न इंजीनियरिंग की डिग्री, न टेक्निकल बैकग्राउंड, BBA छात्र ने बताया कैसे 2010 में Google में मिली नौकरी

Google में नौकरी का सपना देखने वालों में अक्सर इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के छात्रों का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन निखिल दुर्गानी की कहानी इस आम धारणा से बिल्कुल अलग है। उन्होंने न तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और न ही कंप्यूटर साइंस की। इसके बावजूद 2010 में BBA के छात्र रहते हुए उन्हें Google में नौकरी मिल गई। करीब 16 साल तक कंपनी में काम करने के बाद 2026 में उन्होंने 35 साल की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया।

जब कॉलेज कैंपस में Google को देखकर हैरान रह गए छात्र

निखिल का जन्म और पालन-पोषण भारत में हुआ। पढ़ाई के लिए वह कोलकाता के St. Xavier’s College पहुंचे, जहां उन्होंने BBA में दाखिला लिया। साल 2010 में जब वह ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में थे, तभी उनके कॉलेज में Google कैंपस प्लेसमेंट के लिए पहुंचा। यह देखकर छात्रों को काफी हैरानी हुई। वजह थी कॉलेज का माहौल। वहां ज्यादातर छात्र कॉमर्स, आर्ट्स और जर्नलिज्म जैसे विषयों से जुड़े थे। ऐसे में एक बड़ी टेक कंपनी का कैंपस में आना कई छात्रों के लिए किसी पहेली से कम नहीं था। निखिल ने बाद में बताया कि छात्रों के मन में सवाल था कि आखिर Google उनके कॉलेज में क्यों आई है, जबकि वहां इंजीनियरिंग के छात्र ही नहीं हैं।

तब पहली बार सामने आया Google AdWords का नाम

कैंपस भर्ती के दौरान निखिल और उनके साथियों को पता चला कि Google में सिर्फ सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के लिए ही नौकरियां नहीं होतीं। कंपनी के विज्ञापन कारोबार में ऐसे लोगों की भी जरूरत थी, जिन्हें बिजनेस और ग्राहकों की समझ हो। यहीं निखिल की मुलाकात Google AdWords से हुई। यही प्लेटफॉर्म आगे चलकर Google के बड़े विज्ञापन कारोबार का अहम हिस्सा बना और 2018 में इसका नाम बदलकर Google Ads कर दिया गया। निखिल के लिए यह एक ऐसा मौका था, जिसने उनके करियर की दिशा ही बदल दी।

BBA के बाद सीधे Google, शुरुआत Account Optimizer के तौर पर

2010 में निखिल उन तीन छात्रों में शामिल थे, जिन्हें St. Xavier’s College से Google ने चुना था। तीनों की पहली पोस्टिंग हैदराबाद में हुई। निखिल ने Account Optimizer के तौर पर काम शुरू किया। उनकी जिम्मेदारी विज्ञापनदाताओं की ऑनलाइन विज्ञापन कैंपेन को बेहतर बनाने और उन्हें अच्छे नतीजे दिलाने की थी। यानी जिस छात्र ने कॉलेज में BBA पढ़ते हुए Google के कैंपस में आने पर हैरानी जताई थी, कुछ ही समय बाद वह खुद Google की टीम का हिस्सा बन चुका था।

प्लान था सिर्फ दो साल नौकरी करने का

Google ज्वाइन करते समय निखिल ने नहीं सोचा था कि उनका सफर इतना लंबा होने वाला है। उनकी योजना थी कि कुछ साल नौकरी करेंगे और फिर मास्टर्स की पढ़ाई के लिए आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन Google में उन्हें लगातार नई भूमिकाएं और नए अवसर मिलते रहे। इसी वजह से उनका सफर एक नौकरी से बढ़कर लंबा करियर बन गया।

एक रोटेशन प्रोग्राम ने खोले करियर के नए दरवाजे

Google में करीब तीन साल काम करने के बाद निखिल को एक रोटेशन प्रोग्राम में शामिल होने का मौका मिला। इस प्रोग्राम के जरिए कर्मचारी कुछ समय के लिए कंपनी की किसी दूसरी टीम या भूमिका में काम कर सकते थे। इससे उन्हें यह समझने का मौका मिलता था कि वे आगे किस क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं। निखिल के लिए यह अनुभव काफी अहम साबित हुआ। उन्होंने कंपनी के भीतर अलग-अलग भूमिकाओं और टीमों को समझा और अपने करियर का दायरा बढ़ाया।

हैदराबाद से अमेरिका तक पहुंचा सफर

Google में करीब साढ़े तीन साल हैदराबाद में काम करने के बाद निखिल को विदेश जाने का अवसर मिला। वह अमेरिका के मिशिगन स्थित Ann Arbor पहुंचे। यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। भारत से बाहर काम करने के अनुभव ने उनके सामने आगे बढ़ने की नई संभावनाएं खोलीं।इसी दौरान उन्हें Google Singapore जाने का मौका मिला।

Singapore गए तो वहीं बस गई जिंदगी

निखिल करीब 12 साल से सिंगापुर में रह रहे हैं। शुरुआत में यह उनके करियर का अगला पड़ाव था, लेकिन धीरे-धीरे सिंगापुर उनकी स्थायी जिंदगी का हिस्सा बन गया। यहीं उन्होंने अपने परिवार के साथ जीवन बसाया और Google में अपना करियर भी आगे बढ़ाया। भारत के एक कॉलेज से शुरू हुआ उनका सफर पहले हैदराबाद, फिर अमेरिका और आखिरकार सिंगापुर तक पहुंच गया।

15 साल से ज्यादा Google में बिताए, फिर 35 की उम्र में रिटायरमेंट

2010 में शुरू हुआ Google का सफर 2026 में खत्म हुआ। निखिल ने कंपनी में 15 साल से ज्यादा समय बिताने के बाद 35 साल की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया। उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी शुरुआत एक ऐसे मौके से हुई थी, जिसकी उन्होंने शायद उम्मीद भी नहीं की थी। BBA के छात्र निखिल ने जब अपने कॉलेज में Google को देखा था, तब उनके मन में सवाल था “Google यहां क्यों आई है?” लेकिन उसी सवाल का जवाब उनके लिए एक नए करियर के रूप में सामने आया।

आज उनकी कहानी यह बताती है कि किसी कंपनी में करियर बनाने के लिए हमेशा वही डिग्री जरूरी नहीं होती, जिसकी हम कल्पना करते हैं। कभी-कभी आपकी पढ़ाई से ज्यादा मायने रखता है कि आपके सामने आया मौका आपकी काबिलियत से कितना मेल खाता है और आप उस मौके को कितनी दूर तक ले जा पाते हैं।

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JLR Layoffs: टाटा मोटर्स की जगुआर लैंड रोवर में जाएंगी 4000 नौकरियां

टाटा मोटर्स की जगुआर लैंड रोवर ऑटोमोटिव पीएलसी (JLR) अगले दो सालों में 4,000 नौकरियां कम करने जा रही है। कंपनी बढ़ती लागत, गिरती बिक्री और अमेरिकी टैरिफ के असर जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। JLR ब्रिटेन की सबसे बड़ी कार कंपनी है। ‘द टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार देर रात कर्मचारियों को चेतावनी दी गई कि सोमवार को रिडंडेंसी प्रोग्राम (छंटनी) की घोषणा हो सकती है।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, एक बयान में कंपनी ने कहा है कि वह एक स्वैच्छिक छंटनी कार्यक्रम (वॉलंटरी रिडंडेंसी प्रोग्राम) शुरू कर रही है। कंपनी दो सालों में लगभग 2.3 अरब डॉलर की बचत करना चाहती है। बयान के अनुसार, JLR वैश्विक बाजार की स्थितियों को देखते हुए अपने ब्रेक-ईवन पॉइंट को घटाकर 300,000 गाड़ियां करना चाहती है। साथ ही अपने कारोबार को आसान बनाना चाहती है।

JLR दिए हुए है 33000 लोगों को रोजगार

JLR ब्रिटेन में लगभग 33,000 लोगों को रोजगार दिए हुए है। कंपनी की मालिक भारत की टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड है। हाल की तिमाही में JLR का रेवेन्यू लगभग 10 प्रतिशत गिर गया। प्रॉफिट बिफोर टैक्स 69 प्रतिशत घटकर 10.9 करोड़ पाउंड रह गया। कंपनी की पहली इलेक्ट्रिक रेंज रोवर इस महीने की शुरुआत में बिक्री के लिए आई। यह बाजार की सबसे महंगी इलेक्ट्रिक SUV में से एक है।

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Volkswagen में और 50000 लोगों की छंटनी को मंजूरी

जर्मनी की फॉक्सवैगन में जल्द ही और 50000 नौकरियां जा सकती हैं। कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड ने एक बदलाव योजना ‘फ्यूचर प्लान 2030’ को मंजूरी दी है। इसमें 50,000 और नौकरियां खत्म करना, 2035 तक अपने व्हीकल मॉडल लाइनअप को आधा करना और 2027-2031 के दौरान कैपिटल खर्च को 16 प्रतिशत तक कम करना जैसी 12 पहलें शामिल हैं। 50,000 नौकरियां कम करने पर सहमति पहले ही बन चुकी थी और प्रक्रिया चल रही है। अब दुनियाभर में लगभग और 50,000 नौकरियां कम करने के प्लान को मंजूरी मिल गई है।

इसके अलावा फॉक्सवैगन ग्रुप की भारतीय यूनिट अपने 3 साल के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान को तेज कर रही है। इसके कारण कंपनी की लगभग 12 प्रतिशत वर्कफोर्स कम हो जाएगी। स्कोडा ऑटो फॉक्सवैगन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 2025 में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की थी। अब 2027 तक तेजी से छंटनी करने की तैयारी है।

MP Jahrili Sharab: मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब का कहर! 9 लोगों की दर्दनाक मौत, जिले में मचा हड़कंप

MP Jahrili Sharab: एक अधिकारी ने बताया कि मध्य प्रदेश के सागर जिले की बंडा तहसील के चार गांवों में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से शनिवार (5 सितंबर) रात नौ लोगों की मौत हो गई। सागर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) देवेश पटेरिया ने बंडा में पत्रकारों से कहा कि कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से नौ से 10 लोगों की मौत हुई है। उन्होंने बताया कि पांच लोगों की हालत गंभीर होने के कारण उन्हें सागर जिला अस्पताल भेजा गया है।

हालांकि, ‘दैनिक भास्कर’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जहरीली और अवैध शराब पीने से कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई है। जबकि लगभग 35 लोगों को अस्पताल लाया गया है, जिनमें से 24 का अभी भी इलाज चल रहा है। कुछ मरीजों की हालत गंभीर बताई जा रही है। हालांकि, प्रशासन की तरफ से 11 मौतों की पुष्टि नहीं की गई है।

दूसरी तरफ सागर की जिलाधिकारी प्रतिभा पाल ने पत्रकारों से कहा कि यह जरूरी नहीं है कि मौतें जहरीली शराब के सेवन के कारण ही हुई हों। उन्होंने कहा, “कुछ लोग बीमार पड़े हैं और कुछ मौतें भी हुई हैं। सिविल अस्पताल में उनकी जांच की जा रही है। नौराज और घूघर समेत आसपास के चिह्नित इलाकों में चिकित्सकों और अधिकारियों की जांच दल तैनात किए गए हैं।”

जिलाधिकारी ने ग्रामीणों से अपील की है कि पिछले 24 से 48 घंटे के दौरान किसी भी प्रकार की शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति को यदि किसी तरह के लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो वह तुरंत डॉक्टर से जांच कराए।

किस इलाके में हुई है मौत?

DM ने पत्रकारों से कहा, “प्रशासन ऐसे सभी मामलों पर नजर रख रहा है। जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।” बंडा के पूर्व विधायक तरवर लोधी ने दावा किया कि नौ लोगों की मौत जहरीली शराब पीने के कारण हुई है।

उन्होंने न्यूज एजेंसी ‘पीटीआई’ से बातचीत में कहा कि बंडा विकासखंड के बराज, घूघर, नौराज और आसपास के गांवों में रहने वाले कई लोगों ने शनिवार रात शराब का सेवन किया था, जिसके बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। उन्होंने बताया कि परिजन उन्हें इलाज के लिए बंडा के सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने कई लोगों को मृत घोषित कर दिया।

सीएम ने क्या कहा?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने एमपी के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई मौतों पर न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि ऐसी घटनाओं को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने रविवार को कहा, “मैंने प्रभारी मंत्री को निर्देश दिए हैं और अधिकारियों से कहा है कि वे तुरंत कार्रवाई करें, सबसे सख़्त कदम उठाएं और मामले की पूरी जांच करें। हमारी सरकार ऐसी घटनाओं को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी।”

पूर्व विधायक ने बताया कि चार-पांच लोग बंडा सिविल अस्पताल में भर्ती हैं। जबकि चार-पांच लोगों को सागर भेजा गया है। लोधी ने लोगों से अपील की है कि जिन लोगों ने पिछले दो-तीन दिनों में बंडा क्षेत्र की किसी दुकान या अवैध रूप से शराब बेचने वालों से शराब खरीदकर पी है। उन्हें स्वास्थ्य संबंधी थोड़ी भी परेशानी महसूस हो रही है। वे तुरंत अस्पताल पहुंचकर डॉक्टरों से जांच कराएं।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए सागर जिले की जिलाधिकारी (DM) प्रतिभा पाल और पुलिस अधीक्षक (SP) अनुराग सुजानिया के नेतृत्व में जिला प्रशासन और मध्य प्रदेश पुलिस की टीम मौके पर मौजूद है। अधिकारी फिलहाल, मामले की जांच कर रहे हैं।

McDonald’s India पर गंभीर आरोप! इंटर्न का महीनों तक बिना सैलरी काम कराने का दावा, कहा- दो और नौकरियां करनी पड़ीं

सोशल मीडिया पर मैकडॉनल्ड्स इंडिया (McDonald’s India) से जुड़ा एक पोस्ट इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वायरल पोस्ट में एक कथित इंटर्न ने आरोप लगाया है कि उसे कई महीनों तक किए गए काम का भुगतान नहीं किया गया और आर्थिक मजबूरी के चलते उसे दो अतिरिक्त नौकरियां तक करनी पड़ीं। हैरानी की बात यह है कि यह दावा McDonald’s India के आधिकारिक X हैंडल पर एक पोस्ट के जरिए किया गया। हालांकि, McDonald’s India ने इस पोस्ट को कुछ ही देर बाद सोशल मीडिया से डिलीट कर दिया। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

क्या है वायरल पोस्ट में दावा?

वायरल स्क्रीनशॉट में एक कथित इंटर्न ने McDonald’s India के सोशल मीडिया अकाउंट से ट्वीट कर शिकायत दर्ज कराई है। पोस्ट में दावा किया गया है कि वह कंपनी में इंटर्न के तौर पर काम कर रहा था। लेकिन दिसंबर 2025 से उसका भुगतान नहीं किया गया। कथित इंटर्न ने यह भी दावा किया कि वह McDonald’s के कई एशियाई अकाउंट संभाल रहा था।

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लेकिन इसके बावजूद उसके काम का भुगतान नहीं किया गया। आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उसे दो अतिरिक्त नौकरियां करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यही दावा सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है। इसे लेकर इंटर्नशिप, स्टाइपेंड और कंपनियों में युवाओं के साथ होने वाले व्यवहार पर बहस शुरू हो गई है।

इंटर्नशिप या बिना भुगतान के काम?

इस मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है अगर किसी इंटर्न से नियमित कर्मचारी की तरह काम लिया जा रहा है, जिम्मेदारियां दी जा रही हैं और लंबे समय तक काम कराया जा रहा है, तो क्या उसे उचित स्टाइपेंड या भुगतान नहीं मिलना चाहिए? भारत में इंटर्नशिप को लेकर पहले भी सोशल मीडिया पर बहस होती रही है। LinkedIn पर युवाओं की कई पोस्ट में ऐसे अनुभव शेयर किए गए हैं, जिनमें लंबे समय तक बिना भुगतान काम, फुल-टाइम उपलब्धता और वास्तविक सीखने के बजाय नियमित काम करवाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

यूजर्स ने क्या कहा?

वायरल दावे के बाद सोशल मीडिया यूजर्स की प्रतिक्रियाएं मुख्य रूप से दो हिस्सों में नजर आती हैं। एक वर्ग ने कथित इंटर्न का समर्थन करते हुए कहा कि बड़ी कंपनियों से युवाओं को बेहतर कार्य-संस्कृति और भुगतान की उम्मीद होती है। यूजर्स का कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो कंपनी को मामले की जांच कर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

वहीं, कुछ यूजर्स ने बिना पूरी जानकारी के कंपनी को दोषी ठहराने से बचने की सलाह दी। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल किसी स्क्रीनशॉट या पोस्ट को आखिरी सच मानने से पहले संबंधित कंपनी और कथित इंटर्न दोनों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

McDonald’s के लिए क्यों अहम है मामला?

यह मामला ऐसे समय में चर्चा में आया है जब कंपनियों में इंटर्नशिप को लेकर युवाओं की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। किसी बड़े ब्रांड के साथ इंटर्नशिप को छात्र और युवा अक्सर अपने करियर के लिए महत्वपूर्ण अवसर मानते हैं। McDonald’s India से जुड़ी इंटर्नशिप के पुराने रिकॉर्ड भी बताते हैं कि कंपनी के साथ विभिन्न समय पर इंटर्नशिप अवसर उपलब्ध रहे हैं।

कुछ भूमिकाओं में स्टाइपेंड भी दिया गया था। उदाहरण के तौर पर 2017 के एक Internshala रिकॉर्ड में McDonald’s India (South & West) की HR इंटर्नशिप के लिए ₹7,500-15,000 मासिक स्टाइपेंड का उल्लेख था। इसलिए वायरल पोस्ट में लगाए गए वर्तमान आरोपों और कंपनी की सामान्य इंटर्नशिप नीतियों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।

क्या कंपनी की ओर से कोई जवाब आया?

फिलहाल उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों में इस वायरल आरोप पर McDonald’s India का स्पष्ट आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि कथित इंटर्न को वास्तव में महीनों तक भुगतान नहीं किया गया या कंपनी ने जानबूझकर ऐसा किया। पूरे मामले की सच्चाई सामने आने के लिए कथित इंटर्न की पहचान, उसका ऑफर/इंटर्नशिप दस्तावेज, भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड और कंपनी का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है।

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Volkswagen Layoffs: और 50000 लोगों की छंटनी को मंजूरी, भारतीय यूनिट 12% नौकरियों पर चलाएगी कैंची

जर्मनी की फॉक्सवैगन में जल्द ही और 50000 नौकरियां जा सकती हैं। कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड ने एक बदलाव योजना ‘फ्यूचर प्लान 2030’ को मंजूरी दी है। इसमें 50,000 और नौकरियां खत्म करना, 2035 तक अपने व्हीकल मॉडल लाइनअप को आधा करना और 2027-2031 के दौरान कैपिटल खर्च को 16 प्रतिशत तक कम करना जैसी 12 पहलें शामिल हैं। कंपनी ने इसके पीछे ग्लोबल कॉम्पिटीशन, बदलती मांगों और टेक्नोलॉजी में बदलाव का हवाला दिया है।

फॉक्सवैगन यूरोप की सबसे बड़ी कार मेकर है। यह AG, Porsche और Audi की भी मालिक है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, यह फॉक्सवैगन के 89 साल के इतिहास में सबसे बड़ा रीस्ट्रक्चरिंग प्लान है। इसमें जर्मनी के उन 4 प्लांट के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार करना भी शामिल है, जिनके मॉडल अगले दशक में खत्म हो जाएंगे। कंपनी के CEO ओलिवर ब्लूम ने एक बयान में कहा, “यह फॉक्सवैगन ग्रुप के भविष्य के लिए एक मजबूत संकेत है। हम अपने सभी कर्मचारियों, अपने पार्टनर्स और दुनिया भर में इंडस्ट्रियल जॉब्स के लिए जिम्मेदारी ले रहे हैं।”

AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, फॉक्सवैगन के मैनेजमेंट और यूनियनों के बीच इस दशक के आखिर तक कुल 1,00,000 नौकरियां कम करने पर सहमति बन गई है। 50,000 नौकरियां कम करने पर सहमति पहले ही बन चुकी थी और प्रक्रिया चल रही है। अब दुनियाभर में लगभग और 50,000 नौकरियां कम करने के प्लान को मंजूरी मिल गई है।

तगड़ा दबाव झेल रही है Volkswagen

यह फ्यूचर प्लान ऐसे समय में आया है, जब फॉक्सवैगन पर हर तरफ से दबाव है। कंपनी एक ओर अमेरिका के इंपोर्ट टैरिफ और दूसरी तरफ कमजोर चीनी बाजार के बीच फंसी हुई है। फॉक्सवैगन का कहना है कि ग्लोबल वर्कफोर्स क्षमता में और बुनियादी बदलाव की जरूरत है।

Volkswagen India 12% जॉब करने वाली है कट

ब्लूमबर्ग की एक दूसरी रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वालों के हवाले से कहा गया है कि फॉक्सवैगन ग्रुप की भारतीय यूनिट अपने 3 साल के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान को तेज कर रही है। इसके कारण कंपनी की लगभग 12 प्रतिशत वर्कफोर्स कम हो जाएगी। कंपनी भारत में अपने अगले इन्वेस्टमेंट साइकिल से पहले लागत कम करना चाहती है। स्कोडा ऑटो फॉक्सवैगन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 2025 में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की थी। अब 2027 तक तेजी से छंटनी करने की तैयारी है। इसके तहत कुछ सौ व्हाइट-कॉलर और शॉप-फ्लोर नौकरियां खत्म हो सकती हैं।

PayPal Layoffs: फिनटेक कंपनी में छंटनी, भारत में निकाले 600 कर्मचारी

कहा जा रहा है कि इस बदलाव का मकसद फॉक्सवैगन के भारत में नेक्स्ट जनरेशन गाड़ियां लॉन्च करने से पहले कामकाज में करोड़ों डॉलर बचाना है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्कोडा ऑटो फॉक्सवैगन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO पीयूष अरोड़ा का कहना है, “वैसे तो हम अपनी वर्कफोर्स के बारे में अनुमानित आंकड़ों पर कोई टिप्पणी नहीं करते हैं, लेकिन अपनी भारतीय बिजनेस यूनिट्स में कामकाज को बेहतर बनाने की हमारी कोशिशें तेज हो रही हैं।”

यह भी कहा कि आगे चलकर कंपनी अपनी लोकल इंजीनियरिंग टीम को बढ़ा सकती है। साथ ही ग्रुप के लिए एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और एक्सपोर्ट हब के तौर पर भारत में निवेश भी बढ़ा सकती है। भारत में दो दशक यानि कि 20 साल से ज्यादा समय बिताने के बाद भी फॉक्सवैगन की मौजूदगी अपेक्षाकृत कम है।

केन्या के राष्ट्रपति ने टाटा केमिकल्स को कामकाज बंद करने का दिया आदेश, 100 साल पुराने कारोबार पर लगाया ब्रेक!

Tata company out in Kenyan: केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो ने कहा है कि ‘टाटा केमिकल्स (Tata Chemicals)’ को काजियाडो काउंटी के लेक मगाडी में अपने खनन कामकाज तत्काल बंद करने का आदेश दिया है। Reuters की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूटो ने गुरुवार (3 सितंबर) को कहा, “उन्होंने भारत की टाटा केमिकल्स (TTCH.NS) को केन्या में अपना कामकाज रोकने का आदेश दिया है, क्योंकि कंपनी की मौजूदगी से देश को कोई फायदा नहीं हुआ।” रूटो ने कहा कि सरकार टाटा केमिकल्स का कामकाज संभालने के लिए दो नई कंपनियां लाएगी।

इस फैसले के साथ इलाके में टाटा केमिकल्स और उससे पहले की कंपनियों की करीब 100 साल से चली आ रही खनिज गतिविधियों (मिनरल निकालने के काम) पर विराम लग गया है। दक्षिणी केन्या में विकास कार्यों के दौरे के दौरान रुटो ने कंपनी पर आरोप लगाया कि कंपनी ने दशकों तक इलाके में मौजूद सोडा ऐश के विशाल प्राकृतिक भंडार का इस्तेमाल करने के बावजूद कोई ठोस आर्थिक विकास, रोजगार या स्थानीय औद्योगिक ढांचा नहीं बनाया।

क्या है पूरा विवाद?

राष्ट्रपति रूटो ने कंपनी पर आरोप लगाया कि इतने लंबे समय तक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करने के बावजूद काजियाडो एरिया में स्थानीय लोगों के लिए पर्याप्त रोजगार, उद्योग और आर्थिक विकास का आधार तैयार नहीं किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कच्चा माल विदेश क्यों भेजा जाता रहे और स्थानीय समुदाय को उसका पर्याप्त लाभ क्यों न मिले।

‘उन्होंने यहां कुछ नहीं बनाया’

Reuters के मुताबिक, दक्षिणी केन्या के विकास दौरे के दौरान काजियाडो में लोगों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रूटो ने टाटा के पुराने कारोबार पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कंपनी को करीब 100 साल तक कॉन्ट्रेक्ट मिला। लेकिन उसने काजियाडो में कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं लगाई। रुटो ने जोर देकर कहा कि भविष्य में माइनिंग लाइसेंस के लिए निवेशकों को कच्चे सोडा ऐश को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात करने के बजाय स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट बनाने की शर्त माननी होगी।

रूटो ने कथित तौर पर कहा, “उस टाटा कंपनी के पास 100 साल का कॉन्ट्रैक्ट था। उन्होंने काजियाडो में कुछ नहीं बनाया। उन्होंने काजियाडो में कोई फैक्ट्री नहीं बनाई। हमने कहा है कि हम एक नई कंपनी लाएंगे और उन्हें यहां काजियाडो में कांच की एक बड़ी कंपनी और केमिकल बनाने वाली एक और कंपनी लगानी चाहिए। क्या हम दूसरे लोगों के गुलाम हैं?”

टाटा के खिलाफ कार्रवाई की वजह क्या बताई गई?

राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब केन्या के खनन मंत्रालय ने पहले ही टाटा के खनन संचालन पर रोक लगा दी थी। 28 जुलाई को खनन मामलों के कैबिनेट सचिव हसन जोहो ने कंपनी के संचालन को निलंबित किया था। अधिकारियों की ओर से इसके पीछे कई कथित नियामकीय उल्लंघनों का हवाला दिया गया, जिनमें स्थानीय खरीद संबंधी कानूनों का पालन न करना, निर्यात से जुड़े रिकॉर्ड में कथित गड़बड़िया और काउंटी के भूमि करों का कथित रूप से भुगतान न करना शामिल हैं।

टाटा का बयान

हालांकि, टाटा केमिकल्स का कहना है कि उसने केन्या के नियमों का पालन किया है। कंपनी का यह भी दावा है कि वह लेक मगाडी के आसपास रहने वाली करीब 30,000 स्थानीय आबादी को स्वास्थ्य और पानी जैसी आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराती है। जुलाई के आखिर में टाटा ने कहा था कि केन्या सरकार ने उसकी यूनिट टाटा केमिकल लिमिटेड को मगाडी सोडा फैक्ट्री में कामकाज रोकने और सोडा ऐश का एक्सपोर्ट बंद करने का आदेश दिया है।

टाटा ने 2005 में संभाला था कारोबार

लेक मगाडी में सोडा ऐश का खनन कोई नया कारोबार नहीं है। टाटा केमिकल्स ने 2005 में ऐतिहासिक Magadi Soda Company का अधिग्रहण किया था। इसके बाद से टाटा ग्रुप इस क्षेत्र में सोडा ऐश और उससे जुड़े खनिज कारोबार से जुड़ा रहा है। सोडा ऐश का इस्तेमाल मुख्य रूप से कांच, रसायन और अन्य औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। अब रूटो सरकार चाहती है कि केन्या अपने प्राकृतिक संसाधनों का सिर्फ निर्यात न करे। बल्कि केन्या के भीतर ही उनका वैल्यू एडिशन और औद्योगिक उत्पादन हो।

विपक्ष ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

राष्ट्रपति रूटो के इस फैसले के बाद केन्या में राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। विपक्षी डेमोक्रेसी फॉर सिटिजन्स पार्टी (DCP) के नेताओं ने सरकार पर राज्य प्रायोजित आर्थिक तोड़फोड़ का आरोप लगाया है। विपक्ष का दावा है कि टाटा के संचालन पर रोक लगाने से 1 लाख से ज्यादा लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। इससे सैकड़ों प्रत्यक्ष नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।

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विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि इस कार्रवाई के पीछे कोई दूसरा राजनीतिक मकसद हो सकता है। उनका दावा है कि लेक मगाडी एरिया में मौजूद संभावित लिथियम भंडार और तेल संसाधनों पर नए कारोबारी और राजनीतिक सहयोगियों को मौका देने के लिए मौजूदा कंपनी पर दबाव बनाया जा रहा है। हालांकि केन्याई सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।

अमेरिका ने की वेनेजुएला से तेल के लिए दुनिया की सबसे बड़ी डील, अब सस्ता होगा पेट्रोल!

अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ एक ऐसा सौदा किया है, जिसके तहत इसे 6500 करोड़ बैरल से अधिक के प्रूवेन यानी मिल चुके तेल भंडार पर मेजॉरिटी कंट्रोल मिलेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार तड़के यह दावा किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इस सौदे के बारे में ऐलान किया। ट्रंप ने दुनिया के इतिहास में इसे अब तक की सबसे बड़ी ऑयल डील कहा है और कहा कि इससे अमेरिका का तेल भंडार दोगुना से अधिक हो जाएगा। हालांकि उन्होंने समझौते की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि इसके बदले वेनेजुएला को क्या मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह सौदा अमेरिका और वेनेजुएला के बीच पहले से मजबूत होते संबंधों को और मजबूत करेगा।

दावा: अमेरिका और वेनेजुएला, दोनों के लिए फायदे का सौदा

ट्रंप के अनुसार अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के साथ मिलकर निजी कंपनियों की साझेदारी के जरिए इस सौदे पर बातचीत की। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस समझौते को अमेरिकी और वेनेजुएला के लोगों के लिए बहुत बड़ी जीत बताया। ट्रंप कीके ऐलान के तुरंत बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व नाम Twitter) पर उन्होंने कहा कि इस समझौते से अमेरिका को स्थिर और कम लागत वाला तेल मिलेगा, तो वेनेजुएला में लगभग $10 हजार करोड़ के निजी निवेश, हजारों अच्छी सैलरी वाली नौकरियां और देश की अर्थव्यवस्था को फिर से ट्रैक पर लाने में मदद मिल सकती है।

वेनेजुएला में बढ़ रहा अमेरिका का दखल!

दोनों देशों के बीच यह समझौता वेनेजुएला में महीनों तक चली अमेरिका की गहरी दखलंदाजी के बाद हुआ है जोकि जनवरी में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे निकोलस मादुरो को हटाए जाने और उनके पकड़े जाने के बाद शुरू हुई थी। मादुरो के उपराष्ट्रपति रहे रोड्रिगेज ने फिर अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर कमान संभाली और अमेरिका ने उनकी सरकार के साथ बेहतर साझेदारी की उम्मीद की। वेनेजुएला में दुनिया का सबसे बड़ा प्रूवेन तेल भंडार है, जिसका अनुमान लगभग 30 हजार करोड़ बैरल है।

एक्सियोस ने गुरुवार को दो अमेरिकी अधिकारियों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तेल के ऐसे 12 प्रोडक्टिव ऑयल फील्ड्स के बारे में बातचीत चल रही थी, जिनमें लगभग 9000 करोड़ बैरल का पक्का भंडार है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियां मालिकाना हक के बदले इन जगहों को डेवलर करेंगी, तो वेनेजुएला को तेल से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा मिलेगा। वेनेजुएला में अभी हर दिन लगभग 12.5 लाख बैरल कच्चा तेल निकलता है।

खत्म हुआ इंतजार, जैक्सन होल की बैठक में अमेरिकी फेड ने महंगाई को लेकर जताई चिंता

फेड चेयरमैन केविन वार्श ने महंगाई पर चेताया, बोले- 2% इंफ्लेशन का लक्ष्य हासिल करना जरूरी

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वार्श ने महंगाई को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि महंगाई अभी इतनी नहीं घटी है कि फेड निश्चिंत हो सके। जब तक महंगाई के 2% लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ने का भरोसा नहीं होता, तब तक फेड को काम करना होगा।

यह मई में फेड चेयर बनने के बाद वार्श का पहला बड़ा भाषण था। उन्होंने शुक्रवार को अमेरिका के व्योमिंग में जैक्सन होल में फेड के सालाना सम्मेलन में यह बात कही। वार्श ने कहा कि 2% का महंगाई लक्ष्य तय है। फेड इसी लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करेगा। उनके मुताबिक, कीमतों में स्थिरता लाना फेड की जिम्मेदारी है।

महंगाई में अभी बड़ा सुधार नहीं

वार्श ने कहा कि गर्मियों में PCE और CPI के आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे हैं। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि महंगाई की मूल स्थिति में बड़ा सुधार आ गया है। उन्होंने कहा कि महंगाई अभी भी 2% से ऊपर है। इसलिए फिलहाल फेड का मुख्य फोकस कीमतों पर होना चाहिए।

ब्याज दर है फेड का बड़ा हथियार

वार्श के मुताबिक, मौजूदा वित्तीय स्थितियां अभी बहुत सख्त नहीं हैं। ऐसे में ब्याज दर फेड का सबसे अहम हथियार है। उन्होंने कहा कि महंगाई अपने आप 2% तक नहीं आएगी। इसे स्थिर करना फेड की जिम्मेदारी है।

ब्याज दर बढ़ाने पर बंटी राय

अब बड़ा सवाल ब्याज दरों को लेकर है। अर्थशास्त्रियों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि महंगाई को काबू करने के लिए आने वाले महीनों में दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं।

जुलाई की बैठक में फेड ने ब्याज दरों को स्थिर रखा था। हालांकि, कई अधिकारियों ने दर बढ़ाने का समर्थन किया था। बैठक के मिनट्स में भी संकेत मिले थे कि अगर महंगाई कम नहीं हुई तो फेड को नीति और सख्त करनी पड़ सकती है।

पिछली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर हुई थी आलोचना

जुलाई की बैठक के बाद वार्श की प्रेस कॉन्फ्रेंस की आलोचना भी हुई थी। आलोचकों का कहना था कि वह दरें स्थिर रखने की वजह साफ तरीके से नहीं बता पाए।

उसके बाद निवेशकों ने लंबी अवधि वाले अमेरिकी बॉन्ड बेचने शुरू किए। इससे उनकी यील्ड करीब दो दशक के उच्च स्तर तक पहुंच गई। इसे फेड के 2% महंगाई लक्ष्य को लेकर निवेशकों के भरोसे में कमी के संकेत के तौर पर देखा गया।

अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत

हालांकि, जुलाई की बैठक के बाद कुछ आंकड़ों से अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत मिले हैं। जुलाई में रिटेल बिक्री एक साल से ज्यादा समय में सबसे ज्यादा गिरी। कोर महंगाई भी सीमित रही। कंपनियों ने जुलाई में उम्मीद के उलट नौकरियां घटाईं। इससे पहले के दो महीनों के रोजगार आंकड़ों में भी कटौती की गई।

इन आंकड़ों के बाद सितंबर में ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद कम हुई है। शुक्रवार सुबह फेडरल फंड्स फ्यूचर्स के मुताबिक, सितंबर में दर बढ़ने की संभावना करीब 36% थी। जुलाई के अंत में यह 70% से ज्यादा थी।

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मराठी सीखने के लिए ऑटो-कैब ड्राइवरों को 1 साल की मोहलत, CM फडणवीस का बड़ा ऐलान

Maharashtra Language Controversy: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गुरुवार को घोषणा की कि राज्य सरकार के भाषा संबंधी आदेश को लेकर हो रहे विरोध और राजनीतिक विवाद के बीच, ऑटो-रिक्शा और कैब ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए एक साल का समय दिया जाएगा। फडणवीस ने कहा कि अगले एक साल तक ड्राइवरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, ताकि उन्हें मराठी का कामकाजी ज्ञान हासिल करने के लिए समय मिल सके।

फडणवीस ने कहा, “मैंने कैब और ऑटो ड्राइवरों से मुलाकात की। वे सभी इस बात से सहमत हैं कि हर किसी को मराठी आनी चाहिए, लेकिन उन्होंने कहा कि इस पेशे में अलग-अलग उम्र के लोग हैं और उनके लिए जल्दी मराठी सीखना मुश्किल है। उन्होंने एक योजना तैयार की है और इसके लिए एक साल का समय मांगा है। हालांकि, राज्य सरकार ने यह मांग मान ली है। इस साल कोई कार्रवाई नहीं होगी।”

बता दें कि यह घोषणा महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के उस बयान के कुछ दिनों बाद की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो ड्राइवर मराठी का कामकाजी ज्ञान दिखाने में विफल रहेंगे, उनके ऑथराइजेशन बैज सस्पेंड किए जा सकते हैं।

मराठी भाषा को लेकर बढ़ा विवाद

महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर सख्ती के बीच मुंबई के कुछ ऑटो ड्राइवर बिहार और उत्तर प्रदेश लौटने लगे हैं। वहीं, पुणे में कुछ ड्राइवर RTO की कार्रवाई से बचने के लिए यात्रियों से बातचीत के दौरान सतर्कता बरत रहे हैं।

मराठी से जुड़ा नया नियम क्या है?

सरनाईक ने कहा था कि अगर ड्राइवर को मराठी की कामकाजी जानकारी नहीं है, तो उसका ड्राइवर बैज शुरू में एक महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। इस महीने की शुरुआत में बदले गए नियमों के मुताबिक, अगर ड्राइवर उस समय में भाषा नहीं सीख पाता है, तो बैज रद्द करने से पहले उसे तीन महीने का और समय दिया जाएगा।

मंत्री ने यह भी कहा था कि जो ड्राइवर चार महीने बाद भी मराठी नहीं सीख पाते हैं, वे असल में यह दिखा रहे होंगे कि उन्हें “भाषा से प्यार नहीं है” और उन्हें मराठी पहचान की जरूरत नहीं है।

इस बीच, सरनाईक ने मंगलवार को आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक नेता मुंबई और ठाणे में “मराठी-हिंदी” विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए।

बता दें कि भाषा से जुड़े इस नियम की वजह से दूसरे राज्यों से आए ड्राइवरों के बीच भी तनाव पैदा हो गया है। सोमवार को मुंबई के कांदिवली इलाके में चार ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों ने कथित तौर पर मराठी बोलने वाले एक ड्राइवर के साथ मारपीट की, क्योंकि उसने मराठी भाषा की जानकारी की अनिवार्यता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

यह घटना उस समय हुई, जब बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा ड्राइवर MG रोड पर सरकार की मराठी भाषा संबंधी अनिवार्यता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने दूसरे ऑटो ड्राइवरों से भी अपने वाहन चलाना बंद करने को कहा।

सरकार के इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। चार कैब ड्राइवरों ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब ड्राइवरों के लिए काम चलाने लायक मराठी जानना जरूरी किए जाने वाले नियम पर रोक लगाने की मांग की है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 12 अगस्त को जारी सरकारी नोटिफिकेशन से लाखों “गरीब और प्रवासी” ड्राइवरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कोर्ट से इस नियम को लागू करने पर फिलहाल रोक लगाने की मांग की है।

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पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल देने पर विचार, E20 को हटाने का कोई प्लान नहीं: BPCL

भारत में E20 पेट्रोल को लेकर बहस के बीच पुराने गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल उपलब्ध कराने पर विचार हो रहा है। सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनी BPCL के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर संजय खन्ना ने गुरुवार को यह जानकारी दी। हालांकि, उन्होंने साफ कहा कि E20 को हटाकर दोबारा E10 लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

E10 और E20 में क्या अंतर है?

E10 पेट्रोल में 10% इथेनॉल और 90% पेट्रोल होता है। वहीं E20 में 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है। E20 को लेकर पुरानी गाड़ियों के मालिकों की चिंता रही है। इसमें माइलेज, फ्यूल सिस्टम के पार्ट्स और मरम्मत से जुड़े सवाल उठे हैं।

पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पर विचार

ऑयल मार्केटिंग कंपनी BPCL के मुताबिक, पुरानी गाड़ियों के लिए अलग से E10 उपलब्ध कराने का विकल्प देखा जा रहा है। संजय खन्ना ने कहा कि मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर से E10 की सप्लाई करना संभव है। हालांकि, E10 और E20 को एक साथ उपलब्ध कराने के तरीके पर अभी चर्चा चल रही है।

E10 की सप्लाई में क्या दिक्कत है?

ऑयल मार्केटिंग कंपनी BPCL को E10 की सप्लाई में कोई बड़ी लॉजिस्टिक दिक्कत नजर नहीं आती। लेकिन अगर E10 और E20 दोनों को एक साथ बेचना है, तो अलग ग्रेड के पेट्रोल की सप्लाई संभालनी होगी। इसी वजह से सरकार और कंपनियां इसके तौर-तरीकों पर काम कर रही हैं।

E20 को वापस लेने का प्लान नहीं

सरकार पहले ही कह चुकी है कि E20 से वापस E10 या E0 पर जाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने 10 अगस्त को राज्यसभा में कहा था कि देशभर के एक लाख से ज्यादा पेट्रोल पंपों पर E0, E10 और E20 की अलग-अलग सप्लाई रखने से लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज की लागत बढ़ेगी।

हालांकि, BPCL के ताजा बयान से साफ है कि E10 को E20 के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि पुरानी गाड़ियों के लिए एक अलग विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

E10 की मांग क्यों उठी?

E20 को लेकर पुरानी गाड़ियों के मालिकों की चिंता बढ़ी है। लोगों का कहना है कि ज्यादा इथेनॉल वाले पेट्रोल से माइलेज पर असर पड़ सकता है। कुछ पुरानी गाड़ियों में फ्यूल सिस्टम के पार्ट्स की अनुकूलता को लेकर भी सवाल हैं।

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी 17 अगस्त को एक लेख में सुझाव दिया था कि पुरानी गाड़ियों के मालिकों की परेशानी दूर करने के लिए पेट्रोल पंपों पर E10 के साथ E20 भी उपलब्ध कराया जा सकता है।

E20 की शुरुआत कैसे हुई?

केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल से ऑयल कंपनियों को 20% तक इथेनॉल मिला पेट्रोल बेचने का निर्देश दिया था। इस पेट्रोल का न्यूनतम Research Octane Number यानी RON 95 होना भी जरूरी किया गया। इसके बाद पुरानी गाड़ियों के मालिकों में माइलेज और गाड़ी की सेहत को लेकर चिंता बढ़ी।

फिलहाल तस्वीर यही है कि E20 की व्यवस्था जारी रहेगी। पुरानी गाड़ियों के लिए E10 उपलब्ध कराने का विकल्प जरूर सरकार और ऑयल कंपनियों की चर्चा में है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।