2030 तक ₹20 लाख करोड़ का हो सकता है EV मार्केट, 5 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी: नितिन गडकरी

भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी EV बाजार तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को कहा कि 2030 तक भारत का EV बाजार ₹20 लाख करोड़ का हो सकता है। इससे करीब 5 करोड़ नौकरियां पैदा होने का अनुमान है।

गडकरी ने CII-ITC Centre of Excellence for Sustainable Development के एक कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने बताया कि भारत में अभी करीब 57 लाख इलेक्ट्रिक व्हीकल रजिस्टर्ड हैं। देश में EV की गाड़ियों के मार्केट में हिस्सेदारी करीब 7% है।

EV बाजार में बड़ा मौका

गडकरी के मुताबिक, भारत के EV सेक्टर में आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार हो सकता है। सरकार इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा दे रही है। इससे वाहन निर्माण के साथ बैटरी, चार्जिंग और इससे जुड़े दूसरे कारोबार भी बढ़ सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि बजाज ऑटो और हीरो मोटोकॉर्प जैसे बड़े टू-व्हीलर निर्माता भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता दिखा रहे हैं। दोनों कंपनियां अपने बनाए 50% से ज्यादा वाहन विदेशों में एक्सपोर्ट करती हैं।

इलेक्ट्रिक बसों की मांग ज्यादा

गडकरी ने कहा कि भारत में हर साल करीब 1 लाख इलेक्ट्रिक बसों की जरूरत है। लेकिन घरेलू कंपनियां अभी सिर्फ 50,000 से 60,000 इलेक्ट्रिक बसें सालाना बना रही हैं।

यानी इस सेगमेंट में अभी भी बड़ी कमी है। सरकार का फोकस घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर है। इससे इलेक्ट्रिक बस बनाने वाली कंपनियों के लिए भी अवसर बढ़ सकते हैं।

ऑटो सेक्टर को नंबर-1 बनाने का लक्ष्य

गडकरी ने कहा कि सरकार अगले पांच साल में भारत के ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को दुनिया का नंबर-1 बनाना चाहती है। उन्होंने माना कि लक्ष्य मुश्किल है। लेकिन इसे हासिल करना असंभव नहीं है।

उनके मुताबिक, जब उन्होंने परिवहन मंत्री का पद संभाला था, तब भारत का ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री करीब ₹14 लाख करोड़ का था। अब इसका आकार करीब ₹22 लाख करोड़ हो गया है।

अमेरिका और चीन से पीछे भारत

गडकरी के मुताबिक, अमेरिका का ऑटोमोबाइल उद्योग करीब ₹78 लाख करोड़ का है। चीन का उद्योग करीब ₹47 लाख करोड़ का है। वहीं भारत का ऑटो सेक्टर करीब ₹23 लाख करोड़ का है।

उन्होंने कहा कि भारत के पास प्रशिक्षित कर्मचारी और प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है। इसलिए देश के पास वैश्विक ऑटो हब बनने की क्षमता है।

फॉसिल फ्यूल इंपोर्ट घटाने पर जोर

गडकरी ने कहा कि भारत हर साल करीब ₹22 लाख करोड़ का फॉसिल फ्यूल इंपोर्ट करता है। इससे देश के आयात बिल के साथ प्रदूषण भी बढ़ता है। उन्होंने बायोफ्यूल और दूसरे वैकल्पिक ईंधनों को भविष्य के लिए अहम बताया।

लॉजिस्टिक्स लागत 8% करने का लक्ष्य

सरकार लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर GDP के करीब 8% तक लाने का लक्ष्य रखती है। गडकरी के मुताबिक, इससे भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी।

उन्होंने बताया कि IIT चेन्नई, IIT कानपुर और IIM बेंगलुरु की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक्सप्रेसवे और इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत करीब 16% से घटकर 10% रह गई है। सरकार इसे और घटाकर 8% तक लाना चाहती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

2030 तक EV सेक्टर में आएंगी 5 करोड़ नौकरियां, 20 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचेगा मार्केट! नितिन गडकरी का बड़ा दावा

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को कहा कि भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बाजार 2030 तक 20 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसके साथ ही इस सेक्टर में 5 करोड़ नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है।

PTI की रिपोर्ट के अनुसार, CII-ITC सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित एक समिट को संबोधित करते हुए गडकरी ने कहा कि भारत में अभी 57 लाख इलेक्ट्रिक वाहन रजिस्टर्ड हैं और ऑटोमोबाइल बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब 7 प्रतिशत है।

उन्होंने कहा, “2030 तक भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मार्केट 20 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। इससे 2030 तक पांच करोड़ नौकरियां भी पैदा होंगी।”

इस दौरान गडकरी ने भारत की दो सबसे बड़ी टू-व्हीलर बनाने वाली कंपनियों, बजाज ऑटो और हीरो मोटोकॉर्प की एक्सपोर्ट क्षमता का भी जिक्र किया और कहा कि वे अपने बनाए गए वाहनों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा का एक्सपोर्ट करती हैं।

भारत को और ज्यादा इलेक्ट्रिक बसों की जरूरत

गडकरी ने कहा कि भारत में हर साल एक लाख इलेक्ट्रिक बसों की मांग है, लेकिन देश के मैन्युफैक्चरर अभी साल में सिर्फ 50,000-60,000 EV बसें ही बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य अगले पांच सालों में भारत के ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को दुनिया में सबसे बड़ा बनाना है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के पास ट्रेंड मैनपावर और कॉम्पिटिटिव व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं हैं।

गडकरी ने आगे कहा, “अगले पांच सालों में हमारा लक्ष्य भारत के ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को दुनिया में नंबर 1 बनाना है… यह मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं।”

उन्होंने कहा कि भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर का आकार काफी बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर का पद संभाला था, तब इस सेक्टर की वैल्यू 14 लाख करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 22 लाख करोड़ रुपये हो गई है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अभी US के ऑटोमोबाइल सेक्टर की वैल्यू 78 लाख करोड़ रुपये है, इसके बाद चीन 47 लाख करोड़ रुपये के साथ दूसरे और भारत 23 लाख करोड़ रुपये के साथ तीसरे स्थान पर है।

फॉसिल फ्यूल के इंपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने पर जोर

गडकरी ने कहा कि भारत फॉसिल फ्यूल के इंपोर्ट पर 22 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है, जिससे प्रदूषण भी बढ़ता है।

उन्होंने कहा, “हम अच्छे हाईवे बना रहे हैं… अच्छे रास्ते और उनके विकल्प तैयार कर रहे हैं, और बायो-फ्यूल ही भविष्य है।”

लॉजिस्टिक्स लागत के बारे में गडकरी ने कहा कि सरकार का लक्ष्य इसे घटाकर 8% तक लाना है। उनका तर्क है कि लॉजिस्टिक्स लागत कम होने से ग्लोबल मार्केट में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धा क्षमता) बेहतर होगी।

गडकरी ने कहा कि IIT चेन्नई, IIT कानपुर और IIM बैंगलोर की हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि एक्सप्रेसवे और इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत 16% से घटकर 10% हो गई है।

उन्होंने कहा, “सरकार का लक्ष्य लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर 8% करना है, जिससे भारत को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिलेगी।”

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Bill Gates AI Warning: AI की रफ्तार देख सन्न रह गए बिल गेट्स! नौकरियों को लेकर दे दी ये बड़ी चेतावनी

Bill Gates AI Warning: माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर अब तक की सबसे बड़ी चेतावनी दी है। एक इंटरव्यू में गेट्स ने कहा कि AI की तरक्की जिस तेज रफ्तार से हो रही है, वह उनकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा आगे निकल चुकी है। उन्होंने आगाह किया कि अगर सरकारों और टेक कंपनियों ने समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए, तो दुनिया को बड़े पैमाने पर नौकरियों के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

‘मैं खुद हैरान हूं’: कोडिंग में AI ने दी मात

‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ को दिए इंटरव्यू में कोडिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र में दशकों का अनुभव रखने वाले बिल गेट्स ने स्वीकार किया कि Anthropic के Claude जैसे AI टूल्स की क्षमताओं ने उन्हें पूरी तरह चौंका दिया है।

गेट्स ने कहा, ‘यह विचार कि अब ये AI टूल्स कई मामलों में मुझसे भी बेहतर काम कर रहे हैं, यह मेरे लिए हैरान कर देने वाला है।’

गेट्स के मुताबिक, AI क्रांति पुरानी औद्योगिक या डिजिटल क्रांतियों से बिल्कुल अलग है। पहले की तकनीकों ने पुरानी नौकरियां खत्म करके नए रोजगार पैदा किए थे, लेकिन AI जिस पैमाने पर इंसानों को रिप्लेस कर रहा है, उससे दूसरे क्षेत्रों में नई नौकरियां बच पाना मुश्किल होगा।

टेक कंपनियां क्यों छुपा रही हैं AI का असली खतरा?

गेट्स ने टेक इंडस्ट्री के दिग्गजों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनियां भारी फंड जुटाने के चक्कर में इसके खतरों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘प्राइवेट में AI समझने वाले लोग बेहद डरे हुए हैं। लेकिन कोई खुलकर नहीं बोल रहा क्योंकि इससे अगली ट्रिलियन डॉलर की फंडिंग रुकने का डर है।’

कंपनियां बिना किसी सुरक्षा मानकों के सिर्फ इस उम्मीद में आगे बढ़ रही हैं कि AI का अच्छा पहलू इसके बुरे असर को ढक लेगा।

गेट्स ने क्या सुझाया AI का समाधान?

AI के बढ़ते खतरे से आम जनता और नौकरियों को बचाने के लिए बिल गेट्स ने दो प्रमुख प्रस्ताव रखे हैं:

AI Tax: कंपनियों द्वारा इंसानों की जगह AI का इस्तेमाल करने पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। इस टैक्स से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल नौकरियां गंवाने वाले लोगों की मदद के लिए किया जाए।

‘Human Reserved’ जॉब्स: कुछ संवेदनशील पेशों (जैसे- केयरगिविंग, नर्सिंग और व्यक्तिगत देखभाल) को पूरी तरह ‘ह्यूमन रिजर्व्ड’ घोषित किया जाए, ताकि इन क्षेत्रों में AI के प्रवेश पर बैन रहे और इंसानी नौकरियां सुरक्षित रहें।

जैविक हथियारों का बड़ा खतरा

नौकरियों के अलावा, बिल गेट्स ने एडवांस AI से उत्पन्न होने वाले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा खतरों पर भी चिंता जताई। गेट्स ने चेतावनी दी कि अगर AI का इस्तेमाल नए मॉलिक्यूल्स या खतरनाक बायोलॉजिकल हथियार बनाने में किया गया, तो यह तबाही ला सकता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त समझौते और मैंडेटरी रिव्यू की मांग की है, ताकि AI का दुरुपयोग बायो-टेररिज्म के लिए न हो सके।

बिल गेट्स का मानना है कि AI सुरक्षा का मुद्दा अब वैश्विक स्वास्थ्य जितना ही गंभीर हो चुका है और वे इसे दुनिया भर के नेताओं के सामने उठाएंगे। उन्होंने साफ कहा कि इनोवेशन हमेशा सही हो ऐसा जरूरी नहीं, और फिलहाल AI जिस दिशा में जा रहा है, वह एक बड़ी चेतावनी है।

दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बनाएंगे मस्क:ये मैनहट्टन शहर से 8 गुना बड़ी जमीन पर बनेगा, हर साल हजारों स्टारशिप रॉकेट लॉन्च होंगे

इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स अमेरिका के दक्षिणी लुइसियाना में दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बना रही है। इस प्रोजेक्ट पर कंपनी 100 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹9.50 लाख करोड़ का निवेश करेगी। ‘स्टारबेस, लुइसियाना’ स्पेसएक्स का दूसरा ‘स्टारबेस’ कैंपस होगा। यह नया स्पेसपोर्ट लुइसियाना के पिकान आइलैंड पर 1.25 लाख एकड़ में फैला होगा, जो कि न्यूयॉर्क के मैनहट्टन शहर से भी आठ गुना बड़ा है। यहां से स्पेसएक्स के नेक्स्ट-जनरेशन रॉकेट ‘स्टारशिप’ और AI बेस्ड सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। कंस्ट्रक्शन साल 2029 से शुरू होने की उम्मीद है। 3,000 नई नौकरियां मिलेंगी, औसत सैलरी ₹88 लाख सालाना होगी लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री ने इसे राज्य की इकोनॉमी के लिए बड़ा कदम बताया है। लैंड्री के मुताबिक, इस स्पेसपोर्ट से क्षेत्र में कम से कम 3 हजार से ज्यादा डायरेक्ट नौकरियां पैदा होंगी। यहां काम करने वाले कर्मचारियों की औसत सालाना सैलरी 92,600 डॉलर यानी करीब 88 लाख रुपए होगी, जो वर्मिलियन पैरिश की मौजूदा औसत इनकम से लगभग दोगुनी है। गवर्नर ने कहा, “यह प्रोजेक्ट रोजगार, समुदायों के लिए प्रगति और हमारे तटीय इलाकों के लिए सुरक्षा लेकर आएगा।” ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा कैंपस, खुद बनाएगा ईंधन और बिजली स्पेसएक्स की प्रेसिडेंट ग्विन शॉटवेल ने बताया कि यह कैंपस पूरी तरह ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा। खुद का ईंधन और बिजली: कॉम्प्लेक्स के भीतर ही रॉकेट प्रोपेलेंट के लिए मीथेन गैस का उत्पादन होगा और इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन फैसिलिटी लगाई जाएगी। शिपिंग और ट्रांसपोर्ट: स्टारशिप रॉकेट्स को लाने-ले जाने के लिए डीप-वॉटर शिपिंग पोर्ट और व्हीकल प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाई जाएंगी। एक डेडिकेटेड एयरपोर्ट भी बनाया जा सकता है। शॉटवेल ने कहा कि इस फैसिलिटी का लक्ष्य हर साल स्टारशिप के हजारों उड़ानों को सपोर्ट करना है, हालांकि यह इंजीनियरिंग और रेग्युलेटरी अप्रूवल पर निर्भर करेगा। रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग नहीं सिर्फ लॉन्चिंग होगी यह लुइसियाना कैंपस स्पेसएक्स के टेक्सास स्थित ‘स्टारबेस’ से काफी अलग होगा। टेक्सास में रॉकेट्स का निर्माण और असेंबली की जाती है, जबकि लुइसियाना फैसिलिटी में रॉकेट की मैन्युफैक्चरिंग नहीं होगी। इसका मुख्य फोकस केवल हाई-फ्रीक्वेंसी यानी तेज गति से लॉन्चिंग पर रहेगा। पिकान आइलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से रॉकेट्स को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में आसानी से भेजा जा सकता है। यह ऑर्बिट सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स के लिए सबसे मुफीद मानी जाती है। लुइसियाना स्पेसपोर्ट के जरिए मस्क दो बड़े लक्ष्य… नॉलेज पार्ट: क्या होता है ‘सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट’? यह पृथ्वी का एक ऐसा ऑर्बिटहै जिसमें सैटेलाइट हमेशा सूर्य के एक ही कोण के साथ यात्रा करती है। यानी सैटेलाइट जिस जगह से भी गुजरती है, वहां हमेशा धूप होती है। सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स और अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स के लिए यह ऑर्बिट सबसे बेस्ट मानी जाती है।

दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बनाएंगे मस्क:ये मैनहट्टन से 8 गुना बड़ी जमीन पर बनेगा, हर साल हजारों स्टारशिप रॉकेट लॉन्च होंगे

इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स अमेरिका के दक्षिणी लुइसियाना में दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बना रही है। इस प्रोजेक्ट पर कंपनी 100 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹9.50 लाख करोड़ का निवेश करेगी। ‘स्टारबेस, लुइसियाना’ स्पेसएक्स का दूसरा ‘स्टारबेस’ कैंपस होगा। यह नया स्पेसपोर्ट लुइसियाना के पिकान आइलैंड पर 1.25 लाख एकड़ में फैला होगा, जो कि न्यूयॉर्क के मैनहट्टन शहर से भी आठ गुना बड़ा है। यहां से स्पेसएक्स के नेक्स्ट-जनरेशन रॉकेट ‘स्टारशिप’ और AI बेस्ड सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। कंस्ट्रक्शन साल 2029 से शुरू होने की उम्मीद है। 3,000 नई नौकरियां मिलेंगी, औसत सैलरी ₹88 लाख सालाना होगी लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री ने इसे राज्य की इकोनॉमी के लिए बड़ा कदम बताया है। लैंड्री के मुताबिक, इस स्पेसपोर्ट से क्षेत्र में कम से कम 3 हजार से ज्यादा डायरेक्ट नौकरियां पैदा होंगी। यहां काम करने वाले कर्मचारियों की औसत सालाना सैलरी 92,600 डॉलर यानी करीब 88 लाख रुपए होगी, जो वर्मिलियन पैरिश की मौजूदा औसत इनकम से लगभग दोगुनी है। गवर्नर ने कहा, “यह प्रोजेक्ट रोजगार, समुदायों के लिए प्रगति और हमारे तटीय इलाकों के लिए सुरक्षा लेकर आएगा।” ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा कैंपस, खुद बनाएगा ईंधन और बिजली स्पेसएक्स की प्रेसिडेंट ग्विन शॉटवेल ने बताया कि यह कैंपस पूरी तरह ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा। खुद का ईंधन और बिजली: कॉम्प्लेक्स के भीतर ही रॉकेट प्रोपेलेंट के लिए मीथेन गैस का उत्पादन होगा और इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन फैसिलिटी लगाई जाएगी। शिपिंग और ट्रांसपोर्ट: स्टारशिप रॉकेट्स को लाने-ले जाने के लिए डीप-वॉटर शिपिंग पोर्ट और व्हीकल प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाई जाएंगी। एक डेडिकेटेड एयरपोर्ट भी बनाया जा सकता है। शॉटवेल ने कहा कि इस फैसिलिटी का लक्ष्य हर साल स्टारशिप के हजारों उड़ानों को सपोर्ट करना है, हालांकि यह इंजीनियरिंग और रेग्युलेटरी अप्रूवल पर निर्भर करेगा। रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग नहीं सिर्फ लॉन्चिंग होगी यह लुइसियाना कैंपस स्पेसएक्स के टेक्सास स्थित ‘स्टारबेस’ से काफी अलग होगा। टेक्सास में रॉकेट्स का निर्माण और असेंबली की जाती है, जबकि लुइसियाना फैसिलिटी में रॉकेट की मैन्युफैक्चरिंग नहीं होगी। इसका मुख्य फोकस केवल हाई-फ्रीक्वेंसी यानी तेज गति से लॉन्चिंग पर रहेगा। पिकान आइलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से रॉकेट्स को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में आसानी से भेजा जा सकता है। यह ऑर्बिट सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स के लिए सबसे मुफीद मानी जाती है। लुइसियाना स्पेसपोर्ट के जरिए मस्क दो बड़े लक्ष्य… नॉलेज पार्ट: क्या होता है ‘सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट’? यह पृथ्वी का एक ऐसा ऑर्बिटहै जिसमें सैटेलाइट हमेशा सूर्य के एक ही कोण के साथ यात्रा करती है। यानी सैटेलाइट जिस जगह से भी गुजरती है, वहां हमेशा धूप होती है। सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स और अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स के लिए यह ऑर्बिट सबसे बेस्ट मानी जाती है।

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

salary gap in germany

साहिबा खान 

जर्मनी में एक जैसे काम और एक जैसे काम के माहौल के बावजूद स्थानीय कर्मचारियों और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा अंतर पाया गया है। जर्मन श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत में यह अंतर 23.6 फीसदी था, जो काफी ज्यादा है। हालांकि साल 2020 से ही सैलरी में अंतर का यह आंकड़ा कमोबेश स्थिर बना हुआ है। ALSO READ: जर्मनी: बुजुर्गों और बीमारियों पर बढ़ते खर्च का बोझ कौन उठाए

 

जबकि जर्मनी के श्रमबल में विदेशी कर्मचारियों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है। साल 2025 के अंत तक यहां के कुल कर्मचारियों में से करीब 17 फीसदी विदेशी नागरिक थे। यह आंकड़ा पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। साल 2010 में विदेशी कर्मचारियों का अनुपात 2025 के मुकाबले आधा था।

 

वेतन की खाई और वास्तविक आंकड़े

जर्मनी के श्रम मंत्रालय के अनुसार, वहां एक फुल-टाइम काम करने वाले जर्मन नागरिक की औसत मासिक कमाई €4,396 (लगभग 4,91,500) है, जबकि विदेशी कर्मचारियों के लिए यह आंकड़ा केवल €3,358 (लगभग 3,75,500 रुपए) पर अटका हुआ है। इसका मतलब है कि औसतन विदेशी कर्मचारी हर महीने अपने जर्मन सहकर्मियों से €1,038 (लगभग 1,16,000 रुपए) कम कमाते हैं। जर्मन श्रम मंत्रालय ने यह जानकारी देश की संसद में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के एक सवाल का जवाब देते हुए सामने रखी।

 

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 में 30.6 फीसदी विदेशी कर्मचारी बेहद कम वेतन वाली नौकरियां करने को मजबूर थे, जबकि इस श्रेणी की नौकरियां करने वाले जर्मन नागरिकों का आंकड़ा महज 12.3 फीसदी था। ALSO READ: क्या सूखे की मार से जर्मनी में महंगा होगा भोजन?

 

सैलरी में अंतर के पीछे की मुख्य वजहें

जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी के प्रवक्ता रेने स्प्रिंगर ने इस अंतर को कमजोर इमिग्रेशन नीतियों का नतीजा बताया और आरोप लगाया कि इससे वेतन पर दबाव पड़ रहा है। लेकिन जर्मनी की संघीय रोजगार एजेंसी का मानना है कि इस वेतन विषमता का मुख्य कारण राजनीतिक न होकर कर्मचारियों की योग्यता, भाषा का ज्ञान और अनुभव है। इंस्टीट्यूट फॉर एम्प्लॉयमेंट रिसर्च यानी आईएबी की एक अन्य स्टडी के मुताबिक इस अंतर की अहम वजह आप्रवासियों का ऊंची सैलरी वाले सेक्टर या पदों पर जाने की पात्रता का ना होना है।

 

आंकड़े दिखाते हैं कि जर्मनी में बिना वोकेशनल ट्रेनिंग वालों की औसतन आय €3,133 (लगभग 3,50,000 रुपए) है। वहीं वोकेशनल डिग्री धारकों की €4,069 (लगभग 4,55,000 रुपए) है। जर्मनी में वोकेशनल डिग्री यानी आउसबिल्डुंग 1 से 3 साल का थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ कंपनी में काम करके सैलरी भी मिलती है। यूनिवर्सिटी स्नातकों की कमाई €6,146 (लगभग 6,87,000 रुपए) प्रति माह तक पहुंच जाती है।

 

यह समझना भी जरूरी है कि जर्मन श्रम मंत्रालय के ये आंकड़े केवल स्थानीय और विदेशी कर्मचारियों के बीच का सीधा अंतर दिखाते हैं। रिपोर्ट खुद यह स्पष्ट करती है कि ये आंकड़े इस बात को साबित या खारिज नहीं करते कि इमिग्रेशन का सैलरी पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ा है या नहीं, क्योंकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि अगर आप्रवासन नहीं होता तब सैलरी का ट्रेंड क्या रहता। ALSO READ: शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं

 

जेंडर पे गैप और दोहरी मार

जर्मनी में विदेशी महिलाएं वेतन विषमता की दोहरी मार झेलती हैं। डीस्टैटिस (जर्मन संघीय सांख्यिकी कार्यालय) के डेटा के अनुसार, जर्मनी में जेंडर पे गैप लगभग 16 फीसदी है। यानी यहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में प्रति घंटा करीब 16 फीसदी कम वेतन मिलता है। जब इस लैंगिक अंतर को विदेशी कर्मचारियों के 23.6 फीसदी वाले पे गैप के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।

 

इसके अलावा गैर-यूरोपीय देशों से आने वाली प्रवासी महिलाओं को न केवल विदेशी होने के कारण नौकरशाही, भाषा और डिग्री मान्यता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं, बल्कि वे अक्सर केयर सेक्टर, सर्विस इंडस्ट्री या पार्ट-टाइम नौकरियों जैसे कम भुगतान वाले क्षेत्रों में सिमट कर रह जाती हैं।

Bangladesh Crisis: कंगाल होने की कगार पर बांग्लादेश? गैस खत्म, 80% निर्यात ठप और ब्लैकआउट से त्राहि-त्राहि!

Bangladesh Economic Crisis: पड़ोसी देश बांग्लादेश इन दिनों अपनी अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। प्राकृतिक गैस की भारी कमी के कारण देश के बड़े-बड़े कारखाने बंद हो रहे हैं, खेतों के लिए खाद बनाने वाली फैक्ट्रियों में जंग लग रहा है और आम जनता बिजली की किल्लत व रसोई गैस की भारी कमी से परेशान है।

घरेलू उत्पादन में गिरावट, नई गैस खोज में देरी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण एलएनजी (LNG) आपूर्ति ठप होने से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

फर्टिलाइजर फैक्ट्रियां बंद, कृषि और खाद सुरक्षा पर मंडराया संकट

गैस संकट की सबसे बड़ी मार बांग्लादेश के खाद उद्योग पर पड़ी है। देश की ऐतिहासिक और सबसे बड़ी ‘आशुगंज फर्टिलाइजर फैक्ट्री’ मार्च 2025 से पूरी तरह बंद पड़ी है। जहां कभी रोज 1,000 टन से ज्यादा यूरिया बनता था, वहां अब केवल जंग लगे ढांचे बचे हैं।

आशुगंज समेत देश के 6 प्रमुख यूरिया कारखाने या तो पूरी तरह बंद हो चुके हैं या क्षमता से बहुत कम पर काम कर रहे हैं। इससे 17 करोड़ की आबादी वाले इस देश के कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा हो गया है।

गारमेंट्स इंडस्ट्री और अर्थव्यवस्था को भारी झटका

बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) निर्यातक है, जो उसके कुल निर्यात राजस्व का लगभग 80% हिस्सा है। गैस की कमी के कारण सैकड़ों कपड़ा और टेक्सटाइल मिलें बंद होने के कगार पर हैं या अपने उत्पादन में भारी कटौती करने को मजबूर हैं। कारखाने बंद होने से हजारों मजदूरों की नौकरियां खतरे में पड़ गई हैं और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ रहा है।

घरों में चूल्हे ठंडे, बिजली गुल और सड़कों पर प्रदर्शन

गैस की कमी ने आम नागरिकों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पाइप से मिलने वाली घरेलू गैस का प्रेशर इतना कम है कि खाना बनाना मुश्किल हो गया है। कई इलाकों में रात भर गैस का एक कतरा भी नहीं आता, जिससे लोग लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर हैं।

गैस से चलने वाले पावर प्लांट पूरी क्षमता से बिजली नहीं बना पा रहे हैं। देश में घंटों के पावर कट लग रहे हैं। सरकार ने मॉल और बाजारों को एक घंटा पहले बंद करने का आदेश जारी किया है।

सीएनजी (CNG) स्टेशनों पर घंटों इंतजार करने के बाद भी ईंधन न मिलने पर ऑटो और गैस-रिक्शा चालकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

आखिर क्यों पैदा हुआ यह महा-संकट?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ, बल्कि सालों की अनदेखी का नतीजा है। साल 2018 तक बांग्लादेश गैस के मामले में आत्मनिर्भर था, लेकिन पुराने गैस कुओं से उत्पादन घटता गया। पिछली सरकारों ने नए कुओं की ड्रिलिंग और खोज पर पर्याप्त निवेश नहीं किया। कतर और अन्य देशों से आने वाली LNG आपूर्ति मिडल ईस्ट में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट के कारण बुरी तरह बाधित हुई है।

क्या है आगे का रास्ता और समाधान?

ढाका यूनिवर्सिटी के जियोलॉजी प्रोफेसर मो. अनवार हुसैन भुइयां के अनुसार, एक नए कुएं की ड्रिलिंग में $12-16 मिलियन का खर्च आता है, लेकिन उससे $4.5-4.9 अरब मूल्य की गैस निकल सकती है। सरकार ने नए ऑफशोर और ऑनशोर कुओं की नीलामी की योजना बनाई है।

पेट्रोबांग्ला के चेयरमैन मो. अब्दुल मन्नान के मुताबिक, गैस संकट का दीर्घकालिक और स्थायी समाधान ग्रीन व रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) की तरफ तेजी से कदम बढ़ाना ही है।

बांग्लादेश में 2 साल में 457 फैक्ट्रियां बंद:2026 में 62 हजार नौकरियां गईं, गैस संकट से 800 कंपनियों के बंद होने का खतरा

बांग्लादेश के उद्योगों पर संकट गहराता जा रहा है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो साल में देश के 7 प्रमुख औद्योगिक इलाकों में 457 औद्योगिक इकाइयां स्थायी रूप से बंद हो चुकी हैं। इनमें 108 गारमेंट उद्योग से जुड़ी यूनिट्स शामिल हैं। फैक्ट्रियां बंद होने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा है। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 95 फैक्ट्रियां बंद हुईं और 61,881 लोगों की सीधी नौकरी चली गई। बंद फैक्ट्रियों का संकट सिर्फ कपड़ा उद्योग तक सीमित नहीं पिछले दो साल में बंद हुई 457 फैक्ट्रियों में कपड़ा और गारमेंट से जुड़ी फैक्ट्रियों के साथ दूसरे उद्योगों की इकाइयां भी शामिल हैं। इनमें 287 इकाइयां अन्य मैन्युफैक्चरिंग कारोबार से जुड़ी थीं। यानी बांग्लादेश में उद्योगों की मुश्किल किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है। बढ़ती लागत और ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग तरह के कारखानों पर पड़ रहा है। गैस की कमी ने संकट और बढ़ाया सबसे बड़ी परेशानी ऊर्जा की कमी को लेकर है। अगस्त की शुरुआत में गाजीपुर में गैस का दबाव इतना कम हो गया कि 700 से 800 फैक्ट्रियों में काम रोकना पड़ा या कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजना पड़ा। गैस की कमी से बॉयलर और दूसरी मशीनें पूरी क्षमता से नहीं चल पातीं। इससे उत्पादन घटता है और फैक्ट्रियों के लिए विदेशी खरीदारों के ऑर्डर समय पर पूरा करना मुश्किल हो जाता है। दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं विदेशी खरीदार गैस की कमी से अभी जो फैक्ट्रियां बंद हैं, उनके लिए ज्यादा दिन तक काम रोकना मुश्किल हो सकता है। फैक्ट्री बंद होने के बाद भी कर्मचारियों की तनख्वाह, बैंक का कर्ज और बाकी खर्च देने पड़ते हैं। गैस की जगह डीजल या एलपीजी से काम चलाने पर खर्च और बढ़ जाता है। ऐसे में अगर संकट लंबा चला तो कई फैक्ट्रियों के लिए दोबारा काम शुरू करना मुश्किल हो सकता है। ऊर्जा संकट का असर सिर्फ फैक्ट्रियों में कामकाज पर नहीं पड़ रहा है। इससे बांग्लादेश के लिए विदेशी कंपनियों से कारोबार हासिल करना भी मुश्किल हो रहा है। अगर फैक्ट्रियां समय पर ऑर्डर पूरा नहीं कर पाईं तो विदेशी खरीदार दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं। इससे बांग्लादेश की फैक्ट्रियों की कमाई घटेगी और कर्मचारियों की तनख्वाह, कर्ज और बाकी खर्च संभालना और मुश्किल हो जाएगा। गैस नहीं मिली तो कपड़ा उद्योग पर और संकट बांग्लादेश के निर्यात कारोबार में कपड़ा और तैयार कपड़ों का बड़ा हिस्सा है। इनके लिए धागा बनाने, कपड़े की रंगाई और दूसरे शुरुआती काम करने वाली फैक्ट्रियां जरूरी हैं। अगर इन्हें पर्याप्त गैस नहीं मिली तो आगे तैयार कपड़े बनाने वाली फैक्ट्रियों का काम भी प्रभावित होगा। इसी वजह से उद्योग संगठनों ने इन इकाइयों को गैस सप्लाई में प्राथमिकता देने की मांग की है। उद्योग संगठनों ने सरकार से यह भी कहा है कि फैक्ट्रियों को रोजाना गैस की उपलब्धता और दबाव की जानकारी दी जाए, ताकि वे उसी हिसाब से उत्पादन की तैयारी कर सकें। इसके अलावा गैस संकट से परेशान छोटी और मझोली फैक्ट्रियों को बैंक कर्ज चुकाने में कुछ समय की राहत देने और मजदूरों से जुड़े विवाद जल्द सुलझाने की मांग की गई है। आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गैस और बिजली का संकट कब तक बना रहता है। अभी कई फैक्ट्रियां कम क्षमता पर चल रही हैं। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे और विदेशी ऑर्डर भी कमजोर रहे, तो आर्थिक दबाव झेल रही कई और फैक्ट्रियां बंद हो सकती हैं। इसका असर सिर्फ रोजगार पर नहीं पड़ेगा। स्थानीय कारोबार और बांग्लादेश की निर्यात कमाई भी प्रभावित हो सकती है।

Apple Layoffs: iPhone मेकर ने फिर की छंटनी, 200 लोगों की नौकरी पर खतरा; इस बार कौन सी टीम्स प्रभावित

आईफोन मेकर एपल इंक अपने सिरी डिजिटल असिस्टेंट और विजन प्रो हेडसेट से जुड़ी टीमों में नौकरियां कम कर रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वालों के हवाले से कहा गया है कि Apple अपनी ‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम के कर्मचारियों की भी छंटनी कर रही है। यह टीम सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग विभाग का हिस्सा है और डिवाइसेज के कुछ AI फीचर्स की जिम्मेदारी इस पर है।

बदलावों के तहत, कंपनी Vision Pro के लिए गेमिंग पर फोकस्ड टीम को काफी हद तक शट डाउन कर रही है और डिवाइस के लिए इमर्सिव वीडियो कंटेंट बनाने वाली यूनिट का साइज भी घटा रही है। कुल मिलाकर, इस जॉब कट से 200 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। Vision Pro विभाग से लगभग 100 पद खत्म किए गए हैं। Siri व सॉफ्टवेयर टीमों से भी 100 पद हटाए गए हैं।

लॉन्च के समय से ही इमर्सिव वीडियो Vision Pro की बिक्री का एक मुख्य आकर्षण रहा है। लेकिन हर 3D वीडियो बनाने के लिए Apple कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्टर्स की कई टीमों की जरूरत होती है। इमर्सिव वीडियो सीरीज के एक एपिसोड को शूट करने में कई मिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है। Vision Pro के एक्टिव यूजर्स की कम संख्या को देखते हुए, इन खर्चों ने बिजनेस पर दबाव डाला है।

किस टीम में किस तरह की रीस्ट्रक्चरिंग

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, Siri में बदलाव, इस असिस्टेंट के आने वाले AI-इनफ्यूज्ड वर्जन से जुड़े हैं। इस बदलाव के लिए जरूरी विशेषज्ञता में बदलाव की जरूरत है, जिसके कारण कंपनी को कुछ मौजूदा भूमिकाओं को खत्म करना पड़ा। साथ ही रिसोर्सेज को को फिर से एलोकेट करना पड़ा और अपडेटेड Siri को सपोर्ट करने वाली नई भूमिकाएं क्रिएट करनी पड़ीं।

‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम में बदलाव AI-संचालित क्षमताओं पर काम को फिर से व्यवस्थित करने के प्रयास को दर्शाते हैं। जैसे-जैसे और अधिक ग्रुप्स की ओर से ऐप्स, फीचर्स और सर्विसेज में AI फंक्शन लाए जा रहे हैं, Apple प्राथमिकताओं के अनुरूप टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है। इस रीस्ट्रक्चरिंग से कुछ मौजूदा पद खत्म होंगे और नई भूमिकाएं क्रिएट होंगी।

Vision Pro में बदलावों के बारे में कर्मचारियों को बताया गया है कि यह ग्राहकों द्वारा डिवाइस के इस्तेमाल के तरीके के आधार पर प्राथमिकताओं को फिर से व्यवस्थित करने और भविष्य के अन्य उत्पादों की ओर रिसोर्सेज को बेहतर ढंग से निर्देशित करने का प्रयास है।

Mobile Manufacturing Scheme 2.0 : सरकार ने लॉन्च की 62,500 करोड़ करोड़ रुपए की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम, जानिए पूरी डिटेल

Vision Pro और visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं हो रहा बंद

Apple इमर्सिव वीडियो को पूरी तरह से बंद नहीं कर रही है। कंपनी की योजना है कि वह खुद कम संख्या में वीडियो बनाएगी। साथ ही थर्ड-पार्टी कंपनियों को इस डिवाइस के लिए कंटेंट बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी। कंपनी ने कर्मचारियों से कहा है कि Vision Pro और इसका visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम बंद नहीं होने वाला है। ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी 2028 के आखिर तक एक नया Vision Pro मॉडल लॉन्च करने पर भी विचार कर रही है।

एक बयान में एपल ने माना कि वह कुछ टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है ताकि अपने यूजर्स को बेहतरीन अनुभव देने के लिए बिजनेस को आगे बढ़ा सके। कंपनी के मुताबिक, “हालांकि इस बदलाव के तहत हम नए जॉब रोल क्रिएट करेंगे, लेकिन इसका असर कुछ मौजूदा रोल्स पर भी पड़ेगा। हम इन टीम मेंबर्स के योगदान के लिए आभारी हैं और इस बदलाव के दौरान उनकी मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसमें Apple में अन्य भूमिकाओं के लिए आवेदन करने के अवसर भी शामिल हैं।”

Mobile Manufacturing Scheme 2.0 : सरकार ने लॉन्च की 62,500 करोड़ करोड़ रुपए की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम, जानिए पूरी डिटेल

Mobile Manufacturing Scheme : आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 के लॉन्च की घोषणा की है। 62 हजार 500 करोड़ रुपए की इस स्कीम का लक्ष्य भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। इसके तहत सरकार कंपनियों को उत्पादन के लिए 5% तक इंसेंटिव देगी। इस स्कीम के जरिए 40 लाख करोड़ के मोबाइल का उत्पादन हो सकेगा। ये स्कीम 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी।

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 के तहत कंपनियों से आवेदन मांगने की शुरुआत कर दी गई है। 15 जुलाई को कैबिनेट ने स्कीम को मंजूरी दी थी। स्कीम का कुल बजट 62,500 करोड़ रुपए और अवधि 5 साल यानी वित्त वर्ष 2027 से वित्त वर्ष 2031 तक है। इसमें मोबाइल उत्पादन,घरेलू वैल्यू एडिशन और कंपोनेंट सोर्सिंग को कवर किया गया है।

1 अप्रैल 2026 से लागू होगी स्कीम

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने कहा कि यह योजना मौजूदा फाइनेंशियल ईयर से यानी 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी और फाइनेंशियल ईयर 2031 तक चलेगी। इस स्कीम के तहत,भारत में बने मोबाइल फोन की बिक्री पर मैन्युफ़ैक्चरर्स को 2.25% से 5% तक का इंसेंटिव मिलेगा। कंपनियां खास कंपोनेंट्स और सब-असेंबली को घरेलू स्तर पर सोर्स करके 1.5% तक का अतिरिक्त इंसेंटिव भी पा सकती हैं। कैबिनेट से मंज़ूर इस फ़्रेमवर्क में भारतीय ब्रांड बनाने के मकसद से प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए 3% का अतिरिक्त इंसेंटिव भी दिया जाएगा।

बड़ी मात्रा में मिलेगा रोजगार

एस कृष्णन ने कहा कि भारतीय हैंडसेट ब्रांड पर 5 प्रतिशत के ज्यादा इंसेंटिव दिया जाएगा। इसके जरिए सरकार उन घरेलू कंपनियों को सपोर्ट करना चाहती है जो विदेशी बाजारों में अपना विस्तार करना चाहती हैं। सरकार का अनुमान है कि इस स्कीम के जरिए 5 साल में कुल लगभग 40 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन हो सकता है और करीब 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियां मिल सकती हैं।

PLI 1.0 ने प्रोडक्शन और इन्वेस्टमेंट के लक्ष्यों को भी किया पार

यह स्कीम इसके पहले आई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (PLI-LSEM) के बाद आई है,जिसकी अवधि 31 मार्च, 2026 को खत्म हुई थी। पहले वाले प्रोग्राम का मुख्य मकसद बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग करना और मोबाइल फोन प्रोडक्शन को बढ़ाना था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक PLI 1.0 के तहत मोबाइल फोन का प्रोडक्शन 11.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया,जबकि इसका लक्ष्य 8.12 लाख करोड़ रुपये था। PLI 1.0 का निवेश लक्ष्य 7,000 करोड़ रुपये था लेकिन इसके तहत हुआ निवेश 20,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।

पहले की PLI स्कीम ने ग्लोबल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स को आकर्षित किया,जिनमें सैमसंग और भारत में Apple डिवाइस बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं।

लोकलाइजेंशन पर फोकस

मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 में देश में बनने वाले कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। एस कृष्णन कृष्णन ने कहा कि मोबाइल फोन बनाने में घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन लगभग 15 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गया है। MPMS के तहत अतिरिक्त सोर्सिंग इंसेंटिव का मकसद मैन्युफैक्चरर्स को अपनी घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

 

 

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