जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

salary gap in germany

साहिबा खान 

जर्मनी में एक जैसे काम और एक जैसे काम के माहौल के बावजूद स्थानीय कर्मचारियों और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा अंतर पाया गया है। जर्मन श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत में यह अंतर 23.6 फीसदी था, जो काफी ज्यादा है। हालांकि साल 2020 से ही सैलरी में अंतर का यह आंकड़ा कमोबेश स्थिर बना हुआ है। ALSO READ: जर्मनी: बुजुर्गों और बीमारियों पर बढ़ते खर्च का बोझ कौन उठाए

 

जबकि जर्मनी के श्रमबल में विदेशी कर्मचारियों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है। साल 2025 के अंत तक यहां के कुल कर्मचारियों में से करीब 17 फीसदी विदेशी नागरिक थे। यह आंकड़ा पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। साल 2010 में विदेशी कर्मचारियों का अनुपात 2025 के मुकाबले आधा था।

 

वेतन की खाई और वास्तविक आंकड़े

जर्मनी के श्रम मंत्रालय के अनुसार, वहां एक फुल-टाइम काम करने वाले जर्मन नागरिक की औसत मासिक कमाई €4,396 (लगभग 4,91,500) है, जबकि विदेशी कर्मचारियों के लिए यह आंकड़ा केवल €3,358 (लगभग 3,75,500 रुपए) पर अटका हुआ है। इसका मतलब है कि औसतन विदेशी कर्मचारी हर महीने अपने जर्मन सहकर्मियों से €1,038 (लगभग 1,16,000 रुपए) कम कमाते हैं। जर्मन श्रम मंत्रालय ने यह जानकारी देश की संसद में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के एक सवाल का जवाब देते हुए सामने रखी।

 

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 में 30.6 फीसदी विदेशी कर्मचारी बेहद कम वेतन वाली नौकरियां करने को मजबूर थे, जबकि इस श्रेणी की नौकरियां करने वाले जर्मन नागरिकों का आंकड़ा महज 12.3 फीसदी था। ALSO READ: क्या सूखे की मार से जर्मनी में महंगा होगा भोजन?

 

सैलरी में अंतर के पीछे की मुख्य वजहें

जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी के प्रवक्ता रेने स्प्रिंगर ने इस अंतर को कमजोर इमिग्रेशन नीतियों का नतीजा बताया और आरोप लगाया कि इससे वेतन पर दबाव पड़ रहा है। लेकिन जर्मनी की संघीय रोजगार एजेंसी का मानना है कि इस वेतन विषमता का मुख्य कारण राजनीतिक न होकर कर्मचारियों की योग्यता, भाषा का ज्ञान और अनुभव है। इंस्टीट्यूट फॉर एम्प्लॉयमेंट रिसर्च यानी आईएबी की एक अन्य स्टडी के मुताबिक इस अंतर की अहम वजह आप्रवासियों का ऊंची सैलरी वाले सेक्टर या पदों पर जाने की पात्रता का ना होना है।

 

आंकड़े दिखाते हैं कि जर्मनी में बिना वोकेशनल ट्रेनिंग वालों की औसतन आय €3,133 (लगभग 3,50,000 रुपए) है। वहीं वोकेशनल डिग्री धारकों की €4,069 (लगभग 4,55,000 रुपए) है। जर्मनी में वोकेशनल डिग्री यानी आउसबिल्डुंग 1 से 3 साल का थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ कंपनी में काम करके सैलरी भी मिलती है। यूनिवर्सिटी स्नातकों की कमाई €6,146 (लगभग 6,87,000 रुपए) प्रति माह तक पहुंच जाती है।

 

यह समझना भी जरूरी है कि जर्मन श्रम मंत्रालय के ये आंकड़े केवल स्थानीय और विदेशी कर्मचारियों के बीच का सीधा अंतर दिखाते हैं। रिपोर्ट खुद यह स्पष्ट करती है कि ये आंकड़े इस बात को साबित या खारिज नहीं करते कि इमिग्रेशन का सैलरी पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ा है या नहीं, क्योंकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि अगर आप्रवासन नहीं होता तब सैलरी का ट्रेंड क्या रहता। ALSO READ: शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं

 

जेंडर पे गैप और दोहरी मार

जर्मनी में विदेशी महिलाएं वेतन विषमता की दोहरी मार झेलती हैं। डीस्टैटिस (जर्मन संघीय सांख्यिकी कार्यालय) के डेटा के अनुसार, जर्मनी में जेंडर पे गैप लगभग 16 फीसदी है। यानी यहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में प्रति घंटा करीब 16 फीसदी कम वेतन मिलता है। जब इस लैंगिक अंतर को विदेशी कर्मचारियों के 23.6 फीसदी वाले पे गैप के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।

 

इसके अलावा गैर-यूरोपीय देशों से आने वाली प्रवासी महिलाओं को न केवल विदेशी होने के कारण नौकरशाही, भाषा और डिग्री मान्यता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं, बल्कि वे अक्सर केयर सेक्टर, सर्विस इंडस्ट्री या पार्ट-टाइम नौकरियों जैसे कम भुगतान वाले क्षेत्रों में सिमट कर रह जाती हैं।

Bangladesh Crisis: कंगाल होने की कगार पर बांग्लादेश? गैस खत्म, 80% निर्यात ठप और ब्लैकआउट से त्राहि-त्राहि!

Bangladesh Economic Crisis: पड़ोसी देश बांग्लादेश इन दिनों अपनी अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। प्राकृतिक गैस की भारी कमी के कारण देश के बड़े-बड़े कारखाने बंद हो रहे हैं, खेतों के लिए खाद बनाने वाली फैक्ट्रियों में जंग लग रहा है और आम जनता बिजली की किल्लत व रसोई गैस की भारी कमी से परेशान है।

घरेलू उत्पादन में गिरावट, नई गैस खोज में देरी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण एलएनजी (LNG) आपूर्ति ठप होने से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

फर्टिलाइजर फैक्ट्रियां बंद, कृषि और खाद सुरक्षा पर मंडराया संकट

गैस संकट की सबसे बड़ी मार बांग्लादेश के खाद उद्योग पर पड़ी है। देश की ऐतिहासिक और सबसे बड़ी ‘आशुगंज फर्टिलाइजर फैक्ट्री’ मार्च 2025 से पूरी तरह बंद पड़ी है। जहां कभी रोज 1,000 टन से ज्यादा यूरिया बनता था, वहां अब केवल जंग लगे ढांचे बचे हैं।

आशुगंज समेत देश के 6 प्रमुख यूरिया कारखाने या तो पूरी तरह बंद हो चुके हैं या क्षमता से बहुत कम पर काम कर रहे हैं। इससे 17 करोड़ की आबादी वाले इस देश के कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा हो गया है।

गारमेंट्स इंडस्ट्री और अर्थव्यवस्था को भारी झटका

बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) निर्यातक है, जो उसके कुल निर्यात राजस्व का लगभग 80% हिस्सा है। गैस की कमी के कारण सैकड़ों कपड़ा और टेक्सटाइल मिलें बंद होने के कगार पर हैं या अपने उत्पादन में भारी कटौती करने को मजबूर हैं। कारखाने बंद होने से हजारों मजदूरों की नौकरियां खतरे में पड़ गई हैं और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ रहा है।

घरों में चूल्हे ठंडे, बिजली गुल और सड़कों पर प्रदर्शन

गैस की कमी ने आम नागरिकों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पाइप से मिलने वाली घरेलू गैस का प्रेशर इतना कम है कि खाना बनाना मुश्किल हो गया है। कई इलाकों में रात भर गैस का एक कतरा भी नहीं आता, जिससे लोग लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर हैं।

गैस से चलने वाले पावर प्लांट पूरी क्षमता से बिजली नहीं बना पा रहे हैं। देश में घंटों के पावर कट लग रहे हैं। सरकार ने मॉल और बाजारों को एक घंटा पहले बंद करने का आदेश जारी किया है।

सीएनजी (CNG) स्टेशनों पर घंटों इंतजार करने के बाद भी ईंधन न मिलने पर ऑटो और गैस-रिक्शा चालकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

आखिर क्यों पैदा हुआ यह महा-संकट?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ, बल्कि सालों की अनदेखी का नतीजा है। साल 2018 तक बांग्लादेश गैस के मामले में आत्मनिर्भर था, लेकिन पुराने गैस कुओं से उत्पादन घटता गया। पिछली सरकारों ने नए कुओं की ड्रिलिंग और खोज पर पर्याप्त निवेश नहीं किया। कतर और अन्य देशों से आने वाली LNG आपूर्ति मिडल ईस्ट में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट के कारण बुरी तरह बाधित हुई है।

क्या है आगे का रास्ता और समाधान?

ढाका यूनिवर्सिटी के जियोलॉजी प्रोफेसर मो. अनवार हुसैन भुइयां के अनुसार, एक नए कुएं की ड्रिलिंग में $12-16 मिलियन का खर्च आता है, लेकिन उससे $4.5-4.9 अरब मूल्य की गैस निकल सकती है। सरकार ने नए ऑफशोर और ऑनशोर कुओं की नीलामी की योजना बनाई है।

पेट्रोबांग्ला के चेयरमैन मो. अब्दुल मन्नान के मुताबिक, गैस संकट का दीर्घकालिक और स्थायी समाधान ग्रीन व रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) की तरफ तेजी से कदम बढ़ाना ही है।

बांग्लादेश में 2 साल में 457 फैक्ट्रियां बंद:2026 में 62 हजार नौकरियां गईं, गैस संकट से 800 कंपनियों के बंद होने का खतरा

बांग्लादेश के उद्योगों पर संकट गहराता जा रहा है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो साल में देश के 7 प्रमुख औद्योगिक इलाकों में 457 औद्योगिक इकाइयां स्थायी रूप से बंद हो चुकी हैं। इनमें 108 गारमेंट उद्योग से जुड़ी यूनिट्स शामिल हैं। फैक्ट्रियां बंद होने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा है। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 95 फैक्ट्रियां बंद हुईं और 61,881 लोगों की सीधी नौकरी चली गई। बंद फैक्ट्रियों का संकट सिर्फ कपड़ा उद्योग तक सीमित नहीं पिछले दो साल में बंद हुई 457 फैक्ट्रियों में कपड़ा और गारमेंट से जुड़ी फैक्ट्रियों के साथ दूसरे उद्योगों की इकाइयां भी शामिल हैं। इनमें 287 इकाइयां अन्य मैन्युफैक्चरिंग कारोबार से जुड़ी थीं। यानी बांग्लादेश में उद्योगों की मुश्किल किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है। बढ़ती लागत और ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग तरह के कारखानों पर पड़ रहा है। गैस की कमी ने संकट और बढ़ाया सबसे बड़ी परेशानी ऊर्जा की कमी को लेकर है। अगस्त की शुरुआत में गाजीपुर में गैस का दबाव इतना कम हो गया कि 700 से 800 फैक्ट्रियों में काम रोकना पड़ा या कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजना पड़ा। गैस की कमी से बॉयलर और दूसरी मशीनें पूरी क्षमता से नहीं चल पातीं। इससे उत्पादन घटता है और फैक्ट्रियों के लिए विदेशी खरीदारों के ऑर्डर समय पर पूरा करना मुश्किल हो जाता है। दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं विदेशी खरीदार गैस की कमी से अभी जो फैक्ट्रियां बंद हैं, उनके लिए ज्यादा दिन तक काम रोकना मुश्किल हो सकता है। फैक्ट्री बंद होने के बाद भी कर्मचारियों की तनख्वाह, बैंक का कर्ज और बाकी खर्च देने पड़ते हैं। गैस की जगह डीजल या एलपीजी से काम चलाने पर खर्च और बढ़ जाता है। ऐसे में अगर संकट लंबा चला तो कई फैक्ट्रियों के लिए दोबारा काम शुरू करना मुश्किल हो सकता है। ऊर्जा संकट का असर सिर्फ फैक्ट्रियों में कामकाज पर नहीं पड़ रहा है। इससे बांग्लादेश के लिए विदेशी कंपनियों से कारोबार हासिल करना भी मुश्किल हो रहा है। अगर फैक्ट्रियां समय पर ऑर्डर पूरा नहीं कर पाईं तो विदेशी खरीदार दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं। इससे बांग्लादेश की फैक्ट्रियों की कमाई घटेगी और कर्मचारियों की तनख्वाह, कर्ज और बाकी खर्च संभालना और मुश्किल हो जाएगा। गैस नहीं मिली तो कपड़ा उद्योग पर और संकट बांग्लादेश के निर्यात कारोबार में कपड़ा और तैयार कपड़ों का बड़ा हिस्सा है। इनके लिए धागा बनाने, कपड़े की रंगाई और दूसरे शुरुआती काम करने वाली फैक्ट्रियां जरूरी हैं। अगर इन्हें पर्याप्त गैस नहीं मिली तो आगे तैयार कपड़े बनाने वाली फैक्ट्रियों का काम भी प्रभावित होगा। इसी वजह से उद्योग संगठनों ने इन इकाइयों को गैस सप्लाई में प्राथमिकता देने की मांग की है। उद्योग संगठनों ने सरकार से यह भी कहा है कि फैक्ट्रियों को रोजाना गैस की उपलब्धता और दबाव की जानकारी दी जाए, ताकि वे उसी हिसाब से उत्पादन की तैयारी कर सकें। इसके अलावा गैस संकट से परेशान छोटी और मझोली फैक्ट्रियों को बैंक कर्ज चुकाने में कुछ समय की राहत देने और मजदूरों से जुड़े विवाद जल्द सुलझाने की मांग की गई है। आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गैस और बिजली का संकट कब तक बना रहता है। अभी कई फैक्ट्रियां कम क्षमता पर चल रही हैं। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे और विदेशी ऑर्डर भी कमजोर रहे, तो आर्थिक दबाव झेल रही कई और फैक्ट्रियां बंद हो सकती हैं। इसका असर सिर्फ रोजगार पर नहीं पड़ेगा। स्थानीय कारोबार और बांग्लादेश की निर्यात कमाई भी प्रभावित हो सकती है।

Apple Layoffs: iPhone मेकर ने फिर की छंटनी, 200 लोगों की नौकरी पर खतरा; इस बार कौन सी टीम्स प्रभावित

आईफोन मेकर एपल इंक अपने सिरी डिजिटल असिस्टेंट और विजन प्रो हेडसेट से जुड़ी टीमों में नौकरियां कम कर रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वालों के हवाले से कहा गया है कि Apple अपनी ‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम के कर्मचारियों की भी छंटनी कर रही है। यह टीम सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग विभाग का हिस्सा है और डिवाइसेज के कुछ AI फीचर्स की जिम्मेदारी इस पर है।

बदलावों के तहत, कंपनी Vision Pro के लिए गेमिंग पर फोकस्ड टीम को काफी हद तक शट डाउन कर रही है और डिवाइस के लिए इमर्सिव वीडियो कंटेंट बनाने वाली यूनिट का साइज भी घटा रही है। कुल मिलाकर, इस जॉब कट से 200 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। Vision Pro विभाग से लगभग 100 पद खत्म किए गए हैं। Siri व सॉफ्टवेयर टीमों से भी 100 पद हटाए गए हैं।

लॉन्च के समय से ही इमर्सिव वीडियो Vision Pro की बिक्री का एक मुख्य आकर्षण रहा है। लेकिन हर 3D वीडियो बनाने के लिए Apple कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्टर्स की कई टीमों की जरूरत होती है। इमर्सिव वीडियो सीरीज के एक एपिसोड को शूट करने में कई मिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है। Vision Pro के एक्टिव यूजर्स की कम संख्या को देखते हुए, इन खर्चों ने बिजनेस पर दबाव डाला है।

किस टीम में किस तरह की रीस्ट्रक्चरिंग

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, Siri में बदलाव, इस असिस्टेंट के आने वाले AI-इनफ्यूज्ड वर्जन से जुड़े हैं। इस बदलाव के लिए जरूरी विशेषज्ञता में बदलाव की जरूरत है, जिसके कारण कंपनी को कुछ मौजूदा भूमिकाओं को खत्म करना पड़ा। साथ ही रिसोर्सेज को को फिर से एलोकेट करना पड़ा और अपडेटेड Siri को सपोर्ट करने वाली नई भूमिकाएं क्रिएट करनी पड़ीं।

‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम में बदलाव AI-संचालित क्षमताओं पर काम को फिर से व्यवस्थित करने के प्रयास को दर्शाते हैं। जैसे-जैसे और अधिक ग्रुप्स की ओर से ऐप्स, फीचर्स और सर्विसेज में AI फंक्शन लाए जा रहे हैं, Apple प्राथमिकताओं के अनुरूप टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है। इस रीस्ट्रक्चरिंग से कुछ मौजूदा पद खत्म होंगे और नई भूमिकाएं क्रिएट होंगी।

Vision Pro में बदलावों के बारे में कर्मचारियों को बताया गया है कि यह ग्राहकों द्वारा डिवाइस के इस्तेमाल के तरीके के आधार पर प्राथमिकताओं को फिर से व्यवस्थित करने और भविष्य के अन्य उत्पादों की ओर रिसोर्सेज को बेहतर ढंग से निर्देशित करने का प्रयास है।

Mobile Manufacturing Scheme 2.0 : सरकार ने लॉन्च की 62,500 करोड़ करोड़ रुपए की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम, जानिए पूरी डिटेल

Vision Pro और visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं हो रहा बंद

Apple इमर्सिव वीडियो को पूरी तरह से बंद नहीं कर रही है। कंपनी की योजना है कि वह खुद कम संख्या में वीडियो बनाएगी। साथ ही थर्ड-पार्टी कंपनियों को इस डिवाइस के लिए कंटेंट बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी। कंपनी ने कर्मचारियों से कहा है कि Vision Pro और इसका visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम बंद नहीं होने वाला है। ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी 2028 के आखिर तक एक नया Vision Pro मॉडल लॉन्च करने पर भी विचार कर रही है।

एक बयान में एपल ने माना कि वह कुछ टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है ताकि अपने यूजर्स को बेहतरीन अनुभव देने के लिए बिजनेस को आगे बढ़ा सके। कंपनी के मुताबिक, “हालांकि इस बदलाव के तहत हम नए जॉब रोल क्रिएट करेंगे, लेकिन इसका असर कुछ मौजूदा रोल्स पर भी पड़ेगा। हम इन टीम मेंबर्स के योगदान के लिए आभारी हैं और इस बदलाव के दौरान उनकी मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसमें Apple में अन्य भूमिकाओं के लिए आवेदन करने के अवसर भी शामिल हैं।”

Mobile Manufacturing Scheme 2.0 : सरकार ने लॉन्च की 62,500 करोड़ करोड़ रुपए की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम, जानिए पूरी डिटेल

Mobile Manufacturing Scheme : आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 के लॉन्च की घोषणा की है। 62 हजार 500 करोड़ रुपए की इस स्कीम का लक्ष्य भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। इसके तहत सरकार कंपनियों को उत्पादन के लिए 5% तक इंसेंटिव देगी। इस स्कीम के जरिए 40 लाख करोड़ के मोबाइल का उत्पादन हो सकेगा। ये स्कीम 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी।

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 के तहत कंपनियों से आवेदन मांगने की शुरुआत कर दी गई है। 15 जुलाई को कैबिनेट ने स्कीम को मंजूरी दी थी। स्कीम का कुल बजट 62,500 करोड़ रुपए और अवधि 5 साल यानी वित्त वर्ष 2027 से वित्त वर्ष 2031 तक है। इसमें मोबाइल उत्पादन,घरेलू वैल्यू एडिशन और कंपोनेंट सोर्सिंग को कवर किया गया है।

1 अप्रैल 2026 से लागू होगी स्कीम

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने कहा कि यह योजना मौजूदा फाइनेंशियल ईयर से यानी 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी और फाइनेंशियल ईयर 2031 तक चलेगी। इस स्कीम के तहत,भारत में बने मोबाइल फोन की बिक्री पर मैन्युफ़ैक्चरर्स को 2.25% से 5% तक का इंसेंटिव मिलेगा। कंपनियां खास कंपोनेंट्स और सब-असेंबली को घरेलू स्तर पर सोर्स करके 1.5% तक का अतिरिक्त इंसेंटिव भी पा सकती हैं। कैबिनेट से मंज़ूर इस फ़्रेमवर्क में भारतीय ब्रांड बनाने के मकसद से प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए 3% का अतिरिक्त इंसेंटिव भी दिया जाएगा।

बड़ी मात्रा में मिलेगा रोजगार

एस कृष्णन ने कहा कि भारतीय हैंडसेट ब्रांड पर 5 प्रतिशत के ज्यादा इंसेंटिव दिया जाएगा। इसके जरिए सरकार उन घरेलू कंपनियों को सपोर्ट करना चाहती है जो विदेशी बाजारों में अपना विस्तार करना चाहती हैं। सरकार का अनुमान है कि इस स्कीम के जरिए 5 साल में कुल लगभग 40 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन हो सकता है और करीब 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियां मिल सकती हैं।

PLI 1.0 ने प्रोडक्शन और इन्वेस्टमेंट के लक्ष्यों को भी किया पार

यह स्कीम इसके पहले आई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (PLI-LSEM) के बाद आई है,जिसकी अवधि 31 मार्च, 2026 को खत्म हुई थी। पहले वाले प्रोग्राम का मुख्य मकसद बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग करना और मोबाइल फोन प्रोडक्शन को बढ़ाना था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक PLI 1.0 के तहत मोबाइल फोन का प्रोडक्शन 11.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया,जबकि इसका लक्ष्य 8.12 लाख करोड़ रुपये था। PLI 1.0 का निवेश लक्ष्य 7,000 करोड़ रुपये था लेकिन इसके तहत हुआ निवेश 20,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।

पहले की PLI स्कीम ने ग्लोबल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स को आकर्षित किया,जिनमें सैमसंग और भारत में Apple डिवाइस बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं।

लोकलाइजेंशन पर फोकस

मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 में देश में बनने वाले कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। एस कृष्णन कृष्णन ने कहा कि मोबाइल फोन बनाने में घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन लगभग 15 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गया है। MPMS के तहत अतिरिक्त सोर्सिंग इंसेंटिव का मकसद मैन्युफैक्चरर्स को अपनी घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

 

 

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नोएडा एयरपोर्ट के पास एस्कॉर्ट्स कुबोटा बनाएगी ऐसा प्लांट जो बदल देगी ट्रैक्टर इंडस्ट्री का चेहरा! जानिए ₹2000 करोड़ का पूरा प्लान

Noida Airport News: एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड ने उत्तर प्रदेश के यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) क्षेत्र में अपने नए विशाल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के लिए भूमि पूजन किया है। 19 अगस्त को गौतम बुद्ध नगर जिले के सेक्टर-10 में हुए इस शिलान्यास के साथ ही कंपनी ने 2000 करोड़ रुपये से अधिक के शुरुआती इन्वेस्टमेंट का भी ऐलान किया है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट CNBC TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक यह नया प्लांट 154 एकड़ में तैयार होगा। यह कंपनी द्वारा अब तक का सबसे बड़ा कैपिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर कमिटमेंट है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ जापानी मूल कंपनी कुबोटा के ग्लोबल एक्सपोर्ट को भी स्पीडअप करना है।

यहां पहले फेज में बनेंगे 60000 ट्रैक्टर

कंपनी इस इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैंपस को कई फेज में तैयार करेदी। पहले फेज में सालाना 60000 ट्रैक्टर और 15000 कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट यूनिट्स की कैपिसिटी तैयार होगी। इसके साथ सपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी फैसिलिटी भी डेवलप की जाएंगी। कंपनी के मुताबिक जब इसके सभी फेज पूरे हो जाएंगे, तो यह दुनिया भर में फैले कुबोटा ग्रुप के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स में से एक बन जाएगा।

इस कैंपस में एक ही छत के नीचे ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट और इंजन बनाए जाएंगे। यह प्लांट घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए काम करेगा और इस क्षेत्र में रोजगार के कई नए अवसर पैदा करेगा।

नोएडा एयरपोर्ट के पास होने का क्या है फायदा?

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के पास यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित इस प्लांट को बेहतरीन लोकेशन एडवांटेज मिलेगा। यह साइट जेवर के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के करीब है। यह इलाका आने वाले समय में एक बड़ा रीजनल कार्गो हब बनने जा रहा है। ऐसे में इस प्लांट को देश भर में सामान भेजने के लिए मजबूत रोड कनेक्टिविटी और एक्सपोर्ट के लिए सीधा एयर कार्गो एक्सेस मिलेगा। इसके अलावा NCR में पहले से मौजूद विशाल इंजीनियरिंग और सप्लायर नेटवर्क का फायदा भी कंपनी को मिलेगा।

भारत पर कुबोटा का बड़ा दांव: 2030 का विजन

यह प्रोजेक्ट कुबोटा कॉरपोरेशन के मिड-टर्म बिजनेस प्लान 2030 का हिस्सा है। इसमें भारत को समूह के प्रमुख ग्रोथ मार्केट्स में शामिल किया गया है। कुबोटा कॉरपोरेशन के सीईओ शिंगो हानाडा के मुताबिक नए प्लांट का यह पैमाना कुबोटा की विकास रणनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत अब कुबोटा के लिए सिर्फ एक बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग हब बन रहा है।

आपको बता दें कि नवंबर 2025 में YEIDA ने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ अगस्त 2024 में हुए एक एमओयू के आधार पर एस्कॉर्ट्स कुबोटा को 4500 करोड़ रुपये के कुल ट्रैक्टर निर्माण यूनिट के लिए लगभग 200 एकड़ जमीन आवंटित की थी। इससे 4000 नौकरियां मिलने का अनुमान था। हाल ही में जिस प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ है, वह उसी बड़े विजन का पहला और संशोधित फेज्ड स्कोप है।

2030-31 तक फार्म मेकेनाइजेशन को नई दिशा देने का लक्ष्य

एस्कॉर्ट्स कुबोटा के सीएमडी निखिल नंदा ने कहा कि कंपनी प्रोडक्ट-लीड ग्रोथ पर ध्यान केंद्रित कर रही है। कंपनी ने इस साल अपने तीन ब्रांड्स के तहत 42 नए उत्पाद और पिछले दो सालों में 50 से अधिक उत्पाद लॉन्च किए हैं, जिससे धान की खेती, फोर-व्हील-ड्राइव और अन्य सेगमेंट्स में खाली जगहों को भरा गया है।

अप्रैल से जुलाई के दौरान कंपनी ने अपने संयुक्त पैन-इंडिया नेटवर्क के दम पर लगातार अपने मार्केट शेयर में बढ़ोतरी की है। निखिल नंदा ने कहा है कि एस्कॉर्ट्स कुबोटा भारत में फार्म मेकेनाइजेशन को स्पीडअप करना चाहती है। कंपनी का लक्ष्य 2030-31 तक एक ऐसा फुल-सॉल्यूशन एग्रीकल्चर प्लेटफॉर्म तैयार करना है जो सिर्फ कम कीमतों पर नहीं, बल्कि वैल्यू पर केंद्रित हो। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटलाइजेशन की बड़ी भूमिका होगी।

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आपको बता दें कि साल 1944 में स्थापित एस्कॉर्ट्स कुबोटा भारत और वैश्विक बाजारों में फार्मट्रैक, पावरट्रैक और कुबोटा ब्रांड्स के तहत बिक्री करती है। वहीं 1890 में ओसाका (जापान) में शुरू हुई कुबोटा कॉरपोरेशन दुनिया के 120 से अधिक देशों में कृषि, कंस्ट्रक्शन और इंजन वर्टिकल्स में काम करती है और एस्कॉर्ट्स कुबोटा में मेजॉरिटी की हिस्सेदारी रखती है।

Indian Overseas Bank Recruitment 2026: आईओबी 250 लोकल बैंक ऑफिसरों की भर्ती, जानें कब से कब तक कर सकेंगे आवेदन

Indian Overseas Bank Recruitment 2026: इंडियन ओवरसीज बैंक ने 2026-27 के भर्ती चक्र के तहत 250 लोकल बैंक ऑफिसर के पदों के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इसके मुताबिक, ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया 8 अगस्त से शुरू हो गई है। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 24 अगस्त, 2026 तक बैंक की ऑफिशियल वेबसाइट के जरिए अपना आवेदन जमा कर सकते हैं।

चयनित उम्मीदवारों को जूनियर मैनेजमेंट ग्रेड स्केल-I में लोकल बैंक ऑफिसर के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। उन्हें उसी राज्य में पोस्ट किया जाएगा जिसके लिए वे आवेदन करेंगे। कैंडिडेट सिर्फ एक राज्य में वैकेंसी के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस भर्ती में तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में खाली पद शामिल हैं। आईओबी ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय सीमा में आवेदन सिर्फ ऑनलाइन मोड से ही लिए जाएंगे।

इंडियन ओवरसीज बैंक लोकल बैंक ऑफिसर भर्ती 2026: जरूरी तारीखें

लोकल बैंक ऑफिसर पदों के लिए आवेदन करते समय कैंडिडेट्स को इन तारीखों का ध्यान रखना चाहिए:

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू : 8 अगस्त, 2026

एप्लीकेशन फीस पेमेंट शुरू : 8 अगस्त, 2026

ऑनलाइन अप्लाई करने की आखिरी तारीख : 24 अगस्त, 2026

एप्लीकेशन फीस पेमेंट की आखिरी तारीख : 24 अगस्त, 2026

आईओबी लोकल बैंक ऑफिसर भर्ती 2026: सिर्फ चार राज्यों में होगी

बैंक ने चार राज्यों में कुल 250 वैकेंसी निकाली हैं। कैंडिडेट्स को अपने चुने हुए राज्य की बताई गई लोकल भाषा में अच्छी जानकारी होनी चाहिए।

तमिलनाडु : 100 पद; तमिल जरूरी भाषा है।

कर्नाटक : 50 वैकेंसी; कन्नड़ जरूरी भाषा है।

महाराष्ट्र : 50 वैकेंसी; मराठी जरूरी भाषा है।

गुजरात : 50 वैकेंसी; गुजराती जरूरी भाषा है।

उम्मीदवार सिर्फ एक राज्य के लिए आवेदन कर सकते हैं। मेरिट लिस्ट राज्य वार और श्रेणी वार अलग-अलग तैयार की जाएगी। चयनित उम्मीदवारों को उनके चुने हुए राज्य में सेवा के पहले 12 साल या बताए गए सीनियर ग्रेड में प्रमोशन होने तक, जो भी पहले हो, नियुक्त किया जाएगा।

आईओबी लोकल बैंक ऑफिसर भर्ती 2026: चयन प्रक्रिया

चयन प्रक्रिया में एक ऑनलाइन परीक्षा, लोकल लैंग्वेज प्रोफिशिएंसी टेस्ट (जहां भी लागू हो), और पर्सनल इंटरव्यू शामिल होगा। ऑनलाइन परीक्षा में 200 अंकों के 140 सवाल होंगे और कुल तीन घंटे का समय होगा। इसमें रीजनिंग और कंप्यूटर एप्टीट्यूड, जनरल/इकोनॉमी/बैंकिंग अवेयरनेस, डेटा एनालिसिस और इंटरप्रिटेशन, और अंग्रेजी पर पकड़ देखी जाएगी। गलत जवाब के लिए पेनल्टी भी होगी। पर्सनल इंटरव्यू 100 मार्क्स का होगा। फाइनल सिलेक्शन ऑनलाइन एग्जाम और इंटरव्यू के आधार पर होगा। इनका वेटेज 80:20 का रहेगा।

क्या हमारी नौकरियां ले सकता है AI? जानें 5 ऐसी फील्ड जहां इंसानों की काबीलियत का मुकाबला नहीं कर सकेगा एआई

क्या हमारी नौकरियां ले सकता है AI? जानें 5 ऐसी फील्ड जहां इंसानों की काबीलियत का मुकाबला नहीं कर सकेगा एआई

आज के दौर में छोटे-बड़े पदों पर काम कर रहे कामगारों को एक सवाल सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्या हमारी नौकरियां ले सकता है? कहने को यह सिर्फ मशीन है, लेकिन एंट्री लेवल कर्मचारियों से लेकर सीईओ तक इसके खौफ में जी रहे हैं। आए दिन मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में लोगों की छंटनी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में ये सोचना लाजिमी है कि क्या एआई की वजह से इंसानों के काम करने के विकल्प सीमित होंगे या खतरा उतना बड़ा भी नहीं है, जितना इसका खौफ बन गया है? इस विषय पर बीबीसी हिंदी एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि एआई सिर्फ नौकरियां खत्म नहीं करेगा, बल्कि नई नौकरियां पैदा भी करेगा। जनवरी 2026 में जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एआई के कारण लाखों नई नौकरियां बनी हैं। कोई 12वीं छात्र एआई से जुड़े क्षेत्र में करियर बनाना चाहता है, तो इसके लिए सही कोर्स चुनना होगा। आइए जानें 5 ऐसे करियर विकल्प जहां एआई इंसानों का बाल भी बांका नहीं कर सकता है।

क्या होता है एआई?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन या कंप्यूटर की ऐसी क्षमता, जिससे ऐसा लगे कि वो इंसानों की तरह ही सोचने-समझने के काबिल है।” वह कहते हैं रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल हो रहे कंप्यूटर-मोबाइल एप्लिकेशन के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काम कर रहा है।

एआई के पांच टॉप कोर्स

दिल्ली में टेक पॉलिसी फोकस्ड थिंकटैंक इसिया सेंटर की डायरेक्टर और जानी-मानी एआई एक्सपर्ट मेघना बल कहती हैं, ”एआई उन लोगों के लिए खतरा नहीं है, जो खुद को अपडेट रखते हैं। बल्कि यह उनके लिए मौका है।” मेघना के मुताबिक एआई से संबंधित कुछ बेसिक स्तर के कोर्स सभी को करने चाहिए। सरकार के स्वयं पोर्टल के जरिए कई कोर्स फ्री में किए जा सकते हैं। लेकिन इस फील्ड में करियर बनाने में ये 5 कोर्स आपके काम आएंगे।

एमबीए/पीजी डिप्लोमा इन एआई एंड बिजनेस एनालिटिक्स : आईआईएम, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, और अपग्रैड, या ग्रेट लर्निंग जैसी एडुटेक कंपनियों के साथ जुड़कर ये कोर्स किया जा सकता है। इसकी फीस करीब ढाई से सात लाख रुपये तक हो सकती है। कोर्स करने के बाद संभावित सैलरी छह से बीस लाख रुपये के बीच हो सकती है।

एआई सर्टिफिकेट प्रोग्राम (ऑनलाइन): ये ऑनलाइन एडुटेक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। इसकी फीस डेढ़ लाख रुपये के आसपास है। ये उनके लिए है, जो एकदम शुरुआती चरण में हैं और एआई की बुनियादी समझ बनाना चाहते हैं। इस कोर्स के बाद सालाना 10 लाख तक सैलरी मिल सकती है।

एमसीए/एम टेक इन एआई एंड मशीन लर्निंग : आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी और कई दूसरे प्रमुख विश्वविद्यालय से ये कोर्स किया जा सकता है। इसके अलावा आईआईटी में एआई से जुड़े कई क्रैश कोर्स भी उपलब्ध हैं। मास्टर्स की फीस सालाना एक लाख से दस लाख के बीच हो सकती है। इसे करने के बाद अनुमानित सैलरी 22 लाख रुपए हो सकती है।

बीएससी/बीटेक इन एआई एंड डेटा साइंस : दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, एमिटी यूनिवर्सिटी, सेंट जेवियर्स कॉलेज, एनआईटी जैसे बड़े संस्थानों से ये कोर्स किया जा सकता है। पूरे प्रोग्राम की फीस एक लाख से बीस लाख रुपए के बीच हो सकती है। संभावित सैलरी 6 से 18 लाख रुपये तक जा सकती है।

एआई बूटकैंप और इंडस्ट्री प्रोग्राम : आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे और कई बड़े निजी संस्थान में ये कोर्स उपलब्ध है। इसकी फीस करीब 1 लाख से साढ़े तीन लाख रुपये हो सकती है। कोर्स के बाद संभावित पैकेज 6 से 18 लाख रुपए या उससे ज्यादा हो सकता है।

हेल्थ, सीए, कानून के पेशे में कम होगा एआई का असर

विशेषज्ञों का कहना है कि एआई का खतरा उन पेशों पर कम होगा, जहां इंसानी कनेक्ट की जरूरत होगी। मेघना बल कहती हैं, “नर्स, हेल्थकेयर प्रोफेशनल, फिजियोथेरेपिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, टीचर के काम एआई नहीं कर पाएगा। इन कामों के लिए इंसान ही चाहिए। लोग सिर्फ ऑटोमेटेड जवाबों से संतुष्ट नहीं होंगे।”

इसके अलावा क्रिएटिव डायरेक्टर्स, लेखक या कॉन्टेंट स्ट्रैटेजिस्ट के काम में एआई मददगार हो सकता है, लेकिन इनकी जगह नहीं ले पाएगा। प्रोफेसर आकाश सिन्हा चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर, नर्स, एआई इंजीनियर, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट, वकील के करियर को एआई से सुरक्षित मानते हैं। लेकिन इसमें अपनी विशेषज्ञता कायम रखनी होगी। ये करियर विकल्प पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन आप खुद एआई टूल का इस्तेमाल करना सीखें, ताकि काम जल्दी कर सकें।

Bihar Police ASI Operation Result 2026: आधिकारिक वेबसाइट पर इस तरह चेक करें प्री परीक्षा की मेरिट लिस्ट, 462 पदों के लिए हुई थी परीक्षा

द्वारका में बनेगा दिल्ली का सबसे भव्य 5-Star होटल! 1000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट से मिलेंगी 800 नौकरियां

DDA Plan: दिल्ली के द्वारका सब-सिटी को एक इकॉनमिक, कॉर्मर्शियल और इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनाने के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने एक बड़ा कदम उठाया है। डीडीए और जुनिपर होटल्स लिमिटेड ने द्वारका के सेक्टर-23 में एक भव्य 5-स्टार होटल बनाने के लिए MoU किया है। इस प्रोजेक्ट में 1000 करोड़ रुपये से अधिक का कैपिटल इन्वेस्टमेंट होगा। होटल बनने और इसके चलने करीब 800 लोगों के लिए डायरेक्ट एंप्लॉयमेंट के मौके तैयार होंगे। यह होटल दिल्ली-एनसीआर में गुणवत्तापूर्ण 5-स्टार आवास की उपलब्धता को काफी मजबूत करेगा।

यह प्रोजेक्ट जुनिपर द्वारा लाइसेंस शुल्क के आधार पर क्रियान्वित की जाएगी। इसके लिए जल्द ही जमीन जुनिपर होटल्स लिमिटेड को सौंप दी जाएगी। इस होटल को 2030 तक ऑपरेशनल करने का टारगेट बनाया गया है। 55 वर्षों की लाइसेंस अवधि के दौरान इस होटल से डीडीए के लिए 6000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व आने का अनुमान है।

गोल्फ कोर्स और यशोभूमि के पास प्राइम लोकेशन

जुनिपर होटल्स लिमिटेड, सराफ होटल्स और अंतरराष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी ब्रांड हयात के बीच एक रणनीतिक साझेदारी है। अभी यह भारत के प्रमुख स्थलों पर 245 सर्विस अपार्टमेंट्स सहित 1895 कमरों वाले सात होटलों का प्रबंधन करता है। कंपनी द्वारका में प्रस्तावित इस 5-स्टार होटल को हयात के साथ साझेदारी में अपने प्रीमियम ग्रैंड हयात ब्रांड के तहत विकसित और संचालित करेगी।

यह होटल देश के सबसे लंबे 18-होल वाले डीडीए द्वारका गोल्फ कोर्स के ठीक सामने स्थित होगा। इससे गोल्फ खिलाड़ियों और मेहमानों की विशेष जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। यह जगह क्षेत्रफल के हिसाब से भारत और एशिया के सबसे बड़े कन्वेंशन सेंटर यशोभूमि के बेहद करीब है। ये द्वारका स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से भी नजदीकी दूरी पर होगा। इसके अलावा यह होटल ठीक सामने प्रस्तावित डिप्लोमैटिक एन्क्लेव के मेहमानों की जरूरतों को भी पूरा करेगा।

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14 महीने तक किसी को नहीं हुआ शक, दो कंपनियों में चुपचाप करता रहा नौकरी; लेकिन मर्जर ने ऐसा फंसाया कि अब समझ नहीं आ रहा क्या करे!

एक टेक प्रोफेशनल करीब 14 महीने से दो कंपनियों में एक साथ रिमोट जॉब कर रहा था और अब तक उसकी यह ‘डबल जॉब’ वाली व्यवस्था बिना किसी बड़ी परेशानी के चल रही थी। दोनों कंपनियां अलग थीं, काम का तरीका और टेक्नोलॉजी स्टैक भी अलग था, इसलिए उसे लगता था कि दोनों नौकरियों का राज आसानी से छिपा रहेगा। लेकिन अचानक एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उसकी पूरी प्लानिंग हिला दी। उसे पता चला कि उसकी दोनों कंपनियां अब मर्ज होने जा रही हैं।

इसके बाद सबसे बड़ा डर यह है कि कंपनियों के सिस्टम और कर्मचारी रिकॉर्ड आपस में जुड़ते ही उसकी पहचान दोनों जगह सामने आ सकती है। खास बात यह है कि वह दोनों संस्थानों के कर्मचारियों के संपर्क में भी रहता है और दोनों कंपनियों की Slack डायरेक्टरी में उसका नाम मौजूद है। अब वह सोच रहा है कि नौकरी छोड़े या जोखिम लेकर इंतजार करे।

14 महीने तक आराम से चल रही थी दोहरी नौकरी

रेडिट पर शेयर की गई पोस्ट के मुताबिक, टेक कर्मचारी करीब 14 महीने से दो कंपनियों में एक साथ काम कर रहा था। दोनों नौकरियां पूरी तरह रिमोट थीं और दोनों में अलग-अलग टेक्नोलॉजी स्टैक इस्तेमाल होते थे।

उसका मानना था कि दोनों कंपनियों के कामकाज और टीमों के बीच इतना अंतर है कि किसी को उसके दूसरे रोजगार के बारे में पता चलने की संभावना बेहद कम है। इसी भरोसे के साथ वह दोनों नौकरियां संभालता रहा।

छोटी कंपनी को चुना था, ताकि न हो कोई टकराव

कर्मचारी के मुताबिक, उसकी एक कंपनी मिड-साइज SaaS कंपनी थी, जबकि दूसरी उसी सेक्टर में काम करने वाली अपेक्षाकृत छोटी कंपनी थी। उसने दूसरी कंपनी को इसलिए चुना था क्योंकि उसे लगता था कि छोटी कंपनी होने के कारण दोनों संस्थानों के बीच भविष्य में किसी तरह का कारोबारी संपर्क होने की संभावना काफी कम है। लेकिन जिस चीज को उसने सबसे कम संभावित माना था, वही आखिरकार उसके सामने आ गई।

CEO का एक ईमेल और बदल गया पूरा खेल

मुश्किल तब शुरू हुई जब उसे पहली कंपनी के CEO की ओर से ईमेल मिला। ईमेल में बताया गया था कि उसकी कंपनी दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करने जा रही है। यानी जिस कंपनी में वह दूसरी नौकरी कर रहा था, अब वही उसकी पहली कंपनी के कॉरपोरेट दायरे में आने वाली थी। इसके बाद कर्मचारी को सबसे बड़ा डर अपने दोनों रोजगार रिकॉर्ड के आपस में जुड़ने का सताने लगा।

Slack डायरेक्टरी बनी सबसे बड़ी चिंता

टेक प्रोफेशनल ने बताया कि वह दोनों कंपनियों के कर्मचारियों के साथ नियमित रूप से बातचीत करता है। ऐसे में मर्जर के बाद उसके लिए छिपे रहना और मुश्किल हो सकता है। दोनों कंपनियों की Slack डायरेक्टरी में उसका नाम मौजूद है। हालांकि दूसरी कंपनी में उसने अपने नाम का थोड़ा अलग फॉर्मेट इस्तेमाल किया था, लेकिन उसे खुद भी शक है कि सिस्टम और कर्मचारी डेटाबेस के एकीकरण के बाद यह अंतर उसे बचाने के लिए काफी नहीं होगा।

असली डर

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दोनों कंपनियों का इंटीग्रेशन कितनी जल्दी शुरू होगा। कर्मचारी को अंदाजा नहीं था कि पूरी प्रक्रिया में कई महीने लगेंगे या सिस्टम और कर्मचारी रिकॉर्ड का एकीकरण शुरुआत में ही शुरू हो जाएगा। अगर दोनों कंपनियों के HR सिस्टम, डायरेक्टरी और डेटाबेस जल्दी आपस में जुड़ गए, तो एक ही व्यक्ति का दो जगह कर्मचारी के तौर पर मौजूद होना आसानी से सामने आ सकता है।

नौकरी छोड़ दे या जोखिम लेकर इंतजार करे?

यहीं से कर्मचारी की सबसे बड़ी दुविधा शुरू हुई। उसके सामने दो रास्ते थे दूसरी नौकरी से खुद इस्तीफा दे दे या फिर कुछ समय तक दोनों नौकरियां जारी रखकर हालात पर नजर रखे। पहला विकल्प उसे तुरंत संभावित जोखिम से बाहर निकाल सकता था। वहीं दूसरा विकल्प ज्यादा अनिश्चित था, लेकिन इसमें वह मर्जर की दिशा देखकर आगे फैसला लेने की उम्मीद कर रहा था।

Layoff हुआ तो Severance का भी सवाल

कर्मचारी के दिमाग में एक और संभावना आई। मर्जर के दौरान कंपनियां अक्सर restructuring करती हैं और कुछ पदों को खत्म भी किया जा सकते हैं। ऐसे में उसे लगा कि अगर वह इंतजार करता है और उसकी नौकरी restructuring में चली जाती है, तो शायद उसे severance मिल सके। हालांकि वह यह भी समझ रहा था कि इस रणनीति में बड़ा जोखिम है। अगर उससे पहले ही दोनों कंपनियों को उसके डबल एम्प्लॉयमेंट का पता चल गया, तो स्थिति उसके खिलाफ जा सकती है।

तनाव इतना बढ़ा कि सुबह 10 बजे ही खाने लगा Goldfish

अपनी पोस्ट के आखिर में टेक कर्मचारी ने अपनी स्थिति को मजाकिया अंदाज में बताते हुए कहा कि वह सुबह 10 बजे ही अपनी डेस्क पर बैठकर “stress eating goldfish” कर रहा था। उसने Reddit यूजर्स से पूछा कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। पोस्ट सामने आते ही लोगों ने इसे गंभीर सलाह के साथ-साथ मजाकिया नजरिए से भी लेना शुरू कर दिया।

इंटरनेट ने कहा

पोस्ट पर कई यूजर्स ने उसकी स्थिति पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने इसे “suffering from success” वाला मामला बताया। दूसरे ने मजाक करते हुए कहा कि वह दोनों कंपनियों की टीमों का परिचय कराने वाला व्यक्ति बन सकता है। किसी ने तो यहां तक सुझाव दे दिया कि वह अपना कानूनी नाम ही बदल ले। एक अन्य यूजर ने बेहद सीधे अंदाज में सलाह दी दूसरी नौकरी से इस्तीफा देकर भगवान से प्रार्थना करो। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि वे भी ऐसी ही “समस्या” झेलना चाहेंगे।

मर्जर ने खोल दिया Overemployment का सबसे बड़ा जोखिम

इस पूरे मामले की दिलचस्प बात यही है कि करीब 14 महीने तक दो रिमोट नौकरियां करने वाले इस कर्मचारी के लिए सबसे बड़ा खतरा काम का दबाव नहीं, बल्कि कंपनियों का आपस में जुड़ना बन गया। जब तक दोनों संस्थान अलग थे, अलग टेक स्टैक, अलग टीम और अलग सिस्टम ने उसकी दोहरी नौकरी को छिपाए रखा। लेकिन मर्जर के बाद वही अलग-अलग सिस्टम एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। अब उसकी पूरी चिंता इसी बात पर टिकी है कि यह इंटीग्रेशन कितनी जल्दी होता है और दोनों कंपनियों के रिकॉर्ड कब एक-दूसरे के सामने आते हैं।