Gold Price Today: सप्ताह के पहले दिन सोना हुआ सस्ता, 24 और 22 कैरेट दोनों के भाव में गिरावट

सप्ताह के पहले दिन सोमवार को देश में सोने की कीमत में गिरावट है। 5 अक्टूबर की सुबह 24 और 22 कैरेट गोल्ड दोनों का भाव फिसला है। राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड 149320 रुपये प्रति 10 ग्राम पर है।मुंबई में कीमत 149170 रुपये प्रति 10 ग्राम है। बीते सप्ताह अलग-अलग शहरों में 24 कैरेट गोल्ड 3500 रुपये तक और 22 कैरेट गोल्ड 3200 रुपये तक सस्ता हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,153.32 डॉलर प्रति औंस पर है। सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं।

इस बीच RBI की मौद्रिक नीति समिति की अक्टूबर की मीटिंग आज, 5 अक्टूबर से शुरू हो रही है। इसके फैसले 7 अक्टूबर को सामने आएंगे। अगस्त की मीटिंग में रेपो रेट को लगातार चौथी बार बिना किसी बदलाव के 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया था।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 149320 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 136890 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 136740 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 149170 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 149170 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 136740 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 149170 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 136740 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली136890149320
मुंबई136740149170
अहमदाबाद136790149220
चेन्नई136740149170
कोलकाता136740149170
हैदराबाद136740149170
जयपुर136890149320
भोपाल136790149220
लखनऊ136890149320
चंडीगढ़136890149320

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चांदी की कीमत

दूसरी कीमती धातु चांदी की कीमत में भी गिरावट है। 5 अक्टूबर की सुबह चांदी देश में 234900 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। बीते सप्ताह चांदी 10000 रुपये सस्ती हुई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 60.97 डॉलर प्रति औंस है। इस साल जनवरी में देश के अंदर चांदी की कीमत 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी।

प्रधानमंत्री जीत तय मानता है, जनता धोखा देती है!

यह दिल्ली की सत्ता की पुरानी बीमारी है। सत्ता में बैठ कर प्रधानमंत्री को धीरे-धीरे विश्वास होने लगता है कि उसने भारत को समझ लिया है। जनता को पढ़ लिया है। किसे राशन चाहिए, किसे आरक्षण, किस जाति को क्या चाहिए, किस धर्म को किससे डराना है, किस लाभार्थी को कितने रुपये देने हैं और किस नारे से चुनाव जीतना है, इसका हिंसाब लगातार पकाया जाता है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह तो यों भी चौबीसों घंटे हिसाब बनाते है। इनकी सर्वे टीम, लगातार काम करती है। पार्टी, संघ संगठन अलग से सर्वे, फीडबैक देते है। दरबारी पूजा करते ही है तो प्रचारतंत्र से पूरे देश को मीडिया, सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम चौबीसों घंटे, सातों दिन खुद मोदी बताते है कि वे लोगों की भलाई के लिए कैसे दीन-रात अपना खून सूखा रहे है!

जवाहरलाल नेहरू को छोडकर हर प्रधानमंत्री भारत के मतदाताओं के साथ इसी विश्वास में जीया है कि जब इतना कर रहे है तो लोग उन्हे बदले में उन्हे ही वोट देंगे। न कि लोहिया की भीड, जनसंघ के नारों और समाजवाद को कोसने वाले स्वतंत्र पार्टी के उधमियों को। बावजूद इसके नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री को जनता ने तब भी सत्ता से बेदखल किया जब वे शाईनिंग इंडिया जैसी बातों में झूमते-झूमाते हुए थे।

ऐसा इंदिरा गांधी के साथ हुआ। राजीव गांधी, नरसिंह राव के साथ हुआ तो अटलबिहारी वाजपेयी के साथ भी हुआ। फिर दस वर्ष की मनमोहन सिंह सरकार के साथ हुआ। वजह हर बार एक नहीं थी। कहीं आंदोलन था, कहीं भ्रष्टाचार मुद्दा था, कहीं विपक्ष एक हुआ, कहीं महंगाई और स्थानीय असंतोष था। लेकिन हर बड़ी चुनावी हार में एक समानता जरूर थी। सत्ता को अपने बनाए गणित पर चुनावी मतगणना तक भरोसा था कि वे जीत रहे है। और मुझे पता है सरकारी खुफिया एजेंसियां भी ऐसे ही हिसाब, ऐसे मुगालतों में रही है।

सोचें, इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में क्या बाकी छोड़ा था? विपक्ष जेल में, प्रेस पर सेंसरशिप, प्रशासन सरकार के हाथ और प्रधानमंत्री की सत्ता अपने चरम पर। मगर 1977 में जब चुनाव हुआ तो कांग्रेस 154 सीटों पर रह गई। वही लावारिस जनता पार्टी ने 295 सीटें जीती। स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली, संजय गांधी अमेठी हार गए। जिस सत्ता के सामने देश खामोश दिखाई देता था, उसी खामोशी ने मतपेटी में उसका फैसला किया।

और राजीव गांधी! दिसंबर 1984 में किसे कल्पना थी कि नौजवान प्रधानमंत्री का चक्रवर्ती जनादेश पांच वर्ष भी नहीं टिकेगा? उन्होने 1984-85 में 414 सीटें जीती थीं। 1989 में उनकी कांग्रेस 197 सीटों पर रह गई।

भारत में हर बडी चुनावी हार सरकार, सत्ता के हर तरह के दुरूपयोग, आंतक, चुनावी धांधलियों, शाईनिंग इंडिया जैसे ढिढोरों के बावजूद हुई है। सोचे, किसने सोचा शाईनिंग नेतृत्व, शाईनिंग इंडिया के बावजूद प्रधानमंत्री वाजपेयी 2004 में सोनिया गांधी के आगे हारेंगे? कोई माने या न माने अन्ना, केजरीवाल के आंदोलनों, अपनी भारी-भरकम वर्चुअल कैंपेनिंग के बावजूद नरेंद्र मोदी को भी भरोसा नहीं था कि हिंदीभाषी इलाके में उनकी आंधी जैसे चुनाव परिणाम होंगे!

आगे 2024 के चुनाव में जो हुआ वह सामान्य नहीं था। ध्यान रहे ये चुनाव अयोध्या में राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद हुए थे। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस उत्तरप्रदेश में भी कम सीटे मिली जहां रामजी का नगाड़ा घर-घर गूंजा था। भाजपा 303 से घटकर 240 सीटों पर सिमटी। गठबंधन से जरूर बहुमत बचा, लेकिन भाजपा अपना अकेला बहुमत तो खो बैठी थी।

तभी से नरेंद्र मोदी- अमित शाह मतदाताओं की सूचियों को सुधारने के नाम पर उन्हे कैसे मनमाफिक बनवाने के अभियान में जुटे है, इसके ढेरों किस्से, साक्ष्य अब जगजाहिर है। जीतने की ऐसी हठ से स्वभाविक सवाल है कि मोदी के रहते कुल मतदाताओं की संख्या में क्या संघ परिवार-भाजपा पचास प्रतिशत से ऊपर की संख्या वफादार वोटों, भक्तों की बनवा लेगै? आखिर इसके बिना तो लगातार चुनाव को गारंटीनुमा जीतना संभव नहीं है? क्या लोग ऐसा होने देंगे? गली-गली, घऱ-घर में किसी के नाम होने, किसी के कटे होने की वासत्विकताओं में क्या लोगों को जाहिर नहीं होगा कि वोटर लिस्ट की ऐसी गडबडी किसलिए? नतीजतन वही वही मौन सत्ता पलट क्रांति होगी जैसे इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ हुई थी।

मगर प्रधानमंत्री ऐसे नहीं सोचता। वह सत्ता है तो मुमकिन के विश्वास में जीता होता है।

ऐसा आत्मविश्वास मैंने लालू यादव के समय के बिहार में देखा था तो एनटी रामराव, वीपीसिंह (राजा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ)। या कांसीराम-मायावती का हुंकारा-जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। सोचे वीपीसिंह, मायवती, लालू-राबडी यादव का गणित आधारित चक्रवर्तीय शासन कितनी पीड़ी फला-फूंला?

पुराने नेताओं और नरेंद्र मोदी की गणित में एक बुनियादी फर्क है। नरेंद्र मोदी ने अजैविक, दैवीय जन्म के विश्वास में हिंदुओं में अपना भक्ति आंदोलन बनाया है। बावजूद इसके जरा गौर करे कि इन कथित भगवानजी को भी चुनाव आयोग के जरिए वोटरलिस्ट का पुर्नलेखन करवाना पड रहा है। उसी बूते तो भगवानजी को विश्वास है, संघ-भाजपा के सत्ताभोगियों की तैयारियां है कि 2047 तक तो उनका राज पक्का है। 2034 तक मोदी, 2034 से 2043 तक अमित शाह और 2043 -2047 के सौ वर्षीय भारत के युगप्रवर्तक प्रधानमंत्री होंगे योगी आदित्यनाथ! कल्पना करें तब तक एक नंबर बन चुके चीन के आगे भारत के नेतृत्वकर्ता के चेहरे पर।

हां, गांठ बांधे रखे मोदी है तो सब संभव है। दरअसल हजार साला गुलामी में जीया हुआ, धड़कता हुआ भक्त हिंदू ऐसे ही सोचा करता है। यही हिंदू राष्ट्र का सत्य है और भविष्य की खामोख्याली है।

इसलिए उन बातों, उन वीडियों को नहीं देखे जो दो अक्टूबर को मुंबई में नौजवानों के विशाल हूजुम में मौजूद है या दिल्ली में मौजूद था। नौजवान जंतर-मंतर पर बैठ कर भले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले या ज्ञानेश कुमार का। प्रदर्शन कॉकरोचों का हो, आम आदमी-वामपंथियों का हो या कांग्रेस-ममता बनर्जी और विपक्षी गठजोड़ का, इन सबका नमोदी- शाह पर रत्ती भर असर नहीं होना है!

नोट रखे भारत में सत्ता प्रदर्शन नहीं देखती। स़डक का गुस्सा नहीं समझती। सत्ता हमेशा अपने आंकड़े देखती होती है। दिल्ली की सत्ता की खूबी है जो प्रधानमंत्री और उसके अनुचरों को सौ टका विश्वास दिलाए रहती है कि आप प्रधानमंत्री नहीं, भारत भाग्य विधाता हैं। हम जनता के लिए इतना कुछ तो कर रहे हैं। भारत अब शाइनिंग इंडिया है। आप माईबाप, हुजूर सभी को रोटी खिला रहे हैं। राशन दे रहे है। घर दिया। शौचालय दिया। गैस दी। राशन दिया। खाते में पैसा दिया। रामजी की ऊंगली पकड़ उन्हे राममंदिर में प्रतिष्ठित किया। भारत का दुनिया में डंका बजा हुआ है। औरतें भी कह रही हैं, हमने नमक खाया है तो मोदीजी को ही वोट देंगे। इं

दिरा गांधी ने भी सब किया था। वाजपेयी, उनके साथी धुरंधरों, प्रमोद महाजन, वेंकेया, जेतली, सुषमा जैसे ढेरों नाम शाईनिंग इंडिया से देश गुंजाते हुए थे। ध्यान रहे दंगों के बाद की हिंदू राजनीति के पीक के बावजूद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने प्रदेश गुजरात में 26 सीटों में से 14 सीटे ही भाजपा को जीता पाए थे।

और हर बार वही कहानी। चुनावी मतगणना के दिन ही सत्ता को मालूम होता है अरे यह क्या! सो नोट रखे भारत का मतदाता भी कभी किसी प्रधानमंत्री की स्थायी संपत्ति नहीं हुआ। भक्तों की भी आस्था के भगवान समय अनुसार चुपचाप बदलते रहते है!

ज्ञानेश है भाजपा का हथियारः उद्धव

मुंबई। शिवसेना (उबाठा) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रविवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ‘हथियार’ के रूप में काम करने का आरोप लगाया। वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द करने और भविष्य के चुनाव मतपत्र से कराने की मांग की।

सीईसी और एसआईआर के खिलाफ ठाकरे बंधुओं के नेतृत्व में मुंबई में निकाले गए ‘विराट गर्जना मोर्चा’ में हजारों लोग शामिल हुए। मार्च के बाद हुई रैली में कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट और विजय वडेट्टीवार तथा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के जयंत पाटिल, शशिकांत शिंदे, जितेंद्र आव्हाड और अनिल देशमुख भी शामिल हुए।

उद्धव ठाकरे ने सवाल किया कि अगर एसआईआर मतदाता सूची से बांग्लादेशियों को बाहर करने के लिए कराया गया था तो सरकार बताए कि देश में अवैध रूप से रह रहे कितने बांग्लादेशियों का पता लगाया गया है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया, ‘ज्ञानेश कुमार भाजपा का हथियार हैं।’

निर्वाचन आयोग को निशाना बनाते हुए उद्धव ने दावा किया कि महाराष्ट्र में एसआईआर के दौरान दो करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह की कवायद में पश्चिम बंगाल में 30 लाख और तमिलनाडु में 70 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

उद्धव ठाकरे ने नूर्नबर्ग मुकदमों की तर्ज पर भाजपा नेताओं के खिलाफ अभियोजन की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, ‘भाजपा और इन अधिकारियों को समझ लेना चाहिए कि देश में भी ऐसा ही होगा।’

उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की लड़ाई किसी एक पार्टी या नेता, धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए है। उद्धव ने दावा किया, ‘भाजपा को समझ लेना चाहिए कि लोग आज शांत हैं। अगर वे आक्रोशित हो गए तो वे उसका सिंहासन जला देंगे।’

उद्धव ने भाजपा पर न केवल वोट और विधायकों को ‘चुराने’ का आरोप लगाया, बल्कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले चढ़ावे को भी ‘चुराने’ का आरोप लगाया।

शिवसेना (उबाठा) प्रमुख ने इस सप्ताह की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करने को लेकर उच्चतम न्यायालय की भी आलोचना की। यह मामला राज्य में उपचुनाव से एक दिन पहले तत्काल सुनवाई के लिए उठाया गया था। अदालत इस मामले पर पांच अक्टूबर को सुनवाई करेगी, जबकि राज्य की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव छह अक्टूबर को होने हैं।

उद्धव ने दावा किया, ‘यह दिखाता है कि वे सभी संस्थानों को किस तरह नियंत्रित कर रहे हैं।’ राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में एसआईआर की प्रक्रिया रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि देश में भविष्य के चुनाव मतपत्र के जरिए कराए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि वे 2017-18 से ही राजनीतिक नेताओं को निर्वाचन निकाय में कथित ‘अनियमितताओं’ के बारे में बताते रहे हैं।

मनसे प्रमुख ने कहा कि उन्होंने ईवीएम और मतदाता सूची के मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। उन्होंने दोनों नेताओं से इन मुद्दों के स्पष्ट होने तक चुनाव का बहिष्कार करने का आग्रह भी किया था।

दक्षिण मुंबई के मेट्रो सिनेमा से शुरू हुआ विरोध मार्च कुछ ही दूरी तय कर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) मुख्यालय पहुंचा। एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित इस मार्च में सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके इस्तीफे की मांग की गई।

मार्च में राजनीतिक दलों के झंडे ले जाने की अनुमति नहीं थी। प्रतिभागियों से केवल राष्ट्रीय तिरंगा साथ रखने को कहा गया था। प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि शहर एक बार फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आया है। सभी भारतीयों से एकजुट होने का आह्वान करते हुए दीपके ने कहा, ‘अब या कभी नहीं।’

Bullet Train Project Update: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी कामयाबी, 12 मंजिला बिल्डिंग जितना ऊंचा साबरमती नदी पुल तैयार, अब आगे क्या?

Mumbai-Ahmedabad Bullet Train Project Update: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के तहत एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) ने अहमदाबाद में साबरमती नदी पर बने 12 मंजिला बिल्डिंग जितना ऊंचा पुल का निर्माण पूरा कर लिया है। NHSRCL ने बताया कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत साबरमती नदी पर 480 मीटर लंबा और 36 मीटर ऊंचा पुल बनकर तैयार हो गया है। एनएचएसआरसीएल ने एक बयान में कहा कि करीब 118 फुट ऊंचा यह पुल 12 मंजिला इमारत के बराबर है। यह मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के प्रमुख ढांचों में से एक है।

14.8 मीटर की ऊंचाई पर है पुल

आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह पुल पश्चिम रेलवे की अहमदाबाद-दिल्ली मुख्य रेल लाइन के पास स्थित है, जो जमीन के स्तर से करीब 14.8 मीटर की ऊंचाई पर है। यह पुल साबरमती और अहमदाबाद बुलेट ट्रेन स्टेशनों के बीच स्थित है। यह साबरमती स्टेशन से करीब एक किलोमीटर और अहमदाबाद स्टेशन से चार किलोमीटर दूर है। बयान के अनुसार, साबरमती नदी पुल के खंभों को ज्यादा ऊंचाई वाला बनाया गया है ताकि मौजूदा बुनियादी ढांचे से जरूरी वर्टिकल क्लीयरेंस बनाए रखी जा सके। NHSRCL के मुताबिक, साबरमती नदी पर बने इस पुल की लंबाई 480 मीटर है। इसकी करीब 36 मीटर ऊंचाई इसे परियोजना के प्रमुख इंजीनियरिंग स्ट्रक्चर में शामिल करती है।

पुल की बड़ी बातें

नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बताया कि पुल को आठ गोलाकार पिलर का सहारा दिया गया है। इनमें से चार पिलर नदी की तलहटी में, दो पिलर नदी के दोनों किनारों पर और दो पिलर नदी के किनारों से बाहर स्थित हैं। पिलर को रणनीतिक तरीके से इस तरह लगाया गया है कि नदी में जल प्रवाह में कम से कम रुकावट हो। NHSRCLने कहा कि पुल का निर्माण ‘बैलेंस्ड कैंटिलीवर मेथड’ से किया गया है। यह नदियों और गहरे जलमार्गों पर लंबी दूरी वाले पुलों के निर्माण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विशेष तकनीक है। इस तकनीक से पुल के ऊपरी ढांचे के नीचे पारंपरिक मचान लगाए बिना उसका निर्माण किया जा सकता है।

बयान में आगे कहा गया है कि मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (एमएएचएसआर) का मार्ग कई मौजूदा बुनियादी ढांचा सुविधाओं से होकर गुजरता है, जिनमें फ्लाईओवर, पुल, रेलवे लाइन और मेट्रो कॉरिडोर शामिल हैं। विज्ञप्ति के अनुसार, इस कॉरिडोर में नदी पर कुल 25 पुल हैं, जिनमें 21 गुजरात और चार महाराष्ट्र में हैं। गुजरात में प्रस्तावित 21 नदी पुलों में से अब तक 18 का निर्माण पूरा हो चुका है।

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट

मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर देश की पहली हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट है। इसके तहत गुजरात और महाराष्ट्र को हाई-स्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत साबरमती और अहमदाबाद समेत कई स्टेशनों और बड़े इंजीनियरिंग स्ट्रक्चर का निर्माण किया जा रहा है।

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इस बीच, साबरमती नदी पर 480 मीटर लंबे पुल का निर्माण पूरा होना परियोजना के निर्माण कार्य में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। भारत में पहली बुलेट ट्रेन 15 अगस्त 2027 के आसपास शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। यह ट्रेन मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर चलेगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया था कि शुरुआत में सूरत-बिलिमोरा सेक्शन पर सेवा शुरू होगी।

Aditya Dhar-Yami Gautam: आदित्य धर-यामी गौतम ने छोड़ा मुंबई, हिमाचल प्रदेश में शिफ्ट हुआ कपल!

Aditya Dhar-Yami Gautam: ‘फ्री प्रेस जर्नल’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक यामी गौतम धर और फिल्ममेकर आदित्य धर ने अपना स्थायी ठिकाना हिमाचल प्रदेश में बना लिया है। उन्होंने मुंबई की लगातार पब्लिक अटेंशन से दूर एक शांत जिंदगी चुनी है। यह कपल अब काम के सिलसिले में ही मुंबई आता जाता रहता है।

यामी गौतम और आदित्य धर का हिमाचल कनेक्शन

यामी के लिए हिमाचल प्रदेश लंबे समय से सिर्फ घूमने-फिरने की जगह से कहीं ज्यादा रहा है। शादी से पहले एक्ट्रेस ने मंडी के गोहर में 25 एकड़ जमीन पर बना 100 साल पुराना हेरिटेज घर खरीदा था, जो उनके परिवार और बचपन की यादों से गहराई से जुड़ा हुआ है। जून 2021 में वहां शादी करने के बाद यह प्रॉपर्टी कपल के लिए और भी खास हो गई। हिमाचल में उनका घर लकड़ी और पत्थर से बना है और इसके चारों ओर बगीचे हैं, जहां सेब, आलू, आलूबुखारा और अदरक उगाए जाते हैं।

खबरों के मुताबिक धर परिवार ने इस प्रॉपर्टी को किसी बड़े सेलिब्रिटी होम में बदलने के बजाय इसे सादा ही रखना पसंद किया है। वे फिल्मों पर काम न करने के दौरान लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करते हैं। बॉलीवुड के जाने-माने कपल्स में से एक होने के बावजूद, यामी और आदित्य अपनी पर्सनल जिंदगी को शायद ही कभी पब्लिक चर्चा का हिस्सा बनाते हैं। वे ज्यादातर फिल्म शूट, प्रमोशन और इंडस्ट्री के जरूरी इवेंट्स में ही नजर आते हैं।

‘धुरंधर’ के बाद आदित्य ने पब्लिक में अपनी मौजूदगी काफी कम रखी है। इस साल की शुरुआत में उन्हें मुख्य रूप से प्रोफेशनल कामों के सिलसिले में ही पब्लिक में देखा गया, जिसमें गुजरात के एकता नगर में हाल ही में हुआ नेशनल फिल्म अवॉर्ड समारोह भी शामिल है, जहां उन्हें और यामी को ‘आर्टिकल 370’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिले। आदित्य को प्रोड्यूसर के तौर पर सम्मानित किया गया, जबकि यामी ने लीड एक्ट्रेस के तौर पर अपनी परफॉर्मेंस के लिए अवॉर्ड जीता।

मुंबई वाले घर का ‘धुरंधर’ से कनेक्शन है

हिमाचल प्रदेश में अपना स्थायी ठिकाना बनाने से पहले, यामी और आदित्य मुंबई के खार वेस्ट में एक बड़े किराए के अपार्टमेंट में रहते थे। आदित्य ने 2025 के आखिर में अपनी ‘धुरंधर’ फ्रैंचाइजी के पहले हिस्से के प्रमोशन के दौरान उस पते के बारे में मजाक भी किया था। उस इवेंट में उन्होंने कहा-“मेरा घर चित्रकार धुरंधर मार्ग पर है। खबरों के मुताबिक यह अपार्टमेंट उस कपल ने लंबे समय के लिए किराए पर लिया था, हालांकि बाद में ‘धुरंधर’ की सफलता के बाद उन्होंने इसे खरीद लिया था।

बेटे वेदाविद को भी लाइमलाइट से दूर रखा

माता-पिता बनने के बाद से यामी गौतम और आदित्य धर के लिए प्राइवेसी अहम हो गई है। यामी और आदित्य मई 2024 में अपने बेटे वेदाविद के माता-पिता बने, लेकिन उन्होंने जान-बूझकर उसका चेहरा लोगों की नजरों से दूर रखा है। सितंबर 2025 में यामी ने वेदाविद के साथ एक तस्वीर शेयर की, लेकिन उसका चेहरा छिपाकर ही रखा।

LPG Price 04 October 2026: 4 अक्टूबर को LPG के नए रेट जारी, दिल्ली से रांची तक देखें कीमत

LPG Price 04 October 2026: त्योहारी सीजन में जब बाजार से लेकर घर की रसोई तक खर्च बढ़ने लगता है, ऐसे में गैस सिलेंडर की कीमत पर नजर रखना भी जरूरी हो जाता है। 4 अक्टूबर को एलपीजी की कीमतों को लेकर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत बनी हुई है। 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिससे आम परिवारों के बजट पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा। हालांकि, दूसरी ओर कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की बढ़ी कीमत कारोबारियों की चिंता बढ़ा सकती है। होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों में इस्तेमाल होने वाले 19 किलो के सिलेंडर के रेट बढ़ने से उनकी लागत प्रभावित होगी।

ऐसे में इस महीने घरेलू गैस उपभोक्ताओं को जहां स्थिर कीमतों से राहत मिली है, वहीं कमर्शियल गैस इस्तेमाल करने वालों के लिए खर्च बढ़ गया है। आइए जानते हैं दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई समेत प्रमुख शहरों में घरेलू और कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर आज कितने रुपये में मिल रहा है।

घरेलू LPG सिलेंडर के दाम में कोई बदलाव नहीं

तेल कंपनियों ने 14.2 किलो वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया है। यानी देश के प्रमुख शहरों में उपभोक्ताओं को आज भी पुराने रेट पर ही घरेलू सिलेंडर मिलेगा।

राजधानी दिल्ली में 14.2 किलो का सिलेंडर 942 रुपये का है। वहीं मुंबई में इसकी कीमत 941.50 रुपये, कोलकाता में 968 रुपये और चेन्नई में 957.50 रुपये बनी हुई है।

किस शहर में कितने रुपये का मिल रहा LPG सिलेंडर?

शहरघरेलू सिलेंडर (14.2 किलो)कमर्शियल सिलेंडर (19 किलो)
दिल्ली₹942₹2,810
मुंबई₹941.50₹2,763.50
कोलकाता₹968₹2,946.50
बेंगलुरु₹944.50₹2,893.50
हैदराबाद₹994₹3,058.50
चेन्नई₹957.50₹2,978.50
कटक₹968₹2,947.50
कोयंबटूर₹959₹3,002.50
रांची₹1,010.50₹2,988

घरेलू सिलेंडर स्थिर, लेकिन कमर्शियल गैस ने बढ़ाया खर्च

घरेलू उपभोक्ताओं के लिए भले ही कीमतें स्थिर हैं, लेकिन कारोबारियों को गैस के मोर्चे पर झटका लगा है। 1 अक्टूबर से 19 किलो वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी की गई है।

दिल्ली में कमर्शियल सिलेंडर 62.50 रुपये महंगा होकर 2,810 रुपये पर पहुंच गया है। मुंबई में यह 2,764.50 रुपये, कोलकाता में 2,954 रुपये और चेन्नई में 2,983 रुपये का हो गया है।

होटल-रेस्टोरेंट से लेकर ढाबों तक पड़ेगा असर

कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने का असर सीधे तौर पर उन कारोबारों पर पड़ सकता है जहां बड़े पैमाने पर खाना पकाया जाता है। होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और छोटे फूड बिजनेस में एलपीजी एक जरूरी खर्च है।

सिलेंडर महंगा होने से कारोबारियों की कुकिंग लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

घरेलू और कमर्शियल LPG में क्या फर्क है?

घरेलू एलपीजी सिलेंडर मुख्य रूप से घरों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होता है और इसका सामान्य वजन 14.2 किलो होता है। इसके मुकाबले 19 किलो वाला सिलेंडर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए होता है।

होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और अन्य खाद्य कारोबारों में इसका इस्तेमाल ज्यादा होता है। दोनों सिलेंडरों की कीमतें अलग होती हैं और इनके रेट में होने वाले बदलाव भी अलग-अलग हो सकते हैं।

आपके बजट के लिए क्या मायने रखता है?

फिलहाल घरेलू सिलेंडर की कीमत स्थिर रहने से आम परिवारों को राहत मिली है। हालांकि, कमर्शियल गैस के महंगे होने से बाहर खाना, होटल और छोटे खाद्य कारोबारों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में इसके असर पर नजर रखना जरूरी होगा।

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मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

कांग्रेस को अकेला छोड़ रहे हैं सहयोगी

दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर देश के अलग अलग हिस्सो में खूब प्रदर्शन और आंदोलन हुए। दिल्ली से लेकर मुंबई तक हजारों लोग सड़कों पर उतरे। महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहन कर और तिरंगा हाथ में लेकर लोगों ने प्रदर्शन किया। लेकिन गांधी की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस इससे नदारद रही। कांग्रेस ने अपनी कार्य समिति की बैठक में और उसके अगले दिन विपक्षी गठबंधन की बैठक में यह तय जरूर किया कि दो अक्टूबर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होगा, जो आठ अक्टूबर तक चलेगा। लेकिन कांग्रेस ने दो अक्टूबर के लिए कोई निश्चित योजना नहीं बनाई। कांग्रेस ने तय कराया कि छह अक्टूबर को दिल्ली में निर्वाचन सदन का घेराव किया जाएगा। हो सकता है कि छह अक्टूबर को भी भीड़ जुटे और कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियां अपने संसाधनों से आंदोलन को सफल बनाने का प्रयास करें। लेकिन दो अक्टूबर का विरोध प्रदर्शन ज्यादा व्यस्थित और स्वंयस्फूर्त दिख रहा था। कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों ने दो अक्टूबर के आंदोलन को कामयाब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता जरूर सक्रियता दिखा रहे थे लेकिन मूल रूप से आंदोलन लेफ्ट का था। लेफ्ट की तीनों पार्टियों सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले के छात्र संगठनों ने आंदोलन की प्लानिंग की थी। एक दिन पहले एक अक्टूबर को जंतर मंतर पर जाकर नेहा बोरा ने वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला। उसके बाद लेफ्ट के छात्र संघों एआईएसएफ, एसएफआई और आईसा ने लोग जुटाए। यह अलग बात है कि आम आदमी पार्टी के सौरव भारद्वाज, संजीव झा आदि सुबह ही जंतर मंतर पहुंच गए और क्रेडिट लेने का प्रयास किया। हो सकता है कि आप के लोग भी जंतर मंतर के आसपास या कनॉट प्लेस में जुटे हों लेकिन मूल रूप से लेफ्ट औऱ सिविल सोसायटी का आंदोलन था। कांग्रेस के छात्र संघ एनएसयूआई के छात्र भी इसमें शामिल थे लेकिन किसी ने उनको क्रेडिट नहीं दिया। इसे सीपीएम महासचिव एमए बेबी की अरविंद केजरीवाल से हुई मुलाकात से भी जोड़ कर देख सकते हैं। आप और लेफ्ट इस समय ज्यादा बॉन्डिंग दिखा रहे हैं।

ऐसे ही मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने आंदोलन का ऐलान किया तो उद्धव ठाकरे की पार्टी उसमें शामिल हो गई। शिवाजी पार्क में सीजेपी ने उद्धव की पार्टी की मदद से अच्छी भीड़ जुटा ली। सुबह दिल्ली में आंदोलन शुरू हुआ तो शाम चार बजे से मुंबई में सीजेपी ने प्रदर्शन किया। उसमें शामिल होने के लिए आदित्य़ ठाकरे कुछ फिल्मी कलाकारों के साथ पहुंचे तो बाद में उद्धव ठाकरे भी पहुंचे। बड़ी संख्या में फिल्मी कलाकार भी आंदोलन का हिस्सा बने। ध्यान रहे 30 सितंबर की बैठक में उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस को नसीहत दी थी कि वह एकला चलो का रवैया छोड़े लेकिन दो अक्टूबर को खुद ही कांग्रेस से अलग सीजेपी के आंदोलन में शामिल हो गए। उनका अपना आंदोलन चार अक्टूबर को होना है, जिसकी घोषणा उन्होंने कांग्रेस के साथ मिल कर नहीं की है, बल्कि मनसे के नेता और अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ मिल कर की है। यह आंदोलन भी विपक्ष की बैठक में तय हुए प्रदर्शन से अलग है। कांग्रेस ने विपक्ष की बैठक में बनी सहमति के आधार पर कई राज्यों में प्रदर्शन किए लेकिन हर जगह वह अकेले ही दिखी। पटना में महागठबंधन के नाम पर प्रदर्शन हुआ, जिसमें कांग्रेस के सारे बड़े नेता शामिल हुए पर राजद के प्रमुख तेजस्वी यादव नदारद रहे।

दिल्ली में सीजेपी का अलग आंदोलन

विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की 30 सितंबर की बैठक में तय किया गया कि दो से आठ अक्टूबर तो पूरे एक हफ्ते प्रदर्शन होगा और मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगा जाएगा। इस प्रदर्शन के दौरान छह अक्टूबर को सभी विपक्षी पार्टियों के बड़े नेता निर्वाचन सदन की ओर मार्च करेंगे और घेराव करेंगे। इसके अलावा भी बैठक में कई प्रस्ताव मंजूर किए गए। इस बीच अलग अलग हिस्सों में प्रदर्शन चलता रहेगा। इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया है। दो अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ऐलान किया कि वे 10 अक्टूबर को दिल्ली आ रहे हैं।

हालांकि अभी यह तय नहीं है कि दिल्ली में किसी जगह पर उनको प्रदर्शन करना है या प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी है। अभी तक जंतर मंतर या किसी और जगह पर प्रदर्शन की इजाजत सीजेपी ने नहीं मांगी है। हालांकि उनको प्रदर्शन की इजाजत मिल जाती है। छह जून को भी जब दीपके अमेरिका से लौटे थे तब दिल्ली पुलिस ने हवाईअड्डे पर ही उनसे आवेदन लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी थी। यही शिवाजी पार्क के मामले में भी हुआ। पहले पुलिस ने परमिशन नहीं दी थी। लेकिन सीजेपी ने ऐलान किया कि अगर अनुमति नहीं मिली तो जेल भरो अभियान करेंगे। इसके बाद उनको अनुमति मिल गई।

तभी कहा जा रहा है कि भले लेफ्ट और आम आदमी पार्टी को जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली लेकिन हो सकता है कि सीजेपी को मिल जाए। बहरहाल, जो हो ऐसा लग रहा है कि पेपर लीक और परीक्षा में ग़ड़बड़ी के मामले में जिस तरह युवाओं की प्रतिनिथि आवाज सीजेपी बन गई थी वैसे ही मतदाताओं के मामले में भी सीजेपी के प्रदर्शन और उनकी अपील को ज्यादा तवज्जो मिल रही है। दिल्ली के मुकाबले मुंबई में ज्यादा व्यवस्थित प्रदर्शन हुआ, जिसका मैसेज पूरे देश में गया। यह कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए चिंता की बात है। खास कर कांग्रेस के लिए, जो सोशल मीडिया में लड़ रही है, जबकि सीजेपी जमीन पर लड़ रही है।

SIR विवाद के बीच CEC ज्ञानेश कुमार पर 20 साल पुराने भ्रष्टाचार के आरोप, केरल सरकार कराएगी विजिलेंस जांच

CEC Gyanesh Kumar: केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ साल 2006 के कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर विजिलेंस जांच के आदेश दिए हैं। उस समय ज्ञानेश कुमार केरल के लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव के पद पर तैनात थे। करीब दो दशक पुराने इस मामले की दोबारा चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। अब नई विजिलेंस जांच में शिकायत में लगाए गए आरोपों और पुराने रिकॉर्ड की पड़ताल की जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह जांच मलयंकिझु वेणुगोपाल की शिकायत के आधार पर शुरू की गई है। न्यूज 18 के मुताबिक, शिकायत में ज्ञानेश कुमार के PWD सचिव रहते सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके दिए जाने में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई है।

मलेशियाई अधिकारी की मौत से भी जुड़े आरोप

मामला ली सी बीन की मौत से भी जुड़ा है। ली सी बीन मलेशिया के नागरिक और PATI-BEL नाम की भारत-मलेशिया संयुक्त कंपनी के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर थे। यह कंपनी केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के तहत एक सड़क परियोजना से जुड़ी थी। साल 2006 में कुआलालंपुर में ली की आत्महत्या से मौत हो गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, ली के कथित सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम था। नोट में PWD अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और कथित उत्पीड़न से जुड़े आरोप लगाए जाने की बात सामने आई थी।

ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप हैं?

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि PWD सचिव रहते ज्ञानेश कुमार ने ठेकेदारों को सरकारी निर्माण कार्यों का आवंटन करने में कथित आपराधिक कदाचार किया। शिकायतकर्ता ने ली सी बीन की मौत की परिस्थितियों और उनके कथित सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों की भी जांच की मांग की है। इस मामले में पहले भी विजिलेंस जांच हुई थी।

न्यूज 18 के मुताबिक, उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, विवाद सामने आने के बाद 2006 के अंत से पहले ज्ञानेश कुमार का PWD से तबादला कर दिया गया था। हालांकि, पिछली जांच किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंची। वेणुगोपाल का आरोप है कि पहले की विजिलेंस जांच को अचानक बंद कर दिया गया और आरोपों की उचित तरीके से पड़ताल नहीं की गई।

केरल सरकार ने पुराने विजिलेंस रिकॉर्ड मांगे

ताजा घटनाक्रम से पहले केरल के गृह विभाग ने 2006 में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुई प्रारंभिक विजिलेंस जांच से जुड़ी फाइलें मांगी थीं। इन रिकॉर्ड में ली सी बीन की मौत और केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट से जुड़े आरोपों के बाद शुरू हुई जांच से संबंधित दस्तावेज शामिल बताए जा रहे हैं।

SIR विवाद को लेकर देशभर में प्रदर्शन

शुक्रवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देश में कई जगह प्रदर्शन हुए। विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने दिल्ली में सड़कों पर उतरकर विरोध किया और इस दौरान 700 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अपील पर मुंबई के शिवाजी पार्क में बड़ी संख्या में लोग जुटे। इन प्रदर्शनों के तहत राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और युवा समूहों ने व्यापक स्तर पर लामबंदी की। उन्होंने कुमार के इस्तीफे की मांग की। दिल्ली और मुंबई के अलावा अहमदाबाद, लखनऊ और पटना समेत देश के कई अन्य हिस्सों में प्रदर्शन हुए।

विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गांधी जयंती के दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों को हिरासत में लिए जाने की निंदा की और पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाया। कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शुक्रवार दोपहर मुंबई के शिवाजी पार्क में CJP की अगुवाई वाले प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग जुटे। एसएफआई और आईसा के कार्यकर्ता भी प्रदर्शन में शामिल हुए। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, गायक विशाल डडलानी और महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी भी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे।

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शिवसेना (UBT) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने CJP के आंदोलन को समर्थन दिया है। दिल्ली में फिरोजशाह रोड और अशोक रोड समेत कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड पार करने की कोशिश की। जबकि पुलिसकर्मियों ने उन्हें निर्धारित प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर की ओर बढ़ने से रोक दिया। दिल्ली मेट्रो ने प्रदर्शन स्थल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था के तहत राजीव चौक, केंद्रीय सचिवालय और पेटल चौक सहित मध्य दिल्ली के 12 स्टेशनों पर अस्थायी रूप से प्रवेश और निकास बंद कर दिया। मध्य दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं भी निलंबित कर दी गई। भारतीय युवा कांग्रेस ने प्रदर्शन कर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए तथा कुमार के इस्तीफे की मांग की।