महिला आरक्षण का भी भरोसा

एसआईआर और परिसीमन के बाद भाजपा के चुनाव जीतने के भरोसे का एक आधार महिला आरक्षण की तैयारियां हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण का दांव 2034 के चुनाव के लिए रखा था। तभी 2023 में महिला आऱक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून को पास करते समय उसमें जनगणना और परिसीमन की शर्त जोड़ दी गई। लेकिन 2024 के चुनाव नतीजों के बाद अब सरकार को बेचैनी है कि परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों 2024 के चुनाव में ही लागू किया जाएगा। अगर परिसीमन का फैसला होता है और सीटों की संख्या बढ़ा कर साढ़े आठ सौ की जाती है तो उसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 33 फीसदी आरक्षण के अलावा भी अनारक्षित सीटों पर महिलाओं को टिकट मिलेगी। सो, महिला सदस्यों की संख्या 40 फीसदी तक जा सकती है।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय के अपने शासन में नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को एक अलग और स्वतंत्र वोट समूह के रूप में तैयार करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए कई काम किए हैं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पिछले दो दशक में महिलाओं की स्वतंत्र कांस्टीट्यूएंसी विकसित हुई है। अलग अलग राज्यों के नेताओं ने भी इसके लिए काम किया। बिहार में नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल आदि की मिसाल दी जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को अपने साथ जोडऩे के लिए काम किए। शौचालय की योजना से लेकर लखपति दीदी तक कई योजनाएं चलाई गईं।

लोकसभा और राज्यों के चुनाव के बाद पोस्ट इलेक्शन डेटा एनालिसिस में सीएसडीएस और अन्य एजेंसियों ने महिला वोट का जो आकलन किया है उसका निष्कर्ष यह है कि महिलाएं मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को अपेक्षाकृत थोड़ा ज्यादा वोट करती हैं। महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत भी हर चुनाव के साथ बढ़ रहा है। यह भी माना जा रहा है कि महिलाएं जाति के बंधन से निकल कर वोट कर रही हैं। तीन तलाक को अवैध करने के फैसले के बाद यह भी दावा किया जाता है कि मुस्लिम महिलाओं के भी कुछ वोट भाजपा को मिलते हैं।

अब भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लग रहा है कि अगर इस समय लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया जाए तो कम से कम एक चुनाव में तो महिलाओं का वोट थोक में हासिल किया जा सकता है। हालांकि यह भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार की सदिच्छा है, जो हो सकता है कि पूरी नहीं भी हो। कई बार इस तरह के दांव उलटा पड़ जाते हैं। कांग्रेस जब केंद्र में थी तब उसने 2014 के चुनाव से ठीक पहले आंध्र प्रदेश का विभाजन यह सोच कर किया था कि इससे 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी खत्म होगी और अगर आंध्र में नहीं तो नए राज्य तेलंगाना में तो कांग्रेस जरूर जीत जाएगी। लेकिन अगले दो चुनाव तक वह तेलंगाना तो नहीं ही जीती, आंध्र प्रदेश से साफ अलग हो गई। तीन चुनाव से आंध्र में कांग्रेस का खाता नहीं खुल रहा है।

बहरहाल, भाजपा और नरेंद्र मोदी एसआईआर के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में हैं। इससे भरोसा बना है कि 2029 हर हाल में जीतेंगे। विपक्ष महिला आरक्षण के समर्थन में है। लेकिन उसकी कई पार्टियां आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि अगर महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण नहीं मिला तो संभव है कि लोकसभा और विधानसभाओं में इन जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व कम हो। अगर यह मुद्दा बनता है तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। वैसे भाजपा अब कांग्रेस व अन्य प्रादेशिक पार्टियों से ज्यादा जातीय मामलों की चैंपियन बन गई है। हिदुत्व से ज्यादा भाजपा नेता अब जाति की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी को ओबीसी और एससी, एसटी का नया मसीहा बनाया जा रहा है।

चुनाव जीतकर भी क्या PM नहीं बन पाएंगे नेतन्याहू:दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का डर; हाथ से निकल सकती है सत्ता

इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

चुनाव जीतकर भी क्या PM नहीं बन पाएंगे नेतन्याहू:दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का डर; हाथ से निकल सकती है सत्ता

इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

वोट बंटवारे का नगांव व रेजिनगर मॉडल

एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद भाजपा को यह उम्मीद है कि विपक्ष का वोट बंटेगा, जिसका लाभ उसको मिलेगा। भाजपा के इस भरोसे को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट और असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव को मॉडल की तरह देखा जा सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में नगांव सीट कांग्रेस ने जीती थी। लेकिन उसके सांसद प्रद्योत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इसलिए वहां उपचुनाव हुआ। ऐसे ही रेजिनगर की सीट हुमायूं कबीर ने जीती थी। वे दो सीटों से जीते थे इसलिए उन्होंने रेजीनगर से इस्तीफा दिया। नगांव में 55 से 60 फीसदी औऱ रेजिनगर में करीब 70 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। इसके बावजूद दोनों सीटों पर भाजपा जीती।

नगांव लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार को करीब 50 फीसदी वोट मिले और रेजिनगर में करीब 60 फीसदी वोट मिला। भाजपा ने हुमायूं कबीर के बेटे को 75 हजार वोट से हराया। नगांव लोकसभा सीट पर वोट बंटवारा एक बड़ा फैक्टर रहा। वहां ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता बदरूद्दीन अजमल चुनाव लड़े थे। मुस्लिम मतदाता उनके पक्ष में एकजुट हुए फिर भी कांग्रेस को सवा लाख के करीब वोट मिला। जीत हार का अंतर डेढ़ लाख के करीब वोट का था। तभी माना जा रहा है कि अगर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर लड़तीं तो शायद भाजपा नहीं जीत पाती। रेजिनगर का मामला अलग है। वहां विपक्ष के सभी उम्मीदवारों को मिला कर भी उतना वोट नहीं आया, जितने वोट से भाजपा जीती।

सो, ये दोनों मॉडल हैं। रेजिनगर में कहा गया कि राज्य के मुस्लिम मतदाता भी लेफ्ट और तृणमूल के शासन से ऊबे हुए थे और उनको भी विकास, रोजगार वाली राजनीति पसंद आ रही है। इसलिए मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट दिया। नगांव का मॉडल विपक्ष के वोट बंटवारे का है। भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ेगा। पिछली बार यानी 2024 में विपक्ष एकजुट होकर लड़ा था तो संगठन और नैरेटिव दोनों की साझा ताकत के दम पर उसने भाजपा को बहुमत से नीचे ला दिया था। आजादी के बाद पहली बार इतना मजबूत विपक्ष जीत कर आया। लेकिन उसके बाद अलग अलग कारणों से बिखराव है। आम आदमी पार्टी, डीएमके आदि अलग रास्ते पर चल रहे हैं। अगर ये सभी पार्टियां साथ नहीं आती हैं तो भाजपा विरोधी वोट बंटेगा। विपक्ष के अंदर विभाजन बढ़ाने के लिए भाजपा की ओर से भी साम, दाम, दंड और भेद सारे उपाय किए जाते हैं।

इस बीच मुस्लिम नेताओं की पार्टियां भी चुनाव लड़ेंगी। मुस्लिम नेताओं ने अपनी जिस तरह की छवि बनाई है या विपक्षी पार्टियों ने उनके बारे में जिस तरह के प्रचार किए हैं उसके बाद यह संभावना कम है कि विपक्ष के साथ उनका तालमेल होगा। चाहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी हो या बदरूद्दीन अजमल की पार्टी हो या हुमायूं कबीर और नौशाद सिद्दीकी पार्टी हो। इनका तालमेल मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियों के साथ नहीं होगा। ऐसे में ये पार्टियां अलग चुनाव लड़ेंगी। इनकी वजह से भी वोट का बंटवारा होगा, जिस लाभ भाजपा को मिल सकता है।

न्यूजीलैंड दौरे के लिए 2 एकदिवसीय टीम चुनी भारत ने, शुभमन के बाद श्रेयस करेंगें कप्तानी

INDvsNZ न्यूज़ीलैंड के आगामी दौरे के लिए भारत की वनडे और टेस्ट टीमों की घोषणा कर दी गई है। टी 20 सीरीज़ के समापन के बाद भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ पांच वनडे और दो टेस्ट मैच खेलेगी।वनडे सीरीज़ की सबसे बड़ी हाईलाइट ये है कि स्टार ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा और तेज़ गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह इसका हिस्सा नहीं हैं। ऋषभ पंत को टेस्ट और प्रसिद्ध कृष्णा को टेस्ट एवं वनडे (पहले तीन) दोनों टीमों के लिए चुना गया है। दोनों ही खिलाड़ी चोट से उबर रहे हैं और उन्हें फ़िटनेस क्लिएरेंस की आवश्यकता होगी।

सूत्रों के मुताबिक  प्रसिद्ध के स्कैन में हैमस्ट्रिंग टियर नहीं सामने आया है। पिछले दो सप्ताह से वह स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग पर काम कर रहे हैं। आकाश को ईरानी कप और रणजी ट्रॉफ़ी के पहले राउंड में फ़ॉर्म और फ़िटनेस दिखाने का ईनाम मिला है। जुलाई 2025 में मैनचेस्टर में टेस्ट डेब्यू करने के बाद अंशुल कम्बोज की भी टेस्ट टीम में वापसी हुई है।

वनडे सीरीज़ के पहले तीन मैचों में शुभमन गिल भारतीय टीम की कप्तानी करेंगे वहीं चौथे और पांचवें वनडे के लिए श्रेयस अय्यर को कप्तान बनाया गया है। आख़िरी दो वनडे के लिए झारखंड के विकेटकीपर बल्लेबाज़ कुमार कुशाग्र को भी टीम में जगह मिली है। यह पहला मौक़ा है जब कुशाग्र को सीनियर नेशनल टीम में शामिल किया गया है। इसके अलावा तिलक वर्मा, आक़िब नबी और यश ठाकुर को भी आख़िरी दो वनडे के लिए चुना गया है।

पहले तीन वनडे के लिए भारतीय टीम
शुभमन गिल (कप्तान), रोहित शर्मा, विराट कोहली, श्रेयस अय्यर (उपकप्तान), केएल राहुल (विकेटकीपर), नीतीश कुमार रेड्डी, अक्षर पटेल, नमन धीर, अंशुल कम्बोज, गुरनूर बराड़, ऋतुराज गायकवाड़, अर्शदीप सिंह, इशान किशन (विकेटकीपर), मोहम्मद सिराज, प्रसिद्ध कृष्णा और कुलदीप यादव।

चौथे और पांचवें वनडे के लिए भारतीय टीम
श्रेयस अय्यर (कप्तान), रोहित शर्मा, विराट कोहली, तिलक वर्मा, इशान किशन (विकेटकीपर और उपकप्तान), नीतीश कुमार रेड्डी, अक्षर पटेल, नमन धीर, आक़िब नबी, गुरनूर बराड़, ऋतुराज गायकवाड़, अर्शदीप सिंह, कुमार कुशाग्र (विकेटकीपर), मोहम्मद सिराज, यश ठाकुर और कुलदीप यादव।

प्रसिद्ध कृष्णा और ऋषभ पंत का चयन फ़िटनेस क्लीयरेंस पर निर्भर करेगा।

जिम्बाब्वे को 4 विकेटों से हराकर भारतीय महिलाओं ने पाई शुरुआती बढ़त

INDvsZIM भारत ने अनुभवी ऑलराउंडर दीप्ति शर्मा (49 रन) और पदार्पण करने वाली बल्लेबाज निकी प्रसाद (नाबाद 39) के बीच पांचवें विकेट के लिए 82 रन की साझेदारी की मदद से शुरूआती झटकों से उबरते हुए शुक्रवार को  पहले महिला टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में जिम्बाब्वे को चार विकेट से शिकस्त देकर तीन मैच की श्रृंखला में 1-0 से बढ़त बना ली।भारत और जिम्बाब्वे पहली बार द्विपक्षीय श्रृंखला में खेल रहे हैं। इस मुकाबले के साथ स्मृति मंधाना के कप्तानी कार्यकाल की भी शुरुआत हुई।

भारतीय टीम के लिए 115 रन का लक्ष्य इतना बड़ा नहीं था लेकिन 19 रन पर चार विकेट गंवाने के बाद टीम संघर्ष करती दिख रही थी।लेकिन अनुभवी ऑलराउंडर दीप्ति (37 गेंद, आठ चौके) और मध्यक्रम बल्लेबाज निकी (35 गेंद, छह चौके) ने मिलकर पांचवें विकेट के लिए 63 गेंद में 82 रन की भागीदारी कर भारत को जीत तक पहुंचाया। यह महिला टी20 अंतरराष्ट्रीय में पांचवें विकेट के लिए भारत की सबसे बड़ी साझेदारी है। इन दोनों ने मिताली राज और अनुजा पाटिल के बीच इस विकेट के लिए 77 रन की साझेदारी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा।

इस दौरान दीप्ति आउट हो गईं, पर भारत ने 4.2 ओवर रहते छह विकेट पर 116 रन बनाकर जीत दर्ज की।नयाशा ग्वानजुरा (तीन ओवर में 18 रन देकर तीन विकेट) ने अपने पहले ही ओवर में भारतीय कप्तान स्मृति मंधाना (09) और अनुष्का शर्मा (04) के विकेट लेकर भारत को दो झटके दे दिए।

जिम्बाब्वे का मंधाना के खिलाफ शुरुआत में ऑफ स्पिन गेंदबाजी कराने का फैसला सफल रहा। दूसरे ओवर की पहली गेंद हालांकि विकेट लेने वाली गेंद नहीं थी। मंधाना के पास इसे खेलने का समय था लेकिन वह पीछे हटकर पुल शॉट खेलने गईं और गेंद उनके बल्ले का ऊपरी किनारा लेकर हवा में उछल गई। बैकवर्ड स्क्वायर लेग पर खड़ी खिलाड़ी ने आसान कैच लपक लिया।

जिम्बाब्वे को शुरुआती सफलता मिली और भारत की नयी कप्तान सस्ते में आउट हो गईं।फिर दो गेंद बाद ग्वानजुरा ने भारत को दूसरा झटका दे दिया। अनुष्का ऑफ स्टंप के बाहर की जाती गेंद को ड्राइव करने गईं, लेकिन गेंद बल्ले का किनारा लेकर बैकवर्ड प्वाइंट की ओर चली गई, जहां क्षेत्ररक्षक ने आसान कैच लपक लिया। भारत का स्कोर दो विकेट पर 18 रन हो गया।

स्कोर में एक रन ही जुड़ा था कि पूर्व कप्तान हरमनप्रीत कौर भी सस्ते में आउट हो गईं। मिशेल मावुंगा की फुल लेंथ को हरमनप्रीत ने फ्लिक करने की कोशिश की, लेकिन यह सीधे शॉर्ट मिडविकेट पर खड़ी ग्वानज़ुरा के हाथों में चली गई। भारत का तीसरा विकेट गिर गया।

ग्वानजुरा ने इसके बाद उप-कप्तान शेफाली वर्मा को अपनी ही गेंद पर कैच लेकर भारत को चौथा झटका दिया।स्कोर चार विकेट पर 19 रन था और भारतीय टीम मुश्किल में दिख रही थी।पर दीप्ति जिम्मेदारी से खेलते हुए क्रीज पर टिकीं रहीं, हालांकि अपने अर्धशतक से एक रन पहले ओलिंडर चारे की गेंद पर आउट हो गईं। निकी डटीं रहीं और टीम को जीत दिलाई।

इससे पहले जिम्बाब्वे की सलामी बल्लेबाज केलिस एंडलोहवु ने 44 गेंद में 42 रन की आकर्षक पारी खेली, लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने मेहमान टीम को पांच विकेट पर 114 रन पर रोक दिया।एंडलोहवु की पारी जिम्बाब्वे की ओर से सबसे प्रभावशाली रही जबकि अन्य बल्लेबाजों को भारतीय गेंदबाजी आक्रमण के सामने संघर्ष करना पड़ा।

शारने मेयर्स ने अंतिम ओवरों में नाबाद 43 रन (33 गेंद में) बनाकर टीम के स्कोर को कुछ सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाया।एंडलोहवु ने बड़े मंच पर अपनी शॉट खेलने की क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने शॉर्ट गेंदों पर तेजी से कट और पुल शॉट लगाए। हालांकि 10 ओवर में जिम्बाब्वे का स्कोर एक विकेट पर 60 रन पहुंचने के बाद बाएं हाथ की इस सलामी बल्लेबाज की रन गति काफी धीमी हो गई। वह अपनी आखिरी 12 गेंदों पर केवल दो रन बना सकीं, जिसके बाद अरुंधति रेड्डी ने उन्हें बोल्ड कर दिया।

एंडलोहवु की सलामी जोड़ीदार बिलव्ड बिजा पहले ही ओवर में क्रांति गौड़ की सीधी गेंद को चूककर आउट हो गईं।इसके बाद एंडलोहवु और मॉडेस्टर मुपाचिकवा (26 गेंद में 16 रन) ने दूसरे विकेट के लिए 53 रन की साझेदारी की। इस दौरान ज्यादातर रन एंडलोहवु ने बनाए।

पर 11वें ओवर में स्पिनर श्री चरणी की गेंद पर मुपाचिकवा ने आसान कैच थमा दिया, जिससे जिम्बाब्वे का स्कोर दो विकेट पर 60 रन हो गया।जिम्बाब्वे की बल्लेबाजों ने काफी अधिक डॉट गेंदें खेलीं। भारत जैसी मजबूत टीम को चुनौती देने के लिए उन्हें अभी काफी सुधार करने की जरूरत है।मेयर्स ने पारी के अंतिम ओवरों में दो छक्के और चार चौके लगाकर टीम के स्कोर में उपयोगी रन जोड़े।

Lal Krishna Advani : लालकृष्ण आडवाणी अपोलो अस्पताल में भर्ती, सीने में संक्रमण की शिकायत के बाद कराया गया एडमिट

Lal Krishna Advani : लालकृष्ण आडवाणी अपोलो अस्पताल में भर्ती, सीने में संक्रमण की शिकायत के बाद कराया गया एडमिट

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भाजपा के सीनियर नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को शुक्रवार देर शाम दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। 98 वर्षीय आडवाणी को सीने में संक्रमण की शिकायत के बाद अस्पताल लाया गया। 

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हॉस्पिटल से जुड़े लोगों ने बताया कि उनकी हालत फिलहाल स्थिर है और डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी कर रही है। 

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अधिकारियों के अनुसार, आडवाणी को शाम करीब 7.30 बजे अस्पताल लाया गया था। उन्हें पल्मोनरी डिपार्टमेंट में भर्ती किया गया है, जहां फेफड़ों और सांस से जुड़ी समस्याओं का इलाज किया जाता है। अभी उनका इलाज चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब इस साल आडवाणी को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। इससे पहले मई में भी उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह कुछ दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद डिस्चार्ज हो गए थे।

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लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक करियर

लालकृष्ण आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक रहे हैं। देश की राजनीति में बीजेपी के उभार में उनकी अहम भूमिका रही है। उन्होंने तीन अलग-अलग अवधियों में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वह 1986 से 1990, 1993 से 1998 और 2004 से 2005 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार में आडवाणी ने 1998 से 2004 तक केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद 2002 से 2004 तक उन्होंने देश के उप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।

2024 में मिला भारत रत्न

लालकृष्ण आडवाणी को सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान के लिए वर्ष 2024 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। भारतीय राजनीति में उनका योगदान और बीजेपी के संगठनात्मक विस्तार में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

जसप्रीत बुमराह, आकाशदीप लौटे टेस्ट टीम में, न्यूजीलैंड के खिलाफ स्कॉड घोषित

Jasprit Bumrah

INDvsNZ न्यूजीलैंड के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की शृंखला के लिए भारतीय टीम में तेज गेंदबाज आकाश दीप और अंशुल कंबोज को शामिल किया गया है। चोट से उबरकर वापसी करने वाले आकाश दीप ने पिछली बार इंग्लैंड दौरे पर टेस्ट क्रिकेट खेला था, जहां उनका प्रदर्शन प्रभावशाली रहा था। वहीं, अंशुल कंबोज को इंग्लैंड में टेस्ट पदार्पण के बाद टीम से बाहर कर दिया गया था।

टेस्ट शृंखला 19 नवंबर से शुरू होगी। इससे पहले भारत और न्यूजीलैंड के बीच पांच वनडे मैचों की शृंखला खेली जाएगी, जिसका आगाज चार नवंबर से होगा।श्रीलंका दौरे से चोट के कारण बाहर रहने वाले जसप्रीत बुमराह को भी टेस्ट सीरीज में शामिल किया गया है।

भारत की टेस्ट टीम: शुभमन गिल (कप्तान), यशस्वी जायसवाल, केएल राहुल (उपकप्तान), देवदत्त पडिक्कल, ऋषभ पंत (विकेटकीपर, फिटनेस मंजूरी मिलने पर), ध्रुव जुरेल (विकेटकीपर), रविंद्र जडेजा, अंशुल कंबोज, जसप्रीत बुमराह, प्रसिद्ध कृष्णा (फिटनेस मंजूरी मिलने पर), आकाश दीप, साई सुदर्शन, नितीश कुमार रेड्डी, वॉशिंगटन सुंदर, कुलदीप यादव और मोहम्मद सिराज।

अनंत सिंह का चौंकाने वाला दावा, बोले- नीतीश कुमार का साथ देने पर मेरे 9 लोग मारे गए, बाद में दी सफाई

अनंत सिंह का चौंकाने वाला दावा, बोले- नीतीश कुमार का साथ देने पर मेरे 9 लोग मारे गए, बाद में दी सफाई

anant singh

बिहार की मोकामा विधानसभा सीट से विधायक और जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU के नेता अनंत सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अपने पुराने राजनीतिक संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने दावा किया कि नीतीश कुमार का साथ देने के दौरान उनके 9  लोग मारे गए थे। हालांकि बाद में अनंत सिंह ने स्पष्ट किया कि उनके बयान को गलत तरीके से समझा गया।

उनका कहना था कि वह नौ लोगों की हत्या करवाने का दावा नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने नौ साथियों की मौत का जिक्र कर रहे थे।

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नीतीश कुमार का साथ देने की कीमत चुकाने का दावा

 

इंटरव्यू में अनंत सिंह ने नीतीश कुमार के साथ अपने लंबे राजनीतिक जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने उनके समर्थन में काफी कुछ गंवाया। उन्होंने दावा किया कि उस दौर में नीतीश कुमार के साथ रहने और उनका साथ देने के कारण उन्हें अपने नौ साथियों को खोना पड़ा। अनंत सिंह के मुताबिक, यह उनके लिए व्यक्तिगत नुकसान था। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के साथ आने और लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ने के बाद उन्हें इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

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बाद में बयान पर दी सफाई

 

अनंत सिंह के बयान के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी बात का गलत अर्थ निकाला गया। उन्होंने कहा कि वह यह नहीं कह रहे थे कि उन्होंने नौ लोगों की हत्या करवाई, बल्कि उनका आशय उन नौ लोगों से था, जिनकी उस दौरान हत्या हुई थी और जिन्हें वह अपना करीबी मानते थे। इस सफाई के बाद उनके बयान का संदर्भ उनके राजनीतिक सफर के दौरान हुए व्यक्तिगत नुकसान से जुड़ा माना जा रहा है।

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गोली चलने और पिता की मौत का भी किया जिक्र

अनंत सिंह ने इंटरव्यू में दावा किया कि उस दौर में उन पर भी गोली चलाई गई थी। उन्होंने अपने पिता की मौत का भी जिक्र किया और बताया कि उनके पिता को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।

 

नीतीश कुमार से मुलाकात और चांदी के सिक्कों पर तौलने का जिक्र

अनंत सिंह के मुताबिक, नीतीश कुमार से मुलाकात के कुछ दिन बाद ही उनके नौ साथियों की हत्या हुई थी। उन्होंने बताया कि लालू प्रसाद यादव ने उन्हें नीतीश कुमार से मुलाकात करने से मना किया था, लेकिन इसके बावजूद वह उनसे मिलने गए। अनंत सिंह ने यह भी दावा किया कि मुलाकात के दौरान उन्होंने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौलवाया था।

 

उनके बयान और बाद में दी गई सफाई ने बिहार की राजनीति में उनके पुराने संबंधों और उस दौर की घटनाओं को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, नौ लोगों की हत्या से जुड़े उनके दावे और घटनाओं के विवरण की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

राज्य सरकार ओबीसी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

राज्य सरकार ओबीसी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से  शुक्रवार को ओबीसी महासभा के प्रतिनिधि मंडलों ने मुख्यमंत्री निवास स्थित समत्व भवन में भेंट की।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार ओबीसी हितों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। न्याय संगत और तार्किक व्यवस्था के लिए सभी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी उद्देश्य से ओबीसी आरक्षण के विषय पर सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई और ओबीसी के सभी संगठनों से वार्ता कर मजबूती के साथ माननीय न्यायालय में अपना पक्ष रखा गया था। राज्य सरकार इस विषय को टालने की दृष्टि से नहीं अपितु उसका समुचित हल निकालने के उद्देश्य से कार्य कर रही है। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण पर राज्य सरकार की नीति और नीयत स्पष्ट है। 

 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि ओबीसी आरक्षण के संबंध में सम्माननीय न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले का बिंदुवार अध्ययन कर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख राज्य सरकार की ओर से मजबूती से अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इस क्रम में आज शाम महाधिवक्ता कार्यालय मध्‍यप्रदेश द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी (स्पेशल लीव पिटीशन), स्टेट ऑफ एम.पी. वर्सेस आशिता दुबे एवं अन्य दायर कर दी गई है।

 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव को प्रतिनिधि मंडलों ने म.प्र. में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण पर उच्च न्यायालय के 9 अक्टूबर 2026 के निर्णय के संबंध में अद्यतन आंकड़ों के आधार पर संवैधानिक समाधान करने तथा ओबीसी अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के संबंध में ज्ञापन सौंपा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव से ओबीसी महासभा दिल्ली ने एडवोकेट श्री वैभव सिंह, इंजीनियर श्री महेंद्र सिंह लोधी के नेतृत्व में तथा ओबीसी महासभा ग्वालियर ने महासभा के संस्थापक श्री विजय कुमार, प्रदेश प्रभारी श्री जीतू लोधी और प्रदेशाध्यक्ष श्री गिरिराज धाकड़ के नेतृत्व में अपने-अपने पक्ष रखे।