नेपाल में कैसे आई इतनी भयानक बाढ़? वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

नेपाल में कैसे आई इतनी भयानक बाढ़? वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

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नेपाल में 26 अगस्त को भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ में 903 लोगों की मौत हो गई जबकि करीब 4200 लोग लापता है। इस मामले में वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह आपदा सामान्य से बेहद ज्यादा बारिश या बादल फटने के कारण नहीं आई थी। इसके पीछे ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बर्फ, चट्टानों और मलबे के अचानक खिसकने की घटना को जिम्मेदार माना गया है। ALSO READ: नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई

 

नेपाल पर्यावरण सोसायटी के अनुरोध पर तैयार की गई रिपोर्ट रविवार को सार्वजनिक की गई। वैज्ञानिकों के प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार, रसुवा जिले के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। यह मलबा ल्हेंदे नदी में पहुंचा और वहां से तेज बहाव भोटेकोशी होते हुए त्रिशूली नदी तक पहुंच गया। रास्ते में पानी अपने साथ भारी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और तलछट लेकर आगे बढ़ा।

 

इस अचानक आई बाढ़ ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। कई कस्बे और गांव प्रभावित हुए। अधिकारियों के अनुसार, आपदा में मरने वालों की संख्या सोमवार तक बढ़कर 903 हो गई है। राहत और बचाव अभियान के दौरान शवों की बरामदगी अब भी जारी है। ALSO READ: नेपाल में बाढ़ की तबाही के बाद भावुक हुईं मनीषा कोइराला, अंतरराष्ट्रीय समुदया से की बड़ी अपील

 

ग्लेशियल झील फटने का नहीं मिला सबूत

 

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनदीय झील के अचानक फटने से नहीं हुई। वैज्ञानिकों ने उपग्रह तस्वीरों, मौसम और जल विज्ञान से जुड़े आंकड़ों, भू-भाग की संरचना तथा नदी तंत्र में ऊंचाई और ढलान के बदलावों का अध्ययन किया। इस विश्लेषण में किसी ग्लेशियल झील के फटने के प्रमाण नहीं मिले।

 

शोधकर्ताओं के अनुसार, 26 अगस्त की सुबह करीब 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से में बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से शुरू हुआ यह मलबा तेज ढलान से गुजरते हुए लगभग 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में जा पहुंचा।

 

उपग्रह तस्वीरों में करीब 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बड़े भू-आकृतिक बदलाव दिखाई दिए हैं। इसके अलावा करीब 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर अलग होने के संकेत भी मिले हैं। ALSO READ: नेपाल में बाढ़ से सुरंगों में फंसे 900 से ज्‍यादा मजदूर, रेस्क्यू टीम चला रही अभियान, इस तरह पहुंचाई ऑक्सीजन
 

महज 7 मिनट में 22 किलोमीटर का सफर

रिपोर्ट में इस बाढ़ की रफ्तार को भी असाधारण बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक बर्फ, चट्टानों और मलबे का यह विशाल प्रवाह सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करके रसुवागढ़ी पहुंच गया।

 

इस दौरान इसकी औसत गति करीब 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी लगभग 167 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई। रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी गति घटकर करीब 73 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई। आगे बढ़ते हुए बहाव की गति करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई।

 

हालांकि रफ्तार कम होने के बाद भी बाढ़ का बहाव अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और तलछट लेकर आगे बढ़ता रहा। वैज्ञानिकों ने पाया कि बाढ़ आने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी में नदी का जलस्तर और बहाव घट गया था।

 

भारी बारिश को लेकर भी सवाल

अध्ययन के मुताबिक, रसुवागढ़ी में सुबह 5 बजे से 8 बजे के बीच पानी का औसत स्तर कम हुआ, जबकि स्याफ्रुबेसी में नदी का बहाव करीब सात बजे से घटने लगा था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घटना वाले दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण रूप से भारी बारिश होने के प्रमाण नहीं मिले। इससे यह संभावना कमजोर होती है कि पूरी आपदा केवल अत्यधिक बारिश या बादल फटने की वजह से हुई थी।

 

हालांकि वैज्ञानिकों ने अंतिम निष्कर्ष से पहले और जांच की जरूरत बताई है। विशेषज्ञ यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस घटना के पीछे सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया क्या थी, पिघलती बर्फ की कितनी भूमिका रही और क्या ऊपरी क्षेत्र में नदी का पानी कुछ समय के लिए कहीं रुका था।

 

जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान

विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के जलविद्युत क्षेत्र को भी बड़ा नुकसान पहुंचाया। अध्ययन में नेपाल विद्युत प्राधिकरण के शुरुआती आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुईं। इन परियोजनाओं के प्रभावित होने से करीब 431 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता फिलहाल व्यवस्था से बाहर हो गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस आपदा से हुए पर्यावरणीय, आर्थिक और बुनियादी ढांचे के नुकसान का पूरा आकलन आगे की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

जर्मनी ने स्पेन के खिलाफ सिर्फ एक गोल दागकर जीता हॉकी विश्वकप

जर्मनी की सबसे ज़रूरी समय पर अच्छा प्रदर्शन करने की प्रतिष्ठा रविवार को भी बनी रही, जब डिफेंडिंग चैंपियन ने बेल्जियम के वावरे में बेल्फ़ियस हॉकी एरिना में स्पेन को 1-0 से हराकर पुरुषों के हॉकी वर्ल्ड कप 2026 का खिताब बरकरार रखा।तीसरे क्वार्टर के आखिर में कड़े मुकाबले वाले फाइनल में मिशेल स्ट्रुथॉफ ने एकमात्र गोल किया, जिससे जर्मनी को स्पेन के कंट्रोल वाले मैच में अपने देश को चौथा पुरुषों का वर्ल्ड खिताब दिलाने का एकमात्र मौका मिला।

1998 के बाद अपने पहले वर्ल्ड कप फाइनल में खेल रहे स्पेन ने लंबे समय तक ज़्यादा पज़ेशन और मौके बनाए रखे, लेकिन जर्मन डिफेंस को भेदने में नाकाम रहे।रेड स्टिक्स ने आखिरी क्वार्टर में भी ज़ोर लगाना जारी रखा, यहां तक कि चार मिनट से भी कम समय बाकी रहते अपने गोलकीपर को भी चमत्कार की तलाश में हटा लिया, लेकिन जर्मनी ने मज़बूती से अपना टाइटल सफलतापूर्वक बचाया।

इससे पहले रविवार को, अर्जेंटीना ने नीदरलैंड्स को 2-1 से हराकर पुरुषों का ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। यह नतीजा अर्जेंटीना की महिलाओं के एम्सटलवीन में डच मेज़बानों को हराने के 24 घंटे से भी कम समय बाद आया, जहां लास लियोनास 1-1 से ड्रॉ के बाद एक नाटकीय शूटआउट में नीदरलैंड्स को 3-1 से हराकर महिला वर्ल्ड कप विजेता बनीं।

RBI Plastic Notes: कैसा होगा RBI का नया प्लास्टिक नोट? टेंडर रेस में उतरीं दुनिया की दिग्गज कंपनियां

RBI Polymer Banknotes Plan: भारत में कागजी नोटों की जगह जल्द ही टिकाऊ और मजबूत प्लास्टिक के नोट ले सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किए गए टेंडर के लिए दो विदेशी कंपनियों और एक भारतीय कंपनी ने अपनी बोलियां जमा कर दी हैं।

शुरुआती चरण में रिजर्व बैंक ₹10 और ₹20 के नोटों को पॉलीमर में छापने की योजना पर विचार कर रहा है। आइए जानते हैं कि इस प्रोजेक्ट की मुख्य शर्तें क्या हैं और कौन सी कंपनियां इसकी रेस में आगे चल रही हैं।

RBI की 2 सबसे सख्त शर्तें: चीन-पाकिस्तान से दूरी और नो-एनिमल फैट

BRBNMPL ने टेंडर में हिस्सा लेने वाली कंपनियों के सामने दो बेहद अहम और सख्त शर्तें रखी हैं:

चीन और पाकिस्तान से पूर्ण फायरवॉल: भारतीय मुद्रा की सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए सभी बोलीदाताओं को हलफनामा देना होगा कि वे भारत में अपने ऑपरेशन्स को चीन और पाकिस्तान में मौजूद अपनी किसी भी गतिविधि से पूरी तरह अलग रखेंगे।

जानवरों की चर्बी पर बैन: कंपनियों को प्रमाणित करना होगा कि सप्लाई की जाने वाली पॉलीमर शीट में जानवरों की चर्बी या उसका DNA शामिल नहीं होगा। ब्रिटेन जैसे देशों में पॉलीमर नोटों में एनिमल फैट का इस्तेमाल विवाद का कारण बना था, जिसके चलते RBI अब भारत के लिए इसे लेकर बेहद सतर्क है।

तुरंत चाहिए 68,000 रीम पॉलीमर शीट

रिपोर्ट के अनुसार, BRBNMPL को भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए ‘तत्काल’ 68,000 रीम पॉलीमर सबस्ट्रेट की आवश्यकता है। एक रीम में पॉलीमर फिल्म की 500 शीट्स होंगी। सभी कंपनियों को सैंपल्स जमा करने होंगे। इन सैंपल्स को भारत के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में टेस्ट किया जाएगा। इसके बाद सफल कंपनियों को ही अंतिम टेंडर में हिस्सा लेने दिया जाएगा।

रेस में कौन-कौन सी दिग्गज कंपनियां शामिल?

पॉलीमर नोटों के सबस्ट्रेट सप्लाई के लिए दुनिया की जानी-मानी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है:

कॉस्मो फर्स्ट और डी ला रू: भारत की सबसे बड़ी BOPP एक्सपोर्टर कॉस्मो फर्स्ट ने यूके (UK) स्थित दुनिया की सबसे बड़ी बैंक नोट सप्लायर कंपनी De La Rue को अपना तकनीकी पार्टनर बनाया है। डी ला रू सुरक्षा फीचर्स और पॉलीमर सबस्ट्रेट तकनीक मुहैया कराएगी।

CCL सिक्योर: ऑस्ट्रेलिया स्थित यह कंपनी दुनिया के 40 से अधिक केंद्रीय बैंकों को पॉलीमर नोट सोल्यूशन्स दे रही है। कंपनी का दावा है कि उसके पॉलीमर नोट पारंपरिक कॉटन (सूती) के नोटों की तुलना में 6 गुना ज्यादा टिकाऊ होते हैं।

Q&T हाई-टेक पॉलीमर: वियतनाम की इस कंपनी ने अपने देश में कॉटन करेंसी के मुकाबले 78% लागत की बचत का दावा किया है और अब इसने भी भारतीय टेंडर के लिए बोली लगाई है।

कागजी नोटों से कितने अलग होंगे प्लास्टिक के नोट?

लंबी उम्र और मजबूती: पॉलीमर नोट पानी, नमी और धूल-मिट्टी से खराब नहीं होते। इनकी लाइफ सामान्य कागजी नोटों के मुकाबले 6 गुना तक ज्यादा होती है।

नकली नोटों पर लगाम: इन नोटों में आधुनिक सिक्योरिटी फीचर्स और विंडो ट्रांसपेरेंसी जोड़ी जाती है, जिससे इनकी नकल बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

हाइजीनिक और साफ-सुथरे: कागजी नोटों की तुलना में पॉलीमर नोट साफ रहते हैं और इनसे कीटाणु फैलने का खतरा कम रहता है।

उत्तराखंड सरकार का बड़ा कदम: महिला स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा 5 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण

उत्तराखंड सरकार का बड़ा कदम: महिला स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा 5 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण

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उत्तराखंड की पुष्कर धामी सरकार महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से महिला स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपए तक का ब्याज मुक्त ऋण प्रदान कर रही है।

 

सीएम धामी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और उनके सपनों को नई उड़ान देने के लिए हमारी सरकार निरंतर प्रयासरत है। इसी दिशा में महिला स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपए तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। जिससे महिलाएं स्वरोजगार, लघु उद्योग एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाकर आत्मनिर्भर बन सकें। सशक्त और आत्मनिर्भर मातृशक्ति ही विकसित उत्तराखंड की मजबूत नींव है।

इस योजना की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

 

आर्थिक मजबूती: इस पहल का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की महिलाओं को स्वरोजगार, लघु उद्योग, और छोटे व्यवसायों को शुरू करने या बढ़ाने के लिए बिना किसी ब्याज के पूंजी उपलब्ध कराना है।

 

ब्याज का बोझ नहीं: ऋण राशि पर लगने वाला पूरा ब्याज राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा, जिससे महिलाओं को बैंक ऋण चुकाने में आसानी होगी।

 

स्वरोजगार को बढ़ावा: इसके जरिए महिलाएं पापड़, आचार, हस्तशिल्प, सिलाई-कढ़ाई, कृषि आधारित उद्योग और अन्य घरेलू उत्पाद से जुड़े व्यवसाय शुरू कर सकती हैं।

 

आवेदन प्रक्रिया: महिला स्वयं सहायता समूह अपने नजदीकी बैंक शाखा, ब्लॉक विकास कार्यालय (BDO), या ग्रामीण आजीविका मिशन (UKRLM) के माध्यम से इस योजना के लिए आवेदन कर सकते हैं।

नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई

नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई

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विवेक कुमार

नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में भीषण बाढ़ और ग्लेशियर धंसने की घटना के बाद भारत ने चीन और नेपाल से लगते अपने हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने का फैसला किया है। अधिकारियों ने शनिवार को कहा कि सीमावर्ती पर्वतीय इलाकों में मौजूद सभी ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों पर विशेष नजर रखी जाएगी। ALSO READ: भारत के विमानन क्षेत्र पर संकट के बादल

 

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार 26 अगस्त को तिब्बत-नेपाल सीमा पर आई विनाशकारी आपदा एक ग्लेशियर के ध्वस्त होने से पैदा हुई थी। इस घटना के बाद मलबे और पानी का विशाल प्रवाह नीचे की ओर आया, जिससे बड़े पैमाने पर तबाही हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस आपदा में 633 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि करीब 3,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

 

उत्तराखंड में बढ़ेगी निगरानी

भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा कि नेपाल के साथ साझा सीमा और समान भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार ने निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया है।

 

उन्होंने कहा, “चूंकि हमारी सीमा, नेपाल से लगती है और हमारी भौगोलिक स्थिति भी काफी हद तक समान है, इसलिए हमने अपने विभाग को क्षेत्र के सभी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं।”

 

मदन कौशिक ने कहा कि राज्य की टीमों को सतर्क रहने और संभावित खतरों पर लगातार नजर रखने को कहा गया है ताकि किसी भी उभरती हुई स्थिति की समय रहते पहचान की जा सके।

 

उत्तराखंड भारत के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में गिना जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 1,266 हिमनदीय झीलें मौजूद हैं। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति बेहद संवेदनशील है।

 

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय के ग्लेशियर, जो लगभग दो अरब लोगों को पानी उपलब्ध कराने वाली प्रमुख प्रणालियों का हिस्सा हैं, जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। इसके चलते पर्वतीय समुदायों के सामने अप्रत्याशित और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने और स्थायी रूप से जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से पर्वत ढलानों की स्थिरता कमजोर हो सकती है, जिससे भूस्खलन का जोखिम बढ़ जाता है। ALSO READ: नेपाल में तबाही के बीच फरक्का बैराज फिर क्यों है चर्चा में

 

क्यों आई नेपाल में बाढ़

इसी बीच वैज्ञानिक नेपाल-तिब्बत आपदा के संभावित कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। एएफपी से बातचीत में कई विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह की घटनाएं भविष्य में फिर हो सकती हैं। न्यूजीलैंड के जीएनएस साइंस शोध संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक साइमन कॉक्स ने कहा कि जब पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा गिर जाता है तो उसके आसपास के हिस्से भी अस्थिर हो सकते हैं। उनके अनुसार इससे उसी क्षेत्र में दोबारा ध्वंस की आशंका बनी रहती है।

 

यूएसजीएस का कहना है कि नेपाल तिब्बित सीमा पर ग्लेशियर ध्वंस इतना शक्तिशाली था कि उससे निकली ऊर्जा 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी और इसके कारण कई भूस्खलन भी हुए।

 

फ्रांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (सीएनआरएस) के ग्लेशियर विशेषज्ञ एतियां बेर्तिये ने कहा कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसी घटनाओं की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि उन्होंने कहा कि हिमालय में भूगर्भीय हालात इस तरह की घटनाओं को अधिक व्यापक बना देते हैं।

 

कार्डिफ विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय जोखिम विशेषज्ञ ट्रिस्ट्रम हेल्स ने कहा कि पिछले एक दशक में दुनियाभर में ऐसी घटनाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। उन्होंने हिमालय और स्विट्जरलैंड जैसे क्षेत्रों का उदाहरण दिया। ALSO READ: टैक्सियों को लेकर क्यों लड़ते रहते हैं भारत के दो राज्य

 

हालांकि वैज्ञानिकों ने इस विशेष आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने में सावधानी बरतने की सलाह भी दी है। एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र (आईसीआईएमओडी) ने कहा कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी ग्लेशियरों, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी कि इस विशेष घटना में उसकी क्या भूमिका रही।

 

विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और तथाकथित “एट्रिब्यूशन स्टडी” की जरूरत होगी, जिसके बाद ही जलवायु परिवर्तन और इस आपदा के बीच प्रत्यक्ष संबंध के बारे में ठोस निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।

उज्बेकिस्तान में पीएम मोदी ने छात्रों से बात की:स्टूडेंट्स ने हिंदी में सुनाया कविताएं; मोदी बोले- ये मेरे दिल की भावनाएं जैसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे के दौरान ताशकंद स्थित महात्मा गांधी सेंटर का दौरा किया। यहां उज्बेक छात्रों ने हिंदी में उनकी लिखी कविताओं की कुछ पंक्तियां सुनाईं। अपनी कविताएं छात्रों की आवाज में सुनकर मोदी भावुक हो गए और कहा कि हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं होने के बावजूद छात्रों ने कविताओं की भावनाओं को बिल्कुल उसी तरह व्यक्त किया, जैसी भावनाएं उनके दिल में थीं। इस दौरान मोदी ने उज्बेकिस्तान में भारत, महात्मा गांधी और तमिल संस्कृति को लेकर बढ़ती रुचि का जिक्र किया और तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने का सुझाव दिया। वहीं, उनकी यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्ते कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचे और 11 समझौतों का आदान-प्रदान हुआ। उज्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति का बढ़ा प्रभाव कार्यक्रम में एक उज्बेक इंडोलॉजिस्ट ने कहा कि शायद दुनिया में बहुत कम ऐसे देश होंगे जहां लोगों में भारत को लेकर इतना प्यार है। उन्होंने कहा कि उज्बेकिस्तान में लगभग हर नागरिक ‘नमस्ते’ शब्द से परिचित है। यह भी बताया कि उज्बेकिस्तान में भारतीय कला, नृत्य, संगीत, दर्शन और योग को लेकर भी लोगों की रुचि बढ़ रही है। तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में हो अनुवाद PM मोदी ने तमिल साहित्य और ‘तिरुक्कुरल’ का भी जिक्र किया। उन्होंने संस्थान की 80वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने की दिशा में काम किया जा सकता है। कार्यक्रम में मौजूद वक्ता ने जवाब दिया कि इसके लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। मोदी ने कहा कि तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद होने से भारतीय दर्शन और विचारों को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि दुनिया की प्राचीन भाषाओं में मौजूद दार्शनिक विचार यह बताते हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव सोच कितनी गहरी रही है। खबर अपडे़ट हो रही है…

उज्बेकिस्तान में मोदी ने छात्रों से बात की:स्टूडेंट्स ने पीएम की कविताओं को हिंदी में सुनाया; मोदी बोले- भावनाएं बिल्कुल मेरे दिल जैसी थीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे में ताशकंद के महात्मा गांधी सेंटर का दौरा किया। यहां उज्बेक छात्रों ने हिंदी में मोदी की लिखी कविताएं सुनाईं। अपनी कविताएं छात्रों से सुनकर मोदी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हिंदी छात्रों की मातृभाषा नहीं है, फिर भी उन्होंने कविताओं की भावनाओं को बिल्कुल वैसे ही समझकर पेश किया, जैसी भावनाएं उनके दिल में थीं। मोदी ने उज्बेकिस्तान में भारत, महात्मा गांधी और तमिल संस्कृति में बढ़ती रुचि का भी जिक्र किया। उन्होंने तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने का सुझाव दिया। मोदी की यात्रा के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्ते कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचे। दोनों देशों के बीच 11 समझौतों, एमओयू और सहमतियों का आदान-प्रदान भी हुआ। उज्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति का प्रभाव कार्यक्रम में भारत और भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने वाले एक उज्बेक इंडोलॉजिस्ट ने कहा कि शायद दुनिया में बहुत कम ऐसे देश होंगे, जहां लोगों में भारत को लेकर इतना प्यार है। उन्होंने बताया कि यहां लगभग हर नागरिक ‘नमस्ते’ शब्द से परिचित है। भारतीय कला, नृत्य, संगीत, दर्शन और योग में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है। तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में हो अनुवाद PM मोदी ने तमिल साहित्य और ‘तिरुक्कुरल’ का भी जिक्र किया। उन्होंने संस्थान की 80वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने की दिशा में काम किया जा सकता है। मोदी ने कहा भारतीय दर्शन और विचारों को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की प्राचीन भाषाओं में मौजूद दार्शनिक विचार यह बताते हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव सोच कितनी गहरी रही है। क्या है तिरुक्कुरल? तिरुक्कुरल, जिसे ‘कुरल’ भी कहा जाता है, तमिल साहित्य की एक प्रसिद्ध रचना है। इसमें नैतिकता, अच्छे आचरण और जीवन से जुड़ी व्यावहारिक सीख दी गई है। इसे कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर ने लिखा था। माना जाता है कि इसकी रचना दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुई। यह रचना धर्म या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है और इसे पूरी मानवता के लिए उपयोगी विचारों के लिए जाना जाता है। भारत-उज्बेकिस्तान रिश्तों को मिली नई मजबूती PM मोदी की 29 से 30 अगस्त तक की दो दिवसीय उज्बेकिस्तान यात्रा से दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिली है। भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ से बढ़ाकर ‘कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ कर दिया है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 11 समझौतों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत और व्यापक बनाना है। PM मोदी की यह यात्रा उज्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के निमंत्रण पर हुई। ————– यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की पहली रक्षा बैठक आज:इस्तांबुल में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री मिलेंगे; सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत पहली बैठक सोमवार को इस्तांबुल में होगी। बैठक में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री के साथ सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे। पूरी खबर पढ़ें…

LIVE: नेपाल हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर 903, 4000 से ज्यादा लापता

LIVE: नेपाल हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर 903, 4000 से ज्यादा लापता

Nepal flood and landslide

Latest News Today Live Updates in Hindi : नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन में मृतकों की संख्या बढ़कर 903 हुई। 4 हजार से ज्यादा लोग अभी भी लापता। पल पल की जानकारी…

उत्तर प्रदेश के शामली में सोमवार तड़के पुलिस और बदमाशों के बीच हुई मुठभेड़ में दो बदमाश मारे गए। पुलिस के मुताबिक, दोनों बदमाश अंकित बालियान हत्याकांड में शामिल शूटर थे और उनकी गिरफ्तारी पर 50-50 हजार रुपए का इनाम घोषित था। ALSO READ: शामली में पुलिस मुठभेड़, अंकित बालियान हत्याकांड के दो शूटर ढेरअमेरिका और ईरान में फिर तेज हुई जंग। अमेरिका ने खर्ग द्वीप और लरक द्वीप पर किया हमला। ईरान ने भी जॉर्डन में अमेरिकी बेस को निशाना बनाया। ALSO READ: Trump का खर्ग द्वीप पर बड़ा दावा, कहा- 'पूरी तरह तबाह'; होर्मुज जलडमरूमध्य के पास फिर आमने-सामने अमेरिका-ईराननेपाल की बाढ़ में अब तक 903 मौतें हुईं, 4000 से ज्यादा लोग लापता हैं। इसमें सबसे ज्यादा पॉवर प्रोजेक्ट के कार्यों में लगे 933 लोग लापता हैं।

दिल्ली से नोएडा एयरपोर्ट अब सिर्फ 60-70 मिनट दूर! ₹4,000 करोड़ का 50 KM एलिवेटेड एक्सप्रेसवे मंजूर, जानिए पूरा प्लान

Delhi to Jewar Airport: राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश के जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बीच कनेक्टिविटी को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। नोएडा अथॉरिटी ने दिल्ली को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से जोड़ने वाले करीब 50 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड एक्सप्रेसवे के एलाइनमेंट को फाइनल मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद दिल्ली से जेवर एयरपोर्ट तक का सफर काफी तेज और आसान होने की उम्मीद है।

News24 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मेगा प्रोजेक्ट पर करीब 4,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका उद्देश्य दिल्ली, नोएडा और जेवर एयरपोर्ट के बीच सड़क संपर्क को मजबूत करना और मौजूदा सड़कों पर बढ़ते ट्रैफिक के दबाव को कम करना है।

अक्षरधाम से सीधे जेवर एयरपोर्ट तक बनेगा कॉरिडोर

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित एलिवेटेड एक्सप्रेसवे अक्षरधाम मंदिर के आसपास से शुरू होकर सीधे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर तक जाएगा। इसकी कुल लंबाई करीब 50 किलोमीटर होगी, जिसमें लगभग 27 किलोमीटर हिस्सा नोएडा क्षेत्र में आएगा।

एक्सप्रेसवे का मुख्य हिस्सा छह लेन का होगा। वहीं, जहां से वाहन एक्सप्रेसवे पर प्रवेश करेंगे, वहां संभावित जाम और ट्रैफिक बॉटलनेक को रोकने के लिए सड़क को आठ लेन तक चौड़ा किया जाएगा।इस परियोजना के निर्माण और आगे लंबे समय तक रखरखाव की जिम्मेदारी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के पास होगी। फिलहाल, यह प्रोजेक्ट डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) के चरण में है।

पहले यमुना के किनारे था रूट, फिर 5 मीटर बदला गया

इस एक्सप्रेसवे के एलाइनमेंट में एक अहम बदलाव भी किया गया है। शुरुआती योजना के तहत सड़क को यमुना नदी के तटबंध के बिल्कुल साथ बनाने का प्रस्ताव था। हालांकि, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने इस एलाइनमेंट को लेकर बाढ़ के खतरे और निर्माण की संरचनात्मक सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं जताईं। इसके बाद अधिकारियों ने प्रस्तावित मार्ग को करीब 5 मीटर नोएडा की तरफ खिसका दिया। एलाइनमेंट में इस बदलाव के बाद संशोधित योजना को अंतिम मंजूरी मिल गई है।

सेक्टर-94 से मिलेगा प्रमुख कनेक्शन

नोएडा के सेक्टर-94 से करीब 120 मीटर चौड़ी सड़क इस एलिवेटेड एक्सप्रेसवे के लिए प्रमुख पहुंच मार्ग के रूप में काम करेगी। निर्माण से पहले प्रस्तावित रूट पर मिट्टी की जांच भी की जाएगी। NHAI यह पता लगाएगा कि जमीन कितने भार को सुरक्षित रूप से सहन कर सकती है। इसके आधार पर आगे निर्माण से जुड़ी तकनीकी योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा।

दिल्ली से जेवर एयरपोर्ट का सफर 60-70 मिनट में होगा पूरा!

सबसे बड़ा फायदा यात्रा समय में कमी के रूप में देखने को मिल सकता है। परियोजना के चालू होने के बाद दिल्ली से जेवर एयरपोर्ट तक का सफर करीब 60 से 70 मिनट में पूरा होने की उम्मीद है। इसका फायदा पूर्वी दिल्ली और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों को खास तौर पर मिलेगा। मयूर विहार, पटपड़गंज, आईपी एक्सटेंशन, कालिंदी कुंज और सरिता विहार जैसे इलाकों से जेवर एयरपोर्ट पहुंचना पहले की तुलना में आसान हो सकता है। इसके अलावा यह कॉरिडोर मंझावली पुल के जरिए फरीदाबाद से भी जुड़ सकेगा। इससे दिल्ली-NCR के कई प्रमुख इलाकों के बीच एयरपोर्ट कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

NCR के कई बड़े एक्सप्रेसवे से जुड़ेगा

50 किलोमीटर का यह एलिवेटेड कॉरिडोर अकेले एक सड़क परियोजना नहीं होगा, बल्कि इसे NCR के व्यापक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का हिस्सा माना जा रहा है। इसके जरिए दिल्ली, नोएडा, फरीदाबाद और जेवर एयरपोर्ट के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है। मौजूदा सड़क नेटवर्क पर एयरपोर्ट जाने वाले यात्रियों का दबाव बढ़ने के साथ यह नया मार्ग भविष्य में ट्रैफिक को अलग-अलग रूट पर बांटने में भी मदद कर सकता है।

गाजियाबाद से जेवर तक रैपिड रेल-मेट्रो भी चलेगी

जेवर एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए केवल सड़क नेटवर्क पर ही काम नहीं हो रहा है। नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC) ने गाजियाबाद से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट तक एक नए 72.44 किलोमीटर लंबे ट्रांजिट कॉरिडोर की योजना भी सामने रखी है। इसमें दो तरह की सेवाएं एक ही कॉरिडोर पर प्रस्तावित हैं। यात्रियों के लिए 11 नमो भारत स्टेशन होंगे, जो तेज क्षेत्रीय यात्रा में मदद करेंगे।

इसके अलावा स्थानीय यात्रियों के लिए 18 मेट्रो स्टेशन प्रस्तावित हैं। यह कॉरिडोर गाजियाबाद के दिल्ली-मेरठ नमो भारत स्टेशन से जेवर एयरपोर्ट तक जाएगा। NCRTC के मुताबिक, इसका करीब 71.5 किलोमीटर हिस्सा एलिवेटेड होगा, जबकि लगभग 1.29 किलोमीटर हिस्सा भूमिगत होगा।

एयरपोर्ट के लिए बदल रहा पूरा कनेक्टिविटी नेटवर्क

कुल मिलाकर जेवर एयरपोर्ट के आसपास सड़क और सार्वजनिक परिवहन दोनों स्तरों पर कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में बड़े प्रोजेक्ट सामने आ रहे हैं। अक्षरधाम से जेवर तक प्रस्तावित 50 किलोमीटर का एलिवेटेड एक्सप्रेसवे और गाजियाबाद-जेवर नमो भारत-मेट्रो कॉरिडोर के पूरा होने पर NCR के अलग-अलग हिस्सों से एयरपोर्ट पहुंचना पहले के मुकाबले काफी आसान हो सकता है। हालांकि, एलिवेटेड एक्सप्रेसवे अभी DPR चरण में है, इसलिए निर्माण शुरू होने और इसके पूरी तरह चालू होने की समयसीमा आगे की परियोजना मंजूरियों और निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

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