RAC-वेटिंग यात्रियों के लिए बड़ी खबर! खाली बर्थ अब खुद होगी अलॉट, TTE के चक्कर खत्म

ट्रेन में खाली बर्थ अब खुद मिलेगी RAC-वेटिंग पैसेंजर्स को, रेलवे ला रहा डिजिटल सिस्टम

ट्रेन में सफर के दौरान खाली होने वाली बर्थ को लेकर रेलवे एक नई डिजिटल व्यवस्था शुरू करने जा रहा है। इससे किसी पैसेंजर के ट्रेन में नहीं चढ़ने पर उसकी खाली बर्थ की जानकारी सिस्टम तक तुरंत पहुंच जाएगी और नियम के अनुसार उसे RAC या वेटिंग लिस्ट वाले पैसेंजर को अलॉट किया जा सकेगा। इससे सीट मिलने की प्रोसेस पहले से ज्यादा आसान और साफ होने की उम्मीद है।

अब मोबाइल बता देगा कहां है खाली बर्थ!

नए सिस्टम के बाद पैसेंजर्स को ट्रेन में खाली हुई बर्थ के बारे में पता करने के लिए TTE को ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रेलवे के सिस्टम में खाली बर्थ की जानकारी रियल टाइम में अपडेट होगी। पैसेंजर्स रेल मदद या IRCTC ऐप के जरिए यह देख सकेंगे कि सफर के दौरान किस स्टेशन से किस कोच में कितनी सीटें खाली हुई हैं। इसके बाद RAC और वेटिंग लिस्ट वाले पैसेंजर्स को तय नियम और क्रम के अनुसार बर्थ अलॉट की जा सकेगी। बर्थ मिलने की जानकारी पैसेंजर के मोबाइल पर भी भेजी जा सकेगी।

पहला ट्रायल होगा नई मुंबई से

रेलवे इस नई तकनीक को पहले मुंबई सेंट्रल डिवीजन की कुछ चुनिंदा ट्रेनों में आजमाने की तैयारी कर रहा है। योजना के मुताबिक दिसंबर 2026 तक कुछ TTE को स्मार्ट जैकेट, GPS और कैमरे देकर इसका ट्रायल किया जाएगा। इसके नतीजे देखने के बाद अप्रैल 2027 से इस तकनीक को देश के सभी 17 रेलवे जोनों में चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है। अगर TTE खाली बर्थ को सिस्टम में अपडेट नहीं करते या चेकिंग के लिए मौजूद नहीं होते हैं, तो पैसेंजर रेल मदद ऐप या 139 पर शिकायत भी दर्ज करा सकेंगे।

HHT से तुरंत अपडेट होगा डेटा

  • 4G कनेक्टिविटी और GPS ट्रैकिंग: डिवाइस में 4G की सुविधा होगी, जिससे डेटा रियल टाइम में सर्वर तक भेजा जा सकेगा। करीब 5 मीटर तक की सटीकता के साथ TTE की लोकेशन ट्रैक की जा सकेगी।
  • बायोमेट्रिक स्कैनर: फिंगरप्रिंट स्कैनर के जरिए TTE की डिजिटल उपस्थिति दर्ज होगी।
  • 12 घंटे का बैटरी बैकअप: लंबे सफर के दौरान डिवाइस को लगातार इस्तेमाल किया जा सकेगा।
  • मजबूत डिजाइन: HHT को वाटरप्रूफ और डस्टप्रूफ बनाया जा रहा है, ताकि सफर के दौरान इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सके।

स्मार्ट जैकेट से TTE की सुरक्षा होगी मजबूत

  • GPS डिवाइस और HD बॉडी कैमरा: जैकेट में GPS लगा होगा, जिससे ड्यूटी के दौरान TTE की लोकेशन ट्रैक की जा सकेगी। जैकेट में HD कैमरा लगाया जाएगा, जिससे ड्यूटी के दौरान होने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जा सकेगा।
  • SOS बटन: किसी इमरजेंसी में TTE एक बटन दबाकर तुरंत मदद के लिए अलर्ट भेज सकेंगे। ट्रेन में किसी पैसेंजर की तबीयत अचानक बिगड़ने पर TTE SOS दबाकर मदद मांग सकेंगे। SOS दबाते ही नजदीकी कंट्रोल रूम और अगले स्टेशन के स्टेशन मास्टर तक इमरजेंसी की जानकारी पहुंचाई जा सकेगी।

रेलवे का अनुमान है कि पूरी व्यवस्था लागू होने के बाद टिकट जांच की प्रक्रिया ज्यादा प्रभावी हो सकती है और खाली बर्थ के गलत इस्तेमाल से जुड़ी शिकायतों में भी कमी आ सकती है। इसके अलावा, अगर TTE चेकिंग के लिए उपलब्ध नहीं होते या खाली बर्थ को सिस्टम में अपडेट नहीं करते, तो यात्री रेल मदद ऐप या 139 पर शिकायत दर्ज करा सकेंगे।

विजय केडिया कैसे चुनते हैं 10x रिटर्न देने वाले शेयर? जानिए उनकी सुपरहिट ‘R.I.S.E.’ स्ट्रेटेजी

Vijay Kedia Multibagger Strategy: शेयर बाजार के दिग्गज निवेशक और ‘सुपरस्टार इनवेस्टर’ विजय केडिया ने दलाल स्ट्रीट पर मल्टीबैगर शेयर ढूंढने का अपना सीक्रेट फॉर्मूला शेयर किया है। बाजार की भीड़ किसी शेयर के पीछे भागे, उससे पहले 10x या उससे ज्यादा रिटर्न देने वाले स्टॉक्स की पहचान करने के लिए वे एक खास ‘R.I.S.E.’ रणनीति का इस्तेमाल करते हैं।

विजय केडिया का मानना है कि मल्टीबैगर रिटर्न पाने का असली जरिया अगले 15-20 सालों के लंबे समय वाले मेगा-थीम्स पर सही समय पर दांव लगाना है। जानिए विजय केडिया की यह R.I.S.E. स्ट्रेटेजी क्या है और वे शेयर चुनते समय किस ‘गोल्डन रूल’ को फॉलो करते हैं।

क्या है विजय केडिया का ‘R.I.S.E.’ फॉर्मूला?

केडिया के अनुसार, निवेशकों को ऐसे सेक्टर्स और कंपनियों की तलाश करनी चाहिए जिनमें अगले एक-दो दशक तक लगातार ग्रोथ की क्षमता हो। R.I.S.E. का हर अक्षर एक बड़े और भविष्य के मेगा-थीम को दर्शाता है:

1. R – Renewable Energy & Energy Transition (अक्षय ऊर्जा और एनर्जी ट्रांजिशन)

दुनिया तेजी से पारंपरिक ईंधन से ग्रीन एनर्जी की तरफ शिफ्ट हो रही है। इसमें विंड एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, न्यूक्लियर पावर और बैटरी टेक्नोलॉजी/एनर्जी स्टोरेज आते है। विजय केडिया का मानना है कि इस थीम के पास अगले 15 से 20 साल का लंबा रनवे है, जहां कंपनियों के लिए ग्रोथ की अपार संभावनाएं हैं।

2. I – Infrastructure (इंफ्रास्ट्रक्चर और केपेक्स)

देश में बुनियादी ढांचे का विकास और कंपनियों द्वारा किया जाने वाला बड़ा पूंजीगत खर्च। टर्नअराउंड कंपनियां, जो अपने बुरे दौर से निकलकर नए केपेक्स के दम पर मजबूत वापसी कर रही हैं। भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश में इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग ही देश की आर्थिक वृद्धि की रीढ़ बनते हैं।

3. S – Security (साइबर सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र)

साइबर थ्रेट्स के बढ़ते दौर में डिजिटल और राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है। साइबर सिक्योरिटी कंपनियां और डिफेंस यानी रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियां। वैश्विक तनावों और डिजिटलाइजेशन के चलते सरकारों और कॉरपोरेट्स का सिक्योरिटी बजट हर साल तेजी से बढ़ रहा है।

4. E – Emerging Tech (उभरती हुई टेक्नोलॉजी)

आने वाला दौर पूरी तरह नई तकनीकों के नियंत्रण में होगा। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर्स। ये ऐसे सेक्टर्स हैं जो पुराने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह से बदलकर रख रहे हैं। जो कंपनियां इनमें शुरुआती बढ़त बनाएंगी, वे भविष्य की दिग्गज बनेंगी।

अब जानिए विजय केडिया का ‘गोल्डन रूल’

अक्सर रिटेल निवेशक किसी अच्छे सेक्टर की कंपनी को किसी भी कीमत पर खरीद लेते हैं। इस पर चेतावनी देते हुए विजय केडिया ने एक महत्वपूर्ण गोल्डन रूल दिया है:

‘Buying a good sector at ANY price is a recipe for bad returns.’ यानी किसी भी अच्छे सेक्टर के शेयर को किसी भी भाव पर खरीद लेना खराब रिटर्न की गारंटी है।विजय केडिया के अनुसार शेयर चुनते समय हमेशा इस 3-स्टेप हायरार्की को फॉलो करना चाहिए:

1. सही सेक्टर की पहचान

2. कंपनी की गुणवत्ता और बैलेंस शीट

3. सही वैल्यूएशन और अनुशासन

इसका मतलब साफ है कि अगर सेक्टर बहुत शानदार है, लेकिन कंपनी पर भारी कर्ज है या उसकी बैलेंस शीट खराब है, तो वह मल्टीबैगर नहीं बनेगी। और अगर सेक्टर व कंपनी दोनों अच्छे हैं, लेकिन आपने शेयर बहुत महंगे वैल्यूएशन पर खरीद लिया है, तो भी आपको बाजार में अच्छा रिटर्न नहीं मिलेगा।

रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए टेकअवे

विजय केडिया का यह R.I.S.E. फॉर्मूला रिटेल निवेशकों को किसी भी फैंसी या ट्रेंडिंग शेयर में बिना सोचे-समझे पैसा लगाने से रोकता है। शेयर बाजार में लंबी अवधि में बड़ा पैसा बनाने के लिए सेक्टर की ग्रोथ के साथ-साथ कंपनी के फंडामेंटल्स और सही एंट्री प्राइस का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है। 

अमेरिका में AI को लेकर तीन खेमे:मस्क को सभ्यता मिटने का डर, ट्रम्प को चीन से पिछड़ने की चिंता, तीसरा पक्ष इंसानी कंट्रोल चाहता

अमेरिका में AI के विकास की रफ्तार को लेकर बहस तेज है। इसे लेकर तीन अलग-अलग खेमे बन गए हैं। इलॉन मस्क समेत कुछ टेक दिग्गजों को डर है कि AI अगर इंसानों के कंट्रोल से बाहर हुआ तो पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है। वे इसे परमाणु हथियार से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प AI की रफ्तार धीमी करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका जोर अमेरिका को AI की दौड़ में चीन से आगे रखने पर है। उनका मानना है कि ज्यादा रोक-टोक से अमेरिका पीछे रह सकता है। तीसरा खेमा AI को लेकर बीच का रास्ता चाहता है। वह इसकी रफ्तार रोकने के बजाय सुरक्षा नियम और इंसानी निगरानी बनाए रखने के पक्ष में है। नेताओं से लेकर टेक दिग्गजों तक अलग-अलग राय AI को लेकर अमेरिका में छिड़ी यह बहस अब टेक कंपनियों से निकलकर राजनीति के केंद्र में पहुंच गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों तरफ के कुछ नेता AI को लेकर चिंता जता रहे हैं। आम तौर पर एक-दूसरे से अलग रहने वाले इन दोनों खेमों में बहुत कम मुद्दों पर सहमति दिखती है। लेकिन AI की यह बहस सिर्फ राजनीति या टेक कंपनियों तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में इसके फैसले हमारी नौकरी, पढ़ाई, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, यह भी तय होगा कि AI के इस्तेमाल को लेकर नियम कैसे बनाए जाएंगे। AI का विकास धीमा करने के पक्ष में… डारियो अमोडेई AI कंपनी एंथ्रोपिक के को-फाउंडर और CEO हैं। उन्होंने 2021 में OpenAI छोड़कर एंथ्रोपिक शुरू की थी। कंपनी ने खुद को AI की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने वाली कंपनी के तौर पर पेश किया है। अमोडेई कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि भविष्य की AI बेहद खतरनाक हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने जैसे खतरनाक कामों में हो सकता है। वे लंबे समय से AI पर सरकारी नियम बनाने की मांग करते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने 3,800 शब्दों का एक लेख लिखकर दुनियाभर में AI के विकास की रफ्तार धीमी करने का प्रस्ताव रखा है। रुख बदलने वाले… सैम ऑल्टमैन OpenAI के को-फाउंडर और CEO हैं। 2023 में उन्होंने AI से इंसानों के खत्म होने के खतरे की चेतावनी वाले बयान पर हस्ताक्षर किए थे। इसी साल उन्होंने अमेरिकी सीनेट में ताकतवर AI मॉडल पर नियम बनाने का समर्थन भी किया। बाद में उनका रुख कुछ नरम पड़ा। 2025 के बीच तक ऑल्टमैन का कहना था कि AI में बड़े बदलाव धीरे-धीरे होंगे और उन्हें संभालना संभव है। फिर जुलाई 2026 में OpenAI ने बताया कि उसके दो AI मॉडल टेस्टिंग के दौरान बिना इंसानी मदद के सिस्टम से बाहर निकल गए। उन्होंने चोरी की लॉगिन डिटेल्स और सिक्योरिटी खामी का इस्तेमाल कर Hugging Face के सर्वर तक पहुंच बनाई। इस घटना के बाद ऑल्टमैन ने कहा कि अब AI के विकास की रफ्तार धीमी करने का समय आ गया है। उन्होंने अमोडेई की इस मांग का भी समर्थन किया कि AI मॉडल का विकास कुछ धीमा किया जाना चाहिए। इलॉन मस्क लंबे समय से AI के खतरों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं। उनका अनुमान है कि AI के इंसानों के लिए खतरनाक साबित होने की संभावना 10 से 20% तक है। उन्होंने AI को परमाणु हथियारों से भी ज्यादा खतरनाक बताया है और समय रहते इसके लिए नियम बनाने की मांग की है। मस्क ने खुद AI कंपनी xAI शुरू की है और ट्रम्प के चुनाव अभियान में बड़ी रकम दी थी। ट्रम्प प्रशासन में वह कुछ समय तक सरकारी नियमों में बदलाव से जुड़े काम से भी जुड़े रहे। इसके बावजूद शनिवार को उन्होंने अमोडेई की AI विकास धीमा करने की मांग का समर्थन किया। सोशल मीडिया पर मस्क ने लिखा, “डारियो सही हैं।” AI पर बीच का रास्ता चाहते हैं… सत्या नडेला माइक्रोसॉफ्ट के चेयरमैन और CEO हैं। AI की दौड़ में माइक्रोसॉफ्ट OpenAI के साथ बड़ी साझेदारी कर चुका है और अब अपने AI टूल्स पर भी तेजी से काम कर रहा है। हालांकि, नडेला AI को बिना रोक-टोक आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि इसका विकास सोच-समझकर और इंसानी निगरानी में होना चाहिए। उनका तर्क है कि ऐसी सुपरइंटेलिजेंस का कोई फायदा नहीं, जो इंसानों के कंट्रोल से बाहर हो या लोगों के काम न आए। इसके साथ ही नडेला AI के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और खुले AI सिस्टम को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। सुंदर पिचाई अल्फाबेट और गूगल के CEO हैं। वह AI के खतरों को मानते हैं, लेकिन इसके लिए बहुत कड़े नियमों के पक्ष में नहीं हैं। पिचाई का कहना है कि AI के इस्तेमाल के हिसाब से अलग-अलग नियम बनाए जाने चाहिए। उनके मुताबिक, AI के जोखिम से निपटना जरूरी है, लेकिन इसके फायदों से पीछे रह जाना भी बड़ा खतरा हो सकता है। मार्क जुकरबर्ग मेटा के चेयरमैन और CEO हैं। उनका मानना है कि AI अगर कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित रहा तो यह ज्यादा बड़ा खतरा हो सकता है। इसके बजाय वह AI को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने को सुरक्षा का एक तरीका मानते हैं। जुकरबर्ग ने चेतावनी दी है कि अमेरिका में AI मॉडल बनाने और जारी करने की रफ्तार धीमी हुई तो इसका फायदा चीन को मिल सकता है। हालांकि, वह AI की सुरक्षा को लेकर चिंताओं को भी मानते हैं। इसी वजह से मेटा भविष्य में अपने सबसे शक्तिशाली AI मॉडल सभी के लिए खुले तौर पर जारी न करने का फैसला कर सकती है। एलेक्जेंडर वेंग 2025 में मेटा से जुड़े और कंपनी में AI से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी संभाली। वह मेटा के AI असिस्टेंट एजेंट ‘म्यूस’ के विकास से भी जुड़े हैं। वेंग ने एक स्ट्रैटिजी पेपर में सुपरइंटेलिजेंस को परमाणु बम के बाद सबसे खतरनाक चीज बताया। उनका कहना है कि अमेरिका को AI को सिर्फ टेक्नोलॉजी के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और दूसरे देशों को रोकने की रणनीति के नजरिए से भी देखना चाहिए। AI का विकास तेजी से जारी रखने के पक्ष में जेनसन हुआंग एनवीडिया के को-फाउंडर और CEO हैं। एनवीडिया के चिप्स का इस्तेमाल AI बनाने वाली ज्यादातर बड़ी कंपनियां करती हैं। हुआंग AI के तेज विकास के प्रमुख समर्थकों में हैं। उनका कहना है कि कंपनियों को सरकार से AI पर ज्यादा नियम बनाने की मांग नहीं करनी चाहिए। AI से नौकरियां जाने और अमेरिकी चिप्स दूसरे देशों को बेचने जैसे मुद्दों पर उनका एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई से सार्वजनिक मतभेद भी रहा है। डेविड सैक्स टेक निवेशक हैं। ट्रम्प प्रशासन में वह AI और क्रिप्टो से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वह AI के डर के आधार पर सख्त नियम बनाने के खिलाफ हैं। सैक्स अमेरिकी राज्यों के अलग-अलग AI कानून बनाने का भी विरोध करते हैं। इसके बजाय वह कम सरकारी दखल वाली नीति चाहते हैं। उनका कहना है कि AI कंपनियां तेजी से नई तकनीक विकसित कर रही हैं, इसलिए उनकी रफ्तार रोकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अमेरिकी राजनीति में भी AI को लेकर दो राय नियम बनाने के पक्ष में… बर्नी सैंडर्स निर्दलीय अमेरिकी सीनेटर हैं। AI के तेज विकास के आलोचक रहे हैं। उनका कहना है कि AI से बड़ी कंपनियों की ताकत बढ़ सकती है और इसका असर कामगारों पर पड़ सकता है। सैंडर्स ने नए AI डेटा सेंटर बनाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव दिया है। साथ ही, बड़ी AI कंपनियों पर 50% टैक्स लगाने और उससे सार्वजनिक फंड बनाने की बात कही है। उन्होंने सुपरइंटेलिजेंस पर स्थायी रोक लगाने का भी प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा, उनका प्रस्ताव है कि तब तक AI के एडवांस विकास पर रोक रहे, जब तक ऐसे सिस्टम को लेकर सुरक्षा इंतजाम तय नहीं हो जाते। नियमों के विरोध में… माइक जॉनसन अमेरिकी स्पीकर मानते हैं कि AI के खतरे बढ़ रहे हैं, लेकिन वह जल्दबाजी में नियम बनाने के पक्ष में नहीं हैं। वे कहते हैं कि जल्दबाजी में ऐसे नियम नहीं बनाने चाहिए जिनसे चीन को फायदा मिल सकता है। जॉनसन ने AI के कारण इंसानों के खत्म हो जाने की आशंकाओं को खारिज किया है। डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि AI के मामले में अमेरिका चीन से आगे रहे। उन्होंने AI में अमेरिका की बढ़त बनाए रखना अपनी प्राथमिकता बनाई है। इसके लिए वह AI को तेजी से आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। इसमें AI डेटा सेंटर के लिए ज्यादा बिजली की व्यवस्था करना और ऐसे AI मॉडल को बढ़ावा देना शामिल है, जिनका इस्तेमाल ज्यादा लोग कर सकें। एनवीडिया के CEO जेनसन हुआंग के साथ एक कॉन्फ्रेंस में ट्रम्प ने यह भी कहा था कि AI के विकास में सरकार को ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए। ———————- यह खबर भी पढ़ें… ओपनएआई का 90 साल पुरानी गणित पहेली सुलझाने का दावा: यह दुनिया के 7 सबसे मुश्किल सवालों में एक; 88 घंटे में जवाब ढूंढा ओपनएआई ने दावा किया है कि उसकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक ने गणित की दुनिया के सबसे मुश्किल सवालों में से एक को सॉल्व कर दिया है। AI को इसे सुलझाने में सिर्फ 88 घंटे लगे। पूरी खबर पढ़ें…

India Net Zero Portal: क्लाइमेट चेंज पर भारत का बड़ा एक्शन, अब नेट जीरो टारगेट्स की होगी सार्वजनिक निगरानी! जानें कैसे काम करेगा नया पोर्टल

India Net Zero Portal: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने विश्व ओजोन दिवस 2026 के मौके पर मुंबई में भारत का नेट जीरो पोर्टल और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) डैशबोर्ड लॉन्च किया है। ये दोनों डिजिटल इनिशिएटिव्स देश में लिए जा रहे क्लाइमेट एक्शंस में ट्रांसपेरेंसी, कोऑर्डिनेशन के साथ इसे एविंडेस आधारित बनाने में खास भूमिका निभाएंगी।

आपको बता दें कि नेट जीरो पोर्टल अलग अलग संस्थाओं की ओर से वॉलेंट्री लिए गए नेट जीरो संकल्पों को दर्ज करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान देगा। इसके अलावा NAPCC डैशबोर्ड जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय मिशनों की प्रगति की निगरानी करेगा।

नेट जीरो पोर्टल बताएगा कि क्लाइेट ऐक्शन में कितना हो रहा काम

नेट जीरो पोर्टल विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय संस्थाओं द्वारा स्वैच्छिक पंजीकरण और नेट जीरो प्रतिबद्धताओं के डिस्क्लोजर के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसपर मौजूद संस्थाएं अपने ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन की जानकारी दे सकती हैं, अपने नेट जीरो टारगेट्स का ऐलान करने के अलावा एनुअल रिपोर्ट अपडेट्स भी दे सकती हैं।

कंपनियों को अपने सीधे (Scope 1) और अप्रत्यक्ष (Scope 2) उत्सर्जन का ब्योरा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वहीं सप्लाई चेन से जुड़े (Scope 3) उत्सर्जन की जानकारी देना पूरी तरह से उनकी मर्जी पर निर्भर होगा। कंपनियां इस पोर्टल पर यह भी बता सकती हैं कि वे नेट जीरो का लक्ष्य कैसे हासिल करेंगी। इसमें साफ-सुथरी ऊर्जा को अपनाना, ऊर्जा की बचत, नई तकनीकों का इस्तेमाल और कार्बन हटाने जैसे उपाय शामिल हैं।

जो भी कंपनियां अपने नेट जीरो लक्ष्य सफलतापूर्वक घोषित करेंगी, उन्हें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की तरफ से आधिकारिक तौर पर एकनॉलेजमेंट दिया जाएगा।

सबके लिए उपलब्ध रहेगा डेटा

कंपनियों की इन घोषणाओं को आम जनता भी देख सकेगी। इससे देश में जलवायु सुधार के लिए हो रहे कामों का एक बड़ा और पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार होगा। इस पोर्टल को [https://netzeroindia.moef.gov.in/](https://netzeroindia.moef.gov.in/) पर एक्सेस किया जा सकता है।

NAPCC डैशबोर्ड: एक ही जगह दिखेगा सरकारी मिशनों का पूरा रिपोर्ट कार्ड

राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना यानी NAPCC डैशबोर्ड के जरिए सरकार के अलग-अलग जलवायु मिशनों की प्रगति को एक जगह ट्रैक किया जा सकेगा। यह डैशबोर्ड जलवायु परिवर्तन से जुड़े राष्ट्रीय मिशनों के आंकड़ों को एक साथ लाएगा जिससे संबंधित मंत्रालयों और विभागों को उनकी प्रगति पर निगरानी रखना आसान हो जाएगा। इस डैशबोर्ड से अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनेगा। साथ ही यह समझने में मदद मिलेगी कि किस क्षेत्र में कितना काम हुआ है और कहां सुधार की जरूरत है. यह पहल भारत के घरेलू प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए जलवायु वादों से जोड़ने में भी मदद करेगी। इस डैशबोर्ड को  (https://napccindia.moef.gov.in/](https://napccindia.moef.gov.in/) पर देखा जा सकता है।

सरकार की इस पहल का सीधा मकसद टेक्नोलॉजी के जरिए कामकाज में पारदर्शिता लाना और देश को कम-कार्बन वाले भविष्य की ओर ले जाना है, ताकि इस बदलाव में हर किसी की भागीदारी तय की जा सके।

ये भी पढ़ें- MDR Charges Row: 96% मर्चेंट पेमेंट पर नहीं लगेगा कोई शुल्क! वित्त मंत्रालय ने बताया- UPI ट्रांजैक्शन पर कहां लगेगा चार्ज और कहां नहीं लगेगा?

ट्रम्प की डाक वोटिंग सख्त करने की कोशिश पर रोक:सुप्रीम कोर्ट के 9 में से 7 जज खिलाफ; वोटरों की जानकारी USPS को देने का था आदेश

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने डाक से वोटिंग के नियम सख्त करने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कोशिश पर लगी रोक हटाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सोमवार को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला 7-2 रहा। दो जज ने इसका विरोध किया। मामला नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से जुड़ा है। ट्रम्प ने मार्च में आदेश जारी किया था। ट्रम्प का कहना था कि डाक से वोटिंग में गड़बड़ी रोकने के लिए नए नियम जरूरी है। वे चाहते थे कि डाक से वोट भेजने वाले लोगों की लिस्ट राज्यों को अमेरिकी डाक सेवा (USPS) को दी जाए। ट्रम्प के नियम के तहत USPS रोक सकता था बैलेट अगर कोई बैलेट नए नियमों के मुताबिक नहीं होता या वोट देने वाले का नाम तय लिस्ट में नहीं मिलता, तो USPS उस बैलेट को रोक सकता था। डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार वाले राज्यों और वोटिंग अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इन नियमों का विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे चुनाव के दौरान लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। कोर्ट ने समय पर उठाया सवाल डाक से वोटिंग के मामले पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल समय का था। नवंबर के चुनाव में अब कुछ समय बचा है और कई राज्यों में बैलेट भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जस्टिस ब्रेट कावानॉ ने कहा कि ट्रंप की योजना भविष्य में लागू की जा सकती है, लेकिन नवंबर के चुनाव से ठीक पहले इसे लागू करना मुश्किल है। चुनाव अधिकारियों के पास नई व्यवस्था तैयार करने और उसे लागू करने के लिए जरूरी समय नहीं है। डाक से वोटिंग पर ट्रम्प ने पहले भी उठाए सवाल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद ट्रम्प ने डाक से वोटिंग पर सवाल उठाए थे। वह बिना सबूत यह दावा करते रहे कि चुनाव में गड़बड़ी हुई थी और उनसे जीत छीन ली गई। हालांकि, ट्रंप खुद भी डाक से वोट डाल चुके हैं। इस साल फ्लोरिडा के रिपब्लिकन प्राइमरी में उन्होंने मेल से वोट किया था। USPS ने भी ट्रंप के फैसले पर जताई थी चिंता ट्रंप की नई व्यवस्था को लेकर USPS के एक व्हिसलब्लोअर ने भी चिंता जताई थी। उसने कहा था कि नई तकनीकी व्यवस्था जल्दबाजी में तैयार की गई है। अगर इसमें कोई गड़बड़ी हुई तो लाखों लोगों के बैलेट समय पर नहीं पहुंच पाएंगे। नई व्यवस्था में बैलेट के लिफाफे पर मौजूद बारकोड और मतदाता की जानकारी को एक ऑनलाइन सिस्टम से जोड़ना था। चुनाव से कुछ हफ्ते पहले इतना बड़ा बदलाव अधिकारियों के लिए भी चुनौती था। अमेरिका में नवंबर में मिडटर्म चुनाव होंगे अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मिडटर्म चुनाव होंगे। इसमें कांग्रेस के दोनों सदनों हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट के लिए चुनाव होंगे। अभी अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के पास डेमोक्रेटिक पार्टी से ज्यादा सीटें हैं, लेकिन दोनों के बीच सीटों का अंतर बहुत कम है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी ज्यादा सीटें जीतकर बहुमत में आती है, तो वह ट्रम्प के फैसलों को रोकने की कोशिश कर सकती है। साथ ही ट्रम्प सरकार के कामकाज की जांच भी कर सकती है। ट्रम्प के 5 और फैसलों पर SC की रोक टैरिफ – फरवरी 2026 सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के टैरिफ को अवैध ठहराया और कहा कि राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है। इलिनॉय में नेशनल गार्ड – दिसंबर 2025 सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प सरकार को इलिनॉय में नेशनल गार्ड तैनात करने की तत्काल अनुमति नहीं दी। बर्थराइट सिटीजनशिप – जून 2026 ट्रम्प ने अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों की जन्मसिद्ध नागरिकता खत्म करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानून राष्ट्रपति को ऐसा बदलाव करने की इजाजत नहीं देता। बर्थ टूरिज्म – सितंबर 2026 सुप्रीम कोर्ट से बर्थराइट सिटीजनशिप पर झटका लगने के बाद ट्रम्प ने बर्थ टूरिज्म रोकने और कुछ मामलों में बच्चों की नागरिकता सीमित करने के लिए नया आदेश जारी किया, लेकिरन कोर्ट ने इस पर भी रोक लगा दी। फेड गवर्नर को हटाने का मामला – जून 2026 ट्रम्प ने फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को पद से हटाने की कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि फेड गवर्नर को राष्ट्रपति बिना उचित कानूनी कारण और तय प्रक्रिया के नहीं हटा सकते। ————————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-मिडटर्म चुनाव जीता तो हर वोटर को ₹5 लाख: इस पर ₹128 लाख करोड़ खर्च करने होंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि नवंबर के मिडटर्म चुनाव में अगर रिपब्लिकन पार्टी बहुमत बरकरार रखती है, तो हर बालिग अमेरिकी को 5000 डॉलर (करीब 4.76 लाख रुपए) दिए जाएंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

Mokshagundam Visvesvaraya

हर साल 15 सितंबर को भारत में अभियंता दिवस यानी इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। यह दिन महान अभियंता, राष्ट्र-निर्माता और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (सर एम.वी.) की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता, तकनीकी दक्षता और जल प्रबंधन के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों से आधुनिक भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

सर एम. विश्वेश्वरैया को भारतीय इंजीनियरिंग के महान स्तंभों में गिना जाता है। उन्हें आधुनिक मैसूर के विकास में उनके योगदान के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनकी सोच केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे औद्योगिक विकास, शिक्षा, सिंचाई, जल संरक्षण और आर्थिक प्रगति को भी राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे।

 

15 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है अभियंता दिवस?

अभियंता दिवस हर वर्ष 15 सितंबर को सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में इंजीनियरिंग संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों में कार्यक्रम आयोजित कर उनके योगदान को याद किया जाता है।

 

खासकर कर्नाटक में यह दिन विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। उनके जीवन, कार्यों और राष्ट्र निर्माण में योगदान पर चर्चा की जाती है तथा नई पीढ़ी को उनकी उपलब्धियों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

 

शुरुआती जीवन और शिक्षा

सर एम. विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को तत्कालीन मैसूर रियासत के मुद्देनहल्ली गांव में हुआ था, जो वर्तमान में कर्नाटक के चिकबल्लापुर जिले में स्थित है। उनका जन्म एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

 

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए पुणे के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश लिया। सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की और जल्द ही अपनी प्रतिभा तथा कार्यकुशलता के कारण अलग पहचान बना ली।

 

इंजीनियरिंग से राष्ट्र सेवा तक का सफर

सर एम.वी. ने अपने करियर की शुरुआत बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लोक निर्माण विभाग (PWD) से की। इंजीनियर के रूप में उन्होंने जल संसाधन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम किया।

 

उनकी तकनीकी समझ और समस्या के व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता ने उन्हें अपने समय के अग्रणी इंजीनियरों में शामिल कर दिया। वर्ष 1912 से 1918 तक उन्होंने मैसूर राज्य के दीवान के रूप में भी सेवाएं दीं।

 

दीवान के रूप में उन्होंने मैसूर के औद्योगिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास को गति देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं। इसी कारण उन्हें आधुनिक मैसूर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्तित्व माना जाता है।

 

जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण में बड़ा योगदान

सर एम. विश्वेश्वरैया का सबसे महत्वपूर्ण योगदान जल प्रबंधन और सिंचाई व्यवस्था के क्षेत्र में माना जाता है। उस दौर में भारत के कई हिस्से बाढ़, सूखे और सिंचाई की समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।

 

उन्होंने जल के संरक्षण, बांधों के निर्माण और अतिरिक्त पानी के प्रभावी प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों के विकास और उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी तकनीकी दक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश भारत सरकार ने उन्हें अदन (वर्तमान यमन) की जल आपूर्ति और जल निकासी व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भेजा था।

 

वे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विकसित हो रही तकनीकों को समझने और उन्हें भारत की परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने में भी रुचि रखते थे। उनकी यह सोच उस समय के लिए बेहद दूरदर्शी मानी जाती थी।

 

विदेश यात्राओं से सीखने का जुनून

सर एम.वी. का मानना था कि किसी भी देश की प्रगति के लिए नई तकनीकों और वैज्ञानिक सोच को अपनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने विदेशों की तकनीकी प्रगति का अध्ययन किया।

 

उन्होंने जापान, अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका सहित विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं और वहां की इंजीनियरिंग तथा औद्योगिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उनका उद्देश्य केवल जानकारी हासिल करना नहीं था, बल्कि उपयोगी तकनीकों को भारत की जरूरतों के अनुरूप अपनाना था।

 

ब्रिटिश सरकार ने दिया 'सर' का सम्मान

सर एम. विश्वेश्वरैया के असाधारण योगदान को देखते हुए वर्ष 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर' की उपाधि प्रदान की। इसके बाद उनके नाम के साथ 'सर' की उपाधि जुड़ गई। हालांकि उनका वास्तविक सम्मान भारत के विकास और राष्ट्र सेवा में किए गए उनके कार्यों से स्थापित हुआ।

 

भारत रत्न से हुए सम्मानित

स्वतंत्र भारत में भी उनके योगदान को सर्वोच्च सम्मान मिला। वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की पहचान था।

 

100 वर्ष से अधिक का जीवन और अंतिम समय

सर एम. विश्वेश्वरैया ने लंबा और बेहद सक्रिय जीवन जिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक देश के विकास, तकनीकी शिक्षा और औद्योगिक प्रगति से जुड़े विषयों पर विचार व्यक्त किए।

 

उन्होंने 14 अप्रैल 1962 को बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। उनकी स्मृति में उनके पैतृक गांव मुद्देनहल्ली में स्मारक भी बनाया गया है, जहां आज भी लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

 

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं सर एम.वी.

सर एम. विश्वेश्वरैया का जीवन इस बात का उदाहरण है कि तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी किया जा सकता है।

 

उन्होंने जल प्रबंधन से लेकर औद्योगिक विकास तक अनेक क्षेत्रों में दूरदर्शी सोच का परिचय दिया। उनका जीवन अनुशासन, मेहनत, तकनीकी दक्षता और राष्ट्र सेवा के समन्वय की प्रेरक मिसाल है।

 

इसलिए 15 सितंबर का अभियंता दिवस केवल इंजीनियरों के सम्मान का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस महान अभियंता को याद करने का दिन भी है, जिसने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘नई पीढ़ी ग्लोबल हो, लेकिन हृदय में भारत हो’, नेल्लोर में CM योगी ने बताई विकसित भारत की दिशा

'नई पीढ़ी ग्लोबल हो, लेकिन हृदय में भारत हो', नेल्लोर में CM योगी ने बताई विकसित भारत की दिशा

स्वर्ण भारत ट्रस्ट के 25वें स्थापना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पहुंचते ही ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से पूरा परिसर गूंज उठा। बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ उनका स्वागत किया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया। इस दौरान अपने संबोधन में सीएम योगी ने कहा कि विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक दौर ने भारत की स्वावलंबी ग्रामीण व्यवस्था को कमजोर किया। गांवों की आत्मनिर्भरता और स्थानीय संस्थाओं पर इसका असर पड़ा, लेकिन गांवों की आत्मा कभी समाप्त नहीं हुई।

स्वर्ण भारत ट्रस्ट का ब्रिज स्कूल और उत्तर प्रदेश के अटल आवासीय विद्यालय अलग राज्यों में होने के बावजूद समान सोच के साथ वंचित बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारा लक्ष्य ऐसी नई पीढ़ी तैयार करना है, जो ग्लोबल भी हो और रूटेड भी, आधुनिक तकनीक से लैस हो, लेकिन हृदय में भारत, संस्कृति पर गर्व, अपनी जड़ों का बोध, समाज के प्रति संवेदनशीलता और ‘नेशन फर्स्ट’ की भावना रखती हो। तकनीक भेदभाव नहीं करती और नए भारत ने गांव की ताकत को नई तकनीक से जोड़ दिया है। सीएम ने वेंकैया नायडू को उत्तर व दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक व आध्यात्मिक सेतु बताया।

 

मुख्यमंत्री ने स्वर्ण भारत ट्रस्ट के 25 वर्ष पूर्ण होने पर सभी पदाधिकारियों, सदस्यों और शुभचिंतकों को बधाई दी। साथ ही ट्रस्ट के संस्थापक एवं पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू का हृदय से अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि वेंकैया नायडू जी बहुआयामी व अत्यंत संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अपनी सरलता, सहजता और सभी को साथ लेकर चलने की क्षमता के बल पर पूरे देश में अपनी अलग पहचान बनाई। सार्वजनिक जीवन में ऐसा विराट व्यक्तित्व मिलना दुर्लभ है, जो दल और विचारधारा की सीमाओं से ऊपर उठकर सभी को समान रूप से साथ लेकर चले और जिसकी सर्वत्र स्वीकार्यता हो। राज्यसभा सभापति के रूप में दायित्वों के निर्वहन में यही व्यापक स्वीकार्यता दिखाई देती थी। उनका योगदान राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तेलुगु संस्कृति, खान-पान और वेश-भूषा को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

सीएम योगी ने कहा कि वर्ष 2001 में एक व्यक्ति ने शासन में रहकर समाज सेवा की यात्रा प्रारंभ की थी, आज वह भारत के प्रधानमंत्री हैं। उसी वर्ष समाज सेवा की एक और यात्रा शुरू हुई, जो स्वर्ण भारत ट्रस्ट के रूप में हम सबके सामने है। 25 वर्ष बाद दोनों यात्राओं का लक्ष्य एक ही है- विकसित भारत। जब सरकार और समाज दोनों की दिशा एक हो, दोनों का संकल्प एक हो और दोनों लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास करते हैं, तो अवश्य परिणाम आते हैं।

 

भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति हमारे गांव

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति हमारे गांव रहे हैं। सदियों तक गांव अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और संस्कृति के केंद्र रहे। वे उत्पादन, ज्ञान और जल संरक्षण के साथ ही कला-शिल्प के केंद्र रहे हैं तथा सामाजिक मूल्यों की मूल इकाई भी रहे हैं। कृषि, पशुपालन, शिल्प, व्यापार, स्थानीय संस्थाएं, सभी एक दूसरे से जुड़ी थीं। गांव की अर्थव्यवस्था एक सर्कुलर इकॉनमी थी। एक का उत्पादन दूसरे की आजीविका बनता था। विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक दौर का असर केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा। गांव की आत्मनिर्भरता कम हुई। स्थानीय संस्थाएं कमजोर हुईं और ग्रामीण भारत की विकास यात्रा पर आघात हुआ।

 

सीएम ने कहा कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चेतना की एक नई दिशा दी थी। उनका आह्वान था- 'बैक टू विलेज'। वे 'ग्राम स्वराज' के माध्यम से ऐसा गांव चाहते थे जो आत्मनिर्भर हो, स्वावलंबी हो, अपनी आवश्यकताओं के लिए सक्षम हो और अपने निर्णय स्वयं लेने में समर्थ हो। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए वेंकैया नायडू जी ने 2001 में अपने आठ साथियों के साथ स्वर्ण भारत ट्रस्ट की शुरुआत की थी। ट्रस्ट ने स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर दंत एवं नेत्र चिकित्सा, पशु चिकित्सा से लेकर किसान प्रशिक्षण, महिला प्रशिक्षण से लेकर व्यावसायिक शिक्षा और कंप्यूटर प्रशिक्षण से लेकर विद्यालयों एवं ब्रिज स्कूलों तक विभिन्न क्षेत्रों में अत्यंत सराहनीय कार्य किया है।

 

इकोसिस्टम से बाहर बच्चों को वापस शिक्षा में लाना महत्वपूर्ण

मुख्यमंत्री ने कहा कि रेजिडेंशियल ब्रिज स्कूल के माध्यम से स्वर्ण भारत ट्रस्ट वंचित तबके के बच्चों को शिक्षा, भोजन, पुस्तकें, ड्रेस और आवास की सुविधा उपलब्ध कराकर उन्हें फिर से शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का सराहनीय कार्य कर रहा है। अक्षरा विद्यालय और स्वर्ण भारती विद्या मंदिर जैसे संस्थानों के माध्यम से ग्रामीण व बीपीएल परिवार के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का भी अभिनव कार्य हो रहा है। पीएम मोदी जी के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश में भी श्रमिकों के बच्चों के लिए 18 मंडल मुख्यालयों पर अटल आवासीय विद्यालय स्थापित किए गए हैं। कोरोना महामारी के दौरान माता-पिता को खोने वाले बच्चों को भी इन विद्यालयों में शिक्षा व आवास सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। ये निःशुल्क आवासीय विद्यालय हैं, जहां आधी सीटें बालिकाओं के लिए आरक्षित हैं।

 

पुराने हुनर को दिया नया बाजार

सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जनपद में कोई न कोई पारंपरिक हुनर मौजूद है। वाराणसी की साड़ी, भदोही का कालीन, मुरादाबाद का पीतल, फिरोजाबाद का कांच, कन्नौज का इत्र और लखनऊ की चिकनकारी इसकी मिसाल हैं। पीढ़ियों से इस हुनर को आगे बढ़ाने वाले कारीगरों के पास आधुनिक डिजाइन, पूंजी और बाजार की कमी थी। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ योजना शुरू की। हर जिले के एक प्रमुख उत्पाद को चिन्हित कर उसके कारीगरों को डिजाइन प्रशिक्षण, आधुनिक टूल किट, आसान बैंक ऋण तथा मार्केटिंग और एक्सपोर्ट का मंच उपलब्ध कराया गया। ‘विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना’ के तहत पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण और टूल किट दिए गए। इसका परिणाम है कि इनका हुनर निर्यात तक पहुंच रहा है और उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख निर्यातक राज्यों में शामिल हो गया है। हमने कारीगर को नया हुनर नहीं सिखाया, बल्कि उसके पुराने हुनर को नया बाजार उपलब्ध कराया है।

 

गांव की बेटियों को मिला गांव में रोजगार

मुख्यमंत्री ने स्वर्ण भारत ट्रस्ट की ग्रामीण महिलाओं के लिए संचालित प्रशिक्षण व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि इसमें महिलाओं के लिए अलग आवास की व्यवस्था भी है। जब तक व्यवस्था सुरक्षित नहीं होती, तब तक परिवार अपनी बेटी को बाहर नहीं भेजता। उत्तर प्रदेश में ‘मिशन शक्ति’ के माध्यम से महिलाओं को ‘बीसी सखी’ के रूप में तैयार किया गया। उन्हें प्रशिक्षण और डिजिटल डिवाइस देकर बैंकिंग सेवाओं से जोड़ा गया। अब गांव के बुजुर्गों व अन्य लोगों को बैंकिंग सेवाएं घर पर मिल रही हैं और ये काम उसी गांव की बेटियां कर रही हैं। उन्हें अच्छी आय भी हो रही है। गोवंश संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश में 7,700 से अधिक गो-आश्रय स्थल बनाए गए हैं। निराश्रित गोवंश को पालने वाले किसानों को राज्य सरकार की ओर से प्रति गोवंश 1,500 रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं।

 

इंसेफेलाइटिस उन्मूलन में मिली सफलता

सीएम योगी ने कहा कि करीब 25 करोड़ की आबादी वाला उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कभी इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार के कारण हर वर्ष मध्य जुलाई से मध्य नवंबर तक हजारों मौतें होती थीं। गोरखपुर से सांसद रहते हुए उन्होंने इस समस्या के खिलाफ लगातार आवाज उठाई और आंदोलन किया, लेकिन समाधान नहीं निकल पा रहा था। पीएम मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत हुई। वेंकैया नायडू जी उस कैबिनेट के महत्वपूर्ण सदस्य थे। ‘हर घर शौचालय’ के लक्ष्य के साथ उत्तर प्रदेश में ‘दस्तक अभियान’ चलाकर घर-घर जागरूकता पहुंचाई गई। इसके परिणामस्वरूप दशकों से हजारों लोगों की जान लेने वाली इंसेफेलाइटिस को पूरी तरह नियंत्रित करने और उसके उन्मूलन में सफलता मिली।

 

तकनीक नहीं करती भेदभाव

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज तकनीक का युग है और तकनीक का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह भेदभाव नहीं करती। प्रधानमंत्री जी ने तकनीक का प्रभावी उपयोग कर महिला और ग्रामीण सशक्तीकरण को नई गति दी है। जनधन खातों और डीबीटी के माध्यम से सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंच रहा है और यह सुनिश्चित हुआ है कि योजनाओं का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। आज लगभग 60 करोड़ भारतवासी जनधन खातों का लाभ प्राप्त कर रहे हैं और करोड़ों परिवारों को वित्तीय समावेशन का लाभ मिल रहा है। डिजिटल लेन-देन के मामले में भारत पूरी दुनिया को राह दिखा रहा है। इसका लाभ दुकानदार, महिला, अन्नदाता किसान सभी को मिल रहा है। योजनाओं का लाभ उस गरीब परिवार को मिल रहा है, जिसे बिना बिचौलियों के पक्के मकान के लिए सरकारी सहायता मिल रही है।

 

समारोह में ट्रस्ट के संस्थापक एवं पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू, आंध्र प्रदेश सरकार के नगर प्रशासन एवं शहरी विकास मंत्री पी. नारायणा, आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री वाई. सत्य कुमार यादव, बीजेपी आंध्र प्रदेश के अध्यक्ष पी.बी.एन. माधव, राज्यसभा सांसद बीडा मस्तान राव, स्वर्ण भारत ट्रस्ट के चेयरमैन डॉ. कामिनेनी श्रीनिवास, आंध्र प्रदेश विधानसभा के विधायक सोमीरेड्डी चंद्रमोहन रेड्डी, स्वर्ण भारत ट्रस्ट की मैनेजिंग ट्रस्टी दीपा वेंकट, पुष्पा बरपु फाउंडेशन के मैनेजिंग ट्रस्टी एम. हर्षवर्धन आदि उपस्थित थे।

ISRO Privatisation: निजीकरण की खबरों को ISRO ने ‘बेबुनियाद’ बताया, कहा- हमारी अहमियत बनी रहेगी

ISRO Privatisation: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने निजीकरण की खबरों को खारिज किया है। एजेंसी ने ऐसी अटकलों को ‘बेबुनियाद और गलत’ बताया। ISRO ने कहा कि स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ रही है। लेकिन इससे उसकी भूमिका कम नहीं होगी।

ISRO देश में एडवांस्ड स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का मुख्य संस्थान बना रहेगा। राष्ट्रीय और रणनीतिक मिशन भी उसके पास रहेंगे। अंतरिक्ष विज्ञान, खोज और महत्वपूर्ण स्पेस टेक्नोलॉजी पर भी ISRO काम करता रहेगा।

निजी कंपनियों की एंट्री क्यों बढ़ रही है?

भारत अपने स्पेस सेक्टर में ज्यादा कंपनियों को जोड़ रहा है। इसमें प्राइवेट कंपनियां, स्टार्टअप, शिक्षण संस्थान और सरकारी कंपनियां शामिल हैं।

ISRO के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि एजेंसी की अहमियत घट रही है। मकसद पूरे स्पेस इकोसिस्टम को बड़ा बनाना है। इससे ISRO को ज्यादा जटिल और नई तकनीकों पर ध्यान देने का मौका मिलेगा। ISRO ने कहा कि बदलाव उसकी भूमिका में नहीं, बल्कि पूरे स्पेस सेक्टर के आकार और काम करने के तरीके में है।

ISRO अब किन कामों पर ज्यादा ध्यान देगा?

ISRO का फोकस अब अगली पीढ़ी की तकनीकों पर और बढ़ेगा। इसमें अत्याधुनिक रिसर्च, मानव अंतरिक्ष उड़ान और नए लॉन्च सिस्टम शामिल हैं। डीप स्पेस और दूसरे ग्रहों से जुड़े मिशन भी अहम रहेंगे। रणनीतिक तकनीकों पर भी ISRO काम करता रहेगा।

इसके अलावा कम्युनिकेशन, नेविगेशन और अर्थ ऑब्जर्वेशन के लिए एडवांस्ड पेलोड बनाए जाएंगे। सेंसर और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों पर भी काम जारी रहेगा।

मच्योर टेक्नोलॉजी बनाएगा प्राइवेट सेक्टर

जो तकनीक पूरी तरह तैयार हो चुकी है, उसका बड़े स्तर पर उत्पादन निजी कंपनियां और सरकारी कंपनियां कर सकती हैं। इसमें मच्योर लॉन्च व्हीकल, नियमित तौर पर बनने वाले सैटेलाइट और दूसरे स्थापित सिस्टम शामिल हैं।

ISRO पहले ही कई तकनीकों को इंडस्ट्री को ट्रांसफर कर चुका है। एजेंसी ने साफ किया कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का मतलब यह नहीं है कि वह उस क्षेत्र से हट रही है।

इसका मकसद बड़े स्तर पर उत्पादन बढ़ाना है। इससे कमर्शियलाइजेशन और इनोवेशन को भी बढ़ावा मिलेगा। कंपनियों को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने का मौका मिलेगा।

ISRO की भूमिका क्या रहेगी?

ISRO के पास मुख्य वैज्ञानिक और रणनीतिक जिम्मेदारियां रहेंगी। वहीं, इंडस्ट्री को तैयार तकनीकों को बड़े स्तर पर बनाने की जिम्मेदारी ज्यादा मिल सकती है। इससे ISRO अपने वैज्ञानिकों और संसाधनों को एडवांस्ड रिसर्च पर लगा सकेगा। दूसरी तरफ, निजी कंपनियां निवेश और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाएंगी।

ISRO ने इस मॉडल को ‘ISRO-led national space ecosystem’ बताया है। यानी ISRO की भूमिका खत्म नहीं हो रही है। बल्कि स्पेस सेक्टर में ज्यादा कंपनियों के आने के साथ उसका फोकस और ज्यादा एडवांस्ड मिशन पर होगा।

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सुंदर पिचाई का फ्यूचर मंत्र! तकनीक बदलेगी, लेकिन इंसान पर भरोसा करना न छोड़े

टेक्नोलॉजी की दुनिया में हर दिन कुछ नया आता रहता है। कभी नया फोन लॉन्च होता है, तो कभी किसी ऐप या सॉफ्टवेयर में नया फीचर जुड़ जाता है। ऐसे बदलाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाते हैं। लेकिन इनके पीछे सिर्फ मशीनों का कमाल नहीं होता, बल्कि इन्हें बनाने और इस्तेमाल करने वाले लोगों की सोच भी बहुत मायने रखती है। सुंदर पिचाई टेक्नोलॉजी के फ्यूचर को लेकर काफी पॉजिटिव सोच रखते हैं। उनका मानना है कि टेक्निक हमारी जिंदगी को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसके लिए लोगों की सोच और सही फैसले भी जरूरी हैं। यानी उनका भरोसा सिर्फ टेक्नोलॉजी पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर भी है जो इसे बनाते हैं और सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं।

 

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सुंदर पिचाई का आज का विचार-

मैं आशावादी हूं, इसलिए नहीं कि मुझे टेक्नोलॉजी पर भरोसा है, बल्कि इसलिए कि मुझे लोगों पर भरोसा है।

 

लोगों पर भरोसा करें

सुंदर पिचाई के इस विचार का मतलब है कि फ्यूचर को लेकर उनका भरोसा सिर्फ टेक्नोलॉजी पर नहीं है। मशीनें काम को तेज कर सकती हैं, सॉफ्टवेयर कई चीजों को अपने आप कर सकता है और AI कुछ ही सेकंड में जवाब दे सकता है। लेकिन सही फैसला लेना अभी भी इंसान के हाथ में है। कौन-सी परेशानी हल करनी है, किसी जवाब पर भरोसा करना है या नहीं और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किस तरह करना है, यह इंसान ही तय करता है।

 

अपने फैसले खुद लें

नई टेक्नोलॉजी आने के बाद हर कोई उसे एक ही तरीके से इस्तेमाल नहीं करता। कंपनियां तय करती हैं कि उन्हें कौन-सा सिस्टम अपनाना है, एम्पलॉई देखते हैं कि वह उनके काम को कैसे आसान बना सकता है और कस्टमर तय करते हैं कि कौन-सा प्रोडक्ट लंबे समय तक चलेगा। वहीं गवर्नमेंट और दूसरी ऑर्गेनाइजेशन यह तय करती हैं कि किसी टेक्निक के इस्तेमाल के लिए कौन से नियम होने चाहिए।

टेक्नोलॉजी कई ऐसे काम कर सकती है, जिनमें पहले काफी समय और मेहनत लगती थी। इससे काम करने का तरीका जरूर बदल रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इंसानों की जरूरत खत्म हो जाएगी। किसी को यह तय करना होगा कि काम कैसे किया जाए, नतीजा सही है या नहीं और गलती होने पर क्या कदम उठाना है। बातचीत करना, परेशानी को समझना, सही फैसला लेना और दूसरों के साथ मिलकर काम करना जैसी खूबियां आज भी जरूरी हैं।

 

 

 

नई चीजें सीखते रहे

टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है, इसलिए एक ही सिस्टम या टूल को हमेशा के लिए सीख लेना काफी नहीं है। आज जो सॉफ्टवेयर काम का है, हो सकता है कुछ समय बाद उसकी जगह कोई नया टूल ले ले। ऐसे में नई चीजों को सीखने और जरूरत के हिसाब से खुद को बदलने की आदत काफी काम आती है। शुरुआत में किसी नई टेक्नोलॉजी को समझने में परेशानी हो सकती है, लेकिन गलतियों से सीखकर धीरे-धीरे बेहतर हुआ जा सकता है।

 

 

 

AI इनफार्मेशन सोच-समझकर अपनाएं

पिचाई की बात का मतलब यह नहीं है कि टेक्नोलॉजी से जुड़ी हर चीज अच्छी ही होगी। AI गलत जानकारी दे सकता है, ऑटोमेशन से कुछ नौकरियों पर असर पड़ सकता है और डिजिटल टेक्नोलॉजी से प्राइवेसी जैसे सवाल भी खड़े हो सकते हैं। इसलिए नई टेक्निक को अपनाते समय सिर्फ उसके फायदे देखना सही नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि इसे किसने बनाया, इसका इस्तेमाल कौन कर रहा है, इससे किसे फायदा हो रहा है और इसकी वजह से किन लोगों को परेशानी हो सकती है।

 

 

टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है, इसलिए जरूरी है कि हम भी नई चीजों के साथ खुद को बदलते रहें। हर नई टेक्निक को बिना सोचे अपनाने के बजाय यह समझना बेहतर है कि वह हमारे लिए कितनी काम की है। खुली सोच और सीखने की आदत के साथ हम आने वाले बदलावों को आसानी से अपना सकते हैं।