नोएल टाटा के पक्ष में उतरे शरद पवार, टाटा ग्रुप की विरासत को प्रोटेक्ट करने को लेकर कही बड़ी बात

टाटा संस के चेयरमैन एन.चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के प्रेसिडेंट शरद पवार ने सोशल मीडिया मीडियम X पर एक पोस्ट किया है। इस पोस्ट में टाटा ग्रुप के संगठनात्मक ढ़ाचे पर टिप्पणी करते हुए शरद पवार ने कहा कि टाटा ग्रुप की परंपरा और टाटा ट्रस्ट्स के सामाजिक प्रतिबद्धता को बचाकर रखना चाहिए।

शरद पवार ने 22 सितंबर को टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहे विवाद पर अपनी राय रखते हुए नोएल टाटा के रुख का समर्थन किया और महाराष्ट्र व भारत के विकास में टाटा ग्रुप की भूमिका की तारीफ की। उन्होंने जमशेदजी टाटा के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि टाटा परिवार ने इंडस्ट्री को समाज सेवा की दिशा दी है। उन्होंने लिखा कि इस सोच का मूल यह है कि इंडस्ट्री से पैदा हुई संपत्ति का इस्तेमाल समाज के हित के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी एक सोचा-समझा स्ट्रक्चर है। इस ओनरशिप स्ट्रक्चर की वजह से ही टाटा ग्रुप के बिज़नेस से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल हेल्थ,एजुकेशन,रिसर्च और ग्रामीण इलाकों की रोज़ी-रोटी जैसे सामाजिक कल्याण के कामों के लिए किया जाता है।

टाटा ग्रुप की विरासत को बचाकर रखना आज की जरूरत

शरद पवार ने अपने एक्स पोस्ट में कहा है कि टाटा ग्रुप की लीडरशिप के बारे में फैसले लेते समय इंस्टीट्यूशनल प्रोसेस और टाटा ट्रस्ट की भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए। टाटा ग्रुप का देश और खासकर महाराष्ट्र के विकास से पुराना नाता रहा है। इसलिए, टाटा ग्रुप के अंदर के झगड़ों को बातचीत और सही कानूनी प्रक्रिया से सुलझाने की जरूरत है। इसके लिए शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करते हुए कंपनी के बायलॉज में बताए गए प्रोसेस का सम्मान करना जरूरी है।

बताते चलें कि 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने एन.चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर फिर से अपॉइंट करने का फैसला लिया था। यह फैसला 4 के मुकाबले 1 वोट से हुआ था। उसी मीटिंग में टाटा संस को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट करने का भी फैसला किया गया।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के दोबारा अपॉइंटमेंट का विरोध किया था। हालांकि,ट्रस्ट के दूसरे नॉमिनेटेड डायरेक्टर,वेणु श्रीनिवासन ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है और कहा है कि ट्रस्ट के नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स की भूमिका पर कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन के मुताबिक ठीक से विचार किया जाना चाहिए।

टाटा ग्रुप की विरासत को संजोना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

शरद पवार ने यह भी कहा कि अगर टाटा ट्रस्ट्स की सामाजिक और संस्थागत भूमिका कमजोर होती है तो इसका असर हेल्थ,एजुकेशन और रिसर्च सेक्टर के अलग-अलग संस्थाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल,TIFR और TISS जैसी प्रतिष्ठित संथाओं के ज़रिए लंबे समय तक सामाजिक क्षेत्र में काम किया है। इसलिए,यह सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम इस ग्रुप के संस्थागत स्वरूप और मूल्य आधारित परंपरा को बचाकर रखें,जिसने खुद को भारत के विकास के लिए समर्पित कर दिया है।

क्‍या राहुल गांधी ‘अंधभक्‍तों’ को भविष्‍य में अपने वोटर्स में तब्‍दील नहीं करना चाहते?

क्‍या राहुल गांधी ‘अंधभक्‍तों’ को भविष्‍य में अपने वोटर्स में तब्‍दील नहीं करना चाहते?

Rahul Gandhi

इंदौर में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने करीब 27 बार ‘अंधभक्‍त’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया। या शायद इससे भी ज्‍यादा बार। इस आयोजन को गैर-राजनीतिक कहकर प्रचारित किया जा रहा है, कांग्रेस इसे छात्रों से सीधा संवाद करना कहती है। अगर ऐसा है तो फिर राहुल गांधी अपनी स्‍पीच और इस पूरे संवाद में ‘अंधभक्‍त’ शब्‍द का इस्‍तेमाल क्‍यों करते हैं, यह शब्‍द तो पूरी तरह से सोशल मीडिया पर लड़ी जाने वाली पॉलिटिकल लड़ाई से निकलकर आया शब्‍द है।

दूसरी बात यह कि ‘अंधभक्‍त’ की श्रेणी में तो बहुत से ऐसे छात्र भी हैं जो अभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं और मोदी समर्थक हैं या किसी न किसी मुद्दे पर सरकार से अपनी सहमति रखते हैं। जबकि दूसरे कई ऐसे मुद्दें हैं, जिन पर सरकार से उनकी सहमति नहीं है, मसलन देश का एजुकेशन सिस्‍टम, बेरोगजारी और नीट घोटाला इत्‍यादि।

ऐसे में सवाल यह है कि क्‍या राहुल गांधी ऐसे ‘छात्रों’ को भविष्‍य में अपने वोटर्स में तब्‍दील नहीं करना चाहते हैं जो अभी किसी न किसी लिहाज से ‘अंधभक्‍त’ कहे या माने जा सकते हैं? क्‍या राहुल गांधी ने ऐसे ‘अंधभक्‍तों’ को हमेशा के लिए ‘अंधभक्‍त’ मान लिया है, जो आगे चलकर कभी अपना माइंडसेट बदल सकते हैं। क्‍या राहुल गांधी ऐसे लोगों को बार-बार अंधभक्‍त कहकर उन्‍हें और ज्‍यादा अपना विरोधी नहीं बना रहे हैं, जिनमें आगे चलकर राहुल का वोटर्स होने की संभावना छिपी है?

यहां राहुल गांधी की समझ और दूरदृष्‍टि को लेकर कुछ संशय पैदा होता है, वे यह मानकर चलते हैं कि जो ‘अंधभक्‍त’ हैं वो हमेशा ‘अंधभक्‍त’ रहेंगे, जबकि निजी-तौर पर मेरा यह मानना है और मैंने यह देखा है कि पिछले कुछ वक्‍त में मेरे इर्द-गिर्द सैकड़ों प्रो-बीजेपी लोगों का माइंडसेट बहुत हद तक बदला है और वे राहुल गांधी को एक दूसरा पक्ष या एक दूसरे विकल्‍प के तौर पर देखना चाहते हैं, बशर्ते वो विकल्‍प उनकी सोच पर खरा उतरता हो।

वे चाहते हैं कि सत्‍ता के सामने एक ऐसी दूसरी सोच उभरकर आए जो वर्तमान सरकार के ‘एल्‍गोरिदम’ का मुकाबला कर सके और वेलफेयर के मामलों में सरकार को चुनौती दे सके, लेकिन राहुल गांधी की तरफ से वो ‘फोर्स’ नहीं बन पा रहा है, जिसकी अनुभूति कर के वे राहुल गांधी नाम के दूसरे विकल्‍प को मन ही मन चाहने लगे और जब वोटिंग की कतार में खड़े हों तो न चाहते हुए भी उनका हाथ कमल के सामने ठप्‍पा लगाने के लिए मजबूर न हो।

हर मनुष्‍य के मन में एक गहरी लालसा दबी पड़ी होती है, ठीक ऐसे ही वोटर के मन में भी एक ऐसी ‘अनभिज्ञ’ इच्‍छा होती है, जिसे खंगालकर उसकी पड़ताल राहुल गांधी नहीं कर पा रहे हैं। संभवत: मोदी भक्‍त या प्रो-बीजेपी वोटर्स राहुल गांधी को वोट देने का पाप अपने सिर नहीं लेना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि यह पाप करने का मौका उन्‍हें राहुल गांधी खुद दें, किंतु राहुल की तरफ से वो फिसलन नहीं बन पा रही है, जिसका इस्‍तेमाल प्रो-बीजेपी वोटर्स अपने और अपने बच्‍चों के फायदे के लिए कर सकें। इस पर भी राहुल गांधी सरकार के समर्थन में पोस्‍ट करने वाले लोगों को ‘अंधभक्‍त’ कहकर पहले से ही अपने लिए वोटर्स के तौर पर खारिज कर देते हैं। वे यह सीख ही नहीं पा रहे हैं कि जिस सच्‍चाई के साथ मंच पर ग्राफिक्‍स के जरिए वे एजुकेशन सिस्‍टम के फैल्‍योर, देश में बढ़ती बेराजगारी, नीट घोटाला, व्‍यापम स्‍कैम, स्‍कॉलरशिप की दिक्‍कतें, होस्‍टल की परेशानियां, बंद होते सरकारी स्‍कूल, विभागों में नियुक्‍तियां, नौकरी में भर्तियां और यूनिवर्सिटियों में भेदभाव के आकड़ें दिखा रहे हैं, वे बदलाव लाने के लिए काफी हैं। ये मुद्दें आम लोगों की नब्‍ज दबाने के लिए पर्याप्‍त हैं, लेकिन इनसे प्रभावित जनता का भरोसा जीतने की बजाए उन्‍हें ‘अंधभक्‍त’ कहकर उन्‍हें पहले से ही अपने से दूर कर रहे हैं, इस बात को पुख्‍ता मानते हुए कि ये अंधभक्‍त हैं तो कभी कांग्रेस को वोट नहीं देंगे। कभी बीजेपी समर्थकों ने भी तो कांग्रेस को वोट दिया होगा।

राहुल गांधी ये क्‍यों सोचते हैं कि जो अंधभक्‍त हैं, उनके बच्‍चे नीट की तैयारी नहीं कर रहे होंगे, आईआईटी के लिए नहीं जा रहे होंगे या किसी यूनिवर्सिटी में उनके साथ भेदभाव नहीं हुआ होगा, या ऐसे लोगों के बच्‍चों को किसी संस्‍थान में एडमिशन लेने या हॉस्‍टल में किसी तरह की दिक्‍कत नहीं हो रही होगी?

जब राहुल गांधी ऐसे मंच को गैर-राजनीतिक बताकर सिर्फ छात्रों की बात करते हैं तो उन्‍हें अंधभक्‍त जैसे राजनीतिक और दोयम दर्जे के शब्‍दों के इस्‍तेमाल से बचना चाहिए, तभी वो ऐसे परिजनों के दिलों पर भी दस्‍तक दे सकेंगे, जो अभी इस वक्‍त कहीं न कहीं वर्तमान सरकार से इत्‍तेफाक तो रखते हैं, लेकिन बेहतर भविष्‍य के लिए भी उम्‍मीदमंद भी हैं।

यह ठीक है कि राहुल गांधी के नाम पर इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ में करीब एक लाख से ज्‍यादा लोग पहुंच थे। जिस इंदौर में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं जीता, उस शहर में इतने बड़े जनसैलाब की उम्‍मीद कांग्रेस को भी नहीं थी। यह जरूर है कि जगह की अनुमति देने के नाम पर बीजेपी ने अड़ंगे लगाकर जो खेल खेला उससे कांग्रेस को बहुत हद तक फायदा हुआ, लेकिन आयोजन स्‍थल पर जो दृश्‍य था, उसका पूरा श्रेय सिर्फ बीजेपी को ही नहीं जाता, इस भीड़ के पीछे राहुल गांधी एक बड़ी वजह है, क्‍योंकि वे जेन-जी या युवाओं से बेहद आसानी से जुड़ जाते हैं, युवा उनके आसपास बेहद कंफर्ट महसूस करते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा भारत जोड़ो यात्रा के दौरान देखा गया था।

अब सवाल यह नहीं है कि बेहद विपरीत परिस्‍थितयों में भी राहुल की सभा में लाखों लोग उमड़ पड़े, सवाल यह है कि जब राहुल को देखने-सुनने के लिए इतनी संख्‍या में युवा पहुंच रहे हैं ये भीड़ वोटर्स में तब्‍दील क्‍यों नहीं होती। यहां तक तो राहुल ठीक ठीक पहुंच गए हैं, अब उन्‍हें इस ‘क्‍यों’ के आगे सोचना चाहिए।

8 साल की IPS सेवा के बाद कॉर्पोरेट की दुनिया में कदम, राजन सिंह ने ऐसे रची सफलता की नई कहानी!

एक नौकरी से शुरू हुआ सफर, जिसने राजन सिंह को पहुंचाया अलग-अलग करियर तक

राजन सिंह का करियर किसी एक तय रास्ते पर नहीं चला। IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस का रास्ता चुना और IPS में शामिल हुए। करीब आठ साल पुलिस सेवा में रहने के बाद उन्होंने MBA के लिए अमेरिका का रुख किया। इसके बाद कंसल्टिंग, प्राइवेट इक्विटी और फिर अपना बिजनेस शुरू करने तक उनका सफर पहुंचा। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना करियर बदला और हर नए पड़ाव पर एक अलग तरह का अनुभव हासिल किया।

IIT के बाद चुनी पुलिस की राह

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजन सिंह ने सामान्य इंजीनियरिंग करियर में जाने के बजाय सिविल सेवा परीक्षा दी। सितंबर 1997 में उन्होंने IPS जॉइन किया और केरल के करुणागप्पल्ली में ASP के तौर पर पहली पोस्टिंग मिली। कुछ ही सालों में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं और 2001 तक वह तिरुवनंतपुरम के पुलिस कमिश्नर बन गए। उस समय वह इस पद पर पहुंचने वाले कम उम्र के अधिकारियों में शामिल थे।

पुलिस सेवा छोड़कर पहुंचे Wharton

2004 में पुलिस कमिश्नर रहते हुए उनके करियर ने एक नया मोड़ लिया। एक पुलिस ऑपरेशन के दौरान उन्हें अपने साथी IPS अधिकारी के Wharton MBA में एडमिशन की जानकारी मिली। इस घटना ने उन्हें अपने आगे के करियर के बारे में सोचने पर मजबूर किया। करीब आठ साल पुलिस सेवा में बिताने के बाद उन्होंने जुलाई 2005 में IPS छोड़ दिया और Wharton के MBA प्रोग्राम में दाखिला लिया। 2007 में MBA पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में McKinsey & Company के साथ कंसल्टेंट के तौर पर काम शुरू किया।

कंसल्टिंग के बाद इन्वेस्टमेंट की दुनिया

McKinsey में काम करते हुए राजन ने इंश्योरेंस, फार्मा, बायोटेक्नोलॉजी और बैंकिंग जैसे अलग-अलग सेक्टर की कंपनियों के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने प्राइवेट इक्विटी फर्म New Silk Route का रुख किया। यहां उन्हें कंपनियों और कारोबार को एक इन्वेस्टर की नजर से समझने का मौका मिला। इसी दौरान उन्होंने यह भी करीब से देखा कि कोई व्यक्ति सुरक्षित प्रोफेशनल करियर चुनने के बजाय अपना नया बिजनेस शुरू करने का जोखिम क्यों लेता है।

पहला स्टार्टअप नहीं चला, फिर भी नहीं रुके

2012 में राजन ने Course Brew नाम से ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह उनका एंटरप्रेन्योर के तौर पर शुरुआती बड़ा प्रयोग था, लेकिन यह बिजनेस ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। इसके बाद उन्होंने दोबारा कोशिश की और ConceptOwl शुरू किया। इसका मकसद छोटे शहरों के छात्रों को अच्छी साइंस और मैथ्स की पढ़ाई उनके अपने शहरों के करीब उपलब्ध कराना था। कंपनी ने ऑनलाइन पढ़ाई के साथ क्लासरूम प्रोग्राम पर भी काम किया। एक समय शिक्षकों की कमी हुई तो राजन ने खुद फिजिक्स पढ़ाना शुरू कर दिया। कंपनी ने आगे चलकर निवेश भी जुटाया और एजुकेशन सेक्टर में अपना मॉडल आगे बढ़ाया।

ConceptOwl से HabitStrong तक पहुंचा सफर

कोरोना महामारी के दौरान राजन और उनकी टीम ने रूटीन, आदतों और प्रोडक्टिविटी से जुड़े कार्यक्रमों पर काम करना शुरू किया। इसी प्रयोग से HabitStrong का आइडिया सामने आया। शुरुआत सुबह जल्दी उठने वाले एक साधारण YouTube प्रोग्राम से हुई, जिसे करीब 100 दिनों तक आजमाया गया। लोगों से मिले अनुभवों के बाद इसे एक स्ट्रक्चर्ड प्रोग्राम का रूप दिया गया। 2020 में शुरू हुए HabitStrong का फोकस बेहतर रूटीन बनाने, कंसंट्रेशन बढ़ाने और डिजिटल डिस्ट्रक्शन कम करने जैसी चीजों पर रहा। इस तरह उनका सफर शिक्षा से आगे बढ़कर हैबिट्स और प्रोडक्टिविटी के क्षेत्र तक पहुंच गया।

राजन सिंह की कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया, बल्कि यह है कि हर बदलाव के बाद उन्होंने खुद को नए काम के लिए तैयार किया। इंजीनियरिंग से पुलिस सेवा, फिर MBA, कंसल्टिंग, निवेश और आखिर में स्टार्टअप तक का यह सफर दिखाता है कि करियर हमेशा एक ही दिशा में आगे बढ़े, यह जरूरी नहीं। कई बार अलग-अलग अनुभव मिलकर आगे के काम के लिए नई सोच और नए मौके तैयार करते हैं।

Elevate Campuses IPO: ₹2100 करोड़ का इश्यू 23 सितंबर से, ₹343-₹362 है प्राइस बैंड; ग्रे मार्केट में चढ़ने लगा शेयर

एलिवेट कैंपसेस का ₹2,100 करोड़ का IPO 23 सितंबर से खुलने वाला है। इसमें 5.80 करोड़ नए शेयर जारी होंगे। ऑफर फॉर सेल नहीं होगा। प्राइस बैंड ₹343-₹362 प्रति शेयर है। लॉट साइज 41 शेयर है। इश्यू की क्लोजिंग 25 सितंबर को होने वाली है। इसके बाद अलॉटमेंट 28 सितंबर को फाइनल होगा। कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 30 सितंबर को लिस्ट हो सकते हैं। एंकर निवेशक 22 सितंबर को बोली लगा सकेंगे। कंपनी में हिल हाउस कैपिटल का भी पैसा लगा हुआ है।

IPO के लिए जेएम फाइनेंशियल, IIFL कैपिटल सर्विसेज और मॉर्गन स्टेनली इंडिया, बुक रनिंग लीड मैनेजर हैं। रजिस्ट्रार केफिन टेक्नोलोजीस है। पब्लिक इश्यू में 75 प्रतिशत हिस्सा क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स के लिए, 10 प्रतिशत हिस्सा रिटेल इनवेस्टर्स के लिए और 15 प्रतिशत हिस्सा नॉन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स के लिए रिजर्व है।

क्या करती है Elevate Campuses

एलिवेट कैंपसेस लिमिटेड एक एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी है। यह हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स (HEIs) के कैंपस में छात्रों के लिए हॉस्टल और रहने की सुविधाएं उपलब्ध कराती है। कंपनी इन आवासीय सुविधाओं की मालिक होने के साथ-साथ उनका संचालन और प्रबंधन भी करती है। इसके अलावा, कंपनी K-12 स्कूलों की संपत्तियों का भी मालिकाना हक रखती है। कंपनी अपने स्टूडेंट अकोमोडेशन बिजनेस को ‘Good Host Spaces’ और ‘ScholarZ’ ब्रांड्स के तहत चलाती है।

31 मार्च, 2026 तक, कंपनी के प्री-एक्वीजीशन ग्रुप की स्टूडेंट अकोमोडेशन क्षमता भारत के 15 शहरों और यूनाइटेड अरब अमीरात के एक शहर में कुल 80,255 स्टूडेंट्स की थी। कंपनी जो ऑपरेशनल सर्विसेज देती है उनमें डील सोर्सिंग, साइट चुनना, डेवलपमेंट, एसेट खरीदना, एसेट को नए सिरे से तैयार करना (रीपोज़िशनिंग) और कम्युनिटी एंगेजमेंट शामिल हैं। यह कम्युनिटी और कैंपस टेक्नोलॉजी सर्विसेज भी देती है, जिसमें HEIs और कम्युनिटी इवेंट्स की मीडिया कवरेज शामिल है।

Varmora Granito IPO: आ रहा है ₹708 करोड़ का एक और इश्यू, रहेंगे ₹320 करोड़ के नए शेयर

कंपनी की वित्तीय सेहत

कंपनी का वित्त वर्ष 2025-26 में रेवेन्यू 53 प्रतिशत बढ़कर ₹603.39 करोड़ रहा। शुद्ध मुनाफा 249 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ ₹173.76 करोड़ दर्ज किया गया। इस बीच कंपनी पर ₹4,120.53 करोड़ की उधारी थी। वित्त वर्ष 2025 में एलिवेट कैंपसेस का रेवेन्यू ₹394.13 करोड़ और शुद्ध मुनाफा ₹49.74 करोड़ रहा।

कंपनी अपने IPO से होने वाली कमाई का इस्तेमाल K-12 एंटिटीज और कैंपसेस की खरीद के पेमेंट के लिए, अपना व सब्सिडियरीज का कर्ज और पेनल्टी चुकाने के लिए, पहले से न पता अधिग्रहणों व अन्य पहलों के जरिए इनऑर्गेनिक ग्रोथ की फंडिंग के लिए और आम कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए करेगी। ग्रे मार्केट में एलिवेट कैंपसेस का शेयर 4.14 प्रतिशत प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है। ग्रे मार्केट एक अनऑथराइज्ड मार्केट है, जहां​ किसी कंपनी के शेयर उसकी लिस्टिंग तक ट्रेड करते हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

8वें वेतन आयोग में 3.25 फिटमेंट फैक्टर और Level 10 की डिमांड, समझिए सरकारी कर्मचारियों की सैलरी कितनी बढ़ सकती है

आठवें वेतन आयोग लगातार एंप्लॉयीज संगठनों, एंप्लॉयीज यूनियंस और इंस्टीट्यूशंस के प्रतिनिधियों से मिलकर उनका राय जानने की कोशिश कर रहा है। चंडीगढ़ में आयोग की दो दिन की मीटिंग 18 सितंबर को खत्म हो गई। आयोग अब 7 और 8 अक्तूबर को बेंगलुरु में मामले से जुड़े पक्षों की राय जानने की कोशिश करेगा।

चंडीगढ़ में आयोग की बैठक के बाद नर्सेज वेल्फेयर एसोसिएशंस (NWA) और पोस्ट ग्रेचुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) ने बताया कि उन्हें भरोसा है कि आयोग उनकी मांगें मान लेगा। नर्सों के एसोसिएशंस ऑल इंडिया एनपीएस एंप्लॉयीज फेडरेशंस (AINEF) से जुड़े हैं।

AINEF से जुड़े नर्सों के एसोसिएशंस का मानना है कि आयोग अगर उनकी मांगें मान लेता है तो इससे केंद्र सरकार के हॉस्पिटल्स, पीजीआई, ईएसआईसी हॉस्पिटल्स, एम्स और दूसरे हेल्थकेयर इंस्टीट्यूशंस के 3 लाख से ज्यादा नर्सों को फायदा होगा। NWA ने कहा, “8वें वेतन आयोग और नर्सेज वेल्फेयर एसोसिएशंस की प्रतिनिधियों के बीच काफी अहम और फायदेमंद बातचीत आज पूरी हो गई।”

NWA की दलील है कि नर्सिंग अधिकारियों के लिए लेवल-10 एंट्री-लेवल पे की डिमांड जीएनएम से बीएससी नर्सिंग की अपग्रेडेड एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के मुताबिक है। यह मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेल्फेयर की उस सिफारिश के भी मुताबिक है, जिसमें नर्सिंग अधिकारियों को मिलिट्री नर्सिंग सर्विस के बराबर रखने की बात कही गई है।

उनकी मांगों में सभी नर्सिंग अधिकारियों के लिए डेडिकेटेड नाइट ड्यूटी अलाउंस और R1H1 मैट्रिक्स के तहत रिस्क एंड हार्डशिप अलाउन्स की मांगें शामिल हैं। उनकी दलील है कि नर्स का काम काफी चैलेंजिंग है। उन्होंने हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए कंप्रिहेंसिव टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी की भी मांग की है।

एसोसिएशन ने हाउस रेंट अलाउन्स (HRA) और ट्रांसपोर्ट अलाउन्स (TA) के कैलकुलेशन के मकसद से चंडीगढ़ को A1 सिटी की कैटेगरी में शामिल करने की भी मांग की है। इसके अलावा एसोसिएशन ने नर्सिंग अलाउन्स, ड्रेस अलाउन्स और स्पेशल अलाउन्स की भी मांग की है। एसोशिएशन ओल्ड पेंशन स्कीम की भी वापसी चाहता है।

PGIMR के नर्सों ने 3.25 फिटमेंट फैक्टर की भी मांग की है। सातवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.57 था। एसोसिएशन का कहना है कि बढ़ती लिविंग कॉस्ट, हाउसिंग, हेल्थकेयर और एजुकेशन से जुड़े खर्चों को देखते हुए ज्यादा फिटमेंट फैक्टर जरूरी है। उनकी मांग एनुअल इंक्रीमेंट को 3 फीसदी से बढ़ाकर 5 फीसदी करने की भी है। उनकी दलील है कि अभी जितनी इंक्रीमेंट होती है, उससे बढ़ते खर्च से निपटना मुश्किल है।

Lust Stories 3 Movie Review: चार बड़े फिल्ममेकर, चाहत को देखने के चार बिल्कुल अलग नजरिए

Lust Stories 3 Movie Review: एंथोलॉजी बनाना आसान नहीं होता। दर्शक अभी एक कहानी में पूरी तरह डूब भी नहीं पाता कि उसे दूसरी दुनिया में पहुंचना पड़ता है। लेकिन’लस्ट स्टोरी 3′ इस फॉर्मेट की इसी खासियत को अपनी ताकत बना लेती है। चारों कहानियों को एक जैसा बनाने की कोशिश करने के बजाय हर निर्देशक को अपनी आवाज और अपना अंदाज रखने की पूरी जगह दी गई है।

विक्रमादित्य मोटवाने की कहानी चारों में सबसे अलग है। राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक शर्मा एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं, जो कोरियन फिक्शन से प्रभावित अंदाज में पति-पत्नी के पार्टनर बदलने जैसे विषय को एक्सप्लोर करती है। विषय अपने आप में असहज है, लेकिन फिल्म इस असहजता से भागती नहीं बल्कि इसी को कहानी का हिस्सा बना लेती है।

किरण राव गुरफतेह पीरजादा और सना थंपी के साथ माहौल को पूरी तरह बदल देती हैं। उनकी कहानी में हल्की-फुल्की ठगी वाली थ्रिलर का अंदाज है, जिसमें ड्रग्स, पैसे और इतने ट्विस्ट हैं कि मनोरंजन बना रहता है। जब आपको लगता है कि अब कहानी समझ आ गई है, तभी एक मजेदार फिल्मी सरप्राइज सामने आ जाता है।

शकुन बत्रा का सेगमेंट रिश्तों पर बनी ड्रामा कहानी के लिहाज से शायद सबसे ज्यादा जाना-पहचाना महसूस होता है। अली फजल और राधिका मदान एक ऐसे रिश्ते को सामने लाते हैं, जो चाहत, थेरेपी, परिवार की उम्मीदों और अधूरी भावनाओं के बोझ तले दबा हुआ है। कहानी शारीरिक रिश्ते से आगे जाकर यह समझने की कोशिश करती है कि जब भावनात्मक उलझनें हावी होने लगती हैं तो क्या होता है।

विशाल भारद्वाज की कहानी एक खूबसूरत बदलाव लेकर आती है। अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ और गजराज राव हमें 1987 में ले जाते हैं, जहां सेक्स एजुकेशन जैसे विषय को उस दौर की पृष्ठभूमि में पेश किया गया है। कहानी का रिदम बाकी से अलग है और नक्स वोमिका व बेलाडोना जैसे क्वर्की संदर्भ इसे और खास बनाते हैं। चारों कहानियां एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करतीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि चाहत को समझने और देखने के कितने अलग-अलग तरीके हो सकते हैं।

लस्ट स्टोरीज 3 यह साबित करती है कि किसी फ्रेंचाइज़ी को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए खुद को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं होती। यह नजदीकियों और रिश्तों को एक्सप्लोर करती रहती है, लेकिन चारों फिल्ममेकरों को चार बिल्कुल अलग कहानियां कहने की आजादी देती है। दो सफल अध्यायों के बाद भी यह फॉर्मेट फ्रेश महसूस होता है और अपनी अलग पहचान बनाए रखता है।

UPI MDR Charge: क्या OTT सब्सक्रिप्शन, SIP का ऑटोपे महंगा होगा? शेयर मार्केट, इंश्योरेंस से पेट्रोल तक… कितना चार्ज लगेगा? समझिए सभी नियम

UPI MDR Charge: UPI पेमेंट पर हर जगह एक जैसा MDR नहीं लगेगा। अलग-अलग सेक्टर के लिए अलग नियम बनाए गए हैं। कैपिटल मार्केट, इंश्योरेंस, पेट्रोल पंप, सरकारी बिल और एजुकेशन पेमेंट के लिए अलग MDR स्ट्रक्चर है।

इनमें कई जगह ₹2,000 तक के पेमेंट पर MDR नहीं है। वहीं बड़े पेमेंट के लिए फ्लैट फीस या अधिकतम सीमा वाला सिस्टम रखा गया है। NCPI ने बताया है कि किस सेक्टर में कितना MDR रहेगा।

ऑटोपे वाले UPI पेमेंट पर चार्ज नहीं लगेगा

UPI के चुनिंदा पेमेंट पर MDR लागू होने से उन लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं, जो ऑटोपे से पेमेंट करते हैं। इनमें Netflix, Amazon Prime जैसे OTT सब्सक्रिप्शन शामिल हैं। बिजली-पानी के बिल और म्यूचुअल फंड SIP भी इसी तरह ऑटोमैटिक कटते हैं।

NPCI ने अपने FAQ में यह बात साफ की है कि UPI ऑटोपे पर तय MDR चार्ज नहीं लगेगा।

कैपिटल मार्केट पेमेंट पर कितना MDR?

कैपिटल मार्केट से जुड़े UPI पेमेंट पर 0.02% MDR लगेगा। हालांकि, इसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन है।

यह नियम रेगुलेटेड कैपिटल मार्केट संस्थाओं से जुड़े पेमेंट पर लागू होगा। इसमें एसेट मैनेजमेंट कंपनियां यानी म्यूचुअल फंड की AMC, SEBI रजिस्टर्ड स्टॉकब्रोकर, सिक्योरिटीज डीलर और इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म शामिल हैं। UPI से डेट इंस्ट्रूमेंट खरीदने, म्यूचुअल फंड में निवेश करने और ब्रोकर वॉलेट में पैसा डालने जैसे पेमेंट भी इसमें शामिल हैं।

इंश्योरेंस प्रीमियम पर क्या चार्ज लगेगा?

इंश्योरेंस प्रीमियम के लिए भी अलग MDR रखा गया है। ₹2,000 से ज्यादा के प्रीमियम पेमेंट पर 0.04% या ₹5 का फ्लैट MDR लागू होगा।

यानी इस कैटेगरी में ज्यादा रकम के पेमेंट पर सामान्य तरीके से MDR बढ़ता नहीं जाएगा। बड़े प्रीमियम का पेमेंट करने वालों के लिए यह व्यवस्था ज्यादा काम की हो सकती है। खास बात यह है कि साल में एक या दो बार प्रीमियम भरने वाले ग्राहकों के बड़े पेमेंट पर ज्यादा प्रतिशत के हिसाब से फीस नहीं बढ़ेगी।

पेट्रोल पंप पर UPI पेमेंट का नियम

पेट्रोल पंप पर ₹2,000 से ज्यादा के पेमेंट पर ₹5 का फ्लैट MDR रखा गया है। यानी पेट्रोल की रकम बढ़ने के साथ MDR भी उसी अनुपात में नहीं बढ़ेगा।

वहीं ₹2,000 तक के फ्यूल पेमेंट पर MDR शून्य रहेगा। इसका मतलब छोटे पेट्रोल-डीजल पेमेंट पर MDR नहीं लगेगा।

बिजली-पानी के बिल पर कितना MDR?

बिजली, पानी और पाइप्ड नेचुरल गैस जैसे यूटिलिटी पेमेंट के लिए भी अलग व्यवस्था है। ₹2,000 से ज्यादा के यूटिलिटी पेमेंट पर ₹5 प्रति ट्रांजैक्शन का MDR रखा गया है। ₹2,000 तक के पेमेंट पर MDR नहीं लगेगा।

इसमें बिजली के बिल, नगर निकाय के पानी के शुल्क और पाइप्ड नेचुरल गैस के पेमेंट शामिल हैं। इस व्यवस्था का मकसद सरकारी बोर्ड और नगर निकायों के लिए डिजिटल बिल कलेक्शन को सस्ता रखना है।

स्कूल-कॉलेज की फीस पर क्या नियम है?

एजुकेशन पेमेंट को भी अलग कैटेगरी में रखा गया है। इसमें स्कूल की फीस, यूनिवर्सिटी की टर्म फीस और संस्थानों की एंट्रेंस एग्जाम फीस शामिल हैं। ₹2,000 तक के एजुकेशन पेमेंट पर MDR पूरी तरह फ्री रहेगा। ₹2,000 से ज्यादा के पेमेंट के लिए फ्लैट फीस या कैप वाली व्यवस्था का फायदा मिलेगा।

इससे बड़े एजुकेशन पेमेंट पर ज्यादा प्रतिशत के हिसाब से फीस लगने का बोझ कम होगा। स्कूल, कॉलेज और स्टूडेंट्स बड़ी फीस का पेमेंट भी डिजिटल तरीके से कर सकेंगे।

अलग-अलग सेक्टर के लिए अलग MDR क्यों?

NCPI का कहना है कि UPI पर हर तरह के पेमेंट का पैटर्न एक जैसा नहीं है। कहीं छोटे-छोटे पेमेंट होते हैं। वहीं कैपिटल मार्केट, इंश्योरेंस और एजुकेशन में एक बार में बड़ी रकम का पेमेंट हो सकता है।

इसी वजह से इन सेक्टर के लिए अलग MDR स्ट्रक्चर रखा गया है। कहीं प्रतिशत के हिसाब से MDR है। वहीं कुछ जगह फ्लैट फीस या अधिकतम सीमा तय की गई है। इससे बड़े पेमेंट पर MDR का खर्च नियंत्रित रखने की कोशिश की गई है।

UPI पर ट्रांजेक्शन चार्ज को लेकर दुविधा में हैं? तो यहां जानें अपने हर सवाल का पूरा जवाब

CBSE Teacher Recruitment: केवीएस-एनवीएस टियर 2 शिक्षक भर्ती रिजल्ट हुआ घोषित, जानें कैसे मिलेगी मार्कशीट और क्या होगा अगला स्टेप

CBSE Teacher Recruitment: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) और नवोदय विद्यालय समिति (NVS) में भर्ती के लिए प्राइमरी टीचर्स (PRT) टियर 2 के रिजल्ट घोषित कर दिए हैं। इस परीक्षा में शामिल उम्मीदवार आवेदन पोर्टल पर अपने क्रेडेंशियल के साथ लॉग इन करके आधिकारिक वेबसाइट पर अपना रिजल्ट या शॉर्टलिस्टिंग स्टेटस देख सकते हैं।

सीबीएसई टीचर भर्ती 2026: रिजल्ट के बाद आगे क्या

सीबीएसई टीचर भर्ती 2026 के तहत केवीएस-एनवीएस टियर 2 परीक्षा का रिजल्ट घोषित होने के बाद आगे की प्रक्रिया के बारे में बोर्ड ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में जानकारी दी है। बोर्ड ने कहा कि जिन पदों के लिए इंटरव्यू चयन प्रक्रिया का हिस्सा है, उनके लिए इस चरण पर घोषित किया गया रिजल्ट इंटरव्यू के लिए कैंडिडेट का शॉर्टलिस्टिंग स्टेटस दिखाता है। वही, जिन पदों के लिए चयन प्रक्रिया में इंटरव्यू शामिल नहीं है, उनके लिए सीबीएसई ने रिजल्ट की घोषणा के साथ टियर 2 परीक्षा के अंक संबंधित कैंडिडेट लॉगिन में उपलब्ध करा दिए हैं।

इंटरव्यू के बाद अगले 15 दिनों में आएगी मार्कशीट

सीबीएसई शिक्षक भर्ती 2026 केवीएस-एनवीएस टियर 2 के तहत कई पदों के लिए चयन प्रक्रिया अभी जारी है। इसलिए आधिकारिक गाइडलाइंस के अनुसार, इंटरव्यू प्रक्रिया पूरी होने के बाद, फाइनल रिजल्ट के पब्लिकेशन की तारीख से 15 दिनों के अंदर परीक्षार्थियों को मार्कशीट उपलब्ध करा दी जाएंगी।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, क्योंकि सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन धीरे-धीरे रिजल्ट जारी कर रहा है, इसलिए बाकी पदों के लिए स्कोरकार्ड भी फाइनल किए जा रहे हैं और उन्हें धीरे-धीरे जारी किया जाएगा।

उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे भर्ती प्रक्रिया से जुड़े और अपडेट के लिए नियमित सीबीएसई, केवीएस और एनवीएस की आधिकारिक वेबसाइट और अपने आवेदन लॉगिन पर नजर बनाए रखें।

सीबीएसई शिक्षक भर्ती 2026: स्कोरकार्ड डाउनलोड करने के स्टेप्स

परीक्षार्थी आधिकारिक पोर्टल पर केवीएस, एनवीएस रिजल्ट 2026 डाउनलोड करने के लिए यहां बताए गए स्टेप्स फॉलो कर सकते हैं:

  • केवीएस की आधिकारिक वेबसाइट kvsangathan.nic.in पर जाएं।
  • होमपेज पर केवीएस-एनवीएस टियर 2 भर्ती रिजल्ट 2026 से जुड़ा लिंक ढूंढें।
  • रिजल्ट या कैंडिडेट लॉगिन पेज खोलें।
  • रजिस्ट्रेशन नंबर और पासवर्ड के साथ ज़रूरी लॉगिन क्रेडेंशियल डालें।
  • सबमिट बटन पर क्लिक करें।
  • केवीएस-एनवीएस टियर 2 रिजल्ट या शॉर्टलिस्टिंग स्टेटस स्क्रीन पर दिखाई देगा।
  • रिजल्ट डाउनलोड करें और भविष्य के लिए एक कॉपी रख लें।

CTET Exam Date 2026 Out: 12 और 13 दिसंबर को होगी सीटेट 22वें एडिशन की परीक्षा, जानें कब जारी होंगे एडमिट कार्ड और सिटी स्लिप

अमेरिका में अच्छी कमाई के लिए नामचीन डिग्री जरूरी नहीं:पिछड़े कॉलेजों के ग्रेजुएट भी हार्वर्ड जैसा कमा रहे, सैलरी औसतन 95 लाख सालाना

अमेरिका की फोर्ब्स टॉप-500 कॉलेज रैंकिंग के मुताबिक सालाना 95 लाख रुपए से ज्यादा कमाई के लिए किसी ‘बड़े’ या ‘नामचीन’ कॉलेज की डिग्री जरूरी नहीं है। रैंकिंग में सबसे नीचे वाले कॉलेजों के ग्रेजुएट्स भी डिग्री लेने के 10 साल बाद औसतन 95 लाख रुपए से ज्यादा कमा रहे हैं। फोर्ब्स की लिस्ट में एमआईटी, प्रिंसटन और हार्वर्ड सबसे ऊपर हैं। इन कॉलेजों से पढ़ने वालों की 10 साल बाद कमाई 1.15 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई है। वहीं, लिस्ट में 500वें नंबर पर ओहायो के ग्रामीण इलाके का निजी मेरिएटा कॉलेज है। यहां से पढ़ने वालों की 10 साल बाद औसत कमाई करीब 1 करोड़ रुपए है। रिपोर्ट के मुताबिक लिस्ट में लगभग हर कॉलेज के ग्रेजुएट्स की औसत कमाई 86 लाख रुपए से ज्यादा है। यानी कम मशहूर कॉलेजों से पढ़ने वालों की कमाई भी काफी अच्छी हो सकती है। कॉलेज चुनने में कमाई को आधार न बनाएं रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉलेज चुनते समय सिर्फ कमाई को आधार नहीं बनाना चाहिए। ऊंची रैंक वाले कॉलेजों में पुराने छात्रों का मजबूत नेटवर्क और कॉलेज के नाम की पहचान जैसे फायदे मिलते हैं। पर ये फायदे 10 साल बाद की कमाई के आंकड़ों में सीधे नहीं दिखते। अमेरिका में बैचलर डिग्री पर औसतन 33 लाख कर्ज एजुकेशन डेटा इनिशिएटिव के मुताबिक पिछले 20 साल में कॉलेज की औसत लागत दोगुने से ज्यादा हो गई है। इसी वजह से अब एक बैचलर डिग्री के लिए औसतन 33 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज लेना पड़ रहा है। डिग्री सफलता की गारंटी नहीं: सीईओ कई बड़े कारोबारी भी मानते हैं कि डिग्री सफलता की पक्की गारंटी नहीं है। मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा कि कॉलेज लोगों से जुड़ने और रिश्ते बनाने में मदद करता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कॉलेज आज की नौकरियों के लिए युवाओं को तैयार कर रहा है?

कनाडा में बिना स्टडी वीजा के पढ़ सकेंगे पंजाबी:नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं, पढ़ाई-कमाई के साथ PR में भी मिलेगा फायदा

कनाडा में वर्क परमिट पर काम कर रहे विदेशी युवक-युवतियां अब 6 महीने तक बिना स्टडी परमिट के पढ़ाई कर सकेंगे। इमिग्रेशन, रिफ्यूजीज एंड सिटिजनशिप कनाडा (IRCC) ने 9 सितंबर 2026 को इस नई अस्थायी पॉलिसी की घोषणा की है। इसका मकसद कनाडा में पहले से मौजूद टेंपरेरी वर्कर्स को जरूरी स्किल, लाइसेंसिंग और ट्रेनिंग हासिल करने का मौका देना है, ताकि वे लेबर की जरूरत वाले क्षेत्रों में ज्यादा योगदान दे सकें। इस फैसले से कनाडा में वर्क परमिट पर काम कर रहे करीब 3 लाख भारतीयों को फायदा हो सकता है। इनमें करीब डेढ़ लाख पंजाबी हैं। वहीं इसके जरिए कनाडा में परमानेंट सिटीजनशिप यानी PR में भी मदद मिलेगी। कनाडा की नई पॉलिसी क्या है?
जवाब: नई पॉलिसी के तहत पात्र वर्क परमिट होल्डर्स 6 महीने तक या उनके वर्क परमिट की वैधता खत्म होने तक जो भी पहले हो, वह बिना स्टडी परमिट पढ़ाई कर सकेंगे। इसका फायदा 6 महीने या उससे कम अवधि वाले शॉर्ट-टर्म लाइसेंसिंग, एजुकेशन और ट्रेनिंग प्रोग्राम में लिया जा सकेगा। IRCC के मुताबिक, इससे ऐसी पढ़ाई के लिए अलग स्टडी परमिट लेने की अतिरिक्त प्रक्रिया से राहत मिलेगी। युवा नौकरी के साथ पढ़ाई कर सकेंगे, जिससे आय जारी रहेगी और परिवार पर आर्थिक बोझ भी कम पड़ेगा। क्या इसमें हर तरह की पढ़ाई के लिए छूट है?
जवाब: नहीं, यह सुविधा फुल-टाइम स्टडी के लिए नहीं है। उसके लिए स्टडी परमिट की जरूरत बनी रहेगी। यानी नई पॉलिसी का फायदा मुख्य रूप से छोटी अवधि के उन कोर्स, ट्रेनिंग और लाइसेंसिंग प्रोग्राम में मिलेगा जो 6 महीने या उससे कम अवधि के हैं। इस पॉलिसी से किन नौकरी वालों को ज्यादा फायदा होगा?
जवाब: IRCC ने नई पॉलिसी में खास तौर पर ट्रेड्सपर्सन, नर्स और लैबोरेटरी टेक्नीशियन का उल्लेख किया है। इन क्षेत्रों में काम करने वाले योग्य वर्क परमिट होल्डर्स नौकरी जारी रखते हुए अपनी स्किल अपग्रेड कर सकेंगे। इससे हेल्थकेयर, होम बिल्डिंग और दूसरे जरूरी क्षेत्रों में कुशल वर्कफोर्स तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है। पहले ऐसे स्टडी परमिट के लिए अलग आवेदन, बैंक स्टेटमेंट, ऑफर लेटर और मेडिकल रिपोर्ट जमा करने पड़ते थे। प्रोसेसिंग में हफ्तों से महीनों का इंतजार लगता था। बीच में नौकरी प्रभावित होने का डर रहता था। अब ये सारी औपचारिकताएं खत्म हो गई हैं। क्या इसके लिए नौकरी छोड़नी पड़ेगी?
जवाब: नहीं, इस नई व्यवस्था का बड़ा फायदा यह है कि कामगारों को छोटी अवधि की ट्रेनिंग या लाइसेंसिंग के लिए अपनी मौजूदा नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं होगी। IRCC का कहना है कि यह सुविधा टेंपरेरी वर्कर्स को काम करते हुए इन-डिमांड स्किल हासिल करने में मदद करेगी। इससे वे सार्वजनिक सेवाओं, घरों के निर्माण और दूसरे जरूरी प्रोजेक्ट्स में ज्यादा प्रभावी ढंग से योगदान दे सकेंगे। पहले के मुकाबले ये कितना आसान है?
जवाब: पहले छोटी अवधि की पढ़ाई के लिए पात्रता के हिसाब से स्टडी परमिट की जरूरत पड़ सकती थी। नई पॉलिसी का उद्देश्य इस अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रिया को हटाना है। अब योग्य वर्क परमिट होल्डर्स को 6 महीने या उससे कम अवधि की पात्र पढ़ाई के लिए अलग स्टडी परमिट आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी। इससे आवेदन और प्रोसेसिंग की अतिरिक्त प्रक्रिया से समय बच सकता है। PR के लिए कैसे मदद मिल सकती है?
जवाब: नई पॉलिसी सीधे PR नहीं देती। हालांकि, कनाडा में पहले से मौजूद वर्कर्स को अपनी स्किल और योग्यता बढ़ाने का मौका मिलने से वे भविष्य में कनाडा के आर्थिक इमिग्रेशन और PR के लिए अपनी प्रोफाइल मजबूत कर सकते हैं। कनाडा सरकार की इमिग्रेशन नीति भी पहले से देश में मौजूद ऐसे लोगों को PR की ओर आगे बढ़ाने पर ध्यान दे रही है, जिनके पास जरूरी स्किल और अनुभव है। क्या इसके कोई अंक PR में जुड़ेंगे?
जवाब: 2026-2028 के इमिग्रेशन प्लान में सरकार ने 2026 और 2027 के दौरान 33,000 तक टेंपरेरी वर्कर्स को PR में ट्रांजिशन कराने की योजना भी बताई है। हालांकि, सिर्फ इस पॉलिसी के तहत कोई कोर्स करने से PR या एक्सप्रेस एंट्री के अतिरिक्त अंक अपने-आप नहीं मिलेंगे। PR के लिए संबंधित इमिग्रेशन प्रोग्राम की अलग पात्रता पूरी करनी होगी। क्या इससे PGWP का फायदा नहीं मिलेगा?
जवाब: इस सुविधा के तहत बिना स्टडी परमिट किए गए कोर्स के आधार पर पोस्ट ग्रेजुएशन वर्क परमिट (PGWP) का अधिकार नहीं मिलेगा। इसलिए इसे इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए PGWP हासिल करने का नया रास्ता नहीं माना जा सकता। इस पॉलिसी का फायदा कब से उठा सकते हैं?
जवाब: IRCC ने कहा है कि वह इस हफ्ते से पात्र वर्क परमिट होल्डर्स को सूचित करना शुरू करेगा कि वे नई व्यवस्था के तहत पढ़ाई कर सकते हैं। यह अस्थायी पॉलिसी 31 दिसंबर 2027 तक लागू रहेगी। क्या इस पॉलिसी के आधार पर कनाडा जा सकते हैं?
जवाब: IRCC ने साफ किया है कि यह पॉलिसी वर्कर्स को कनाडा आने के लिए कोई नया इमिग्रेशन या वर्क परमिट रास्ता नहीं देती। यह सुविधा उन टेंपरेरी वर्कर्स के लिए है जो पहले से कनाडा में हैं और वैध वर्क परमिट रखते हैं। सरकार का उद्देश्य मौजूदा वर्कफोर्स की क्षमता बढ़ाकर लेबर मार्केट की जरूरतों को पूरा करना है।