मोदी मंत्रिमंडल में वैकेंसी बढ़ रही है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कब अपनी सरकार में फेरबदल करेंगे इसका सस्पेंस बढ़ता जा रहा है। लेकिन जब भी संगठन में बदलाव हो रहा है या राज्यसभा के चुनाव हो रहे हैं तो सरकार में नई वैकेंसी बन जा रही है। तीन मंत्रियों के इस्तीफे हुए हैं, तीन मंत्री संगठन में गए हैं और दो मंत्रियों की राज्यसभा रिन्यू नहीं हुई है। इस तरह आठ वैकेंसी बन गई है। हालांकि इस वैकेंसी को भरने की जल्दी प्रधानमंत्री को नहीं दिख रही है। इस बार उत्तर प्रदेश की आठ सीटों के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया तो मोदी सरकार में दो और वैकेंसी बनने का रास्ता साफ हुआ। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को टिकट नहीं दी। हालांकि अभी दोनों का कार्यकाल समाप्त नहीं हुआ है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी छह महीने तक दोनों मंत्री बनी रह सकते हैं। लेकिन उसके बाद भी राज्यसभा या लोकसभा की कोई वैकेंसी नहीं है, जहां से इन दोनों को संसद पहुंचाया जाएगा। इसलिए इस्तीफा तो होना है। सिर्फ समय की बात है कि कब इस्तीफा होता है।

इससे पहले भाजपा ने संगठन में फेरबदल किया तो उससे भी वैकेंसी क्रिएट हुई। नितिन नबीन की टीम में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। वे दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। हालांकि जानकार सूत्रों का कहना है कि उनके लिए अपवाद बनाया जा सकता है। यानी वे सरकार और संगठन दोनों जगह रह सकते हैं। लेकिन यह छूट शायद हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी को नहीं मिले। कुछ समय पहले हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि यह किसी को समझ में नहीं आया कि वीरेंद्र सचदेवा को क्यों हटाया गया। राज्य में कोई चुनाव भी नहीं था। फिर भी एक पंजाबी को हटा कर दूसरा पंजाबी अध्यक्ष बनाया गया। मल्होत्रा सरकार में मंत्री बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में चुनाव था और सामाजिक समीकरण के हिसाब से जाट नेता भूपेंद्र सिंह को हटा कर पिछड़ी जाति से आने वाले पंकज चौधरी को अध्यक्ष बनाया गया। वे भी केंद्र में मंत्री बने हुए हैं।

इससे पहले अप्रैल में जब राज्यसभा के दोवार्षिक चुनाव हुए तब रिटायर हो रहे दो सदस्यों को दोबारा टिकट नहीं मिली। पंजाब के रवनीत सिंह बिट्टू राजस्थान से राज्यसभा गए थे। उनका कार्यकाल खत्म हुआ तो उनको पंजाब भेजा गया है। बताया जा रहा है कि वे वहां से विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह केरल के रहने वाले जॉर्ज कुरियन को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया था। लेकिन उनका भी कार्यकाल रिन्यू नहीं हुआ। बाद में दोनों ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। इस तरह तीन मंत्रियों को इस्तीफे हो चुके हैं। पीयूष गोयल, पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा संगठन में जिम्मेदारी निभा रहे हैं। और अब हरदीप सिंह पुरी व बीएल वर्मा का कार्यकाल रिन्यू नहीं हुआ है। इस तरह मोदी सरकार में आठ वैकेंसी बन गई है। अब अगर मोदी अपनी सरकार से किसी को नहीं भी हटाते हैं तो आठ से 10 लोगों को मंत्री बना सकते हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि अभी मंत्रिपरिषद में तुरंत बदलाव होता नहीं दिख रहा है। महिला  आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन के बारे में कोई फैसला होने के बाद ही मंत्रिमंडल का विस्तार होगा। ध्यान रहे सरकार ने अभी तक संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया है। कहा जा रहा है दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए बातचीत चल रही है।

अल्पसंख्यक मंत्री क्या कोई नहीं रहेगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के इकलौते सिख मंत्री हरदीप सिंह पुरी की सरकार से छुट्टी हो रही है। उनके राज्यसभा का कार्यकाल अगले महीने 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। भाजपा ने राज्य की अपने कोटे की आठ सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया तो उसमें पुरी का नाम नहीं आया। हालांकि वे 25 नवंबर के बाद भी छह महीने तक मंत्री बने रह सकते हैं। लेकिन उसके बाद उनको इस्तीफा देना होगा। ध्यान रहे पंजाब में फरवरी में विधानसभा के चुनाव हैं। तभी यह भी कहा जा रहा है कि शायद उसके बाद उनका इस्तीफा हो। गौरतलब है कि उनसे पहले रवनीत सिंह बिट्टू भी एक सिख मंत्री थे। लेकिन उनको भी राज्यसभा का दूसरा कार्यकाल नहीं मिला और उनको पंजाब में विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए भेजा गया है। सवाल है कि क्या अकाली दल से तालमेल होगा और सिख मंत्री की कमी हरसिमरत कौर बादल से पूरी होगी? य़ह देखने वाली बात होगी।

इस साल अप्रैल में राज्यसभा के दोवार्षिक चुनाव हुए थे तो जॉर्ज कुरियन की राज्यसभा रिन्यू नहीं हुई थी और उनको इस्तीफा देना पड़ा था। वे मोदी सरकार के इकलौते ईसाई मंत्री थे। केरल में भाजपा ने ईसाई वोट लुभाने की खूब कोशिश की थी लेकिन कामयाबी नहीं मिली। उसके बाद ही कुरियन हटाए गए थे। उनसे पहले कभी केजे अल्फोंस भी मंत्री थे। जहां तक मुस्लिम मंत्रियों की बात है तो पिछली सरकार में ही इकलौते मुस्लिम मंत्री की छुट्टी हो गई थी और उसके बाद किसी को नहीं बनाया गया। एमजे अकबर आखिरी मुस्लिम मंत्री थे। ‘मी टू’ विवाद में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। उससे पहले मुख्तार अब्बास नकवी मुस्लिम मंत्री थे। सो, अगर हरदीप पुरी के इस्तीफे के समय तक कोई सिख मंत्री नहीं बनता है तो मोदी सरकार में देश के तीन सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूहों मुस्लिम, ईसाई औऱ सिख का कोई मंत्री नहीं रहेगा। ध्यान रहे भारत सबसे बड़ी धार्मिक विविधता वाला देश है।

Stocks to Watch: RBI के ऐलान का इंतजार; इंट्रा-डे में 4 लिस्टिंग्स और Titan, Ola Electric और Apollo Tyres समेत 24 शेयर फोकस में

Stocks to Watch: अधिकतर एशियाई बाजारों से कमजोर रुझानों के बीच गिफ्ट निफ्टी से आज घरेलू स्टॉक मार्केट में लाल शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं। गिफ्ट निफ्टी फिलहाल 69.50 प्वाइंट्स यानी 0.31% की गिरावट के साथ 22,704.50 पर है। चूंकि आज आरबीआई की मौद्रिक नीतियों का ऐलान होना है और रेपो रेट (Repo Rate) पर फैसला सामने आएगा तो इसके चलते मार्केट में तेज उठा-पटक दिख सकती है। कई इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट से 50 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो सकता है।

एक कारोबारी दिन पहले 06 अक्टूबर को निफ्टी की वीकली एक्सपायरी के दिन सेंसेक्स 685.34 प्वाइंट्स यानी 0.95% की बढ़त के साथ 73,067.81 और निफ्टी भी 220.35 प्वाइंट्स यानी 0.98% की मजबूती के साथ 22,776.10 पर बंद हुआ था। अब आज इंडिविजुअल स्टॉक्स की बात करें तो अपनी खास कॉरपोरेट एक्टिविटीज के चलते कुछ स्टॉक्स में तेज हलचल दिख सकती है। यहां इन शेयरों के बारे में डिटेल्स दी जा रही है।

Stocks to Watch: आज इन स्टॉक्स पर फोकस

Asset Reconstruction Company India Q1 (Consolidated YoY)

जून 2026 तिमाही में सालाना आधार पर एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी का कंसालिडेटेड प्रॉफिट 14.6% बढ़कर ₹59.1 करोड़ और रेवेन्यू 115.4% उछलकर ₹234.7 करोड़ पर पहुंच गया।

Glass Wall Systems Q1 (Consolidated YoY)

जून 2026 तिमाही में सालाना आधार पर ग्लास वाल सिस्टम्स का कंसालिडेटेड प्रॉफिट 7.7% गिरकर ₹17.3 करोड़ पर आ गया लेकिन इसी दौरान रेवेन्यू 35.8% उछलकर ₹107.4 करोड़ पर पहुंच गया।

Kanohar Electricals Q1 (YoY)

जून 2026 तिमाही में सालाना आधार पर कनोहर इलेक्ट्रिकल्स का कंसालिडेटेड प्रॉफिट 140% बढ़कर ₹27.3 करोड़ और रेवेन्यू 103.5% उछलकर ₹137.1 करोड़ पर पहुंच गया।

Karamtara Engineering Q1 (Consolidated YoY)

जून 2026 तिमाही में सालाना आधार पर करमतारा इंजीनियरिंग का कंसालिडेटेड प्रॉफिट 45.3% बढ़कर ₹87.4 करोड़ और रेवेन्यू 72.3% उछलकर ₹1,580.9 करोड़ पर पहुंच गया।

Titan Company Q2 (YoY)

सितंबर तिमाही में टाइटन कंपनी का घरेलू बिजनेस सालाना 22%, इंटरनेशनल बिजनेस 97%, कंज्यूमर बिजनेस 25%, वॉच बिजनेस 30%, आईकेयर सेगमेंट 28%, एमर्जिंग बिजनेस 21% और ज्वैलरी बिजनेस 21% की रफ्तार से बढ़ा। सितंबर तिमाही में टाटइन ने अपने नेटवर्क में 77 घरेलू और 1 इंटरनेशनल स्टोर जोड़े और इसके साथ ही इसके कुल 3758 स्टोर हो गए।

Apollo Tyres

कंपनी के बाहर नए मौकों की तलाश में अपोलो टायर्स के सीएफओ गौरव कुमार ने कंपनी के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) पद से इस्तीफा दे दिया है, जो 6 अक्टूबर से प्रभावी हुआ।

Mahindra Lifespace Developers

महिंद्रा लाइफस्पेस ने पुणे के बानेर एनेक्स में महिंद्रा रिवेंजा नाम का एक रेजिडेंशियल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट लॉन्च किया है, जिसकी कुल ग्रॉस डेवलपमेंट वैल्यू (GDV) लगभग ₹3,500 करोड़ है।

ABB India

एबीबी इंडिया के बोर्ड ने सुनील कुमार मुनागा को कंपनी का सीएफओ बनाने की मंजूरी दे दी है, जो 1 जनवरी 2027 से प्रभावी होगी। अभी सुनील कुमार मुनागा कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट और बिजनेस एरिया कंट्रोलर (इलेक्ट्रिफिकेशन) हैं।

Ola Electric Mobility

ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के बोर्ड की बैठक 7 अक्टूबर को है, जिसमें ₹1000 करोड़ के राइट्स इश्यू से जुड़े कई मामलों पर चर्चा होगी।

Asian Paints

नतीजे के साथ-साथ एशियन पेंट्स बोर्ड की बैठक में अंतरिम डिविडेंड के भी प्रस्ताव पर विचार करने वाली है। इसकी रिकॉर्ड डेट 4 नवंबर तय की गई है।

Adani Ports and Special Economic Zone

अदाणी पोर्ट्स ने ओडिशा के पारादीप पोर्ट पर दो ड्राई बल्क बर्थ के डेवलपमेंट और ऑपरेशन के लिए एक पूर्ण मालिकाना हक वाली सब्सिडियरी पारादीप महानदी टर्मिनल बनाई है।

HCL Technologies

एचसीएल ग्रुप ने ₹500 करोड़ के प्लान के साथ एचसीएल आईटी सिटी के विस्तार का ऐलान किया है। इसमें 9.5 लाख स्क्वेयर फीट तक का नया एरिया तैयार होगा, जिसमें 4,500 टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के लिए जगह होगी। इसके अलावा एचसीएलटेक ने ऐलान किया है कि FY27 के दौरान उसके लिटमस (LITMUS) प्रोग्राम के जरिए उत्तर प्रदेश के 1,000 छात्रों को AI और उससे जुड़ी टेक्नोलॉजी में ट्रेनिंग दी जाएगी।

JSW Cement

जेएसडब्ल्यू सीमेंट ने राजस्थान के नागौर में 1.00 MTPA की एक और सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट शुरू की है। इसके साथ ही कंपनी की कुल सीमेंट ग्राइंडिंग क्षमता बढ़कर 25.10 MTPA हो गई है, जबकि क्लिंकर बनाने की इसकी कुल क्षमता 9.74 MTPA है, जिसमें इसके जॉइंट वेंचर JSW सीमेंट FZC की क्लिंकर क्षमता भी शामिल है।

Godrej Consumer Products

गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स की सब्सिडियरी गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स इंडोनेशिया ने केंडल स्पेशल इकोनॉमिक जोन में अपनी नई मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के पहले चरण का उद्घाटन किया। कंपनी ने इंडोनेशिया में अपनी मैन्युफैक्चरिंग स्थिति को मजबूत करने के लिए केंडल में लगभग ₹250 करोड़ का निवेश किया है।

Marsons

मार्सन्स और न्यूयॉर्क की प्राइवेट इक्विटी फर्म क्लीनहिल पार्टनर्स ने अमेरिका और कनाडा में ट्रांसफॉर्मर के डिस्ट्रीब्यूशन, सर्विसिंग और मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स को तेज करने के लिए एक जॉइंट वेंचर बनाने की योजना का ऐलान किया है।

Mphasis

एमफेसिस ने सोशल सिक्योरिटी स्कॉटलैंड के साथ 3.54 करोड़ पाउंड का एग्रीमेंट किया है। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कंपनी सोशल सिक्योरिटी स्कॉटलैंड के बेनिफिट्स मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म को मैनेज और मेंटेन करेगी।

Shadowfax Technologies

टीपीजी की न्यूक्वेस्ट एशिया फंड IV (सिंगापुर) ने ₹114.8 करोड़ में शैडोफैक्स टेक के 40 लाख शेयर (0.68% हिस्सेदारी) प्रति शेयर र्287 के भाव पर बेच दिए। इसके साथ ही इसने शैडोफैक्स में अपनी हिस्सेदारी 4.86 पर्सेंटेज प्वाइंट्स (यानी 2.85 करोड़ इक्विटी शेयर) कम कर दी है। जून 2026 तक कंपनी में इसकी हिस्सेदारी 11.53% थी।

Satin Creditcare Network

कैम्ब्रिज की MIT (मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) ने सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क के 14.54 लाख शेयर (1.31% हिस्सेदारी) ₹30.31 करोड़ में प्रति शेयर ₹208.36 के भाव पर बेच दिए। जून 2026 तक सैटिन क्रेडिटकेयर में MIT की हिस्सेदारी 1.81% थी।

One Mobikwik Systems

हर ग्लोबल कैपिटल मास्टर फंड I ने वन मोबिक्विक सिस्टम्स के 4.31 लाख शेयर (0.54% हिस्सेदारी) ₹9.83 करोड़ प्रति शेयर ₹227.86 के भाव पर खरीदे। वहीं बजाज लाइफ इंश्योरेंस ने मोबिक्विक के 7 लाख शेयर (0.88% हिस्सेदारी) ₹236.49 के भाव पर ₹16.55 करोड़ में बेच दिए। जून 2026 तक बजाज लाइफ इंश्योरेंस की कंपनी में 2.69% हिस्सेदारी थी।

RMC Switchgears

ईओएफ-डायरेक्ट ने स्मार्ट मीटरिंग सिस्टम बनाने वाली कंपनी आरएमसी स्विचगियर्स के 86,750 इक्विटी शेयर (0.82% हिस्सेदारी) ₹1.7 करोड़ में प्रति शेयर ₹195.93 के भाव पर खरीदे। वहीं इंडिया इमर्जिंग जायंट्स फंड ने इतने ही शेयर प्रति शेयर ₹195.72 के भाव पर बेच दिए।

Black Opal Consultants, Papadmalji Agro Foods, Vans Electroengineerings, Green Asia Impex

पापड़मालजी एग्रो फूड्स और ग्रीन एशिया इंपेक्स के शेयर आज एनएसई एसएमई पर लिस्ट होंगे तो ब्लैक ओपल कंसल्टैंट्स और वान्स इलेक्ट्रोइंजीनियरिंग्स के शेयरों की बीएसई एसएमई पर एंट्री होगी।

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उच्च सदन का यह उद्देश्य तो नहीं था

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की आठ राज्यसभा सीटों के लिए सोमवार, पांच अक्टूबर को जब उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया तो चौतरफा इस बात की चर्चा थी कि इससे कैसे भाजपा ने चुनाव का सामाजिक समीकरण साधा है। हर जगह प्रमुखता से यह बताया गया कि इन आठ में तीन पिछड़ी जाति के हैं, दो दलित समुदाय के हैं, दो ब्राह्मण हैं और एक ठाकुर समाज के हैं।

उच्च सदन में जाने के लिए इसके अलावा उनकी क्या योग्यता है यह बताने की जरुरत किसी ने नहीं समझी। ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत उच्च सदन यानी राज्यसभा का गठन किया गया है, जिसमें कम से कम एक योग्यता ऐसी रखी गई है, जो लोकसभा सदस्य बनने की जरूरी योग्यता से अलग है। वह भिन्नता उम्र की है। अनुच्छेद 80 में तय किया गया है कि कम से कम 30 साल की उम्र का व्यक्ति राज्यसभा जाएगा। लोकसभा की सदस्यता के लिए उम्र सीमा 25 साल की रखी गई है।

उच्च सदन के लिए उम्र सीमा पांच साल ज्यादा रखने का उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। संविधान बनाने वाले चाहते थे कि राज्यसभा में जाने वाले सदस्य अपेक्षाकृत ज्यादा परिपक्व हों। उम्र की परिपक्वता प्रतीकात्मक है। बुनियादी रूप से यह सोचा गया था कि ज्यादा बेहतर अनुभव और योग्यता वाले लोग उच्च सदन में जाएं। अघोषित रूप से यह भी माना गया कि ऐसे नेता, जो लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते हैं या लोकसभा का चुनाव हार गए हैं लेकिन संसद में उनकी उपस्थिति अनिवार्य है, उनको राज्यसभा के रास्ते संसद में भेजा जाए। अब तक ऐसी परंपरा भी रही है।

ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 में ही 12 सदस्यों के मनोनयन की भी व्यवस्था है। सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ऐसे 12 लोगों को मनोनीत करते हैं, जिनका साहित्य, कला, संस्कृति, समाजसेवा आदि में विशिष्ट योगदान हो। बाकी सदस्यों के लिए ऐसी योग्यता व अर्हता तय नहीं की गई है लेकिन आमतौर पर यही माना जाता है कि चुनाव के जरिए आने वाले अन्य सदस्य भी दूसरे नेताओं के मुकाबले कुछ विशिष्ट योग्यता रखते होंगे।

इस अघोषित नियम के कई गौरवशाली उदाहरण मिल जाएंगे। मिसाल के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हार गए थे। वे उस समय की बॉम्बे नॉर्थ सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन जीत नहीं सके थे। उसी साल अप्रैल में उनको बॉम्बे प्रेसिडेंसी से राज्यसभा में भेजा गया था। इंदिरा गांधी पहली बार राज्यसभा के रास्ते सांसद बनी थीं। जब नरसिंह राव को लगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह की आवश्यकता है तो पहले उनको मंत्री बनाया गया और फिर राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया गया। स्वंय नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो अरुण जेटली लोकसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन मोदी ने उनको राज्यसभा भेजा और वित्त व रक्षा मंत्री बनाया। अब भी शीर्ष पांच मंत्रालयों में से दो में राज्यसभा सांसदों को मंत्री बनाया गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दोनों राज्यसभा सांसद हैं।

ऐसी अनगिनत मिसालें हैं कि विशिष्ट योग्यता रखने वाले नेता या विशेषज्ञ को राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया जाता है और वे अपनी विशिष्ट योग्यता से विधायी कामकाज या कार्यकारी भूमिका में सकारात्मक योगदान करते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा देखने को मिल रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा को भी यह संदेश देने का मंच बना दिया है कि वह किसी को भी उच्च सदन का सदस्य बना देती है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मास्टरस्ट्रोक की तरह पेश किया जाता है। हो सकता है कि भाजपा को इसका कुछ राजनीतिक लाभ मिलता हो लेकिन इससे राज्यसभा के स्वरूप, संसदीय कामकाज और विधायी कार्यों में उच्च सदन की भूमिका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

संसदीय बहसों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करके इसकी पुष्टि की जा सकती है। राज्यसभा में भी ज्यादातर सदस्य ऐसे आते हैं, जिनका विधायी कामकाज में कोई सार्थक योगदान नहीं होता है। वे सिर्फ सदन के माननीय सदस्य होते हैं। अगर कभी बोलना पड़ा तो बहुत जेनेरिक बातों का भाषण देते हैं। उसमें कोई गुणवत्ता नहीं होती है। विषय के मामले में विद्वता की झलक नहीं दिखती है। उनका काम भी हाथ उठा कर सरकार के प्रस्तावों का समर्थन करना और मेज थपथपा कर प्रधानमंत्री का स्वागत करना या उनके नाम के नारे लगाना रह गया है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पद्म पुरस्कारों जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों का लोकतंत्रीकरण किया था। वह एक अच्छी पहल थी। ऐसे लोग जो अपने क्षेत्र में बहुत अच्छा काम कर रहे थे लेकिन मीडिया और महानगरों की लाइमलाइट से दूर थे और इस वजह से उनके काम की पहचान और पूछ नहीं हो रही थी, उनको पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाने लगा। पहले संपर्कों और मीडिया में चर्चा के आधार पर ऐसे पुरस्कार दिए जाते थे। तब भी अच्छे और योग्य लोगों को पुरस्कार मिलता था। लेकिन दूरदराज के लोग छूट जाते थे। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं होता है कि मीडिया की चर्चा में रहे अच्छे लोगों को पुरस्कारों से दूर कर दिया जाए।

बहरहाल, वह एक अच्छी पहल थी। लेकिन उसी तरह की पहल राज्यसभा को उसके मूल उद्देश्यों से दूर ले जा रही है। राज्यसभा को राज्यों के हितों की बात करने के साथ साथ लोकसभा की मनमानियों पर चेक एंड बैलेंस की भूमिका भी निभानी होती है। इसके अलावा देश और दुनिया के ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा, जीवंत संवाद और विधायी कामकाज में गुणवत्तापूर्ण हस्तक्षेप सुनिश्चित करना भी राज्यसभा का काम था। दुर्भाग्य से उसकी यह भूमिका कम होती जा रही है। मनोनयन के जरिए भी ऐसे लोग उच्च सदन में लाए जा रहे हैं, जो सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक आवश्यकता को पूरा करते हैं।

चुनाव के जरिए तो जो लोग उच्च सदन पहुंच रहे हैं वे या तो अकूत संपत्ति वाले होते हैं या संबंधित पार्टी के लिए सामाजिक व राजनीतिक महत्व वाले होते हैं। भाजपा ने अगर अपने आठ उम्मीदवारों के जरिए सामाजिक समीकरण साधा है तो सपा ने अपने उम्मीदवारों के जरिए परिवार और धन को महत्व दिया है। कह सकते हैं कि हर दोवार्षिक चुनाव के बाद राज्यसभा की गुणवत्ता में थोड़ी और कमी हो जा रही है।

पश्चिमी विक्षोभ का बड़ा असर! IMD ने दिल्ली-यूपी से लेकर पहाड़ों तक दिया बारिश का अलर्ट, जानें कैसा रहेगा आपके राज्य का मौसम

IMD Rain Forecast: देश भर से दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई की प्रक्रिया के बीच एक नया और मजबूत पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) उत्तर भारत के मौसम में भारी उथल-पुथल मचा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मंगलवार 6 अक्टूबर की दोपहर जारी वेदर बुलेटिन के मुताबिक इस पश्चिमी विक्षोभ के असर से 10 अक्टूबर तक पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में हल्की से मध्यम बारिश और बर्फबारी जारी रह सकती है। इसके साथ ही दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में बारिश और तेज आंधी का सिलसिला शुरू हो चुका है।

बीते 24 घंटों के दौरान मौसम के मिजाज की बात करें तो तमिलनाडु में अलग-अलग जगहों पर 12 से 20 सेमी तक अत्यधिक भारी बारिश हुई है। इसके अलावा उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल, सिक्किम, केरल, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक, रायलसीमा और बिहार में 7 से 11 सेमी तक भारी बारिश हुई है।

उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ का असर: दिल्ली, यूपी और पंजाब में 60 kmph की आंधी

मौसम विभाग के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभ मध्य और ऊपरी क्षोभमंडलीय पछुआ हवाओं में ट्रफ रेखा के रूप में बना हुआ है। इसके साथ ही दक्षिण हरियाणा पर एक चक्रवाती हवाओं का क्षेत्र बना हुआ है, जबकि एक अन्य चक्रवाती परिसंचरण दक्षिण-पूर्व उत्तर प्रदेश पर सक्रिय है। इन मौसमी प्रणालियों के असर से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में 6 अक्टूबर को भारी बारिश और बर्फबारी का अनुमान है, जबकि 7 से 12 अक्टूबर के दौरान छिटपुट बारिश जारी रहेगी। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 6 से 12 अक्टूबर तक बारिश और बर्फबारी के आसार हैं। हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में 6 और 7 अक्टूबर को आकाशीय बिजली चमकने के साथ 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे (झोंके 60 किमी/घंटे) की गति से तूफानी हवाएं चलेंगी।

मैदानी इलाकों की बात करें तो पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 6 से 7 अक्टूबर के दौरान और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 6 से 8 अक्टूबर तक 40 से 50 किमी/घंटे की गति से झोंकेदार हवाएं चलने और बारिश होने का अलर्ट है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि 6 अक्टूबर को दक्षिण-पूर्व उत्तर प्रदेश में पृथक स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है। 11 और 12 अक्टूबर को पश्चिमी राजस्थान तथा 12 अक्टूबर को पूर्वी राजस्थान में भी हल्की बारिश हो सकती है।

मध्य भारत और पूर्वी राज्यों में भारी बारिश और तूफानी हवाएं

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाकों में भी मौसमी चक्र सक्रिय है। 6 अक्टूबर को पूर्वोत्तर मध्य प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर भारी बारिश की संभावना जताई गई है। इसके अलावा पूर्वी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 6 से 10 अक्टूबर के दौरान गरज-चमक के साथ बारिश की गतिविधियां बनी रहेंगी। 6 और 7 अक्टूबर को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बिजली कड़कने के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं।

पूर्वी भारत में बिहार और झारखंड में 6 से 10 अक्टूबर के दौरान और ओडिशा में 6 से 12 अक्टूबर तक बारिश होने की संभावना है। बिहार में 6 और 7 अक्टूबर को आकाशीय बिजली चमकने और 40 से 50 किमी/घंटे की गति से हवाएं चलने का अनुमान है। उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में 8 अक्टूबर को भारी बारिश दर्ज की जा सकती है।

पूर्वोत्तर भारत और तटीय इलाकों में उथल-पुथल

पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बारिश तेज रहेगी। अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय में 6 अक्टूबर को भारी बारिश होने का अलर्ट जारी किया गया है। नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में 6 और 7 अक्टूबर को भारी बारिश के साथ बादलों की तेज गड़गड़ाहट और बिजली कड़कने की आशंका जताई गई है।पश्चिम भारत की बात करें तो कोंकण व गोवा और मध्य महाराष्ट्र में 6 और 7 अक्टूबर को बारिश और बिजली कड़कने की संभावना है, जिसके बाद मौसम में सुधार देखने को मिलेगा।

दक्षिण भारत में जारी रहेगा मूसलाधार बारिश का दौर

दक्षिण भारत के राज्यों में समुद्र और धरातल के ऊपर एक साथ कई चक्रवाती हवाओं के क्षेत्र सक्रिय हैं। एक चक्रवाती परिसंचरण दक्षिण केरल तट के पास दक्षिण-पूर्व अरब सागर पर और दूसरा उत्तरी तमिलनाडु पर बना हुआ है। इसके साथ ही मन्नार की खाड़ी से मध्य महाराष्ट्र तक एक ट्रफ रेखा फैली हुई है। इनके असर से केरल व माहे में 6 से 11 अक्टूबर के दौरान काफी बारिश होगी।

केरल और तमिलनाडु, पुडुचेरी व कराइकल में 6 अक्टूबर और 8 से 10 अक्टूबर के दौरान भारी बारिश का नया दौर आएगा। दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में भी 6 अक्टूबर को भारी बारिश दर्ज हो सकती है। तमिलनाडु, केरल और लक्षद्वीप में 6 से 10 अक्टूबर के दौरान आकाशीय बिजली चमकने के साथ 40 से 50 किमी/घंटे की रफ्तार से तूफानी हवाएं चलेंगी। तटीय आंध्र प्रदेश और रायलसीमा में 6 से 8 अक्टूबर तक दिन भर तेज सतही हवाएं चलती रहेंगी।

चुनाव से पहले अध्यक्ष बदलने का ट्रेंड

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने एक ट्रेंड बना लिया है कि चुनाव नजदीक आएंगे तो अध्यक्ष बदलना है। एक के बाद एक राज्यों में यह ट्रेंड देखने को मिल  रहा है। कांग्रेस के नेता भी इसका मजाक उड़ाने लगे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में पार्टी के एक नेता से पत्रकारों ने अनौपचारिक बातचीत में एक प्रदेश का अध्यक्ष बदलने के बारे में पूछा तो उन्होंने मजाक में कहा कि चुनाव नजदीक आने के इंतजार कीजिए। सोचें, यह क्या रणनीति है? जिस नेता को चार साल या पांच साल तक लगातार प्रदेश अध्यक्ष बना कर रखते हैं उसे चुनाव से ऐन पहले बदल देते हैं और नया अध्यक्ष ला देते हैं। पंजाब में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को साढ़े चार साल तक अध्यक्ष बनाए रखा गया और चुनाव से चार महीने पहले उनको बदल कर परगट सिंह को प्रधानी दे दी। यह ज्यादा हैरान करने वाली बात इसलिए है क्योंकि दो महीने पहले तक तत्कालीन प्रभारी भूपेश बघेल कह रहे थे कि अध्यक्ष बदलना गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा था कि राजा वड़िंग रहेंगे। लेकिन अंत में बघेल भी बदले गए और वड़िंग भी गए।

इसके बाद एक और चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष बदला गया। तीन साल से अजय राय प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल रहे थे और कांग्रेस की भाजपा विरोध की राजनीति को धार दे रहे थे। लेकिन ऐन चुनाव से पहले उनको हटा कर आराधना मिश्रा उर्फ मोना मिश्रा को अध्यक्ष बना दिया गया। वे कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। वहां भी कुछ समय पहले कांग्रेस ने प्रभारी बदला था। सो, यह भी एक ट्रेंड देखा जा रहा है कि प्रभारी बदलो और फिर प्रभारी के हिसाब से अध्यक्ष बदल दो। इसी तरह का काम पिछले साल यानी 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी किया गया था। कांग्रेस ने पहले मोहन प्रकाश को प्रभारी पद से हटाया और उसके बाद अखिलेश प्रसाद सिंह को अध्यक्ष पद से हटा दिया।

राहुल गांधी के करीबी कृष्णा अल्लावरू बिहार के प्रभारी बने और राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद सीट बंटवारे में जो बदमजगी हुई वह सबने देखी। पार्टी आलाकमान ने अंत में अशोक गहलोत को भेजा और तब जाकर सीट बंटवारा हुआ। इसके बावजूद कांग्रेस, राजद और लेफ्ट के बीच नौ सीटों पर दोस्ताना लड़ाई हुई। इसमें कांग्रेस की जीती हुई सीटें भी थीं। अंत नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस 16 से घट कर पांच सीट पर आ गई। आज बिहार में एमएलसी के चुनाव में भी कांग्रेस और राजद अलग अलग लड़ रहे हैं और सब एक दूसरे को हराने में लगे हैं। बिहार से पहले यही काम कांग्रेस ने झारखंड में किया था। 2024 के नवंबर में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर को हटा दिया गया। वे ढाई साल से प्रदेश का संगठन संभाल रहे थे। लेकिन चुनाव से तीन महीने पहले उनको हटा कर केशव महतो कमलेश को अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि झारखंड में इसके बाद भी कांग्रेस सर्वाइव कर गई क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मइया सम्मान योजना शुरू करके महिलाओं के खाते में हर महीने ढाई हजार रुपए भेजने शुरू कर दिए, जिसका लाभ पूरे गठबंधन को मिला। हेमंत सोरेन की सरकार वापस लौटी तो कांग्रेस भी लौट गई। लेकिन बिहार बिगड़ गया और पंजाब व यूपी में क्या होता है यह देखना होगा।

कांग्रेस प्रभारियों की राजनीति

कांग्रेस में प्रभारी महासचिव हमेशा बहुत शक्तिशाली रहे हैं। पार्टी आलाकमान प्रभारियों के हिसाब से ही फैसले करता है। कई बार तो ऐसा हुआ कि प्रदेश के नेताओं ने प्रभारी की शिकायत पार्टी आलाकमान से की और उनकी शिकायत दूर करने का काम प्रभारी को ही सौंप दिया गया। इससे शिकायत तो दूर नहीं होती थी नेता ही दूर हो जाते थे। कांग्रेस के कई नेता ऐसे किस्से सुनाते हैं कि किसी ने पार्टी आलाकमान से मिलने का समय मांगा, समय नहीं मिला तो उसने लिखित शिकायत भेजी और वह लिखित शिकायत मार्क होकर प्रभारी के पास पहुंच गई, जिसके बाद प्रभारी ने शिकायत करने वाले नेता को निपटा दिया। अपने नेताओं से सीधे बातचीत नहीं करने और फीडबैक नहीं से अक्सर ऐसा होता है। अभी कई राज्यों में यह देखने को मिलता है। हालांकि इसके अपवाद भी रहे हैं। कई बार प्रदेश अध्यक्ष या मुख्यमंत्र इतना पावरफुल होता है कि वह अपने हिसाब से प्रभारी को चलाता है। जैसे इस समय डीके शिवकुमार चला रहे हैं या जैसे कभी भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कमलनाथ आदि चलाते थे।

बहरहाल, भूपेश बघेल पंजाब के प्रभारी थे तो उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे तमाम बड़े नेताओं के विरोध को दरकिनार कर ऐलान कर दिया था कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ही प्रदेश अध्यक्ष रहेंगे। लेकिन जैसे ही बघेल की विधाई हुई वैसे नए प्रभारी सचिन पायलट ने वड़िंग को बदल दिया। अब पंजाब में खूब राजनीति चल रही है। हटने के बाद वड़िंग ने बघेल से मुलाकात की और उनका स्वागत किया। वड़िंग ने दिखाया कि उनको बघेल का समर्थन है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में अविनाश पांडेय को हटा कर राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाया गया तो उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया अजय राय को हटाने का। इसमें वे कामयाब भी हो गए। वे इतने पावरफुल हैं कि उन्होंने अजय राय को हटवा कर मोना मिश्रा को अध्यक्ष और अपने करीबी इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनवा दिया। यह अलग बात है कि राजेंद्र पाल गौतम जिस जाटव समाज से आते हैं उसका एक फीसदी वोट भी वे कांग्रेस को नहीं दिलवा सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी और उनके करीबियों को दलित, मुस्लिम राजनीति का गणित समझाने में सफल रहे हैं।

तीनों भूमिहार अध्यक्षों की विदाई

थोड़े दिन पहले तक देश के तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस ने भूमिहार अध्यक्ष बना रखे थे। इसकी तुलना 2014 से ठीक पहले की भाजपा से की जाती थी, जब तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में उसके भूमिहार अध्यक्ष थे। बिहार में सीपी ठाकुर, झारखंड में रविंद्र राय और उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप शाही अध्यक्ष थे। नितिन गडकरी ने अध्यक्ष रहते तीनों को नियुक्त किया गया। उसके बाद जब 2024 में इन तीन राज्यों में कांग्रेस के भूमिहार अध्यक्ष हुए तो यह टोटका बताया जाता था कि जैसे भाजपा ने तीन भूमिहार अध्यक्ष रखा और लोकसभा का चुनाव जीता वैसे कांग्रेस भी जीत सकती है। कांग्रेस जीती तो नहीं लेकिन उसकी सीटें दोगुनी हो गईं।

उसके बाद यानी 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद एक एक करके तीनों को हटा दिया गया। पहले झारखंड के कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर की विदाई हुई। उनकी जगह पिछड़ी जाति से आने वाले केशव महतो कमलेश अध्यक्ष बनाए गए। उसके बाद बिहार में अखिलेश प्रसाद सिंह की विदाई हुई। उनकी जगह दलित समाज के राजेश राम को अध्यक्ष बनाया गया। अंत में उत्तर प्रदेश से अजय राय की विदाई हुई है। उनकी जगह ब्राह्मण समाज की आराधना मिश्रा उर्फ मोना मिश्रा को अध्यक्ष बनाया गया है। गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अजय राय ने वाराणसी सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसीने छुड़ा दिए थे। कोई 10 राउंड तक की गिनती में वे आगे चल रहे थे। वे हारे लेकिन प्रधानमंत्री की जीत का अंतर पांच लाख से डेढ़ लाख वोट पर ले आए। आबादी के हिसाब से भूमिहारों का ज्यादा असर नहीं है लेकिन राजनीतिक असर बहुत है।

यूपी में कांग्रेस का अपना पीडीए

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने पीडीए बनाया है। पीडीए का अर्थ है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। हालांकि बीच बीच में वे कोई और अर्थ भी बताते रहते हैं। जैसे पिछले दिनों ब्राह्मणों को खुश करने के लिए कह दिया कि उनके पीडीए में पीडी का मतलब है पंडित। लेकिन असल मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। अखिलेश ने पिछले दिनों पीडीए रथयात्रा भी शुरू की। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने पीडीए यात्रा राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली से की। रायबरेली से यात्रा शुरू करने से पहले उन्होंने न तो राहुल गांधी से बात की और न कांग्रेस को भरोसे में लिया। उसमें कांग्रेस के लोह शामिल भी नहीं हुए। सो, अब कांग्रेस ने अपना पीडीए बना लिया है।

कांग्रेस पार्टी के पीडीए का मतलब है पंडित, दलित और अल्पसंख्यक। जाहिर है कि दलित और अल्पसंख्यक कांग्रेस और सपा दोनों में कॉमन हैं। लेकिन कांग्रेस का कहना है कि यह आजादी के बाद से ही बना उसका फॉर्मूला है। इसी फॉर्मूले पर कांग्रेस ने इतने बरसों तक देश पर और ज्यादातर राज्यों में शासन किया। इसी फॉर्मूले को नए सिरे से साधने के लिए कांग्रेस ने ब्राह्मण नेता मोना मिश्रा को अध्यक्ष, इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और दलित समाज से आने वाले राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाया है। हालांकि मुस्लिम पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ हैं और दलित में जाटव समाज का  भावनात्मक जुड़ाव अब भी बसपा और मायावती के साथ है। इमरान मसूद और राजेंद्र पाल गौतम मुस्लिम और दलित वोट कांग्रेस को दिला पाएंगे इसमें संदेह है। तभी भले कांग्रेस ने पीडीए बना लिया है लेकिन इसकी कोई भी कामयाबी इस पर निर्भर करेगी कि सपा के साथ उसका तालमेल होता है या नहीं। तालमेल हुआ तो दोनों बेहतर करेंगे अन्यथा कांग्रेस तो बहुत खराब करेगी।

क्या नया विपक्ष उभर सकता है

यह बड़ा सवाल है कि क्या देश में नया विपक्ष उभर सकता है? कांग्रेस के नेता इस सवाल को भाजपा की साजिश थ्योरी का हिस्सा मान रहे हैं लेकिन उस राजनीतिक पहलू को छोड़ दें तब भी यह स्पष्ट दिख रहा है कि देश में एक नए किस्म का विमर्श चल रहा है, जिसमें न तो भाजपा फिट हो रही है और न कांग्रेस। यह सिर्फ ‘जेन जी’ का विमर्श नहीं है, बल्कि आम आदमी का विमर्श है, जिसमें वह रोजमर्रा की समस्याओं के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार मान रहा है।

यह एक व्यापक नैरेटिव का भी हिस्सा है, जिसके दम पर भाजपा ने बरसों तक कांग्रेस को किनारे किए रखा। आम लोग कांग्रेस के विपक्ष में होने के बावजूद यह मानते रहे कि उनकी और देश की समस्याओं के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। तभी भाजपा द्वारा स्थापित किया हुआ यह नैरेटिव चला कि मोदी या भाजपा को नहीं वोट दें तो क्या राहुल और अखिलेश या तेजस्वी को दे दें?

अब इस प्रश्न में नए आयाम जुड़ गए हैं। अगर लोग केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों से उबे हैं या उनको लग रहा है कि भाजपा का कांग्रेसीकरण हो रहा है या उनको धीरे धीरे यह यकीन होता जा रहा है कि भाजपा के पास भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं है लेकिन वे राहुल, अखिलेश या तेजस्वी को भी वोट नहीं देना चाहते, तो उनके सामने क्या विकल्प है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक हो गया है क्योंकि अलग अलग राज्यों में लोगों ने नए विकल्प आजमाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का जीतना इसका एक उदाहरण है।

ऐसा नहीं है कि दोनों राज्यों में कांग्रेस का विकल्प नहीं था। दिल्ली में भाजपा और पंजाब में अकाली दल के रूप में मजबूत विकल्प था लेकिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को चुना। ऐसे ही तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके एक दूसरे के विकल्प के रूप में करीब सात दशक से थे। लेकिन उन्हें ठुकरा कर लोगों ने सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके को चुना। इससे पहले 2019 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को हराने के लिए लोगों ने टीडीपी का विकल्प नहीं चुना, बल्कि जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को चुना। नए बने राज्य तेलंगाना में भी के चंद्रशेखर राव की पार्टी लगातार दो बार जीती।

तर्क के नाते कहा जा सकता है कि पहले भी अलग अलग राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों का उदय हुआ और उन्होंने चुनाव भी जीते। बिहार में राजद, उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, आंध्र प्रदेश में टीडीपी आदि। इनके अलावा भी कई राज्यों में प्रादेशिक पार्टियां मजबूत रहीं और चुनाव जीत कर सरकार बनाई। इसलिए अभी अगर राज्यों में नई पार्टियों का उदय हो रहा है तो यह कहना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई नया विपक्ष उभर रहा है। लेकिन यहां दोनों परिघटनाओं के बीच के अंतर को समझना होगा।

इससे पहले जितनी भी प्रादेशिक पार्टियां बनीं उनमें से किसी के नेता की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं रही। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भले रही हो लेकिन किसी ने पार्टी का विस्तार दूसरे राज्यों में करने के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा। कुछ पार्टियों ने एक से ज्यादा राज्यों में विस्तार किया लेकिन उनका विस्तार बहुत सीमित रहा। बहुजन समाज पार्टी इसका अपवाद है। लेकिन अब वह पार्टी भी अंतिम सांसें गिन रही है। एक दूसरा अंतर यह था कि पहले बनी ज्यादातर प्रादेशिक पार्टियां किसी स्थानीय मुद्दे या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बनी थीं।

पहली बार ऐसा हो रहा है कि अखिल भारतीय मुद्दों पर नई ताकतें आंदोलन कर रही हैं। आम आदमी पार्टी का उभरना किसी स्थानीय मुद्दे या प्रादेशिक पहचान का मामला नहीं है। उसने राजकाज को राजनीतिक विचारधारा बना कर राजनीति की और अपनी स्थापना के एक दशक बाद ही राष्ट्रीय पार्टी बन गई। इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी अभी एक राजनीतक दल नहीं बनी है फिर भी उसके मुद्दे अखिल भारतीय महत्व के हैं और किसी दूसरी पार्टी के मुकाबले देश के नौजवान उसकी बातों पर ज्यादा यकीन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल खड़ी की है।

दोनों इस धारणा को जनता के बीच पहुंचा रहे हैं कि अगर भाजपा से नाराजगी है और लोग उसे बदलना चाहते हैं तो उसका स्वाभाविक विकल्प कांग्रेस नहीं है। यह बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है और इसे इसी रूप में देखने की जरुरत है। कांग्रेस इस बात को समझ रही है कि भाजपा ने पहले उसे सत्ता से बेदखल किया और अब उसे स्वाभाविक विपक्ष की जगह से भी खिसकाने का अभियान चल रहा है। कांग्रेस इसके पीछे भाजपा की साजिश भी देख रही है। हो सकता है कि भाजपा धारणा के स्तर पर इस विचार को बढ़ावा दे रही हो और यह भी संभव है कि संसाधन से भी मदद मुहैया करा रही हो लेकिन अंततः यह उसके लिए भी घातक हो सकता है।

कांग्रेस पार्टी ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को इस रूप में नहीं देखा था। उसके नेता मानते रहे कि चीफ जस्टिस की टिप्पणी से त्वरित रूप में बने एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से युवा जुड़े हैं और उसने युवाओं का मुद्दा उठाया है। लेकिन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन ने कांग्रेस को अलर्ट कर दिया है। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को लेफ्ट और सिविल सोसायटी का साथ मिल रहा है तो कॉकरोच जनता पार्टी को आप का सपोर्ट मिल रहा है। कुछ और प्रादेशिक पार्टियां उनको समर्थन दे रही हैं। तभी कांग्रेस के साथ सीजेपी का विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता सीजेपी को आम आदमी पार्टी का फ्रंट और आप को भाजपा का फ्रंट बता रहे हैं।

कांग्रेस की इस बात को लेकर सीजेपी ने उसके ऊपर तीखा हमला किया है। सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने ‘सेल्फ स्टाइल लिबरल इकोसिस्टम’ पर निशाना साधा है और कहा है, ‘यह सिस्टम अभिजीत दीपके को खारिज कर रहा है, जबकि हकीकत यह है कि बहुत अरसे बाद ऐसा हुआ है कि किसी ने आम लोगों के इमेजिवनेशन को कैप्चर किया है’। विवाद की शुरुआत कांग्रेस के एक प्रवक्ता के बयान से हुई थी, जिन्होंने कहा था कि आशुतोष रांका असम गए तो वहां कांग्रेस नेताओं से नहीं मिले, जबकि कांग्रेस ने सीजेपी के लोगों को पुलिस के बचाया था।

इसके बाद रांका ने एक पोस्ट लिखा और उस पोस्ट को सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि, एक खास तबका, सिर्फ भाजपा नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी भी सोचती है कि ‘सेविंग इंडिया, सेविंग कांस्टीट्यूशन’ उन्हीं का काम है। उन्होंने आगे कहा कि ये लोग, ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड लिबरल्स’ औऱ ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड ठेकेदार ऑफ कांस्टीट्यूशन’ हैं। सौरव दास का कहना है कि ‘य़ह भाजपा से खराब काम करने वाला इकोसिस्टम है’।

रांका और दास का सीधा हमला कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम पर है।

यह एक शुरुआत है, नया विपक्ष बनाने की। इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी और कब मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस से अलग नए विपक्ष के बारे में विचार शुरू हो गया है। आम आदमी पार्टी के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी पर नजर रखने की जरुरत है। इनके अलावा बिहार में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर की भीम आर्मी, तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय की टीवीके, पंजाब में अमृतपाल की अकाली दल वारिस पंजाब दे, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, हुमायूं कबीर की एजेपी, बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ जैसी पार्टियों पर भी नजर ऱखने की जरुरत है।