ईरान युद्ध में घायल अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर 861 हुई

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने ईरान संघर्ष के लिए अपने सार्वजनिक घायलों के डेटाबेस में 37 और घायल सैन्य कर्मियों, 29 नाविकों और आठ मरीन, को शामिल किया है, जिससे कुल संख्या बढ़कर 861 हो गई है। यह जानकारी वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट से प्राप्त हुई।

पेंटागन अधिकारियों ने इस बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की है कि नई सूची में शामिल लोग कब या कैसे घायल हुए। 

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हताहतों की बढ़ती संख्या ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और इज़रायल का महीनों से चल रहा अभियान ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर करने या अमेरिका द्वारा तय किए गए युद्ध के किसी भी लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह युद्ध एक ऐसे गतिरोध में बदल गया है जिसमें बहुत ज़्यादा नुकसान हो रहा है, जबकि ईरान सत्ता में बना हुआ है, अमेरिका के दबाव का विरोध कर रहा है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना मज़बूत नियंत्रण बनाए हुए है। फिर भी, ट्रंप प्रशासन ने इस संघर्ष को खत्म करने के बजाय इसे जारी रखा है।

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ट्रंप ने शी के स्वागत में बिछाया रेड कार्पेट, अमेरिका-चीन शिखर वार्ता शुरू

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का बुधवार को सैन्य हवाई अड्डे पर व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया। इसी के साथ व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ताइवान और ईरान युद्ध को लेकर तनाव के बीच तीन दिवसीय अमेरिका-चीन शिखर वार्ता शुरू हो गई।

श्री ट्रंप और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप ने मैरीलैंड स्थित ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर श्री शी और उनकी पत्नी पेंग लियुआन का भव्य स्वागत किया। इस दौरान करीब 30 मीटर लंबा लाल कालीन बिछाया गया, सैन्य विमानों ने फ्लाईपास्ट किया, 21 तोपों की सलामी दी गई और अमेरिकी वायुसेना के बैंड ने प्रस्तुति दी।

श्री शी का एयर चाइना विमान स्थानीय समयानुसार शाम 5:39 बजे हवाई अड्डे पर उतरा। इसके बाद लाल कालीन के दोनों ओर सैन्य गार्ड तैनात किए गए। श्री ट्रंप और सुश्री मेलानिया राष्ट्रपति की आधिकारिक कार ‘द बीस्ट’ से वहां पहुंचे और विमान के पास जाकर चीनी राष्ट्रपति तथा उनकी पत्नी का स्वागत किया।

दोनों दंपतियों ने हाथ मिलाया और संक्षिप्त बातचीत के बाद साथ-साथ लाल कालीन पर चले तथा तस्वीरें खिंचवाईं। अमेरिकी सेना और वायुसेना के बैंड द्वारा राष्ट्रगान बजाए जाने के दौरान दो बी-1 बमवर्षक विमानों ने ऊपर से उड़ान भरी। इसके अलावा छह एफ-16 और छह एफ-22 लड़ाकू विमान भी हवाई अड्डे पर स्वागत समारोह के हिस्से के रूप में तैनात किए गए थे।

सैन्य अड्डे पर श्री शी का व्यक्तिगत रूप से स्वागत करने का श्री ट्रंप का फैसला इस यात्रा को दिए जा रहे महत्व को दर्शाता है। वर्ष 1962 के बाद यह पहली बार है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने सैन्य अड्डे पर किसी विदेशी नेता का व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया है। वर्ष 1962 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हेरोल्ड मैकमिलन का स्वागत किया था।

वर्ष 2015 के बाद श्री शी की यह पहली वाशिंगटन यात्रा है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं कई वर्षों से चले आ रहे व्यापार तनाव के बाद संबंधों को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं, जबकि उन्नत प्रौद्योगिकी और रणनीतिक प्रभाव को लेकर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा जारी है।

दोनों नेता गुरुवार को व्हाइट हाउस में बंद कमरे में बातचीत करेंगे और इसके बाद राजकीय रात्रिभोज आयोजित किया जाएगा। वार्ता में शुल्क, एआई, ताइवान और ईरान युद्ध के व्यापक प्रभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। दोनों पक्ष मौजूदा नाजुक व्यापार समझौते को बनाए रखने की भी कोशिश कर रहे हैं।

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका और चीन ने शुल्क संबंधी अस्थायी समझौते को जनवरी तक बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह व्यवस्था मूल रूप से 10 नवंबर को समाप्त होने वाली थी। इसके तहत कुछ वस्तुओं पर शुल्क कम किए गए हैं और चीन की ओर से दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों को फिलहाल रोक दिया गया है।

श्री बेसेंट ने चीनी उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग के साथ बैठक के बाद कहा कि दोनों पक्षों ने इस अस्थायी व्यवस्था को व्यापक व्यापार समझौते में बदलने की संभावनाओं पर भी चर्चा की।

उन्होंने कहा हम केवल बुसान समझौते को जारी रखने या किसी बड़े समझौते पर विचार करने, दोनों विकल्पों के लिए तैयार हैं।

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व्यापार संबंधी यह अस्थायी समझौता 2025 में दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद हुआ था। उस समय दोनों देशों द्वारा लगाए गए शुल्क कुछ समय के लिए 100 प्रतिशत से अधिक हो गए थे, जिसके बाद वाशिंगटन और बीजिंग ने तनाव कम करने के लिए कई उपायों पर बातचीत शुरू की। इस बीच, चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ में प्रकाशित बयान में श्री शी ने दोनों देशों के बीच सहयोग का आह्वान किया।

उन्होंने कहा दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार होना चाहिए।” उन्होंने अमेरिका और चीन को “महान राष्ट्र और उनकी जनता को महान लोग” बताया।

श्री शी ने कहा कि चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान और अमेरिका को फिर से महान बनाने के लक्ष्य साथ-साथ चल सकते हैं और एक-दूसरे को मजबूत करते हुए दुनिया को लाभ पहुंचा सकते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि उनकी यात्रा “फलदायी परिणाम” देगी।

श्री शी के साथ चीन के वरिष्ठ अधिकारी भी वाशिंगटन पहुंचे हैं। इनमें कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो स्थायी समिति के सदस्य काई ची, उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग और विदेश मंत्री वांग यी शामिल हैं।

बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी प्रमुख मुद्दा रहने की उम्मीद है। दोनों देश उन्नत चिप और एआई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। श्री बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका ने एक ऐसी सूचना प्रणाली का प्रस्ताव रखा है जिसके तहत दोनों देश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संभावित खतरा पैदा करने वाली एआई घटनाओं के बारे में एक-दूसरे को सूचित कर सकेंगे।

व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि उन्नत कंप्यूटर चिप के व्यापार पर प्रतिबंध भी बैठक का महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने एनवीडिया को कुछ स्वीकृत चीनी ग्राहकों को चिप बेचने की अनुमति दी है।

श्री शी के लिए गुरुवार को व्हाइट हाउस में पूर्ण सैन्य सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा। इसमें सैन्य बैंड, सशस्त्र बलों की पूर्ण सम्मान टुकड़ी और बी-2 स्पिरिट बमवर्षक तथा चार एफ-22 रैप्टर विमानों का फ्लाईपास्ट शामिल होगा।

श्री ट्रंप और श्री शी ओवल ऑफिस में द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इसके बाद श्री शी और सुश्री पेंग राष्ट्रपति और प्रथम महिला द्वारा आयोजित राजकीय रात्रिभोज में शामिल होंगे। सुश्री मेलानिया ट्रंप के भी दोनों नेताओं की बैठक के दौरान सुश्री पेंग के साथ स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट जाने की उम्मीद है।

राजकीय रात्रिभोज में अमेरिका के कई प्रमुख प्रौद्योगिकी और कारोबारी अधिकारियों के शामिल होने की संभावना है। इनमें एनवीडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेंसन हुआंग, क्वालकॉम के सीईओ क्रिस्टियानो अमोन, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और जेपी मॉर्गन के सीईओ जेमी डिमोन शामिल हैं।

श्री शी की यात्रा शुक्रवार को समाप्त होगी। उस दिन श्री ट्रंप और सुश्री मेलानिया उनके और सुश्री पेंग के लिए चाय का आयोजन करेंगे। इसके बाद चीनी दंपति नेशनल आर्काइव्स का दौरा करेगा और चीन के लिए रवाना होगा।

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ईरान के लिए ‘सीक्रेट हथियार’ बना रहा चीन! रिपोर्ट में हुए खुलासे से अमेरिका में हड़कंप

China Secret Support to Iran: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच चीन एक तरफ तो खुद को शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से ईरान की आर्थिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में लगा हुआ है। एक खोजी रिपोर्ट ने इस पूरे मामले से पर्दा उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन, ईरान के लिए एक खास ‘सीक्रेट हथियार’ भी बना रहा है।

अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान के रक्षा मंत्रालय को भेजे जाने वाले ‘डुअल-यूज’ पार्ट्स यानी दोहरे इस्तेमाल वाले घटकों की डिलीवरी में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। ईरानी सीमा शुल्क डेटा, अमेरिकी अधिकारियों और इस गुप्त व्यापार से जुड़े लोगों के हवाले से आई इस रिपोर्ट से कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। चीन और अमेरिका के शीर्ष नेताओं की मुलाकात के बीच इस खुलासे ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

चीन से क्या-क्या मिल रहा है ईरान को?

‘डुअल-यूज’ पार्ट्स वे सामान होते हैं जिनका उपयोग आम नागरिक उपकरणों के साथ-साथ खतरनाक हथियारों में भी किया जा सकता है। WSJ रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान भेजे गए सामान में ये प्रमुख चीजें शामिल हैं:

इलेक्ट्रॉनिक्स और जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण: जो मिसाइलों की सटीक निशाना लगाने की क्षमता बढ़ाते हैं।

इलेक्ट्रिक मोटर और एयरक्राफ्ट इंजन पार्ट्स: जिनका सीधा इस्तेमाल सैन्य ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम में होता है।

रासायनिक सामग्री: जिसका इस्तेमाल बैलिस्टिक मिसाइल के फ्यूल बनाने में किया जा सकता है।

उपग्रह तस्वीरें: अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि 17 जुलाई के उस हमले से पहले और बाद में ईरान ने चीनी सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया, जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।

कार्गो फ्लाइट्स में अचानक उछाल: ‘महान एयर’ का संदिग्ध रोल

फ्लाइट ट्रैकिंग साइट ‘FlightRadar24’ के डेटा के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित ईरानी एयरलाइन महान एयर ने मार्च के महीने में चीन के बीजिंग, शंघाई और गुआंगझू से तेहरान के लिए हर हफ्ते सिर्फ 4 उड़ानें भरी थीं।

लेकिन अप्रैल के अंत तक यह संख्या बढ़कर 27 उड़ानें प्रति सप्ताह हो गई। सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में महान एयर की फ्लाइट्स की संख्या 39 तक पहुंच गई। इन अधिकांश उड़ानों का इस्तेमाल यात्रियों को ले जाने के बजाय गुप्त सैन्य और तकनीकी कार्गो (हथियारों के पुर्जों) की डिलीवरी के लिए किया जा रहा था।

अमेरिकी पाबंदियों को दरकिनार कर खेल कर रहा तेल का ‘मास्टरमाइंड’

अमेरिकी पाबंदियों से पंगु हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था को चीन संजीवनी दे रहा है। अमेरिकी सांसदों के अनुसार, चीन ईरान के क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट का 80% से ज्यादा हिस्सा खुद खरीद रहा है। अमेरिकी वित्तीय पाबंदियों को चकमा देने के लिए चीनी बैंकों और छद्म कंपनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे तेहरान तक पैसा आसानी से पहुंच रहा है।

16 सितंबर को बीजिंग में हुई बैठक में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने साफ शब्दों में कहा था कि चीन और ईरान ‘व्यापक रणनीतिक भागीदार’ हैं और चीन ईरान के ‘वैध अधिकारों और हितों’ की रक्षा के लिए सहयोग मजबूत करने को तैयार है।

ट्रंप-जिनपिंग की मीटिंग के बीच अमेरिकी सियासत में भूचाल

वाशिंगटन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, एआई सुरक्षा और ताइवान जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है, लेकिन अमेरिकी संसद में ईरान का मुद्दा सबसे ऊपर आ गया है।

सीनेटर एलिसा स्लॉटकिन समेत कई डेमोक्रेट नेताओं ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखकर मांग की है कि राष्ट्रपति ट्रंप, शी जिनपिंग के सामने चीन की इस ‘सैन्य मदद’ का मुद्दा सख्ती से उठाएं। सीनेटरों ने आरोप लगाया कि चीनी कंपनियां अमेरिकी सैनिकों की हत्या और ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को जिंदा रखने में मदद कर रही हैं।

हालांकि, ट्रंप प्रशासन चीन से सीधे टकराने में थोड़ा हिचकिचा रहा है। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि शी जिनपिंग ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे ईरान को सीधे हथियार नहीं देंगे और वे शी पर भरोसा करते हैं।

चीन की सफाई: ‘हमारी छवि खराब करने की कोशिश’

इन गंभीर आरोपों पर चीन के विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजिंग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह ‘चीन को बदनाम करने की साजिश’ है। चीन का तर्क है कि वह दोहरे उपयोग वाले सामानों के निर्यात पर सख्त नियम लागू करता है और अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं।

Trump Vs CNN: ट्रंप को बड़ा झटका! सीएनएन समेत 3 अमेरिकी मीडिया संस्थानों पर ‘व्हाइट हाउस’ बैन हटाने का आदेश, कोर्ट ने फैसले को बताया असंवैधानिक

Trump Vs CNN: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को मीडिया को लेकर एक कानूनी मामले में बड़ा झटका लगा है। एक अमेरिकी फेडरल अदालत ने CNN, MS NOW और Politico के पत्रकारों को ‘व्हाइट हाउस’ में दोबारा एंट्री देने का आदेश दिया है। अमेरिकी जिला जज टिमोथी केली ने कहा कि इन तीनों मीडिया संस्थानों पर लगाया गया प्रतिबंध संभवतः अमेरिकी संविधान के तहत असंवैधानिक है।

अदालत का यह आदेश उन तीनों मीडिया संस्थानों की ओर से दायर मुकदमे पर आया है, जिसमें उन्होंने व्हाइट हाउस से अपने पत्रकारों को बाहर किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट के आदेश के बाद इन संस्थानों के पत्रकारों की प्रेस क्रेडेंशियल्स बहाल करने का निर्देश दिया गया है।

18 सितंबर को ट्रंप ने लगाया था बैन

राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर को CNN, MS NOW और Politico को ‘व्हाइट हाउस’ से प्रतिबंधित करने का ऐलान किया था। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इन मीडिया संस्थानों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया था कि उन्हें लगातार ‘फिक्शन और झूठ’ लिखने या रिपोर्ट करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इसके बाद 19 सितंबर को तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को व्हाइट हाउस परिसर में एंट्री नहीं दिया गया। उनके प्रेस पास निष्क्रिय या जब्त कर लिए गए। CNN की रिपोर्टर बेट्सी क्लेन, MS NOW की रिपोर्टर अकायला गार्डनर और Politico की व्हाइट हाउस रिपोर्टर चेयेन हैसलेट उन पत्रकारों में शामिल थीं, जिन्हें प्रवेश से रोका गया था।

मीडिया संस्थानों ने कोर्ट में क्या कहा?

CNN, MS NOW और Politico ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर करते हुए कहा कि उनके कवरेज के आधार पर उन्हें चुनिंदा तरीके से ‘व्हाइट हाउस’ से बाहर करना अमेरिकी संविधान के First Amendment यानी प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन है।

तीनों संस्थानों ने यह भी तर्क दिया कि सरकार पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग या प्रकाशित सामग्री के आधार पर सरकारी परिसर में प्रवेश से वंचित नहीं कर सकती। उन्होंने कोर्ट से अपने पत्रकारों का व्हाइट हाउस एक्सेस बहाल करने की मांग की थी।

व्हाइट हाउस का क्या तर्क था?

ट्रंप प्रशासन ने प्रतिबंध का बचाव करते हुए कहा कि ‘व्हाइट हाउस’ में प्रवेश कोई स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा/विशेषाधिकार है। प्रशासन का कहना था कि First Amendment मीडिया संस्थानों को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करने का अधिकार देता है। लेकिन इससे उन्हें व्हाइट हाउस का विशेष प्रेस पास, ब्रीफिंग रूम की सीट या प्रेस पूल में जगह पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। अमेरिकी न्याय विभाग ने भी अदालत में प्रशासन की कार्रवाई का बचाव किया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तर्क पेश किए।

जज ने किस बात पर जताई आपत्ति?

मामले की सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या पत्रकारों का एक्सेस रद्द करने से पहले उन्हें उचित प्रक्रिया का मौका दिया गया था। कोर्ट ने पूर्व के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि व्हाइट हाउस द्वारा किसी पत्रकार का हार्ड पास निलंबित या रद्द करने से पहले संबंधित पत्रकार को पहले से सूचना और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसके बाद अदालत ने तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों का व्हाइट हाउस एक्सेस बहाल करने का आदेश दिया। यह अस्थायी राहत फिलहाल 14 दिनों के लिए लागू रहेगी।

CNN बैन के बाद टीवी प्रेस पूल ने क्या किया?

इस विवाद का असर व्हाइट हाउस के साझा टीवी प्रेस पूल पर भी पड़ा। CNN को राष्ट्रपति की कवरेज करने वाले टेलीविजन पूल से हटाए जाने के बाद अन्य प्रमुख नेटवर्कों ने भी साझा पूल कवरेज को अस्थायी रूप से रोक दिया था। यह पूल राष्ट्रपति के सार्वजनिक कार्यक्रमों और यात्राओं की साझा वीडियो कवरेज उपलब्ध कराता है। CNN के निर्धारित कवरेज कर्तव्यों को लेकर व्हाइट हाउस के फैसले के बाद नेटवर्कों ने पूल कवरेज को आगे जारी न रखने का फैसला किया था।

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ट्रंप ने ईरान को लेकर विकल्पों पर विचार किया, पूछा, ‘पूरे देश को कब तबाह कर दूं?’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह ईरान के साथ जारी संघर्ष को लेकर कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिसमें ईरान पर बड़े हमले का विकल्प भी शामिल है। उन्होंने सवाल किया, “मैं पूरे देश को कब तबाह कर दूं?”

ईरान को एक नई चेतावनी देते हुए श्री ट्रंप ने कहा कि वह ईरान युद्ध को लेकर “फैसला लेने की स्थिति” में हैं और निकट भविष्य में “बहुत बड़ी घटनाएं” होने वाली हैं। श्री ट्रंप की यह टिप्पणी ईरान के उस बयान के बाद आई है जिसमें उसने कहा था कि उसने मध्यस्थों के जरिए होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए अपनी शर्तें अमेरिका तक पहुंचा दी हैं। इस बीच अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।

श्री ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि वह “फैसला लेने की स्थिति” में हैं और निकट भविष्य में “बहुत बड़ी घटनाएं होने वाली हैं।” उन्होंने अपने सामने मौजूद विकल्पों में “ईरान का सफाया करना, उसे आर्थिक रूप से बर्बाद होने देना या कूटनीतिक समझौता करना” बताया है।

उन्होंने कहा, “मेरा सवाल है कि अगर और कब मैं पूरे देश को तबाह कर दूं? उन्हें बेहतर होगा कि वे सही व्यवहार करें।”

श्री ट्रंप ने गुरुवार को भी कहा था कि वह इस बात पर विचार कर रहे हैं कि “ईरान में जाकर उसे पूरी तरह तबाह कर दूं या नहीं।” उन्होंने कहा था कि उनके साथ “कुछ भी हो सकता है।

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श्री ट्रंप की ताजा टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क पहुंचने की उम्मीद है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अन्य वरिष्ठ ईरानी अधिकारी भी उनके साथ आ सकते हैं।

ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि ईरानी अधिकारियों के एक “मुख्य प्रतिनिधिमंडल” को महासभा के उच्चस्तरीय सत्र में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी। श्री ट्रंप ने यह भी संकेत दिया है कि वह संयुक्त राष्ट्र की बैठक के दौरान श्री पेजेश्कियन से मुलाकात के लिए तैयार हो सकते हैं।

‘तस्नीम’ के अनुसार, श्री पेजेश्कियन संयुक्त राष्ट्र की बैठक से इतर कई देशों के नेताओं के साथ बैठक कर सकते हैं। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने रविवार को कहा कि ईरान को अपने विरोधियों का मुकाबला करने के लिए लड़ाई और बातचीत दोनों जारी रखनी चाहिए तथा जब युद्ध के मैदान में स्थिति उसके पक्ष में हो तो कूटनीति का इस्तेमाल करना चाहिए।

अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक स्तर पर जारी लड़ाई कई महीनों से रुकी हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अब भी काफी अधिक है। अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हुआ 60 दिनों का समझौता पिछले महीने समाप्त हो गया। इसके बाद विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हमले बढ़े हैं, जिसे ईरान ने प्रभावी रूप से बंद कर रखा है। अमेरिका ने ईरान के दक्षिणी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी भी जारी रखी है।

ईरान की शर्तों में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करना, ईरान के रोके हुए धन को जारी करना, ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना, ईरान के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप रोकना और ईरानी क्षेत्र पर सभी अमेरिकी हमले रोकना शामिल हैं।

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ईरानी राष्ट्रपति और ट्रंप की होगी सीधी मुलाकात! बैकफुट पर क्यों आ रहे अमेरिका और तेहरान?

Trump Iran President Meeting: करीब 7 महीनों से जारी भीषण युद्ध और तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक नया मोड़ देखने को मिलने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे इस हफ्ते न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात करने के लिए ‘तैयार’ हैं।

यह संभावित मुलाकात ऐसे समय में होने की बात कही जा रही है, जब एक तरफ ईरान ने अमेरिका के सामने बातचीत की 7 शर्तें रखी हैं, तो दूसरी तरफ ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि किसी भी नए अमेरिकी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। आइए आपको बताते हैं इस संभावित मुलाकात के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी।

न्यूयॉर्क में कैसे हो सकती है हाई-प्रोफाइल मुलाकात?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की महासभा में 22 से 28 सितंबर तक चलने वाली बैठकों के सिलसिले में दुनिया भर के नेता न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रपति मासूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची समेत पूरे ईरानी प्रतिनिधिमंडल को अमेरिका आने की अनुमति दे दी है। क्योंकि दोनों नेता एक ही छत के नीचे मौजूद होंगे, इसलिए बिना किसी अलग से बड़े शिखर सम्मेलन के भी साइडलाइन्स पर सीधी बातचीत का रास्ता खुल सकता है।

ईरान ने मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया मैसेज

ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रजाई के मुताबिक, ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका के सामने बातचीत की 7 प्रमुख शर्तें रखी हैं:

  • सभी मोर्चों पर जारी युद्ध को तुरंत रोका जाए।
  • अमेरिका द्वारा फ्रीज किए गए ईरानी फंड और संपत्तियों को तुरंत बहाल किया जाए।
  • ईरान पर लगी अमेरिकी समुद्री/नौसैनिक नाकाबंदी को खत्म किया जाए।
  • कतर, तुर्की और कई अन्य मध्यपूर्वी देश इस बीच बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संदेश पहुंचा रहे हैं।

‘फैसले के मोड़ पर हूं’: ट्रंप की चेतावनी और 3 विकल्प

फॉक्स न्यूज से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे इस समय ‘डिसाइडिंग मोड’ में हैं और आने वाले दिनों में ‘बहुत कुछ बड़ा’ होने वाला है। ट्रंप के पास इस समय 3 मुख्य रास्ते मौजूद हैं:

आर्थिक दबाव: ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध जारी रखना।

सैन्य कार्रवाई: अमेरिका की ओर से सीधा हमला करना।

डिप्लोमैटिक डील: बातचीत के जरिए किसी समझौते पर पहुंचना।

अपनी सख्त बयानबाजी के लिए मशहूर ट्रंप ने ये तक कह दिया कि, ‘मेरा सवाल यह है कि मुझे पूरे देश को कब और कैसे तबाह करना है? बेहतर होगा कि वे सही व्यवहार करें।’

गल्फ देशों के साथ ट्रंप की बड़ी मीटिंग

ट्रंप न्यूयॉर्क में सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के नेताओं से भी अलग से मुलाकात करने वाले हैं। माना जा रहा है कि जंग के अगले चरण पर कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले ट्रंप अपने खाड़ी सहयोगियों की राय सीधे तौर पर सुनना चाहते हैं।

वहीं, ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान का कहना है कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता, लेकिन वे किसी की धौंस या ताकत के आगे झुकेंगे नहीं। इसके साथ ही ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए कच्चे तेल की सप्लाई रोकने को अपने सबसे बड़े हथियार के रूप में देख रहा है।

वैसे ट्रंप की इस मुलाकात की रजामंदी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दोनों देशों के बीच डील पक्की हो गई है। ट्रंप की यह पुरानी कूटनीतिक रणनीति रही है। एक तरफ भारी सैन्य दबाव और सख्त जुबानी हमले, तो दूसरी तरफ टेबल पर बातचीत की खिड़की खुली रखना। अगर यह मुलाकात होती है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की कीमतों के लिहाज से इस साल का सबसे बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है।

इसे स्वीकार ना करें

भारतीय सोलर सेल और पैनलों पर 123.04 प्रतिशत की एंटी-डंपिंग और 126.09 प्रतिशत काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग को भेजा गया है, जो इस पर 14 अक्टूबर को फैसला करेगा।

भारतीय कारोबार पर अमेरिका फिर बड़ा प्रहार करने जा रहा है। वहां के वाणिज्य विभाग ने भारत, इंडोनेशिया, और लाओस से सोलर सेल और सोलर पैनल के आयात पर भारी शुल्क लगाने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है। उसका आरोप है कि “अनुचित सरकारी सब्सिडी” का लाभ उठा कर इन देशों की कंपनियों ने सस्ते उत्पाद बनाए, जिन्हें अमेरिकी बाजार में थोक भाव में उतारा गया। इन तीनों देशों में सबसे ज्यादा शुल्क भारत से होने वाले आयात पर लगाने का इरादा जताया गया है। भारतीय सोलर सेल और पैनलों पर 123.04 प्रतिशत की एंटी-डंपिंग ड्यूटी और 126.09 प्रतिशत प्रतिपूरक (काउंटरवेलिंग) शुल्क लगाने का प्रस्ताव अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग को भेजा गया है, जो इस पर 14 अक्टूबर को फैसला करेगा।

उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिए, तो भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पाद बेचना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसकी बहुत गहरी मार भारतीय सौर उद्योग पर पड़ेगी। फिलहाल, भारत के सौर मॉड्यूल निर्यात का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है। जब से अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए, उससे खाली हुई जगह को भारत और कुछ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भरा। यानी अमेरिकी सौर उद्योग को उसका लाभ नहीं मिला। इसीलिए अमेरिकी सौर कारोबारियों के संगठन इसके खिलाफ लॉबिंग में जुटे रहे हैं। उन्होंने यह प्रचार कर अपने पक्ष में माहौल बनाया कि चीनी पाट-पुर्जों का भारत और अन्य देशों में असेंबल होकर अमेरिका पहुंचना जारी है।

अब उन्हें सफलता मिलती दिख रही है। यह भारत के लिए नई चुनौती है। भारत को इस पर दृढ़ रुख अपनाना चाहिए। एक तरफ भारत तो डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के दबाव में अमेरिकी उत्पादों की खरीदारी बढ़ा रहा है, वहीं भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में पहुंच कठिन होती जा रही है। अतः नरेंद्र मोदी सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि ऐसी गैर-व्यापार रुकावटें भारत को मंजूर नहीं है। ऐसी रुकावटों के रहते अमेरिका से प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सिर्फ ऐसे सख्त रुख से ही भारत अपने सौर एवं अन्य उद्योगों के हित की रक्षा कर सकता है।

‘AI में जीतने वाला ही होगा असली विजेता’, ट्रंप बोले- हम चीन को आगे निकलने नहीं दे सकते

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने AI को लेकर बढ़ती चिंताओं को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है। यह बात ऐसे समय आई है, जब AI इंडस्ट्री के बड़े नाम ही इसकी रफ्तार धीमी करने की बात कर रहे हैं।

ट्रंप ने रविवार को आयरिश ओपन के दौरान पत्रकारों से बात की। उन्होंने कहा कि अमेरिका AI में चीन से आगे है। वह दुनिया का सबसे एडवांस्ड देश है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को यह बढ़त बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘जो AI में जीतेगा, वही विजेता होगा।’

ट्रंप के मुताबिक AI के लिए सुरक्षा नियम बनाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए गार्डरेल्स लगाए जा सकते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसी चिंताएं उठा रहे हैं, जिन्हें उठाने की जरूरत नहीं है।

AI की रफ्तार धीमी करने की मांग क्यों उठी?

Anthropic के CEO डारियो अमोडेई ने शनिवार को एक लंबा ब्लॉग लिखा। इसमें उन्होंने AI इंडस्ट्री से विकास की रफ्तार धीमी करने की अपील की। अमोडेई ने कहा कि AI के सबसे एडवांस्ड मॉडल तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है।

उन्होंने इसके लिए इंडस्ट्री और दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच तालमेल की जरूरत बताई। अमोडेई ने अपनी कंपनी के लिए नए सुरक्षा कदमों का भी ऐलान किया। इनमें स्वतंत्र थर्ड पार्टी से AI मॉडल की जांच कराना शामिल है।

OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन ने भी इस विचार का समर्थन किया। xAI के प्रमुख एलन मस्क ने भी अमोडेई की बात का समर्थन किया। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि AI कंपनियां वास्तव में अपनी रफ्तार कितनी कम करेंगी। खासकर तब, जब उनके सबसे एडवांस्ड AI मॉडल ही कमाई का बड़ा जरिया बन रहे हैं।

ट्रंप प्रशासन भी सुरक्षा पर कर रहा काम

अमेरिकी नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के डायरेक्टर केविन हैसेट ने भी AI सुरक्षा पर बात की। उन्होंने कहा कि अमोडेई का प्रस्ताव प्राइवेट कंपनियों के लिए एक मॉडल बन सकता है। इसमें स्वतंत्र लोगों को AI मॉडल की जांच का मौका देना शामिल है।

हैसेट ने AI सिक्योरिटी को ऐसी समस्या बताया, जिसका सॉल्यूळशंस निकाला जा सकता है। हालांकि उन्होंने एक बड़ी चिंता भी जताई। उनके मुताबिक AI इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है कि वह मौजूदा साइबर सिक्योरिटी सिस्टम को भी पीछे छोड़ सकता है। दूसरी तरफ, AI कंपनियां भी नए सुरक्षा उपाय तैयार कर रही हैं।

अमेरिका में AI के खिलाफ बढ़ रहा गुस्सा

AI को लेकर अमेरिका में सिर्फ टेक इंडस्ट्री के भीतर ही बहस नहीं हो रही। आम लोगों की चिंताएं भी बढ़ रही हैं। नए AI डेटा सेंटर बड़ी मात्रा में बिजली और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर दबाव बढ़ने की बात कही जा रही है।

लोगों को यह भी डर है कि AI उनकी नौकरियां छीन सकता है। बिजली के बिल बढ़ने की चिंता भी सामने आ रही है। यही वजह है कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में AI एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

AI में पैसा लग रहा है, तो कमाई कितनी होगी?

निवेशकों की चिंता सिर्फ AI की सुरक्षा को लेकर नहीं है। बाजार में एक और सवाल चल रहा है। AI और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर कंपनियां अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। लेकिन क्या इस खर्च से उतनी कमाई होगी? यही असली सवाल है।

अगर खर्च बढ़ता गया और रिटर्न उम्मीद के मुताबिक नहीं आया, तो टेक शेयरों पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर उन कंपनियों पर, जिनकी वैल्यूएशन पहले ही काफी ज्यादा है। फिलहाल ट्रंप का रुख साफ है। वह AI की रफ्तार कम करने के बजाय अमेरिका की बढ़त बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि सुरक्षा के उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन AI की दौड़ में अमेरिका पीछे नहीं रह सकता।

चिप स्टॉक्स क्रैश होंगे? अल्टमैन और मस्क की बात से निवेशकों की चिंता बढ़ी

BRICS Summit 2026: दिल्ली में मौजूद रहेंगे दुनिया के ये ताकतवर नेता, ब्रिक्स सम्मेलन के लिए कौन-कौन आ रहा, ये रही पूरी लिस्ट

BRICS Summit 2026: दुनिया भर में बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच, भारत शनिवार से शुरू हो रहे दो दिन के ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का इस्तेमाल इस समूह को आर्थिक विकास के एक सहयोगी इंजन के तौर पर पेश करने के लिए कर रहा है। साथ ही, भारत ‘ग्लोबल साउथ’ की विकास से जुड़ी मुख्य प्राथमिकताओं—खासकर खाद्य, ऊर्जा और सप्लाई चेन की सुरक्षा—की वकालत भी कर रहा है।

बता दें कि नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की तैयारियां पूरी हो रही हैं, और चीन ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इसमें शामिल होने की पुष्टि भी कर दी है। करीब सात साल बाद यह उनकी भारत यात्रा होगी।

इस अहम बैठक में शामिल होने वाले अन्य शीर्ष नेताओं में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो शामिल हैं।

भारत के शीर्ष अधिकारियों ने गुरुवार को कहा कि भारत ‘ग्लोबल साउथ’ की मुख्य विकास प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए ब्रिक्स (BRICS) समूह को एक अहम और पूरक मंच के तौर पर आगे बढ़ा रहा है।

उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार विवादों और भू-राजनीतिक बदलावों से पैदा हो रही आर्थिक चुनौतियों के बीच, हम खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा स्थिरता और मजबूत सप्लाई चेन से जुड़ी अहम कमजोरियों को दूर करने पर ध्यान दे रहे हैं।

BRICS Summit के बीच ग्लोबल इकोनॉमी के सामने बड़ी चुनौतियां

बता दें कि नई दिल्ली में यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट (खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी) और ट्रंप प्रशासन की व्यापार व टैरिफ नीतियों के बुरे असर का सामना कर रही है।

समिट शुरू होने में बस दो दिन बचे हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि ग्रुप के सदस्य देश किसी साझा बयान पर सहमत हो पाए हैं या नहीं, क्योंकि पश्चिम एशिया संकट को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच मतभेद बने हुए हैं। यह ग्रुप आम सहमति के आधार पर काम करता है।

BRICS में शुरू में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका शामिल थे। 2024 में इसका विस्तार हुआ और इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को शामिल किया गया, जबकि इंडोनेशिया 2025 में इसमें शामिल होगा।

पिछले साल बेलारूस, बोलीविया, कज़ाकिस्तान, क्यूबा, ​​मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम BRICS के पार्टनर देश बने।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में BRICS का बढ़ता दबदबा

ध्यान दे कि BRICS एक प्रभावशाली ग्रुप के तौर पर उभरा है, क्योंकि यह दुनिया की 11 बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाता है। ये देश दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत GDP और लगभग 26 प्रतिशत व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारत की BRICS की अध्यक्षता चार मुख्य स्तंभों— मजबूती (resilience), इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी पर आधारित है।

अधिकारियों ने बताया कि मजबूती वाले हिस्से के तहत, भारत स्वास्थ्य, कृषि, भोजन, ऊर्जा, आपदा जोखिम कम करने और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सामूहिक सहयोग को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है।

उन्होंने कहा कि व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और हाई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना भी समिट के एजेंडे में अहम होगा।

भारत की BRICS अध्यक्षता का थीम क्या है?

भारत की BRICS अध्यक्षता का थीम है: ‘मजबूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण’। यह थीम लोगों पर केंद्रित उस नजरिए को दिखाता है जो “मानवता सबसे पहले” की भावना पर आधारित है।

विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, इन मुद्दों के अलावा BRICS देशों के नेता आपसी प्राथमिकताओं पर सहयोग मजबूत करने को लेकर भी चर्चा करेंगे। साथ ही, वे दुनिया और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े ऐसे मुद्दों पर अपने विचार साझा करेंगे, जो सभी देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इस साल भारत की अध्यक्षता में BRICS को मजबूत करने के लिए देश के 25 से ज्यादा शहरों में 350 से अधिक बैठकें और बड़े स्तर की चर्चाएं आयोजित की गई हैं। इनका मकसद BRICS की रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना है। यह साझेदारी तीन मुख्य क्षेत्रों पर आधारित है—राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय, तथा सांस्कृतिक और लोगों के बीच आपसी संपर्क।

भारत चौथी बार संभाल रहा BRICS की कमान

भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है। इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में BRICS की अध्यक्षता कर चुका है। 1 जनवरी 2026 को भारत ने चौथी बार BRICS की अध्यक्षता संभाली है।

बंद कमरे की बैठक से लेकर फैमिली फोटो तक, ऐसा रहेगा पहला दिन

विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, शिखर सम्मेलन की शुरुआत शनिवार को दोपहर 2:35 बजे BRICS सदस्य देशों के लिए ‘समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना’ (Inclusive Global Governance and Strengthening Multilateralism) विषय पर एक बंद कमरे में होने वाले सत्र (closed-door session) के साथ होगी।

इस सत्र के बाद, नेता ‘भारत इनोवेट्स प्रदर्शनी’ (Bharat Innovates Exhibition) का दौरा करेंगे, जिसका उद्घाटन शाम 4:25 बजे होना है। शाम 5:05 बजे, नेता ‘भारत मंडपम’ – जो शिखर सम्मेलन का स्थल है – के लॉन में एक ‘फैमिली फोटो’ (सामूहिक तस्वीर) के लिए इकट्ठा होंगे, जिसके बाद संयुक्त रूप से वृक्षारोपण समारोह होगा। पहले दिन के कार्यक्रमों का समापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शाम 7:30 बजे आयोजित एक भव्य रात्रिभोज (gala dinner) के साथ होगा।

रविवार को BRICS के सदस्य देशों, पार्टनर देशों और आमंत्रित देशों के नेता सुबह 9:55 बजे से भारत मंडपम पहुंचना शुरू करेंगे। इसके बाद सुबह 10:35 बजे आधिकारिक ग्रुप फोटो ली जाएगी।

विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार, ‘रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी: शेपिंग द फ्यूचर फॉर इंक्लूसिव ग्लोबल ग्रोथ’ (लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता: समावेशी वैश्विक विकास के लिए भविष्य को आकार देना) विषय पर उद्घाटन सत्र सुबह 10:50 बजे शुरू होगा।

यह शिखर सम्मेलन ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ (New Delhi Declaration) जारी होने के साथ संपन्न होगा।

दक्षिण अफ्रीका की एंट्री से BRIC बना BRICS

2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में औपचारिक रूप से गठित BRIC ने अपना पहला शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया था।

2010 में UNGA के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने पर सहमति बनने के बाद यह समूह BRICS बन गया, और दक्षिण अफ्रीका ने 2011 में सान्या में हुए अपने पहले शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया।

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Hormuz Strait में अमेरिकी पनडुब्बी पकड़ने का ईरान का दावा, ट्रंप के सामने बढ़ी चुनौती

Hormuz Strait में अमेरिकी पनडुब्बी पकड़ने का ईरान का दावा, ट्रंप के सामने बढ़ी चुनौती

donald trump

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट से बड़ी खबर सामने आई है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया है कि उसने होर्मुज स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के पास एक अमेरिकी बिना क्रू वाले अंडरवाटर व्हीकल को पकड़ लिया है। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, यह डिवाइस कैलिफोर्निया की डिफेंस कंपनी एंडुरिल का बनाया हुआ DIVE-LD ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि होर्मुज स्ट्रेट में हुए इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है।

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हालांकि, अमेरिका ने इस घटना को अलग तरीके से पेश किया है। पेंटागन के एक प्रवक्ता के मुताबिक, एक अंडरवाटर ड्रोन एक दिन से ज्यादा पहले खराब हो गया था। अमेरिकी पक्ष ने कहा कि यह ड्रोन चल रहे ऑपरेशन के समर्थन में इलाके के पानी का सर्वे कर रहा था।

ईरान ने क्या दावा किया?

 

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की नेवी ने दावा किया कि उसने होर्मुज स्ट्रेट के एंट्री पॉइंट पर अमेरिकी सेना के एक आधुनिक मानवरहित सबमर्सिबल को अपने कब्जे में ले लिया। ईरानी सरकारी मीडिया ने इसे DIVE-LD बताया है। यह एक बड़े आकार का ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल है, जिसे समुद्र के भीतर बिना चालक के अलग-अलग मिशन को अंजाम देने के लिए डिजाइन किया गया है। ईरानी पक्ष ने दावा किया कि यह सिस्टम अत्याधुनिक तकनीक से लैस था।

क्या है DIVE-LD और इसका इस्तेमाल किस काम में होता है?

DIVE-LD एक ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल है। कंपनी के मुताबिक करीब 19 फीट यानी 5.8 मीटर लंबा यह सबमर्सिबल कई तरह के समुद्री मिशन में इस्तेमाल किया जा सकता है।

 

इसके संभावित मिशनों में—

 

समुद्र के भीतर माइंस की पहचान और उनसे निपटने से जुड़े ऑपरेशन

सीबेड मैपिंग

समुद्र के भीतर जानकारी जुटाना

केबल और पाइपलाइन जैसे अंडरवाटर इंफ्रास्ट्रक्चर का निरीक्षण शामिल हैं।

 

अमेरिका ने क्या कहा?

 

ईरान के दावे के बाद अमेरिकी रक्षा विभाग ने घटना को लेकर अलग बयान दिया। पेंटागन के प्रवक्ता ने कहा कि एक अंडरवाटर ड्रोन एक दिन से अधिक समय पहले खराब हो गया था। उनके मुताबिक यह ड्रोन चल रहे ऑपरेशन के समर्थन में इलाके के पानी का सर्वे कर रहा था। अमेरिकी पक्ष ने यह भी कहा कि खराब हुआ ड्रोन पुराना मॉडल था और उसमें संवेदनशील डेटा इकट्ठा करने की क्षमता या क्लासिफाइड सोनार अथवा रडार उपकरण नहीं था। इस तरह ईरान और अमेरिका के बयानों में घटना की अहमियत को लेकर स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है।

 

एंडुरिल ने भी की अपने सिस्टम के नुकसान की पुष्टि

 

DIVE-LD बनाने वाली अमेरिकी कंपनी एंडुरिल ने अपने एक सिस्टम के नुकसान की पुष्टि की है, लेकिन कंपनी ने घटना को लेकर इसकी अहमियत कम करके बताई। कंपनी के अनुसार DIVE-LD एक ऐसा ऑटोनॉमस सिस्टम है जिसे खतरनाक वातावरण में काम करने के लिए तैयार किया गया है और ऐसे मिशनों में वाहन के नुकसान की संभावना को डिजाइन का हिस्सा माना जाता है।

 

समुद्र में मानवरहित सिस्टम पर अमेरिका का बढ़ता जोर

 

अमेरिकी सेना पिछले कुछ समय से मानवरहित नेवल सिस्टम में निवेश बढ़ा रही है। इनमें समुद्र की सतह पर और पानी के भीतर काम करने वाले ऑटोनॉमस सिस्टम शामिल हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल बड़े समुद्री इलाकों की निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और दुश्मन के जहाजों या पनडुब्बियों पर नजर रखने जैसे अभियानों में किया जा सकता है। इसका एक बड़ा फायदा यह है कि ऐसे मिशनों में मानव सैनिकों को सीधे खतरे में डालने की जरूरत कम हो सकती है।

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ईरान पर अमेरिका ने लगाए नए प्रतिबंध

 

होर्मुज स्ट्रेट की घटना के बीच अमेरिका ने ईरान के विमानन क्षेत्र पर भी नए प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी परिसंपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के विमानन नेटवर्क, हथियारों के हस्तांतरण और कथित अवैध खरीद योजनाओं से जुड़े 36 संस्थाओं और व्यक्तियों को प्रतिबंधों के दायरे में रखा है।

 

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इन प्रतिबंधों का निशाना ईरान की सक्रिय एयरलाइंस के साथ-साथ वे विदेशी बिचौलिए, मुखौटा कंपनियां और अन्य संस्थाएं हैं, जिन पर ईरान को विमान, विमान के कलपुर्जे और विमानन तकनीक हासिल करने में मदद करने का आरोप है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान के विमानन क्षेत्र का इस्तेमाल उसके शासन की गतिविधियों और कथित आतंकवादी नेटवर्क को समर्थन देने के लिए किया जाता रहा है।

 

होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

 

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। यही वजह है कि यहां किसी अमेरिकी सैन्य सिस्टम के पकड़े जाने या क्षतिग्रस्त होने की घटना को लेकर तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

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ईरान और अमेरिका के बीच पहले से जारी तनाव के बीच यह घटनाक्रम ट्रंप प्रशासन के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है। हालांकि, अमेरिका की ओर से ड्रोन को लेकर दिया गया बयान यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन इस घटना को ईरानी दावे के मुताबिक बड़ा सैन्य झटका नहीं मान रहा है।