Retirement Planning: रिटायरमेंट के बाद नियमित कमाई चाहिए? जानिए आपके लिए कौन-सी स्कीम बेस्ट

Retirement Planning: रिटायरमेंट प्लानिंग अब सिर्फ बचत तक सीमित नहीं रह गई है। बढ़ती उम्र, महंगाई और इलाज का खर्च देखते हुए समय रहते बड़ा रिटायरमेंट फंड बनाना जरूरी हो गया है। नौकरीपेशा लोगों को EPF का फायदा मिलता है। लेकिन इसके अलावा भी कई सरकारी और मार्केट से जुड़ी स्कीम हैं, जो रिटायरमेंट के बाद नियमित आय का सहारा बन सकती हैं।

NPS (National Pension System)

NPS सरकार की रिटायरमेंट स्कीम है। इसे PFRDA रेगुलेट करता है। इसमें नौकरीपेशा और स्वरोजगार करने वाले, दोनों निवेश कर सकते हैं।

इसमें पैसा इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड, सरकारी बॉन्ड और दूसरे एसेट्स में लगाया जाता है। रिटायरमेंट पर कुछ रकम एकमुश्त निकाली जा सकती है। बाकी रकम से एन्युटी खरीदनी होती है, जिससे हर महीने पेंशन मिलती है। इसमें टैक्स छूट का भी फायदा मिलता है।

EPF (Employees’ Provident Fund)

EPF संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए सबसे लोकप्रिय रिटायरमेंट स्कीम है। हर महीने कर्मचारी और कंपनी, दोनों बेसिक सैलरी और DA का तय हिस्सा जमा करते हैं।

इस पर EPFO हर साल ब्याज तय करता है। फिलहाल ब्याज दर 8.25% सालाना है। रिटायरमेंट पर पूरा फंड निकाला जा सकता है। वहीं, इलाज, घर खरीदने या पढ़ाई जैसी जरूरतों के लिए कुछ शर्तों के साथ आंशिक निकासी भी की जा सकती है।

PPF (Public Provident Fund)

PPF सरकार समर्थित लंबी अवधि की बचत योजना है। इसकी मैच्योरिटी 15 साल की होती है, जिसे 5-5 साल के ब्लॉक में बढ़ाया जा सकता है।

इसकी ब्याज दर सरकार तय करती है। रिटर्न बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होता। इसमें टैक्स छूट का भी फायदा मिलता है। यह लंबी अवधि में सुरक्षित रिटायरमेंट फंड बनाने का अच्छा विकल्प माना जाता है।

APY (Atal Pension Yojana)

अटल पेंशन योजना मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए शुरू की गई थी। हालांकि, पात्रता पूरी करने वाले दूसरे लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं।

इसमें कामकाजी उम्र के दौरान नियमित निवेश करना होता है। तय उम्र के बाद हर महीने गारंटीड पेंशन मिलती है। पेंशन की रकम आपके योगदान और चुने गए विकल्प पर निर्भर करती है।

SCSS (Senior Citizens’ Savings Scheme)

SCSS खास तौर पर रिटायर हो चुके लोगों के लिए है। इसमें बैंक और पोस्ट ऑफिस के जरिए निवेश किया जा सकता है।

सरकार समय-समय पर इसकी ब्याज दर तय करती है। ब्याज नियमित अंतराल पर मिलता है, इसलिए रिटायरमेंट के बाद नियमित आय चाहने वालों के बीच यह काफी लोकप्रिय है।

म्यूचुअल फंड

सरकारी योजनाओं के अलावा म्यूचुअल फंड भी रिटायरमेंट फंड बनाने का अच्छा विकल्प हो सकते हैं। लंबी अवधि में इक्विटी म्यूचुअल फंड बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, इनमें बाजार का जोखिम भी रहता है।

SIP के जरिए हर महीने निवेश करने से लंबे समय में कंपाउंडिंग का फायदा मिल सकता है। रिटायरमेंट के करीब पहुंचने पर कई निवेशक डेट फंड जैसे स्थिर विकल्पों का रुख करते हैं। इनमें जोखिम कम होता है।

कौन-सी स्कीम चुनें?

हर व्यक्ति के लिए एक ही रिटायरमेंट प्लान सही नहीं हो सकता। सही विकल्प आपकी उम्र, आय, नौकरी, जोखिम लेने की क्षमता और रिटायरमेंट के लक्ष्य पर निर्भर करता है फाइनेंशयल एडवाइजर आमतौर पर सिर्फ एक स्कीम पर निर्भर रहने से बचने की सलाह देते हैं। उनके मुताबिक- आपको अलग अलग स्कीमों में निवेश करना चाहिए, ताकि जोखिम कम रहे।

उदाहरण के लिए, नौकरीपेशा लोगों के लिए EPF आधार बन सकता है। वहीं NPS, PPF और म्यूचुअल फंड अतिरिक्त रिटायरमेंट फंड बनाने में मदद कर सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद SCSS जैसी स्कीम नियमित कमाई का अच्छा जरिया बन सकती है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Personal Loan Prepayment: पर्सनल लोन समय से पहले चुकाना सही है या नहीं? समझिए कब होगा फायदा

Personal Loan Prepayment: पर्सनल लोन लेते समय ज्यादातर लोग सिर्फ EMI देखते हैं। लेकिन कुछ महीने बाद जब बोनस मिलता है या बचत बढ़ती है, तो मन में सवाल आता है कि क्या लोन समय से पहले चुका देना चाहिए?

इसका जवाब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। कई बार प्रीपेमेंट से लाखों रुपये का ब्याज बच जाता है। लेकिन कई बार फायदा बहुत कम होता है। इसलिए फैसला लेने से पहले कुछ बातें समझना जरूरी है।

सबसे ज्यादा फायदा कब होता है?

पर्सनल लोन की EMI में शुरुआत में ब्याज का हिस्सा ज्यादा होता है। धीरे-धीरे ब्याज कम होता जाता है और मूलधन (Principal) का हिस्सा बढ़ता जाता है।

यानी अगर आप लोन की शुरुआत में प्रीपेमेंट करते हैं, तो ज्यादा ब्याज बचा सकते हैं। अगर आखिरी साल में लोन चुकाते हैं, तो बचत बहुत कम होती है।

उदाहरण से समझिए

मान लीजिए आपने ₹5 लाख का पर्सनल लोन 5 साल के लिए 15% सालाना ब्याज पर लिया है। इस पर EMI करीब ₹11,895 बनेगी। पूरे 5 साल में कुल भुगतान करीब ₹7.14 लाख होगा यानी सिर्फ ब्याज के तौर पर करीब ₹2.14 लाख चुकाने होंगे।

अब मान लीजिए आपने 12 महीने बाद ₹2 लाख का प्रीपेमेंट कर दिया। ऐसी स्थिति में आपकी बची हुई ब्याज की रकम में हजारों रुपये की कमी आ सकती है। अगर बैंक प्रीपेमेंट चार्ज कम लेता है, तो यह फैसला काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।

ब्याज दर ज्यादा है तो सोचिए जरूर

पर्सनल लोन की ब्याज दर आमतौर पर 10% से 24% तक हो सकती है। यह होम लोन से काफी ज्यादा होती है। अगर आपका लोन 14%, 15% या 16% पर चल रहा है, तो जल्दी चुकाने से अच्छी बचत हो सकती है। लेकिन अगर किसी कंपनी स्कीम या ऑफर के तहत आपको कम ब्याज पर लोन मिला है, तो पहले हिसाब जरूर लगाएं।

प्रीपेमेंट चार्ज जरूर देखें

ज्यादातर बैंक और NBFC लोन समय से पहले बंद करने पर 2% से 5% तक फोरक्लोजर या प्रीपेमेंट चार्ज लेते हैं। कई बैंक पहले 6 या 12 महीने तक प्रीपेमेंट की अनुमति भी नहीं देते। इसलिए पहले यह देखें कि ब्याज में जितनी बचत होगी, वह चार्ज से ज्यादा है या नहीं।

पूरी बचत लोन में मत लगा दीजिए

मान लीजिए आपके पास ₹3 लाख की बचत है और आपने पूरी रकम लोन चुकाने में लगा दी। एक महीने बाद अगर मेडिकल इमरजेंसी में ₹2 लाख की जरूरत पड़ जाए, तो फिर आपको नया लोन या क्रेडिट कार्ड लेना पड़ सकता है। इसलिए लोन चुकाने के बाद भी कम से कम 3 से 6 महीने के खर्च जितनी रकम इमरजेंसी फंड के रूप में जरूर बचाकर रखें।

होम लोन लेना है तो पहले पर्सनल लोन खत्म करें

अगर आने वाले समय में आप होम लोन लेने वाले हैं, तो पर्सनल लोन पहले बंद करना फायदेमंद हो सकता है। इससे आपकी Debt-to-Income (DTI) Ratio बेहतर होती है। बैंक आपकी कुल EMI देखते हैं। EMI कम होगी तो नए लोन की मंजूरी मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

कब प्रीपेमेंट करने की जरूरत नहीं?

अगर आपका लोन आखिरी साल में पहुंच चुका है, तो जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है। तब तक ज्यादातर ब्याज चुकाया जा चुका होता है। इसी तरह अगर आपके पास ऐसा निवेश का मौका है, जहां 15% रिटर्न मिलने की संभावना है और आपका लोन 11% पर है, तो पहले निवेश करना ज्यादा समझदारी हो सकती है। हालांकि, इसमें जोखिम का भी ध्यान रखें।

आपका फैसला क्या होना चाहिए?

पर्सनल लोन का प्रीपेमेंट तब सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है, जब लोन शुरुआती दौर में हो, ब्याज दर ज्यादा हो और प्रीपेमेंट चार्ज कम हो। लेकिन सिर्फ कर्ज खत्म करने के लिए अपनी पूरी बचत खर्च करना सही नहीं है। पहले हिसाब लगाइए, फिर फैसला लीजिए। कई बार थोड़ा इंतजार करना भी आपके लिए ज्यादा फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Video: 1 लाख रुपये कमाने वाले लोग हो जाएं अलर्ट, जानिए क्यों बताई गई यह इनकम खतरनाक

हर महीने 1 लाख रुपये की सैलरी पाना कई लोगों के लिए आर्थिक सफलता का संकेत माना जाता है। ये आय स्तर एक आरामदायक जीवन जीने, जरूरी खर्च पूरे करने और कुछ इच्छाओं को पूरा करने की क्षमता देता है। लेकिन अब इसी कमाई को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। साल 2026 में एक सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर ने दावा किया है कि 1 लाख रुपये प्रति माह की सैलरी कई लोगों के लिए एक तरह का ‘कम्फर्ट ट्रैप’ बन सकती है।

उनके अनुसार, समस्या कमाई की रकम में नहीं बल्कि उस संतुष्टि में है, जो व्यक्ति को बड़े लक्ष्य तय करने से रोक सकती है। इस विचार ने सोशल मीडिया पर लोगों के बीच चर्चा छेड़ दी है, जहां कुछ लोग इससे सहमत हैं तो कुछ इसे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से अलग मान रहे हैं।

कंटेंट क्रिएटर ने बताया ‘सबसे खतरनाक सैलरी’

इंस्टाग्राम पर पर्सनल फाइनेंस और माइंडसेट से जुड़े वीडियो बनाने वाली निधि कुशवाहा ने कहा कि 1 लाख रुपये प्रति माह की सैलरी कम होना इसकी समस्या नहीं है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी चुनौती इसका आरामदायक होना है। उनका कहना है कि इतनी आय कई लोगों को इतना संतुष्ट कर सकती है कि व बड़े सपने देखने और आगे बढ़ने की कोशिश कम कर दें।

आराम कब बन जाता है करियर की रुकावट?

निधि के मुताबिक, 1 लाख रुपये की मासिक कमाई से लोग किराया, रोजमर्रा के खर्च, वीकेंड आउटिंग और साल में एक-दो ट्रिप जैसी चीजें आसानी से मैनेज कर लेते हैं। यही सुविधा कई बार लोगों को अपनी सीमाओं से बाहर निकलने और नए जोखिम लेने से रोक सकती है। उनका मानना है कि जब इंसान को लगता है कि जिंदगी पूरी तरह सेट हो गई है, तो आगे बढ़ने की भूख धीरे-धीरे कम हो सकती है।

‘ज्यादा कमाने की चाह’ खत्म होने का खतरा

निधि ने अपने वीडियो में कहा कि असली खतरा कम आय में नहीं बल्कि उस स्थिति में है, जहां व्यक्ति आरामदायक जीवन में इतना खुश हो जाए कि नए लक्ष्य बनाना छोड़ दे। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि सिर्फ आरामदायक कमाई पर रुकने के बजाय लगातार सीखने, निवेश करने और नए अवसर तलाशने पर ध्यान देना चाहिए।

सोशल मीडिया पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया

वीडियो वायरल होने के बाद लोगों ने इस पर अलग-अलग राय रखी। कुछ यूजर्स ने माना कि ज्यादा आराम इंसान को आगे बढ़ने से रोक सकता है। वहीं कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या जीवन में सफलता का पैमाना हमेशा ज्यादा पैसा कमाना ही होना चाहिए।

एक यूजर ने पूछा कि अगर 10 लाख रुपये महीने की सैलरी हो तो क्या वह भी खतरनाक होगी? वहीं कुछ लोगों ने महंगाई का हवाला देते हुए कहा कि आज के समय में 1 लाख रुपये की कमाई उतनी बड़ी नहीं रही जितनी पहले मानी जाती थी।

असली सवाल

इस बहस का कोई तय जवाब नहीं है कि कौन-सी सैलरी इंसान को रोक देती है। कुछ लोगों के लिए 1 लाख रुपये की आय आर्थिक स्थिरता हो सकती है, जबकि दूसरों के लिए ये सिर्फ एक पड़ाव।

विशेषज्ञों का मानना है कि आय चाहे जितनी हो, सही बचत, निवेश और नए लक्ष्य बनाते रहना जरूरी है, ताकि आराम विकास की राह में बाधा न बने।

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Mutual Fund SIF: म्यूचुअल फंड बेचने वालों के लिए आएगी नई परीक्षा, SEBI और NISM कर रहे तैयारी

Mutual Fund SIF: सेबी (SEBI) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज मार्केट्स (NISM) मिलकर नई परीक्षा लाने की तैयारी कर रहे हैं। यह परीक्षा म्यूचुअल फंड और स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) बेचने वाले डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए होगी।

यह जानकारी सेबी के होल टाइम मेंबर अमरजीत सिंह ने नई दिल्ली में ASSOCHAM के 17वें म्यूचुअल फंड समिट में दी।

नई परीक्षा क्यों लाई जा रही है?

अमरजीत सिंह ने कहा कि इस परीक्षा का मकसद डिस्ट्रीब्यूटर्स की समझ को और बेहतर बनाना है।

उनका कहना है कि जो लोग म्यूचुअल फंड और SIF बेचते हैं, उन्हें इन प्रोडक्ट्स की पूरी जानकारी होनी चाहिए। नई परीक्षा इसी बात को सुनिश्चित करेगी।

SIF को मिला अच्छा रिस्पॉन्स

अमरजीत सिंह ने बताया कि पिछले साल शुरू स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) को निवेशकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है।

31 मई 2026 तक SIF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 13,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। इस दौरान 56,000 से ज्यादा फोलियो खुले।

21 नई इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी लॉन्च

SIF के तहत अब तक 21 इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी लॉन्च की जा चुकी हैं।

इनमें Hybrid Long Short Strategy में सबसे ज्यादा निवेश आया है। इससे पता चलता है कि निवेशकों की दिलचस्पी नए तरह के निवेश विकल्पों में बढ़ रही है।

Life Cycle Fund पर भी जोर

अमरजीत सिंह ने सेबी के नए Life Cycle Fund फ्रेमवर्क का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन फंड्स में समय के साथ निवेश का बंटवारा अपने-आप बदलता रहता है। जैसे-जैसे आपका लक्ष्य करीब आता है, वैसे-वैसे जोखिम कम होता जाता है।

उनका कहना है कि ऐसे फंड लोगों को लंबे समय तक लक्ष्य के हिसाब से निवेश करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

सोशल मीडिया देखकर निवेश न करें

अमरजीत सिंह ने कहा कि सिर्फ सोशल मीडिया पर चल रहे ट्रेंड देखकर निवेश नहीं करना चाहिए।

उन्होंने सलाह दी कि निवेश हमेशा अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम उठाने की क्षमता और कितने समय के लिए निवेश करना है, इन बातों को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

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SIP Calculator: मंथली 2000 रुपये की SIP से 10 लाख का फंड कितने समय में तैयार होगा? आसानी से समझें पूरा कैलकुलेशन

SIP Calculator: कई लोग निवेश शुरू करन के लिए इनकम बढ़ने का इंतजार करते हैं। इनकम बढ़ने पर खर्च भी बढ़ जाते हैं। इस वजह से वे निवेश शुरू करने के लिए सही मौके का इंतजार करते रह जाते हैं। सच यह है कि निवेश शुरू करने के लिए ज्यादा इनकम जरूरी नहीं है। आप कम इनकम से भी निवेश की शुरुआत कर सकते हैं। खासकर आप सिप से म्यूचुअल फंड की स्कीम में कम अमाउंट से निवेश शुरू कर बड़ा फंड तैयार कर सकते हैं। आइए यहां पूरा कैलकुलेशन समझते हैं।

निवेश में बरतना होगा अनुशासन

एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेश में सबसे जरूरी अनुशासन है। अगर आप 2000 रुपये से निवेश शुरू करते हैं और लंबी अवधि तक हर महीने निवेश करना जारी रखते हैं तो आप आसानी से बड़ा फंड तैयार कर सकते हैं। म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में निवेश करने पर सालाना कम से कम 12 फीसदी का रिटर्न आराम से मिल जाता है। कई बार इससे ज्यादा यानी 14 फीसदी या 16 फीसदी तक रिटर्न मिल जाता है। लंबी अवधि के निवेश में सबसे बड़ा फायदा कंपाउंडिंग का मिलता है।

लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का ज्यादा फायदा

कंपाउंडिंग का मतलब यह है कि निवेश के रिटर्न पर भी आपको रिटर्न मिलता है। इससे आपका पैसा तेजी से बढ़ता है। कंपाउंडिंग की वजह से छोटे अमाउंट के निवेश से भी लंबी अवधि में आसानी से बड़ा फंड तैयार हो जाता है। जो इनवेस्टर कंपाउंडिंग के मैजिक को समझ जाते हैं वे निवेश में अनुशासन बनाए रखते हैं। इससे 10-15 साल में उनके लिए आसानी से बड़ा फंड तैयार हो जाता है।

आइए एक टेबल की मदद से समझते हैं कि हर महीने 2000 रुपये के SIP निवेश से 10 लाख रुपये का फंड तैयार होने में कितना समय लगेगा।

अनुमानित सालाना रिटर्न10 लाख का फंड तैयार होने में अनुमानित समय
12%15 साल कुछ महीने
14%14 साल कुछ महीने
16%13 साल कुछ महीने

अगर आप कम समय में बड़ा फंड तैयार करना चाहते हैं तो आप स्टेट-अप स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल कर सकते हैं। स्टेप-अप स्ट्रेटेजी में हर साल सिप का अमाउंट बढ़ा दिया जाता है। इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते हैं। मान लीजिए आप निवेश की शुरुआत मंथली 2000 रुपये के निवेश से करते हैं। दूसरे साल आप निवेश का अमाउंट 10 फीसदी बढ़ा देते हैं। तीसरे साल भी आप SIP का अमाउंट 10 फीसदी बढ़ा देते हैं। इस स्ट्रेटेजी से कम समय में आपके लिए काफी बड़ा फंड आसानी से तैयार हो जाता है।

आइए समझते हैं कि स्टेप-अप सिप से 10 लाख रुपये का SIP तैयार करने में कितना समय लगेगा।

सामान्य SIP से 10 लाख10% स्टेप-अप SIP से 10 लाखसमय की बचतअनुमानित सालाना रिटर्न
15 साल कुछ महीने12 साल कुछ महीने3 साल12%
14 साल कुछ महीने11 साल कुछ महीने3 साल14%
13 साल कुछ महीने11 साल कुछ महीने2 साल16%

स्टेप-अप सिप के फायदे

स्टेप-अप सिप में हम देखते हैं कि हर महीने 2000 रुपये के SIP निवेश से 10 लाख रुपये का फंड तैयार होने में कम समय लगता है। चूंकि, आप SIP अमाउंट हर साल सिर्फ 10 फीसदी बढ़ाते हैं, जिससे आपको किसी तरह की दिक्कत नहीं आती है। लेकिन, आपके निवेश की अवधि काफी कम हो जाती है। इसकी वजह कंपाउंडिंग का मैजिक है।

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रिटर्न की गारंटी नहीं

यहां टेबल में 12 फीसदी, 14 फीसदी और 16 फीसदी रिटर्न का अनुमान लगाया गया है। इसका मतलब है कि हम तीन तरह के रिटर्न का अनुमान लगाते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि म्यूचुअल फंड के रिटर्न के बारे में पहले से कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन, आम तौर पर यह देखा  गया है कि लंबी अवधि तक निवेश करने पर कम से कम 12 फीसदी का रिटर्न मिल जाता है। ऊपर टेबल में दी गई जानकारी सिर्फ कैलकुलेशन के लिए है।

SIP Calculator: ₹1000 की SIP से कितने समय में बनेंगे ₹10 लाख? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP Calculator: अगर आप हर महीने सिर्फ 1,000 रुपये की SIP शुरू करते हैं, तो भी लंबी अवधि में 10 लाख रुपये का फंड बना सकते हैं। हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपको औसतन कितना सालाना रिटर्न मिलता है। जितना ज्यादा रिटर्न होगा, आपका लक्ष्य उतनी जल्दी पूरा होगा।

आइए 10%, 12% और 15% के अनुमानित सालाना रिटर्न के आधार पर समझते हैं कि 10 लाख रुपये का फंड बनने में कितना समय लग सकता है।

₹10 लाख का फंड बनने में कितना समय लगेगा?

अनुमानित सालाना रिटर्न
₹10 लाख बनने में अनुमानित समय

10%करीब 22 साल 5 महीने
12%करीब 20 साल 1 महीना
15%करीब 17 साल 5 महीने

नोट: यह कैलकुलेशन हर महीने 1,000 रुपये की SIP और मंथली कंपाउंडिंग के आधार पर की गई है। म्यूचुअल फंड का रिटर्न तय नहीं होता। वास्तविक रिटर्न बाजार के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।

रिटर्न में थोड़ा फर्क, समय में बड़ा अंतर

सिर्फ 2% या 3% ज्यादा रिटर्न भी लंबी अवधि में बड़ा असर डालता है। 10% रिटर्न पर जहां 10 लाख रुपये का फंड बनाने में करीब 22 साल 5 महीने लगते हैं, वहीं 12% रिटर्न मिलने पर यह समय करीब 20 साल रह जाता है। अगर औसतन 15% रिटर्न मिलता है, तो यही लक्ष्य करीब 17 साल 5 महीने में हासिल हो सकता है।

यही कंपाउंडिंग की ताकत है। समय के साथ आपके निवेश पर मिलने वाला रिटर्न भी कमाई करने लगता है।

स्टेप-अप SIP से लक्ष्य जल्दी होगा पूरा

अगर आपकी सैलरी हर साल बढ़ती है, तो SIP भी हर साल बढ़ाना समझदारी हो सकती है। इसे स्टेप-अप SIP कहा जाता है।

मान लीजिए आपने 1,000 रुपये महीने से SIP शुरू की। अगले साल इसे 1,100 रुपये कर दिया। तीसरे साल 1,210 रुपये और इसी तरह हर साल 10% बढ़ाते रहे। इससे आपका निवेश हर साल बढ़ता जाएगा और कंपाउंडिंग का फायदा भी ज्यादा मिलेगा।

नतीजा यह होगा कि 10 लाख रुपये का लक्ष्य सामान्य SIP के मुकाबले कम समय में हासिल हो सकता है। साथ ही, लंबे समय में आपका कुल निवेश और अंतिम फंड दोनों काफी बड़े हो सकते हैं।

सामान्य SIP से ₹10 लाख10% स्टेप-अप SIP से ₹10 लाखसमय की बचत
अनुमानित सालाना रिटर्न

करीब 23.1 सालकरीब 17.2 सालकरीब 6 साल10.00%
करीब 20.8 सालकरीब 16.3 सालकरीब 4.5 साल12.00%
करीब 18.3 सालकरीब 15 सालकरीब 3.3 साल15.00%

निवेश करते समय इन बातों का रखें ध्यान

  • SIP जितनी जल्दी शुरू करेंगे, कंपाउंडिंग का फायदा उतना ज्यादा मिलेगा।
  • बाजार में गिरावट आने पर भी SIP बंद करने के बजाय जारी रखना बेहतर माना जाता है।
  • अगर आपकी कमाई बढ़ रही है, तो हर साल SIP में भी बढ़ोतरी करें।
  • निवेश हमेशा अपने वित्तीय लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखकर करें।

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Personal Loan EMI: कम ब्याज पर पर्सनल लोन चाहिए? अप्लाई करने से पहले जरूर करें ये 7 काम

Personal Loan EMI: पर्सनल लोन सबसे आसान और तेजी से मिलने वाला लोन है। शादी, इलाज, बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत या किसी दूसरी जरूरी जरूरत के लिए लोग अक्सर इसका सहारा लेते हैं। लेकिन कई बार लोग बिना तैयारी के लोन के लिए आवेदन कर देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि या तो लोन महंगे ब्याज पर मिलता है या फिर आवेदन ही रिजेक्ट हो जाता है।

अगर आप चाहते हैं कि बैंक या NBFC आपको कम ब्याज दर पर पर्सनल लोन ऑफर करे, तो आवेदन करने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते हैं ऐसे 7 काम, जो आपकी ब्याज दर कम कराने में मदद कर सकते हैं।

1. CIBIL Score मजबूत रखें

पर्सनल लोन की ब्याज दर तय करने में CIBIL Score सबसे अहम भूमिका निभाता है। अगर आपका स्कोर 750 या उससे ज्यादा है तो बैंक आपको कम जोखिम वाला ग्राहक मानते हैं। ऐसे ग्राहकों को अक्सर बेहतर ब्याज दर मिलने की संभावना रहती है।

अगर स्कोर कम है तो पहले पुराने बकाया चुकाएं, समय पर EMI और क्रेडिट कार्ड बिल भरें। कुछ महीनों में स्कोर बेहतर हो सकता है।

2. नौकरी और आमदनी स्थिर होनी चाहिए

बैंक सिर्फ आपकी सैलरी नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि आपकी नौकरी कितनी स्थिर है। अगर आप लंबे समय से एक ही कंपनी में काम कर रहे हैं और आपकी आमदनी नियमित है, तो लोन मिलने के साथ-साथ बेहतर ब्याज दर मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।

अगर अपना रोजगार करते हैं, तो नियमित कमाई और इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की भी भूमिका अहम हो जाती है।

3. पहले से ज्यादा कर्ज है तो सावधान रहें

अगर आपकी कमाई का बड़ा हिस्सा पहले से EMI चुकाने में जा रहा है, तो बैंक को लगता है कि आपको लोन देने में जोखिम है। इसे डेट टु इनकम रेशियो कहते हैं यानी कर्ज और कमाई का अनुपात।

हमेशा कोशिश करें कि आपकी कुल EMI, मंथली इनकम के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा न करे। इससे कम ब्याज पर लोन मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

4. एक साथ कई जगह आवेदन न करें

कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बैंकों में आवेदन करेंगे, लोन मिलने की संभावना उतनी बढ़ जाएगी। लेकिन ऐसा करना उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है।

हर आवेदन पर आपकी क्रेडिट रिपोर्ट में हार्ड इन्क्वायरी दर्ज होती है। कम समय में कई हार्ड इन्क्वायरी होने पर CIBIL Score प्रभावित हो सकता है और बैंक इसे जोखिम का संकेत मान सकते हैं।

5. जिस बैंक से रिश्ता पुराना है, वहां पहले बात करें

अगर आपका सैलरी अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट, होम लोन या दूसरी बैंकिंग सेवाएं पहले से किसी बैंक में हैं, तो उसी बैंक से पहले ऑफर जरूर चेक करें।

मौजूदा ग्राहकों को कई बैंक प्री-अप्रूव्ड पर्सनल लोन या कम ब्याज दर की पेशकश करते हैं।

6. सिर्फ पहली पेशकश पर हामी न भरें

हर बैंक और NBFC की ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और दूसरी शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए पहला ऑफर मिलते ही लोन लेने की बजाय अलग-अलग संस्थानों के ऑफर की तुलना करें।

अगर आपका क्रेडिट प्रोफाइल मजबूत है, तो कई मामलों में ब्याज दर पर सौदेबाजी की भी गुंजाइश होती है।

7. जितनी जरूरत हो, उतना ही लोन लें

जरूरत से ज्यादा रकम का लोन लेने पर EMI का बोझ बढ़ जाता है। वहीं बहुत लंबी अवधि चुनने पर कुल ब्याज भी ज्यादा देना पड़ सकता है।

इसलिए उतना ही लोन लें, जिसकी वास्तव में जरूरत हो। साथ ही, लोन की अवधि भी अपनी सहूलियत के हिसाब से रखें। ताकि EMI भी आराम से चुकाई जा सके और कुल ब्याज भी ज्यादा न बढ़े।

इन बातों को भी नजरअंदाज न करें

सिर्फ ब्याज दर देखकर फैसला न करें। प्रोसेसिंग फीस, फोरक्लोजर चार्ज, प्रीपेमेंट नियम, लेट पेमेंट पेनल्टी और दूसरी शर्तों को भी ध्यान से पढ़ें। कई बार कम ब्याज वाला लोन भी छिपे हुए चार्ज की वजह से महंगा पड़ सकता है।

कम ब्याज पर पर्सनल लोन पाना सिर्फ किस्मत की बात नहीं है। ये सिबिल स्कोर, कमाई और आपकी सौदेबाजी के हुनर पर काफी निर्भर करता है। इसलिए आवेदन करने से पहले थोड़ी तैयारी कर लें। इससे आपकी जेब पर EMI का बोझ भी कम रहेगा और लोन चुकाना भी आसान होगा।

Income Tax Refund: पूरा इनकम टैक्स रिफंड नहीं मिला? ये 7 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Income Tax Refund: पूरा इनकम टैक्स रिफंड नहीं मिला? ये 7 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Income Tax Refund: ITR फाइल करने के बाद ज्यादातर लोगों को 4 से 5 हफ्तों में टैक्स रिफंड मिल जाता है। लेकिन कई बार खाते में उतनी रकम नहीं आती, जितनी आपने क्लेम की थी। इसकी वजह यह है कि इनकम टैक्स विभाग रिटर्न प्रोसेस करते समय आपकी जानकारी का दोबारा मिलान करता है। अगर कोई गड़बड़ी मिलती है, तो रिफंड की रकम कम हो सकती है।

पूरा रिफंड क्यों नहीं मिलता?

रिटर्न प्रोसेस करते समय इनकम टैक्स विभाग Form 26AS, AIS, TIS, TDS स्टेटमेंट और दूसरी जानकारियों का मिलान करता है। अगर इनमें अंतर मिलता है, तो रिफंड कम हो सकता है। इसके लिए ये 7 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

  • TDS या TCS की जानकारी में गड़बड़ी
  • बैंक ब्याज या कैपिटल गेन जैसी टैक्स योग्य आय छूट जाना
  • गलत टैक्स छूट (Deduction) का दावा
  • एडवांस टैक्स या सेल्फ-असेसमेंट टैक्स की गलत जानकारी
  • टैक्स के कैलकुलेशन में गलती
  • धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज लगना
  • पुराने असेसमेंट ईयर की बकाया टैक्स डिमांड

अगर विभाग कोई बदलाव करता है, तो धारा 143(1) के तहत इंटिमेशन भेजता है। इसमें रिफंड कम होने की वजह भी बताई जाती है।

रिफंड की रकम कैसे तय होती है?

इनकम टैक्स विभाग आपकी आय, टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का मिलान करता है। इसके लिए वह कंपनी, बैंक और दूसरी वित्तीय संस्थाओं से मिली जानकारी का इस्तेमाल करता है।

इसके बाद आपकी कुल टैक्स देनदारी दोबारा निकाली जाती है। फिर TDS, TCS, एडवांस टैक्स और सेल्फ-असेसमेंट टैक्स को एडजस्ट किया जाता है। अगर आपने जरूरत से ज्यादा टैक्स जमा किया है, तो बची हुई रकम रिफंड के रूप में मिलती है। अगर पुराने साल का कोई टैक्स बकाया है, तो उसे भी रिफंड से एडजस्ट किया जा सकता है।

पुराने टैक्स बकाया का क्या होगा?

अगर किसी पुराने असेसमेंट ईयर का टैक्स बकाया है, तो इनकम टैक्स विभाग उसे आपके रिफंड से एडजस्ट कर सकता है। हालांकि, ऐसा करने से पहले विभाग ई-फाइलिंग पोर्टल पर सूचना देता है।

टैक्सपेयर्स को डिमांड स्वीकार करने, आंशिक रूप से मानने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलता है। तय समय तक जवाब नहीं मिलने या जवाब पर फैसला होने के बाद ही एडजस्टमेंट किया जाता है।

ब्याज भी घटा सकता है रिफंड

अगर आपने ITR देर से फाइल की है, एडवांस टैक्स कम भरा है या उसकी किस्त समय पर जमा नहीं की है, तो धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज देना पड़ सकता है।

यह ब्याज आपकी कुल टैक्स देनदारी में जुड़ जाता है। ऐसे में TDS पूरा कटा होने पर भी रिफंड कम मिल सकता है।

अगर रिफंड कम मिले तो क्या करें?

अगर आपको लगता है कि रिफंड गलत तरीके से कम किया गया है, तो सबसे पहले धारा 143(1) के तहत मिला इंटिमेशन पढ़ें। उसमें पूरी वजह लिखी होती है।

अगर कोई गलती दिखे, तो रेक्टिफिकेशन के लिए आवेदन करें। Form 16, Form 16A, Form 26AS, AIS, TIS, टैक्स चालान, निवेश के दस्तावेज, कैपिटल गेन का हिसाब, ITR की कॉपी और पुराने टैक्स रिकॉर्ड संभालकर रखें। जरूरत पड़ने पर यही दस्तावेज काम आएंगे।

रिफंड कम होने से कैसे बचें?

ITR फाइल करने से पहले Form 26AS, AIS और TIS का अच्छी तरह मिलान करें। बैंक ब्याज, कैपिटल गेन और दूसरी सभी टैक्स योग्य आय जरूर शामिल करें। सही ITR फॉर्म चुनें। टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का दावा दस्तावेजों के आधार पर ही करें।

बैंक अकाउंट पहले से प्री-वैलिडेट रखें। ITR फाइल करने के बाद समय पर ई-वेरिफिकेशन करें। रिटर्न सबमिट करने से पहले एक बार पूरी जानकारी जरूर जांच लें। इससे रिफंड में कटौती या देरी की संभावना काफी कम हो जाती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Multi Cap vs Flexi Cap: मल्टीकैप या फ्लेक्सी कैप… जानिए कौन-सा म्यूचुअल फंड आपके लिए रहेगा बेहतर?

Multi Cap vs Flexi Cap: जब हम अपनी गाढ़ी कमाई निवेश करने की सोचते हैं, तो चाहते हैं कि पैसा सुरक्षित रहे और अच्छा रिटर्न भी मिले। ऐसे निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड काफी लोकप्रिय विकल्प है। लेकिन यहां भी अक्सर लोग मल्टी-कैप (Multi Cap) और फ्लेक्सी-कैप (Flexi Cap) फंड को लेकर उलझ जाते हैं।

नाम सुनने में दोनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन निवेश का तरीका और रणनीति अलग है। मनीफ्रंट के को-फाउंडर और CEO मोहित गांग ने आसान शब्दों में समझाया कि दोनों फंड कैसे काम करते हैं और किस तरह के निवेशक के लिए कौन-सा विकल्प बेहतर हो सकता है।

मल्टी-कैप फंड कैसे काम करता है?

मल्टी-कैप फंड को आप ऐसे परिवार की तरह समझ सकते हैं, जहां हर खर्च पहले से तय होता है। SEBI के नियमों के मुताबिक, इस फंड को अपनी कुल रकम का कम से कम 75% शेयर बाजार में निवेश करना होता है।

इसके अलावा फंड मैनेजर को 25% लार्ज-कैप, 25% मिड-कैप और 25% स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश करना ही पड़ता है। बाकी 25% रकम वह अपनी रणनीति के हिसाब से कहीं भी लगा सकता है।

मोहित गांग के मुताबिक, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी सीमा भी। फायदा यह है कि आपका पैसा हर तरह की कंपनियों में बंटा रहता है। लेकिन अगर बाजार में गिरावट आए और स्मॉल-कैप शेयर लगातार कमजोर चल रहे हों, तब भी फंड मैनेजर वहां से पूरा पैसा नहीं निकाल सकता। उसे नियमों के मुताबिक निवेश बनाए रखना पड़ता है। इससे जोखिम बढ़ सकता है।

फ्लेक्सी-कैप फंड में क्या खास है?

फ्लेक्सी-कैप फंड में फंड मैनेजर के पास ज्यादा आजादी होती है। इसे सिर्फ अपनी कुल रकम का कम से कम 65% शेयरों में निवेश करना होता है। इसके बाद वह बाजार की स्थिति के हिसाब से निवेश का फैसला ले सकता है।

अगर उसे लगता है कि आने वाले समय में स्मॉल-कैप कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी, तो वह वहां ज्यादा पैसा लगा सकता है। अगर बाजार में जोखिम बढ़ता दिखे, तो वह निवेश का बड़ा हिस्सा लार्ज-कैप कंपनियों में शिफ्ट कर सकता है। जरूरत पड़ने पर वह स्मॉल-कैप में निवेश शून्य भी कर सकता है।

मोहित गांग का कहना है कि फ्लेक्सी-कैप की सबसे बड़ी ताकत यही लचीलापन है। फंड मैनेजर बाजार के हिसाब से रणनीति बदल सकता है। इससे गिरावट के दौर में जोखिम को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

आपके लिए कौन-सा फंड सही रहेगा?

यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं। मोहित गांग के मुताबिक, अगर आप लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं और बाजार के उतार-चढ़ाव से ज्यादा परेशान नहीं होते, तो मल्टी-कैप फंड आपके लिए बेहतर हो सकता है। इसमें मिड और स्मॉल-कैप का हिस्सा तय होने की वजह से लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। हालांकि, इसमें जोखिम भी ज्यादा होता है।

अगर आप चाहते हैं कि बाजार की स्थिति के हिसाब से आपका पोर्टफोलियो बदलता रहे और जोखिम कुछ कम रहे, तो फ्लेक्सी-कैप फंड बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें फंड मैनेजर बाजार के हिसाब से निवेश का अनुपात बदल सकता है।

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Flexicap या Multicap, किस फंड में निवेश से आपको होगा ज्यादा फायदा?

क्या आप लंबी अवधि के लिए शेयरों पर दांव लगाना चाहते हैं? अगर हां तो यह समझ लेना जरूरी है कि मार्केट में किसी एक सेगमेंट का प्रदर्शन हमेशा अच्छा नहीं रहता है। कभी लार्जकैप शेयरों का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो कभी मिडकैप या स्मॉलकैप का प्रदर्शन बेहतर रहता है। ऐसे में सवाल है कि आपको कैसे पता चलेगा कि आगे किस तरह के शेयरों का प्रदर्शन अच्छा रहने वाला है? आपके लिए इस समस्या का समाधान फ्लेक्सी-कैप और मल्टीकैप फंड्स हैं।

फ्लेक्सी-कैप फंड लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में निवेश करता है। खास बात यह है कि इस फंड पर इनमें से किसी एक कैटेगरी में मैक्सिमम या मिनिमम निवेश की शर्त नहीं होती है। जब तक शेयरों में फंड का कुल निवेश कम से कम 65 फीसदी तक बना रहता है तब तक फंड मैनेजर को ऐलोकेशन को लेकर किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है।

अगर फंड मैनेजर को लगता है कि अभी समय लार्जकैप शेयरों का है तो वह इन शेयरों में निवेश बढ़ा सकता है। इसी तरह अगर बाद में उसे मिडकैप या स्मॉलकैप शेयर अट्रैक्टिव लगते हैं तो वह इनमें निवेश बढ़ा सकता है। इसका मतलब है कि बाजार की स्थितियों के मुताबिक इस फंड का ऐलोकेशन बदलता रहता है।

मल्टीकैप फंड के लिए नियम थोड़े सख्त हैं। उसे कम से कम 75 फीसदी निवेश शेयरों में करना जरूरी है। इसमें से लार्जकैप में 25 फीसदी, मिडकैप में 25 फीसदी और स्माॉल कैप में 25 फीसदी निवेश होना चाहिए। इस ऐलोकेशन का पालन हर समय करना जरूरी है। इसका मतलब है कि बाजार में चाहे जैसी भी स्थिति हो, मल्टीकैप फंड के मैनेजर को तीनों तरह के शेयरों में एकसमान निवेश बनाए रखना पड़ता है।

इस स्ट्रेटेजी का फायदा यह है कि तीनों तरह के शेयरों में इस फंड का ऐलोकेशन बना रहता है। बाकी 25 फीसदी निवेश को लेकर फंड मैनेजर को आजादी होती है। डायवर्सिफिकेशन के लिहाज से मल्टीकैप फंड सही है। इसकी वजह यह है कि इसके फंड मैनेजर को हर समय तीनों तरह के शेयरों में एक समान निवेश बनाए रखना होता है।

अगर रिटर्न की बात की जाए तो लंबी अवधि में मल्टीकैप फंड्स का रिटर्न फ्लेक्सीकैप फंड के मुकाबले ज्यादा रहता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबी अवधि के निवेश के लिहाज से दोनों फंड्स सही हैं। जो इनवेस्टर्स डायवर्सिफिकेशन चाहते हैं उनके लिए मल्टीकैप फंड सही है। अगर कोई इनवेस्टर्स बाजार की स्थितियों के हिसाब से निवेश चाहता है तो उसके लिए फ्लेक्सीकैप फंड सही हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि दोनों फंड की फिलोसॉफी अलग-अलग है।