हर महीने सिर्फ 12500 रुपये के निवेश से करोड़पति बनने का जबर्दस्त फॉर्मूला

कई लोग निवेश में सुरक्षा का ज्यादा ध्यान रखते हैं। हालांकि, ज्यादा रिटर्न के लिए थोड़ा रिस्क जरूरी है। लेकिन, सुरक्षित निवेश से भी लंबी अवधि में बड़ा फंड तैयार किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई युवा नौकरी लगते ही या कमाई शुरू होते ही सिर्फ 12500 रुपये का निवेश हर महीने करना शुरू कर देता है तो सिर्फ 24 साल के निवेश से 1 करोड़ रुपये से ज्यादा फंड तैयार किया जा सकता है।

पीपीएफ के रिटर्न पर शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव का असर नहीं

पीपीएफ को निवेश का सबसे भरोसेमंद इनवेस्टमेंट ऑप्शन माना जाता है। इसकी वजह यह है कि यह स्कीम सरकार की तरफ से चलाई जाती है। यह फिक्स्ड रिटर्न वाली स्कीम है। इसका मतलब है कि निवेश शुरू करने से पहले इनवेस्टर को पता होता है कि स्कीम मैच्योर करने पर उसे कुल कितने पैसे मिलेंगे। दूसरा, इस स्कीम के रिटर्न पर शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव का भी असर नहीं पड़ता है। इस स्कीम का लंबा ट्रैक रिकॉर्ड है।

एक साल में मैक्सिमम 1.5 लाख रुपये के निवेश पर डिडक्शन की इजाजत

पीपीएफ में एक वित्त वर्ष में मैक्सिमम 1.5 लाख रुपये तक का निवेश कर डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है। हालांकि, यह ध्यान में रखना होगा कि डिडक्शन की यह सुविधा इनकम टैक्स की सिर्फ पुरानी रीजीम में मिलती है। नई रीजीम में टैक्सपेयर को ज्यादातर डिडक्शन की सुविधा नहीं मिलती है।

मंथली 125000 के निवेश से 15 साल में बनेगा बड़ा फंड

अगर 25 साल का कोई व्यक्ति पीपीएफ में हर महीने 12,500 रुपये का निवेश शुरू करता है तो उसके 40 साल के होने पर पीपीएफ में उसका निवेश मैच्योर कर जाएगा। हर महीने 12,500 रुपये निवेश का मतलब साल में कुल 1.50 लाख रुपये का निवेश है। पीपीएफ में इंटरेस्ट रेट 7.1 फीसदी है। इस तरह 15 साल में आप कुल 22,50,000 रुपये का निवेश करेंगे।

पीपीएफ के मैच्योरिटी अमाउंट पर नहीं लगता है टैक्स

आपको 15 साल बाद पीपीएफ अकाउंट मैच्योर होने पर कुल 40,68,209 रुपये मिलेंगे। इसमें 18,18,209 रुपये इंटरेस्ट का होगा। पीपीएफ की खासियत यह है कि यह स्कीम एग्जेम्प्ट-एग्जेम्प्ट-एग्जेम्प्ट (EEE) कैटेगरी में आती है। इसका मतलब है कि न तो आपके निवेश पर टैक्स लगता है, न तो इंटरेस्ट पर टैक्स लगता है और न ही मैच्योरिटी अमाउंट पर टैक्स लगता है। इस वजह से मैच्योरिटी का पूरा पैसा आपके बैंक अकाउं में आता है।

म्यूचुअल फंड में सिर्फ 9 साल के निवेश से एक करोड़ का फंड तैयार

पीपीएफ अंकाउंट मैच्योर करने पर आपको जो 40,68,209 रुपये मिलेंगे, उसे आपको एकमुश्त म्यूचुअल फंड की किसी अच्छी इक्विटी स्कीम में डालना होगा। 12 फीसदी सालाना रिटर्न के हिसाब से आपका यह पैसा सिर्फ 9 साल में 1,10,92,315 रुपये हो जाएगा। इस तरह सिर्फ 24 साल में आपके पास एक करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाएगा। म्यूचुअल फंड से मिले रिटर्न पर 12.5 फीसदी की दर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स लगेगा। यह 8.75 लाख रुपये आएगा। इसका मतलब है कि टैक्स चुकाने के बाद भी आपके पास एक करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड होगा।

Post Office TD vs Bank FD: पोस्ट ऑफिस या बैंक FD, किसमें निवेश पर मिलेगा ज्यादा फायदा? समझिए पूरा हिसाब

Post Office TD vs Bank FD: अगर आप बिना जोखिम के तय रिटर्न चाहते हैं, तो पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट (TD) और बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) दोनों अच्छे विकल्प हैं। दोनों में आपका पैसा सुरक्षित रहता है और तय ब्याज मिलता है।

लेकिन सुरक्षा, ब्याज, पैसे निकालने की सुविधा और टैक्स बेनिफिट्स जैसे मामलों में दोनों के बीच बड़ा अंतर है। ऐसे में निवेश से पहले यह जानना जरूरी है कि आपके लिए कौन-सा विकल्प ज्यादा सही रहेगा।

सुरक्षा के मामले में कौन बेहतर?

अगर पैसों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है, तो पोस्ट ऑफिस TD आगे है। इसकी वजह यह है कि इस पर सरकार की गारंटी होती है। यानी आपका मूलधन और ब्याज, दोनों पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।

वहीं, बैंक FD पर डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) का बीमा मिलता है। लेकिन इसकी सीमा 5 लाख रुपये तक ही है। इसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं। अगर किसी बैंक में आपकी जमा राशि इससे ज्यादा है, तो अतिरिक्त रकम पर बीमा नहीं मिलता।

कहां मिल रहा है ज्यादा ब्याज?

पोस्ट ऑफिस TD की ब्याज दरें सरकार हर तीन महीने में तय करती है। एक बार जिस ब्याज दर पर निवेश कर दिया, वही दर पूरी अवधि तक लागू रहती है।

मौजूदा पोस्ट ऑफिस TD ब्याज दरें

अवधिब्याज दर
1 साल6.90%
2 साल7.00%
3 साल7.10%
5 साल7.50%

वहीं, बैंक FD की ब्याज दरें हर बैंक में अलग-अलग होती हैं। ये समय-समय पर भी बदलती रहती हैं। फिलहाल कई प्राइवेट और स्मॉल फाइनेंस बैंक 7.5% से 8.10% तक ब्याज दे रहे हैं। कई लोग सुरक्षा के लिहाज सरकारी बैंकों को भी प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, उनकी ब्याज दर प्राइवेट और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के मुकाबले कम रहती है।

पैसे निकालने की सुविधा किसमें बेहतर?

अगर आपको बीच में पैसे की जरूरत पड़ सकती है, तो बैंक FD ज्यादा सुविधाजनक है। बैंकों में आप 7 दिन से लेकर 10 साल तक की FD करा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर मैच्योरिटी से पहले FD तोड़ भी सकते हैं। हालांकि, इसके लिए आमतौर पर 0.5% से 1% तक ब्याज का जुर्माना देना पड़ता है। कई बैंक FD के बदले लोन की सुविधा भी देते हैं।

वहीं, पोस्ट ऑफिस TD में पहले 6 महीने तक पैसा नहीं निकाला जा सकता। अगर छह महीने बाद लेकिन मैच्योरिटी से पहले खाता बंद करते हैं, तो कम ब्याज मिलता है। इससे आपका कुल रिटर्न घट जाता है।

टैक्स और सीनियर सिटीजन को क्या फायदा?

अगर आप टैक्स बचाना चाहते हैं, तो 5 साल का पोस्ट ऑफिस TD और 5 साल का टैक्स सेवर बैंक FD, दोनों पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है।

हालांकि, सीनियर सिटीजन के लिए बैंक FD ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है। ज्यादातर बैंक सामान्य ग्राहकों के मुकाबले 0.25% से 0.75% तक अतिरिक्त ब्याज देते हैं। पोस्ट ऑफिस TD में वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से कोई अतिरिक्त ब्याज नहीं मिलता।

आखिर किसमें निवेश करना चाहिए?

अगर आपकी पहली प्राथमिकता पूरी सुरक्षा है, तो पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट बेहतर विकल्प हो सकता है। क्योंकि इस पर सरकार की गारंटी होती है। लेकिन अगर आप ज्यादा ब्याज, पैसे निकालने में आसानी, निवेश अवधि चुनने की आजादी और सीनियर सिटीजन के लिए अतिरिक्त ब्याज चाहते हैं, तो बैंक FD बेहतर साबित हो सकती है। कुछ मामलों में FD का ब्याज पोस्ट ऑफिस के मुकाबले ज्यादा होता है।

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ ब्याज दर देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए। सुरक्षा, लिक्विडिटी, टैक्स बेनिफिट और निवेश की अवधि जैसी सभी बातों को ध्यान में रखकर फैसला लें। चाहें तो दोनों विकल्पों में पैसा लगाकर सुरक्षा और बेहतर रिटर्न के बीच संतुलन भी बना सकते हैं।

Tax Refund: टैक्स रिफंड जल्दी चाहते हैं? जानिए किन 5 गलतियों से बचना है जरूरी

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क्या आप बहुत ज्यादा फंड में निवेश कर रहे हैं? जानिए इसके नुकसान

मेरे एक दोस्त ने एक दिन अपने म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि वह हर साल म्यूचु्अल फंड में निवेश बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही उनके पोर्टफोलियो में फंड्स यानी स्कीम की संख्या भी बढ़ रही है। क्या ऐसा करना सही है? जब मैंने उनसे पूछा कि उनके पोर्टफोलियो में कितनी स्कीमें हैं तो वह गिनती करने लगे। दरअसल यह समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है।

डायवर्सिफिकेशन का सही मतलब कम लोग समझते हैं

ज्यादातर निवेशकों को लगता है कि डायवर्सिफिकेशन के लिए ज्यादा स्कीमों में निवेश करना जरूरी है। लेकिन, कम लोग यह समझते हैं कि डायवर्सिफिकेशन का मतलब ज्यादा फंडों में निवेश करना नहीं है। डायवर्सिफिकेशन का मतलब यह है कि आपके पोर्टफोलियो में अलग-अलग तरह के एसेट्स और स्कीमें होनी चाहिए। उन स्कीमों का पोर्टफोलियो एक जैसे शेयरों का नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए एक से ज्यादा लार्जकैप फंड में निवेश करने का कोई मतलब नहीं है।

एक जैसी कई स्कीम में निवेश करना डायवर्सिफिकेशन नहीं है 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई इनवेस्टर डायवर्सिफिकेशन करना चाहता है तो वह अपने पोर्टफोलियो में एक लार्जकैप फंड, एक मिडकैप फंड, एक स्मॉलकैप फंड को शामिल कर सकता है। लार्जकैप, मिडकैप या स्मॉलकैप के एक से ज्यादा फंड में निवेश करने से डायवर्सिफिकेशन का मकसद पूरा नहीं होता है।

अलग-अलग एसेट में निवेश करने से रिस्क कम हो जाता है

डायवर्सिफिकेशन का मतलब अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करना है। इसका मतलब है कि पोर्टफोलियो में इक्विटी शामिल होना चाहिए। इक्विटी की हर कैटेगरी के फंड होने चाहिए। डेट यानी बॉन्ड्स जैसे फिक्स्ड रिटर्न इंस्ट्रूमेंट्स भी पोर्टफोलियो का हिस्सा होना चाहिए। साथ ही बुलियन भी होना चाहिए। बुलियन का मतलब सोने और चांदी से है। एक्सपर्ट्स गोल्ड ईटीएफ और सिल्वर ईटीएफ में निवेश की सलाह देते हैं।

यह भी पढ़ें: इस फंड ने 10 साल में 10 हजार के मंथली निवेश को 33.87 लाख रुपये बनाया

एक साथ सभी एसेट क्लास में नहीं आती है गिरावट 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि डायवर्सिफिकेशन का मकसद यह है कि किसी एसेट क्लास में गिरावट का असर पोर्टफोलियो पर कम से कम पड़े। आम तौर पर यह देखा जाता है कि सभी एसेट क्लास में एक साथ गिरावट नहीं आती है। कई बार इक्विटी में गिरावट आने पर गोल्ड में तेजी होती है। डेट में निवेश आपके पोर्टफोलियो को शेयरों में तेज गिरावट की स्थिति में नुकसान से बचाता है। इसलिए एक्सपर्ट्स पोर्टफोलियो में डेट को शामिल करने सलाह देते हैं।

1 जुलाई से बदल जाएंगे ये 5 बड़े नियम; सैलरी, टैक्स, PF और क्रेडिट कार्ड यूजर्स पर पड़ेगा असर

जुलाई 2026 से कई बड़े वित्तीय बदलाव होने जा रहे हैं। इनका असर नौकरीपेशा लोगों, टैक्सपेयर्स, पेंशनर्स और क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों पर पड़ेगा।

इनमें EPFO की UPI से PF निकासी, ITR फाइलिंग की डेडलाइन, महंगाई भत्ता (DA) और क्रेडिट कार्ड के नए नियम शामिल हैं। अगर समय रहते इन बदलावों की जानकारी नहीं होगी, तो टैक्स फाइलिंग, बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में परेशानी हो सकती है।

ITR फाइल करने की डेडलाइन का रखें ध्यान

जुलाई में इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने वालों के लिए सबसे जरूरी काम रिटर्न दाखिल करना है। ITR-1 और ITR-2 भरने वाले टैक्सपेयर्स के लिए वित्त वर्ष 2025-26 (आकलन वर्ष 2026-27) का रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई 2026 है।

वहीं, ITR-3 और ITR-4 भरने वाले ऐसे टैक्सपेयर्स, जिनका टैक्स ऑडिट नहीं होता, वे 31 अगस्त 2026 तक रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। अगर तय समय तक ITR नहीं भरा गया, तो जुर्माना लग सकता है। कुछ टैक्स बेनिफिट्स भी नहीं मिलेंगे। साथ ही कुछ तरह के नुकसान (Loss) को अगले साल कैरी फॉरवर्ड करने का फायदा भी नहीं मिलेगा।

UPI से PF निकालना हो सकता है आसान

जुलाई में EPFO 3.0 प्लेटफॉर्म लॉन्च होने की उम्मीद है। इसका मकसद EPFO की डिजिटल सेवाओं को पहले से ज्यादा आसान बनाना है।

नए सिस्टम के तहत EPF खाताधारकों को UPI के जरिए तुरंत PF निकालने की सुविधा मिल सकती है। अगर ऐसा होता है, तो PF निकालने की प्रक्रिया पहले के मुकाबले काफी तेज और आसान हो जाएगी।

DA बढ़ने का इंतजार

जुलाई में लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की नजर महंगाई भत्ते (DA) पर भी रहेगी। सरकार हर साल जनवरी और जुलाई में DA की समीक्षा करती है।

इसलिए इस बार भी जुलाई में DA में बढ़ोतरी की घोषणा का इंतजार रहेगा। इसका फायदा केंद्रीय कर्मचारियों, पेंशनर्स और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को मिल सकता है।

HDFC Bank क्रेडिट कार्ड के नियम

HDFC Bank ने अपने Regalia Gold और Diners Club Privilege क्रेडिट कार्ड से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। रिवॉर्ड पॉइंट्स से जुड़े कुछ बदलाव पहले ही लागू हो चुके हैं। अब 1 जुलाई 2026 से एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस के नए नियम लागू होंगे।

नए नियम के मुताबिक, Regalia Gold कार्डधारकों को मुफ्त घरेलू एयरपोर्ट लाउंज की सुविधा पाने के लिए पिछली तिमाही में कम से कम ₹60,000 खर्च करना होगा।

SBI Card में भी बदलेंगे नियम

SBI Card ने भी PhonePe SBI Card Purple और PhonePe SBI Card Select Black के नियमों में बदलाव किया है। नए नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होंगे। इसके बाद हर महीने मिलने वाले रिवॉर्ड पॉइंट्स की अधिकतम सीमा तय कर दी जाएगी।

बीमा प्रीमियम पर होने वाले खर्च और दूसरी कैटेगरी के खर्च के लिए अलग-अलग लिमिट होगी। इसके अलावा ऑनलाइन ट्रांजैक्शन पर मिलने वाले अधिकतम रिवॉर्ड पॉइंट्स भी पहले के मुकाबले कम कर दिए गए हैं।

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आइए जानें कि इंटरेस्ट कैलकुलेटर लोन लेने से पहले कुल लागत की तुलना करने में कैसे आपकी मदद करता है

कोई भी लोन लेने से पहले इंटरेस्ट कैलकुलेटर आपको उस पर होने वाले कुल खर्च का अंदाज़ा लगाने में आपकी मदद करता है। इससे पता चलता है कि आपको कितना ब्याज़ चुकाना होगा, आपकी महीने की किस्त कितनी होगी और कुल मिलाकर कितनी रकम वापस करनी होगी। इस कैलकुलेटर की मदद से आप लोन के अलग-अलग विकल्पों की तुलना कर सकते हैं, अपना बजट की बेहतर योजना बना सकते हैं और समझदारी से लोन लेने का फैसला कर सकते हैं।

चाहे आप अपने घर को नए जैसा बनाना चाहते हों, आगे की पढ़ाई के लिए पैसों का इंतजाम कर रहे हों, शादी का खर्च उठाना हो या  अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी सामने आ गई हो, किसी भी स्थिति में आपको अपना लोन चुकाने की ज़िम्मेदारी को समझना बेहद जरूरी है। ऐसे मौकों पर ही पर्सनल लोन और इंटरेस्ट कैलकुलेटर आपके काम आते हैं ताकि आप ज़िम्मेदारी से लोन ले सकें।

इंटरेस्ट कैलकुलेटर क्या होता है?

इंटरेस्ट कैलकुलेटर एक ऑनलाइन टूल है, जो कुछ जरूरी बातों को ध्यान में रखकर अंदाज़ा लगाता है कि आपको लोन पर कितना ब्याज़ देना होगा, जैसे कि:

  • लोन की रकम
  • ब्याज़ दर
  • लोन चुकाने की समय-सीमा

इस कैलकुलेटर की मदद से आप तुरंत कुछ चीजों का अंदाज़ा लगा सकते हैं, जैसे कि:

  • हर महीने की किस्त
  • चुकाया जाने वाला कुल ब्याज़
  • चुकाई जाने वाली कुल रकम
  • समय-सीमा या लोन की रकम बदलने का असर

खुद से हिसाब लगाने के झंझट के बिना, आपको तुरंत नतीजे मिल जाते हैं जिससे आप पूरे भरोसे के साथ लोन के अलग-अलग विकल्पों की तुलना कर सकते हैं।

लोन लेने से पहले इंटरेस्ट कैलकुलेटर का इस्तेमाल करना क्यों जरूरी है?

लोन लेना पैसों से जुड़ा एक बड़ा फैसला है। इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से आप कोई भी लोन लेने से पहले ही उस पर होने वाले कुल खर्च को अच्छी तरह समझ सकते हैं।

लोन की अलग-अलग रकम की तुलना करें

हो सकता है आपको अपने घर के रेनोवेशन के लिए 2 लाख रुपये चाहिए या फिर शादी में होने वाले खर्च के लिए 10 लाख रुपये की ज़रूरत हो। आप इंटरेस्ट कैलकुलेटर में अलग-अलग रकम डालकर देख सकते हैं कि आपकी महीने की किस्त और कुल खर्च में कितना बदलाव आता है।

इस तरह आप बस उतना ही लोन लेते हैं जितनी आपको ज़रूरत हो, और बेवजह के आर्थिक बोझ से बच जाते हैं।

लोन की समय-सीमा के असर को समझें

आम तौर पर, कम समय के लिए लोन लेने पर आपकी हर महीने की किस्त तो ज़्यादा होगी, लेकिन कुल मिलाकर आपको काफी कम ब्याज़ चुकाना होगा। वहीं, लंबे समय के लिए लोन लेने से हर महीने खर्च का बोझ थोड़ा कम होता है, पर आपको ज़्यादा ब्याज़ चुकाना पड़ सकता है।

इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से आप लोन चुकाने की अलग-अलग समय-सीमा में होने वाले खर्च को देख सकते हैं, फिर आप अपनी इनकम और आर्थिक लक्ष्यों के हिसाब से सही समय-सीमा चुन सकते हैं।

अपने महीने के बजट की बेहतर योजना बनाएँ

अगर आपको पहले से ही अपनी महीने की किस्तों के बारे में पता हो, तो इससे अपने महीने के खर्चों को अच्छी तरह संभालने में मदद मिलती है।

पर्सनल लोन के लिए आवेदन करने से पहले आप यह देख सकते हैं कि लोन चुकाना आपके बजट में आसानी से फिट बैठता है या नहीं।

इंटरेस्ट कैलकुलेटर लोन पर होने वाले कुल खर्च की तुलना करने में कैसे मददगार है?

इंटरेस्ट कैलकुलेटर का सबसे बड़ा फायदा यही है कि ये आपसे कुछ भी नहीं छिपाता है। इसकी मदद से आप सिर्फ ब्याज़ दर ही नहीं, बल्कि कई दूसरे पहलुओं के आधार पर भी लोन की तुलना कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, हो सकता है दो अलग-अलग लोन की ब्याज़ दरें एक-समान हों, लेकिन लोन चुकाने की समय-सीमा अलग-अलग होने पर आपके द्वारा चुकाई जाने वाली कुल रकम में काफी अंतर आ सकता है।

इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से आप इन चीजों की तुलना कर सकते हैं:

  • चुकाई जाने वाली कुल रकम
  • हर महीने की किस्त
  • चुकाया जाने वाला कुल ब्याज़
  • समय-सीमा के अलग-अलग विकल्प
  • लोन की अलग-अलग रकम

यह पूरी जानकारी आपको ऐसा लोन विकल्प चुनने में मदद करती है, जो आपके लिए किफायती हो और जिसे चुकाना भी आसान हो।

एक ही लोन के लिए दो अलग-अलग समय-सीमा के विकल्पों की तुलना

मान लीजिए पुणे में रहने वाली 32 साल की प्रिया एक मार्केटिंग प्रोफेशनल हैं, जिनकी महीने की इनकम 65,000 रुपये है। उन्हें अपनी बहन की शादी के लिए 5 लाख रुपये की ज़रूरत है। वह इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से सालाना 14% की ब्याज़ दर पर लोन चुकाने के दो अलग-अलग विकल्पों की तुलना करती हैं।

तुलना के बिंदुविकल्प A: 24 महीने की समय-सीमाविकल्प B: 48 महीने की समय-सीमा
लोन की रकम5,00,000 रुपये5,00,000 रुपये
ब्याज़ दर14% सालाना14% सालाना
महीने की किस्त (लगभग)24,006 रुपये13,676 रुपये
चुकाया जाने वाला कुल ब्याज़ (लगभग)76,144 रुपये1,56,448 रुपये
चुकाई जाने वाली कुल रकम (लगभग)5,76,144 रुपये6,56,448 रुपये

दोनों विकल्पों की तुलना करने पर, प्रिया को समझ आता है कि 48 महीने की समय-सीमा चुनने से उनकी महीने की किस्त में 10,330 रुपये की बचत तो होगी, लेकिन लोन की समय-सीमा के दौरान कुल मिलाकर 80,304 रुपये ज़्यादा ब्याज़ चुकाना होगा।

चूंकि उनकी महीने की इनकम इतनी है कि वह हर महीने होने वाले खर्चों के बाद भी 24 महीने की EMI आसानी से चुका सकती हैं, इसलिए वह लोन पर होने वाले कुल खर्च को कम करने के लिए कम समय-सीमा वाला विकल्प चुनती है।

कैलकुलेटर से क्या पता चला: दोनों ही मामलों में ब्याज़ की दर एक जैसी थी। सिर्फ लोन की समय-सीमा बदलने से चुकाई जाने वाली कुल रकम में 80,000 रुपये से ज्यादा का अंतर आ गया। इंटरेस्ट कैलकुलेटर के ज़रिये आप कुछ ही सेकंड में इन बातों की तुलना कर सकते हैं।

पर्सनल लोन फाइनैंसिंग का सुविधाजनक विकल्प क्यों है?

पर्सनल लोन पैसे की ज़रूरत पूरी करने के सबसे सुविधाजनक विकल्पों में से एक हैं, क्योंकि पहले से तय और अचानक सामने आने वाले कई तरह के खर्चों को पूरा करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।

आप पर्सनल लोन ऑनलाइन के लिए आवेदन करके लोन की रकम का उपयोग इन कामों के लिए कर सकते हैं:

  • मेडिकल इमरजेंसी
  • ट्रैवल पर होने वाले खर्च
  • आगे की पढ़ाई
  • शादी का खर्च
  • घर की मरम्मत/रिनोवेशन
  • कोई बड़ी खरीदारी

सिक्योर्ड लोन के मुकाबले, पर्सनल लोन के लिए आमतौर पर किसी कोलेटरल की ज़रूरत नहीं होती है। इसके आवेदन करने का तरीका भी बहुत आसान है, जो उन लोगों के लिए सबसे बेहतर विकल्प है जिन्हें तुरंत पैसों की ज़रूरत हो।

बजाज फाइनैंस पर्सनल लोन कैसे आपकी मदद कर सकता है?

बजाज फाइनैंस पर्सनल लोन अलग-अलग तरह की पैसों की जरूरतों को पूरा करने का बेहद आसान और सुविधाजनक जरिया है। इंटरेस्ट कैलकुलेटर का उपयोग करके आप अपने लोन चुकाने की जिम्मेदारियों का अंदाज़ा लगा सकते हैं और एक सही लोन स्ट्रक्चर चुन सकते हैं।

इसके कुछ खास फायदे इस प्रकार हैं:

  • 40,000 रुपये से 55 लाख रुपये तक की लोन की रकम
  • लोन चुकाने के लिए 12 महीने से 108 महीने तक की समय-सीमा
  • सालाना 10% से 30% तक की ब्याज़ दरें
  • किसी कोलेटरल की ज़रूरत नहीं
  • तेजी से मंजूरी मिलने की प्रक्रिया
  • बहुत कम कागजी कार्रवाई
  • ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया
  • वेरिफिकेशन और मंजूरी के आधार पर, सिर्फ़ 24 घंटों* में लोन की रकम पाने की सुविधा

आवेदन करने से पहले इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से आप जान सकते हैं कि लोन की अलग-अलग रकम और समय-सीमा आपके कुल लोन खर्च पर कैसे असर डालती है।

ऑनलाइन पर्सनल लोन के लिए कौन-कौन आवेदन कर सकता है?

ज्यादातर नौकरीपेशा वाले और खुद का रोजगार करने वाले लोग ऑनलाइन पर्सनल लोन चुनते हैं, क्योंकि यह सुविधाजनक है और इसकी प्रक्रिया पूरी होने में बहुत कम वक्त लगता है।

सामान्य तौर पर एलिजिबिलिटी इन बातों पर निर्भर है:

राष्ट्रीयताभारतीय
उम्र21 साल से 80 साल*
नौकरीसरकारी, प्राइवेट, या MNC.
CIBIL स्कोर650 या उससे ज्यादा
ग्राहक का प्रोफाइलखुद का रोजगार करने वाले या नौकरीपेशा

 

* लोन की समय-सीमा पूरी होने पर आपकी उम्र 80 साल या उससे कम होनी चाहिए।

लोन पाने की शर्तों को पूरा करने से मंजूरी की गारंटी नहीं मिलती, क्योंकि लोन देने वाले संस्थान अपने नियमों और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया के आधार पर हर आवेदन की जांच करते हैं।

पर्सनल लोन के लिए आवेदन करने से पहले, चुकाई जाने वाली रकम का अंदाज़ा लगाने और अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से सही फैसला लेने के लिए इंटरेस्ट कैलकुलेटर का उपयोग करना बहुत मददगार साबित होता है।

ज़िम्मेदारी से लोन लेने से हमें क्या फायदा होता है?

इंटरेस्ट कैलकुलेटर सिर्फ़ योजना बनाने में मदद करने वाला टूल नहीं है, बल्कि यह ज़िम्मेदारी से लोन लेने में भी बहुत उपयोगी है।

कोई भी लोन लेने से पहले, इन बातों को जरूर ध्यान में रखें:

  • बस उतनी ही रकम लोन लें जितनी आपको असल में ज़रूरत हो
  • लोन चुकाने की अपनी क्षमता के हिसाब से सही समय-सीमा चुनें
  • अपना क्रेडिट प्रोफाइल बेहतर बनाए रखें
  • सभी शुल्कों और शर्तों पर अच्छी तरह गौर करें
  • ध्यान रखें कि हर महीने की किस्त आपके बजट में आ जाए

ज़िम्मेदारी से लोन लेकर आप इसे अच्छी तरह संभाल सकते हैं और भविष्य में होने वाले आर्थिक तनाव से बच सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या इंटरेस्ट कैलकुलेटर चुकाई जाने वाली कुल रकम दिखाता है?

हाँ। इंटरेस्ट कैलकुलेटर से आपको यह अंदाज़ा मिलता है कि लोन के मूलधन और तय समय-सीमा में लगने वाले ब्याज़ को मिलाकर आपको कुल कितनी रकम चुकानी होगी। इससे लोन लेने से पहले आपको कुल खर्च के बारे में जानने में मदद मिलती है।

क्या मैं इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से लोन के अलग-अलग विकल्पों की तुलना कर सकता हूँ?

हाँ। इंटरेस्ट कैलकुलेटर की मदद से आप लोन की अलग-अलग रकम, ब्याज़ दर और लोन चुकाने की समय-सीमा की तुलना कर सकते हैं। इस तरह आपके लिए ऐसा विकल्प चुनना आसान हो जाता है, जो आपके बजट और आर्थिक लक्ष्यों के हिसाब से सही हो।

क्या पर्सनल लोन के लिए इंटरेस्ट कैलकुलेटर उपयोगी है?

हाँ, पर्सनल लोन के लिए इंटरेस्ट कैलकुलेटर खास तौर पर बहुत उपयोगी है, क्योंकि इससे आप हर महीने की किस्त और कुल खर्च का आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं। इससे आपको लोन लेने के बारे में सही फैसला लेने और लोन चुकाने की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलती है।

निष्कर्ष

इंटरेस्ट कैलकुलेटर बेहद आसान लेकिन बहुत कारगर टूल है, जिससे आपको लोन के विकल्पों की तुलना करने, लोन चुकाने के बारे में अंदाज़ा लगाने और कोई भी फैसला लेने से पहले लोन लेने की कुल लागत को समझने में मदद मिलती है। इसके ज़रिये आप  सारी चीजों को अच्छे से समझ सकते हैं, आपकी फाइनेंशियल प्लानिंग बेहतर होती है और आप समझदारी से लोन ले सकते हैं।

अगर आप पहले से तय या अचानक सामने आने वाले किसी खर्च के लिए लोन लेने के बारे में सोच रहे हैं, तो बजाज फाइनैंस पर्सनल लोन के साथ इंटरेस्ट कैलकुलेटर का उपयोग करके आप अपनी ज़रूरतों के हिसाब से लोन चुकाने का सही विकल्प चुन सकते हैं। आज ही अपनी एलिजिबिलिटी के बारे में जानें और ऑनलाइन आवेदन करें, ताकि आप आसान और तेज आवेदन प्रक्रिया के ज़रिये फाइनैंसिंग के सुविधाजनक विकल्पों का लाभ उठा सकें।

* नियम व शर्तें लागू

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

ITR Filing 2026: फॉर्म 16 नहीं मिला? फिर भी आसानी से भर सकते हैं ITR, जानिए स्टेप-बाय-स्टेप तरीका

ITR Filing 2026: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने का समय आते ही ज्यादातर नौकरीपेशा लोग Form 16 का इंतजार करने लगते हैं। यह दस्तावेज ITR फाइल करने का काम काफी आसान बना देता है। लेकिन कई बार नौकरी बदलने, कंपनी बंद हो जाने, कम सैलरी होने या किसी दूसरी वजह से Form 16 नहीं मिल पाता। ऐसे में कई लोगों को लगता है कि अब ITR भरना मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन ऐसा नहीं है। अगर आपके पास Form 16 नहीं है, तब भी आप आसानी से अपना ITR फाइल कर सकते हैं। बस आपको अपनी कमाई, टैक्स कटौती और निवेश से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारियां जुटानी होंगी।

Form 16 आखिर होता क्या है?

Form 16 एक टैक्स सर्टिफिकेट होता है, जिसे कंपनी अपने कर्मचारियों को देती है। इसमें सालभर की सैलरी, TDS, टैक्स छूट और दूसरी जरूरी जानकारियां दर्ज होती हैं।

हालांकि Form 16 ITR भरने में मदद करता है, लेकिन ITR दाखिल करने के लिए इसका होना जरूरी नहीं है। आयकर विभाग ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी है कि बिना Form 16 के रिटर्न नहीं भरा जा सकता।

बिना Form 16 के ITR कैसे भरें?

सबसे पहले सैलरी स्लिप जुटाएं

अगर Form 16 नहीं मिला है, तो सबसे पहले पूरे वित्त वर्ष की सैलरी स्लिप निकाल लें। इन स्लिप्स में आपकी बेसिक सैलरी, HRA, स्पेशल अलाउंस, बोनस और दूसरी भुगतान संबंधी जानकारी होती है।

अगर आपने साल के दौरान नौकरी बदली है, तो दोनों कंपनियों की सैलरी स्लिप साथ रखें। इससे कुल आय निकालना आसान हो जाएगा।

AIS और TIS जरूर चेक करें

इनकम टैक्स पोर्टल पर लॉगिन करके एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और टैक्सपेयर इंफॉर्मेशन समरी (TIS) डाउनलोड करें।

AIS में आपकी सैलरी, बैंक ब्याज, डिविडेंड, शेयरों से हुई कमाई, TDS और कई दूसरे वित्तीय लेन-देन की जानकारी मिल जाती है। इससे आपको अपनी कुल आय का सही हिसाब लगाने में मदद मिलेगी।

Form 26AS को नजरअंदाज न करें

ITR भरने से पहले Form 26AS जरूर देखें। इसमें आपके PAN पर कटे TDS और जमा किए गए टैक्स का पूरा रिकॉर्ड होता है।

अगर आपकी कंपनी या बैंक ने TDS काटा है, तो वह यहां दिखाई देगा। इससे यह भी पता चल जाएगा कि आपके नाम पर कितना टैक्स जमा किया गया है।

सिर्फ सैलरी नहीं, दूसरी आय भी जोड़ें

कई लोग ITR भरते समय सिर्फ सैलरी की जानकारी भरते हैं और बैंक ब्याज, FD का ब्याज, डिविडेंड या दूसरी आय को भूल जाते हैं।

ऐसी गलती बाद में नोटिस की वजह बन सकती है। इसलिए AIS, बैंक स्टेटमेंट और निवेश से जुड़े रिकॉर्ड देखकर सभी आय को जोड़ना जरूरी है।

टैक्स छूट का फायदा लेना न भूलें

अगर आप पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) चुन रहे हैं, तो 80C, 80D, NPS, होम लोन और दूसरी उपलब्ध कटौतियों को जरूर शामिल करें।

अपने निवेश और खर्च से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें दिखाया जा सके।

नौकरी बदली है तो ये गलती न करें

अगर आपने वित्त वर्ष के दौरान एक से ज्यादा कंपनियों में काम किया है, तो सभी कंपनियों से मिली सैलरी को जोड़कर कुल आय निकालें।

कई बार नया नियोक्ता पुरानी नौकरी की आय को अपने टैक्स कैलकुलेशन में शामिल नहीं करता। ऐसे में ITR भरते समय सही आंकड़ा खुद जोड़ना जरूरी होता है। वरना बाद में अतिरिक्त टैक्स देना पड़ सकता है।

ITR भरने से पहले एक बार सब मिलान कर लें

रिटर्न फाइल करने से पहले AIS, Form 26AS, बैंक स्टेटमेंट और सैलरी रिकॉर्ड का मिलान जरूर करें। यह भी सुनिश्चित करें कि आपकी हर आय उसमें शामिल हो।

अगर आपकी कमाई के कई स्रोत हैं या मामला थोड़ा जटिल है, तो किसी टैक्स एक्सपर्ट की सलाह लेना बेहतर हो सकता है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Index funds vs Active funds: इंडेक्स फंड या एक्टिव फंड… 10 साल में ₹1 लाख से किसने बनाया ज्यादा पैसा?

Index funds vs Active funds: म्यूचुअल फंड में निवेश लंबी अवधि में पैसा बढ़ाने का सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है। लेकिन, कौन सा फंड ज्यादा बेहतर रिटर्न देता है? अब मान लीजिए कि दो दोस्त हैं। 10 साल पहले दोनों ने म्यूचुअल फंड में ₹1-1 लाख लगाए। पहले ने ज्यादा सोच-विचार नहीं किया और Nifty 50 Index Fund में पैसा लगा दिया। दूसरे को भरोसा था कि एक अच्छा फंड मैनेजर बाजार से बेहतर रिटर्न दिला सकता है, इसलिए उसने एक एक्टिव इक्विटी फंड चुना।

10 साल बाद पहले निवेशक का ₹1 लाख बढ़कर करीब ₹3.15 लाख हो गया। लेकिन दूसरे निवेशक के लिए नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि उसने कौन-सा फंड चुना था।

अगर उसने सही लार्ज कैप फंड चुना होता, तो उसकी रकम करीब ₹3.83 लाख हो सकती थी। लेकिन अगर फंड का चुनाव गलत हो जाता, तो वही ₹1 लाख सिर्फ ₹2.60 लाख तक पहुंचता। यानी इंडेक्स फंड से भी कम रिटर्न मिलता।

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फ्लेक्सी कैप फंड में और बड़ा अंतर

फ्लेक्सी कैप फंड्स में यह अंतर और ज्यादा बड़ा दिखता है। पिछले 10 साल में कुछ फ्लेक्सी कैप फंड्स ने ₹1 लाख को बढ़ाकर करीब ₹5.99 लाख कर दिया। वहीं कुछ फंड्स में यही रकम सिर्फ ₹2.53 लाख तक पहुंची।

यही इंडेक्स फंड और एक्टिव फंड के बीच सबसे बड़ा फर्क है। इंडेक्स फंड का मकसद बाजार जितना रिटर्न देना होता है, इसलिए इसमें रिटर्न का अंदाजा लगाना आसान होता है। दूसरी तरफ एक्टिव फंड में ज्यादा कमाई का मौका भी होता है और कमजोर रिटर्न का जोखिम भी।

एक्टिव फंड ज्यादा रिटर्न कैसे दे सकते हैं?

Arthasadhana Investments की संस्थापक और QPFP®️ Namrata Singh कहती हैं कि एक्टिव फंड्स में बाजार से बेहतर रिटर्न देने की क्षमता होती है। खासकर उन कैटेगरी में, जहां फंड मैनेजर को अलग-अलग सेक्टर और अलग-अलग आकार की कंपनियों में निवेश करने की आजादी होती है।

इंडेक्स फंड एक तय सूची के हिसाब से निवेश करते हैं। लेकिन एक्टिव फंड में फंड मैनेजर अपने हिसाब से फैसले ले सकता है। उसे अगर लगता है कि किसी सेक्टर में तेजी आने वाली है, तो वह वहां निवेश बढ़ा सकता है। अगर कोई सेक्टर महंगा लग रहा है, तो वहां निवेश कम कर सकता है। फ्लेक्सी कैप फंड्स में तो फंड मैनेजर लार्ज, मिड और स्मॉल कैप कंपनियों के बीच भी आसानी से पैसा शिफ्ट कर सकता है।

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अनुभव मैनेजर पकड़ लेते हैं मौके

नम्रता सिंह का कहना है कि भारतीय शेयर बाजार में हालात लगातार बदलते रहते हैं। कभी कोई सेक्टर आगे निकल जाता है तो कभी दूसरा। ऐसे में अनुभवी फंड मैनेजर कई बार ऐसे मौके पकड़ लेते हैं, जो अभी इंडेक्स में पूरी तरह दिखाई नहीं देते।

यही वजह है कि इस अध्ययन में सबसे बेहतर फ्लेक्सी कैप फंड ने ₹1 लाख को करीब ₹6 लाख में बदल दिया। यह Nifty 50 Index Fund के रिटर्न से लगभग दोगुना है।

लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा है

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। जिस फ्लेक्सी कैप फंड का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा, उसने 10 साल में ₹1 लाख को सिर्फ ₹2.53 लाख बनाया। वहीं सबसे कमजोर लार्ज कैप फंड की वैल्यू ₹2.60 लाख तक पहुंची। दोनों ही मामलों में रिटर्न Nifty 50 Index Fund से कम रहा। यानी एक्टिव फंड में सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि आपने कौन-सा फंड चुना है।

नम्रता सिंह कहती हैं कि सिर्फ पुराने रिटर्न देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए। निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि फंड पैसा कैसे निवेश करता है, जोखिम को कैसे संभालता है और लंबे समय में उसका प्रदर्शन कितना स्थिर रहा है।

फिर भी कई लोग इंडेक्स फंड क्यों चुनते हैं?

कई निवेशक फंड मैनेजर चुनने की झंझट में नहीं पड़ना चाहते। वे यह सोचकर निवेश करते हैं कि बाजार जितना रिटर्न मिल जाए, वही काफी है। ऐसे निवेशकों के लिए इंडेक्स फंड एक आसान विकल्प बन जाते हैं। ये बाजार को हराने की कोशिश नहीं करते। इनका मकसद सिर्फ Nifty 50 जैसे किसी इंडेक्स के प्रदर्शन को दोहराना होता है।

इसके अलावा इंडेक्स फंड का खर्च भी आमतौर पर कम होता है और निवेशक को एक ही फंड के जरिए कई बड़ी कंपनियों में निवेश का मौका मिल जाता है।

नम्रता सिंह के मुताबिक, जो निवेशक सरल और नियम-आधारित निवेश पसंद करते हैं और फंड मैनेजर पर निर्भर नहीं रहना चाहते, उनके लिए इंडेक्स फंड अच्छा विकल्प हो सकते हैं। वहीं जो लोग थोड़ा ज्यादा जोखिम लेकर बेहतर रिटर्न की तलाश में हैं, वे अच्छे एक्टिव फंड्स पर विचार कर सकते हैं।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Personal Loan: अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए कैसे चुनें सही पर्सनल लोन? ये 5 फैक्टर करेंगे आपकी मदद

Personal Loan: -पर्सनल लोन जरूरत के समय बड़ी राहत दे सकता है। मेडिकल इमरजेंसी, बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह, घर की मरम्मत या पुराने कर्जों को चुकाने जैसे कई कामों के लिए लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, बिना योजना के लिया गया लोन बाद में आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है। इसलिए लोन लेने से पहले अपनी जरूरत, चुकाने की क्षमता और लोन की शर्तों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

1. सबसे पहले तय करें कितनी रकम चाहिए

लोन के लिए आवेदन करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपको कितनी रकम की जरूरत है और उसका इस्तेमाल किस काम के लिए होना है। कई बार लोग जरूरत से ज्यादा लोन ले लेते हैं, जिससे EMI और ब्याज दोनों का बोझ बढ़ जाता है।

जरूरत के हिसाब से लोन लेने का फायदा यह है कि कुल ब्याज कम चुकाना पड़ता है और लोन चुकाना भी आसान रहता है। इससे आपकी वित्तीय स्थिति पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता।

2. ब्याज दरों की तुलना करना जरूरी

पर्सनल लोन चुनते समय सबसे अहम ब्याज दर है। अलग-अलग बैंक अलग-अलग दरों पर लोन देते हैं। जून 2026 में Axis Bank 8.95% सालाना की शुरुआती ब्याज दर पर पर्सनल लोन ऑफर कर रहा है। वहीं HDFC Bank और कई अन्य बैंक 9.99% से शुरू होने वाली दरों पर लोन दे रहे हैं।

ब्याज दर में छोटा-सा अंतर भी लंबे समय में बड़ी रकम का फर्क पैदा कर सकता है। इसलिए किसी एक बैंक के ऑफर को देखकर फैसला करने की बजाय कई बैंकों की दरों की तुलना करना बेहतर रहता है।

3. छिपे हुए शुल्कों को नजरअंदाज न करें

सिर्फ कम ब्याज दर देखकर लोन लेना सही फैसला नहीं होता। कई बार प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज, पार्ट-पेमेंट फीस, लेट पेमेंट पेनाल्टी और दूसरे शुल्क लोन की कुल लागत को काफी बढ़ा देते हैं।

यही वजह है कि आवेदन करने से पहले सभी नियम और शुल्कों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। इससे बाद में किसी तरह की परेशानी या अतिरिक्त खर्च से बचा जा सकता है।

4. सही टेन्योर चुनना भी उतना ही अहम

लोन का टेन्योर आपकी EMI और कुल ब्याज लागत दोनों को प्रभावित करता है। कम अवधि वाला लोन चुनने पर EMI ज्यादा आती है, लेकिन कुल ब्याज कम देना पड़ता है। वहीं लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, लेकिन ब्याज का कुल बोझ बढ़ जाता है।

इसलिए ऐसा टेन्योर चुनना चाहिए, जो आपकी आय और मासिक बजट के हिसाब से संतुलित हो। EMI इतनी होनी चाहिए कि बाकी जरूरी खर्चों पर असर न पड़े।

5. बैंक की साख और सेवा भी देखें

लोन लेते समय सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि बैंक या वित्तीय संस्था की साख भी देखनी चाहिए। ग्राहक सेवा, शिकायत निपटान व्यवस्था, लोन प्रोसेसिंग की पारदर्शिता और रकम मिलने में लगने वाला समय जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। एक अच्छी संस्था से लिया गया लोन पूरी प्रक्रिया को आसान और सुविधाजनक बना सकता है।

सोच-समझकर लें पर्सनल लोन का फैसला

पर्सनल लोन एक वित्तीय जिम्मेदारी है। बैंक आपको तय शर्तों पर रकम देता है और बदले में आपको हर महीने EMI चुकानी होती है। इसलिए लोन लेने से पहले अपनी आय, खर्च, मौजूदा कर्ज और भविष्य की जरूरतों का आकलन जरूर करें।

ब्याज दर, टेन्योर, अतिरिक्त शुल्क और चुकाने की क्षमता को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला आपको आर्थिक दबाव से बचा सकता है। जरूरत पड़ने पर किसी योग्य वित्तीय सलाहकार की राय लेना भी फायदेमंद हो सकता है।

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Viral Post: 6 अंकों की सैलरी के बाद भी खर्च करने में डरता है ये युवक! 26 साल के प्रोफेशनल ने शेयर किया पोस्ट

आज के समय में कई लोगों को ऐसा लगता है कि 6 अंकों वाली सैलरी मिलने के बाद आर्थिक परेशानियां खत्म हो जाती हैं। लेकिन 26 साल के एक युवक ने सोशल मीडिया पर बताया कि अच्छी कमाई होने के बावजूद हर महीने खर्च और बचत के बीच बैलेंस बनाना आसान नहीं है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए एक पोस्ट में एक प्रोफेशनल ने अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर दिलचस्प अनुभव साझा किया है। उन्होंने बताया कि करीब 82 लाख रुपए सालाना कमाने के बावजूद कई बार ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि मनोरंजन, घूमने-फिरने या महंगे कपड़ों जैसी चीजों पर पैसा खर्च किया जाए या नहीं। युवक का ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा हैय़

उसकी पोस्ट के बाद कई लोगों ने कहा कि बढ़ती महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों की वजह से अच्छी सैलरी वाले लोगों को भी अपने पैसों का सही तरीके से हिसाब रखना पड़ता है।

युवक ने शेयर किया पोस्ट

रेडिट पर शेयर किए गए पोस्ट में यूजर ने लिखा, “मुझे पता है कि मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी है और पैसों को लेकर कोई बड़ी परेशानी नहीं है, लेकिन एक चीज को लेकर मैं अब भी असमंजस में रहता हूं। कॉन्सर्ट या थिएटर के टिकट, किसी खास मौके पर बाहर घूमने जाना या अच्छे कपड़े खरीदने जैसी छोटी-बड़ी चीजों पर खर्च करने का फैसला मेरे लिए आसान नहीं होता। कई बार समझ नहीं आता कि इन चीजों पर कितना और कब खर्च करना सही रहेगा।”

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कितनी है सैलरी

26 साल के इस यूजर ने बताया कि उनकी सालाना आय करीब 95,000 डॉलर है। रिटायरमेंट फंड, हेल्थकेयर और इंश्योरेंस जैसी कटौतियों के बाद उनके पास हर महीने लगभग 3,000 डॉलर बचते हैं। यूजर ने पोस्ट में लिखा, “मैं चाहता हूं कि इन खर्चों के लिए मेरा बजट थोड़ा बड़ा हो, ताकि मैं कभी-कभी अच्छे ड्रेस शूज़ जैसी चीजें भी खरीद सकूं। लेकिन ज्यादातर महीनों में मैं इस कैटेगरी के लिए तय रकम का 90 से 110 प्रतिशत तक खर्च कर देता हूं।”

यूजर की पोस्ट पर लोगों ने किया कमेंट

इस पोस्ट पर कई लोगों ने अपनी राय भी शेयर की। एक यूजर ने लिखा, “बजट बनाना खर्चों का अंदाजा लगाने के लिए अच्छा तरीका है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात समझदारी से खर्च करना है। हर स्थिति को बजट में शामिल नहीं किया जा सकता, इसलिए किसी भी खरीदारी से पहले यह जरूर सोचें कि उसकी कीमत वाकई उचित है या नहीं।” वहीं एक अन्य यूजर ने कहा, “जब मैं ऐसी स्थिति में होता हूं, तो मैं उस चीज के लिए कुछ महीनों तक बचत करने का फैसला करता हूं जिसे खरीदना चाहता हूं। अगर चाहूं तो अपने बजट में बदलाव कर सकता हूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करता। इसलिए मेरे लिए सबसे अच्छा तरीका धैर्य रखना और इंतजार करना है।”

Personal Loan: सैलरी वालों को आसानी से मिलता है पर्सनल लोन, लेकिन इन 5 बातों नजरअंदाज करना पड़ेगा महंगा

Personal Loan: भारत में डिजिटल पर्सनल लोन का चलन तेजी से बढ़ा है। खासकर, सैलरी को देखकर मिलने वाला पर्सनल लोन। पारंपरिक लोन के मुकाबले इसमें कम कागजी काम होती है। लोन देने वाली कंपनियां आपकी सैलरी, नौकरी की स्थिरता, क्रेडिट स्कोर, पुराने लोन चुकाने का रिकॉर्ड और बैंकिंग पैटर्न देखकर तय करती हैं कि आपको कितना लोन दिया जा सकता है।

इस वजह से लोन जल्दी मंजूर हो जाता है और कम समय में पैसा मिल सकता है। लोग इन लोन का इस्तेमाल मेडिकल इमरजेंसी, शादी-ब्याह, बच्चों की पढ़ाई, पुराने कर्ज चुकाने या कई महंगे लोन को एक जगह जोड़ने के लिए करते हैं।

हालांकि, आसान से मिलने का मतलब यह नहीं है कि बिना सोचे-समझे लोन ले लिया जाए। कुछ गलतियां आपको बाद में परेशानी में डाल सकती हैं।

सैलरी वाले पर्सनल लोन में क्या जोखिम हैं?

ऐसे लोन में कई बार सिर्फ ब्याज ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज भी जुड़ जाते हैं। इससे लोन की कुल लागत बढ़ सकती है। आसान मंजूरी मिलने की वजह से कुछ लोग जरूरत से ज्यादा रकम उधार ले लेते हैं। इससे बाद में EMI का बोझ बढ़ जाता है।

इसके अलावा अगर आप लंबी अवधि का लोन चुनते हैं, तो मंथली EMI कम जरूर हो सकती है, लेकिन कुल ब्याज ज्यादा देना पड़ सकता है। समय पर EMI नहीं चुकाने पर क्रेडिट स्कोर खराब हो सकता है। इसका असर भविष्य में होम लोन, कार लोन या क्रेडिट कार्ड मिलने पर भी पड़ सकता है।

समझदारी से लोन लेने के 5 तरीके

1. सिर्फ जरूरत भर का लोन लें

कई बार लोग जितना लोन मिल सकता है, उतना ले लेते हैं। लेकिन सही तरीका यह है कि सिर्फ उतनी ही रकम लें, जिसकी वास्तव में जरूरत हो।

ज्यादा लोन का मतलब ज्यादा EMI और ज्यादा ब्याज है। इसलिए पहले जरूरत का सही आकलन करें और फिर लोन लें।

2. EMI चुकाने की क्षमता जरूर देखें

लोन लेना आसान है, लेकिन हर महीने EMI भरना उतना आसान नहीं होता।

नया लोन लेने से पहले यह जरूर देखें कि आपकी सैलरी का कितना हिस्सा EMI में जाएगा। अगर पहले से कोई लोन चल रहा है, तो उसका भी ध्यान रखें। ऐसी EMI चुनें जिसे आप आराम से चुका सकें।

3. अलग-अलग बैंकों की तुलना करें

लोन लेने से पहले सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस, दूसरे चार्ज और लोन की शर्तों की भी तुलना करें।

कई बार कम ब्याज वाला लोन दूसरे चार्ज की वजह से महंगा पड़ सकता है। इसलिए पूरी लागत समझने के बाद ही फैसला लें।

4. अच्छा क्रेडिट स्कोर बनाए रखें

क्रेडिट स्कोर जितना अच्छा होगा, भविष्य में उतनी ही आसानी से लोन मिल सकता है। 750 या उससे ज्यादा का क्रेडिट स्कोर आमतौर पर अच्छा माना जाता है।

इसके लिए EMI और क्रेडिट कार्ड बिल हमेशा समय पर चुकाएं। लोन या कार्ड पेमेंट में देरी करने से क्रेडिट स्कोर पर नेगेटिव असर पड़ता है।

5. लोन का इस्तेमाल सही काम में करें

लोन की रकम का इस्तेमाल सोच-समझकर करें। महंगे गैजेट, लग्जरी शॉपिंग या गैर-जरूरी खर्चों के लिए बार-बार लोन लेना सही नहीं माना जाता।

कोशिश करें कि लोन का इस्तेमाल किसी जरूरी जरूरत, इमरजेंसी या ऐसे काम में हो जो आपकी वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करे।

लोन लेते समय जल्दबाजी न करें

सैलरी पर मिलने वाला पर्सनल लोन जरूरत के समय काफी मददगार साबित हो सकता है। लेकिन लोन लेने से पहले उसकी लागत, EMI, ब्याज और अपनी चुकाने की क्षमता को अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है।

अगर सही योजना और अनुशासन के साथ लोन लिया जाए, तो यह आपके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकता है। वहीं बिना योजना के लिया गया लोन लंबे समय तक आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।

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Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।