विपक्ष की राजनीतिक दिशा ही ठीक नहीं है

वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका समय आ गया है। ऐसा लगने में कोई बुराई नहीं है। जो विपक्ष में है उसे लगना चाहिए कि उसका समय आ गया है या आ रहा है। लेकिन सिर्फ लगने से कुछ नहीं होता है। कांग्रेस के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वह सत्ता में रहती है या सत्ता के इंतजार में रहती है। अभी राहुल गांधी सत्ता का इंतजार कर रहे हैं। इंतजार जैसे जैसे लंबा होता जा रहा है वैसे वैसे उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। तभी हर छोटी बड़ी घटना पर वे यह मानने लगते हैं कि अब सरकार कमजोर हो गई है और उनका समय आ गया है, वे चुनाव जीत सकते हैं। तभी चुनाव आयोग को लेकर अंग्रेजी के एक अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की तो राहुल गांधी को लगा कि यह मौका है। सिर्फ उन्हीं को नहीं, बल्कि दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी लगा कि यह एक बड़ा मौका है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगा कि यह बहुत बड़ा अवसर है और इस बहाने अपने को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

ममता बनर्जी तो इतनी उत्साहित हो गईं कि दशकों की दुश्मनी भूल कर सीपीएम के महासचिव एमए बेबी को फोन कर दिया। उनसे आग्रह किया कि वे विपक्षी पार्टियों को एकजुट करें। उन्होंने राहुल गांधी से अपील करते हुए कहा कि वे ‘इंडिया’ ब्ल़ॉक की बैठक बुलाएं। इसी तरह का उत्साह राहुल गांधी में भी दिखा। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें इस अंदाज में बात कर रहे थे, जैसे उनकी सरकार आ गई हो। वे मुख्य चुनाव आयुक्त से कह रहे थे कि वे इस्तीफा कर दें और सरकारी गवाह बन जाएं। इससे ऐसा लगा, जैसे देश में उनकी सरकार हो। लेकिन असल में उनके उत्साह का कोई ठोस आधार नहीं है। चाहे ममता बनर्जी हों या राहुल गांधी दोनों अपने अपने कारणों से मौजूदा हालात का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है तो राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका सत्ता का इंतजार समाप्त होने वाला है। तभी आने वाले दिनों में इसी लाइन पर संपूर्ण विपक्ष की राजनीति देखने को मिलेगी।

परंतु वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है। चाहे चुनाव आयोग हो या कोई दूसरी एजेंसी वह किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकती है। चुनाव जनता के वोट से जीता जाता है। जनभावना जिस पार्टी के साथ होती है वह चुनाव जीतती है। बाकी बातों का कोई खास अर्थ नहीं होता है। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल का चुनाव देखा जा सकता है। 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल माहौल दिख रहा था। लेकिन जनभावना तृणमूल कांग्रेस के साथ थी तो भाजपा नहीं जीत सकी। इसके उलट 2026 में जनभावना ममता बनर्जी के खिलाफ हुई तो पुलिस और प्रशासन का सारा प्रबंधन होने के बावजूद वे खुद भी हारीं और पार्टी भी हार गई। ऐसी अनके मिसालें दी जा सकती हैं।

ध्यान रहे किसी भी पार्टी के चुनाव जीतने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। पहली, पार्टी का संगठन। दूसरी, एक करिश्माई नेतृत्व और तीसरी चीज है नैरेटिव। जिस पार्टी के पास मजबूत संगठन होगा, करिश्माई नेता होगा और धारणा पर नियंत्रण होगा वही चुनाव जीतेगा। इस समय ये तीनों चीजें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं। इसलिए वह लगातार चुनाव जीत रही है। दूसरी ओर अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके पास सबसे बड़ी कमजोरी संगठन की है। उसका संगठन बहुत कमजोर है और राज्यों में भी उसके पास अच्छे नेताओं का अकाल है। प्रदेशों के ज्यादातर बड़े नेताओं ने अपनी प्रादेशिक पार्टी बना ली या कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। अगर नेतृत्व की बात करें तो पिछले 22 साल से लगातार मेहनत करके राहुल गांधी अपने को नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही है। नेतृत्व के मामले में विपक्ष में आपसी सहमति भी नहीं है। जहां तक धारणा का सवाल है तो विपक्ष के प्रति आम जनमानस में निगेटिव धारणा है। अगर विपक्ष के पास संगठन, नेता और नैरेटिव ये तीन चीजें नहीं हैं तो फिर वह भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे करिश्माई नेता को कैसे चुनौती दे पाएगा?

इसके बावजूद अगर राहुल गांधी हमलावर हैं तो उसका कारण यह है कि वे पूरे घटनाक्रम को गलत नजरिए से पढ़ रहे हैं। वे नेता प्रतिपक्ष हैं और इस नाते सरकार के खिलाफ बोलना या राजनीति करना उनका काम है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से वे सरकार और भाजपा का विरोध करते करते देश की संवैधानिक संस्थाओं का विरोध करने लगे हैं। अपने अति उत्साह में राहुल गांधी देश की संस्थाओं की साख को कमजोर करने और उनके ऊपर संदेह बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं। अंग्रेजी के एक अखबार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर एक खुलासा किया तो उससे जुड़े मुद्दों पर सवाल करने की बजाय राहुल गांधी ने पूरी संस्था और उसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए। वे इसको एक अलग ही दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने मुख्य चुनाव आय़ुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था और आपत्ति दर्ज कराई थी। हकीकत यह है कि उन्होंने बाकी दोनों आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जाहिर है वे सेलेक्टिव होकर हमले कर रहे हैं। उनको चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आय़ुक्त रहे एमएस गिल को मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनाया था। नवीन चावला का विवाद भी कांग्रेस के राज का है, जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति के शिकायत की थी कि चावला कांग्रेस के आदमी हैं। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की सरकारों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था का राजनीतिकरण किया था। यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस के शासन में सीधे सरकार ही चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करती थी।

बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि देश में एसआईआर जरूरी है या नहीं? इसका स्पष्ट जवाब है कि एसआईआर जरूरी है। मतदाता सूची में करोड़ों ऐसे लोगों के नाम हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है। लाखों ऐसे नाम हैं, जो डुप्लीकेट हैं। ऐसे नामों को हटा कर मतदाता सूची की पवित्रता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनावी आयोग की होती है। उसने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व के तहत यह काम किया है। अगर उसमें कहीं कोई त्रुटि है और नेता विपक्ष उसकी ओर ध्यान दिलाएं तो बात समझ में आती है। लेकिन यह दावा करना कि एसआईआर के कारण भाजपा जीत रही है या चुनाव आयोग के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं होती है, एक बचकानी बात है। कोई भी एजेंसी या संस्था किसी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी को खत्म नहीं कर सकती है और न चुनाव जिता सकती है। ध्यान रहे एसआईआर की प्रक्रिया पिछले साल जून में शुरू हुई और कांग्रेस के हारने का सिलसिला उससे बहुत पुराना है। इसी साल एसआईआर के बीच पांच राज्यों में चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस केरल में जीती है और एक नई बनी पार्टी तमिलनाडु में जीत गई। इसलिए किसी भी घटना को एक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता होती है। हर चीज चुनावी राजनीति के लिए नहीं होती है।

असल में राहुल गांधी ढाई साल पहले ही अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इसके लिए वे पार्टी संगठन को मजबूत करते या जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करते नहीं दिख रहे हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनावी माहौल बना रहे हैं। वे चुनावी लाभ के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आदि को देश को नष्ट करने वाला बता रहे हैं। वे सम्मानित उद्योगपतियों, राष्ट्रवादी संगठन से जुड़े लोगों और मीडिया की हस्तियों को भी देश विरोधियों की सूची में शामिल कर रहे हैं। इस तरह का एक्सट्रीम नैरेटिव पता नहीं उनको कितना चुनावी लाभ पहुंचाएगा लेकिन देश को निश्चित रूप से इसका नुकसान होगा। देश विरोधी शक्तियों को इन बातों से भारत विरोधी की गतिविधियां तेज करने का अवसर मिलता है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उनको एक जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर बरताव करना चाहिए। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

‘आतंकवाद का सीरियल प्रैक्टिशनर है पाकिस्तान’; UNGA में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शहबाज शरीफ को जमकर धोया

India-Pakistan Dispute: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार (26 सितंबर) को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए पाकिस्तान पर जमकर तीखा हमला बोला। उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना उसे ‘आतंकवाद का सीरियल प्रैक्टिशनर’ करार दिया। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद को सामान्य बनाने या उसके लिए किसी तरह की छूट मांगने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद लंबे समय से वैश्विक शांति के लिए खतरा बना हुआ है। उन्होंने विशेष रूप से राज्य प्रायोजित आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती बताया।

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में विश्व नेताओं से कहा, “ऐसी गतिविधियों में शामिल सरकारों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। आतंकवाद के प्रति हमारी जीरो टॉलरेंस की नीति में किसी तरह की ढील नहीं होनी चाहिए। खास तौर पर आतंकवाद के वित्तीय पहलुओं को उजागर किया जाना चाहिए और उनका मुकाबला किया जाना चाहिए।”

शहबाज पर जयशंकर का सीधा निशाना

पाकिस्तान का नाम लिए बिना जयशंकर ने कहा, “कल आतंकवाद का एक सीरियल प्रैक्टिशनर इस महासभा के सामने तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रहा था। आतंकवाद को सामान्य बनाने और उसके परिणामों से बचने के लिए तर्क दिए गए। ऐसा नहीं चल सकता।”

विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत को आतंकवादी हमलों से अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है। वह इसका इस्तेमाल करेगा। उन्होंने कहा कि दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। जयशंकर ने कहा, “आतंकवाद को अंजाम देने वाले को ही अपना रास्ता सुधारना होगा।”

पाक PM के नापाक बयान के बाद आया पलटवार

जयशंकर की यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के शुक्रवार को UNGA में दिए भाषण के एक दिन बाद आई। शरीफ ने अपने संबोधन में सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने, बाधित करने या मोड़ने की किसी भी कोशिश को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। शहबाज शरीफ ने UNGA में एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा भी उठाया।

भारत ने ‘राइट टू रिप्लाई’ में भी दिया जवाब

भारत की ओर से राइट टू रिप्लाई का इस्तेमाल करते हुए भारतीय राजनयिक पेटल गहलोत ने शरीफ के बयानों को अजीब करार दिया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा का ध्यान पाकिस्तान पर लगे उन आरोपों की ओर दिलाया, जिनमें उस पर हाई-प्रोफाइल आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप लगाया जाता रहा है।

गहलोत ने विशेष रूप से 9/11 हमलों के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन का जिक्र किया और कहा कि वह पाकिस्तान में रह रहा था। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच केंद्रीय मुद्दा पाकिस्तान की सीमा पार आतंकवाद की लंबे समय से चली आ रही नीति है। गहलोत ने कहा कि भारत ने पिछले वर्ष यह स्पष्ट कर दिया था कि आतंकवादियों के लिए न तो कोई सुरक्षित ठिकाना होगा और न ही छिपने की कोई जगह।

‘अंतहीन युद्ध का अब अंत होना चाहिए’

भारत ने खाड़ी क्षेत्र में अशांति पर चिंता जताने के साथ यूक्रेन में संघर्ष को भी समान रूप से चिंताजनक बताते हुए कहा कि अंतहीन युद्ध का अब अंत होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सत्र की आम चर्चा को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “इस साल हम खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष देख रहे हैं, जिससे पहले से ही मुश्किल हालात और बिगड़ रहे हैं। जारी तनाव को लेकर हम बेहद चिंतित हैं।” उन्होंने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों और नाविकों को निशाना बनाए जाने को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।

जयशंकर ने कहा, “भारत सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऊर्जा तथा व्यापार के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने का आह्वान करता है।” उन्होंने कहा कि यूक्रेन में संघर्ष समान रूप से चिंताजनक है। जयशंकर ने अगस्त में बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा, “अंतहीन युद्ध का अब अंत होना चाहिए।”

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उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी हिंसा पर भी चिंता जताई। जयशंकर ने इजराइल-फलस्तीन संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा, “पश्चिम एशिया या मध्य पूर्व में भी तनाव और हिंसा दुर्भाग्य से जारी है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि स्थायी और दीर्घकालिक शांति के लिए दो-राष्ट्र समाधान जरूरी है।” जयशंकर ने कहा, “इस बीच, भारत फलस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता और राहत प्रयासों में योगदान दे रहा है।”

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’: कामना के उस पार

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है।

पंकज दुबे

सेक्स के बारे में हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह नहीं कि हम उसके बारे में कम जानते हैं। दिक्कत यह है कि हम उसके बारे में खुलकर सोचते भी कम हैं।

हमारे समाज में सेक्स या तो नैतिकता का विषय रहा है, या अपराध बोध का, या फिर चुपचाप उपभोग की जाने वाली चीज़। प्रेम पर कविता लिखी जा सकती है, विरह पर गीत बनाया जा सकता है, लेकिन इच्छा पर बात आते ही भाषा धीमी पड़ जाती है। इसलिए ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ को सिर्फ चार कामुक कहानियों की तरह देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी।

विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज की चार कहानियां दरअसल एक ही मानवीय इलाके में घूमती हैं कि ‘हम आखिर चाहते क्या हैं’? और उससे भी बड़ा सवाल कि हम जो चाहते हैं, क्या उसके बारे में अपने साथी से बात कर पाते हैं? यही वह जगह है जहां सेक्स धीरे-धीरे रिश्ते का विषय बन जाता है।

मोटवानी की कहानी में दो विवाहित स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में आई ऊब को तोड़ने के लिए एक असामान्य रास्ता सोचती हैं। कहानी में हास्य है, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर प्रश्न है, “क्या विवाह में साथ रहना अपने आप अंतरंग बने रहना भी है?”

विवाह की शुरुआत में दूसरा व्यक्ति रहस्य होता है। फिर वह परिचित होता है। फिर बहुत परिचित। और कभी-कभी इतना परिचित कि जिज्ञासा ही खत्म हो जाती है। शायद इच्छा का एक हिस्सा नवीनता नहीं, दूसरे को फिर से देखने की क्षमता है। मोटवानी की कहानी इसी खोई हुई दृष्टि को हल्के-फुल्के ढंग से पकड़ती है। खास बात यह है कि यहां स्त्री की कामना किसी पुरुष की इच्छा के जवाब में नहीं, अपने आप में मौजूद मानवीय इच्छा है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।

किरण राव इस इच्छा को और भीतर ले जाती हैं। उनकी कहानी में आकर्षण सिर्फ़ उस व्यक्ति का नहीं है जो सामने मौजूद है; उसमें उस व्यक्ति की हमारी बनाई हुई कल्पना भी शामिल है। हम किसी को देखते हैं और फिर अपने मन में उसका एक संस्करण बना लेते हैं। कभी-कभी हम इंसान से नहीं, उसके बारे में अपनी कल्पना से आकर्षित होते हैं। यानी कामना की पहली मंज़िल शरीर नहीं बल्कि कल्पना है।

शकुन बत्रा के यहां यह कल्पना विवाह के टूटने के बाद भी शरीर में बनी रहती है। रिश्ता खत्म करने का फैसला हो चुका है, लेकिन आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।यह असुविधाजनक स्थिति इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जीवन में भावनाएं अनुबंधों की तरह समाप्त नहीं होतीं। तलाक का कागज़ कह सकता है कि रिश्ता ख़त्म। शरीर शायद कहे, अभी नहीं। यहीं फ़िल्म सेक्स को एक ऐसी भाषा की तरह देखती है जो उस समय भी बोल सकती है जब शब्दों ने जवाब देना बंद कर दिया हो।

और विशाल भारद्वाज कामना को लगभग पूरी तरह मन के हवाले कर देते हैं। साहित्य, कल्पना, आवाज़ और स्मृति मिलकर एक ऐसा संसार बनाते हैं जहां इच्छा को किसी शारीरिक घटना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है। इस विचार को ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ पर रखें तो चारों कहानियां एक दिलचस्प नक्शा बनाती हैं।

कहीं इच्छा को विवाह की ऊब से मुक्ति चाहिए। कहीं वह कल्पना में अपना संसार बना रही है। कहीं रिश्ता खत्म हो चुका है, लेकिन शरीर पीछे छूट गया है।

कहीं साहित्य और कल्पना देह से पहले इच्छा को जगा रहे हैं। तो फिर सेक्स आखिर है क्या? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। कभी वह सुख है। कभी रोमांच। कभी ये पुष्टि कि मैं अभी भी आकर्षक हूं। और कभी पलायन कि कुछ देर के लिए अपनी ज़िंदगी की दूसरी सारी परेशानियां भूल सकूं। और कभी-कभी वह उस अकेलेपन के खिलाफ मनुष्य का सबसे पुराना प्रतिरोध है, जिसे शब्दों में स्वीकार करना मुश्किल होता है। यहीं ओशो का ‘ध्यान’ वाला विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि ध्यान का अर्थ पूरी तरह वर्तमान क्षण में होना है, तो अंतरंगता में भी ऐसी ही उपस्थिति की संभावना है। जब दो लोग सचमुच एक-दूसरे के साथ होते हैं, तब कुछ समय के लिए सामाजिक भूमिकाएं, चिंता, प्रदर्शन और आत्म-संदेह पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा फ़र्क़ है। सेक्स अपने आप ध्यान नहीं है। जागरूकता उसे एक अलग अनुभव बना सकती है। और जागरूकता का अर्थ है कि मैं सिर्फ़ अपनी इच्छा को नहीं देख रहा; मैं सामने वाले मनुष्य को भी देख रहा हूं।

यहीं से कामना और अंतरंगता अलग हो जाती हैं। कामना पूछती है, ‘मुझे क्या चाहिए?’ अंतरंगता पूछती है, ‘हम दोनों के बीच अभी क्या हो रहा है?’ यह फ़र्क़ विवाह के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि विवाह में सबसे बड़ा संकट हमेशा सेक्स की कमी नहीं होता। कभी-कभी संकट यह होता है कि हम अपने साथी के बारे में नई चीज़ें जानना बंद कर देते हैं। उसे देखकर हमें कुछ नया महसूस नहीं होता। उसकी चुप्पी पढ़ने की कोशिश नहीं करते। उसके बदलते शरीर को नहीं देखते। उसकी बदलती इच्छाओं के बारे में नहीं पूछते। हम व्यक्ति को उसकी भूमिका में बदल देते हैं मसलन पति, पत्नी, मां, पिता, कमाने वाला, घर संभालने वाला। और जिस दिन व्यक्ति की जगह भूमिका ले लेती है, उस दिन अंतरंगता धीरे-धीरे कम होने लगती है।

यहीं ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ अपने शीर्षक से कहीं बड़ा हो जाता है। यह सिर्फ ‘लस्ट’ की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो चाहा जाना चाहता है, देखा जाना चाहता है और अपने भीतर अभी भी जीवित किसी हिस्से को महसूस करना चाहता है। चारों फ़िल्मों में कामना के रूप अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ में पहचान का प्रश्न है। क्या मैं अभी भी आकर्षक हूं? क्या कोई मुझे देखता है? क्या मेरे भीतर अभी भी कुछ ऐसा है जिसे कोई पाना चाहता है? क्या मैं अपने साथी को अब भी वैसे देख सकता हूं? और शायद सबसे कठिन सवाल कि ‘क्या मैं खुद को अब भी वैसे देख सकता हूं’?

यही वजह है कि फ़िल्म में सेक्स जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थित चीज़ें महत्वपूर्ण हैं जैसे बातचीत, जिज्ञासा, असुरक्षा, कल्पना, स्मृति और वह भावनात्मक दूरी जिसे कोई शारीरिक निकटता हमेशा भर नहीं सकती।

 

सभी निर्देशक इन चीज़ों को अलग-अलग सुरों में छूते हैं। मोटवानी के यहां हास्य है, किरण राव के यहां भ्रम, शकुन बत्रा के यहां रिश्ते के टूटने की बेचैनी और विशाल भारद्वाज के यहां कल्पना का सम्मोहन।

इनमें कोई एक कहानी दूसरी पर निर्णायक रूप से भारी नहीं पड़ती; असली दिलचस्पी इन चार दृष्टियों को साथ देखने में है। क्योंकि तब ‘लस्ट’ एक शारीरिक शब्द नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन जाता है। हम किस चीज़ के लिए तरस रहे हैं? और शायद इस सवाल का जवाब सेक्स से बहुत बड़ा है।

कभी हम स्पर्श के लिए तरसते हैं। कभी ध्यान के लिए। कभी स्वीकार किए जाने के लिए। कभी पुराने प्रेम में नई रोशनी के लिए। और कभी सिर्फ़ इस आश्वासन के लिए कि हमारी ज़िंदगी अभी पूरी तरह आदत नहीं बनी है।

इसलिए सेक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद उसका चरम सुख नहीं, बल्कि उसकी क्षमता है कि कुछ देर के लिए वह हमें अपनी बनाई हुई दुनिया से बाहर निकाल सके। लेकिन विडंबना देखिए कि हम सेक्स का इस्तेमाल कभी-कभी अकेलेपन से बचने के लिए करते हैं, जबकि सच्ची अंतरंगता हमें अकेलेपन के कारण से सामना कराती है।

मेरे भीतर ऐसा क्या खाली है, जिसे मैं दूसरे की देह से भरना चाहता हूं? यह सवाल आसान नहीं है। शायद इसी कारण हम इसे पूछना भी नहीं चाहते।

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ की असली दिलचस्पी इसी असुविधा में है। यह हमें सेक्स के बारे में सोचने के बहाने रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। और ओशो को संदर्भ में रखें तो शायद यात्रा कुछ ऐसी बनती है- दमन से मुक्ति तक। कामना से जागरूकता तक। शरीर से उपस्थिति तक। और उपस्थिति से अंतरंगता तक।

क्योंकि अंततः किसी रिश्ते का सबसे कामुक हिस्सा शायद शरीर नहीं होता। वह क्षण होता है जब सामने वाला मनुष्य आपको महसूस कराता है कि मैं तुम्हें देख रहा हूं।
तुम मेरे लिए अभी भी एक रहस्य हो।शायद प्रेम का भविष्य इसी छोटे-से रहस्य में छिपा है। और शायद कामना का भी। कामना के उस पार सेक्स नहीं, एक-दूसरे को फिर से खोज लेने की संभावना है।

देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

Oman Cricket Team: 11 में से 7 खिलाड़ियों का एक ही सरनेम! ओमान की प्लेइंग इलेवन देखकर चकराया सबका सिर

Oman Cricket Team: ओमान की पुरुष क्रिकेट टीम ने शुक्रवार को हांगकांग, चीन के खिलाफ मैच के साथ एशियन गेम्स 2026 में अपने अभियान की शुरुआत की। लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा, क्योंकि सुफियान महमूद की कप्तानी वाली टीम को निसिन के कोरोगी स्पोर्ट्स पार्क में 41 रन से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, मैच के नतीजे से ज्यादा एक और चीज ने दुनियाभर के क्रिकेट फैंस का ध्यान खींचा और वह था ओमान की प्लेइंग इलेवन में एक ही सरनेम वाले सात खिलाड़ियों का शामिल होना। जिसे देखकर सभी क्रिकेट फैंस भी हैरान रह गए।

हॉन्ग कॉन्ग (चीन) के खिलाफ खेले जा रहे मैच में ओमान की टीम में मोहम्मद अल बलुशी, शुएब अल बलुशी, जुबैर अल बलुशी, वहीद अल बलुशी, ईसा अल बलुशी, नवीद अल बलुशी और फारिस अल बलुशी शामिल थे। इसके अलावा, टीम में इसी सरनेम वाले दो और खिलाड़ी भी हैं – वसीम अल बलुशी और कैस अल बलुशी, जिससे कुल खिलाड़ियों की संख्या 9 हो जाती है।

मोहम्मद अल बलुशी, शुएब अल बलुशी, जुबैर अल बलुशी और वहीद अल बलुशी ने ओमान के टॉप-ऑर्डर की कमान संभाली। इन चारों ने नंबर 1 से 4 तक के स्लॉट पर बैटिंग की और क्रमशः 2, 20, 0 और 1 रन बनाए। जबकि ईसा अल बलुशी ने नंबर 7 पर बैटिंग करते हुए 7 रन बनाए।

वहीं, गेंदबाजी में शोएब, नवीद और मोहम्मद अल बलुशी ने भी अपना जलवा दिखाया और कुल मिलाकर 5 विकेट लिए। इनमें से मोहम्मद ने 17 रन देकर तीन विकेट चटकाए।

इन सात खिलाड़ियों के बारे में आपको जो कुछ भी जानना चाहिए

मोहम्मद अल बलुशी ने ओमान के लिए छह T20I मैच खेले हैं; उन्होंने इसी साल सिंगापुर के खिलाफ अपना डेब्यू किया था। उनका सबसे ज्यादा स्कोर 81 रन है, जो उन्होंने 3 जून, 2026 को बहरीन के खिलाफ बनाया था। शोएब की बात करें तो उन्होंने भी मोहम्मद जितने ही T20I मैच खेले हैं। 30 साल के इस ऑलराउंडर ने अब तक 117 रन बनाए हैं और चार विकेट लिए हैं।

जुबैर अल बलुशी ने भी नेशनल टीम के लिए छह मैच खेले हैं। हालांकि, हांगकांग, चीन के खिलाफ एशियन गेम्स 2026 के शुरुआती मैच में वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए और बिना खाता खोले ही आउट हो गए।

वहीं वहीद की बात करें तो उन्होंने शुक्रवार को एशियाई गेम्स के मुकाबले में ओमान के लिए अपना T20I डेब्यू किया; हालांकि, उनका यह मैच काफी निराशाजनक रहा और वे बल्ले से सिर्फ एक रन ही बना पाए। जबकि ईसा अल बलूशी ने कुल मिलाकर अब तक 5 मैच खेले हैं। लेकिन उनका भी प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है और वे सिर्फ 23 रन ही बना पाए हैं।

फास्ट-बॉलिंग ऑल-राउंडर नवीद अल बलुशी की बात करें तो, उन्होंने ओमान के लिए 5 मैच खेले हैं और कुल 7 विकेट लिए हैं। उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन सिंगापुर के खिलाफ अपने डेब्यू मैच में 4/22 का रहा है।

जबकि 29 साल के फारिस अल बलुशी ने ओमान के लिए दो है मैच खेले हैं। बाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने 10 रन बनाए हैं, लेकिन उनके नाम कोई विकेट नहीं है।

हांगकांग, चीन और ओमान के बीच हुए मैच में क्या हुआ?

पहले बल्लेबाजी करते हुए हांगकांग ने 20 ओवर में 8 विकेट खोकर 121 रन बनाए। इस स्कोर का बचाव करने में टीम को कोई खास परेशानी नहीं हुई क्योंकि ओमान की टीम 6 विकेट पर सिर्फ 80 रन ही बना सकी और हांगकांग ने यह मैच 41 रनों से जीत लिया।

अब ओमान का अगला मुकाबला शनिवार को मलेशिया से होगा। क्वार्टर-फाइनल में जगह बनाने की उम्मीद बनाए रखने के लिए उन्हें यह मैच जीतना जरूरी है।

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भाजपा ने विभिन्न राज्यों में पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति की

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने विभिन्न राज्यों के लिए प्रदेश संगठन महामंत्री और सह प्रदेश संगठन महामंत्री की नियुक्ति की है।

भाजपा के महासचिव तरुण चुघ ने गुरुवार को बताया कि पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने देश के अलग-अलग राज्यों में पार्टी संगठन का दायित्व संभालने के लिए विभिन्न नेताओं को नियुक्त किया है।

श्री चुघ की ओर से जारी की गयी सूची के अनुसार पार्टी ने श्री मधुकर को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का सह प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है। वहीं श्री दशरथ को तेलंगाना का सह महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है। पार्टी ने श्री रवींद्र राजू को असम और त्रिपुरा का प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है।

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उन्हें कार्यालय निर्माण की भी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। श्री भीखूभाई दलसानिया बिहार के प्रदेश महामंत्री (संगठन) बनाये गये हैं। भाजपा ने श्री पवन साई को झारखंड का प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है। इसी तरह से श्री सिद्धार्थन हिमाचल प्रदेश के प्रदेश महामंत्री (संगठन) बनाये गये हैं। श्री नवीन ने श्री रत्नाकर को गुजरात, दमन एवं दीव तथा दादर नगर हवेली का प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है।

श्री अरुण बिन्नाडी गुजरात के प्रदेश महामंत्री (संगठन) बनाये गये हैं। वहीं, श्री फणीन्द्र नाथ शर्मा उत्तराखंड के प्रदेश महामंत्री संगठन नियुक्त किये गये हैं। श्री नवीन ने श्री पवन राणा को दिल्ली प्रदेश भाजपा का प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया है। श्री कर्मवीर छत्तीसगढ़ के प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किये गये हैं। वहीं श्री चंद्रशेखर को मध्य प्रदेश भाजपा के महामंत्री (संगठन) बनाये गये हैं।

भाजपा की ओर से जारी सूची के अनुसार श्री मानस मोहंती ओडिशा, श्री मंत्री श्रीनिवासुलु पंजाब और चंडीगढ़, श्री धर्मपाल उत्तर प्रदेश और श्री अमिताभ चक्रवर्ती पश्चिम बंगाल के प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किये गये हैं।

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भाजपा संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बड़े पैमाने पर संगठनात्मक बदलाव किये हैं और इसके तहत विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पार्टी प्रभारियों और सह प्रभारियों की नियुक्ति की है।

भाजपा ने सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी राज्यसभा सांसद एवं पार्टी महासचिव विनोद तावड़े को सौंपी है। श्री तावड़े को उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी बनाया है, जबकि श्री जगदीश पटेल, श्रीमती मेघा कुलकर्णी, डॉ. प्रदीप वर्मा और श्री अनंत ओझा को सह प्रभारी बनाया है। वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को हरियाणा, छत्तीसगढ़, श्री राम माधव को उत्तराखंड और तमिलनाडु और श्री तरुण चुघ को गुजरात का पार्टी प्रभारी बनाया गया है। भाजपा महासचिव तरुण चुघ ने बुधवार को एक विज्ञप्ति जारी कर बताया कि पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पार्टी प्रभारियों और सह प्रभारियों को नियुक्त किया है।

उन्होंने 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पार्टी प्रभारियों और सह-प्रभारियों की सूची जारी की है। भाजपा की ओर से जारी सूची के अनुसार श्री विनय सहस्रबुद्धे को दिल्ली इकाई का प्रभारी बनाया गया, जबकि श्री जमयांग सेरिंग नामग्याल और श्रीमती दर्शना जरदोश को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया। भाजपा ने श्री संजय भाटिया को राजस्थान प्रभारी नियुक्त किया, जबकि श्रीमती कविता पाटीदार और श्री कुलजीत चहल सह प्रभारी बनाया है। श्री बैजयंत जय पांडा महाराष्ट्र के प्रभारी बनाये गये है, जबकि श्री अमित मालवीय, श्री सदानंद तनावड़े और श्रीमती कमलजीत सहरावत सह प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।

श्री नवीन ने श्री हरीश द्विवेदी को बिहार का प्रभारी बनाया है, जबकि श्रीमती संगीता यादव और श्री रोहन गुप्ता को सह प्रभारी नियुक्त किया गया है। श्री विप्लव कुमार देव को मध्य प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया गया है। श्री तरुण चुग को गुजरात का प्रभारी नियुक्त किया गया है। वहीं श्री राजदीप रॉय को मणिपुर, श्री डी. पुरंदेश्वरी को ओडिशा, श्री सुनील बंसल को तेलंगाना और पश्चिम बंगाल, श्री बिप्लब देव को मध्य प्रदेश और श्रीमती भारती पवार को गोवा का भाजपा प्रभारी नियुक्त किया गया। भाजपा ने अंडमान एवं निकोबार का प्रभारी श्री जय प्रकाश को बनाया है। वहीं, अरुणाचल प्रदेश के प्रभारी डॉ. देवेश कुमार बनाये गये हैं।

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इसी तरह भाजपा ने डॉ. अरविंद भदौरिया को आंध्र प्रदेश का प्रभारी बनया है, जबकि सह प्रभारी की जिम्मेदारी श्री वंशी श्रीनिवासन को सौंंपी है। असम के प्रभारी श्री मंगल पांडे बनाये गये हैं, जबकि श्री फांगनोन कोन्याक और श्री मनोज टिग्गा सह प्रभारी बनाये गये हैं। चंडीगढ़ के प्रभारी श्री महेंद्र पांडे बनाये गये हैं। दादरा नगर हवेली एवं दमन-दीव की प्रभारी श्रीमती वर्षाबेन नरेंद्रभाई पटेल बनायी गयी हैं। भाजपा ने गोवा की प्रभारी डॉ. भारती प्रवीन पवार को बनाया है जबकि सह प्रभारी की जिम्मेदारी श्री अनिल एंटनी को सौंपी है। गुजरात के प्रभारी श्री तरुण चुघ, जबकि सह प्रभारी श्री अजय महावर और श्रीमती गोमती साई को बनाया गया है।

हरियाणा की प्रभारी श्रीमती स्मृति ईरानी और सह प्रभारी डॉ. भोला सिंह, हिमाचल प्रदेश के प्रभारी श्री श्रीकांत शर्मा, सह प्रभारी श्रीमती दर्शना सिंह, जम्मू-कश्मीर के प्रभारी: डॉ. सतीश पूनिया और सह प्रभारी श्रीमती रीना कश्यप, झारखंड के प्रभारी, श्री गजेंद्र पटेल, सह प्रभारी श्री सोरेन सिंह, श्रीमती निवेदिता सिंह, कर्नाटक के प्रभारी, श्री हरीश द्विवेदी और सह प्रभारी डॉ. कसुम वेंकटेश्वरलु, केरल के प्रभारी प्रो. एम. नागराजा और सह प्रभारी, एम. वेंकटेशन, लद्दाख के प्रभारी श्री राजकुमार भाटिया होंगे। इनके अलावा लक्षद्वीप के प्रभारी श्री जॉर्ज कुरियन, मध्य प्रदेश के प्रभारी श्री बिप्लव कुमार देव और सह प्रभारी श्रीमती रेखा वर्मा, मणिपुर के प्रभारी डॉ. राजदीप रॉय, मेघालय के प्रभारी श्री कनाद पुरकायस्थ और सह प्रभारी डॉ. नुमल मोमिन, मिजोरम के प्रभारी डॉ. भगवत कराड, नगालैंड के प्रभारी श्री अनिल एंटनी, ओडिशा की प्रभारी श्रीमती डी. पुरंदेश्वरी और सह प्रभारी डॉ. स्वदेश सिंह, पुड्डुचेरी के प्रभारी के. सुरेंद्रन होंगे।

इनके अलावा पंजाब के प्रभारी: डॉ. सतीश पूनिया और सह प्रभारी श्री वीरेंद्र सचदेवा और डॉ. अलका गुर्जर, राजस्थान के प्रभारी श्री संजय भाटिया और सह प्रभारी श्रीमती कविता पाटीदार और श्री कुलजीत चहल, सिक्किम के प्रभारी श्री राजू बिष्ट, तमिलनाडु के प्रभारी श्री राम माधव और सह प्रभारी श्री निर्मल कुमार सुराना और श्रीमती डी. के. अरुणा, तेलंगाना के प्रभारी श्री सुनील बंसल और सह प्रभारी श्री अभय पाटिल और श्रीमती रेखा शर्मा, त्रिपुरा की प्रभारी श्रीमती मृगांका देव बर्मन, उत्तराखंड – प्रभारी के श्री राम माधव और सह प्रभारी श्री अरविंद मेनन तथा सुश्री बांसुरी स्वराज, पश्चिम बंगाल के प्रभारी श्री सुनील बंसल और सह प्रभारी श्री लाल सिंह आर्य, श्री राजेंद्र सिंह, तथा श्रीमती पिंकी कुशवाहा को बनाया गया है।

भाजपा ने 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कोई सह-प्रभारी नियुक्त नहीं किया है। इनमें अंडमान-निकोबार, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा नगर हवेली एवं दमन और दीव, लद्दाख और लक्षद्वीप शामिल है। मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, पुडुचेरी, सिक्किम और त्रिपुरा में भी सिर्फ प्रभारी नियुक्त किए गये हैं, कोई सह-प्रभारी नहीं बनाया गया है।

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Azamgarh Triple Murder: पत्नी और 2 पुजारियों को गोलियों से भूना, फिर 3 मासूम बच्चों को बनाया बंधक… आजमगढ़ में अरविंद का 7 घंटे का खौफनाक ड्रामा!

Azamgarh Triple Murder: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अहरौला थाना क्षेत्र के शंभूपुर गांव में मंगलवार (22 सितंबर) शाम पूजा के दौरान हुए विवाद के बाद तीन लोगों की हत्या के आरोपी अरविंद सिंह को आजमगढ़ की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और ATS की संयुक्त टीम ने देर रात मुठभेड़ में मार गिराया। आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉक्टर अनिल कुमार ने बताया कि रात्रि साढ़े तीन बजे मुठभेड़ में घायल अहरौला पुलिस थाना अंतर्गत शंभूपुर गांव निवासी अरविंद सिंह की इलाज के दौरान मौत हो गई।

पत्नी और दो पूजारियों की हत्या

आजमगढ़ पुलिस के मुताबिक, अरविंद सिंह मंगलवार शाम छह बजे घर लौटा। उस समय, उसकी पत्नी बबिता सिंह (32) दो पंडितों से पूजा-पाठ करवा रही थी। घर में धार्मिक अनुष्ठान होता देख अरविंद भड़क गया। फिर नाराज अरविंद ने अपनी पत्नी एवं दो पंडितों को गाली देना शुरू कर दिया। पत्नी की आपत्ति पर विवाद बढ़ गया। इस बीच, अरविंद ने अपनी लाइसेंसी बंदूक निकाली और कथित तौर पर पत्नी बबिता सिंह को गोली मार दी। इसके बाद दोनों पंडितों को भी गोली मार दी। पंडितों की पहचान महेंद्र पाठक (60) और अखिलेश मिश्रा (50) के रूप में की गई है।

तीन बच्चों को बनाया बंधक

इस घटना के बाद उसने खुद को घर के भीतर बंद कर लिया। मामले की सूचना मिलने पर कई थानों से पुलिस टीमें मौके पर पहुंची और घर को चारों तरफ से घेर लिया। डॉक्टर अनिल कुमार ने बताया कि तीन हत्याओं के आरोपी ने तीन बच्चों के साथ खुद को कमरे में बंद कर लिया था। इस दौरान वह लगातार उन बच्चों को मारने की धमकी दे रहा था। आरोपी द्वारा चलाई गई गोली से एक बच्चे को भी गोली लगी है जिसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

घायल बेटे ने भी तोड़ा दम, दो बेटियां बचाई गईं

पुलिस ने सबसे पहले घायल बेटे को कमरे से बाहर निकाला। ‘दैनिक जागरण’ की रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी पहचान आठ वर्षीय शौर्य के रूप में हुई। उसे गोली लगी थी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने अरविंद की दोनों बेटियों को सुरक्षित बाहर निकाला। दोनों बच्चियां सदमे में थीं। पुलिस के मुताबिक उनमें पानी और भोजन की कमी के संकेत दिखाई दिए। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया।

पुलिस पर की फायरिंग

अधिकारियों ने बताया कि आरोपी ने पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी को गोली लगी। मंगलवार रात साढ़े तीन बजे आरोपी की इलाज के दौरान मौत हो गई। जबकि दो बच्चे खतरे से बाहर हैं। डॉक्टर अनिल कुमार ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि आरोपी को लगभग सात घंटे तक समझाने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही रिश्तेदारों और परिजनों को बुलाकर भी प्रयास किया गया। लेकिन वह लगातार बच्चों को मारने की धमकी दे रहा था।

भूत प्रेत और आत्मा के साए!

गांव के लोगों ने बताया कि आरोपी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसलिए भूत प्रेत और आत्मा के साए की बात को लेकर उसके घर में पूजा पाठ का आयोजन किया गया था। इसी बात से आरोपी नाराज था। वाराणसी के एडीजी नवीन अरोड़ा का कहना है कि लगातार सात घंटे के प्रयास के बाद भी आरोपी बाहर नहीं निकला। इसी बीच फायरिंग की आवाज आई जिसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं था।

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स्टन ग्रेनेड और टियर गैस ग्रेनेड का प्रयोग करके दरवाजा तोड़ा गया। इसके बाद डॉक्टर अनिल कुमार एसओजी टीम के साथ अंदर गए। उन्होंने बताया कि अंदर जाते ही लगातार आरोपी फायरिंग करने लगा। अधिकारियों ने बताया कि उसने पांच राउंड फायर किया। इसी दौरान पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी को गोली लगी। इस मुठभेड़ में आरोपी की मौत हो गई है।

5 मौतों से दहला आजमगढ़

इस पूरी वारदात में कुल पांच लोगों की मौत हुई। इनमें अरविंद सिंह, उसकी पत्नी बाबिता सिंह, दो पुजारी महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्रा तथा उसका आठ वर्षीय बेटा शौर्य शामिल है। इस हत्याकांड के बाद पूरे जिले में दहशत का माहौल है। फिलहाल पुलिस पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। धार्मिक अनुष्ठान से शुरू हुए विवाद से लेकर गोलीबारी, बच्चों को कमरे में बंद करने और सात घंटे बाद पुलिस कार्रवाई तक की पूरी घटनाक्रम की जांच की जा रही है।

एक जैसे फिंगरप्रिंट और रेटिना! जुड़वां बहनों का आधार कार्ड बनाने में छूटे पसीने, जानिए रामपुर DM अजय द्विवेदी ने कैसे सुलझाया ये केस

रामपुर की तुबा जुबैर और खिजरा जुबैर के लिए एक जैसी शक्ल-सूरत सिर्फ पारिवारिक समानता नहीं, बल्कि पहचान की बड़ी उलझन बन गई। दोनों बहनों की जिंदगी में एक ऐसा वक्त आया, जब खुद को अलग-अलग साबित करना भी आसान नहीं रहा। मामला इतना पेचीदा था कि एक जरूरी सरकारी दस्तावेज बन गया, जबकि दूसरी बहन के लिए वही प्रक्रिया बार-बार रुकती रही। परिवार ने इसे दूर करने के लिए कई कोशिशें कीं, लेकिन हर बार तकनीकी दिक्कत सामने आ गई। इस परेशानी का असर सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि बच्ची से जुड़े जरूरी काम भी प्रभावित होने लगे।

आखिरकार मामला स्थानीय स्तर से निकलकर उच्च स्तर तक पहुंचा और कई हफ्तों की कोशिश के बाद रास्ता निकला। ये कहानी सिर्फ दो जुड़वां बहनों की नहीं, बल्कि उस परिवार के इंतजार, चिंता और राहत की भी है, जिसने अपनी ही बेटी की पहचान को सिस्टम के सामने साबित करने के लिए लंबी जद्दोजहद की।

एक बहन की पहचान बनी, दूसरी की फाइल अटक गई

रामपुर नगर के खारी कुआं मोहल्ले में रहने वाले जुबैर इलियास की जुड़वां बेटियां तुबा और खिजरा हैं। दोनों का पहचान पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो शुरुआत में सब सामान्य रहा। एक बच्ची का पंजीकरण हो गया। मुश्किल तब सामने आई, जब दूसरी बेटी का नामांकन कराया गया। बायोमीट्रिक प्रणाली ने उसके डेटा को पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अत्यधिक मिलता-जुलता पाया। सिस्टम ने इसे डुप्लीकेट नामांकन की आशंका माना और आवेदन आगे बढ़ने से रोक दिया। परिवार के लिए यह महज तकनीकी दिक्कत नहीं थी। पहचान पत्र न होने से बच्ची के स्कूल प्रवेश और सरकारी योजनाओं से जुड़े जरूरी काम प्रभावित होने लगे।

जुड़वां बहनों की समानता बनी सिस्टम की चुनौती

आम तौर पर बायोमीट्रिक प्रणाली किसी व्यक्ति की अलग पहचान सुनिश्चित करने के लिए उसके शारीरिक डेटा का इस्तेमाल करती है। लेकिन तुबा और खिजरा के मामले में दोनों के बीच मौजूद जैविक समानता ने यही व्यवस्था चुनौती के सामने खड़ी कर दी।

एक तरफ सिस्टम सुरक्षा के लिहाज से किसी संभावित डुप्लीकेट रिकॉर्ड को स्वीकार नहीं कर रहा था, दूसरी तरफ परिवार के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि दोनों बच्चियां अलग-अलग व्यक्ति हैं। यही वह मोड़ था, जहां एक तकनीकी समस्या धीरे-धीरे पूरे परिवार की चिंता बन गई।

जनता दर्शन में पहुंची फरियाद, डीएम ने बनाया रास्ता

कई स्तरों पर प्रयास के बावजूद जब समाधान नहीं निकला तो जुबैर इलियास ने रामपुर कलेक्ट्रेट में आयोजित जनता दर्शन में अपनी समस्या जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी के सामने रखी। मामले को सामान्य दस्तावेजी शिकायत मानने के बजाय प्रशासन ने इसे बायोमीट्रिक पहचान से जुड़ी तकनीकी समस्या के रूप में लिया। जिलाधिकारी के निर्देश पर स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों की जांच और सत्यापन कराया गया। इसके बाद जिला प्रशासन ने यूआईडीएआई अधिकारियों से संपर्क किया और पूरे मामले का विवरण, जरूरी दस्तावेज तथा सत्यापन रिपोर्ट मुख्यालय भेजी।

जब मामला पहुंचा दिल्ली के तकनीकी विशेषज्ञों तक

चूंकि समस्या बायोमीट्रिक डी-डुप्लीकेशन प्रणाली से जुड़ी थी, इसलिए इसे यूआईडीएआई मुख्यालय, नई दिल्ली भेजा गया। वहां उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रशासन की ओर से भेजे गए सत्यापन दस्तावेजों की तकनीकी जांच की गई। सामान्य व्यवस्था में किसी नए नामांकन का बायोमीट्रिक डेटा पहले से मौजूद रिकॉर्ड से बहुत अधिक मेल खाने पर सिस्टम उसे संभावित डुप्लीकेट मानकर रोक देता है। इस मामले में भी यही हुआ था। लेकिन जिला प्रशासन के सत्यापन और विशेष अनुरोध के बाद मामले को असाधारण परिस्थिति के तौर पर लिया गया। जरूरी सुरक्षा और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के बाद तकनीकी स्तर पर विशेष समाधान निकाला गया।

तीन महीने बाद खत्म हुआ इंतजार

तकनीकी समाधान के बाद दूसरी बच्ची का नामांकन सफल हो सका। पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में करीब तीन महीने लगे। इस दौरान जिला प्रशासन और यूआईडीएआई अधिकारियों के बीच लगातार संपर्क बना रहा। आखिरकार वह दिन भी आया, जब तुबा और खिजरा दोनों के अलग-अलग पहचान पत्र जारी हो गए।

दो बहनें, दो पहचान और परिवार के चेहरे पर सुकून

पहचान पत्र हाथ में आने के बाद जुबैर इलियास अपनी दोनों बेटियों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे। उनके लिए ये कार्ड सिर्फ सरकारी दस्तावेज नहीं थे, बल्कि उस लंबे इंतजार के खत्म होने का प्रमाण थे जिसमें एक छोटी-सी तकनीकी अड़चन ने परिवार को महीनों परेशान रखा। तुबा और खिजरा की कहानी यह भी बताती है कि तकनीक जहां पहचान को आसान और सुरक्षित बनाने का काम करती है, वहीं असाधारण मामलों में मानवीय हस्तक्षेप और संवेदनशील प्रशासनिक कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी हो सकती है।

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Azamgarh News: आजमगढ़ में घर में पूजा करने आए दो पंडितों और पत्नी को मारने वाले अरविंद के साथ क्या हुआ?

Azamgarh News: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक बेहद चौंकाने वाली घटना सामने आई है। पत्नी और दो पुजारियों की गोली मारकर हत्या करने के आरोपी अरविंद सिंह को करीब सात घंटे चले गतिरोध के बाद पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। आरोपी ने खुद को एक कमरे में बंद कर तीन बच्चों को भी बंधक बना लिया था। इसके बाद वह पुलिस पर लगातार गोली चलाने की धमकी दे रहा था। पुलिस के मुताबिक, ऑपरेशन के दौरान तीनों बच्चों को कमरे से सुरक्षित बाहर निकाला गया। हालांकि, आरोपी के बेटे को गोली लगी थी।इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। बाकी दो बच्चों को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज किया गया।

पूजा के दौरान शुरू हुआ विवाद

आजमगढ़ के SSP डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, स्थानीय निवासी अरविंद सिंह मंगलवार शाम करीब छह बजे घर लौटा। इस दौरान उसने अपनी पत्नी बबीता सिंह (32) को दो पुजारियों महेंद्र पाठक (60) और अखिलेश मिश्रा (50) के साथ धार्मिक अनुष्ठान करते देखा। सूत्रों के अनुसार, धार्मिक कार्यक्रम देखकर अरविंद कथित रूप से गुस्से में आ गया। उसने पत्नी तथा दोनों पुजारियों के साथ गाली-गलौज शुरू कर दी। पत्नी के विरोध करने पर विवाद बढ़ गया।

इसके बाद अरविंद ने कथित रूप से अपना लाइसेंसी हथियार निकाला और सबसे पहले पत्नी बबीता सिंह को गोली मारी। इसके बाद उसने दोनों पुजारियों को भी गोली मार दी। पुलिस सूत्रों ने बताया कि घटना के बाद आरोपी घर के अंदर बंद हो गया। बताया जा रहा है परिवार को शक था कि अरविंद किसी ‘बुरी आत्मा’ के प्रभाव में है।

इसी वजह से उसकी मां और पत्नी ने पूजा का आयोजन कराया था। पुलिस के मुताबिक, अरविंद पूजा से नाराज था। इसी दौरान उसकी पत्नी ने कथित तौर पर उसे पुजारी का अपमान करने से रोका, जिसके बाद वह गुस्से में आ गया। इस दौरान उसने गोली चला दी। इस दौरान तीन लोग वहां से भागने में सफल रहे। सूचना मिलने पर कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे घर को घेर लिया।

बच्चों को कमरे में बंद कर पुलिस को दी चुनौती

घटना के बाद अरविंद ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया था। उसके साथ उसके दो बच्चे और उसकी साली का एक बच्चा भी कमरे के अंदर था। पुलिस ने पहले बातचीत के जरिए उसे आत्मसमर्पण करने और बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए मनाने की कोशिश की। परिवार के सदस्यों को भी बातचीत में शामिल किया गया। हालांकि, पुलिस के मुताबिक अरविंद ने पुलिसकर्मियों और परिवार के लोगों को गोली मारने की धमकी दी। उसने बच्चों को भी जान से मारने की धमकी दी। सुबह तक पुलिस को इंतजार करने के लिए कहा।

सात घंटे बाद पुलिस ने तोड़ा दरवाजा

वाराणसी जोन के एडीजी नवीन अरोड़ा के मुताबिक, पुलिस ने शुरुआती दौर में काफी संयम बरता। करीब सात घंटे तक आरोपी से बातचीत के जरिए बच्चों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की गई। लेकिन जब आरोपी ने अंदर से पुलिस पर गोली चला दी, तो एसएसपी और SOG टीम के कुछ सदस्यों को दरवाजा तोड़कर अंदर जाना पड़ा।

पुलिस ने इस रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान स्टन ग्रेनेड और आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया। कमरे के अंदर पहुंचने के बाद पुलिस टीम पर फिर गोली चलाई गई। इसके जवाब में पुलिस ने आत्मरक्षा और बच्चों की सुरक्षा के लिए गोलीबारी की, जिसमें अरविंद घायल हो गया।

बेटे को भी लगी थी गोली

पुलिस ने सबसे पहले अरविंद के बेटे को बाहर निकाला। इसके बाद दोनों बच्चियों को सुरक्षित बाहर लाया गया। पुलिस को पता चला कि बेटे को गोली लगी हुई थी। तीनों बच्चों को अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन अरविंद के बेटे ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। वहीं, पुलिस की गोली लगने से घायल अरविंद की भी अस्पताल में मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, दोनों बच्चियां काफी डरी हुई थीं। उन्हें भोजन-पानी की कमी के साथ मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ा था।

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परिवार ने पहले भी की थी शिकायत

SSP के अनुसार, शुरुआती जांच में सामने आया है कि अरविंद सिंह का व्यवहार परिवार के प्रति आक्रामक रहता था। उसकी मां और पत्नी ने कथित तौर पर उसके द्वारा परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट और आक्रामक व्यवहार की शिकायत की थी। पुलिस ने घटना के संबंध में आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों ने कहा कि इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति कंट्रोल में है।

सेवारत सैनिक बेटे के पिता ने किया लिवर और किडनी दान, एयरफोर्स सफलतापूर्वक पूरा किया मिशन

एक सेवारत सैनिक के 62 साल के पिता ने बेहद साहसिक फैसला किया। उन्होंने लिवर और एक किडनी दान कर मानवीय मूल्यों का सर्वोच्च प्रदर्शन किया। अंगदान के बाद इन महत्वपूर्ण अंगों को तय समयसीमा के भीतर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाना बेहद जरूरी था। इस चुनौतीपूर्ण काम में भारतीय वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई।

दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में पहुंचाए गए अंग

भारतीय वायुसेना ने मेडिकल टीमों के साथ सहयोग करते हुए चंडीगढ़ से दिल्ली तक अंगों को एयरलिफ्ट किया। एयरलिफ्ट किए गए दोनों अंगों को दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में पहुंचाया गया। लिवर को आर्मी हॉस्पिटल (रिसर्च एंड रेफरल) में ट्रांसप्लांट के लिए भेजा गया, जबकि किडनी को सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया गया।

वायुसेना ने तेजी से पूरी की प्रक्रिया

इस पूरे मिशन की खास बात यह रही कि अंगदान करने वाले 62 वर्षीय व्यक्ति ने अपने बेटे, जो भारतीय सेना में सेवारत है, के माध्यम से देशसेवा की भावना को एक अलग स्तर पर पहुंचाया। उन्होंने अपने अंग दान कर जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगाई। मिशन के दौरान समय की गंभीरता को देखते हुए पूरी प्रक्रिया तेजी से पूरी की गई, ताकि अंगों को सुरक्षित और जल्द से जल्द संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके।

पहले भी ऐसे मिशन का हिस्सा रही है वायुसेना

भारतीय वायुसेना पहले भी ऐसे मिशन का हिस्सा रह चुकी है। समय-समय पर आपात स्थितियों में मेडिकल इवैक्यूएशन और महत्वपूर्ण अंगों को समय पर पहुंचाने जैसे मिशनों में सहयोग करती रही है। इस मिशन में भी तेज प्रतिक्रिया और सटीक समन्वय के जरिए चंडीगढ़ से दिल्ली तक जीवन बचाने की इस महत्वपूर्ण कड़ी को पूरा किया गया।