Bhadrapad Amavasya 2026 Upay: सितंबर में आने वाली दर्श अमावस्या पर पितरों के आशीर्वाद के लिए जरूर करें ये उपाय, जानें सही तारीख

Bhadrapad Amavasya 2026 Upay: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष स्थान है। माना जाता है कि इस दिन पितरों के नाम पर दान-पुण्य करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। पूरे साल में 12 अमावस्या तिथियां आती हैं। इनमें दर्श अमावस्या का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या का वह समय है जब चंद्रमा पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है, उसे दर्श अमावस्या कहते हैं। इस तिथि को पितृ शांति और पितृ दोष निवारण के उपाय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल भाद्रपद माह में दर्श अमावस्या संयोग बन रहा है। इसे कुशग्रहणी अमावस्या, कुशोत्पाटिनी अमावस्या और पिथौरा अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।

दर्श अमावस्या तारीख और समय

वर्ष 2026 में दर्श अमावस्या 11 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी।

अमावस्या तिथि प्रारंभ : 10 सितंबर 2026, रात 10:35 बजे से

अमावस्या तिथि समाप्त : 11 सितंबर 2026, सुबह 08:58 बजे तक

उदय तिथि के अनुसार मुख्य पूजा, स्नान-दान और पितृ कर्म 11 सितंबर को ही किए जाएंगे।

महत्व और मान्यताएं

कुश एकत्र करना : इस दिन धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और श्राद्ध कर्म के लिए ‘कुशा’ (पवित्र घास) उखाड़कर एकत्रित की जाती है।

पितृ तर्पण और दान : पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देना, पितरों के लिए तर्पण व पिंडदान करना और गरीबों को दान देना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

पिथौरा अमावस्या व्रत : शादीशुदा महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए इस दिन माता दुर्गा/गौरी की पूजा-अर्चना करती हैं और व्रत रखती हैं।

दोष निवारण : कालसर्प दोष, पितृ दोष और शनि संबंधी कष्टों से मुक्ति पाने के लिए इस दिन विशेष उपाय और पूजा की जाती है।

दर्श अमावस्या पर क्या करें?

दर्श अमावस्या के दिन आपको कुछ काम करने चाहिए जिससे आपके ऊपर पूर्वजों की कृपा बनी रहे और उनकी नाराजगी से भी बचा जा सके-

दर्श अमावस्या के दिन पानी में काले तिल मिलाकर पूर्वजों के नाम से जल अर्पित करें। ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। इस दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद तर्पण करना शुभ माना जाता है।

दर्श अमावस्या के दिन स्नान करके पीपल के वृक्ष में दीपक जलाएं, तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और पूर्वजों की कृपा बनी रहती है।

दर्श अमावस्या के दिन चंद्रमा की पूजा से पूर्वजों की कृपा भी बनी रहती है और जीवन में खुशहाली आती है। हालांकि, इस दिन रात के समय चंद्रमा आसमान में दिखाई नहीं देता है, लेकिन चंद्रोदय की दिशा में अर्घ्य देते हुए पूजा करनी चाहिए।

दक्षिण दिशा को पूर्वजों की दिशा माना जाता है। इस दिन घर की दक्षिण दिशा में पूर्वजों के नाम का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है और इससे पितरों का आशीर्वाद भी बना रहता है।

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Hanuman Ansh Box Office Collection: ‘हनुमान अंश’ ने भारत में 144 करोड़ रुपये कमाए, फिल्म ने लागत से 50 गुना ज्यादा की कमाई

Hanuman Ansh Box Office Collection: ‘हनुमान अंश’ ने 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया है। नीम करौली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ 2026 की सबसे बड़ी ‘स्लीपर हिट’ फिल्मों में से एक बन गई है। लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने अपनी लागत से 50 गुना ज़्यादा कमाई की है।

‘हनुमान अंश’ अब 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करने वाली सबसे छोटे पैमाने की हिंदी फिल्म बन गई है। यह रिकॉर्ड पहले ‘द कश्मीर फाइल्स’ के नाम था। सैकनिलक (Sacnilk) के अनुसार, ‘हनुमान अंश’ ने सिनेमाघरों में अपने 31वें दिन 22.75 करोड़ रुपये (नेट) कमाए, जिससे भारत में इसका कुल ग्रॉस कलेक्शन 144.40 करोड़ रुपये और कुल नेट कलेक्शन 122.13 करोड़ रुपये हो गया।

पिछले महीने रिलीज़ होने पर बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की शुरुआत धीमी रही थी। हालांकि, दो हफ़्तों के बाद, लोगों की बातचीत (वर्ड ऑफ़ माउथ) और सोशल मीडिया रिव्यूज़ की वजह से इसे ज़बरदस्त लोकप्रियता मिली। ‘टॉक्सिक’ और ‘मिर्ज़ापुर’ जैसी फिल्मों से टक्कर मिलने के बावजूद, ‘हनुमान अंश’ ने अपने लिए काफी चर्चा बटोरी है।

अब, यह 11 सितंबर को दुनिया भर में रिलीज़ होगी। इससे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में इसे बड़ी बढ़त मिलेगी। फिल्म के सीक्वल की घोषणा भी पहले ही हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आगरा के एक मल्टीप्लेक्स में दर्शकों से बात करते हुए डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने ‘हनुमान अंश 2’ की पुष्टि की। विशाल ने बताया कि आने वाली फिल्म नीम करौली बाबा के जन्मस्थान, फिरोज़ाबाद पर केंद्रित होगी और फिर दिखाएगी कि कैसे और क्यों वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए आगरा, मथुरा और अन्य जगहों पर गए।

कौन थे नीम करौली बाबा?

नीम करौली बाबा एक हिंदू आध्यात्मिक गुरु और भगवान हनुमान के परम भक्त थे। उनका जन्म का नाम आमतौर पर लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है, और उनका जन्म 1900 के आसपास मौजूदा उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में हुआ था। 11 सितंबर, 1973 को वृंदावन में उनका निधन हो गया।

बाबा से जुड़ी कई कहानियां चमत्कारों और असाधारण घटनाओं से भरी हैं, जिनमें से कई उनके भक्तों द्वारा सुनाई गई हैं। क्योंकि ये बातें मुख्य रूप से भक्तों की यादों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय, उनसे जुड़ी आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाना ज़्यादा सही है।

Mobiles Ban in temple: तमिलनाडु के मंदिरों में मोबाइल बैन का असर! फोन जमा कराने के बाद युवाओं ने बनाई दूरी, श्रद्धालुओं की संख्या 20% तक घटी

Mobiles Ban in Tamil Nadu temple: तमिलनाडु के प्रमुख मंदिरों में मोबाइल बैन का एक हैरान करने वाला नतीजा सामने आया है। फोन पर रोक का असर अब युवा श्रद्धालुओं की संख्या पर दिखाई देने लगा है। 1 सितंबर से राज्य के 52 प्रमुख मंदिरों में स्मार्टफोन ले जाने पर बैन लगाया गया है। इसके बाद कांचीपुरम स्थित देवराजस्वामी मंदिर में युवाओं की संख्या कम होने और कुल श्रद्धालुओं की संख्या में करीब 20 फीसदी तक गिरावट की बात सामने आई है। एक रिसर्च रिपोर्ट में एक बात सामने आई है कि सेल्फी और कॉन्टेंट क्रिएशन के लिए जाने वाले तमिलनाडु के युवाओं ने मंदिर जाना कम कर दिया है

‘दैनिक भास्कर’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मंदिर प्रशासन का कहना है कि वह अपनी ओर से कोई नया नियम लागू नहीं कर रहा। बल्कि मद्रास हाई कोर्ट के पुराने आदेश को लागू कर रहा है। मंदिर परिसर में मोबाइल फोन जमा कराने के लिए काउंटर बनाए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले जहां युवाओं की अच्छी संख्या नजर आती थी, अब बुजुर्ग श्रद्धालु ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

फोन बैन के बाद बदला मंदिर का नजारा

कांचीपुरम के देवराजस्वामी मंदिर में पहले कई युवा दर्शन के साथ-साथ सेल्फी, वीडियो और सोशल मीडिया के लिए कंटेंट बनाने आते थे। मोबाइल जमा कराने की व्यवस्था लागू होने के बाद युवाओं की मौजूदगी कम दिखाई देने लगी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोबाइल जमा कराने वाले काउंटर पर शुरुआती दिनों में लंबी कतारें भी लगीं। हालांकि, अब वहां भी युवाओं की तुलना में बुजुर्ग श्रद्धालुओं की संख्या अधिक दिखाई दे रही है। मंदिर प्रशासन के अनुसार, श्रद्धालुओं की संख्या में करीब 20 फीसदी तक कमी देखी गई है।

‘हाई कोर्ट के आदेश का कर रहे पालन’

मंदिर प्रशासन के अधिकारी आर. गणेशन ने फोन बैन का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मंदिरों में भक्तों की संख्या कम होने की एक वजह युवाओं का कम आना हो सकती है। लेकिन मंदिर की पवित्रता के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, यह फैसला मंदिर प्रशासन ने अपनी तरफ से नहीं लिया है। मद्रास हाई कोर्ट के दिसंबर 2022 के आदेश के तहत मंदिरों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लागू की जा रही है।

क्यों लगाया गया मोबाइल पर प्रतिबंध?

मंदिरों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं। खासतौर पर सेल्फी, फोटो, वीडियो और रील्स बनाने को लेकर मंदिर प्रशासन और श्रद्धालुओं की आपत्तियां रही हैं। सरकार और मंदिर प्रशासन का तर्क है कि मोबाइल फोन की वजह से मंदिरों का आध्यात्मिक माहौल प्रभावित होता है। कई श्रद्धालु दर्शन के बजाय फोटो और सोशल मीडिया कंटेंट बनाने में व्यस्त रहते हैं। इसी वजह से मंदिरों की पवित्रता और शांत वातावरण बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था लागू की गई है।

23 साल के अरुण ने कहा- फोन के बिना अनुभव अधूरा

भास्कर की रिपोर्ट में 23 वर्षीय अरुण कुमार का उदाहरण दिया गया है। वह तीन दोस्तों के साथ मंदिर पहुंचे थे। उन्हें मंदिर में मोबाइल जमा कराने के नियम की जानकारी थी। लेकिन उन्होंने इसे लेकर असहमति जताई। अरुण के मुताबिक, मंदिर और परंपरा को समझने के लिए सिर्फ दर्शन ही काफी नहीं हैं।

आज के दौर में लोग मंदिरों की वास्तुकला और माहौल की तस्वीरें लेकर उन्हें सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं। उनका कहना था कि फोन के बिना उन्हें मंदिर आने का अनुभव अधूरा लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर फोन रखने के लिए कुछ रुपये देने पड़ें और उसके बाद फोटो या रिकॉर्डिंग भी न कर सकें तो वे ऐसे मंदिर जाना पसंद करेंगे जहां मोबाइल को लेकर इतने सख्त नियम न हों।

19 साल की प्रिया को भी हुई परेशानी

रिपोर्ट में 19 वर्षीय प्रिया राजेश का भी जिक्र है। वह अपने परिवार के साथ मंदिर पहुंची थीं। मोबाइल जमा कराने के लिए काउंटर पर देने के बाद वह मंदिर के अंदर चली गईं। प्रिया के मुताबिक, वह दर्शन के लिए आई थीं। लेकिन मंदिर के अंदर फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर फोन अंदर ले जाने की इजाजत होती तो वह मंदिर की तस्वीरें ले सकती थीं और बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर शेयर कर सकती थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मंदिर इतना सुंदर है तो उसकी तस्वीरें क्यों नहीं ली जा सकतीं? साथ ही उन्होंने कहा कि आज के दौर में युवाओं को मंदिरों से जोड़ने के बजाय इस तरह के नियम उन्हें दूर कर सकते हैं।

5 रुपये में जमा हो रहा है मोबाइल

52 मंदिरों में मोबाइल लेकर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए जमा काउंटर बनाए गए हैं। कई जगह प्रति मोबाइल 5 रुपये शुल्क लिया जा रहा है। हालांकि यह शुल्क हर मंदिर में अनिवार्य नहीं है। इसे लेकर मंदिरों को व्यवस्था के अनुसार निर्णय लेने की छूट दी गई है। मोबाइल फोन की सुरक्षा के लिए मंदिरों में लॉकर/डिपॉजिट काउंटर बनाए गए हैं। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि मोबाइल जमा कराने या वापस लेने के लिए श्रद्धालुओं को बहुत देर तक कतार में न खड़ा होना पड़े।

एक अहम छूट भी लागू

मोबाइल बैन पूरी तरह हर तरह के फोन पर लागू नहीं है। बिना कैमरे वाले सामान्य मोबाइल फोन को लेकर अलग व्यवस्था है। ऐसे फोन अंदर ले जाने की अनुमति दी गई है। प्रतिबंध मुख्य रूप से कैमरा वाले स्मार्टफोन पर है। इसके अलावा बाद में तमिलनाडु के HR&CE मंत्री एस. रमेश ने स्पष्ट किया कि गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों को साथ लेकर चलने वाली महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों को इस प्रतिबंध से छूट दी जाएगी। भारी भीड़ वाले त्योहारों के दिनों में भी मोबाइल जमा कराने को लेकर अलग व्यवस्था की जा सकती है।

क्या दूसरे मंदिरों में भी दिखेगा असर?

तमिलनाडु के कई बड़े मंदिरों में पहले से ही मोबाइल फोन पर प्रतिबंध या सीमाएं लागू थीं। अब 52 प्रमुख मंदिरों में इस व्यवस्था को लागू किया गया है। तिरुचि में भी श्रद्धालुओं ने नियम का स्वागत किया। हालांकि उन्होंने अधिक डिपॉजिट काउंटर और बेहतर व्यवस्था की मांग की है। तमिलनाडु सरकार ने राज्य भर के 52 मंदिरों में भक्तों के स्मार्टफोन ले जाने पर रोक लगा दी है। यह रोक मंगलवार, 1 सितंबर से लागू हो गई है।

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क्यों लगाया गया बैन?

हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग ने यह आदेश इसलिए जारी किया ताकि भक्त मंदिर परिसर के अंदर फोटो और वीडियो न ले सकें। HR&CE मंत्री रमेश ने पिछले सप्ताह इस रोक की घोषणा करते हुए कहा था कि जिन भक्तों को मंदिर के अंदर स्मार्टफोन ले जाने की जरूरत है, उन्हें प्रति फोन 5 रुपये का चार्ज देना होगा। जो भक्त अपने फोन जमा करना चाहेंगे, उनके लिए मंदिरों में लॉकर की सुविधा दी जाएगी। बिना कैमरे वाले फोन को बिना किसी रोक-टोक के मंदिर के अंदर ले जाने की अनुमति होगी।

मंत्री के अनुसार, यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि भक्त शांति से प्रार्थना कर सकें। HR&CE विभाग ने साफ किया कि 5 रुपये का शुल्क कमाई करने के लिए नहीं है। बल्कि इसका इस्तेमाल लॉकर और उससे जुड़ी सुविधाओं के रखरखाव के लिए किया जाएगा। हालांकि, इस रोक से मंदिर के कर्मचारियों के मन में भक्तों द्वारा जमा किए गए फोन की सुरक्षा की जिम्मेदारी को लेकर चिंता पैदा हो गई है।

Aja Ekadashi 2026: 6 या 7 सितंबर, कब किया जाएगा अजा एकादशी का व्रत? नोट करें सही तारीख और शुभ मुहूर्त

Aja Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की कृपा पाने का सबसे सरल मार्ग माना जाता है। यह व्रत हर हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। हर एकादशी व्रत का अलग नाम और महत्व होता है। इस दिन बहुत से भक्त फलाहार उपवास करते हैं, तो कुछ निर्जला व्रत भी करते हैं। एकादशी व्रत के नियम दशमी तिथि से लेकर द्वादशी तिथि तक माने जाते हैं। हर माह की तरह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी या अन्नदा एकादशी का व्रत किया जाता है। यह दिन भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अजा एकादशी का व्रत रखने से समस्त पापों का नाश होता है और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। पौराणिक काल में चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र ने अपने वचन और सत्य की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण राज्य, पत्नी और पुत्र तक त्याग दिया था। जब वे अत्यंत कष्ट झेल रहे थे, तब महर्षि गौतम के बताए अनुसार उन्होंने अजा एकादशी का निष्काम भाव से व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए, उनका मृत पुत्र जीवित हो गया और उन्हें पुनः अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ।

अजा एकादशी व्रत 2026 की तारीख

अजा एकादशी व्रत तारीख : 7 सितंबर 2026 (सोमवार)

एकादशी तिथि प्रारंभ : 6 सितंबर 2026, शाम 07:29/07:30 बजे से

एकादशी तिथि समाप्त : 7 सितंबर 2026, शाम 05:03/05:05 बजे तक

व्रत पारण समय : 8 सितंबर 2026, सुबह 06:02 से 08:33 बजे तक

अजा एकादशी व्रत 2026 शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: 04:52 AM से 05:38 AM तक

प्रातः सन्ध्या: 05:15 AM से 06:25 AM तक

अभिजित मुहूर्त: 12:12 PM से 01:01 PM तक

गोधूलि मुहूर्त: 06:48 PM से 07:11 PM तक

अमृत काल: 03:59 PM से 05:29 PM तक

सायाह्न सन्ध्या: 06:48 PM से 07:58 PM तक

पूजा विधि

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (विशेष रूप से पीले) पहनकर व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थान की सफाई कर पीले कपड़े पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।
  • भगवान को पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। भोग में तुलसी दल (पत्ते) अनिवार्य रूप से शामिल करें।
  • अजा एकादशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें और अंत में आरती करें।
  • अगले दिन द्वादशी को शुभ समय में पूजा और दान-पुण्य के बाद ही व्रत खोलें।

अजा एकादशी व्रत के मुख्य नियम

एकादशी के दिन चावल (अक्षत), तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांसाहार) और शराब का सेवन पूर्णतः वर्जित है।

फलाहार में दूध, फल, मखाने या सेंधा नमक से बनी चीजें ली जा सकती हैं।

इस दिन किसी की निंदा न करें और घर में शांति बनाए रखें।

Hartalika Teej 2026: सुख और सौभाग्य प्राप्ति के लिए कब किया जाएगा हरतालिका तीज का व्रत, जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक प्रमुख और बेहद पवित्र त्यौहार है, जिसे शादीशुदा महिलाएं और अविवाहित कन्याएं पूरी आस्था और विधि-विधान से करती हैं। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं अच्छा घर और वर पाने की लालसा में यह व्रत करती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी। उन्होंने बालू (मिट्टी) का शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। माता पार्वती के इस अनन्य समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इसी दिन उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, हरत और आलिका। इसमें हरत का अर्थ है हरण करना या छिपाना और आलिका अर्थात सहेली/सखी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सहेलियां उनका अपहरण करके उन्हें एक घने जंगल में ले गई थीं, ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें। जंगल में रहकर ही उन्होंने यह तपस्या की थी, इसलिए इसे ‘हरतालिका तीज’ कहा जाता है।

कब किया जाएगा हरतालिका तीज व्रत 2026

साल 2026 में हरतालिका तीज व्रत सोमवार, 14 सितंबर 2026 को किया जाएगा। तृतीया तिथि के समय और पूजा के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी निम्नलिखित है:

तिथि और मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारंभ : 13 सितंबर 2026, सुबह 07:08 बजे

तृतीया तिथि समाप्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 07:06 बजे

प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 06:12 बजे से 07:06 बजे तक

प्रदोष काल (संध्या) पूजा : 13 सितंबर 2026, शाम 06:00 बजे से रात 08:30 बजे तक

हरतालिका व्रत के प्रमुख नियम और परंपराएं

निर्जला व्रत : यह अत्यंत कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें महिलाएं 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना पानी और भोजन के रहती हैं।

पार्थिव शिवलिंग पूजन : इस दिन शाम को या प्रदोष काल में मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है।

सोलह श्रृंगार : महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करके पूजा में बैठती हैं।

रात भर जागरण : पूजा के बाद पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है और अगले दिन सुबह पारण करके व्रत पूरा होता है।

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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Guru Purnima vs Teachers Day Difference: शिक्षक को समर्पित हैं गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस, जानें दोनों में क्या है अंतर और क्या है इतिहास

Guru Purnima vs Teachers Day Difference: शिक्षक का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है, क्योंकि शिक्षक सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं देता, वह हमें जीने का, अपने उसूलों पर चलने और सही-गलत में फर्क करने की समझ भी देता है। इसलिए हमारे देश में दो खास दिन गुरु को समर्पित हैं। एक है गुरु पूर्णिमा और दूसरा है टीचर्स डे। अक्सर लोग ‘गुरु पूर्णिमा’ और ‘शिक्षक दिवस’ को एक ही मानते हैं। लेकिन असल में इन दोनों में मूल अर्थ में बहुत अंतर है। भारतीय संस्कृति और इतिहास में इन दोनों पर्वों के भाव और मायने में बहुत दिलचस्प फर्क है।

गुरु पूर्णिमा हजारों साल पुरानी आध्यात्मिक साधना और ‘अंधकार से प्रकाश’ की तरफ ले जाने वाले गुरु को समर्पित है। वहीं शिक्षक दिवस आधुनिक भारत के शैक्षणिक योगदान और महान दार्शनिक राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन का सम्मान है। एक पर्व तिथि और पंचांग से चलता है तो दूसरा कैलेंडर की तय तारीख से यानी 5 सितंबर को मनाया जाता है। शिक्षक दिवस 2026 के खास अवसर पर जनरल नॉलेज में जानिए ‘शिक्षक’ और ‘गुरु’ के बीच अंतर।

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के बीच अंतर

बहुत से लोग गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस को एक ही समझते हैं। लेकिन इनका मूल अर्थ एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न है। आइए आज समझें गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के बीच कुछ प्रमुख अंतर।

प्राचीन परंपरा और आधुनिक इतिहास

गुरु पूर्णिमा हमारे देश और हिंदू धर्म की प्राचीन संस्कृति से जुड़ा पर्व है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन महाभारत और चारों वेदों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसीलिए इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।

शिक्षक दिवस (5 सितंबर) आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़ा है। यह दिन भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान शिक्षाविद और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के रूप में मनाया जाता है। जब डॉ. राधाकृष्णन के छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई तो उन्होंने कहा कि इसे देश के सभी शिक्षकों के सम्मान में समर्पित किया जाए।

‘शिक्षक’ और ‘गुरु’ की भूमिका में अंतर

‘शिक्षक’ शब्द का सीधा संबंध शिक्षा, किताबी ज्ञान और जीवन में इस्तेमाल आने वाले हुनर से है। शिक्षक गणित, विज्ञान, भाषा या कोई विषय सिखाते हैं जो प्रैक्टिकल लाइफ चलाने और आजीविका कमाने योग्य बनाता है। वे बौद्धिक विकास की नींव रखते हैं।

वहीं, ‘गुरु’ का अर्थ बहुत व्यापक और गहरा है। संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)। गुरु आपकी चेतना को जगाते हैं, जीवन दर्शन समझाते हैं और आत्मानुभूति करवाते हैं। शिक्षक साक्षर बनाते हैं, जबकि गुरु जीवन जीने का दृष्टिकोण बदल देते हैं। शिक्षक और छात्र का संबंध मुख्य रूप से औपचारिक होता है। वहीं, गुरु और शिष्य का नाता जीवनभर का और आत्मिक होता है।

मनाने का तरीका और पंचांग का नियम

गुरु पूर्णिमा का त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा को पड़ता है। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है। इस दिन मंदिरों और आश्रमों में गुरु पूजन, चरण स्पर्श और आध्यात्मिक अनुष्ठान होते हैं। लेकिन, शिक्षक दिवस हर साल 5 सितंबर को ही आता है। यह स्कूल और कॉलेजों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शिक्षकों को कार्ड या उपहार देने और उनका आभार व्यक्त करने का शानदार दिन होता है।

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नवरात्रि में गरबा पंडालों में मुस्लिमों की एंट्री पर बैन! महाराष्ट्र में VHP का बड़ा फैसला

विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने महाराष्ट्र में नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा और डांडिया आयोजनों को लेकर विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने नई गाइडलाइन जारी की है। संगठन ने आयोजकों से कार्यक्रमों में शामिल होने वाले लोगों की पहचान की जांच करने की बात कही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विहिप ने महाराष्ट्र में नवरात्रि के दौरान गरबा-डांडिया में मुस्लिमों को शामिल नहीं होने देने का फैसला किया है। VHP के मुताबिक, इन नियमों का उद्देश्य आयोजनों में किसी तरह की गलत गतिविधि को रोकना और नवरात्रि के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना है।

VHP की नई गाइडलाइन

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, VHP का कहा कि, इन आयोजनों में कौन शामिल हो रहा है, इसे लेकर आयोजकों को सतर्क रहना चाहिए। VHP ने नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा और डांडिया कार्यक्रमों को लेकर आयोजकों के लिए कुछ सुझाव दिए हैं। VHP ने गरबा और डांडिया आयोजकों से कहा कि वे कार्यक्रम में आने वाले लोगों का आधार कार्ड चेक करें। साथ ही, पहचान की जांच के दौरान लोगों के माथे पर तिलक लगाने का भी सुझाव दिया गया है। ताकि आयोजक यह सुनिश्चित कर सकें कि कार्यक्रम में केवल हिंदू ही शामिल हों।

क्यों लिया ये फैसला

VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता और संयुक्त सचिव श्रीराज नायर ने बताया कि संगठन ने इन कार्यक्रमों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को शामिल नहीं करने का फैसला लिया है। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, नायर ने कहा, “नवरात्रि का त्योहार सिर्फ गाने और नाचने के बारे में नहीं है। यह देवी की पूजा के लिए समर्पित त्योहार है। जो मुस्लिम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते, उन्हें इसमें क्यों हिस्सा लेना चाहिए?” VHP ने कहा, कि गरबा और डांडिया कार्यक्रमों को लेकर लिए गए फैसले का मकसद किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं है।

आयोजकों को सावधानी बरतने की सलाह

संगठन के अनुसार, इन आयोजनों के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है। VHP का कहना कि हिंदू त्योहारों का समुदाय की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत में खास स्थान है और इसी को ध्यान में रखते हुए आयोजकों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। नायर ने कहा कि अगर मुस्लिम समुदाय के लोग नवरात्रि से जुड़े आयोजनों में शामिल होना चाहते हैं, तो वे अपने परिवार के साथ घर या पूजा स्थल पर इसे मना सकते हैं। उन्होंने सार्वजनिक गरबा और डांडिया कार्यक्रमों के बजाय निजी तौर पर त्योहार मनाने की बात कही।

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RSS चीफ मोहन भागवत लंदन के मंदिर-गुरुद्वारे में पहुंचे:ब्रिटेन के 20 संगठनों ने मेयर को लेटर लिखकर दौरे का बॉयकॉट किया

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को लंदन के मंदिरों और गुरुद्वारे के दौरे के साथ अपने विदेश दौरे के ब्रिटेन चरण की शुरुआत की। यह जानकारी RSS ने दी। RSS के केंद्रीय कार्यकारी दल के सदस्य सुनील अंबेकर और ब्रिटेन दौरे के समन्वयक संगठन Integral UK के संयोजक रोहित अंबेकर ने मीडिया कॉन्फ्रेंस में बताया कि भागवत इस दौरान धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों, रिसर्चर्स और अन्य प्रमुख लोगों से मिलेंगे। उन्होंने कहा कि भागवत RSS के निस्वार्थ सेवा और सामाजिक सद्भाव के अनुभव के साथ ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, का संदेश साझा करेंगे। RSS के मुताबिक, लंदन का कार्यक्रम भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे में दिए गए संदेश को आगे बढ़ाता है। यह RSS की शताब्दी वर्ष से जुड़े तीन देशों के आउटरीच कार्यक्रम का हिस्सा है। मंदिर और गुरुद्वारे पहुंचे सुनील अंबेकर और रोहित अंबेकर ने बताया कि अंतरधार्मिक संवाद के तहत भागवत विल्सडन स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर और खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा जा चुके हैं। उन्हें लंदन के एक जैन मंदिर में भी जाना है। ब्रिटेन दौरे का मुख्य कार्यक्रम रविवार को होगा। इसमें ‘सेलिब्रेशन ऑफ वननेस’ थीम पर सामुदायिक नेताओं का स्वागत समारोह और ‘सभ्यतागत संवाद’ रखा गया है। यह कार्यक्रम ब्रिटेन में 1966 में स्थापित हिंदू सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) UK ने शुरू किया है। इसे Integral UK का समर्थन मिला है। प्रवक्ताओं के मुताबिक, पूरे ब्रिटेन के 310 से ज्यादा सामुदायिक संगठन और एसोसिएशन इसमें शामिल होने की उम्मीद है। बंद कमरे में बैठकें और प्रवासी भारतीयों से मुलाकात भागवत बुधवार को लंदन पहुंचे थे। गुरुवार को उन्होंने ‘बंद कमरे में हुई गोलमेज बैठकों’ के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद कारोबार और राजनीति से जुड़े प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रमुख लोगों की बड़ी सभा हुई। सुनील अंबेकर ने बताया कि ब्रिटेन के लोग RSS को समझने में काफी रुचि रखते हैं। उन्होंने कहा कि भागवत ने लोगों की ओर से उठाए गए सभी मुद्दों पर बात की। उनके मुताबिक, कार्यक्रम में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकों के साथ ब्रिटेन के नेता, संसद से जुड़े लोग, कारोबारी, करोड़पति और अरबपति तथा FTSE 100 कंपनियों और अन्य कॉरपोरेट्स से जुड़े लोग शामिल थे। हालांकि, प्रवक्ता ने कार्यक्रम में शामिल लोगों के बारे में ज्यादा जानकारी देने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम को गोपनीय तरीके से आयोजित किया गया था, ताकि चर्चा खुलकर हो सके। भागवत के दौरे पर उठी चिंताओं पर RSS का जवाब ब्रिटेन में कुछ सिविल सोसाइटी समूहों और सांसदों ने भागवत के दौरे को लेकर चिंता जताई है। इस पर सुनील अंबेकर ने कहा, “हम शांति, एकीकरण और एकता के लिए यहां हैं। इसलिए हम हर किसी से बातचीत के लिए तैयार हैं। लोकतंत्र में अलग-अलग आवाजें हो सकती हैं। ऐसी आवाजें उठना सामान्य बात है।” उन्होंने कहा कि RSS को लेकर कई गलतफहमियां हैं, क्योंकि बुनियादी समझ में कमी है। उनके मुताबिक, “भारत किसी राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक अवधारणा जैसा नहीं है। यह एक सांस्कृतिक अवधारणा है।” सुनील अंबेकर ने कहा कि हिंदुत्व कोई स्थिर अवधारणा नहीं है। इसमें हर तरह के धर्म और सभी धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान और सत्य में विश्वास की बात है। उन्होंने कहा, “यही हिंदुत्व है, यही भारत है। मुझे लगता है कि यह दौरा इन विचारों को साफ करने में मदद करेगा।” रविवार को सार्वजनिक संबोधन RSS प्रमुख का रविवार को प्रवासी भारतीय समुदाय को दिया जाने वाला सार्वजनिक संबोधन लाइव प्रसारित किए जाने की उम्मीद है। RSS प्रमुख के साथ ब्रिटेन के मीडिया के लिए कोई बातचीत नहीं रखी गई है। भागवत के कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी लोगों की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… न्यूयॉर्क में भागवत बोले- भारत के DNA में एकता-विविधता: हम अलग होकर भी एकदूसरे से जुड़े RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त को करीब 42 मिनट स्पीच दी। उन्होंने कहा कि एकता और विविधता भारत के DNA में है। लोग अलग दिखते हैं, उनके रहने के तरीके हैं, लेकिन सभी के बीच एक जन्मजात जुड़ाव है। पूरी खबर पढ़ें…