टैक्स बचाते-बचाते कहीं आप तो नहीं कर रहे ये 3 बड़ी गलतियां? समझें स्मार्ट सेविंग का गणित

Smart Financial Planning: अक्सर लोग टैक्स बचाने के लिए ऐसे फाइनेंशियल फैसले ले लेते हैं, जिनका नुकसान उन्हें सालों-साल उठाना पड़ता है। इनकम टैक्स के सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख की छूट पाने के चक्कर में ज्यादातर लोग बिना सोचे-समझे ट्रेडिशनल इंश्योरेंस प्लान या गलत जगह पैसा फंसा देते हैं।

अगर आप भी सिर्फ टैक्स की बचत को अपना एकमात्र मकसद मानकर निवेश कर रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। जानिए वे 3 बड़ी गलतियां जो आपकी वेल्थ को बढ़ाने के बजाय घटा रही हैं।

इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट को एक साथ मिलाना

टैक्स बचाने के लिए लोग सबसे पहली गलती यह करते हैं कि वे एंडोमेंट या मनी-बैक पॉलिसी ले लेते हैं। इन पॉलिसियों में मिलने वाला रिटर्न महज 4% से 6% के आसपास होता है, जो महंगाई दर को भी मात नहीं दे पाता।

इसका दूसरा स्मार्ट ऑप्शन ये है कि इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट को हमेशा अलग रखें। लाइफ कवर के लिए सिर्फ टर्म इंश्योरेंस लें, जो कम प्रीमियम में भारी-भरकम कवर देता है।

लॉक-इन और रिटर्न का गणित समझे बिना निवेश करना

केवल 80C की लिमिट भरने के लिए टैक्स-सेविंग एफडी (5 साल का लॉक-इन) या ऐसे प्रोडक्ट्स में पैसा लगा देना, जहाँ रिटर्न टैक्स-एडजस्टेड होने के बाद बेहद कम बचता है। इसका कड़वा सच ये है कि बैंक एफडी पर मिलने वाले ब्याज पर आपकी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, जिससे आपका असल रिटर्न और कम हो जाता है।

अगर आपकी रिस्क क्षमता इजाजत देती है, तो इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम(ELSS) में निवेश करें। इसमें केवल 3 साल का लॉक-इन होता है और लंबे समय में 12% से 15% तक का संभावित रिटर्न मिल सकता है।

इंश्योरेंस कवर को ही वेल्थ क्रिएटर्स समझ लेना

कई लोग गारंटीड रिटर्न वाली पॉलिसियों में यह सोचकर सालों तक प्रीमियम भरते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है और टैक्स भी बच रहा है। 20-25 साल बाद मिलने वाला ₹20 लाख का फंड महंगाई के कारण आज के ₹5-6 लाख के बराबर भी नहीं होगा। यानी आप सुरक्षित रहकर भी अपनी खरीदारी की ताकत खो रहे हैं।

स्मार्ट सेविंग का आसान गणित

टैक्स बचाने और वेल्थ क्रिएट करने के लिए सही एसेट एलोकेशन बेहद जरूरी है। जहां ट्रेडिशनल इंश्योरेंस प्लान 10 से 20 साल के लंबे लॉक-इन के साथ महज 4% से 6% का औसत रिटर्न देते हैं, वहीं ELSS (टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड) सिर्फ 3 साल के सबसे कम लॉक-इन पीरियड में 12% से 15% तक का शानदार अनुमानित रिटर्न और 80C के तहत छूट देता है। इसके अलावा 15 साल की अवधि वाला PPF 7.1% का पूरी तरह टैक्स-फ्री रिटर्न देता है, जबकि सबसे स्मार्ट रणनीति यानी ‘टर्म प्लान + इंडेक्स फंड’ का कॉम्बिनेशन टर्म प्लान पर 80C की छूट के साथ-साथ लॉन्ग टर्म में 12%+ का तगड़ा रिटर्न हासिल करने में मदद करता है।

कैसे करें स्मार्ट शुरुआत?

टैक्स बचाना निवेश की प्रक्रिया का एक छोटा सा हिस्सा होना चाहिए, मुख्य लक्ष्य नहीं। सबसे पहले अपनी उम्र और जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस लें। इसके बाद बचे हुए पैसों को ELSS, PPF या NPS जैसे बेहतर रिटर्न देने वाले साधनों में अपनी रिस्क प्रोफाइल के अनुसार बांटें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

होर्मुज में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ रहा:ट्रम्प की धमकी के बावजूद जहाज ईरानी रास्ते से जा रहे, सिर्फ 3 ने ओमानी रास्ता चुना

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले ज्यादातर जहाज अपनी पहचान या रास्ता छिपा रहे हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाज यहां से गुजरे, लेकिन 148 जहाजों की राह साफ तौर पर पता नहीं चल सकी। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ट्रम्प की धमकियों के बावजूद कई जहाज ईरानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि होर्मुज स्ट्रेट में इस समय अमेरिका का दबदबा ज्यादा है या ईरान का। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है। वहीं, ईरान का कहना है कि तेहरान की मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकता। ऐसे में दोनों देशों के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तव में इस रास्ते पर किसका कंट्रोल है। ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावे ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी भी दी है। ओमान अमेरिका का सहयोगी है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान के सामने स्थित है। स्ट्रेट का समुद्री इलाका ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रम्प की धमकी का मकसद मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट का संयुक्त संचालन करने के समझौते से रोकना बताया गया है। युद्ध के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। 80% से ज्यादा जहाजों का रास्ता पता नहीं समुद्री खुफिया कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 112 तेल, एलपीजी और एलएनजी ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें से 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गए, जबकि सिर्फ 2 जहाजों ने ओमानी रास्ते का इस्तेमाल किया। बाकी 89 जहाजों का रास्ता साफ नहीं था। यानी इस दौरान होर्मुज से गुजरने वाले 80% से ज्यादा तेल और गैस वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ट्रैक नहीं हो सकी। ऐसा तब होता है जब जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। कई बार जहाज का AIS डेटा केप्लर के तय ईरानी या ओमानी रास्तों से मेल भी नहीं खाता। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में किस रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों में भी ईरानी रास्ता आगे 1 से 19 अगस्त के बीच कुल 236 जहाज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें तेल और गैस के अलावा सूखा माल और रसायन ले जाने वाले जहाज भी शामिल थे। यानी हर 10 में से 6 से ज्यादा जहाज किस रास्ते से गुजरे, यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका। जहाज AIS क्यों बंद कर रहे हैं? युद्ध शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका दोनों ने अपने बताए समुद्री रास्तों या नियमों का पालन नहीं करने वाले जहाजों को चेतावनी दी। कुछ मामलों में जहाजों पर हमले भी हुए। इसी वजह से कई जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं। इससे उनकी सही स्थिति और वे किस रास्ते से जा रहे हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने अल जजीरा से कहा कि ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की आवाजाही कम दिखाई देती है। हालांकि, इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है। उनके मुताबिक, कुछ जहाज संचालकों को लगता है कि मौजूदा हालात में व्यापार जारी रखने का फायदा इन सुरक्षा जोखिमों से ज्यादा है। रास्ते में जहाजों के बीच सामान भी बदला जा रहा ट्रांसपोंडर बंद करने की एक वजह समुद्र में दो जहाजों के बीच सामान का ट्रांसफर भी है। एनर्जी एक्सपर्ट मार्क अयूब ने अल जजीरा से कहा कि सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कुछ खाड़ी देशों ने ओमानी रास्ते से कुछ खेप भेजीं। इसके लिए कुछ जहाजों की ट्रैकिंग बंद की गई और रास्ते में दूसरे जहाजों को माल सौंपा गया। उनके मुताबिक, कुछ ईरानी जहाज भी ओमानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मकसद प्रतिबंधों और अमेरिकी नाकाबंदी से बचना है। क्या आंकड़े ईरान के दबदबे की ओर इशारा कर रहे हैं? 148 जहाजों का रास्ता साफ नहीं होने की वजह से यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में कितने जहाज ईरानी या ओमानी रास्ते से गुजरे। फिर भी उपलब्ध आंकड़ों से एक बात सामने आती है। अमेरिकी नाकाबंदी और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद हर पांच में से एक जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों को मिलाकर देखें तो 35% जहाजों ने सार्वजनिक रूप से ईरानी रास्ते का इस्तेमाल किया। इसके मुकाबले ओमानी या पुराने रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही। इससे संकेत मिलता है कि कई जहाज अमेरिकी धमकियों के बावजूद ईरानी रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यानी मौजूदा हालात में ईरान को नाराज करने का डर ट्रम्प की धमकियों से ज्यादा असरदार दिखाई दे रहा है। होर्मुज दुनिया के लिए इतना अहम क्यों है अमेरिका-इजराइल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी की करीब एक-पांचवीं सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती थी। तब हर दिन करीब 130 जहाज यहां से गुजरते थे। इसके मुकाबले अगस्त के 19 दिनों में कुल 236 जहाज ही यहां से गुजरे। ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट बंद कर दिया था और सिर्फ अपने मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दिया। 17 जून को अमेरिका के साथ MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जलमार्ग दोनों देशों की बातचीत का सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। इस संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा। संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट कच्चा तेल करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 119 डॉलर तक पहुंच गया। बाद में कीमत घटी, लेकिन तनाव बढ़ने के साथ फिर चढ़ गई। गुरुवार सुबह ब्रेंट कच्चा तेल 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर था। नील क्विलियम के मुताबिक, अगर जहाजों की आवाजाही पर तेहरान का असर कम होता हुआ माना गया, तो अमेरिका के साथ बातचीत में दबाव बनाने का ईरान का एक अहम हथियार कमजोर पड़ सकता है। ——————————

होर्मुज में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ रहा:ट्रम्प की धमकी के बावजूद जहाज ईरानी रूट से जा रहे, सिर्फ 3 ने ओमानी रास्ता चुना

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले ज्यादातर जहाज अपनी पहचान या रास्ता छिपा रहे हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाज यहां से गुजरे, लेकिन 148 जहाजों की राह साफ तौर पर पता नहीं चल सकी। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ट्रम्प की धमकियों के बावजूद कई जहाज ईरानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि होर्मुज स्ट्रेट में इस समय अमेरिका का दबदबा ज्यादा है या ईरान का। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है। वहीं, ईरान का कहना है कि तेहरान की मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकता। ऐसे में दोनों देशों के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तव में इस रास्ते पर किसका कंट्रोल है। ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावे ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी भी दी है। ओमान अमेरिका का सहयोगी है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान के सामने स्थित है। स्ट्रेट का समुद्री इलाका ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रम्प की धमकी का मकसद मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट का संयुक्त संचालन करने के समझौते से रोकना बताया गया है। युद्ध के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। 80% से ज्यादा जहाजों का रास्ता पता नहीं समुद्री खुफिया कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 112 तेल, एलपीजी और एलएनजी ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें से 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गए, जबकि सिर्फ 2 जहाजों ने ओमानी रास्ते का इस्तेमाल किया। बाकी 89 जहाजों का रास्ता साफ नहीं था। यानी इस दौरान होर्मुज से गुजरने वाले 80% से ज्यादा तेल और गैस वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ट्रैक नहीं हो सकी। ऐसा तब होता है जब जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। कई बार जहाज का AIS डेटा केप्लर के तय ईरानी या ओमानी रास्तों से मेल भी नहीं खाता। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में किस रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों में भी ईरानी रास्ता आगे 1 से 19 अगस्त के बीच कुल 236 जहाज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें तेल और गैस के अलावा सूखा माल और रसायन ले जाने वाले जहाज भी शामिल थे। यानी हर 10 में से 6 से ज्यादा जहाज किस रास्ते से गुजरे, यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका। जहाज AIS क्यों बंद कर रहे हैं? युद्ध शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका दोनों ने अपने बताए समुद्री रास्तों या नियमों का पालन नहीं करने वाले जहाजों को चेतावनी दी। कुछ मामलों में जहाजों पर हमले भी हुए। इसी वजह से कई जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं। इससे उनकी सही स्थिति और वे किस रास्ते से जा रहे हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने अल जजीरा से कहा कि ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की आवाजाही कम दिखाई देती है। हालांकि, इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है। उनके मुताबिक, कुछ जहाज कंपनियां खतरे के बावजूद अपना कारोबार जारी रखना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे होने वाला फायदा जोखिम से ज्यादा है। रास्ते में जहाजों के बीच सामान भी बदला जा रहा ट्रांसपोंडर बंद करने की एक वजह समुद्र में दो जहाजों के बीच सामान का ट्रांसफर भी है। एनर्जी एक्सपर्ट मार्क अयूब ने अल जजीरा से कहा कि सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कुछ खाड़ी देशों ने ओमानी रास्ते से कुछ खेप भेजीं। इसके लिए कुछ जहाजों की ट्रैकिंग बंद की गई और रास्ते में दूसरे जहाजों को माल सौंपा गया। उनके मुताबिक, कुछ ईरानी जहाज भी ओमानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मकसद प्रतिबंधों और अमेरिकी नाकाबंदी से बचना है। क्या आंकड़े ईरान के दबदबे की ओर इशारा कर रहे हैं? 148 जहाजों का रास्ता साफ नहीं होने की वजह से यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में कितने जहाज ईरानी या ओमानी रास्ते से गुजरे। फिर भी उपलब्ध आंकड़ों से एक बात सामने आती है। अमेरिकी नाकाबंदी और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद हर पांच में से एक जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों को मिलाकर देखें तो 35% जहाजों ने सार्वजनिक रूप से ईरानी रास्ते का इस्तेमाल किया। इसके मुकाबले ओमानी या पुराने रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही। इससे संकेत मिलता है कि कई जहाज अमेरिकी धमकियों के बावजूद ईरानी रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यानी मौजूदा हालात में ईरान को नाराज करने का डर ट्रम्प की धमकियों से ज्यादा असरदार दिखाई दे रहा है। होर्मुज दुनिया के लिए इतना अहम क्यों है अमेरिका-इजराइल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी की करीब एक-पांचवीं सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती थी। तब हर दिन करीब 130 जहाज यहां से गुजरते थे। इसके मुकाबले अगस्त के 19 दिनों में कुल 236 जहाज ही यहां से गुजरे। ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट बंद कर दिया था और सिर्फ अपने मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दिया। 17 जून को अमेरिका के साथ MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जलमार्ग दोनों देशों की बातचीत का सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। इस संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा। संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट कच्चा तेल करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 119 डॉलर तक पहुंच गया। बाद में कीमत घटी, लेकिन तनाव बढ़ने के साथ फिर चढ़ गई। गुरुवार सुबह ब्रेंट कच्चा तेल 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर था। नील क्विलियम के मुताबिक, अगर जहाजों की आवाजाही पर तेहरान का असर कम होता हुआ माना गया, तो अमेरिका के साथ बातचीत में दबाव बनाने का ईरान का एक अहम हथियार कमजोर पड़ सकता है। —————————- यह भी पढ़ें….. ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

नोएडा एयरपोर्ट के पास एस्कॉर्ट्स कुबोटा बनाएगी ऐसा प्लांट जो बदल देगी ट्रैक्टर इंडस्ट्री का चेहरा! जानिए ₹2000 करोड़ का पूरा प्लान

Noida Airport News: एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड ने उत्तर प्रदेश के यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) क्षेत्र में अपने नए विशाल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के लिए भूमि पूजन किया है। 19 अगस्त को गौतम बुद्ध नगर जिले के सेक्टर-10 में हुए इस शिलान्यास के साथ ही कंपनी ने 2000 करोड़ रुपये से अधिक के शुरुआती इन्वेस्टमेंट का भी ऐलान किया है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट CNBC TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक यह नया प्लांट 154 एकड़ में तैयार होगा। यह कंपनी द्वारा अब तक का सबसे बड़ा कैपिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर कमिटमेंट है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ जापानी मूल कंपनी कुबोटा के ग्लोबल एक्सपोर्ट को भी स्पीडअप करना है।

यहां पहले फेज में बनेंगे 60000 ट्रैक्टर

कंपनी इस इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैंपस को कई फेज में तैयार करेदी। पहले फेज में सालाना 60000 ट्रैक्टर और 15000 कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट यूनिट्स की कैपिसिटी तैयार होगी। इसके साथ सपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी फैसिलिटी भी डेवलप की जाएंगी। कंपनी के मुताबिक जब इसके सभी फेज पूरे हो जाएंगे, तो यह दुनिया भर में फैले कुबोटा ग्रुप के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स में से एक बन जाएगा।

इस कैंपस में एक ही छत के नीचे ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट और इंजन बनाए जाएंगे। यह प्लांट घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए काम करेगा और इस क्षेत्र में रोजगार के कई नए अवसर पैदा करेगा।

नोएडा एयरपोर्ट के पास होने का क्या है फायदा?

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के पास यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित इस प्लांट को बेहतरीन लोकेशन एडवांटेज मिलेगा। यह साइट जेवर के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के करीब है। यह इलाका आने वाले समय में एक बड़ा रीजनल कार्गो हब बनने जा रहा है। ऐसे में इस प्लांट को देश भर में सामान भेजने के लिए मजबूत रोड कनेक्टिविटी और एक्सपोर्ट के लिए सीधा एयर कार्गो एक्सेस मिलेगा। इसके अलावा NCR में पहले से मौजूद विशाल इंजीनियरिंग और सप्लायर नेटवर्क का फायदा भी कंपनी को मिलेगा।

भारत पर कुबोटा का बड़ा दांव: 2030 का विजन

यह प्रोजेक्ट कुबोटा कॉरपोरेशन के मिड-टर्म बिजनेस प्लान 2030 का हिस्सा है। इसमें भारत को समूह के प्रमुख ग्रोथ मार्केट्स में शामिल किया गया है। कुबोटा कॉरपोरेशन के सीईओ शिंगो हानाडा के मुताबिक नए प्लांट का यह पैमाना कुबोटा की विकास रणनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत अब कुबोटा के लिए सिर्फ एक बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग हब बन रहा है।

आपको बता दें कि नवंबर 2025 में YEIDA ने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ अगस्त 2024 में हुए एक एमओयू के आधार पर एस्कॉर्ट्स कुबोटा को 4500 करोड़ रुपये के कुल ट्रैक्टर निर्माण यूनिट के लिए लगभग 200 एकड़ जमीन आवंटित की थी। इससे 4000 नौकरियां मिलने का अनुमान था। हाल ही में जिस प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ है, वह उसी बड़े विजन का पहला और संशोधित फेज्ड स्कोप है।

2030-31 तक फार्म मेकेनाइजेशन को नई दिशा देने का लक्ष्य

एस्कॉर्ट्स कुबोटा के सीएमडी निखिल नंदा ने कहा कि कंपनी प्रोडक्ट-लीड ग्रोथ पर ध्यान केंद्रित कर रही है। कंपनी ने इस साल अपने तीन ब्रांड्स के तहत 42 नए उत्पाद और पिछले दो सालों में 50 से अधिक उत्पाद लॉन्च किए हैं, जिससे धान की खेती, फोर-व्हील-ड्राइव और अन्य सेगमेंट्स में खाली जगहों को भरा गया है।

अप्रैल से जुलाई के दौरान कंपनी ने अपने संयुक्त पैन-इंडिया नेटवर्क के दम पर लगातार अपने मार्केट शेयर में बढ़ोतरी की है। निखिल नंदा ने कहा है कि एस्कॉर्ट्स कुबोटा भारत में फार्म मेकेनाइजेशन को स्पीडअप करना चाहती है। कंपनी का लक्ष्य 2030-31 तक एक ऐसा फुल-सॉल्यूशन एग्रीकल्चर प्लेटफॉर्म तैयार करना है जो सिर्फ कम कीमतों पर नहीं, बल्कि वैल्यू पर केंद्रित हो। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटलाइजेशन की बड़ी भूमिका होगी।

ये भी पढ़ें- Noida Airport: नोएडा एयरपोर्ट को मिला बड़ा रोड लिंक! 74 km का एक्सप्रेसवे जेवर को गंगा एक्सप्रेसवे से जोड़ेगा, एक्सपर्ट्स से समझिए रियल एस्टेट को कैसे मिलेगा बूस्ट

आपको बता दें कि साल 1944 में स्थापित एस्कॉर्ट्स कुबोटा भारत और वैश्विक बाजारों में फार्मट्रैक, पावरट्रैक और कुबोटा ब्रांड्स के तहत बिक्री करती है। वहीं 1890 में ओसाका (जापान) में शुरू हुई कुबोटा कॉरपोरेशन दुनिया के 120 से अधिक देशों में कृषि, कंस्ट्रक्शन और इंजन वर्टिकल्स में काम करती है और एस्कॉर्ट्स कुबोटा में मेजॉरिटी की हिस्सेदारी रखती है।

Belonging: राजनीति, प्‍यार और निजी जिंदगी तक, गांधी परिवार में हुईं हत्‍याओं के बाद कैसे बदल गई सोनिया गांधी की जिंदगी

Belonging: राजनीति, प्‍यार और निजी जिंदगी तक, गांधी परिवार में हुईं हत्‍याओं के बाद कैसे बदल गई सोनिया गांधी की जिंदगी

Sonia Gandhi

भारत में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित उनकी किताब Belonging 10 नवंबर को प्रकाशित होगी, लेकिन इसके पहले ही इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में जमकर हलचल है। सोनिया की इस किताब में उनकी राजनीति से लेकर उनकी जिंदगी, उनका संघर्ष और और निजी जीवन का भी जिक्र है। इसमें इटली से भारत तक के उनके सफ़र का ज़िक्र किया गया है। यह किताब प्यार, नुकसान और उन राजनीतिक फैसलों की निजी कहानी बताती है।

इसके साथ ही किताब उनके जीवन के साथ-साथ भारत में करीब छह दशकों के दौरान हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को देखने का एक अलग नजरिया भी देती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़ द्वारा रिलीज़ की जाने वाली 544 पन्नों की इस किताब को एक “खुलासा करने वाली” यादों की किताब बताया जा रहा है, जो युद्ध के बाद के इटली से भारत तक के उनके जीवन का सफ़र बताती है और एक बेहद निजी और राजनीतिक कहानी सुनाती है।

पेंगुइन रैंडम हाउस की वेबसाइट पर इसके बारे में कहा गया है कि यह “एक हैरान करने वाली यादों की किताब है जो प्यार, परिवार का एक बेहद दिलचस्प तरीके से जिक्र करती है। इसमें कहा गया है कि किताब में इटली में गांधी के शुरुआती सालों और राजीव गांधी से उनकी शादी से लेकर उनके संघर्षों तक का ज़िक्र होगा।

हिंदी, साड़ी और गांधी परिवार : जानकारी अनुसार, यह किताब इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से शुरू होती है, जहां “1965 में उन्नीस साल की छात्रा सोनिया माइनो को पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है”- भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पोते राजीव गांधी से। इसमें बताया गया है कि किताब में उनकी प्रभावशाली सास, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात का ज़िक्र है और दिखाया गया है कि कैसे राजीव के साथ रहते हुए सोनिया का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह हिंदी बोलना, साड़ी पहनना और भारतीय खाने का मज़ा लेना सीखती हैं।

राजीव की हत्‍या और संजय की प्‍लैन क्रैश में मौत : बता दें कि इस किताब में उन दुखद घटनाओं का भी ज़िक्र है जो राजीव गांधी के भाई संजय की प्लेन क्रैश में मौत और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार पर गुज़रीं। अपनी माँ की मौत के बाद और सोनिया के डर के बावजूद, राजीव प्रधानमंत्री बने, और सात साल बाद राजीव की भी चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती हमलावर द्वारा हत्या कर दी गई। इसमें यह भी बताया गया है कि सोनिया ने कई सालों तक राजनीति में आने के दबाव का विरोध किया, लेकिन बाद में वह इंडियन नेशनल कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं। एक अहम चुनाव के बाद जब पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस पद को ठुकराने का ‘हैरान करने वाला फैसला’ लिया और इसके बजाय उस गठबंधन में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया जिसने एक दशक तक देश पर शासन किया।

2004 में PM की कुर्सी ठुकराई थी : बता दें कि 2004 में कांग्रेस ने 14 सहयोगी दलों के साथ UPA बनाया। चुनाव के बाद लेफ्ट समेत कई दलों के समर्थन से UPA को 335 सांसदों का समर्थन मिला। सहयोगियों ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने 18 मई 2004 को पद ठुकरा दिया। इसके बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।

परदे के पीछे बागडोर : NDA ने सोनिया के विदेशी नागरिक का मुद्दा उठाकर उनके पीएम बनने का विरोध किया। इसके कारण सोनिया ने पीएम पद ठुकरा दिया और मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का प्रस्ताव रखा। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें। हालांकि, कहा जाता है कि पर्दे के पीछे रहकर सरकार की बागडोर सोनिया के हाथों में ही थी।

किताब के बारे में प्रकाशक का कहना है कि यह किताब आज़ादी के बाद के इतिहास, मौजूदा राजनीतिक संघर्षों और 60 सालों में हुए आर्थिक और सामाजिक बदलावों के ज़रिए “भारत को एक अनोखे नज़रिए से” दिखाती है, साथ ही सोनिया गांधी की निजी खुशियों और मुश्किलों की एक करीबी तस्वीर भी पेश करती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़, नॉफ़ डबलडे पब्लिशिंग ग्रुप का एक इम्प्रिंट है, जो पेंगुइन रैंडम हाउस का एक डिवीज़न है।

10 साल लगातर जीत, श्रीजेश ने कहा कि पाक अब कोई मुकाबला नहीं देती

भारत की पाकिस्तान की हॉकी टीम पर लगातार दसवीं जीत के बाद पूर्व भारतीय गोलकीपर श्रीजेश ने कहा कि यह अब सांसो को थाम देने वाला मुकाबला नहीं रहा। गौरतलब है कि भारतीय टीम आखिरी बार पाकिस्तान से साल 2016 में खेली गई चैंपियन्स ट्रॉफी में हारी थी। वहीं आखिरी बार विश्वकप में पाकिस्तान ने भारत को साल 1986 में हराया था।

भारत के पूर्व कप्तान और गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता, भारत के डिफेंसिव अप्रोच और दबाव वाली स्थितियों में शांत रहने की अहमियत पर अपनी राय रखी। पूर्व कप्तान पीआर श्रीजेश ने कहा, “भारतीय पुरुष हॉकी टीम पिछले डेढ़ साल से एक नए फॉर्मेशन के साथ खेल रही है। वह फॉर्मेशन ज़्यादातर हमें डिफेंस करने पर मजबूर करता है, लेकिन हाल ही में प्रो लीग में, हमने कई मैचों में आगे बढ़कर ज़ोरदार दबाव बनाया।

एक ज़रूरी बात यह है कि यूरोपीय टीमों के खिलाफ़ खेलते समय हमें डिफेंस में एकजुट रहना होगा। इसके अलावा, हमें विश्व कप में अपना स्वाभाविक खेल खेलना चाहिए। डिफेंस में, हमने ज़ोनल मार्किंग का इस्तेमाल किया, इसलिए हमें उस क्षेत्र में अपनी समझ को बेहतर बनाने की ज़रूरत है। हमें बहुत पीछे नहीं हटना चाहिए। हमें आगे बढ़कर, हाई प्रेसिंग करनी चाहिए और सेंटर लाइन के आगे भी डिफेंस करना चाहिए।” हरमनप्रीत सिंह की कप्तानी पर श्रीजेश ने कहा, “हरमनप्रीत एक बहुत अच्छे कप्तान हैं। पिच पर कप्तान का असर सीमित होता है क्योंकि आप हर चाल या खिलाड़ी को कंट्रोल नहीं कर सकते। जिसके पास गेंद होती है, उसे ही फ़ैसला लेना होता है।

कप्तान का ज़्यादातर काम पिच के बाहर होता है – टीम को एकजुट रखना, युवा खिलाड़ियों का समर्थन करना, उन्हें जमने में मदद करना, टीम का सकारात्मक माहौल बनाना, खिलाड़ियों की चिंताओं को कोच तक पहुँचाना, संदेह दूर करना और यह पक्का करना कि हर कोई कोच के निर्देशों को समझे। इसलिए, हॉकी कप्तान के लिए मैदान के बाहर का काम मैदान पर किए जाने वाले काम से कहीं ज़्यादा अहम होता है।” श्रीजेश ने भारतीय हॉकी टीम के विकास और भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता पर कहा, “आखिरी क्वार्टर या आखिरी मिनटों में गोल खाना हमारे लिए एक समस्या हुआ करती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है।

अब, हम मैच जीतने के लिए देर से गोल करते हैं। पहले, 35 मिनट के हाफ के दौरान, हम फिटनेस या खराब फैसले लेने की वजह से गलतियां करते थे और गोल खा जाते थे। लेकिन जब से चार-क्वार्टर वाला सिस्टम आया है, और उससे पहले भी, हमने अपनी फिटनेस, ताकत, खेल की समझ और फैसले लेने की क्षमता में काफी सुधार किया है। इसी वजह से, पाकिस्तान के खिलाफ मैच अब उतने मुश्किल नहीं रहे जितने पहले हुआ करते थे। पहले, भारत बनाम पाकिस्तान के मैच बहुत कड़े मुकाबले वाले होते थे, जो अक्सर 1-0 या 2-1 पर खत्म होते थे। पाकिस्तान की मौजूदा टीम का स्तर पहले जैसा नहीं रहा है, उनके द्वारा किए गए 3 गोलों में भारतीय रक्षापंक्ति की गलतियां ज्यादा रही।”

Dividend Stocks: बंपर डिविडेंड कमाने का आज आखिरी मौका, कल से इन शेयरों में निवेश पर नहीं मिलेगा डिविडेंड

Dividend Stocks: कई इनवेस्टर्स कमाई के लिए उन कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं, जिनका डिविडेंड देने का रिकॉर्ड अच्छा है। इससे उन्हें दो तरह से कमाई होती है। शेयरों की कीमतों में इजाफा होने पर उनके निवेश की वैल्यू बढ़ती है। साथ ही जब तक शेयर उनके पोर्टफोलियो में रहता है, उन्हें डिविडेंड मिलता रहता है। अगर आप भी डिविडेंड के लिए निवेश करना चाहते हैं तो आज बड़ा मौका है। करीब तीन दर्जन कंपनियों ने डिविडेंड के लिए 21 अगस्त को रिकॉर्ड डेट तय किया है।

डिविडेंड के लिए 21 अगस्त तक डीमैट अकाउंट में होने चाहिए शेयर

ये कंपनियां उन शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड देंगी, जिनके डीमैट अकाउंट में 21 अगस्त को शेयर होंगे। इसका मतलब है कि अगर आप इन कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं तो कल यानी 21 अगस्त (शुक्रवार) को आपके डीमैट अकाउंट में शेयर आ जाएंगे। इसका मतलब है कि डिविडेंड इनकम के लिए जा इन शेयरों को खरीदने का अंतिम मौका है। अगर कोई इनवेस्टर 21 अगस्त को इन शेयरों को खरीदता है तो वह डिविडेंड का हकदार नहीं होगा।

सबसे ज्यादा 22 रुपये का डिविडेंड एके कैपिटल दे रही है

AK Capital Services सबसे ज्यादा 22 रुपये का डिविडेंड दे रही है। इसका मतलब है कि 21 अगस्त को जिन इनवेस्टर्स के डीमैट अकाउंट में कंपनी के शेयर होंगे, उन्हें प्रति शेयर 22 रुपये का डिविडेंड मिलेगा। अगर आपके पास एके कैपिटल सर्विसेज के 10 शेयर हैं तो आपको कंपनी की तरफ से कुल 220 रुपये का डिविडेंड मिलेगा। AK Capital Services का शेयर 20 अगस्त को 1:20 बजे 1.36 फीसदी चढ़कर 1,778 रुपये पर चल रहा था।

वाडीलाल इंडस्ट्रीज प्रति शेयर 17 रुपये का डिविडेंड देगी

Vadilal Industries ने भी बंपर डिविडेंड का ऐलान किया है। कंपनी हर एक शेयर पर 17 रुपये का अंतरिम डिविडेंड देगी। वाडीलाल इंडस्ट्रीज का शेयर 20 अगस्त को 0.66 फीसदी चढ़कर 7,450 रुपये पर चल रहा था। इस साल इस शेयर में जबर्दस्त तेजी आई है। यह 2026 में 51 फीसदी से ज्यादा चढ़ा है। इस कंपनी के शेयर पर डिविडेंड कमाने के लिए आपको आज ही इसके शेयर में निवेश करना होगा।

LICHF के शेयरों से भी डिविडेंड कमाने का यह बड़ा मौका

LIC Housing Finance (LICHF) ने भी प्रति शेयर 10 रुपये डिविडेंड का ऐलान किया है। इसकी रिकॉर्ड डेट 21 अगस्त है। इसका मतलब है कि प्रति शेयर 10 रुपये डिवलिडेंड कमाने के लिए आपको इस शेयर में आज ही निवेश करना होगा। यह देश की सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी LIC की हाउसिंग फाइनेंस कंपनी है। यह घर खरीदने के लिए लोन देती है। LICHF का शेयर 20 अगस्त को 2.09 फीसदी चढ़कर 508 रुपये पर चल रहा था। बीते एक साल में यह शेयर 12 फीसदी से ज्यादा गिरा है।

हिताची एनर्जी प्रत्येक शेयर पर 8 रुपये का डिविडेंड देगी

Hitachi Energy ने प्रति शेयर 8 रुपये डिविडेंड का ऐलान किया है। अगर आप इस डिविडेंड का फायदा उठाना चाहते हैं तो आज ही आपको इस शेयर में निवेश करना होगा। हिताची एनर्जी का शेयर 20 अगस्त को 0.67 फीसदी गिरकर 33,575 रुपये पर चल रहा था। हालांकि, बीते एक साल में इस शेयर ने निवेशकों को मालामाल किया है। इस दौरान यह शेयर करीब 68 फीसदी उछला है।

यह भी पढ़ें: दिग्गज इनवेस्टर विजय केडिया के 20 लाख शेयर खरीदते ही रॉकेट बने इस कंपनी के स्टॉक

ये कंपनियां भी दे रही हैं शेयरों पर अट्रैक्टिव डिविडेंड 

पतंजिल फूड्स, जिंदल स्टेनलेस, जिंदल स्टील, GE Vernova T&D India, Veljan Denison, KSE, Mayur Uniquoters, Savita Oil Technologies, Patels Airtemp, Deep Industries के शेयरों पर भी डिविडेंड की रिकॉर्ड डेट 21 अगस्त है। इसका मतलब है कि इन शेयरों से डिविडेंड इनकम के लिए आज ही इनमें निवेश करना पड़ेगा।

Volvo EX90, ES90 India launch on October 12

Volvo EX90, ES90 India launch on October 12
volvo ex90 es90 india launch

Volvo has confirmed that it will launch two new EVs, the EX90 SUV and the ES90 sedan, in India on October 12, 2026. The EX90 and ES90 will serve as Volvo’s flagship electric offerings for the Indian market. Notably, the ES90 will mark Volvo India’s return to the luxury sedan space, following the discontinuation of the S90 in June 2025. The EX90 is expected to rival the likes of the Mercedes-Benz EQS and Kia EV9, while the ES90 is likely to go up against the BMW i5.

Volvo EX90, ES90 battery and range

Identical 92kWh RWD and 106kWh AWD powertrains

The EX90 and ES90 are both underpinned by Volvo’s SPA2 platform, which features as 800V electrical architecture. In global markets, both EVs can be had in 92kWh (Single Motor) and 106kWh (Twin Motor) guises. In 92kWh spec, the EX90 and ES90 get a single rear-mounted motor (RWD) outputting 333hp and 480Nm. Meanwhile, the 106kWh battery option is split into Twin Motor and Twin Motor Performance variants, developing 456hp/670Nm and 680hp/870Nm, respectively.

For the EX90, 0-100kph comes up in a claimed 6.6 seconds for the 92kWh, 5.3 seconds for the 106kWh Twin Motor, and 4 seconds for the Twin Motor Performance. The ES90 Twin Motor is slightly slower from 0-100kph at 5.4 seconds, but mirrors the EX90 for the other variants.

As for WLTP range, the EX90 92kWh is rated at 565km, while the Twin Motor and Twin Motor Performance trims manage 608km and 602km, respectively. Meanwhile, the ES90’s WLTP range is certified at 664km for the 92kWh variant and 696km for the 106kWh versions.

Coming to charging speeds, both the EX90 and ES90 can utilise up to 350kW DC charging, and take 22 minutes for a 10-80 percent charge across all variants.

Volvo EX90, ES90 exterior design

Look quite different compared to the XC90 and S90

Measuring 5,037mm in length, 1,964mm in width, 1,744mm in height, and 2,985mm in wheelbase, the EX90 is dimensionally similar to the XC90, but sports a distinct design. Up front, the EX90 has sleeker T-shaped headlamps with pixel-like ‘Thor’s Hammer’ DRL signatures, below which sits a pair of slim vertically-arranged fog lamps. The Volvo badge is placed front and centre on the grille-less fascia, with a discreet air dam underneath. A LiDAR sensor can also be spotted on the leading edge of the roof.

The side profile of the EX90 is cleanly-styled, with a prominent shoulder line and gently rising glass area, and there’s not much in the way of body cladding Volvo claims a drag coefficient of 0.29Cd. 20-inch alloy wheels are fitted as standard, with 21- and 22-inchers optionally available. Over to the rear, the EX90 gets C-shaped LED tail-lamps with an additional vertical row of brake lights flanking the rear windscreen. Other styling elements of note include a sizable roof spoiler and a Volvo wordmark on the bootlid.

Coming to the ES90, it adopts very similar styling cues to the EX90, like the Thor’s Hammer DRLs, vertical fog lamps, grille-less fascia, brake lights around the rear windshield, Volvo wordmark on the bootlid, gloss black bumpers and skirts, and more. However, the ES90 sets itself apart with slightly reshaped headlamps and tail-lamps, different alloy wheel designs (sizes range from 20 to 22 inches), and of course, its sedan form factor.

Thanks to its more low-slung proportions, the ES90 sports a drag coefficient of 0.25, which makes it the most aerodynamic Volvo car to date.

Volvo EX90, ES90 interior and features

14.5-inch infotainment touchscreen sits front and centre on the dash

Inside, the EX90 and ES90 are very similar in terms of dashboard layout. Both get a minimalistic dashboard dominated by a 14.5-inch Google-based portrait touchscreen that incorporates much of the in-car functionality physical controls are few and far between. There’s also a floating centre console, a three-spoke steering wheel with a neat layered design, a slim 9-inch digital driver’s display, and a 13.2-inch heads-up display.

The area between the portrait screen and centre console, however, differs between the two. The EX90 has a split design with a more open cubby, whereas the ES90 has a more enclosed storage space with two buttons underneath the touchscreen.

While the ES90 is a 5-seater, the EX90 is a 7-seater as standard, with certain variants offering a 6-seat configuration with captain’s chairs for the second row. In some markets, Volvo even offers a 4-seater version of the EX90 with a rear centre console that integrates a refrigerator, rivalling the likes of the Mercedes Maybach EQS SUV. Boot space is pegged at up to 384 litres with all three rows up for the EX90 and 424 litres for the ES90. The EX90 additionally gets a 45-litre frunk, while the ES90 features a 27-litre space.

As for creature comforts, both EVs pack a 5G connection to aid OTA updates, a digital key, ambient lighting, four-zone climate control, a cabin air purifier, a wireless charging pad, a 360-degree camera, powered front seats, a panoramic glass roof, a Bose sound system, connected car tech, auto park assist, Level-3 ADAS, V2L functionality, and lots more. The EX90 is touted to be Volvo’s safest car to date, holding 5-star crash safety ratings from Euro NCAP and NCAP. The ES90, however, is yet to be crash-tested by an NCAP agency.

Maruti Suzuki Share Price: प्राइस हाइक के बाद शेयर 1% तक उछला; नोमुरा बोली- मार्जिन बचाने के लिए और बढ़ानी पड़ सकती हैं कीमतें

मारुति सुजुकी इंडिया ने अपनी सभी गाड़ियों की कीमतों में औसतन लगभग 0.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। यह 18 अगस्त 2026 से लागू हो गई है। नोमुरा का मानना है कि अगर कंपनी को अपने मार्जिन को बचाना है तो आगे कीमतें और बढ़ाने की जरूरत होगी। अगस्त की प्राइस हाइक के तहत मारुति सुज़ुकी की कारें अलग-अलग मॉडल और वेरिएंट के हिसाब से 2,500 से 30,000 रुपये तक महंगी हो रही हैं। इनपुट कॉस्ट में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण कंपनी ऐसा कर रही है।

इससे पहले मारुति सुजुकी ने जून 2026 में भी कारों की कीमत बढ़ाई थी। उस वक्त भी कीमतें 30000 रुपये तक बढ़ाने की बात कही गई थी। नई बढ़ोतरी के बाद मौजूदा वित्त वर्ष 2026—27 में अब तक मारुति सुजुकी की ओर से कीमतों में की गई कुल बढ़ोतरी लगभग 0.9 प्रतिशत हो गई है।

नोमुरा का मानना है कि ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स को अभी भी ज्यादा लागत का सामना करना पड़ सकता है। इसकी वजह है कि रबर, कॉपर, एनर्जी और वेंडर लेबर की लागत में बढ़ोतरी का असर कुछ समय बाद दिखाई देता है।

लगभग 150-200 बेसिस पॉइंट्स की और बढ़ोतरी जरूरी

नोमुरा के मुताबिक, मारुति सुजुकी को FY27/28/29F के लिए 10.5 प्रतिशत/11.8 प्रतिशत/11.9 प्रतिशत के EBITDA मार्जिन के बाजार अनुमानों को पूरा करने के लिए कीमतों में लगभग 150-200 बेसिस पॉइंट्स की और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। नोमुरा का कहना है कि कंपनी की रणनीति समय-समय पर सोच-समझकर कीमतें बढ़ाने की लगती है, ताकि मांग पर कम से कम असर पड़े। डीलरों का कहना है कि मांग मजबूत बनी हुई है। लेकिन ब्रोकरेज का कहना है कि वह छोटी कारों के सेगमेंट पर कीमत में बढ़ोतरी और महंगाई के असर पर नजर रखेगी, क्योंकि इस सेगमेंट में ग्राहक कीमतों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं।

HDB Financial Services Share Price: मॉर्गन स्टेनली का बढ़ा भरोसा, रेटिंग और टारगेट प्राइस बढ़ाया; शेयर 4% तक उछला

नोमुरा ने मारुति सुजुकी के लिए 14,071 रुपये प्रति शेयर का टारगेट प्राइस बरकरार रखा है। मध्यम अवधि में, EV यानि इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाने की बढ़ती रफ्तार मारुति सुजुकी के लिए मार्केट-शेयर के लिहाज से एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। इंडस्ट्री में पैसेंजर व्हीकल EV की पैठ लगभग 7 प्रतिशत तक बढ़ गई है। अगर EV की पैठ तेजी से बढ़ती है, तो कंपनी के मार्केट-शेयर पर असर पड़ सकता है। इसकी वजह है कि EV मार्केट में मारुति सुजुकी की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से काफी कम रहने की संभावना है।

Maruti Suzuki के शेयर में तेजी

मारुति सुजुकी इंडिया के शेयर में 20 अगस्त को दिन में लगभग 1 प्रतिशत तक की तेजी दिखी। BSE पर शेयर 13809.40 रुपये के हाई तक गया। कंपनी का मार्केट कैप बढ़कर 4.34 लाख करोड़ रुपये हो गया है। शेयर की फेस वैल्यू 5 रुपये है। शेयर साल 2026 में अब तक 17 प्रतिशत नीचे आया है।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Tempsens Instruments IPO: खुलते ही छा गया यह IPO! 1 घंटे में फुल, लिस्टिंग पर बंपर मुनाफे का बड़ा इशारा

Tempsens Instruments IPO: राजस्थान बेस्ड टेम्पसेंस इंस्ट्रूमेंट्स इंडिया के 650 करोड़ रुपये के आईपीओ को निवेशकों की तरफ से पहले ही दिन जबरदस्त रिस्पांस मिला है। 20 अगस्त को बोली खुलने के पहले ही घंटे में यह इश्यू 1.20 गुना सब्सक्राइब हो गया। ग्रे मार्केट में भी इसके अनलिस्टेड शेयरों की भारी डिमांड देखने को मिल रही है।

Tempsens Instruments IPO: सब्सक्रिप्शन स्टेटस

एनएससी (NSE) के आंकड़ों के मुताबिक, आईपीओ में ऑफर पर रखे गए 1,51,81,667 शेयरों के मुकाबले 1,89,88,300 शेयरों के लिए बोलियां मिल चुकी हैं:

गैर-संस्थागत निवेशक (NII): 2.31 गुना सब्सक्रिप्शन

रिटेल निवेशक (RII): 1.50 गुना सब्सक्रिप्शन

₹650 करोड़ रुपये के इस कुल आईपीओ में ₹95 करोड़ का फ्रेश इश्यू और ₹555 करोड़ का ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल है। निवेशक इस आईपीओ में 24 अगस्त तक बोली लगा सकते हैं। इस आईपीओ के लिए ICICI Securities और JM Financial बुक-रनिंग लीड मैनेजर के रूप में काम कर रहे हैं।

एंकर इन्वेस्टर्स से जुटाए ₹194.5 करोड़

आईपीओ खुलने से ठीक एक दिन पहले 19 अगस्त को कंपनी ने एंकर निवेशकों से ₹194.5 करोड़ जुटाए। अरंडा इन्वेस्टमेंट्स और गोल्डमैन सैक्स जैसे दिग्गज इंटरनेशनल फंड्स के साथ एचडीएफसी, निप्पॉन लाइफ, कोटक महिंद्रा और टाटा जैसे 8 डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स को भी शेयर अलॉट किए गए।

जुटाये गए पैसों का कहां होगा इस्तेमाल?

फ्रेश इश्यू से मिलने वाले ₹95 करोड़ में से ₹18.1 करोड़ का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक हीटिंग और केबल सॉल्यूशंस बिजनेस के कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए। ₹55 करोड़ कंपनी का कर्ज चुकाने के लिए और बाकी रकम जनरल कॉर्पोरेट जरूरतों में इस्तेमाल होगी।

कंपनी की कमाई और बिजनेस प्रोफाइल

राजस्थान बेस्ड टेम्पसेंस इंस्ट्रूमेंट्स टेम्परेचर सेंसर्स बनाने वाली देश की प्रमुख कंपनी है। दुनिया भर में इसके 15 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं और भारत के टेम्परेचर सेंसर सेगमेंट में इसका 10.5% व नॉन-कॉन्टैक्ट टेम्परेचर सेंसर मार्केट में 21.3% मार्केट शेयर है।

कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो FY26 में इसका कुल रेवेन्यू 17.5% बढ़कर ₹444.9 करोड़ रहा, जो FY25 में ₹378.5 करोड़ था। इस दौरान कंपनी का नेट प्रॉफिट भी 11.2% की बढ़त के साथ ₹60.6 करोड़ से बढ़कर ₹67.3 करोड़ पर पहुंच गया। कंपनी को अपनी कुल कमाई का 71.5% हिस्सा घरेलू बाजार से और बाकी 28.5% हिस्सा एक्सपोर्ट्स से मिलता है।

GMP से तगड़ा लिस्टिंग गेन का इशारा

इन्वेस्टरगेन के अनुसार, Tempsens Instruments का शेयर ग्रे मार्केट में ₹220 के प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है। ₹300 के अपर प्राइस बैंड पर इसका अनुमानित लिस्टिंग प्राइस करीब ₹520 (₹300 + ₹220) बैठता है। इस हिसाब से निवेशकों को करीब 73% का लिस्टिंग गेन की संभावना है।

सब्सक्राइब करें या नहीं? जानें ब्रोकरेज की राय

दिग्गज ब्रोकरेज हाउस आनंद राठी ने Tempsens Instruments के IPO को लंबी अवधि के नजरिए से ‘Subscribe’ करने की सलाह दी है। ब्रोकरेज के मुताबिक, ₹300 के अपर प्राइस बैंड पर यह शेयर FY26 की कमाई के आधार पर 35.4x P/E और 25.64x EV/EBITDA के वैल्यूएशन पर उपलब्ध है।

कंपनी की मजबूत रेवेन्यू ग्रोथ, टेम्परेचर सेंसर्स व केबल्स का डायवर्सिफाइड प्रोडक्ट पोर्टफोलियो और दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में फैलता बिजनेस इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हालांकि, ब्रोकरेज ने यह भी सतर्क किया है कि अपर प्राइस बैंड पर कंपनी का वैल्यूएशन पूरी तरह से फेयरली प्राइज्ड नजर आ रहा है, लेकिन इसके लंबे समय के बिजनेस फंडामेंटल्स बेहद मजबूत हैं।

SBI Securities ने भी Tempsens Instruments के IPO को लंबी अवधि के लिए ‘Subscribe’ करने की सलाह दी है। ₹300 के अपर प्राइस बैंड पर पोस्ट-इश्यू बेसिस पर कंपनी का वैल्यूएशन 37.3x FY26 P/E पर आंका है। ब्रोकरेज ने थर्मल इंजीनियरिंग सेगमेंट में कंपनी की मार्केट लीडरशिप, प्रोजेक्ट्स और मेंटेनेंस (MRO) के बीच बैलेंस रेवेन्यू मिक्स और FY24 से FY26 के बीच एक्सपोर्ट में मिली 46.5% की सालाना ग्रोथ को बड़ा पॉजिटिव बताया है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।