बंगाल मंत्रिमंडल ने नई औद्योगिक नीति को दी मंजूरी

पश्चिम बंगाल मंत्रिमंडल ने बुधवार को एक व्यापक औद्योगिक नीति के मसौदे को मंजूरी दी। इसका नीति का उद्देश्य नया निवेश आकर्षित करना, नौकरशाही की अड़चनों में कमी लाना एवं रोजगार के अवसर उत्पन्न करना है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी पांच नवंबर को नबन्ना में इस नीति का उद्घाटन करेंगे।

मंत्रिमंडल की बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “हमने वादा किया था कि दुर्गा पूजा से पहले औद्योगिक नीति लागू की जाएगी लेकिन इसमें कुछ और सुधार करना था इसलिए थोड़ा ज्यादा समय लगा है। हमने सभी मंत्रियों से उनकी राय मांगी थी। मैंने भी अपनी राय दी है और हम पांच नवंबर को नबन्ना से इसका उद्घाटन करेंगे।

उन्होंने आगे कहा, “इसमें स्वपन दासगुप्ता और तापस रॉय शामिल होंगे और हम प्रमुख औद्योगिक घरानों के सभी प्रतिनिधियों को बुलाकर नई औद्योगिक नीति का अनावरण करेंगे।

मुख्यमंत्री अधिकारी और उद्योग मंत्री तापस रॉय की सीधी देखरेख में तैयार की गई इस नीति में राज्य सरकार की उस रणनीति की रूपरेखा शामिल होने की उम्मीद है जिसका उद्देश्य औद्योगिक विकास को पुनर्जीवित करना और राज्य अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।

सरकार ने जून में नीति बनाने का कार्य शुरू किया था ताकि उद्योगपतियों एवं व्यापारिक निकायों में लंबे समय से व्याप्त चिंताओं का समाधान किया जा सके, जो एक स्पष्ट एवं व्यापक औद्योगिक संरचना की कमी को लेकर थीं।

नौ मई को पदभार ग्रहण करने के बाद से शुभेंदु सरकार ने उद्योगों को पुनर्जीवित करने और आर्थिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार का दावा है कि हुगली और बांकुड़ा जैसे जिलों में भारी एवं मध्यम उद्योगों के लिए अवसंरचना विकास में प्रगति हुई है।

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सरकार ने निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने, नौकरशाही की अड़चनों को कम करने और युवाओं के लिए लाखों स्थायी रोजगार उत्पन्न करने को अपनी मुख्य प्राथमिकताओं के रूप में चिह्नित किया है।

दुर्गा पूजा से पहले, चटर्जी ग्रुप ने पूर्वी मिदनापुर के हल्दिया में लगभग 6,000 करोड़ रुपये के निवेश को सुनिश्चित कर लिया है। जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनी मित्सुबिशी ने भी राज्य में बड़ा निवेश करने में दिलचस्पी दिखाई है।

नई औद्योगिक नीति से इन निवेश लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक व्यवस्थित संरचना मिलने की उम्मीद है। औद्योगिक विकास के साथ-साथ, मंत्रिमंडल ने किसानों को समर्थन देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उपायों को भी मंजूरी दी है।

मुख्यमंत्री ने कहा, “मुख्यमंत्री कृषक सम्मान निधि योजना से 50 लाख से अधिक किसानों को लाभ मिलेगा। इसके तहत, प्रत्येक पात्र किसान को दो किस्तों में 3,000-3,000 रुपये मिलेंगे जो पांच नवंबर को सीधे उनके बैंक खातों में स्थानांतरित किए जाएंगे।

हुगली जिले के पुरसुराह में राज्य-स्तरीय कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री द्वारा वितरण की शुरुआत की जाएगी। अन्य जिलों के किसान एवं लाभार्थी इसमें वर्चुअल माध्यम से शामिल होंगे।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यह सहायता ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ योजना की तर्ज पर तैयार की गई संरचना के तहत राज्य की ओर से दी जाने वाली निधि का हिस्सा है। मंत्रिमंडल ने मौजूदा ‘कृषक बंधु’ योजना का नाम बदलकर ‘मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि’ करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी प्रदान की है।

मंत्रिमंडल ने विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने के लिए सरकारी विभागों के खर्चों की समीक्षा की। वित्त विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह उन विभागों को निधि की अगली किस्त जारी करें जिन्होंने अपने वार्षिक बजट आवंटन का 35 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खर्च कर लिया है ताकि विकास कार्यों में कोई रुकावट न आए।

इस बीच, सरकार ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि काली पूजा और दीपावली के दौरान पूरे राज्य में सतर्कता बढ़ाई जाए ताकि जनसुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था बनी रहे। त्योहारों के इस मौसम में मंत्रियों को कुछ खास जिलों में स्थिति पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

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पाकिस्तान के करीब जा रहे मालदीव राष्ट्रपति, विपक्ष ने चेताया:कहा- भारत को खतरा लगा तो नतीजा भुगतना पड़ेगा; मुइज्जू ने PAK से 20 समझौते किए

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के पाकिस्तान से बढ़ते रिश्तों पर देश में विरोध शुरू हो गया है। मुइज्जू 20 से 22 अक्टूबर तक पाकिस्तान के दौरे पर थे। इस दौरान दोनों देशों के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार, रक्षा और समुद्री सुरक्षा समेत 20 समझौते हुए। इसे लेकर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने चेतावनी दी है कि अगर भारत को अपनी सुरक्षा पर खतरा लगा, तो मालदीव को इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। पूर्व राष्ट्रपति नशीद ने कहा- भारत की सुरक्षा से समझौता भारी पड़ेगा मालदीव के विपक्षी दल मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) के अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने 25 अक्टूबर को अड्डू सिटी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे की आलोचना की। नशीद ने आरोप लगाया कि मुइज्जू ने भारत-पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे तनाव को नजरअंदाज किया और मालदीव को दोनों देशों के विवाद के बीच ला खड़ा किया। न्यूज आउटलेट सन ऑनलाइन के मुताबिक उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में छोटे देशों, खासकर मालदीव के लिए खतरे ज्यादा होते हैं लेकिन राष्ट्रपति ने इन जोखिमों पर ध्यान नहीं दिया। पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने भी दौरे की आलोचना की। शाहिद ने आरोप लगाया कि मुइज्जू फिर से भारत विरोधी अभियान शुरू कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने 2023 में भी इसी तरह की राजनीति की थी। मालदीव के राष्ट्रपति की 11 साल बाद पाकिस्तान यात्रा मुइज्जू का यह दौरा 11 साल में किसी मालदीवी राष्ट्रपति की पहली पाकिस्तान यात्रा थी। दोनों देशों ने अगले दो साल में आपसी व्यापार को करीब 1.3 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर 20 करोड़ डॉलर करने पर भी सहमति जताई है। इस दौरान प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जम्मू-कश्मीर और सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान का पक्ष रखा। पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में भारत ने सिंधु जल संधि स्थगित कर दी थी। पाकिस्तान ने भारत के इस फैसले का विरोध किया है। मुइज्जू ने दौरे के दौरान कश्मीर या सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के पक्ष का सार्वजनिक रूप से समर्थन नहीं किया। लेकिन उनकी मौजूदगी में हुई यह बातें अब सवालों के घेरे में हैं। भारत ने कहा- समझौतों पर नजर रख रहे हैं मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे पर भारत ने भी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 24 अक्टूबर को कहा कि भारत दोनों देशों के बीच हुए समझौतों पर करीब से नजर रख रहा है। भारत के लिए मालदीव रणनीतिक रूप से अहम है। यह देश हिंद महासागर के उन समुद्री रास्तों के करीब है, जहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। ऐसे में वहां रक्षा और समुद्री सुरक्षा से जुड़े बदलाव भारत के लिए भी मायने रखते हैं। भारत से तनाव का मालदीव की अर्थव्यवस्था पर असर पर्यटन पर असर: मालदीव की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन पर निर्भर है। 2023 में 2.09 लाख से ज्यादा भारतीय पर्यटक मालदीव पहुंचे थे। 2025 में यह संख्या करीब 1.32 लाख रही। भारत से जरूरी सामान आता है: 2024 में मालदीव के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 41% थी। भारत से चावल, सब्जियां, दवाइयां और सीमेंट जैसे जरूरी सामान जाते हैं। कारोबार प्रभावित हो सकता है: भारत से तनाव बढ़ने पर व्यापार और हवाई संपर्क पर असर पड़ सकता है। इससे मालदीव में सामान की सप्लाई और पर्यटन से जुड़े कारोबार को नुकसान हो सकता है। आम लोगों पर भी असर पड़ेगा: लंबे समय तक तनाव रहने पर जरूरी सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं और पर्यटन से जुड़े लोगों की कमाई घट सकती है। ‘इंडिया आउट’ अभियान के सहारे सत्ता में आए थे मुइज्जू मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे को उनके पुराने भारत विरोधी रुख से जोड़कर भी देखा जा रहा है। 2023 में वे ‘इंडिया आउट’ अभियान के सहारे सत्ता में आए थे। इस अभियान में मालदीव से भारतीय सैन्यकर्मियों को वापस बुलाने की मांग की गई थी। हालांकि, इसके बाद मुइज्जू ने भारत से रिश्ते सुधारने की कोशिश की। जुलाई 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मालदीव यात्रा को भी इसी दिशा में अहम कदम माना गया। अब मालदीव में विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मुइज्जू फिर से भारत को राजनीति का मुद्दा बना रहे हैं। मुइज्जू सरकार का कहना है कि उसकी विदेश नीति ‘मालदीव फर्स्ट’ यानी सबसे पहले मालदीव के हितों पर ध्यान देने की नीति है। ऐसे में उसके सामने पाकिस्तान से रिश्ते बढ़ाने के साथ भारत से संबंध बनाए रखने की चुनौती भी है। दोनों देशों के बीच रक्षा और समुद्री सुरक्षा से जुड़े सहयोग को लेकर भी संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। ——————————- यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- हूतियों को हमला न करने के बदले पैसे देगा सऊदी: रक्षा मंत्री 1 अरब डॉलर लेकर तेहरान पहुंचे; ईरान-पाकिस्तान के जरिए मध्यस्थता की कोशिश सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच पिछले 3 महीने से जंग चल रही है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी के कई तेल ठिकानों और एयरपोर्ट्स पर हमले किए हैं। पूरी खबर पढ़ें…

Houthi : हूती विद्रोही कौन हैं? सऊदी अरब और हूतियों में दुश्मनी क्यों ? क्या है उनका असली मकसद, ईरान किसलिए करता है मदद

Houthi : हूती विद्रोही कौन हैं? सऊदी अरब और हूतियों में दुश्मनी क्यों ? क्या है उनका असली मकसद, ईरान किसलिए करता है मदद

सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच पिछले 3 महीने से जंग चल रही है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी के कई तेल ठिकानों और एयरपोर्ट्स पर हमले किए हैं। अब इसे खत्म करने के लिए सऊदी ने हूती विद्रोहियों को पैसे देने की पेशकश की है। इजराइली अखबार हायोम के मुताबिक सऊदी हूती विद्रोहियों को 1 अरब डॉलर (95 अरब रुपए) देने को राजी हो गया है।

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यमन में सक्रिय हूती विद्रोही पश्चिम एशिया के सबसे अहम सशस्त्र और राजनीतिक संगठनों में से एक हैं। उनका संघर्ष केवल यमन की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सऊदी अरब की क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान का प्रभाव, लाल सागर में जहाजों की आवाजाही और वैश्विक तेल व्यापार जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।

हूती विद्रोही कौन हैं?

हूती आंदोलन को अंसार अल्लाह (Ansar Allah) के नाम से भी जाना जाता है। सकी स्थापना 1990 के दशक में यमन में हुई थी, और जून 2004 में धर्मगुरु हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती के नेतृत्व में यमन सरकार के खिलाफ इसने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया था। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में यमन के उत्तरी हिस्से में हुई थी। इस आंदोलन का आधार जायदी शिया समुदाय है, जो यमन की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शुरुआत में यह आंदोलन धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय था। बाद में इसने सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया और यमन की केंद्रीय सरकार के खिलाफ अपनी ताकत बढ़ाई। 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यमन में राजनीतिक संकट और गृहयुद्ध और गहरा गया। 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया।

सऊदी अरब और हूतियों की दुश्मनी क्यों है?

सऊदी अरब और यमन पड़ोसी देश हैं। दोनों के बीच लंबी सीमा है, इसलिए यमन में किसी शत्रुतापूर्ण सशस्त्र संगठन का मजबूत होना सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। 2014 में हूतियों ने सना पर कब्जा किया और यमन की तत्कालीन सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान शुरू किया। इसके बाद संघर्ष में मिसाइल हमले, हवाई हमले और सीमा पार सैन्य कार्रवाई शामिल होती गई।  2022 में युद्धविराम के बाद संघर्ष की तीव्रता कुछ समय तक कम रही, लेकिन 2026 में लड़ाई फिर तेज होने की खबरें सामने आईं। हूतियों की हालिया बढ़त ने लाल सागर के तटीय इलाकों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

 

आज हूती यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और उनके पास मिसाइल, ड्रोन तथा अन्य सैन्य क्षमताएं हैं।

 

हूती विद्रोहियों का लक्ष्य क्या है?

हूतियों के लक्ष्य को समझने के लिए तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।

 

यमन की सत्ता पर पकड़ मजबूत करना

हूती केवल विद्रोही लड़ाके नहीं हैं, बल्कि एक राजनीतिक-सैन्य आंदोलन भी हैं। उनका प्रमुख लक्ष्य यमन में अपनी सत्ता और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखना तथा बढ़ाना है। वे राजधानी सना सहित देश के बड़े आबादी वाले हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। 

विदेशी हस्तक्षेप और विरोधियों का मुकाबला

हूती सऊदी अरब और अमेरिका के क्षेत्रीय प्रभाव का विरोध करते हैं। वे यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के विरोध में भी लड़ते रहे हैं। उनकी विचारधारा में अमेरिका और इजराइल-विरोध प्रमुख है। हालांकि, आंदोलन के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य उद्देश्यों को एक ही वजह से नहीं समझा जा सकता। 

क्षेत्रीय ताकत और रणनीतिक दबाव बढ़ाना

लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास सैन्य दबाव बनाकर हूती अपने विरोधियों के व्यापार और सुरक्षा हितों को प्रभावित कर सकते हैं। जहाजों और तेल ढांचे पर हमलों की धमकी उन्हें क्षेत्रीय बातचीत में एक महत्वपूर्ण पक्ष बनाती है। सऊदी अरब और यमन पड़ोसी देश हैं। दोनों के बीच लंबी सीमा है, इसलिए यमन में किसी शत्रुतापूर्ण सशस्त्र संगठन का मजबूत होना सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

ईरान हूतियों की मदद क्यों करता है?

ईरान और हूती आंदोलन के बीच राजनीतिक तथा सैन्य संबंध हैं। ईरान को सऊदी अरब का क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। ऐसे में हूतियों को समर्थन देने से ईरान को अरब प्रायद्वीप और लाल सागर के आसपास प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिलता है। ईरान ने हूतियों को सैन्य सहायता और तकनीकी समर्थन दिया है। हालांकि, हूती आंदोलन की अपनी स्थानीय जड़ें, राजनीतिक हित और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भी है। उसे केवल ईरान का संगठन कहना पूरे संघर्ष की जटिलता को नहीं दर्शाता।  ईरान की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सऊदी अरब और हूतियों के बीच संवाद के लिए एक संभावित मध्यस्थ बन सकता है। लेकिन मध्यस्थता की कोशिश और किसी समझौते का वास्तव में लागू होना दो अलग बातें हैं।

सऊदी अरब हूतियों को 1 अरब डॉलर क्यों देना चाहता है?

इजराइली अखबार Israel Hayom की 26 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब हूतियों के साथ संघर्ष रोकने के लिए 1 अरब डॉलर यानी करीब 95 अरब रुपये के वित्तीय समझौते पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट में खाड़ी क्षेत्र के अज्ञात राजनयिक सूत्रों का हवाला दिया गया है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रस्तावित वित्तीय सहायता का संबंध पहले हुई समझ के तहत हूती-नियंत्रित क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और नागरिक बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण से भी हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, रियाद चाहता है कि हूती कब्जाए गए क्षेत्रों को लेकर समझौता करें और हमले रोकें। 

बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। यह एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापार करने वाले जहाजों के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। हूतियों की तटीय इलाकों में बढ़त और जहाजों पर हमले की क्षमता के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों और तेल परिवहन पर खतरा बढ़ सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 में हूतियों की क्षेत्रीय बढ़त ने सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए भी चिंता पैदा की। 

 
यदि इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे माल ढुलाई, बीमा और ईंधन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। बाब अल-मंदेब और होर्मुज जलडमरूमध्य अलग-अलग समुद्री मार्ग हैं। दोनों में तनाव बढ़ने से ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन इनके भौगोलिक स्थान और व्यापारिक भूमिकाएं अलग हैं।

 क्या हूती सिर्फ यमन की सत्ता चाहते हैं या पूरे क्षेत्र पर प्रभाव?

हूतियों का मूल संघर्ष यमन की सत्ता, राजनीतिक व्यवस्था और अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों को लेकर है। लेकिन समय के साथ उनकी सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय गठजोड़ ने उन्हें यमन की सीमाओं से बाहर भी प्रभावशाली बना दिया है।

 – यमन के भीतर अपने शासन और क्षेत्रीय नियंत्रण को बनाए रखना।

– सऊदी अरब, अमेरिका और इजराइल जैसे विरोधियों पर सैन्य तथा राजनीतिक दबाव बनाना।

– लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों पर अपनी सैन्य स्थिति का इस्तेमाल करके क्षेत्रीय बातचीत में प्रभाव बढ़ाना। हूती फिलहाल पूरे अरब क्षेत्र पर शासन करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। उनका मुख्य सत्ता-केंद्र यमन है, लेकिन उनकी कार्रवाई के प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकते हैं।

ज्ञानेश हटें, आंदोलन तुरंत रुकेगा

नई दिल्ली। राहुल गांधी ने सोमवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटा दें तो विपक्ष का आंदोलन 30 सेकंड में रुक जाएगा। उन्होंने दिल्ली के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने एक्स पर व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस उनकी बात सुन रही है और उनके साथ खड़ी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने मेट्रो बंद की, सड़कें सील कीं और राजधानी पर ताला लगाया।

राहुल ने दावा किया कि जब वोट ही चोरी हो जाए तो किसी की दुकान, बचत और बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को ‘आरोपी नंबर चार’ कहा। हालांकि, पोस्ट में यह स्पष्ट नहीं किया कि इस संबोधन का आधार क्या है।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने कथित वोट चोरी के खिलाफ एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली बुलाई है। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष बृजेश गोयल ने राहुल को पत्र लिखकर रैली के समय पर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि धनतेरस और दिवाली से पहले बाजारों में बड़ी संख्या में ग्राहक आते हैं। ऐसे समय रैली से आसपास के थोक और खुदरा बाजारों का कारोबार प्रभावित हो सकता है।

क्या सिक्किम के नाथू ला में घुस आई चीनी सेना? वायरल दावे की सेना ने बताई सच्चाई

नाथू ला भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार के लिए तय सेंटर्स में शामिल है। यहां दोनों देशों के बीच व्यापार समझौतों और सुविधाओं के तहत होता है। सेना ने कहा कि वायरल वीडियो में इसी व्यापार मार्ग पर चल रहे वाहनों को दिखाया गया।

न गर्मी, न आम का सीजन…फिर भी बाजार में कैसे पहुंचा केसर आम, ₹14,500 रुपये में बिका एक बॉक्स

फलों का राजा कहा जाने वाला आम आमतौर पर गर्मियों के मौसम में बाजार में मिलता है। इसका सीजन खत्म होने के बाद लोग अगले साल इसका इंतजार करते हैं। लेकिन गुजरात के पोरबंदर में एक हैरान कर देने वाले नजारा देखने को मिला। यहां गर्मियों में मिलने वाला फेमस केसर आम अक्टूबर में ही बाजार पहुंच गया। पोरबंदर मार्केटिंग यार्ड में केसर आम के चार बॉक्स नीलामी के लिए पहुंचे हैं। हर बॉक्स में 10 किलो आम हैं, यानी कुल 40 किलो आम बाजार में आए हैं। नीलामी में आम की कीमत 1,450 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। मौसम से पहले ही केसर आम की आवक ने सबको हैरान कर दिया। आइए जानते हैं इसके बारे में

हर कोई रह गया हैरान

गुजरात के गिर-सोमनाथ जिले के केसर आम अपने मीठे स्वाद और अच्छी खुशबू के लिए देश-विदेश में मशहूर हैं। वहीं पोरबंदर में इस बार मौसम से पहले ही केसर आम बाजार में पहुंच गए हैं। बर्दा क्षेत्र के राणावाव और हनुमानगढ़ गांवों से केसर आम के चार बॉक्स पोरबंदर मार्केटिंग यार्ड की सुदामा फ्रूट कंपनी में नीलामी के लिए लाए गए। आमतौर पर केसर आम गर्मियों में पकते हैं और अप्रैल-मई के दौरान बाजार में इनकी आवक बढ़ती है। ऐसे में नवरात्रि और शरद पूर्णिमा के तुरंत बाद आम का बाजार में पहुंचना व्यापारियों और ग्राहकों के लिए हैरानी की बात रही। सीजन से कई महीने पहले केसर आम की इस आवक ने सभी का ध्यान खींचा है।

कितनी थी आम की कीमत

पोरबंदर की सुदामा फ्रूट कंपनी में केसर आमों की नीलामी की शुरुआत नारियल फोड़कर और मिठाई बांटकर की गई। कंपनी में नितिन दसानी ने इन आमों की नीलामी करवाई। इस दौरान आमों की कीमत को लेकर खरीदारों में खासा उत्साह देखने को मिला। नीलामी में 10 किलो के एक बॉक्स की कीमत 14,500 रुपये लगी, यानी आमों का भाव 1,450 रुपये प्रति किलो रहा। वहीं केसर आम के दो अन्य बॉक्स 1,425 रुपये प्रति किलो के भाव से बिके, जिनकी कुल कीमत 28,500 रुपये रही।

वहीं, चौथे बॉक्स की बिक्री 1,050 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 10,500 रुपये में हुई। इन चार बॉक्स में से एक राजकोट और एक पोरबंदर के व्यापारियों ने खरीदा, जबकि बाकी दो बॉक्स ब्रिटेन (UK) में निर्यात करने के लिए खरीदे गए। सीजन से पहले बाजार में पहुंचे इन आमों को मिली ऊंची कीमत और विदेश भेजने की तैयारी ने इस नीलामी को खास बना दिया।

समय से पहले कैसे आया आम

इस साल मानसून के दौरान कम बारिश और उसके बाद पड़ी तेज गर्मी को केसर आम के समय से पहले आने की एक वजह माना जा रहा है। मौसम में हुए बदलाव के कारण सावन महीने में ही आम के पेड़ों पर फूल खिलने लगे, जिससे फल सामान्य समय से पहले तैयार हो गए और बाजार तक पहुंच गए। वहीं, बाजार में इतनी जल्दी केसर आम पहुंचने से व्यापारी भी हैरान हैं और इसे कुदरत का अनोखा कमाल मान रहे हैं।

आज का एक्सप्लेनर:नेतन्याहू सर्वे में पिछड़ रहे, क्या फिर भी प्रधानमंत्री बन जाएंगे; इजराइल में वोटिंग कल, भारत से कितने अलग होते हैं चुनाव

इजराइल में कल, यानी 27 अक्टूबर को वोट पड़ेंगे। सर्वे में मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी विपक्षी आइजनकोट से पिछड़ रही है। इसके बावजूद नेतन्याहू के 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा। इसकी वजह है इजराइल का अनोखा चुनावी सिस्टम। इसे ही डिकोड करेंगे आज के एक्सप्लेनर में… साल- 1907, ब्रिटेन का एक यहूदी केमिस्ट चाइम वाइजमैन पहली बार फिलिस्तीन पहुंचा और जाफा इलाके में एक कंपनी खोली। धीरे-धीरे दुनियाभर से सताए हुए यहूदी फिलिस्तीन पहुंचने लगे। वो यहां जमीनें खरीदते, खेती और व्यापार करते। आबादी बढ़ती गई। 1948 में इजराइल नया देश बना। तब तक यहां 70 से ज्यादा देशों से यहूदी आकर बस चुके थे। जमीनी सीमाएं तय नहीं थीं। हर समूह की भाषा, संस्कृति और राजनीति अलग थी। सभी को प्रतिनिधित्व देना जरूरी था। ऐसे में पूरा देश एक निर्वाचन क्षेत्र मानकर प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम अपनाया गया, यानी जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। इजराइल के इसी अनोखे इलेक्शन सिस्टम को आसानी से समझने के लिए 7 पॉइंट्स से गुजर जाइए… 1. पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र 2. वोट पार्टी को मिलते हैं, किसी एक उम्मीदवार को नहीं 3. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा 4. सीट पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट जरूरी 5. नेसेट की सीटों का बंटवारा 6. प्रधानमंत्री कौन बनेगा? 7. अगर कोई गठबंधन न बने तो? 1949 से लेकर आज तक इजराइल में किसी भी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला है। इसकी 3 वजहें हैं… 1. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा: नेसेट में सीटें पार्टी को मिले वोट शेयर के अनुपात में बंटती हैं। ऐसे में बहुमत की 61 सीटें पाने के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 51% की जरूरत है, जो बहुत मुश्किल है। जबकि भारत में अमूमन 35-40% वोट पर लोकसभा में आधी सीटें मिल सकती हैं। 1969 में गोल्डा मायर के अलाइनमेंट (लेबर अलायंस) बहुमत के सबसे नजदीक पहुंचा। उसे 46.2% वोट और 56 सीटें मिली थीं। 2. कई खेमों में बंटा समाज: इजराइली थिंकटैंक ‘इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट’ के सीनियर फेलो प्रो. गिदोन राहत के मुताबिक, इजराइल का समाज कई हिस्सों में बंटा हुआ है। जैसे- सेकुलर यहूदी बनाम अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स, अशकेनाजी बनाम मिजराही, यहूदी बनाम अरब। हर समूह की अपनी अलग पार्टी है, इसलिए वोट बिखर जाते हैं। जैसे- सेकुलर यहूदी येश अतीत, अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स शास, राष्ट्रीय-दक्षिणंपथी लिकुड और अरब-इजराइली रा’आम को अमूमन वोट देते हैं। 3. कम इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड: शुरुआत में 1% वोट पाने वाली पार्टियों को भी नेसेट में जगह मिल जाती थी। फिर इसे बढ़ाकर 1.5%, 2% और अब 3.25% किया गया, ताकि छोटी पार्टियां कम हों। इसके बावजूद औसतन 11-12 पार्टियां इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड पार कर लेती हैं। औसतन 3 पार्टियां ही 10 से ज्यादा सीटें हासिल कर पाती हैं। वहीं औसतन 5-6 छोटी पार्टियों को 4-6 सीटें मिल जाती हैं। क्या चुनाव के बाद नेतन्याहू फिर से सरकार बना पाएंगे? ऐसा 38 साल बाद हो रहा है कि नेसेट के पूरे 4 साल के कार्यकाल के बाद चुनाव हो रहा है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस बार के चुनाव में ये छोटे गुट ‘किंगमेकर’ बन सकते हैं, खासतौर पर अरब पार्टियां। दरअसल, इजराइल के 3 बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म्स- चैनल 12, चैनल 13 और कान 11 के फाइनल पोल में किसी भी अलायंस को बहुमत नहीं मिला। ज्यादातर पोल में पूर्व आर्मी चीफ गादी आइजनकोट की पार्टी ‘याशर’ को बढ़त है। याशर को 22 से 23 सीटें मिल सकती हैं, जबकि 19 साल पीएम रहे नेतन्याहू की लिकुड को 19 से 21 सीटें। माना जा रहा है कि अगर अरब पार्टियों ने 10 सीटें भी हासिल कर लीं, तो वही तय करेंगी कि सत्ता कौन संभालेगा? इजराइली मीडिया में इस चुनाव को अक्टूबर 2023 में शुरू हुई जंग के बाद का पहला चुनाव और नेतन्याहू की लीडरशिप पर जनमत जैसा बता रही हैं। नेतन्याहू पर जंग की आड़ में अपनी सरकार बचाने के आरोप लगे हैं। उन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा भी चल रहा है। ‘फ्लाई एंड वोट’ नाम की एक मुहिम भी चल रही है, जिसके तहत विदेशों में रह रहे इजराइली वोटर्स देश आकर वोट डाल रहे हैं। यहूदी मीडिया वेबसाइट ‘फॉरवर्ड’ के मुताबिक, करीब 5 लाख इजराइली वोटर्स विदेशों में रहते हैं, जिनमें से करीब 53 हजार वोटर वोट डालने के लिए इजराइल जा रहे हैं और ये 67 हजार तक हो सकते हैं। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में रहने वाले एडम पाइंस वोट डालने के लिए इजराइल के तेल अवीव पहुंच गए हैं। वे मानते हैं कि इजराइल ने अपनी नैतिक दिशा खो दी है। नेतन्याहू इजराइल की हिफाजत करने में नाकाम रहे हैं। उनकी कार्रवाइयों से दुनियाभर के यहूदियों और इजराइलियों पर असर पड़ा है। विदेशों से लौट रहे ज्यादातर वोटर नेतन्याहू के खिलाफ हैं। इसी के चलते लिकुड पार्टी ने केंद्रीय चुनाव समिति से ‘फ्लाई एंड वोट’ मुहिम रोकने की मांग की है। ———— ये खबर भी पढ़िए… क्या पाकिस्तानी पायलट भी प्लेन भारत ला सकते हैं; इजराइल की फ्लाइट में कैसे पहुंचा ओमानी अल-हमामी, असली इरादा क्या था कैप्टन स्मित मच्छर पर चाकू से नहीं, क्रैश एक्स से हमला हुआ था। कॉकपिट में रखी इस कुल्हाड़ी का इस्तेमाल इमरजेंसी में विंडो वगैरह तोड़ने में होता है। इसे चलाने वाले हमलावर को-पायलट हमाम अल-हमामी की कहानी भी खुल गई है। पूरी खबर पढ़िए…

लूला चौथी बार ब्राजील के राष्ट्रपति निर्वाचित

ब्राजील के दिग्गज वामपंथी राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा, एक कड़े चुनावी मुकाबले के बाद फिर से चुन लिए गए हैं। उन्होंने अपने दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोल्सोनारो को हराया है, जिन्होंने अभी तक अपनी हार स्वीकार नहीं की है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट ने बताया कि सभी वोटों की गिनती के बाद, लूला को 51.79 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत वोट मिले।

लेकिन बोल्सोनारो ने नतीजों को मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने मतदान का समय दो घंटे बढ़ाए जाने को “अस्पष्ट” (या बिना किसी ठोस कारण के) बताया है – जबकि सच्चाई यह है कि उनकी अपनी चुनाव टीम और उनके प्रतिद्वंद्वी की टीम, दोनों ने ही मतदान केंद्रों को देर तक खुला रखने की मांग की थी।

उन्होंने ब्रासीलिया में अपने समर्थकों से कहा कि वे चुनाव को रद्द कराने की मांग करेंगे। हालांकि, इसके बावजूद लूला और उनके समर्थक इस जीत का जश्न मना रहे हैं। वे इसे एक “ऐतिहासिक जीत” और एक चौंकाने वाला बदलाव बता रहे हैं।

यह राष्ट्रपति चुनाव में लूला की चौथी जीत है। वे जनवरी 2003 से दिसंबर 2010 तक दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति रह चुके हैं और जनवरी 2023 से फिर से इस पद पर हैं। लेकिन रविवार को हुए रन-ऑफ चुनाव में उनकी जीत का रास्ता आसान नहीं था।

चार अक्टूबर को पहले दौर में बोल्सोनारो ने लूला को हरा दिया था और कई लोगों को नहीं लगा था कि वे सिर्फ तीन हफ्तों में नतीजों को पलट पाएंगे।

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उन्होंने लैटिन अमेरिका के एक व्यापक चलन को भी चुनौती दी है जहाँ मतदाताओं ने सत्ताधारी नेताओं को नकार दिया है और दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर रुख किया है। इस पूरे क्षेत्र में, अर्जेंटीना, चिली और कोलंबिया जैसे बड़े देशों में अब रूढ़िवादी नेता सत्ता में हैं।

पूर्व मेटलवर्कर (धातु कर्मी), जो 1989 में पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के बाद से ब्राजील की वामपंथी राजनीति में सबसे प्रमुख चेहरा रहे हैं, उन्हें 2003 में पहली बार सत्ता संभालने के बाद से अब सबसे कठिन राजनीतिक हालात का सामना करना पड़ रहा है।

पांच जनवरी 2027 से शुरू होने वाला उनका नया कार्यकाल देश और विदेश दोनों स्तरों पर भारी चुनौतियों के बीच शुरू होगा, इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से मिलने वाली दुश्मनी भी शामिल है।

हालाँकि ट्रम्प ने लुला के प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो का सीधे तौर पर समर्थन नहीं किया (जैसा कि उन्होंने कोलंबिया और होंडुरास में राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले दक्षिणपंथी उम्मीदवारों के मामले में किया था) फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रम्प प्रशासन यही चाहता होगा कि 21.30 करोड़ की आबादी वाले इस देश की सत्ता में कोई रूढ़िवादी (कंजर्वेटिव) नेता आए।

व्हाइट हाउस लैटिन अमेरिका को अमेरिकी प्रभाव वाला क्षेत्र मानता है। ट्रम्प प्रशासन चाहता है कि वहाँ ऐसे नेता सत्ता में हों जो रक्षा, सुरक्षा और व्यापार जैसे मुद्दों पर उसकी नीतियों का समर्थन करें। साथ ही वह पश्चिमी गोलार्ध में चीन के प्रभाव को भी कम करना चाहता है।

तेल से समृद्ध होने के साथ ही ब्राजील में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ (दुर्लभ खनिज) के भंडार मौजूद हैं। दक्षिण अमेरिका का एकमात्र ऐसा बड़ा देश है जहाँ कोई दक्षिणपंथी नेता सत्ता में नहीं है। वहीं, लुला को काफी हद तक चीन का समर्थक माना जाता है।

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UP SIR Update: यूपी के CEO ने 10 अप्रैल के बाद के सभी वोटर फॉर्म्स की ऑडिट के दिए आदेश, वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के आरोपों के बाद उठाया ये कदम

UP SIR Update: उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट से जुड़ी कथित अनियमितताओं की खबरों के बीच मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिणवा ने बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने 10 अप्रैल से कंप्यूटर सहायकों द्वारा संसाधित किए गए फॉर्म-6, फॉर्म-7 और फॉर्म-8 की राज्यव्यापी जांच यानी ऑडिट कराने का आदेश दिया है। यह प्रक्रिया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की अवधि समाप्त होने के बाद सामने आई शिकायतों और वोटर लिस्ट में संभावित गड़बड़ियों की जांच के लिए शुरू की जा रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की खबर के मुताबिक, पीलीभीत और आजमगढ़ समेत कुछ जिलों की वोटर लिस्ट में अनियमितताओं की रिपोर्ट सामने आने के बाद यह फैसला लिया गया। निर्वाचन विभाग अब कंप्यूटर सहायकों द्वारा दर्ज और संसाधित किए गए फॉर्म की जांच करेगा, ताकि किसी भी तरह की गलती या नियमों के उल्लंघन का पता लगाया जा सके।

फॉर्म-6, 7 और 8 की होगी जांच

निर्वाचन विभाग के आदेश के तहत 10 अप्रैल से कंप्यूटर सहायकों द्वारा संसाधित किए गए तीन प्रकार के फॉर्म की जांच की जाएगी:-

– फॉर्म-6: वोटर लिस्ट में नया नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

– फॉर्म-7: मतदाता सूची में नाम हटाने या किसी प्रविष्टि पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होता है।

– फॉर्म-8: वोटर लिस्ट में दर्ज डिटेल्स में संशोधन, पता बदलने या अन्य निर्धारित सुधारों के लिए उपयोग किया जाता है।

इन फॉर्म की जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने और डिटेल्स संशोधित करने की प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई या नहीं। ऑडिट के दौरान सामने आने वाली अनियमितताओं के आधार पर संबंधित मामलों में आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

गड़बड़ी मिलने पर अधिकारियों पर भी होगी कार्रवाई

मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक अहम वर्चुअल बैठक की। इस दौरान उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जांच में अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। खबरों के अनुसार, जिला निर्वाचन अधिकारियों को भी अपर्याप्त निगरानी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

इसका मतलब है कि जांच केवल कंप्यूटर सहायकों तक सीमित नहीं रहेगी। बल्कि पर्यवेक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की भूमिका भी देखी जा सकती है। इसके अलावा, संभागीय आयुक्तों और वोटर लिस्ट के पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त रोल ऑब्जर्वरों को भी निर्वाचन लिस्ट से जुड़े कार्यों की निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं।

पीलीभीत और आजमगढ़ की शिकायतों के बाद बढ़ी सतर्कता

पीलीभीत और आजमगढ़ में वोटर लिस्ट से जुड़ी कथित अनियमितताओं की रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग की सतर्कता बढ़ गई है। राज्यव्यापी ऑडिट के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि कहीं मतदाता रजिस्ट्रेशन और संशोधन की प्रक्रिया में गलत जानकारी तो नहीं की गईं। हालांकि, अखबार की इस रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि अब तक कितने फॉर्म में गड़बड़ी मिली है या कितने अधिकारियों के खिलाफ औपचारिक कार्रवाई शुरू हुई है।

SIR में इस्तेमाल सॉफ्टवेयर की जानकारी देने से निर्वाचन आयोग का इनकार

SIR से जुड़ा एक दूसरा मुद्दा भी सामने आया है। निर्वाचन आयोग ने वोटर लिस्ट में त्रुटियों और विसंगतियों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर के नाम और वर्जन की जानकारी शेयर करने से इनकार कर दिया है। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने 16 अक्टूबर को दिए गए जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापारिक रहस्यों और बौद्धिक संपदा से संबंधित है। इसी आधार पर आयोग ने इसे सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट के तहत सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त जानकारी बताया। यह जवाब सॉफ्टवेयर के नाम और वर्जन के संबंध में दायर RTI आवेदन के जवाब में दिया गया था।

सॉफ्टवेयर की पारदर्शिता पर उठे सवाल

वोटर लिस्ट की जांच में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर के बारे में जानकारी नहीं मिलने से उसकी कार्यप्रणाली और त्रुटियों की पहचान की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, केवल सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन सार्वजनिक नहीं किए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वोटर लिस्ट में कोई गड़बड़ी हुई है। इसके लिए स्वतंत्र जांच, उपलब्ध दस्तावेजों और निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया से संबंधित तथ्यों का मूल्यांकन जरूरी होगा।

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सर्बिया में पुतिन समर्थक राष्ट्रपति वुचिच की हार:छात्र गठबंधन ने चुनाव जीता; तानाशाही रवैये के खिलाफ दो साल से प्रदर्शन चल रहे थे

रूस के राष्ट्रपति पुतिन के करीबी माने जाने वाले सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुचिच को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। करीब दो साल से उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के गठबंधन ‘स्टूडेंट लिस्ट’ ने चुनाव जीत लिया है। छात्र भ्रष्टाचार और सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। वुचिच के मुताबिक, छात्रों के गठबंधन को संसद की 250 में से कम से कम 135 सीटें मिली हैं, जबकि उनकी पार्टी को करीब 105 सीटें मिलने का अनुमान है। वुचिच 2012 से सर्बिया की राजनीति के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल रहे हैं। वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों पदों पर रह चुके हैं। वुचिच के हार मानते ही राजधानी बेलग्रेड में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ज्यादातर युवा थे। लोगों ने सर्बिया के झंडे लहराए, गाड़ियों के हॉर्न बजाए और पटाखे जलाकर जश्न मनाया। वुचिच की हार के बाद जश्न की 3 तस्वीरें नवंबर 2024 में हुए हादसे के बाद शुरू हुआ आंदोलन नवंबर 2024 में नोवी साद शहर के एक रेलवे स्टेशन की छतरी गिर गई थी। इस हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद लोगों का गुस्सा बढ़ गया। सवाल उठने लगे कि सुरक्षा के इंतजामों में लापरवाही क्यों हुई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। लोगों ने सरकार पर भ्रष्टाचार और जवाबदेही से बचने के आरोप लगाए। धीरे-धीरे छात्र आंदोलन बड़ा होता गया। प्रदर्शनकारी सरकार में बदलाव की मांग करने लगे। उन्होंने वुचिच से पद छोड़ने की भी मांग की। छात्रों के लगातार प्रदर्शनों के दबाव में वुचिच ने सितंबर में तय समय से पहले चुनाव कराया था। रिकॉर्ड मतदान, लेकिन सरकार बनाना बड़ी चुनौती चुनाव में करीब 70% लोगों ने वोट डाले। सर्वे एजेंसियों और चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 1992 में यूगोस्लाविया के टूटने के बाद यह सबसे ज्यादा मतदान है। चुनाव जीतने के बाद भी स्टूडेंट लिस्ट के सामने कई चुनौतियां हैं। अभी यह साफ नहीं है कि नई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और छात्र आंदोलन अपने वादों को कैसे पूरा करेगा। स्टूडेंट लिस्ट में 250 उम्मीदवार हैं। इनमें विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अभिनेता और किसान शामिल हैं। इसके कई उम्मीदवार राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा चर्चित नहीं हैं। सूची का नेतृत्व हृदय रोग विशेषज्ञ इलिया सर्दानोविच कर रहे हैं। आंदोलन ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने, कानून का पालन सुनिश्चित करने और शिक्षा व्यवस्था सुधारने का वादा किया है। लेकिन नई कैबिनेट में कौन-कौन होगा और सरकार कैसे चलेगी, यह अभी तय नहीं है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नई सरकार पर सरकारी संस्थाओं में सुधार का दबाव रहेगा। इसमें पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और मंत्रालयों में बदलाव शामिल हो सकते हैं। चीन, रूस और यूरोपीय संघ के बीच संतुलन बनाना होगा नई सरकार के सामने विदेश नीति की भी चुनौती होगी। सर्बिया को चीन, रूस और यूरोपीय संघ के साथ अपने रिश्तों को संभालना होगा। चीन सर्बिया में बड़ा निवेश करता है। रूस उसका पुराना सहयोगी है और उसे प्राकृतिक गैस भी देता है। वहीं, यूरोपीय संघ सर्बिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। नई सरकार को इन तीनों के साथ रिश्ते बनाए रखते हुए अपने फैसले लेने होंगे। यूरोपीय नेताओं ने जीत का स्वागत किया यूरोपीय नेताओं और अधिकारियों ने स्टूडेंट लिस्ट की जीत का स्वागत किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन ने कहा कि यूरोपीय संघ, सर्बिया को अपनी सदस्यता की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करने के लिए उसके साथ काम करने को तैयार है। यूरोपीय संघ की विस्तार आयुक्त मार्ता कोस ने भी चुनाव नतीजों का स्वागत किया। इस जीत का असर सर्बिया के बाहर भी दिख सकता है। यूरोप के कई देशों में छात्र शिक्षा, रोजगार के मौके और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन कर चुके हैं। अब स्टूडेंट लिस्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव में मिली जीत को ऐसी सरकार में बदलना है, जो काम कर सके। उसे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और सरकारी संस्थाओं पर लोगों का भरोसा लौटाने के अपने वादे पूरे करने होंगे। —————————– ये खबर भी पढ़ें… ब्राजील में लूला चौथी बार राष्ट्रपति बने: बोल्सोनारो से पहले राउंड में पिछड़ने के बाद जीते; 2022 में इनके पिता को हराया था ब्राजील में 80 साल के लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने चौथी बार राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है। वे पहले दौर की वोटिंग में फ्लावियो बोल्सोनारो से पिछड़ गए थे, लेकिन दूसरे दौर में बाजी पलट दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…