यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, महंगाई, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के हिंसक विरोध में अब तक 1800 लोग गिरफ्तार हुए हैं। स्पेन में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना बढ़ चुका है। बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में भी छात्र शिक्षा पर खर्च बढ़ाने, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। फ्रांस: 140 शहरों में 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और बढ़ती महंगाई के विरोध में 17 अक्टूबर को 140 शहरों में प्रदर्शन हुए। करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इसमें छात्र संगठनों के साथ ट्रेड यूनियन और कर्मचारी भी शामिल थे। पेरिस, मार्सेई और बोर्डो समेत कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। लीमोज में 143 साल पुराने ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई और कई गाड़ियों को जला दिया गया। 18 अक्टूबर तक करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और दमकलकर्मियों के घायल होने की खबर है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की है। सरकार का कहना है कि कुछ हिंसक समूहों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का फायदा उठाया। इटली: स्कूलों की हालत पर 30 अक्टूबर को हड़ताल का ऐलान इटली में छात्र शिक्षा पर कम सरकारी खर्च, जर्जर स्कूलों और पढ़ाई के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जा कर लिया। 16 अक्टूबर को रोम में हजारों छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। उन्होंने शिक्षा मंत्री ग्यूसेपे वाल्दितारा के फैसलों का विरोध किया। इससे पहले हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़प और पथराव की घटनाएं भी हुई थीं। अब छात्र संगठन इस आंदोलन से कर्मचारियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने 30 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। छात्रों की मांग है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए और सस्ते हॉस्टल उपलब्ध कराए जाएं। स्पेन: बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन स्पेन में महंगे घरों और बढ़ते किराए के खिलाफ आंदोलन कई शहरों में फैल गया है। राजधानी मैड्रिड के सोल चौक पर प्रदर्शनकारी कई दिनों से टेंट लगाकर बैठे हैं। सितंबर के आखिर में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को किराया बढ़ने के कारण घर से निकाल दिया गया था। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारी किराए पर नियंत्रण लगाने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और सस्ते सरकारी मकान बनाने की मांग कर रहे हैं। किराएदारों के संगठन और आवास अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मैड्रिड के अलावा दूसरे शहरों में भी रैलियां निकाली गई हैं। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने आवास संकट दूर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है, लेकिन प्रस्तावित उपायों पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच, 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान भी किया गया है। ग्रीस: हॉस्टल की कमी के खिलाफ टेंट लगाकर प्रदर्शन ग्रीस की राजधानी एथेंस में छात्रों ने संसद के सामने टेंट लगाकर प्रदर्शन किया। छात्र हॉस्टल की कमी, महंगे किराए और पढ़ाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। छात्र संगठनों के मुताबिक, देश में बहुत कम छात्रों को हॉस्टल मिल पाते हैं। करीब 96% छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, जबकि पिछले 10 साल में कमरों का किराया तीन गुना हो गया है। कुछ छोटे कमरों का मासिक किराया 600 यूरो तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी किराए की सीमा तय करने, सरकारी हॉस्टल बनाने, स्कॉलरशिप बढ़ाने और यूनिवर्सिटीज का बजट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। बेल्जियम: शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ गुस्सा बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में शिक्षा बजट में कटौती और सुधारों के विरोध में छात्रों ने मार्च निकाला। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और पुलिस पर चीजें फेंकीं। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें आईं। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। सरकार ने हिंसा की निंदा की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी पढ़ाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और यूनिवर्सिटीज की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। हजारों युवा 15 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। सरकारी इमारतों और बैंकों में भी आग लगा दी गई। पांच दिन से चल रहे आंदोलन में 167 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए है। आंदोलन में छात्र संगठनों के अलावा सरकार से नाराज दूसरे लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रामा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने छात्रों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही। उनका कहना है कि हिंसा से अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। पूरी खबर पढ़ें…
Market news : भारतीय बाजारों में आज पॉजिटिव शुरुआत होने की की उम्मीद है। सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार दूसरे हफ्ते बढ़त देखने को मिली है। लगातार 15 सत्रों के बाद FIIs शुद्ध खरीदार बनते दिखे हैं। यहां हम आपके लिए तमाम समाचार प्लेटफॉर्मों पर चल रही आज की ऐसी अहम खबरों की एक सूची जारी कर रहें हैं जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।
मार्केट ओवरव्यू
16 अक्टूबर को भारतीय इक्विटी बाजारों में लगातार दूसरे सत्र में तेजी जारी रही। बाजार को आईटी,मीडिया और मेटल शेयरों में हुई खरीदारी से सपोर्ट मिला। कमजोर ग्लोबल संकेतों के बावजूद,शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स-निफ्टी पर बिकवाली का दबाव दिखा,लेकिन जैसे-जैसे सेशन आगे बढ़ा, इनमें धीरे-धीरे सुधार आया। निफ्टी 23,149.85 के इंट्राडे हाई तक पहुंचा और कारोबारी सत्र के अंत में दिन के हाई के करीब बंद हुआ,जो लगातार बनी हुई खरीदारी की दिलचस्पी का संकेत है।
कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 413.66 अंक या 0.56 प्रतिशत की बढ़त के साथ 74,729.27 पर और निफ्टी 148.80 अंक या 0.65 प्रतिशत की बढ़त के साथ 23,146.15 पर बंद हुआ।
बाजार के लिए मिले-जुले संकेत
निफ्टी की वीकली एक्सपायरी के दिन बाजार के लिए मिले-जुले संकेत हैं। FIIs की करीब 1200 करोड़ रुपये की खरीदारी देखने को मिली है। लेकिन 108 डॉलर के करीब पहुंचकर कच्चा तेल फिक्र बढ़ा रहा है। वहीं शुक्रवार को US INDICES में तेज गिरावट रही। नैस्डैक दो फीसदी से ज्यादा फिसला है, एशिया भी कमजोर दिख रहा है। हालांकि गिफ्ट निफ्टी बिल्कुल फ्लैट है।
ट्रंप के फैसले से राहत, 100% टैरिफ खतरा टला
रूस से तेल खरीदने पर भारत को बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी राष्टपति ट्रंप ने 100% टैरिफ वाला कानून 60 दिनों के लिए टाला है।
अनुमान के करीब HDFC बैंक के नतीजे
HDFC BANK के दूसरी तिमाही के नतीजे अनुमान पर खरे उतरे हैं। बैंक का मुनाफा 5% तो ब्याज से कमाई करीब 10% बढ़ी है। बैंक की असेट क्वॉलिटी में भी सुधार दिखा है। हालांकि तिमाही आधार पर नेट इंटरेस्ट मार्जिन में10 बेसिस प्वाइंट का दबाव दिखा है। हालांकि बैंक के CEO शशिधर जगदीशन ने अगली तिमाही से मार्जिन में सुधार की उम्मीद जताई है।
ICICI बैंक ने पेश किए शानदार नतीजे
ICICI बैंक ने शानदार नतीजे पेश किए हैं। दूसरी तिमाही में बैंक का मुनाफा 20 परसेंट बढ़ा है। NII में भी पौने 18% का उछाल दिखा है। बैंक ने NIM के मामले में भी चौंकाया है। Q2 में मार्जिन 4.18% रहे। मार्जिन इंडस्ट्री में सबसे शानदार रहे हैं। एसेट क्वालिटी भी सुधरी है।
एक्सिस बैंक के Q2 नतीजे रहे अच्छे
एक्सिस बैंक के भी Q2 नतीजे अच्छे रहे हैं। बैंक का दूसरी तिमाही में मुनाफा 38% बढ़ा है। NII 12% बढ़ा है। बैंक की एसेट क्वालिटी में सुधार दिखा है। तिमाही और सालाना आधार पर NIM में हल्की कमजोरी दिखी है।
DLF का मुनाफा बढ़ा, लेकिन मार्जिन पर मार
दूसरी तिमाही में DLF का मुनाफा 10% बढा है। लेकिन रेवेन्यू 23% तो EBITDA 92% घटा है। कंपनी के मार्जिन पर भी तगड़ी मार पड़ी है। वहीं ओबेरॉय रियल्टी का प्रॉफिट फ्लैट रहा। रेवेन्यू में 6% की कमी आई है। लेकिन मार्जिन में सुधार हुआ है।
नतीजों के लिहाज से आज बड़ा दिन
नतीजों के लिहाज से आज बड़ा दिन है। निफ्टी की दो कंपनियों अल्ट्राटेक और बजाज फाइनेंस के नतीजे आएंगे । दूसरी तिमाही में बजाज फाइनेंस का मुनाफा 31 परसेंट बढ़ सकता है । वहीं ब्याज से कमाई यानी NII में 24% का उछाल संभव है। साथ ही HIND ZINC, IREDA, UNION BANK के नतीजों का भी इंतजार रहेगा।
एशियन करेंसी
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एशियाई मुद्राओं में मिला-जुला रुख देखने को मिल रहा है। इनमें इंडोनेशियाई रुपया सबसे ज्यादा 0.49 प्रतिशत गिरा है। फिलीपीन पेसो और ताइवान डॉलर में भी 0.27 प्रतिशत की कमजोरी आई, जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन 0.13 प्रतिशत फिसल गया है। दूसरी ओर जापानी येन में 0.08 प्रतिशत की मजबूती आई है और चीनी रेनमिनबी 0.06 प्रतिशत चढ़ गया है। थाई बाहत और मलेशियाई रिंगित में क्रमशः 0.06 प्रतिशत और 0.03 प्रतिशत की मामूली बढ़त हुई है, जबकि सिंगापुर डॉलर में 0.04 प्रतिशत की गिरावट आई है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली थमी
लगातार 15 कारोबारी सत्रों तक नेट बिकवाली करने के बाद, 16 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) नेट खरीदार (net buyers) बन गए और उन्होंने लगभग 1,166 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। वहीं, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार 45 सत्रों से चली आ रही अपनी खरीदारी का सिलसिला तोड़ दिया और इस सत्र के दौरान 3,661 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
Stock market news : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एशियाई मुद्राओं में मिला-जुला रुख देखने को मिल रहा है। इनमें इंडोनेशियाई रुपया सबसे ज्यादा 0.49 प्रतिशत गिरा है।
Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा सुस्त शुरुआत के संकेत, एशिया, यूएस के बाजार गिरे
देश में सोने की कीमत और नीचे आ गई है। 19 अक्टूबर को महानवमी की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 147800 रुपये प्रति 10 ग्राम पर है। मुंबई में भाव 147650 रुपये प्रति 10 ग्राम है। बीते सप्ताह अलग-अलग शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 3760 रुपये तक फिसली। वहीं 22 कैरेट गोल्ड 3450 रुपये तक सस्ता हुआ।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,165.12 डॉलर प्रति औंस पर है। बीते सप्ताह सोने का वैश्विक भाव 0.7 प्रतिशत कमजोर हुआ। सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं।
देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट
दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 147800 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 135490 रुपये प्रति 10 ग्राम है।
मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 135340 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 147650 रुपये प्रति 10 ग्राम है।
चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 147650 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 135340 रुपये प्रति 10 ग्राम है।
पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 147650 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 135340 रुपये प्रति 10 ग्राम है।
| शहर | 22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹) | 24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹) |
| दिल्ली | 135490 | 147800 |
| मुंबई | 135340 | 147650 |
| अहमदाबाद | 135390 | 147700 |
| चेन्नई | 135340 | 147650 |
| कोलकाता | 135340 | 147650 |
| हैदराबाद | 135340 | 147650 |
| जयपुर | 135490 | 147800 |
| भोपाल | 135390 | 147700 |
| लखनऊ | 135490 | 147800 |
| चंडीगढ़ | 135490 | 147800 |
चांदी की कीमत
दूसरी कीमती धातु चांदी में भी गिरावट दिख रही है। 19 अक्टूबर की सुबह चांदी 229900 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। बीते सप्ताह चांदी का भाव 10000 रुपये नीचे आया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 57.05 डॉलर प्रति औंस है। इस साल जनवरी में देश के अंदर चांदी की कीमत 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी।
Petrol Diesel Price Today: हर दिन की शुरुआत सिर्फ सूरज की किरणों से नहीं होती, बल्कि पेट्रोल और डीजल की नई कीमतों से भी होती है, जो आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालती हैं। सुबह 6 बजे देश की तेल विपणन कंपनियां (OMCs) ताजा दरें जारी करती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर-रुपए की विनिमय दर में आए बदलावों पर आधारित होती हैं। ये बदलाव रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं, चाहे वो ऑफिस जाने वाला व्यक्ति हो या फल-सब्जी बेचने वाला व्यापारी।
ऐसे में हर दिन की कीमतों की जानकारी रखना सिर्फ जरूरी ही नहीं, बल्कि समझदारी भी है। सरकार की यह प्रणाली पारदर्शिता सुनिश्चित करती है ताकि उपभोक्ताओं को किसी तरह की भ्रमित जानकारी न मिले।
आपके शहर में आज का पेट्रोल-डीजल का भाव
ये रहे 19 अक्टूबर 2026 के प्रमुख शहरों के पेट्रोल-डीजल के ताजा रेट
नई दिल्ली: पेट्रोल ₹102.12 प्रति लीटर और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर।
मुंबई: पेट्रोल ₹111.18 और डीजल ₹97.83 प्रति लीटर।
कोलकाता: पेट्रोल ₹113.47 जबकि डीजल ₹99.82 प्रति लीटर।
चेन्नई: पेट्रोल ₹107.77 और डीजल ₹99.55 प्रति लीटर।
गुरुग्राम: पेट्रोल ₹102.77 तथा डीजल ₹95.44 प्रति लीटर।
नोएडा: पेट्रोल ₹102.12 और डीजल ₹95.56 प्रति लीटर।
बेंगलुरु: पेट्रोल ₹110.93 जबकि डीजल ₹98.80 प्रति लीटर।
भुवनेश्वर: पेट्रोल ₹109.92 और डीजल ₹100.92 प्रति लीटर।
चंडीगढ़: पेट्रोल ₹98.10 तथा डीजल ₹86.09 प्रति लीटर।
हैदराबाद: पेट्रोल ₹115.69 और डीजल ₹103.82 प्रति लीटर।
जयपुर: पेट्रोल ₹112.66 जबकि डीजल ₹97.78 प्रति लीटर।
लखनऊ: पेट्रोल ₹102.05 और डीजल ₹95.55 प्रति लीटर।
पटना: पेट्रोल ₹113.35 तथा डीजल ₹99.36 प्रति लीटर।
तिरुवनंतपुरम: पेट्रोल ₹115.49 और डीजल ₹104.40 प्रति लीटर।
पिछले दो साल से स्थिर क्यों हैं कीमतें?
मई 2022 के बाद से केंद्र और कई राज्यों द्वारा टैक्स में कटौती की गई, जिसके बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता देखी जा रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव होता रहता है, फिर भी भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कीमतें तुलनात्मक रूप से स्थिर बनी हुई हैं।
किन कारणों से तय होती हैं ईंधन की कीमतें?
- कच्चे तेल की कीमतें:
पेट्रोल और डीजल का उत्पादन मुख्य रूप से कच्चे तेल से होता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ता है।
- डॉलर के मुकाबले रुपया:
भारत अधिकतर कच्चा तेल आयात करता है, और यह डॉलर में खरीदा जाता है। यदि रुपया कमजोर होता है, तो ईंधन महंगा हो जाता है।
- सरकारी टैक्स और शुल्क:
केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगाती हैं, जो खुदरा मूल्य का बड़ा हिस्सा होते हैं। यही कारण है कि राज्यों में कीमतों में अंतर होता है।
- रिफाइनिंग की लागत:
कच्चे तेल को इस्तेमाल लायक बनाने की प्रक्रिया (रिफाइनिंग) में भी खर्च होता है। ये लागत कच्चे तेल की गुणवत्ता और रिफाइनरी की क्षमता पर निर्भर करती है।
- मांग और आपूर्ति का संतुलन:
बाजार में ईंधन की मांग अगर बढ़ जाती है, तो कीमतें भी ऊपर जाने लगती हैं। खासकर त्योहारों, गर्मी या सर्दी के मौसम में ईंधन की खपत ज्यादा होती है।
कैसे करें अपने शहर की कीमतें SMS से चेक?
अगर आप मोबाइल से ईंधन की कीमत जानना चाहते हैं, तो ये प्रक्रिया आसान है:
Indian Oil ग्राहक: अपने शहर का कोड टाइप करें और उसे “RSP” के साथ 9224992249 पर भेजें।
BPCL ग्राहक: “RSP” लिखकर 9223112222 पर भेजें।
HPCL ग्राहक: “HP Price” लिखकर 9222201122 पर भेजें।
फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पंजाब के संगरूर जिले में रविवार शाम एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। इस हादसे में आठ MGNREGA मजदूरों की जान चली गई। वहीं कई गंभीर रूप से घायल हो गए। ये हादसा लहरागागा इलाके के चोटियां गांव के पास जाखल रोड पर हुआ। इस हादसे के समय करीब 23 महिला और पुरुष मजदूर सड़क किनारे काम कर रहे थे। इसी दौरान तेज रफ्तार से आ रही एक कार अचानक बेकाबू हो गई और मजदूरों की ओर मुड़ गई। इस तेज रफ्तार कार ने काम कर रहे मजदूरों को कुचल दिया। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में पहुंचाया गया।
आठ लोगों की हुई मौत
तेज रफ्तार कार को संभालने से पहले ही वह सड़क किनारे काम कर रहे कई मजदूरों से टकरा गई। इस हादसे में आठ मजदूरों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को तुरंत इलाज के लिए आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। फिलहाल, हादसा किन परिस्थितियों में हुआ और इसमें प्रभावित लोगों से जुड़ी पूरी जानकारी सामने आने का इंतजार है।
कौन चला रहा था कार
इंडिया टूडे के मुताबिक, इस दुर्घटना में शामिल कार शेवरले मैग्नम थी, जिसका नंबर PB11 CP 0080 बताया गया। कार चलाने वाले व्यक्ति की पहचान रायधराना गांव के परगट सिंह काला के रूप में हुई है। घटना के बाद हादसे से जुड़ी जानकारी और राहत व्यवस्था को लेकर चर्चा हो रही है।
तेज रफ्तार कार ने मारी मजदूरों को टक्कर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब के संगरूर जिले में हुए सड़क हादसे में जान गंवाने वाले आठ मजदूरों की पहचान कर्मजीत कौर, जीवन सिंह, निकी, सरबजीत कौर, रणजीत कौर, कर्मजीत, रानी कौर और देस राज के रूप में हुई है। ये सभी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत सड़क पर काम कर रहे थे। इसी दौरान तेज रफ्तार कार ने मजदूरों को टक्कर मार दी, जिससे आठ लोगों की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।
बिहार की सड़कों पर जल्द इलेक्ट्रिक व्हीकल्स का जलवा देखने को मिल सकता है। सरकार ने राज्य में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। इसके लिए पटना सहित पूरे राज्य में चार्जिंग स्टेशंस लगाए जाएंगे। इससे लोगों की दिलचस्पी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के इस्तेमाल में बढ़ेगी।
पहले इन स्थानों पर लगेंगे चार्जिंग स्टेशंस
सबसे पहले सरकारी कार्यालयों, बस डिपो और कमर्शियल कॉम्पलेक्स में चार्जिंग प्वाइंट्स लगाने की तैयारी है। इन जगहों पर इलेक्ट्रिक कार के साथ ही ई-बसों, दोपहिया और तिपहिया इलेक्ट्रिक व्हीकल्स चार्ज किए जा सकेंगे। इसके लिए बिहार सरकार की तरफ से अनुदान की भी व्यवस्था की गई है। चार्जिंग स्टेशनों को उन जगहों पर इंस्टॉल करने का प्लान है, जहां गाड़ियों की आवाजाही ज्यादा होती है। इससे समय की बचत होगी।
पटना के 10 सरकारी परिसरों में चार्जिंग की सुविधा
राजधानी पटना में 10 प्रमुख सरकारी परिसरों में फास्ट डीसी चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की योजना है। प्रस्तावित स्थानों में मुख्य सचिवालय, बिहार विधानसभा, समाहरणालय, विश्वेश्वरैया भवन, विकास भवन, सिंचाई भवन, मल्टी मॉडल हब कंकड़बाग, बेउर मोड़ और हार्डिंग रोड शामिल हैं। ये सभी वैसे स्थान हैं जहां रोजाना काफी गाड़ियों की आवाजाही होती है। नए चार्जिंग स्टेशंस परिवहन विभाग और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) के बीच हुए समझौते के तहत लगाए जाएंगे। इन फास्ट चार्जिंग स्टेशन के जरिए इलेक्ट्रिक कारों को लगभग 45 से 60 मिनट में फुल चार्ज किया जा सकता है। इन चार्जिंग स्टेशनों का उपयोग सिर्फ परिसर के कर्मचारी ही नहीं बल्कि आम लोग भी कर सकते हैं।
इलेक्ट्रिक बसों के लिए भी बनेंगे चार्जिंग स्टेशंस
निजी और छोटे गाड़ियों के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए भी चार्जिंग व्यवस्था को बेहतर बनाने की तैयारी है। इसके लिए 50 बसों की क्षमता वाले डिपो में आठ-आठ चार्जिंग पॉइंट विकसित किए जा रहे हैं। इससे ई-बसों को निर्धारित समय में चार्ज करने और उनके नियमित परिचालन में मदद मिल सकती है। फिलहाल, पटना के फुलवारीशरीफ, राजगीर और मुजफ्फरपुर के बस डिपो में चार्जिंग स्टेशन कार्य कर रहे हैं। शहर में चलने वाली इलेक्ट्रिक बसें यहीं से चार्ज होती हैं। इसके अलावा, पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और गया में भी निर्माण कार्य चल रहा है। पूर्णिया में भी निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।
डेढ़ घंटे में चार्ज हो जाएगी ई-बस की बैटरी
एक ई-बस को चार्ज करने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगेगा। सार्वजनिक परिवहन के लिए यह व्यवस्था इसलिए जरूरी है, क्योंकि बसों का संचालन तय समय-सारिणी के अनुसार होता है। पर्याप्त चार्जिंग पॉइंट उपलब्ध रहने से वाहनों को दोबारा सेवा में लगाने की प्रक्रिया व्यवस्थित बनी रहेगी।
निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने पर फोकस
चार्जिंग नेटवर्क को केवल सरकारी परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर है। इसके लिए बिहार ईवी नीति 2026 के तहत सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने वाले पात्र संस्थानों को मशीनरी और उपकरणों की लागत का 25 प्रतिशत या अधिकतम 10 लाख रुपये तक अनुदान दिए जाने का प्रावधान है। इस व्यवस्था के दायरे में सरकारी भवन, व्यावसायिक परिसर, होटल, अस्पताल, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, आवासीय अपार्टमेंट, हाउसिंग सोसायटी, पेट्रोल पंप, हाईवे के ढाबे-रेस्टोरेंट, बस स्टैंड और पार्किंग स्थल आएंगे।
(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)
Ranchi to Patna Four Lane Highway: झारखंड की राजधानी रांची से पटना के लिए ₹5,000 करोड़ की लागत से फोरलेन बनकर तैयार हो रहा है। अगले साल दिसंबर 2027 तक यह काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। PWD विभाग के सचिव सुनील कुमार बताते हैं कि काम में काफी तेजी है और धरातल पर भी आपको काफी कुछ देखने को मिल रहा होगा।
आगे बताते हैं कि अगले साल के अंत तक हम इसके उद्घाटन की योजना बना रहे हैं। यह सड़क बनने से कोडरमा, झुमरी तिलैया, रजरप्पा जैसी जगह जाना भी बेहद आसान हो जाएगा। यह परियोजना करीबन 323 किलोमीटर लंबी है। इससे न सिर्फ इकोनॉमिक कनेक्टिविटी मजबूत होगी, बल्कि यात्रा काफी सुगम व सुरक्षित रहेगी।
हजारीबाग व अन्य शहर जाना होगा आसान
इस परियोजना से खासतौर पर रांची से हजारीबाग जाना बेहद आसान हो जाएगा। बता दें कि रांची से हजारीबाग के बीच पहले ही फोरलेन बन चुका है। हजारीबाग के बरही से कोडरमा के फोरलेन का अंतिम चरण का काम मंजूरी के इंतजार में लटका हुआ था। चूंकि केंद्र से मंजूरी मिल चुकी है, तो काम में काफी तेजी देखने को मिलेगी।
साथ ही, बिहार में रजौली से बख्तियारपुर तक फोरलेन प्रस्तावित है, जबकि बख्तियारपुर से पटना के बीच फोरलेन बना हुआ है। बीच के फोरलेन बनने से रांची और पटना के बीच यात्रियों को काफी आराम मिलेगा, बल्कि टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा। अब आप कुछ घंटे में तिलैया डैम जा सकते हैं व रांची से रजरप्पा मंदिर मात्र 1.5 घंटे में पहुंच सकते हैं।
आसपास की जमीन का रेट हुआ हाई
सचिव सुनील कुमार बताते हैं कि सड़क बनने से सिर्फ आवागमन ही सुगम नहीं होगा, बल्कि आसपास की जमीन का रेट ही चार गुना अधिक देखने को मिल रहा है। यानी कि आर्थिक रूप से वहां के आसपास के लोग सशक्त हो रहे हैं। यह ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट होगा। सड़क के दोनों ओर आपको अच्छी-खासी हरियाली और ग्रीन पैच भी देखने को मिलेंगे।
रिपोर्ट- शिखा श्रेया
Where EPFO invests PF money: नौकरीपेशा लोगों की सैलरी से हर महीने प्रोविडेंट फंड (PF) के नाम पर जो कटौती होती है, उसे हम भविष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार मानते हैं। जितनी रकम आपकी सैलरी से कटती है, उतना ही योगदान आपकी कंपनी भी आपके खाते में जमा करती है।
लेकिन क्या कभी आपने यह जानने की कोशिश की है कि आपकी तिजोरी में जमा होने वाले करोड़ों-अरबों रुपये आखिर कहां जाते हैं? क्या यह पैसा किसी बैंक में रखा रहता है या कहीं और निवेश होता है? कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) आपके इस पैसे को सुरक्षित रखने और उस पर शानदार रिटर्न (जैसे हालिया 8.25% ब्याज) देने के लिए क्या रणनीति अपनाता है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
EPFO आपके पैसे का क्या करता है?
EPFO कोई साधारण बैंक नहीं है, बल्कि भारत के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन काम करने वाला एक बड़ा वैधानिक निकाय है। कर्मचारियों के इस विशाल फंड के प्रबंधन की जिम्मेदारी सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) के पास होती है। बोर्ड के तय नियमों और सुरक्षा मानकों के तहत इस पैसे को देश के अलग-अलग वित्तीय और सरकारी साधनों में निवेश किया जाता है। इस निवेश से होने वाली कमाई से ही आपके पीएफ खाते में हर साल ब्याज का पैसा भेजा जाता है।
कहां-कहां होता है पीएफ का निवेश?
सरकार के तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक, ईपीएफओ निवेशकों के पैसे की सुरक्षा और बेहतर रिटर्न के बीच संतुलन बनाने के लिए फंड को दो मुख्य हिस्सों में बांटता है:
- सुरक्षित डेट इंस्ट्रूमेंट्स: लगभग 85% तक
- इक्विटी यानी शेयर बाजार (Equity – ETFs): 15% तक
| पोर्टफोलियो श्रेणी | संभावित आवंटन % | मुख्य साधन |
| सरकारी प्रतिभूतियां (G-Secs) | 45% – 65% | केंद्र सरकार के बॉन्ड्स, स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDLs) |
| कॉरपोरेट बॉन्ड्स व डेट | 20% – 45% | PSUs, सरकारी वित्तीय संस्थानों व सुरक्षित कॉरपोरेट बॉन्ड्स |
| इक्विटी (शेयर बाजार) | 5% – 15% | केवल इंडेक्स आधारित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs – Nifty 50, Sensex) |
| शॉर्ट-टर्म डेट/मनी मार्केट | 0% – 5% | लिक्विडिटी और तात्कालिक नकदी प्रबंधन के लिए ट्राइ-पार्टी रेपो (TREPS) |
85% पैसा जाता है पूरी तरह सुरक्षित सरकारी डेट में
ईपीएफओ अपने पास आने वाले कुल फंड का करीब 85 हिस्सा ऐसी जगहों पर लगाता है जहां डूबने का जोखिम न के बराबर होता है:
सरकारी बॉन्ड्स और स्टेट डेवलपमेंट लोन: ईपीएफओ का एक बहुत बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों की विकास योजनाओं के बॉन्ड्स में लगा होता है। इससे देश का बुनियादी ढांचा (सड़कें, बिजली, रेलवे) मजबूत होता है और पीएफ के लिए तयशुदा रिटर्न सुनिश्चित होता है।
PSU के कॉरपोरेट बॉन्ड्स: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और अन्य महारत्न कंपनियों के सुरक्षित डेट सिक्योरिटीज में भी यह पैसा निवेश किया जाता है।
15% हिस्सा शेयर बाजार में: क्या आपका पैसा जोखिम में है?
साल 2015 से पहले ईपीएफओ शेयर बाजार में निवेश नहीं करता था। लेकिन कम ब्याज दरों की चुनौती से निपटने और रिटर्न बढ़ाने के लिए सरकार ने अगस्त 2015 से इक्विटी में 5% से 15% तक निवेश करने की अनुमति दी।
सीधे शेयरों की खरीद नहीं: ईपीएफओ कभी भी किसी कंपनी विशेष के शेयर सीधे बाजार से नहीं खरीदता।
केवल इंडेक्स ETFs का सहारा: यह निवेश केवल BSE Sensex और NSE Nifty-50 जैसे शीर्ष सूचकांकों को ट्रैक करने वाले ETFs के जरिए किया जाता है, जिससे जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है।
ईपीएफओ कैसे तय करता है आपका सालाना ब्याज?
वित्तीय वर्ष के दौरान डेट बॉन्ड्स से मिलने वाला तय ब्याज और इक्विटी (ETFs) की बिक्री से हुआ मुनाफा जोड़ा जाता है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) सभी आंकड़ों का विश्लेषण कर ब्याज दर का प्रस्ताव तैयार करता है। वित्त मंत्रालय की मुहर लगने के बाद तय ब्याज दर कर्मचारियों के पीएफ खातों में क्रेडिट कर दी जाती है।

