चीन ने टनल बोरिंग मशीनों के एक्सपोर्ट पर लगाया बैन, क्या ये भारत के मेट्रो और टनल प्रोजेक्ट्स को झटका देने की चाल?

भारत में मेट्रो, हाई-स्पीड रेल और सुरंगों के निर्माण पर चीन के एक नए फैसले का असर पड़ सकता है। चीन ने टनल बोरिंग मशीन (TBM) समेत कुछ अहम मशीनों के निर्यात पर नए प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। इन मशीनों का इस्तेमाल जमीन के नीचे सुरंग बनाने में होता है। ऐसे में चीन के इस कदम से भारत की कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

चीन के वाणिज्य मंत्रालय (MOFCOM) ने कहा कि ये प्रतिबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए लगाए गए हैं। निर्यात पर ये पाबंदियां 18 नवंबर से लागू होंगी।

TBM के प्रतिबंध से भारत की कई परियोजनाओं पर पड़ेगा असर

टनल बोरिंग मशीनों (TBM) और उनसे जुड़ी चीजों के निर्यात पर लगी इन पाबंदियों से भारत की कई परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। इनमें अंडरग्राउंड मेट्रो सिस्टम, हाई-स्पीड रेल लाइनें और सीमावर्ती इलाकों सहित कई जगहों पर बन रही सुरंगें शामिल हैं।

गौरतलब है कि चीन पहले भी भारत को TBM के निर्यात पर पाबंदियां लगाता रहा है। साल 2024 में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी के वाइस चांसलर रॉबर्ट हाबेक के सामने यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने बताया था कि चीन एक जर्मन कंपनी को वहां निर्मित टनल बोरिंग मशीनें भारत निर्यात करने नहीं दे रहा है।

वाणिज्य मंत्रालय की घोषणा के अनुसार, चीन के नए प्रतिबंधों में ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ (चलने वाले उत्खनन यंत्र) और ‘प्लेट्यू-टाइप वेट शॉटक्रिट मशीनें’ भी शामिल हैं।

क्या है ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ मशीन?

बता दें कि ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ एक ऐसी मशीन है जिसे हर तरह के भू-भाग पर चलने के लिए डिजाइन किया गया है। यह अपने वर्किंग अटैचमेंट, आउट्रिगर या पहियों की मिली-जुली गतिविधियों का इस्तेमाल करके कठिन इलाकों में भी खुदाई का काम कर सकती है।

‘प्लेट्यू-टाइप वेट शॉटक्रिट मशीन’ का इस्तेमाल ऊंचे पठारी इलाकों में किया जाता है। यह सीमेंट और दूसरी निर्माण सामग्री को नोजल तक पहुंचाती है। इसके बाद हवा और एक खास केमिकल की मदद से इस मिश्रण को तेज दबाव के साथ किसी सतह पर छिड़का जाता है। इसका इस्तेमाल निर्माण कार्यों में सतह को मजबूत बनाने के लिए किया जाता है।

घोषणा के मुताबिक, इन नए उपायों के तहत ड्रेजर (तलछट हटाने वाली मशीन) से जुड़ी कुछ वस्तुओं के निर्यात नियंत्रण को भी बेहतर बनाया गया है। इनमें स्लरी पंप, ड्रैगहेड और कटरहेड जैसी चीजें शामिल हैं, जो तय तकनीकी मानकों को पूरा करती हैं।

AI से सोलर पावर तक, 14 तकनीकों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में चीन

वहीं शुक्रवार को, MOFCOM ने एक ड्राफ्ट प्लान जारी किया, जिसमें 14 तरह की तकनीकों पर नए निर्यात प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इन तकनीकों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोटेक्नोलॉजी से लेकर फोटोवोल्टिक सोलर पावर तक के क्षेत्र शामिल हैं।

इन प्रस्तावित प्रतिबंधों का वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा पर बड़ा असर पड़ सकता है, खासकर उन देशों के लिए जो चीनी AI पर निर्भर हैं।

सोमवार को जारी घोषणा के मुताबिक, इन प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले सामान का निर्यात करने वाली कंपनियों को चीन के वाणिज्य मंत्रालय से लाइसेंस लेना होगा। इसके लिए उन्हें चीन के निर्यात नियंत्रण कानून और दोहरे इस्तेमाल वाली वस्तुओं से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।

घोषणा में यह भी कहा गया है कि निर्यातकों को प्रतिबंधित सामान की सही पहचान करनी होगी और सीमा शुल्क से जुड़े दस्तावेजों में उसकी पूरी जानकारी देनी होगी। साथ ही, हर सामान के लिए तय दोहरे इस्तेमाल वाले निर्यात नियंत्रण कोड का उल्लेख करना भी जरूरी होगा।

सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जिन वस्तुओं पर निर्यात नियंत्रण लागू नहीं है, लेकिन जिनकी तकनीकी विशेषताएं या प्रदर्शन समान हैं, उनके मामले में निर्यातकों को अपने दावों को साबित करने के लिए विस्तृत तकनीकी पैरामीटर देने होंगे।

अगर सीमा शुल्क अधिकारियों को दी गई जानकारी की सटीकता, उसके पूरा होने या उसकी असलियत पर शक होता है, तो वे उसकी दोबारा जांच कर सकते हैं। MOFCOM की घोषणा के अनुसार, जांच पूरी होने तक संबंधित सामान की खेप को आगे भेजने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

ये निर्यात नियंत्रण उन ड्रेजर स्लरी पंपों पर लागू होंगे, जिनका इनलेट व्यास कम से कम 0.55 मीटर है और जिनकी अधिकतम रोटेशनल स्पीड 400 चक्कर प्रति मिनट (rpm) से अधिक नहीं है।

क्या होते हैं ड्रेजर स्लरी पंप?

बता दें कि ड्रेजर स्लरी पंप भारी-भरकम सेंट्रीफ्यूगल पंप होते हैं। इन्हें नदियों, झीलों, बंदरगाहों और महासागरों की तलहटी से पानी और ठोस पदार्थों (जैसे रेत, बजरी, गाद, मिट्टी और खदान के अवशेष) के सघन मिश्रण को खींचने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है।

ऐसे पंपों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए मुख्य पुर्जे भी निर्यात नियंत्रण के दायरे में आएंगे। इनमें कम से कम 1.3 मीटर के आंतरिक व्यास वाले पंप केसिंग और कम से कम 1.3 मीटर व्यास वाले इम्पेलर शामिल हैं।

घोषणा के अनुसार, इन नियंत्रणों में ‘ट्रेलिंग सक्शन हॉपर ड्रेजर’ (TSHD) में इस्तेमाल होने वाले ड्रैगहेड (जिनके सक्शन पाइप का व्यास कम से कम 0.55 मीटर है) और ‘कटर सक्शन ड्रेजर’ (CSD) में इस्तेमाल होने वाले कटरहेड (जिनके बाहरी कटर रिंग का व्यास कम से कम 2.1 मीटर है) भी शामिल हैं।

TSHD और CSD पानी के नीचे जमा तलछट (sediments) को निकालने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले दो प्रमुख प्रकार के समुद्री जहाज हैं। हालांकि, ये पूरी तरह से अलग-अलग तंत्रों (mechanisms) पर काम करते हैं और अलग-अलग वातावरण के लिए उपयुक्त होते हैं।

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नेपाल 4 झीलों का जलस्तर घटाएगा:भारत में भी बाढ़ का खतरा कम होगा; अगस्त में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ जैसी तबाही रोकने की तैयारी

नेपाल अगस्त में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ जैसी तबाही रोकने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए चार ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों का जलस्तर घटाया जाएगा। इससे नेपाल के साथ भारत में भी बाढ़ का खतरा कम होने की उम्मीद है। इस प्रोजेक्ट पर 474 करोड़ रुपए खर्च होंगे और इसे 2033 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इन झीलों से बिहार में बाढ़ का खतरा बना रहता है नेपाल सरकार ने इस काम के लिए मनांग जिले की थुलागी, संखुवासभा की लोअर वरुण और होंगु-2 के साथ सोलुखुम्बु की लुम्दिंग झील को चुना है। ये झीलें समुद्र तल से 4050 से 5483 मीटर की ऊंचाई पर हैं। योजना के तहत होंगु-2 झील का जलस्तर एक मीटर घटाया जाएगा। वहीं, थुलागी, लोअर वरुण और लुम्दिंग झीलों का जलस्तर तीन-तीन मीटर कम किया जाएगा। इनमें से तीन झीलों का पानी कोशी नदी और गंडकी नदी में पहुंचता है। ये दोनों नदियां बिहार से होकर गुजरती हैं। इसलिए इस योजना से बिहार की बस्तियों, खेती और सड़कों समेत जरूरी सुविधाओं को भी बाढ़ से बचाने में मदद मिल सकती है। झीलों का जलस्तर कैसे कम किया जाएगा? डॉ. भट्टराई के मुताबिक, लगातार काम करने का मौका मिले तो तीन साल में झीलों का जलस्तर घटाया जा सकता है। लेकिन ये झीलें ऊंचाई वाले इलाकों में हैं, जहां खराब मौसम के कारण साल में केवल 5 से 6 महीने ही काम हो सकता है। इसी वजह से प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 2033 तक का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने बताया कि इस योजना से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होगा। हालांकि, इन चार झीलों के फटने पर सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। इसलिए इन्हें प्राथमिकता दी गई है। भारत, नेपाल और चीन की 47 झीलों से खतरा अगस्त में नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने हिमालयी इलाकों में ग्लेशियर से बनी झीलों से होने वाले खतरे को फिर सामने ला दिया था। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत, नेपाल और चीन की 47 हिमनद झीलों को ज्यादा खतरे वाला बताया गया था। इनमें नेपाल की 21, चीन की 25 और भारत की एक झील शामिल है। इनमें से 42 झीलों का पानी कोशी नदी में पहुंचता है। इनमें 24 झीलें चीन और 18 नेपाल में हैं। कोशी नदी नेपाल से भारत के बिहार में आती है, इसलिए इन झीलों के फटने से दोनों देशों में बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। इस प्रोजेक्ट के लिए ग्रीन क्लाइमेट फंड ₹343 करोड़ देगा चारों झीलों का जलस्तर घटाने की परियोजना पर कुल 474 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसमें सबसे ज्यादा 343 करोड़ रुपए ग्रीन क्लाइमेट फंड देगा। यह संयुक्त राष्ट्र के जलवायु समझौते के तहत बना अंतरराष्ट्रीय कोष है। नेपाल सरकार 107 करोड़ और UNDP 20 करोड़ रुपए देगा। इसके अलावा निजी क्षेत्र से भी 3 करोड़ रुपए मिलेंगे। इस प्रोजेक्ट से नेपाल में 38 लाख से ज्यादा लोगों को फायदा मिलने का अनुमान है। इससे बाढ़ के कारण होने वाले संभावित आर्थिक नुकसान में भी 212 करोड़ रुपए तक की कमी आ सकती है। ————————- यह खबर भी पढ़ें… नेपाल की बूढ़ी गंडकी नदी में बाढ़: कई पुल-घर बहे, 10 लापता; लैंडस्लाइड से स्यारी नदी का रास्ता बंद, बिहार में भी खतरा नेपाल के गोरखा जिले में रविवार सुबह बूढ़ी गंडकी नदी में अचानक बाढ़ आने से कई गांवों को नुकसान पहुंचा है। बाढ़ में करीब 35 घर और 6 पुल बह गए, जबकि कम से कम 10 लोग लापता हैं। उनकी तलाश की जा रही है। पूरी खबर पढ़ें…

मणिपुर में चार लोगों की हत्या

इम्फाल। हिंसा प्रभावित मणिपुर में सोमवार को एक बार फिर कई बड़ी वारदातें हुई हैं। दो अलग अलग घटनाओ में चार लोगों की हत्या कर दी गई है। इन घटनाओं से नाराज स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री आवास के सामने शव रख कर प्रदर्शन किया। असल में रविवार की रात को थौबल जिले में दो समुदायों के बीच झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इसके अलावा सोमवार की सुबह जंगल से लकड़ी लेने गए तीन लोगों की उग्रवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

हिंसा की इन घटनाओं से आक्रोशित स्थानीय लोगों ने राजधानी इम्फाल में मुख्यमंत्री आवास के बाहर शव रखकर प्रदर्शन किया। बहरहाल, थौबल के अलावा दूसरी घटना इम्फाल ईस्ट और कांगपोकपी जिलों की सीमा पर हुई। अधिकारियों के मुताबिक, गोलीबारी में चार लोग घायल हुए हैं और तीन लोग अब भी लापता हैं। घटना कांगपोकपी के खोंगबाल सुनुरोक उयोक में हुई। उग्रवादी की हिंसा में मारे गए तीनों लोगों की पहचान कर ली गई है।

अधिकारियों के मुताबिक, वे लकड़ी लेने गए समूह में शामिल थे। इसी दौरान संदिग्ध उग्रवादियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया। घटना में घायल लोगों में से एक की हालत गंभीर है। घटना से नाराज स्थानीय लोग शवों को राज्य की राजधानी इम्फाल ले आए। उन्होंने बाबूपारा स्थित मुख्यमंत्री आवास के मुख्य गेट के बाहर शव रख दिए। प्रदर्शन के दौरान मुख्यमंत्री वाई खेमचंद सिंह आवास पर मौजूद थे या नहीं, यह तुरंत पता नहीं चल सका। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के कई गोले छोड़े। इसके बाद शवों को जवाहरलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ले जाया गया।

हूती-विद्रोहियों के हमले में यमन के 53 सैनिकों की मौत:मिलिट्री कैंप पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया; 200 से ज्यादा घायल

हूती विद्रोहियों ने यमन के दक्षिणी प्रांत शबवा में सेना के एक मिलिट्री कैंप पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है। सोमवार को हुए इस हमले में 53 सैनिकों की मौत हो गई, जबकि 200 से ज्यादा घायल हुए हैं। यमन के सैन्य अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी AP को यह जानकारी दी। सेना के प्रवक्ता कर्नल माजिद अल-नजिली ने बताया कि हूती विद्रोहियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के ट्रेनिंग सेंटर पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूती विद्रोहियों ने अदन शहर में राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं। हमले के वक्त प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, हालांकि सभी सुरक्षित बच गए। हमले में 4 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 2 सुरक्षाकर्मी शामिल थे। सऊदी अरब के हवाई हमले में 9 लोगों की मौत हूती प्रशासन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, रविवार को यमन के उत्तरी प्रांत सादा में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हवाई हमले में कम से कम 9 लोगों की मौत हुई। इनमें 5 बच्चे और 2 महिलाएं शामिल हैं। हूती विद्रोहियों ने दावा किया कि सप्ताहांत में हुए कई हमलों में 30 से ज्यादा लोग मारे गए या घायल हुए। सऊदी अरब ने इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। हूती विद्रोहियों ने हाल के हफ्तों में सऊदी अरब पर भी हमले तेज किए हैं। वे यमन के गृहयुद्ध में सरकार का समर्थन करने के कारण सऊदी अरब को निशाना बना रहे हैं। विद्रोहियों ने सऊदी हवाई अड्डों, तेल और सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। इन हमलों से हजारों उड़ानें प्रभावित हुई हैं और 19 लोगों की मौत हुई है। सऊदी तेल कंपनी अरामको के मुख्यालय पर भी हमला किया गया है। सऊदी अरब के समर्थन से लड़ रही यमन की सरकार यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। सऊदी हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सरकारी सेनाओं को हवाई मदद देता है। वहीं, ईरान पर हूती विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।

Tiger Shroff Firing Case में मुंबई पुलिस का बड़ा खुलासा, प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा

Tiger Shroff Firing Case में मुंबई पुलिस का बड़ा खुलासा, प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा

Tiger Shroff Firing Case

बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर मुंबई के जुहू इलाके में हुई फायरिंग के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। राजस्थान के कोटा रेलवे स्टेशन से तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच इस मामले की जांच कर रही है।

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पुलिस के मुताबिक वारदात के बाद आरोपी नेपाल भागने की फिराक में थे। हालांकि, आरोपियों की उम्र को लेकर सामने आई जानकारी में बाद में बदलाव हुआ है। मुंबई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपी नाबालिग नहीं हैं।

 

यह घटना 18 अक्टूबर 2026 की शाम को हुई थी। टाइगर श्रॉफ एक फुटबॉल ग्राउंड से निकल रहे थे, तभी बाइक सवार तीन लोग वहां पहुंचे। इनमें से दो लोगों ने अभिनेता की कार पर कथित तौर पर गोलीबारी की और इसके बाद मौके से फरार हो गए। घटना में टाइगर श्रॉफ सुरक्षित बच गए। शुरुआती रिपोर्टों में उनके ड्राइवर और एक ऑटो रिक्शा चालक के घायल होने की जानकारी भी सामने आई थी।

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कोटा रेलवे स्टेशन से पकड़े गए तीन आरोपी

 

मुंबई पुलिस और राजस्थान पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए कोटा रेलवे स्टेशन से तीन संदिग्धों को पकड़ा। इस ऑपरेशन में राजस्थान पुलिस के साथ एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) ने भी सहयोग किया।

 

पुलिस के अनुसार, आरोपियों को पकड़ने के लिए कई विशेष टीमें गठित की गई थीं। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, तकनीकी विश्लेषण और जमीनी स्तर पर की गई पड़ताल की मदद ली। जांच में आरोपियों की गतिविधियों का पता अंधेरी वेस्ट रेलवे स्टेशन से लेकर मुंबई के उत्तरी हिस्से और फिर सूरत तक लगाया गया। इसके बाद उनके पुणे-जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन में सवार होने की जानकारी मिली। आगे की कार्रवाई में कोटा पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।

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कौन हैं पकड़े गए आरोपी?

 

शुरुआती जानकारी में तीन संदिग्धों में से एक की उम्र 17 साल बताई गई थी। वहीं, अन्य दो की पहचान बिहार के बेगूसराय निवासी 22 वर्षीय ऋतिक कुमार उर्फ रोशन और हरियाणा के सोनीपत निवासी 18 वर्षीय रेहान के रूप में बताई गई। हालांकि, मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बाद में स्पष्ट किया कि इस मामले में पकड़े गए तीनों आरोपी नाबालिग नहीं हैं। पुलिस के मुताबिक, एक आरोपी की उम्र 18 साल और बाकी दो की उम्र 22 साल है। इस तरह आरोपियों की उम्र को लेकर शुरुआती रिपोर्टों और पुलिस के बाद के बयान में अंतर सामने आया है।

 

नेपाल भागने की फिराक में थे आरोपी

 

मुंबई पुलिस ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि फायरिंग के बाद आरोपी नेपाल भागने की योजना बना रहे थे। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि वारदात के पीछे किसका हाथ था और आरोपियों को किसी अन्य व्यक्ति या गिरोह से निर्देश मिले थे या नहीं। मुंबई पुलिस ने कहा कि आरोपियों को मुंबई लाने की प्रक्रिया जारी है। इस कार्रवाई में दिल्ली, गुजरात और राजस्थान पुलिस भी सहयोग कर रही हैं।

 

जांच के लिए बनाई गईं करीब 20 विशेष टीमें

 

मुंबई पुलिस के डीसीपी राज तिलक रौशन के मुताबिक, रविवार शाम करीब सात बजे बाइक पर तीन लोग आए थे। इनमें से दो ने टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी की और इसके बाद फरार हो गए। घटना की गंभीरता को देखते हुए मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आरोपियों का पता लगाने के लिए करीब 20 विशेष टीमें बनाई थीं।

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, तकनीकी जानकारी और स्थानीय स्तर पर जुटाए गए सुरागों की मदद से उनकी आवाजाही का पता लगाया। पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट से संबंधित धाराएं लगाई हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ अन्य गिरफ्तारियां होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है।

 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिया कार्रवाई का भरोसा

 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने टाइगर श्रॉफ से बात कर मामले में उचित कार्रवाई का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को ढूंढ निकाला जाएगा और इस तरह की वारदातों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फडणवीस के मुताबिक, आरोपियों के महाराष्ट्र के बाहर से, संभवतः विदेश से, काम करने की आशंका की भी जांच की जा रही है। इसके लिए अन्य राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय किया जाएगा।

 

अब आगे क्या करेगी पुलिस?

 

फिलहाल पुलिस आरोपियों को मुंबई लाने, फायरिंग के पीछे की वजह का पता लगाने और संभावित साजिश की जांच में जुटी है। जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि वारदात में इस्तेमाल की गई बाइक और हथियार कहां से आए तथा आरोपियों को किसने मदद पहुंचाई। पुलिस की जांच पूरी होने और आधिकारिक तौर पर अधिक जानकारी सामने आने के बाद मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।

Aayush Wellness ने लॉन्च की कैल्शियम-विटामिन टैबलेट, 16 अरब डॉलर के बाजार में एंट्री

हेल्थकेयर सेक्टर की Aayush Wellness Limited ने कैल्शियम और विटामिन सप्लीमेंट लॉन्च किया है। कंपनी ने इसका नाम Aayush Calcium Vitamin Tablets रखा है। इसके साथ ही कंपनी ने बोन और जॉइंट हेल्थ यानी हड्डियों और जोड़ों की सेहत से जुड़े बाजार में कदम रखा है।

कंपनी के मुताबिक, यह बाजार 16.3 अरब डॉलर का है। वहीं, ग्लोबल डाइटरी सप्लीमेंट्स बाजार में कंपनी की मौजूदगी पहले से है, जिसे वह अब और मजबूत करना चाहती है।

टैबलेट में क्या-क्या है?

कंपनी के मुताबिक, इस टैबलेट में पांच पोषक तत्व शामिल हैं। इनमें कैल्शियम साइट्रेट, विटामिन D2, मैग्नीशियम, जिंक और फोलिक एसिड शामिल हैं। इन सभी का शरीर में अलग-अलग काम है।

कैल्शियम साइट्रेट शरीर को कैल्शियम देता है। यह हड्डियों और दांतों को मजबूत रखने के लिए जरूरी है। वहीं, विटामिन D2 शरीर को कैल्शियम सोखने में मदद करता है। यानी शरीर को कैल्शियम का पूरा फायदा मिले, इसके लिए विटामिन D भी जरूरी है।

इसके अलावा, टैबलेट में मैग्नीशियम और जिंक भी हैं। मैग्नीशियम मांसपेशियों के सही कामकाज में मदद करता है। वहीं, जिंक शरीर की कोशिकाओं और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। इसमें फोलिक एसिड भी मिलाया गया है, जो नई कोशिकाएं बनाने और लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भूमिका निभाता है।

कंपनी का कहना है कि इस फॉर्मूलेशन का मकसद शरीर में पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में मदद करना है। इससे हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों के सामान्य कामकाज को सहारा मिल सकता है।

कंपनी ने क्या कहा?

Aayush Wellness Limited के निदेशक काशीराम जाधव ने कहा कि भारत में कैल्शियम और विटामिन की कमी एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है। इसी जरूरत को देखते हुए कंपनी ने इस बाजार में कदम रखा है।

उन्होंने कहा कि यह लॉन्च निवारक स्वास्थ्य सेवा और पोषण से जुड़े उत्पादों पर कंपनी के फोकस का हिस्सा है। लोगों में अपनी सेहत और खानपान को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कंपनी को उम्मीद है कि इससे इस तरह के उत्पादों की मांग बढ़ सकती है।

भारत में कैल्शियम और विटामिन D की कमी पर फोकस

कंपनी के मुताबिक, भारत में विटामिन D की कमी काफी आम है। कंपनी का दावा है कि यह कमी आबादी के 80-90% लोगों तक को प्रभावित कर सकती है। वहीं, 50% से ज्यादा वयस्कों को पर्याप्त कैल्शियम नहीं मिल पाता।

विटामिन D की कमी होने पर शरीर कैल्शियम को ठीक से सोख नहीं पाता। इससे हड्डियों की सेहत प्रभावित हो सकती है। कैल्शियम और विटामिन D की कमी का असर मांसपेशियों पर भी पड़ सकता है।

इसी जरूरत को देखते हुए Aayush Wellness अपने न्यूट्रास्यूटिकल पोर्टफोलियो का विस्तार कर रही है। कंपनी का लक्ष्य रोजमर्रा की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने वाले और उत्पाद बाजार में उतारना है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Climate impact Alert: जलवायु परिवर्तन की मार से गेहूं में होगा बड़ा बदलाव! रोटी की गुणवत्ता पर मंडराया खतरा; सेहत पर भी पड़ सकता है असर

Climate impact ON wheat: जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी थाली तक पहुंच सकता है। जी हां, जिस गेहूं से हर दिन करोड़ों लोगों की रोटी बनती है, उसकी पोषण संबंधी गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना भविष्य में बदल सकती है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी में सामने आया है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे और ब्रेड की क्वालिटी पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्टडी में खुलासा हुआ है कि वातावरण में बढ़ती CO₂ गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है। इसका असर बेकिंग गुणवत्ता पर पड़ने के संकेत मिले हैं। जर्मनी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल फूड केमिस्ट्री (Food Chemistry) में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गेहूं की खेती पर विचार करते समय केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। अनाज की गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रोटीन के प्रकारों को भी समझना जरूरी है।

हवा में बढ़ती CO₂ से गेहूं पर कितना असर?

स्टडी के अनुसार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1980 में इसका स्तर लगभग 340 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 ppm तक पहुंच गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह स्तर 600 ppm तक जा सकता है। गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। ऐसे में वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बीच इसकी खेती और अनाज की क्वालिटी में होने वाले बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गेहूं की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग किया।

10 किस्मों पर हुआ प्रयोग, सामने आए चौंकाने वाले बदलाव

शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 खेती की किस्मों को वास्तविक कृषि और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सामान्य परिस्थितियों में मौजूद CO₂ के स्तर पर रखा गया। जबकि अन्य पौधों को 546 ppm की बढ़ी हुई CO₂ में उगाया गया। फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने गेहूं के दानों में मौजूद प्रोटीन का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

स्टडी में विशेष रूप से ग्लूटेन प्रोटीन, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs), प्यूरोइंडोलिन और सीलिएक रोग से संबंधित कुछ पेप्टाइड्स पर ध्यान दिया गया। नतीजों से पता चला कि CO₂ कॉन्सेंट्रेशन का स्तर बढ़ने पर गेहूं के अलग-अलग प्रोटीन समूहों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ प्रोटीन बढ़े। जबकि कुछ की मात्रा घट गई। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन गेहूं की प्रोटीन संरचना को प्रभावित कर सकता है।

बढ़ेगा एक तरह का प्रोटीन, घट सकता है ग्लूटेन

इस स्टडी में पाया गया कि बढ़ी हुई CO₂ कॉन्सेंट्रेशन में गेहूं के दानों में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs) की मात्रा बढ़ गई। दूसरी ओर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग से एक्टिव हो सकने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में कमी देखी गई। ATIs ऐसे प्रोटीन हैं जिनकी संभावित हेल्थ संबंधी भूमिका पर वैज्ञानिक अध्यन करते रहे हैं। इनकी मात्रा बढ़ने का असर मानव स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस स्टडी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़ी हुई CO₂ में उगा गेहूं सीधे तौर पर लोगों को बीमार कर देगा। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्लूटेन प्रोटीन की मात्रा घटने के साथ गेहूं की बेकिंग गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। यानी प्रोटीन की संरचना में बदलाव का असर रोटी, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की निर्माण संबंधी विशेषताओं पर पड़ सकता है।

क्या गेहूं से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बदल सकता है?

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि CO₂ बढ़ने के कारण ATIs और सीलिएक रोग से सक्रिय होने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में बदलाव हुआ। सीलिएक रोग एक प्रतिरक्षा सिस्टम से जुड़ी बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन के सेवन से छोटी आंत को नुकसान पहुंच सकता है।

हालांकि, स्टडी में कुछ संबंधित पेप्टाइड्स की मात्रा घटने का संकेत मिला। जबकि ATIs की मात्रा बढ़ी। इसलिए इन बदलावों का कुल स्वास्थ्य प्रभाव क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह समझने के लिए आगे अध्ययन करना जरूरी है कि गेहूं में प्रोटीन संरचना के ये बदलाव वास्तव में मानव शरीर की जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस शोध को गेहूं से जुड़ी बीमारियों में निश्चित वृद्धि या कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हर गेहूं की किस्म पर एक जैसा असर नहीं

पीटीआई के मुताबिक, इस अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई कि सभी गेहूं की किस्मों में बदलाव समान नहीं थे। प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज के अनुसार, प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की सीमा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि गेहूं की कौन-सी किस्म उगाई गई है। यह निष्कर्ष भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ किस्में बढ़ी हुई CO₂ परिस्थितियों में अपनी गुणवत्ता बेहतर बनाए रखती हैं, तो उन किस्मों की पहचान और विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और कृषि क्षेत्रों में और परीक्षण करने होंगे।

भविष्य की खेती के लिए क्या है सबक?

इस स्टडी से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि खेतों में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उस अनाज में किस तरह के प्रोटीन मौजूद हैं। उसकी बेकिंग गुणवत्ता कैसी है। उसके सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करने की जरूरत होगी, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार के साथ बेहतर गुणवत्ता बनाए रख सकें।

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फ्रांसीसी राष्ट्रपति बोले- तोड़फोड़ करने वालों को कीमत चुकानी होगी:गृहमंत्री का इस्तीफा मंजूर नहीं किया, PM लेकोर्नू ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई

फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुई हिंसा और लूटपाट को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने रविवार रात अपने संबोधन में कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। मैक्रों ने गृहमंत्री लॉरेंट नुनेज का इस्तीफा भी नामंजूर कर दिया। मैक्रों ने नुनेज से कहा कि वे सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाएं। इस बीच प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। इसमें हिंसा की घटनाओं और उनसे निपटने के तरीकों पर चर्चा होगी। 1500 दुकानों में लूटपाट, 1000 पुलिकर्मी घायल महंगाई और सरकारी सुविधाओं में कमी के खिलाफ शनिवार को 8 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। शुरुआत में हालात शांतिपूर्ण थे लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट शुरू कर दी। अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट की गई या उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालात संभालने के लिए पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और भीड़ पर पानी की बौछारें कीं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को करीब 1000 पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें सात की हालत गंभीर थी। गृह मंत्री नुनेज पर आरोप लग रहे हैं कि वे पहले से तय प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए। मैक्रों को देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति माना जा रहा हिंसा के बाद खबरें सामने आई कि मैक्रों कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा सकते हैं या आपातकाल घोषित कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने रविवार को टीवी पर देश को संबोधित किया। उन्होंने हिंसा के लिए कट्टर वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को जिम्मेदार ठहराया। मैक्रों ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की और भरोसा दिलाया कि हिंसा करने वालों को सजा मिलेगी। हालांकि, फ्रांस के मीडिया ने उनके भाषण की आलोचना की। उनका कहना है कि मैक्रों ने यह साफ नहीं किया कि सरकार आगे क्या कदम उठाएगी। लूटपाट और तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई कैसे होगी, शहरों को दोबारा ऐसी घटनाओं से कैसे बचाया जाएगा, जिन दुकानदारों का नुकसान हुआ है, उन्हें मुआवजा कैसे मिलेगा। संसद तीन गुटों में बंटी, कोई भी फैसला लेना आसान नहीं फ्रांस की संसद तीन बड़े राजनीतिक गुटों में बंटी हुई है। इनके बीच इतने मतभेद हैं कि संसद का कामकाज प्रभावित हो रहा है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए कोई बड़ा फैसला लेना आसान नहीं है। राष्ट्रपति मैक्रों का कार्यकाल खत्म होने वाला है। अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ऐसे में देश में राजनीतिक खींचतान भी बढ़ गई है। राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबले की तैयारी कर रहे नेताओं में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों भी शामिल हैं। ले पेन प्रवासियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं, जबकि मेलांशों पूंजीवाद के विरोधी हैं। दोनों नेता मौजूदा हालात में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्रांस पर कर्ज का दबाव भी बढ़ रहा फ्रांस की सरकार के सामने आर्थिक मुश्किलें भी हैं। देश पर बढ़ते सरकारी कर्ज को काबू में करने के लिए निवेशक सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। लेकिन सरकार को डर है कि अगर उसने सरकारी सुविधाओं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की, तो और ज्यादा लोग नाराज होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। देश में लोग पूछ रहे हैं कि अब आगे क्या होगा और क्या फ्रांस की व्यवस्था टूटने की कगार पर पहुंच गई है। शनिवार को हुई हिंसा ने लोगों को डरा दिया है। ————————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, आंदोलन के पीछे 5 बड़ी वजहें समझिए फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।