चीन ने टनल बोरिंग मशीनों के एक्सपोर्ट पर लगाया बैन, क्या ये भारत के मेट्रो और टनल प्रोजेक्ट्स को झटका देने की चाल?

भारत में मेट्रो, हाई-स्पीड रेल और सुरंगों के निर्माण पर चीन के एक नए फैसले का असर पड़ सकता है। चीन ने टनल बोरिंग मशीन (TBM) समेत कुछ अहम मशीनों के निर्यात पर नए प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। इन मशीनों का इस्तेमाल जमीन के नीचे सुरंग बनाने में होता है। ऐसे में चीन के इस कदम से भारत की कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

चीन के वाणिज्य मंत्रालय (MOFCOM) ने कहा कि ये प्रतिबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए लगाए गए हैं। निर्यात पर ये पाबंदियां 18 नवंबर से लागू होंगी।

TBM के प्रतिबंध से भारत की कई परियोजनाओं पर पड़ेगा असर

टनल बोरिंग मशीनों (TBM) और उनसे जुड़ी चीजों के निर्यात पर लगी इन पाबंदियों से भारत की कई परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। इनमें अंडरग्राउंड मेट्रो सिस्टम, हाई-स्पीड रेल लाइनें और सीमावर्ती इलाकों सहित कई जगहों पर बन रही सुरंगें शामिल हैं।

गौरतलब है कि चीन पहले भी भारत को TBM के निर्यात पर पाबंदियां लगाता रहा है। साल 2024 में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी के वाइस चांसलर रॉबर्ट हाबेक के सामने यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने बताया था कि चीन एक जर्मन कंपनी को वहां निर्मित टनल बोरिंग मशीनें भारत निर्यात करने नहीं दे रहा है।

वाणिज्य मंत्रालय की घोषणा के अनुसार, चीन के नए प्रतिबंधों में ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ (चलने वाले उत्खनन यंत्र) और ‘प्लेट्यू-टाइप वेट शॉटक्रिट मशीनें’ भी शामिल हैं।

क्या है ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ मशीन?

बता दें कि ‘वॉकिंग एक्सकेवेटर’ एक ऐसी मशीन है जिसे हर तरह के भू-भाग पर चलने के लिए डिजाइन किया गया है। यह अपने वर्किंग अटैचमेंट, आउट्रिगर या पहियों की मिली-जुली गतिविधियों का इस्तेमाल करके कठिन इलाकों में भी खुदाई का काम कर सकती है।

‘प्लेट्यू-टाइप वेट शॉटक्रिट मशीन’ का इस्तेमाल ऊंचे पठारी इलाकों में किया जाता है। यह सीमेंट और दूसरी निर्माण सामग्री को नोजल तक पहुंचाती है। इसके बाद हवा और एक खास केमिकल की मदद से इस मिश्रण को तेज दबाव के साथ किसी सतह पर छिड़का जाता है। इसका इस्तेमाल निर्माण कार्यों में सतह को मजबूत बनाने के लिए किया जाता है।

घोषणा के मुताबिक, इन नए उपायों के तहत ड्रेजर (तलछट हटाने वाली मशीन) से जुड़ी कुछ वस्तुओं के निर्यात नियंत्रण को भी बेहतर बनाया गया है। इनमें स्लरी पंप, ड्रैगहेड और कटरहेड जैसी चीजें शामिल हैं, जो तय तकनीकी मानकों को पूरा करती हैं।

AI से सोलर पावर तक, 14 तकनीकों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में चीन

वहीं शुक्रवार को, MOFCOM ने एक ड्राफ्ट प्लान जारी किया, जिसमें 14 तरह की तकनीकों पर नए निर्यात प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इन तकनीकों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोटेक्नोलॉजी से लेकर फोटोवोल्टिक सोलर पावर तक के क्षेत्र शामिल हैं।

इन प्रस्तावित प्रतिबंधों का वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा पर बड़ा असर पड़ सकता है, खासकर उन देशों के लिए जो चीनी AI पर निर्भर हैं।

सोमवार को जारी घोषणा के मुताबिक, इन प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले सामान का निर्यात करने वाली कंपनियों को चीन के वाणिज्य मंत्रालय से लाइसेंस लेना होगा। इसके लिए उन्हें चीन के निर्यात नियंत्रण कानून और दोहरे इस्तेमाल वाली वस्तुओं से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।

घोषणा में यह भी कहा गया है कि निर्यातकों को प्रतिबंधित सामान की सही पहचान करनी होगी और सीमा शुल्क से जुड़े दस्तावेजों में उसकी पूरी जानकारी देनी होगी। साथ ही, हर सामान के लिए तय दोहरे इस्तेमाल वाले निर्यात नियंत्रण कोड का उल्लेख करना भी जरूरी होगा।

सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जिन वस्तुओं पर निर्यात नियंत्रण लागू नहीं है, लेकिन जिनकी तकनीकी विशेषताएं या प्रदर्शन समान हैं, उनके मामले में निर्यातकों को अपने दावों को साबित करने के लिए विस्तृत तकनीकी पैरामीटर देने होंगे।

अगर सीमा शुल्क अधिकारियों को दी गई जानकारी की सटीकता, उसके पूरा होने या उसकी असलियत पर शक होता है, तो वे उसकी दोबारा जांच कर सकते हैं। MOFCOM की घोषणा के अनुसार, जांच पूरी होने तक संबंधित सामान की खेप को आगे भेजने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

ये निर्यात नियंत्रण उन ड्रेजर स्लरी पंपों पर लागू होंगे, जिनका इनलेट व्यास कम से कम 0.55 मीटर है और जिनकी अधिकतम रोटेशनल स्पीड 400 चक्कर प्रति मिनट (rpm) से अधिक नहीं है।

क्या होते हैं ड्रेजर स्लरी पंप?

बता दें कि ड्रेजर स्लरी पंप भारी-भरकम सेंट्रीफ्यूगल पंप होते हैं। इन्हें नदियों, झीलों, बंदरगाहों और महासागरों की तलहटी से पानी और ठोस पदार्थों (जैसे रेत, बजरी, गाद, मिट्टी और खदान के अवशेष) के सघन मिश्रण को खींचने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है।

ऐसे पंपों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए मुख्य पुर्जे भी निर्यात नियंत्रण के दायरे में आएंगे। इनमें कम से कम 1.3 मीटर के आंतरिक व्यास वाले पंप केसिंग और कम से कम 1.3 मीटर व्यास वाले इम्पेलर शामिल हैं।

घोषणा के अनुसार, इन नियंत्रणों में ‘ट्रेलिंग सक्शन हॉपर ड्रेजर’ (TSHD) में इस्तेमाल होने वाले ड्रैगहेड (जिनके सक्शन पाइप का व्यास कम से कम 0.55 मीटर है) और ‘कटर सक्शन ड्रेजर’ (CSD) में इस्तेमाल होने वाले कटरहेड (जिनके बाहरी कटर रिंग का व्यास कम से कम 2.1 मीटर है) भी शामिल हैं।

TSHD और CSD पानी के नीचे जमा तलछट (sediments) को निकालने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले दो प्रमुख प्रकार के समुद्री जहाज हैं। हालांकि, ये पूरी तरह से अलग-अलग तंत्रों (mechanisms) पर काम करते हैं और अलग-अलग वातावरण के लिए उपयुक्त होते हैं।

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Delhi Metro: दिल्ली वालों के लिए बड़ी खुशखबरी! द्वारका से राजीव चौक तक सिर्फ 25 मिनट में पहुंचेगी मेट्रो

Delhi Metro: दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने द्वारका सेक्टर-25 स्थित यशोभूमि से कनॉट प्लेस के राजीव चौक तक 20 किलोमीटर लंबे हाई-स्पीड अंडरग्राउंड मेट्रो कॉरिडोर के लिए एक डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार किया है। इसका उद्देश्य पश्चिमी दिल्ली से सेंट्रल दिल्ली तक सफर का समय काफी कम करना है।

यह नया कॉरिडोर मौजूदा एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन का विस्तार होगा। इससे यशोभूमि इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर, तेजी से विकसित हो रहे द्वारका इलाके और दिल्ली के केंद्रीय हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी।

पांच अंडरग्राउंड स्टेशनों की योजना

DPR के अनुसार, प्रस्तावित रूट पर पांच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अंडरग्राउंड स्टेशन होंगे। यात्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए इन्हें प्रमुख रिहायशी और संस्थागत इलाकों के पास बनाया जाएगा।

प्रोजेक्ट की मुख्य जानकारी इस प्रकार है:

प्रोजेक्ट की जानकारीविवरण
रूट की लंबाईलगभग 20 किलोमीटर
मेट्रो का प्रकारहाई-स्पीड अंडरग्राउंड मेट्रो
प्रस्तावित स्टेशन5 अंडरग्राउंड स्टेशन
रूटयशोभूमि (द्वारका सेक्टर-25) से राजीव चौक तक
प्रोजेक्ट एजेंसीदिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC)
अनुमानित यात्रा समयघटकर करीब 25 मिनट होने की उम्मीद

इस कॉरिडोर का मुख्य उद्देश्य दिल्ली के पश्चिमी उपनगरों और सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट के बीच तेज और ज्यादा सीधा संपर्क उपलब्ध कराना है।

फिलहाल, अभी बाहरी द्वारका से कनॉट प्लेस जाने वाले लोग आम तौर पर भीड़-भाड़ वाली सड़कों या ब्लू लाइन से लंबे सफर पर निर्भर रहते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित हाई-स्पीड कॉरिडोर से यशोभूमि और राजीव चौक के बीच सफर का समय 25 मिनट से भी कम होने की उम्मीद है। इससे रोजाना सफर करने वालों, बिजनेस के लिए यात्रा करने वालों और कन्वेंशन सेंटर आने वाले लोगों को एक तेज विकल्प मिलेगा।

अधिकारियों का मानना ​​है कि इस सीधे कनेक्शन से दिल्ली की सड़कों पर दबाव कम होगा और राजधानी के सबसे बड़े कन्वेंशन और एग्जिबिशन वेन्यू तक पहुंचना भी आसान हो जाएगा।

इंजीनियरिंग और मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है

DPR के अनुसार, संबंधित अधिकारी फंडिंग की मंजूरी और जरूरी कानूनी मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी ला रहे हैं। DMRC के इंजीनियरों ने शुरुआती मिट्टी की जांच और अलाइनमेंट स्टडी पूरी कर ली है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि प्रस्तावित रूट मौजूदा अंडरग्राउंड यूटिलिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर के रास्ते में न आए।

क्योंकि पूरा कॉरिडोर घनी आबादी वाले शहरी इलाकों के नीचे से गुजरेगा, इसलिए सड़क पर ट्रैफिक और जमीन पर होने वाली गतिविधियों में कम से कम रुकावट आए, इसके लिए टनल बोरिंग मशीनों (TBMs) का इस्तेमाल करके निर्माण करने का प्रस्ताव है।

रियल एस्टेट पर संभावित असर

प्रस्तावित मेट्रो कॉरिडोर से नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में रियल एस्टेट मार्केट पर भी असर पड़ने की उम्मीद है।

इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, प्रस्तावित रूट के आस-पास के इलाकों, खासकर द्वारका और गुरुग्राम के सटे हुए हिस्सों में, इस प्रोजेक्ट की खबर के बाद से ही घर खरीदने वालों और निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है।

प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स का कहना है कि बेहतर कनेक्टिविटी से द्वारका और द्वारका एक्सप्रेसवे के आस-पास रेजिडेंशियल डेवलपमेंट की मांग बढ़ सकती है, जबकि पड़ोसी गुरुग्राम सेक्टरों में रेजिडेंशियल प्लॉट और हाउसिंग प्रोजेक्ट्स को भी मेट्रो की बेहतर सुविधा का फायदा मिल सकता है।

वेस्ट दिल्ली और सिटी सेंटर के बीच एक नया लिंक

अगर मंजूरी मिल जाती है, तो यशोभूमि-राजीव चौक मेट्रो कॉरिडोर दिल्ली मेट्रो के हाई-स्पीड नेटवर्क का एक अहम हिस्सा बन जाएगा। यह मौजूदा एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन का विस्तार होगा, जो दिल्ली के बीचों-बीच तक सीधी कनेक्टिविटी देगा।

इस प्रोजेक्ट से रिहायशी इलाकों, कमर्शियल जोन और इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे मौजूदा ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर पर भीड़ कम होगी और पूरे NCR में भविष्य के शहरी विकास में मदद मिलेगी।

बता दें कि प्रस्तावित कॉरिडोर अभी ‘डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ (DPR) के स्टेज पर है और निर्माण शुरू होने से पहले जरूरी मंज़ूरी का इंतजार कर रहा है।

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Mumbai Bullet Train: बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी कामयाबी! भारत की सबसे बड़ी टनल बोरिंग मशीन ने मुंबई में शुरू की अंडरग्राउंड टनलिंग

भारत के पहले मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर प्रोजेक्ट ने एक और बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है। देश के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए इस प्रोजेक्ट के तहत मुंबई में अंडरग्राउंड टनलिंग (भूमिगत सुरंग बनाने) का काम आधिकारिक तौर पर शुरू हो गया है। एचटी के मुताबिक 5 जुलाई को देश की सबसे बड़ी रेलवे टनल बोरिंग मशीन (TBM) ने विक्रोली से बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्टेशन की तरफ जमीन को चीरते हुए अपनी यात्रा शुरू कर दी है। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए एक औपचारिक लॉन्च कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

इसकी अध्यक्षता केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव करने वाले थे। मुंबई में मूसलाधार बारिश के चलते जारी किए गए ‘रेड अलर्ट’ के कारण इस औपचारिक कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा लेकिन मशीन ने तय समय पर सुरंग बनाने का अपना काम शुरू कर दिया।

13.6 मीटर व्यास वाली देश की सबसे बड़ी रेलवे TBM

सुरंग बनाने के इस बेहद जटिल काम में 13.6 मीटर व्यास वाली एक विशाल मिक्सशील्ड टीबीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह भारत में किसी भी रेलवे टनलिंग प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अब तक की सबसे बड़ी टनल बोरिंग मशीनों में से एक है। इस महाकाय मशीन का कुल वजन लगभग 3100 टन है और इसकी लंबाई 96 मीटर है। यह मशीन एक 6 किलोमीटर लंबी सिंगल-ट्यूब सुरंग खोदेगी। इसके भीतर से ही बुलेट ट्रेन की अप और डाउन दोनों लाइनें गुजरेंगी। यह टनल बुलेट ट्रेन रूट के मुंबई में बनाए कुल 21 किलोमीटर लंबे अंडरग्राउंड सेक्शन का हिस्सा है।

जमीन से 56 मीटर नीचे से हुआ लॉन्च, दो तकनीकों का हो रहा इस्तेमाल

रेलवे अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक इस 21 किलोमीटर लंबे भूमिगत खंड में से 16 किलोमीटर का हिस्सा घनसोली के सांवली से लेकर बीकेसी) के बीच का है। इसे टनल बोरिंग मशीनों के जरिए खोदा जा रहा है। बाकी 5 किलोमीटर का हिस्सा न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड तकनीक के जरिए पहले ही सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। इस नई टीबीएम को विक्रोली में जमीन की सतह से 56 मीटर नीचे बनाए गए एक विशाल शाफ्ट से लॉन्च किया गया है। इसने अब बीकेसी की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया है।

क्या है मिक्सशील्ड तकनीक और इसकी खासियतें?

इस प्रोजेक्ट में इस्तेमाल की जा रही मिक्सशील्ड टेक्नोलॉजी को विशेष रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया है। यह तकनीक मिश्रित मिट्टी की स्थिति और उन इलाकों में जहां भूजल का दबाव बहुत अधिक होता है, वहां पूरी सुरक्षा के साथ काम करने में सक्षम है। टनलिंग के दौरान जमीन धंसने या जमीन के ऊपर होने वाली हलचल और व्यवधान को यह तकनीक बिल्कुल न्यूनतम रखती है। इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक तरफ सुरंग की खुदाई करती जाती है और साथ ही साथ प्रीकास्ट कंक्रीट लाइनिंग सेगमेंट्स को अपनी जगह पर फिट भी करती जाती है। इससे निर्माण की गति काफी तेज हो जाती है और सुरक्षा के मानक भी बेहतर होते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और महापे में बना कास्टिंग यार्ड

नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने इस पूरे प्रोजेक्ट को सपोर्ट करने के लिए विक्रोली में 56 मीटर गहरा लॉन्च शाफ्ट तैयार किया है। इसके साथ ही वहां स्लरी और वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट, एक समर्पित पावर सबस्टेशन और अन्य आवश्यक सहायक बुनियादी ढांचे का निर्माण किया गया है। सुरंग की खुदाई के दौरान आसपास की इमारतों को कोई नुकसान न पहुंचे, इसके लिए बेहद संवेदनशील निगरानी उपकरण लगाए गए हैं। इनमें सेटलमेंट मार्कर्स, टिल्ट मीटर्स, सीस्मोग्राफ और 3D मॉनिटरिंग टारगेट शामिल हैं, जो पल-पल की रिपोर्ट दर्ज कर रहे हैं। सुरंग की दीवारों को मजबूती देने के लिए जरूरी करीब 77000 प्रीकास्ट कंक्रीट सेगमेंट्स का निर्माण करने के लिए महापे में 11.17 हेक्टेयर का एक विशाल कास्टिंग यार्ड स्थापित किया गया है।

क्या है इस टनलिंग प्रोजेक्ट की डेडलाइन?

रेलवे अधिकारियों द्वारा दी गई समयसीमा के अनुसार, इस अंडरग्राउंड प्रोजेक्ट को दो अलग-अलग चरणों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। विक्रोली से बीकेसी साल 2027 की शुरुआत तक और विक्रोली से घनसोली को मार्च 2028 तक पूरा किया जाएगा।