अमेरिका में पहली बार ‘बर्थ टूरिज्म’ पर रोक:यहां पैदा हुए विदेशियों के बच्चे को भी नागरिकता नहीं; ट्रम्प बोले- बर्थराइट सिटीजनशिप मजाक बन गई थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अमेरिका में जन्म लेने वाले लोगों को नागरिकता मिलने के दायरे को सीमित करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने इमिग्रेशन) से जुड़े दो कार्यकारी आदेश साइन किए हैं। इनमें से एक आदेश अमेरिका में पैदा होने वाले उन लोगों की संख्या को सीमित करेगा, जो अमेरिकी नागरिकता पाने के पात्र हैं। ट्रम्प ने बताया कि दूसरा आदेश ‘बर्थ टूरिज्म’ पर लगाम लगाने के लिए है। इसके तहत उन विदेशी पर्यटकों पर वीजा प्रतिबंध बढ़ाए जाएंगे, जो अमेरिका में आकर बच्चे को जन्म देना चाहते हैं। इससे पहले बर्थराइट सिटीजनशिप को सीमित करने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था, लेकिन अब वे दोबारा इसके लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इन आदेशों के बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन ट्रम्प का मानना है कि उनके ये नए कदम संवैधानिक होंगे। जून में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था इससे पहले जून में सुप्रीम कोर्ट ने बर्थराइट सिटीजनशिप को बरकरार रखा था। कोर्ट ने ट्रम्प के उन पिछले प्रयासों को खारिज कर दिया था, जिनमें उन्होंने यह घोषित करने की कोशिश की थी कि अमेरिका में अवैध रूप से या अस्थायी रूप से रह रहे लोगों के बच्चे अमेरिकी नागरिक नहीं हैं। कैसे मिला था बर्थराइट सिटीजनशिप का अधिकार अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन मूल रूप से गृहयुद्ध के बाद गुलामों के बच्चों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था। इसका उद्देश्य हर विदेशी नागरिक के बच्चे को स्वतः नागरिकता देना नहीं था। 2024 में बर्थ टूरिज्म से पैदा हुए बच्चों की संख्या 9600 थी ट्रम्प प्रशासन इसे बहुत बड़े खतरे के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन आधिकारिक आंकड़े कुछ और बताते हैं। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (MPI) के मुताबिक अमेरिका में हर साल जन्म लेने वाले बच्चों में से एक बहुत ही छोटा हिस्सा ‘बर्थ टूरिज्म’ से जुड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक 22,000 से 26,000 बच्चों के पेरेंट्स अमेरिकी नागरिकता पाने के मकसद से वहां पहुंचते हैं। 2024 के सरकारी आंकड़ों में विदेशी पते वाली मांओं के केवल 9,600 जन्म दर्ज किए गए थे।

अमेरिका में पहली बार ‘बर्थ टूरिज्म’ पर रोक:यहां पैदा हुए विदेशियों के बच्चे को नागरिकता नहीं मिलेगी; ट्रम्प बोले- बर्थराइट सिटीजनशिप मजाक बन गई थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अमेरिका में जन्म लेने वाले लोगों को नागरिकता मिलने के दायरे को सीमित करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने इमिग्रेशन से जुड़े दो कार्यकारी आदेश साइन किए हैं। इनमें से एक अमेरिका में पैदा होने वाले उन लोगों की संख्या को सीमित करेगा, जो यहां नागरिकता पाने के हकदार हैं। ट्रम्प ने बताया कि दूसरा आदेश ‘बर्थ टूरिज्म’ पर लगाम लगाने के लिए है। इसके तहत उन विदेशी पर्यटकों पर वीजा प्रतिबंध बढ़ाए जाएंगे, जो अमेरिका में आकर बच्चे को जन्म देना चाहते हैं। इससे पहले बर्थराइट सिटीजनशिप को सीमित करने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था, लेकिन अब वे दोबारा इसके लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इन आदेशों के बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन ट्रम्प का मानना है कि उनके ये नए कदम संवैधानिक होंगे। जून में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था इससे पहले जून में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने बर्थराइट सिटीजनशिप को बरकरार रखा था। कोर्ट ने ट्रम्प के उन पिछले प्रयासों को खारिज कर दिया था, जिनमें उन्होंने यह घोषित करने की कोशिश की थी कि अमेरिका में अवैध-अस्थायी रूप से रह रहे लोगों के बच्चे अमेरिकी नागरिक नहीं हैं। कोर्ट ने कहा था कि अमेरिका में गैर-कानूनी या अस्थायी रूप से मौजूद लोगों के बच्चे अपने-आप अमेरिकी नागरिकता पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने ‘यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क’ मामले में अपने पहले के फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि विदेशी माता-पिता से अमेरिका में पैदा हुए बच्चे इसके हकदार हैं। कैसे मिला था बर्थराइट सिटीजनशिप का अधिकार व्हाइट हाउस के सलाहकार स्टीफन मिलर ने कहा कि ये एग्जीक्यूटिव एक्शन 14वें संशोधन के मूल मकसद पर आधारित हैं। अमेरिकी संविधान में किया गया 14वां संशोधन खास तौर पर गृह युद्ध के बाद इसलिए बनाया गया था ताकि यह पक्का किया जा सके कि गुलामों के बच्चे नागरिक बन सकें। इसका उद्देश्य हर विदेशी नागरिक के बच्चे को स्वतः नागरिकता देना नहीं था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, ऐसी नागरिकता के लिए अयोग्य लोगों की कैटेगरी का दायरा बढ़ाने के लिए कमांडर-इन-चीफ के तौर पर अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। बर्थराइट-बर्थ टूरिज्म पर नए आदेश का असर 2024 में बर्थ टूरिज्म से पैदा हुए बच्चों की संख्या 9600 थी ट्रम्प प्रशासन इसे बहुत बड़े खतरे के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन आधिकारिक आंकड़े कुछ और बताते हैं। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (MPI) के मुताबिक अमेरिका में हर साल जन्म लेने वाले बच्चों में से एक बहुत ही छोटा हिस्सा ‘बर्थ टूरिज्म’ से जुड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक 22,000 से 26,000 बच्चों के पेरेंट्स अमेरिकी नागरिकता पाने के मकसद से वहां पहुंचते हैं। 2024 के सरकारी आंकड़ों में विदेशी पते वाली मांओं के केवल 9,600 जन्म दर्ज किए गए थे। ————– ट्रम्प से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम: पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए अब राह पहले जैसी आसान नहीं रही। ट्रम्प सरकार की सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी के बीच 2025 में भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट आई है। इसके उलट पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले के मुकाबले ज्यादा वीजा मिले हैं। पढ़ें पूरी खबर…

Tarun Tejpal: यौन उत्पीड़न मामले में पत्रकार तरुण तेजपाल को 10 साल की जेल की सजा, Tehelkaके पूर्व संपादक का आया पहला बयान

Tarun Tejpal: बॉम्बे हाई कोर्ट ने ‘तहलका’ मैगजीन के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को 2013 में अपनी एक सहकर्मी से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने गोवा की एक सत्र अदालत द्वारा पांच साल पहले उसे बरी करने के फैसले को भी रद्द कर दिया। हाई कोर्ट की गोवा पीठ की जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसांडेकर ने पहले तरुण तेजपाल को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। लेकिन उनके वकीलों के अनुरोध पर अदालत ने यह अवधि बढ़ाकर चार सप्ताह कर दी।

अदालत ने न्यूनतम सजा सुनाते हुए कहा कि यह घटना 13 वर्ष पहले हुई थी। तब से तेजपाल ने कोई अन्य अपराध नहीं किया है। अदालत ने यह भी कहा, “संभव है कि पीड़िता और तेजपाल, दोनों अब अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हों।” हाई कोर्ट ने तेजपाल पर 10,21,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह पूरी राशि पीड़िता को दी जाएगी। पीठ ने कहा, “यौन उत्पीड़न की पीड़िता को जुर्माने की पूरी राशि सौंपी जाएगी।”

तेजपाल ने खुद को बताया ‘राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार’

सुनवाई के दौरान तरूण तेजपाल ने खुद को राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बताया। दो बेटियों का पिता होने का हवाला देते हुए पूर्व संपादक ने अदालत से नरमी बरतने की अपील की। वहीं, गोवा सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अधिकतम सजा की मांग करते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि नहीं का मतलब नहीं (शारीरिक संबंध के लिए सहमति नहीं देना) होता है। पीठ ने कहा, “हम निचली अदालत के बरी करने के आदेश को निरस्त करते हैं। प्रतिवादी (तरुण तेजपाल) को दोषी करार देते हैं।” हाई कोर्ट के फैसले के बाद अदालत परिसर के बाहर पयत्रकारों से बातचीत में तेजपाल ने कहा कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

बेटियों का दिया हवाला

अदालत ने तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (भादसं) की धारा 376(2)(f) (संरक्षक या विश्वास अथवा प्राधिकार की स्थिति में रहने वाले व्यक्ति द्वारा महिला से दुष्कर्म), धारा 354(a) (यौन उत्पीड़न) और धारा 354(b) (महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उसके खिलाफ आपराधिक बल प्रयोग) के तहत दोषी करार दिया है। अदालत में मौजूद तेजपाल ने खुद को राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बताते हुए नरमी बरतने का अनुरोध किया। तेजपाल ने यह भी कहा कि वह दो बेटियों का पिता है।

उसने अदालत में कहा, “मैं 62 वर्ष का हूं। मेरी दो बेटियां हैं और मेरी पत्नी भी है। मैं राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई का शिकार हूं। मेरे वकीलों ने भी मुझसे कहा है कि मैं अदालत से नरमी बरतने की गुजारिश करूं।” तरुण तेजपाल के वकील आबाद पोंडा ने न्यूनतम सजा देने का अनुरोध करते हुए अदालत से यह भी आग्रह किया था कि सजा और दोषसिद्धि पर कम से कम 10 सप्ताह के लिए रोक लगाई जाए, ताकि सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का समय मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे तेजपाल

बाद में पत्रकारों से बातचीत में तेजपाल ने कहा कि हम इस आदेश के खिलाफ अपील करेंगे। हमारा मानना है कि यह फैसला गलत है। हम इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, तेजपाल ने कहा, “हम निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। वे राजनीतिक बदले की भावना और ‘तहलका’ के काम की वजह से मेरे पीछे पड़े हैं। हमने ट्रायल कोर्ट में 7.5 साल तक केस लड़ा और बरी हो गए। जो लोग उनके साथ हैं, वे बरी हो जाते हैं, लेकिन वे उनके पीछे पड़ते हैं जिन्होंने उनके खिलाफ लिखा है।”

Tehelka के पूर्व एडिटर इन चीफ तेजपाल ने आगे कहा, “उमर खालिद और शरजील इमाम कई सालों से जेल में हैं। ‘तहलका’ की रिपोर्टिंग से शायद उन्हें कुछ राजनीतिक नुकसान हुआ हो या उनके निजी हितों को चोट पहुंची हो। वे पिछले 13 सालों से बदले की भावना से मेरे पीछे पड़े हैं। मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है कि ऐसे जज होंगे जो सच देखेंगे। हम सबूत सबके सामने रखेंगे।”

क्या है पूरा मामला?

यह मामला नवंबर 2013 में गोवा में आयोजित ‘थिंकफेस्ट’ कार्यक्रम के दौरान एक होटल की लिफ्ट में तेजपाल की एक पूर्व जूनियर महिला सहकर्मी के कथित यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म से संबंधित है। निचली अदालत ने 2021 में तेजपाल को इस मामले में बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ गोवा सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। तेजपाल के वकील पोंडा ने कहा, “वह मुकदमे की शुरुआत से ही जमानत पर हैं और उन्होंने कभी जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। वह वरिष्ठ नागरिक हैं।”

हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीड़िता के प्रति तेजपाल के बेहद निर्लज्ज रवैये और कथित घटना के बाद उसके सामान्य आचरण को आधार बनाकर आरोपों को कमजोर साबित करने की कोशिश को देखते हुए उन्हें आजीवन कारावास की अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। मेहता ने कहा, “दोषी (तेजपाल) पीड़िता पर अधिकार जताने और प्रभाव रखने की स्थिति में था। पीड़िता केवल उसकी सहकर्मी ही नहीं, बल्कि उसकी बेटी की मित्र भी थी। दोषी ने अपने कृत्य पर कोई पछतावा प्रदर्शित नहीं किया है।”

उन्होंने कहा कि तेजपाल ने अगले दिन भी अपराध दोहराया और मुकदमे के दौरान तथा अब हाई कोर्ट में भी यह कहकर पीड़िता के आचरण पर सवाल उठाया कि घटना के बाद वह सामान्य व्यवहार कर रही थी। राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान मेहता ने दलील दी थी कि ट्रायल कोर्ट ने यह मानकर गंभीर गलती की कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता का व्यवहार एक तय धारणा के अनुसार होना चाहिए और उसी आधार पर शिकायतकर्ता के आचरण का आकलन किया।

CJP प्रोस्टेट पर बोले CJI- युवाओं की बात सुननी चाहिए, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों और सुरक्षा बलों से संयम बरतने की सलाह दी। कोर्ट ने कहा कि युवा छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा रोकने के लिए अगर हिंसक तरीके अपनाए गए, तो इससे स्थिति और बिगड़ सकती है।

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की कथित भूमिका को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है, युवाओं की बात सुनना जरूरी है। याचिका में दिल्ली समेत देश के अन्य हिस्सों में छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और कथित पत्थरबाजी को लेकर कार्रवाई की मांग की गई है।

 

 सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा से संबंधित अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। कोर्ट ने कहा कि सभी मामलों की सुनवाई एक साथ की जाएगी।

 

'अधिकारियों को बहुत सावधानी से कदम उठाना होगा'

CJI सूर्यकांत ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण मार्च के दौरान सुरक्षा बलों और अधिकारियों को भी संयम बरतना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए बेहद सावधानी से काम करना होगा कि युवा हिंसा की ओर न बढ़ें।

कोर्ट ने कहा कि हिंसा का जवाब हिंसा से देने से स्थिति और गंभीर हो सकती है। पीठ ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों की बात सुनना और यह समझना कि वे किस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, स्थिति को संभालने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के विवेक पर भरोसा जताते हुए कहा कि आगे की कार्रवाई से पहले केंद्र सरकार का पक्ष भी देखा जाएगा।

 

20 जुलाई के 'चलो संसद' मार्च के दौरान हुई थी हिंसा

 

यह मामला 20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। यह मार्च NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में चल रहे छात्र प्रदर्शनों के बीच आयोजित किया गया था। दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के कई इलाकों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प की खबरें सामने आई थीं। दिल्ली पुलिस के अनुसार, इस दौरान 65 से अधिक प्रदर्शनकारी और 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए थे।

 

पैलेट गन के इस्तेमाल पर भी उठा था विवाद

प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर प्लास्टिक पैलेट के इस्तेमाल को लेकर बाद में राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया। रिपोर्टों में दावा किया गया कि कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें आईं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार CRPF की एक आंतरिक जांच में पाया गया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान Rapid Action Force (RAF) के एक जवान ने पैलेट गन से सात राउंड फायर किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से पांच पैलेट प्रदर्शनकारियों को लगे थे।

 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान प्रशासन और सुरक्षा बलों को संयम से काम लेना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि युवाओं के विरोध को समझना और उनकी बात सुनना जरूरी है, क्योंकि बल प्रयोग से तनाव कम होने के बजाय स्थिति और बिगड़ सकती है। अब इस मामले के साथ छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं पर भी संयुक्त रूप से सुनवाई की जाएगी।

क्या UPI पेमेंट पर चार्ज देना होगा? आखिर पेमेंट सिस्टम का बोझ कौन उठाएगा, RBI गवर्नर ने समझाया

UPI Payment Charge: क्या आने वाले समय में ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट पर चार्ज लग सकता है? इस सवाल पर RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने साफ किया कि पेमेंट सिस्टम चलाने की लागत किसी न किसी को उठानी ही पड़ती है। अब यह सरकार उठाएगी, कारोबारी या किसी और पर इसका बोझ आएगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है।

क्या अभी UPI पर कोई चार्ज लगेगा?

अभी नहीं। सरकार ने ग्राहकों, दुकानदारों या किसी भी तरह के UPI ट्रांजैक्शन पर कोई नया चार्ज लागू नहीं किया है। टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 में भी UPI पर MDR लगाने या ₹2,000 की सीमा तय करने का कोई प्रावधान नहीं है।

हालांकि, सरकारी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सरकार कारोबारियों को किए जाने वाले ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट पर 0.5% से कम MDR की अनुमति दे सकती है। फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है।

MDR क्या होता है?

MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल पेमेंट प्रोसेस करने के बदले कारोबारी बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है। यह सीधे ग्राहक से नहीं लिया जाता।

बिल में क्या बदलाव प्रस्तावित है?

अभी कानून के तहत UPI और RuPay डेबिट कार्ड जैसे कुछ डिजिटल पेमेंट मोड पर MDR नहीं लगाया जा सकता। नए बिल में सरकार को यह अधिकार देने का प्रस्ताव है कि वह तय करे किन डिजिटल पेमेंट माध्यमों पर जीरो-MDR जारी रहेगा और किन पर नहीं।

अगर यह बिल कानून बन जाता है, तो सरकार बाद में अलग से नियम बनाकर कुछ कैटेगरी के ट्रांजैक्शन पर MDR लागू कर सकती है।

₹2,000 की सीमा क्यों चर्चा में है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ₹2,000 से ऊपर के UPI ट्रांजैक्शन कुल लेनदेन की संख्या का सिर्फ करीब 5% हैं, लेकिन इनकी वैल्यू लगभग 65% है। इसलिए सरकार इस कैटेगरी पर MDR लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है। हालांकि, इस सीमा या दर को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

सरकार ने पहले MDR क्यों हटाया था?

सरकार ने जनवरी 2020 में UPI और RuPay डेबिट कार्ड पर MDR को जीरो कर दिया था। इसका मकसद डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना था। बाद में बैंकों और पेमेंट कंपनियों को कुछ ट्रांजैक्शन पर प्रोत्साहन राशि भी दी गई।

हाल के महीनों में संसदीय समिति, बैंक और पेमेंट कंपनियां यह मांग कर रही हैं कि UPI नेटवर्क चलाने की लागत के लिए एक टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल बनाया जाए। फिलहाल अंतिम फैसला सरकार को ही करना है।

नई कार पर 4 और बाइक पर 6 साल का इंश्योरेंस जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

NEET-PG cut-off case: डीजीएचएस की अध्यक्षता वाली समिति करेगी नीट पीजी प्रवेश प्रक्रिया का ऑडिट, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

NEET-PG cut-off case: नीट पीजी प्रवेश प्रक्रिया की समीक्षा के लिए 12 सदस्यों वाली एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है। यह समिति नीट पीजी प्रवेश प्रक्रिया में मौजूद कमियों की पहचान करेगी। इसे ठीक करने के लिए सभी संबंधित पक्षों को सलाह देगी और आंतरिक ऑडिट के लिए एक व्यवस्था बनाएगी। केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी है। शीर्ष अदालत में नीट पीजी 2025-26 प्रवेश के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में कमी को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि समिति का गठन 23 जुलाई के नोटिफिकेशन के जरिए कोर्ट के पहले के निर्देशों के मुताबिक किया गया था। कमेटी को डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) डी लवनीश जी कृष्णा हेड कर रहे हैं, जबकि असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल (मेडिकल एजुकेशन) डॉ प्रवीण कुमार दास मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर काम करेंगे।

इसमें नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC), नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA), नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBE) और हेल्थ मिनिस्ट्री के दूसरे अधिकारियों के रिप्रेजेंटेटिव भी शामिल हैं। भाटी ने कहा कि कमेटी का काम मौजूदा पीजी प्रवेश प्रक्रिया के विस्तृत आंतरिक ऑडिट के लिए एक तंत्र बनाना और सुधार लागू करने लायक सुझाव देना है। उन्होंने बेंच को बताया कि इस काम में आठ हफ्ते लगेंगे। केंद्र का जवाब दर्ज करने के बाद बेंच ने कमेटी को आठ हफ्ते के अंदर अपनी रिपोर्ट फाइल करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा, “रिपोर्ट आने के बाद हम इस मुद्दे पर सक्रिय तौर से चर्चा करेंगे।” पीठ ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो कमेटी नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) और नेशनल कमीशन फॉर होम्योपैथी (NCH) से मेंबर्स को को-ऑप्ट कर सकती है।

पिटीशनर हरिशरण देवगन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत ने एक एमिकस क्यूरी नियुक्त करने का सुझाव दिया। भाटी ने जवाब दिया कि सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह को इस मामले में पहले ही एमिकस अपॉइंट किया जा चुका है।

नीट पीजी प्रवेश प्रक्रिया पर याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन और डॉक्टर सौरव कुमार, लक्ष्य मित्तल और आकाश सोनी की तरफ से फाइल की गई है। इसमें नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के 13 जनवरी के नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें नीट पीजी 2025-26 काउंसलिंग के तीसरे राउंड के लिए मिनिमम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल कम कर दिया गया था।

संशोधित योग्यता मापदंड के तहत, सामान्य श्रेणी का कट-ऑफ स्कोर 276 से घटाकर 103 कर दिया गया, जबकि क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल 50 से घटकर सातवें पर्सेंटाइल पर आ गया। SC, ST और OBC कैंडिडेट्स के लिए, कट-ऑफ स्कोर 235 से घटाकर माइनस 40 कर दिया गया। पिटीशनर्स का कहना है कि यह फैसला मनमाना, गैर-संवैधानिक है और संविधान के आर्टिकल 14 और 21 का उल्लंघन करता है।

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नई कार पर 4 और बाइक पर 6 साल का इंश्योरेंस जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने गाड़ियों के इंश्योरेंस बड़ा फैसला सुनाया है। अब नई प्राइवेट कार खरीदने पर 4 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस लेना होगा। नई बाइक खरीदने पर 6 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य होगा। पहले यह अवधि एक साल कम थी। कोर्ट ने कहा कि इससे सड़क हादसों के पीड़ितों को जल्दी मुआवजा मिलेगा।

यह आदेश जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने दिया। कोर्ट ने कहा कि देश में अब भी बड़ी संख्या में गाड़ियां बिना इंश्योरेंस के चल रही हैं। इसे रोकना जरूरी है।

2018 के बाद भी नहीं बदले हालात

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में नई कार के लिए 3 साल और नई बाइक के लिए 5 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य किया था। लेकिन इसके बाद भी हालात नहीं सुधरे। कोर्ट ने कहा कि अब अवधि एक साल और बढ़ाई जा रही है।

IRDAI और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन कोर्ट ने सड़क सुरक्षा को ज्यादा अहम माना।

हर दूसरी गाड़ी के पास इंश्योरेंस नहीं

कोर्ट ने कहा कि देश में करीब 56% गाड़ियां बिना वैध इंश्योरेंस के चल रही हैं। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, 30.48 करोड़ रजिस्टर्ड गाड़ियों में से 16.54 करोड़ के पास वैध इंश्योरेंस नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का मकसद सिर्फ मुआवजा देना नहीं है। इसका मकसद पीड़ितों को लंबी कानूनी लड़ाई से बचाना भी है।

बिना इंश्योरेंस गाड़ी पर ई-चालान

कोर्ट ने कहा कि ANPR कैमरों को VAHAN पोर्टल और Insurance Information Bureau से जोड़ा जाए। इससे बिना इंश्योरेंस चल रही गाड़ियों की पहचान हो सकेगी। फिर उन्हें अपने आप ई-चालान जारी होगा।

राज्य पुलिस को भी ऐसे मोबाइल ऐप और डिवाइस दिए जाएंगे। इससे मौके पर ही इंश्योरेंस चेक किया जा सकेगा।

बिना इंश्योरेंस पेट्रोल भी नहीं

कोर्ट ने IRDAI और सड़क परिवहन मंत्रालय से पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने को कहा है। इसके तहत बिना वैध इंश्योरेंस वाली गाड़ियों को पेट्रोल देने पर रोक लगाने की योजना बनाई जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि लोग किसी भी गाड़ी का इंश्योरेंस स्टेटस ऑनलाइन चेक कर सकें। इसके लिए भी व्यवस्था बनाई जाए।

इंश्योरेंस खरीदने से पहले पूरी जानकारी

कोर्ट ने IRDAI को चार-स्तरीय इंश्योरेंस व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया। इसमें थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के साथ पर्सनल एक्सीडेंट कवर, पिलियन या यात्रियों का कवर और ओन डैमेज कवर का विकल्प भी होगा। हर ग्राहक को बीमा खरीदने से पहले आसान भाषा में पूरी जानकारी भी देनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को 14 अगस्त 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध प्रदर्शन:12 रिजर्व सीटें क्यों खत्म करना चाहते हैं प्रदर्शनकारी, मांगे क्यों नहीं मान रही सरकार

पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत के साथ कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान का पूरा ध्यान रहा। इसलिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी राजनीतिक समस्याएं लंबे समय तक दबकर रह गईं। लेकिन अब वहां हालात ऐसे हो गए हैं कि पाकिस्तान सरकार के लिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय राजनीतिक नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन आंदोलनों के सफल होने से JAAC का जनाधार बढ़ा। अब संगठन महंगाई के मुद्दे से आगे बढ़कर PoK को ज्यादा स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी मांग PoK विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का कहना है कि जो लोग पाकिस्तान के दूसरे शहरों में रहते हैं, उन्हें PoK की सरकार बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। JAAC के मुताबिक इन 12 सीटों की वजह से स्थानीय मतदाताओं की राय का असर कम हो जाता है और अक्सर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए जून की शुरुआत में JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च शुरू होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलन के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के वर्षों में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर अब तक अपेक्षाकृत शांत माना जाता था। लेकिन JAAC के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने इस धारणा को बदल दिया है। अब पहली बार पाकिस्तान को उसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसे वह लंबे समय से स्थिर और शांत बताता रहा है। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलन के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यही से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हुई। JAAC बोली- पाकिस्तान से अलग होना नहीं चाहते PoK एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था के तहत चलता है। यहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और अलग झंडा है। हालांकि रक्षा, विदेश नीति और कई अहम मामलों पर अंतिम फैसला पाकिस्तान की केंद्र सरकार का ही होता है। यहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर कई लोग मानते हैं कि उनके पास सीमित अधिकार हैं और बड़े फैसले इस्लामाबाद में लिए जाते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि वह न तो पाकिस्तान से अलग होना चाहती है और न ही भारत में शामिल होना चाहती है। संगठन का कहना है कि उसकी सिर्फ इतनी मांग है कि PoK के लोगों को अपने इलाके के फैसले लेने का ज्यादा अधिकार मिले। इसके लिए वह ज्यादा स्थानीय अधिकार और संवैधानिक बदलाव की मांग कर रहा है। सेना बोली- आंदोलनकारी कानूनी तरीके से मांग उठाएं पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी का कहना है कि सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ संयम बरता है। चौधरी ने कहा कि सरकार ने कई बार JAAC से कहा कि वह 27 जुलाई से शुरू हुए स्थानीय चुनाव में हिस्सा ले और अपनी मांगें कानूनी तरीके से उठाए। लेकिन आंदोलनकारी सड़क पर दबाव बनाकर अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया है। संगठन का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र बिना कोई वजह बताए खारिज कर दिए गए। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है। इस्लामाबाद के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा का कहना है कि 2024 और 2025 के आंदोलनों के दौरान सरकार ने बिजली सस्ती करने और आटे पर सब्सिडी जैसी रियायतें दी थीं। इससे लोगों में यह धारणा बन गई कि सड़क पर उतरकर दबाव बनाने से सरकार झुक जाती है। इसी वजह से JAAC अब राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर भी बड़े आंदोलन कर पा रही है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन:12 रिजर्व सीटें क्यों खत्म कराना चाहते हैं प्रदर्शनकारी, मांगे क्यों नहीं मान रही सरकार

पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। पाकिस्तान ने हमेशा भारत के साथ कश्मीर विवाद को सबसे बड़ा मुद्दा माना। इस वजह से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी परेशानियों पर कम ध्यान दिया गया। अब वहां हालात ऐसे हैं कि सरकार के लिए उनकी आवाज दबाना मुश्किल हो रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के कुछ साल में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में PoK इनकी तुलना में अब तक शांत माना जाता था, लेकिन अब यह धारणा बदल चुकी है। जिस PoK को पाकिस्तान हमेशा शांत बताता रहा, वहीं अब उसके खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यहीं से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हुई। JAAC बोली- पाकिस्तान से अलग होना नहीं चाहते PoK एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था के तहत चलता है। यहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और अलग झंडा है। हालांकि रक्षा, विदेश नीति और कई अहम मामलों पर अंतिम फैसला पाकिस्तान की केंद्र सरकार का ही होता है। यहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर कई लोग मानते हैं कि उनके पास सीमित अधिकार हैं और बड़े फैसले इस्लामाबाद में लिए जाते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि वह न तो पाकिस्तान से अलग होना चाहती है और न ही भारत में शामिल होना चाहती है। संगठन का कहना है कि उसकी सिर्फ इतनी मांग है कि PoK के लोगों को अपने इलाके के फैसले लेने का ज्यादा अधिकार मिले। इसके लिए वह ज्यादा स्थानीय अधिकार और संवैधानिक बदलाव की मांग कर रहा है। सेना बोली- आंदोलनकारी कानूनी तरीके से मांग उठाएं पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी का कहना है कि सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ संयम बरता है। चौधरी ने कहा कि सरकार ने कई बार JAAC से कहा कि वह 27 जुलाई से शुरू हुए स्थानीय चुनाव में हिस्सा ले और अपनी मांगें कानूनी तरीके से उठाए। लेकिन आंदोलनकारी सड़क पर दबाव बनाकर अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया है। संगठन का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र बिना कोई वजह बताए खारिज कर दिए गए। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है। इस्लामाबाद के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा का कहना है कि 2024 और 2025 के आंदोलनों के दौरान सरकार ने बिजली सस्ती करने और आटे पर सब्सिडी जैसी रियायतें दी थीं। इससे लोगों में यह धारणा बन गई कि सड़क पर उतरकर दबाव बनाने से सरकार झुक जाती है। इसी वजह से JAAC अब राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर भी बड़े आंदोलन कर पा रही है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… PoK में पाकिस्तानी फोर्स ने लोगों पर गोलियां चलाईं:पाकिस्तान सरकार के खिलाफ 40 हजार प्रदर्शनकारी जुटे थे; कई लोग घायल
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के शांतिपूर्ण प्रदर्शन रैली पर पाकिस्तानी फोर्स ने गोलियां चला दीं। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC ने दावा किया कि अब्बासपुर के सरदार गुलाम हुसैन खान स्पोर्ट्स स्टेडियम में करीब 40 हजार लोग जुटे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

US New Tariffs Row: भारत समेत 60 देशों पर नए टैरिफ को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का भारी विरोध, 25 अमेरिकी राज्यों ने ठोका मुकदमा

US New Tariffs Row: डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 25 अमेरिकी राज्यों के एक समूह ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जिसके तहत अमेरिका के कुल आयात में 99.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए गए हैं। अमेरिका ने बंधुआ मजदूरी पर पर्याप्त कार्रवाई न होने का हवाला देते हुए पिछले महीने इन 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक के नए आयात शुल्क लगाए थे।

ये शुल्क 24 जुलाई को समाप्त हो चुके 10 प्रतिशत के ग्लोबल इंपोर्ट ड्यूटी के स्थान पर लागू किए गए हैं। राज्यों का तर्क है कि व्हाइट हाउस जबरन मजदूरीसे जुड़ी चिंताओं का गलत इस्तेमाल करके एक बड़े टैरिफ सिस्टम को फिर से लागू करने की कोशिश कर रहा है। जबकि इस साल की शुरुआत में उसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हार का सामना करना पड़ा था।

इन 25 राज्यों ने कई देशों पर फिर से शुल्क लागू करने के ट्रंप प्रशासन के फैसले के खिलाफ सोमवार 3 अगस्त को अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट का रुख किया। राज्यों का तर्क है कि इस कदम से पूरे देश में उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर लागत का बोझ बढ़ेगा। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटीटिया जेम्स, गर्वनर कैथी होचुल और डेमोक्रेटिक राज्यों के इस समूह ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय से इन शुल्कों को अवैध घोषित करने का अनुरोध किया है।

जेम्स ने एक बयान में कहा, “सुप्रीम कोर्ट में हार के बाद भी प्रशासन (ट्रंप) एक बार फिर नए शुल्कों के जरिए परिवारों और कारोबारों पर अवैध रूप से अतिरिक्त कर का बोझ डालने की कोशिश कर रहा है।” भारत उन 17 देशों में शामिल है, जिन पर अमेरिका ने 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया है। इससे पहले भारत पर 12.5 प्रतिशत शुल्क निर्धारित करने का प्रस्ताव था। भारत को यह राहत 14 जून को अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर बंधुआ मजदूरी से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद मिली।

बयान में कहा गया कि प्रशासन दावा कर रहा है कि वह वैश्विक व्यापार में बंधुआ मजदूरी पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत कार्रवाई कर रहा है। याचिका में दलील दी गई कि यह वास्तव में उन व्यापक आयात शुल्कों को दोबारा लागू करने का एक बहाना भर है, जिन्हें लागू करने के प्रशासन के पूर्व प्रयास विफल हो चुके हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि ट्रंप प्रशासन ने धारा 301 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने कहा, “प्रशासन इसे किसी भी तरह उचित ठहराने की कोशिश करे। लेकिन कानून और हमारा संविधान स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देश पर व्यापक शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।”

25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर

न्यूज एजेंसी AFP की रिपोर्ट के अनुसार, मुकदमे में शामिल 25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर हैं। जबकि नेवादा और वरमोंट में रिपब्लिकन गवर्नर हैं। कोर्ट में हार के बाद प्रशासन ने सेक्शन 301 का रास्ता अपनाया ट्रंप ने पहले ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ के तहत बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे। उनका तर्क था कि अमेरिका का लगातार बना हुआ व्यापार घाटा एक राष्ट्रीय आपातकाल के बराबर है।

हालांकि, फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यह कानून राष्ट्रपति को ऐसे टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता है। इसके चलते प्रशासन को उस व्यवस्था के तहत वसूले गए शुल्क (ड्यूटी) वापस करने पड़े। इसके बाद व्हाइट हाउस ने कुछ समय के लिए 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाया, जो 24 जुलाई को खत्म हो गया।

इसके बाद ‘ट्रेड एक्ट 1974’ के सेक्शन 301 के तहत मौजूदा शुल्क लागू किए गए। ट्रंप प्रशासन ने इन नए शुल्कों को सही ठहराने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया। उनका तर्क था कि प्रभावित देश जबरन मजदूरी (forced labour) से बने सामान के आयात को रोकने में नाकाम रहे हैं।

व्हाइट हाउस ने टैरिफ का बचाव किया

ट्रंप प्रशासन ने इस मुकदमे को खारिज कर दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि ये टैरिफ कानूनी रूप से पूरी तरह सही हैं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा, “अमेरिका अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल उन अनुचित कार्यों, नीतियों और प्रथाओं को खत्म करने के लिए कर रहा है जो अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “किसी विदेशी देश का जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक न लगाना और उसे प्रभावी ढंग से लागू न कर पाना अनुचित है। इससे अमेरिकी व्यापार और अमेरिकी श्रमिकों पर बोझ पड़ता है। इस समस्या का समाधान किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल से ही सेक्शन 301 के तहत लगाए गए टैरिफ कानूनी रूप से मजबूत हथियार साबित हुए हैं और अभी भी हैं।”

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ट्रंप ने ऊंचे टैरिफ का बचाव करते हुए इसे अपने आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा बताया है। उनका तर्क है कि इससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को फिर से बढ़ावा मिलेगा, घरेलू श्रमिकों की सुरक्षा होगी और व्यापार वार्ता में वाशिंगटन को बेहतर स्थिति मिलेगी।