‘शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का अधिकार’— सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल

Supreme Court on cjp protest

छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। CJI सूर्यकांत की बेंच ने पुलिस की कथित ज्यादती पर सवाल उठाते हुए देशभर में विरोध प्रदर्शनों के लिए एक समान प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत बताई। ALSO READ: 'बेटी के बयान से दुखी हूं, लेकिन पिता को दोष नहीं दे सकते'— केशव महंता के बचाव में बोले हिमंत बिस्वा सरमा

CJI सूर्यकांत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान में है। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार पूरी तरह से गारंटीकृत है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सिर्फ इसलिए कि आंदोलन हो रहा है, पुलिस की ज्यादती को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोपों पर भी चिंता जताई।

 

पुलिस को चोट पहुंचना भी उतनी ही चिंता की बात

जब एक वकील ने बेकाबू भीड़ द्वारा पुलिसकर्मियों के घायल होने और उनके परिवारों पर हमले की घटनाओं का ज़िक्र किया, तो जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा, 'पुलिस को चोट पहुंचना भी उतनी ही चिंता की बात है। हम राज्य से जवाब मांग सकते हैं कि पर्याप्त सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए गए? ALSO READ: Rahul Gandhi : राहुल गांधी का अमित शाह को पत्र, छात्रों पर कार्रवाई को लेकर मांगा जवाब; पूछा- क्या पेलट गन इस्तेमाल की मंजूरी दी गई थी?

 

शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट के लिए हो प्रोटोकॉल

CJI ने कहा कि देश भर में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए। जब कोई शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करना चाहता है, तो एक प्रोटोकॉल होना चाहिए। उसके लिए उचित जगह होनी चाहिए। इस मामले में कोई बाधा नहीं है। लेकिन अगर कोई असामाजिक तत्व है, तो उससे निपटा जा सकता है। 

 

कोर्ट ने आगे कहा कि इस मुद्दे के लिए पूरे देश में एक जैसा नजरिया अपनाने की ज़रूरत है और एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी गाइडलाइंस बनाने की बात कही। इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

उन नीट विद्यार्थियों की कहानी, जो पेपर लीक के बाद चले गए

cjp jantar mantar protest

जंतर मंतर पर चल रहे विद्यार्थियों के प्रदर्शन में शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन प्रदर्शनकारी उन 21 नीट अभ्यर्थियों का जिक्र नहीं करते थे जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सुनते ही कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने स्टेज पर प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए उस पोस्टर को सबसे पहले मंगवाया जिसमें उन नीट अभ्यर्थियों के नाम थे, जिनकी मृत्यु हो चुकी है।

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जंतर मंतर पर चल रहे विद्यार्थियों के प्रदर्शन में शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन प्रदर्शनकारी उन 21 नीट अभ्यर्थियों का जिक्र नहीं करते थे जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। हालांकि सरकार ने इस बात को नहीं कहा है लेकिन प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इन बच्चों ने नीट पेपर लीक होने के बाद आत्महत्या कर ली थी। रेमा बेगम भी इनमें से एक थीं। भारतीय राज्य के एक दूरदराज गांव में अपनी बीमार मां के साथ बड़ी हुई रेमा बेगम डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं, लेकिन उनकी मौत के साथ ही उनका यह सपना अधूरा रह गया।

 

कई साल की पढ़ाई और महंगी कोचिंग क्लासों के बाद, 20 साल की रेमा को विश्वास था कि उन्होंने आखिरकार एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट पाने के लिए पर्याप्त मेहनत कर ली है। फिर खबर आई कि जिस मेडिकल प्रवेश परीक्षा में वे बैठी थीं, उसका प्रश्नपत्र लीक हो गया था और दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया गया।

 

 कुछ ही दिनों बाद, बेगम की मौत हो गई। इस घटना के बाद अपनी जान गंवाने वाले कम से कम 20 छात्रों में वे भी शामिल थीं। उनकी मौत के एक महीने बाद भी, बेगम के पिता रजऊल इस्लाम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी लाडली बेटी हिम्मत कैसे हार गई। लेकिन उनका मानना है कि दोबारा परीक्षा के ऐलान ने सब कुछ बदल दिया। न्यूज एजेंसी एएफपी को फोन पर इस्लाम ने बताया,”परीक्षा के बाद, उसे पूरा भरोसा था कि वह इसे पास कर लेगी। लेकिन जब पेपर लीक होने के कारण दोबारा परीक्षा की घोषणा हुई, तो वह बिल्कुल बदल गई और खुद में सिमट गई।”

 

उन्होंने कहा कि परिवार की कोई भी बात उसे सांत्वना नहीं दे सकी। मछली का कारोबार करने वाले इस्लाम ने अपनी बेटी की तैयारी पर काफी खर्च किया था और उसे दो साल के लिए बड़े शहरों के कोचिंग सेंटरों में भेजा था। उन्होंने कहा,”मैंने उसकी पढ़ाई पर बहुत पैसा खर्च किया था, इसलिए उसे चिंता थी कि यह सब बेकार चला जाएगा।”

 

परीक्षा की नई तारीख से कुछ दिन पहले बेगम ने आत्महत्या कर ली। उनकी मौत भारत में विद्यार्थियों पर उस दबाव को उजागर करती है, जहां किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलना आर्थिक सुरक्षा के सबसे बड़े साधनों में से एक माना जाता है।साहित्यकार और पूर्व प्रोफेसर जी। एन। देवी ने नीट का जिक्र करते हुए कहा, “इसलिए नीट परीक्षा पास करने का मतलब कई परिवारों के लिए एक खुशहाल और आरामदायक जीवन का आश्वासन है। लेकिन इन सीटों की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों की संख्या देश में मौजूद संस्थानों की तुलना में बहुत अधिक है।” इस साल भी करीब बीस लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने देश भर में लगभग 1,37,000 मेडिकल सीटों के लिए नीट की परीक्षा दी। राजस्थान में, किसान राजेश कुमार ने अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी और 11 लाख रुपये का कर्ज लिया ताकि उनका बेटा प्रदीप मीणा तीन साल तक कोचिंग क्लास जा सके। कुमार ने एएफपी को बताया, “मैंने खेत में रोजाना 16 घंटे तक मजदूरी की ताकि वह कोचिंग जा सके। मुझे लगा कि अगर वह डॉक्टर बन जाता है तो यह सब सार्थक होगा, और मैं अपने बुढ़ापे में एक आरामदायक जीवन जी सकूंगा। परीक्षा के बाद, मीणा को पूरा भरोसा था कि वे सफल हो गए हैं। कुमार ने याद किया कि उनके बेटे ने उन्हें गले लगाया और कहा कि अब भगवान भी मुझे डॉक्टर बनने से नहीं रोक सकते। दोबारा परीक्षा की घोषणा के एक दिन बाद, 22 साल के प्रदीप ने अपनी जान दे दी।

 

उत्तर प्रदेश में, एक और परिवार को अपने 21 साल के बेटे ऋतिक मिश्रा की मौत के बाद ऐसा ही दुख सहना पड़ा। उनके पिता अनूप कुमार मिश्रा ने परीक्षा का जिक्र करते हुए कहा, “यह उनकी तीसरी कोशिश थी और उन्होंने कहा था कि इस बार उनका पेपर अच्छा गया है।” परीक्षा लीक की खबर सामने आने के एक दिन बाद उनके बेटे की मौत हो गई।

 

उन विद्यार्थियों के लिए जिन्होंने आखिरकार दोबारा परीक्षा दी, यह अनुभव बहुत थका देने वाला था। 19 साल चैतन्य अग्रवाल ने कहा, “यह मानसिक रूप से बहुत हताश करने वाला है। आप अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं और फिर आपको इसे दोबारा देने के लिए मजबूर किया जाता है।” शिक्षकों का कहना है कि इसके भावनात्मक प्रभाव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। पूर्वी शहर कोलकाता के एक कोचिंग सेंटर के शिक्षक अभिजीत पात्रा ने कहा, “परीक्षा की तैयारी करना और उसे देना बहुत तनावपूर्ण अनुभव है, और यह सब फिर से करना आसान नहीं है। पेपर लीक इस मुश्किल अनुभव को और भी बदतर बना देता है।” 

 

 

पूर्व प्रोफेसर देवी कहते हैं कि कई परिवारों के लिए, पेपर लीक सालों के त्याग के बाद एक विश्वासघात जैसा था। उन्होंने कहा कि प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी अक्सर आर्थिक रूप से नुकसानदेह और सामाजिक रूप से थका देने वाली होती है, खासकर कम आय वाले परिवारों के लिए जो महंगे निजी विश्वविद्यालयों या विदेश में पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते। देवी कहती हैं, “वे आशा के साथ तैयारी की यह यात्रा शुरू करते हैं, इसलिए जब उन्हें पता चलता है कि पेपर लीक हो गया है या बेच दिया गया है, तो वे ठगा हुआ महसूस करते हैं।”

 

राजधानी नई दिल्ली में विरोध स्थल से हजारों किलोमीटर दूर, बेगम का परिवार अभी भी जवाब तलाश रहा है। उनके पिता ने कहा, “मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह परीक्षाओं में अनियमितताओं को गंभीरता से ले। उन्हें समझना चाहिए कि गरीब परिवार के बच्चे के लिए बेहतर जिंदगी का सपना देखना और उसके लिए काम करना आसान नहीं होता।”

 

तमिलनाडु की 17 साल की विद्यार्थी एस अनिता ने भी नीट की परीक्षाओं के बाद आत्महत्या कर ली थी। लेकिन मौत से पहले उन्होंने नीट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी भी डाली थी कि नीट की परीक्षा ग्रामीण और राज्य शिक्षा बोर्ड के विद्यार्थियों को अलग थलग करती है। कॉकरोच जनता पार्टी और प्रदर्शनकारियों की मांग यह भी है कि जिन स्टूडेंट्स की जान गई, उनके परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।

H1B Visa Fee: अमेरिका जाने वाले भारतीयों को बड़ी राहत! H-1B वीजा पर ट्रंप के ₹95 लाख की फीस पर कोर्ट ने दिया बड़ा झटका

US Court Blocks Trump H-1B Visa Fee: अमेरिका में रहने के लिए जारी होने वाले H-1B वीजा पर एक बड़ी राहत वाली खबर आई है। एक संघीय अपील अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने नए H-1B वीजा पर करीब 95 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस लगाने वाले आदेश पर रोक हटाने से साफ इनकार कर दिया है।

बोस्टन स्थित ‘फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स’ की तीन जजों की पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें इस फीस को गैर-कानूनी करार दिया गया था। अदालत के इस फैसले से अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।

अदालत ने क्यों लगाई $100,000 की वीजा फीस पर रोक?

यूएस डिस्ट्रिक्ट जज लियो टी. सोरोकिन ने 8 जून 2026 के अपने आदेश में कहा था कि ट्रंप प्रशासन द्वारा इतनी बड़ी फीस वसूलना एक तरह का ‘अवैध टैक्स’ है, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति या कार्यपालिका को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं दिया है।

20 डेमोक्रेटिक शासित राज्यों के अटॉर्नी जनरल द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया कि राष्ट्रपति ने संसद से कानून पास कराने के बजाय सिर्फ एक राष्ट्रपति घोषणापत्र के जरिए इस फीस को लागू कर अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया है।

अपील अदालत ने 1989 के अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार नागरिकों या कंपनियों पर कोई बड़ा वित्तीय बोझ (टैक्स या फीस) डालती है, तो उसके लिए संसद की स्पष्ट मंजूरी अनिवार्य है। ट्रंप प्रशासन यह साबित करने में विफल रहा कि उनके पास इसकी कानूनी मंजूरी थी।

क्या था ट्रंप प्रशासन का तर्क और फैसला?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन के जरिए $100,000 की H-1B वीजा फीस लगाने का ऐलान किया था। प्रशासन का कहना था कि अमेरिकी कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए H-1B वीजा कार्यक्रम का गलत इस्तेमाल करती हैं, जिससे अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छिन जाती हैं। सरकार के मुताबिक, इस भारी फीस का मकसद कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने से हतोत्साहित करना था।

भारतीय IT प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों के लिए राहत क्यों?

H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को आईटी, इंजीनियरिंग और विज्ञान जैसे विशेष क्षेत्रों में विदेशी कुशल पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। अमेरिका हर साल कुल 85,000 H-1B वीजा करीब 65,000 रेगुलर कोटा और 20,000 अमेरिका से मास्टर डिग्री हासिल करने वालों के लिए जारी करता है। इस कोटे का बड़ा हिस्सा भारत और चीन के पेशेवरों को मिलता है।

इस नए नियम से पहले, अमेरिकी कंपनियों को एक H-1B कर्मचारी को स्पॉन्सर करने के लिए औसतन $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4.1 लाख रुपये) ही देने पड़ते थे। $100,000 की फीस लागू होने से कंपनियों के लिए विदेशी प्रतिभाओं को बुलाना बेहद खर्चीला हो जाता।

आगे क्या होगा?

अपील अदालत का यह स्टे खारिज होने का मतलब है कि जब तक इस पूरे मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक ट्रंप प्रशासन $100,000 की इस बढ़ी हुई फीस को लागू नहीं कर सकता है। यानी फिलहाल पुरानी फीस प्रक्रिया के तहत ही H-1B वीजा आवेदन स्वीकार किए जाएंगे।

Manoj Muntashir: ‘मुझे शर्म आ रही है, यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी’, आदिपुरुष पर बोले मनोज मुंतशिर

Manoj Muntashir: ‘आदिपुरुष’ के सिनेमाघरों में आने के तीन साल बाद, फिल्म के डायलॉग लिखने वाले मनोज मुंतशिर ने ओम राउत के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म को अपनी जिंदगी की ‘सबसे बड़ी गलती’ बताया है। हाल ही में एक इंटरव्यू में, मुंतशिर ने प्रभास और कृति सेनन स्टारर इस फिल्म को लेकर हुए विरोध को याद किया और माना कि उन्हें इस पर ‘शर्म’ आती है।

मनोज ने ‘टाइम्स नाउ’ से कहा, “शुरुआत में, मैंने इसे ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। मुझे बात समझने में दो दिन लग गए। ‘आदिपुरुष’ मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी और उस फिल्म का बचाव करना उससे भी बड़ी गलती थी। फिल्म को लेकर जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मुझे बहुत शर्मिंदगी है और जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं देश से माफ़ी मांगता हूं।”

लेखक ने फ़िल्म के डायलॉग्स की आलोचना पर भी बात की और कहा, “अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे शर्म आती है कि मैंने वे डायलॉग लिखे थे। मुझे नहीं पता कि मैंने किस ट्रिप के दौरान उन्हें लिखा था।”आदिपुरुष जून 2023 में रिलीज़ हुई थी। यह फ़िल्म हिंदू पौराणिक महाकाव्य रामायण पर आधारित है।

हालांकि, रिलीज़ के बाद, महाकाव्य को गलत तरीके से दिखाने के आरोप में दर्शकों ने फ़िल्म की कड़ी आलोचना की। लोगों ने फ़िल्म के डायलॉग और रावण व भगवान हनुमान के चित्रण पर निराशा जताई। भले ही मेकर्स ने विवादित डायलॉग ‘कपड़ा तेरे बाप का’ को बदल दिया, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। ओम राउत के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के CBFC सर्टिफ़िकेशन को रद्द करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इसे खारिज कर दिया।

इससे पहले, फ़िल्म में सीता का किरदार निभाने वाली कृति सेनन ने बताया था कि दर्शकों की आलोचना के बाद उन्हें ‘बहुत दुख’ हुआ था। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कृति ने कहा, “आपको बहुत दुख होता है और आपकी आंखों में आंसू भी आ सकते हैं, आप सोचते हैं कि क्या गलत हो गया।”

उन्होंने आगे कहा, “मकसद कभी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं होता। हर प्रोजेक्ट के पीछे की मंशा हमेशा सकारात्मक होती है। हालांकि, हमें इस सच्चाई का सामना करना होगा कि कभी-कभी चीज़ें वैसी नहीं होतीं जैसी हम चाहते हैं, और ऐसे अनुभवों से सीखना ज़रूरी है।”

नेपाल के प्रधानमंत्री पर सुप्रीम कोर्ट में दखल का आरोप:3 जजों पर इस्तीफे का दवाब बना रहे बालेन शाह; अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने चेतावनी दी

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार पर सुप्रीम कोर्ट को अपने पक्ष में करने की कोशिश के आरोप लगे हैं। तीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (ICJ) ने संयुक्त बयान जारी कर यह आरोप लगाए हैं। संगठनों का कहना कि सरकार तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों पर इस्तीफा देने का दबाव बना रही है। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है। संगठनों का कहना है कि सरकार का मकसद सुप्रीम कोर्ट की संरचना बदलना है। उनका आरोप है कि हाल के महीनों में ऐसे कई कदम उठाए गए हैं जिनसे अदालत की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है और संवैधानिक मामलों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है। मुख्य न्यायधीश की नियुक्ति को लेकर भी विवाद बयान में मनोज कुमार शर्मा को नेपाल का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। शर्मा उस समय वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर थे। उनसे सीनियर तीन न्यायाधीश को नजरअंदाज कर दिया गया। इसी वजह से विवाद शुरू हुआ। नेपाल में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है। इस बार इस परंपरा का पालन नहीं किया गया और मनोज शर्मा को तब यह पद दिया गया जब उनसे सीनियर जस्टिस सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल मौजूद थे। इसके अलावा संगठन का आरोप है कि मनोज कुमार शर्मा के खिलाफ मिली शिकायतों की भी खुली और निष्पक्ष जांच नहीं की गई। संसदीय सुनवाई समिति को शर्मा के खिलाफ कुल 16 शिकायतें मिली थीं। हालांकि ये शिकायतें गोपनीय रखी गई और मीडिया के सामने पेश नहीं की गईं। बिना सबूत के जजों पर इस्तीफे का दबाव बयान में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में शर्मा से तीन सीनियर जस्टिस सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा है। संगठनों का कहना है कि अब तक इन तीनों के खिलाफ ऐसा कोई सार्वजनिक आरोप या ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी गलती की है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि नेपाल के संविधान के मुताबिक, किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होते ही उसे तुरंत निलंबित कर दिया जाता है। अगर सुप्रीम कोर्ट के तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों को एक साथ निलंबित किया गया तो अदालत की संरचना और कामकाज पर बड़ा असर पड़ेगा। यह ऐसे समय में होगा, जब सुप्रीम कोर्ट सरकार के कई अहम फैसलों और संवैधानिक मामलों की सुनवाई कर रही है। संगठनों का कहना है कि अगर बिना ठोस संवैधानिक आधार के महाभियोग का इस्तेमाल किया गया तो इससे यह संदेश जाएगा कि सरकार अदालत की संरचना बदलकर लंबित मामलों के फैसलों को प्रभावित करना चाहती है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर जनता का भरोसा भी कमजोर हो सकता है। संवैधानिक परिषद में बदलाव पर आपत्ति जताई इन संगठनों ने मई 2026 में संवैधानिक परिषद अधिनियम में अध्यादेश के जरिए किए गए संशोधन पर भी आपत्ति जताई है। नेपाल में संवैधानिक परिषद एक अहम संस्था है। यही परिषद मुख्य न्यायाधीश, चुनाव आयोग, मानवाधिकार आयोग और अन्य संवैधानिक निकायों के प्रमुखों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करती है। विवाद इस बात पर है कि बालेन शाह सरकार ने मई 2026 में संसद से कानून पारित कराने के बजाय अध्यादेश के जरिए परिषद के काम करने के नियम बदल दिए। पहले बैठक के लिए ज्यादा सदस्यों की मौजूदगी जरूरी थी। नियुक्तियों पर व्यापक सहमति या पूरे परिषद के बहुमत की जरूरत पड़ती थी। अब संशोधन के बाद कम सदस्यों की मौजूदगी में भी बैठक हो सकती है। इतना ही नहीं बैठक में मौजूद सदस्यों के साधारण बहुमत से फैसला लिया जा सकता है। —————————— नेपाल से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… नेपाली PM बालेन शाह ने अपना ही नियम क्यों तोड़ा:भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात करेंगे; 3 महीने में ही फैसले से पलटे
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) पहली बार अपने बनाए नियम से हटकर विदेशी राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने तय किया था कि वह किसी भी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात नहीं करेंगे। नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बालेन शाह भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Delhi Metro Stations closed: CJP प्रोटेस्ट के कारण दिल्ली मेट्रो के 16 स्टेशन आज भी बंद! देखें पूरी लिस्ट, यहां मिलेगी इंटरचेंज सुविधा

Delhi Metro Stations closed: देश की राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता (CJP)पार्टी के विरोध प्रदर्शन के बीच सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) ने 16 मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। डीएमआरसी ने गुरुवार (23 जुलाई) सुबह बताया कि लोक कल्याण मार्ग, राजीव चौक, पटेल चौक, रामकृष्ण आश्रम मार्ग, बाराखंबा रोड, सुप्रीम कोर्ट, सेवा तीर्थ, जनपथ, मंडी हाउस, केंद्रीय सचिवालय, आईटीओ, दिल्ली गेट, इंद्रप्रस्थ, खान मार्केट, जोर बाग और शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशनों को अगले आदेश तक बंद कर दिया गया है। DMRC के अनुसार, राजीव चौक, मंडी हाउस और केंद्रीय सचिवालय स्टेशनों पर ट्रेन बदलने की सुविधा उपलब्ध है।

डीएमआरसी का यह कदम जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के जारी विरोध प्रदर्शन के बीच उठाया गया है। इससे पहले बुधवार को भी इसी तरह मेट्रो सेवाएं प्रभावित हुई थीं। 16 मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने की वजह से बुधवार सुबह के व्यस्त समय में हजारों लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। दफ्तर जाने वाले कई यात्रियों को बीच रास्ते में अपना रूट बदलना पड़ा। कुछ को अपरिचित स्टेशनों पर उतरना पड़ा और वैकल्पिक परिवहन के लिए मशक्कत करनी पड़ी।

DMRC ने क्या कहा?

दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) की तरफ से गुरुवार (23 जुलाई) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में लिखा, “सेवा अपडेट! नीचे बताए गए मेट्रो स्टेशन सुबह 07:30 बजे से अगले आदेश तक बंद रहेंगे। हालांकि, राजीव चौक, मंडी हाउस और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट यानी केंद्रीय सचिवालय पर इंटरचेंज (दूसरी लाइन की मेट्रो बदलने की सुविधा) की सुविधा उपलब्ध रहेगी।

ये 16 स्टेशन हैं बंद

1. लोक कल्याण मार्ग

2. राजीव चौक

3. पटेल चौक

4. रामकृष्ण आश्रम मार्ग

5. बाराखंभा रोड

6. सुप्रीम कोर्ट

7. सेवा तीर्थ

8. जनपथ

9. मंडी हाउस

10. केंद्रीय सचिवालय

11. आईटीओ

12. दिल्ली गेट

13. इंद्रप्रस्थ

14. खान मार्केट

15. जोर बाग

16. शिवाजी स्टेडियम

मेट्रो बंद होने से लोग हुए परेशान

इससे पहले बुधवार को प्रदर्शन के मद्देनजर सुरक्षा उपायों के तहत 16 मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने से दफ्तर जाने के व्यस्त समय में मध्य दिल्ली में यात्रियों की आवाजाही बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई। यात्रियों ने बताया कि कई मार्गों पर मेट्रो सेवाएं जारी थीं। लेकिन ट्रेनें बंद किए गए स्टेशनों पर नहीं रुक रही थीं। इसके कारण यात्रियों के पास आगे जाने और फिर सड़क मार्ग से वापस लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

केंद्रीय सचिवालय से होकर यात्रा कर रही वृंदा नामक एक यात्री ने बताया कि प्रदर्शनकारी स्टेशन परिसर के पास जमा हो गए थे, जिससे यात्रियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने कहा, “केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन पर प्रदर्शनकारी जमा हो गए थे। उनमें से कई लोग निकास द्वार के पास एकत्र होकर ‘वंदे मातरम’ के नारे लगा रहे थे। वहां भारी अनिश्चितता का माहौल था और लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि वे स्टेशन से बाहर निकल पाएंगे या नहीं।”

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येलो लाइन पर यात्रा कर रहे एक अन्य यात्री ने बताया कि ट्रेन में की जा रही घोषणाओं के जरिए यात्रियों को सूचित किया जा रहा था कि दिल्ली गेट से खान मार्केट के बीच के स्टेशनों पर उतरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कई यात्रियों ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनके गंतव्य स्टेशन बंद कर दिए गए हैं तो वे वैकल्पिक रूट तलाशने में जुट गए।

इससे उन्हें दफ्तर, कॉलेज पहुंचने और अन्य जरूरी कामों के लिए देरी हुई। चालू स्टेशनों के बाहर कई लोग ‘नेविगेशन ऐप’ देखते नजर आए। जबकि कुछ अपने परिवार के सदस्यों को फोन कर रहे थे। कई लोग कैब बुक करते दिखे। वहीं, बस स्टॉप और ऑटो-रिक्शा स्टैंड पर लोगों की लंबी कतारें लग गईं।

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फ्रांस में कृषि कानून का विरोध, पर्यावरण मंत्री का इस्तीफा:कीटनाशकों के इस्तेमाल की मंजूरी से मंत्री नाराज, बोलीं- यह मधुमक्खियों के लिए नुकसानहेद

फ्रांस की पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने इस्तीफा देने का ऐलान किया है। उन्होंने यह फैसला उन्होंने विवादित कृषि बिल के विरोध में लिया है, जिसमें दो प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कीटनाशक मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए नुकसानदायक हैं। पर्यावरण मंत्री बनीं बारबू आज राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंपेंगी। फ्रांस की संसद ने मंगलवार को यह बिल पारित किया था। सरकार ने दावा किया कि वह ये कानून किसानों की मदद के लिए लाया जा रहा है। उसका कहना है कि किसानों को घटती कमाई और खेती की बढ़ती लागत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बिल के दो प्रावधानों से सबसे ज्यादा विवाद 1. प्रतिबंधित कीटनाशकों एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन के इस्तेमाल की अस्थायी मंजूरी देना। इसका इस्तेमाल चुकंदर, सेब और चेरी की खेती में किया जा सकेगा। 2. अगले 10 वर्षों में किसानों के लिए पानी के भंडारण (वॉटर स्टोरेज) की अनुमति की सीमा दोगुनी करना। इन्हीं प्रावधानों को लेकर पर्यावरणविदों और सरकार के भीतर भी विरोध बढ़ गया। इसके विरोध में पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने पद छोड़ने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने उनसे किए गए वादे के विपरीत इस प्रावधान को हटाने पर कोई चर्चा ही नहीं होने दी। बारबू ने सोशल मीडिया पर लिखा, पिछले नौ महीनों में मैंने जंगलों, साफ पानी, स्वच्छ हवा, उपजाऊ मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा के लिए काम किया। लेकिन विरोधी ताकतें इतनी मजबूत हो गई हैं कि मैं अपने मकसद पूरे नहीं कर पा रही। राजनीति मेरी दुनिया नहीं है और अगर राजनीति ऐसी ही होती है, तो यह कभी मेरी दुनिया नहीं बन सकती। वहीं, सरकार का कहना है कि नए प्रावधान लाने का फैसला उन किसानों की मदद के लिए लिया गया है, जो मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। पहले भी विवाद में रहा है यह कीटनाशक एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन रसायन नियोनिकोटिनॉइड नाम के कीटनाशकों के समूह में आते हैं। यूरोपीय संघ (EU) के नियमों के तहत इनका इस्तेमाल कुछ शर्तों के साथ किया जा सकता है, लेकिन फ्रांस में इन पर फिलहाल प्रतिबंध है। एसेटामिप्रिड पर फ्रांस ने 2018 में प्रतिबंध लगाया था, क्योंकि इसे मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए हानिकारक माना गया था। एक साल पहले भी इस रसायन पर बैन हटाने की कोशिशें हुई थीं लेकिन फ्रांस की सुप्रीम कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह फैसला पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के अनुरूप नहीं है।

‘आप हमारा समय बर्बाद न करें…’; CJP प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

CJP Protest in Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में निकाले गए मार्च के दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से बुधवार (22 जुलाई) को इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता वकील ने CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए जल्द सुनवाई की मांग की। इस पर सीजेआई ने कहा कि हमारा समय बर्बाद मत कीजिए। हम कोई वीडियो नहीं देखना चाहते।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा, “पुलिस की बर्बरता से जुड़े वीडियो भी मेरे पास हैं… यदि इस मामले को कल (गुरुवार 23 जुलाई) सूचीबद्ध किया जा सके…।” उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ पुलिस ने कथित तौर पर बर्बरता की और याचिका में तीन अनुरोध किए गए हैं। चीफ जस्टिस ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध ठुकराते हुए स्पष्ट किया कि पीठ इस स्तर पर वीडियो देखने की इच्छुक नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है… हम वीडियो नहीं देखना चाहते।” वकील के दोबारा छात्रों की पिटाई की बात कहने और वीडियो का हवाला देने पर CJP ने कहा, “हमारा समय बर्बाद मत कीजिए। हम कोई वीडियो नहीं देखना चाहते।”

यह याचिका सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से संबंधित है। उस दिन हजारों छात्र और युवा प्रदर्शनकारी कथित परीक्षा अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए मध्य दिल्ली में एकत्र हुए थे।

प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई थी। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े थे।

सरकार नीट पर चर्चा के लिए तैयार

मानसून सत्र शुरू होने के बाद नीट पेपर लीक मामले में छात्रों के आंदोलन को लेकर विपक्ष के हंगामे के कारण संसद में गतिरोध जारी है। सरकार ने बुधवार को लोकसभा में कहा कि वह नीट पेपर लीक मामले में सदन में चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। लोकसभा की कार्यवाही सुबह स्थगित होने के बाद दोबारा 12 बजे शुरू हुई तो लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सरकार की ओर से बयान देने के लिए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू का नाम पुकारा।

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इसी बीच कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई और इस मुद्दे पर विपक्ष के कार्यस्थगन प्रस्ताव पर चर्चा कराने की मांग भी की। रीजीजू ने कहा, “सरकार नीट पेपर लीक पर चर्चा के लिए पूरी तरह से तैयार है। हमने पहले दिन से यह बात कही है। लेकिन चर्चा नियम के तहत होती है। चर्चा कब होनी है, कितनी लंबी होनी है और किस नियम के तहत होनी है, इसका निर्णय स्पीकर (बिरला) सभी दलों के नेताओं से बात कर लेंगे।”

8th Pay Commission: कब से आएगी बढ़ी हुई सैलरी? जानें 8वें वेतन आयोग में किसे मिलेगा फायदा और कब तक लागू होंगी सिफारिशें

8th CPC Beneficiaries & Timeline: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की बेसिक सैलरी, भत्तों और पेंशन में संशोधन के लिए बनाए गए 8वें केंद्रीय वेतन आयोग पर बैठकों और चर्चाओं का दौर जारी है। दशक में एक बार गठित होने वाला यह आयोग लगभग 1 करोड़ से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन ढांचे को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग फिलहाल विभिन्न कर्मचारी संगठनों, यूनियनों और हितधारकों से डेटा जुटाने और बैठकें करने में जुटा है। आइए जानते हैं कि इस आयोग से किन-किन लोगों को लाभ मिलेगा और इसकी सिफारिशें कब तक लागू हो सकती हैं।

8वें वेतन आयोग की मौजूदा स्थिति

8वें वेतन आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। इसके अलावा पूर्व आईएएस पंकज जैन (सदस्य-सचिव) और आईआईएम बैंगलोर के प्रोफेसर पुलक घोष (अंशकालिक सदस्य) इस पैनल का हिस्सा हैं।

आयोग ने सुझाव जमा करने की समयसीमा 15 जून तय की थी और सैलरी/सर्विस डेटा कलेक्शन की समयसीमा 31 जुलाई रखी है। मार्च से ही आयोग की टीम देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का दौरा कर कर्मचारी संगठनों, रेलवे और रक्षाकर्मियों के प्रतिनिधियों से सीधे सुझाव ले रही है।

किन-किन चीजों की समीक्षा कर रहा है आयोग?

आयोग कुल 18 पे-लेवल्स के आधार पर कर्मचारियों और सेवानिवृत्त पेंशनभोगियों के पूरे पे-स्ट्रक्चर की समीक्षा कर रहा है:

  • मूल वेतन: बेसिक पे और पे-मैट्रिक्स का पुनर्गठन।
  • भत्ते: महंगाई भत्ता (DA), महंगाई राहत (DR) और मकान किराया भत्ता (HRA) आदि।
  • पेंशन और अन्य लाभ: पेंशन फॉर्मूला, इंक्रीमेंट नियम, पदोन्नति और अन्य वित्तीय लाभ।

किसे मिलेगा फायदा?

8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लगभग 1 करोड़ लाभार्थियों पर लागू होंगी जिसमें करीब 50 लाख एक्टिव केंद्रीय कर्मचारी और 65 लाख पेंशनभोगी शामिल हैं। पात्र श्रेणियों की पूरी सूची इस प्रकार है:

केंद्रीय सरकारी कर्मचारी: औद्योगिक और गैर-औद्योगिक दोनों।

ऑल इंडिया सर्विसेज: अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी।

सशस्त्र बल: भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना के जवान व अधिकारी।

केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारी: सभी UTs के प्रशासनिक और अन्य कर्मी।

भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा विभाग (IA&AD): कैग (CAG) और संबंधित ऑडिट विभागों के कर्मचारी।

नियामक निकायों के सदस्य: संसद के अधिनियमों के तहत गठित रेगुलेटरी बॉडीज के अधिकारी।

न्यायपालिका: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के कर्मचारी, साथ ही केंद्र शासित प्रदेशों की अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारी।

कब तक आएंगी सिफारिशें और कब मिलेगा पैसा?

केंद्र सरकार ने 8वें वेतन आयोग का गठन 3 नवंबर 2025 को किया था और इसे अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। 18 महीने के तय समय के हिसाब से आयोग की अंतिम रिपोर्ट फरवरी से अप्रैल 2027 के बीच आ सकती है।

पिछले वेतन आयोगों के रुझान को देखें तो सिफारिशें जमा होने के बाद उन्हें लागू करने और संशोधित वेतन देने में 2 से 3 साल का समय लग जाता है। इसका मतलब है कि 2027 में आने वाली सिफारिशों का पूरा लाभ कर्मचारियों और पेंशनर्स को 2029 या 2030 तक पूरी तरह मिल पाएगा।

South Delhi Water Crisis: दिल्ली के कई इलाकों में होगी पानी की किल्लत, DJB ने जारी किया अपडेट

South Delhi Water Crisis: अगर आप दक्षिण दिल्ली के इलाकों में रहते हैं, तो आपको पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, अधिकारियों ने मंगलवार को बताया कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा सोनिया विहार वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में मरम्मत का काम किए जाने के कारण दक्षिण दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी की सप्लाई प्रभावित रही।

दिल्ली जल बोर्ड ने कहा, “साउथ दिल्ली मेन लाइन पर जरूरी रखरखाव कार्य के कारण 22 जुलाई 2026 को सुबह 10 बजे से सोनिया विहार वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से होने वाली पानी की सप्लाई प्रभावित रहेगी। 22 जुलाई की शाम को पानी की सप्लाई नहीं होगी, जबकि 23 जुलाई की सुबह पानी लो प्रेशर के साथ उपलब्ध होगा।”

दिल्ली जल बोर्ड ने प्रभावित इलाकों के निवासियों से अनुरोध है कि वे अपनी जरूरत के हिसाब से पहले ही पर्याप्त पानी जमा कर लें। बोर्ड ने आगे कहा कि जरूरत पड़ने पर तय हेल्पलाइन नंबरों के जरिए अनुरोध करने पर DJB टैंकर उपलब्ध कराए जाएंगे।

प्रभावित होने वाले इलाकों में लाजपत नगर, ग्रेटर कैलाश साउथ, छतरपुर, निजामुद्दीन, ओखला, मालवीय नगर, सरिता विहार और आसपास के क्षेत्र शामिल है।

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