लिव-इन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, शादी जैसा रिश्ता है तो महिला पार्टनर को पत्नी जैसा हक

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Supreme Court on Live-in Relationship: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A का दायरा बढ़ाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई लिव-इन रिश्ता 'शादी जैसा' है और दोनों पक्षों का विवाह करने का इरादा था, तो महिला पार्टनर को भी कानून के तहत पत्नी जैसा सुरक्षा अधिकार मिलेगा। ऐसे रिश्तों में महिला के साथ क्रूरता करने पर पुरुष पार्टनर और उसके रिश्तेदारों पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

 

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि हर लिव-इन रिलेशनशिप पर यह दंडात्मक प्रावधान (IPC 498A) लागू नहीं होगा। यह कानून केवल उन लिव-इन रिश्तों पर लागू माना जाएगा जो बालिग व्यक्तियों की आपसी सहमति से बने हों, 'शादी जैसे रिश्ते' की श्रेणी में आते हों और जिनमें विवाह करने का इरादा रिश्ते का अहम हिस्सा रहा हो। अदालत ने यह भी साफ किया कि यह साबित करने की शुरुआती जिम्मेदारी उसी महिला पर होगी जो कानून के तहत सुरक्षा चाहती है।

शुरुआती जांच के बिना नहीं होगी गिरफ्तारी

सुप्रीम कोर्ट ने दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े निर्देश भी जारी किए हैं। पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी से बचाव के नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

 

कोर्ट का आदेश : लिव-इन पार्टनर या उसके रिश्तेदारों पर यदि महिला के साथ क्रूरता का आरोप लगता है, तो शुरुआती जांच के बिना किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

अनुच्छेद 14 का हवाला और कानून की व्याख्या

शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 498A के तहत मिलने वाली सुरक्षा के मामले में शादीशुदा महिला और 'शादी जैसे लिव-इन रिश्ते' में रहने वाली महिला के बीच फर्क करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है, क्योंकि इसका मुख्य मकसद घरेलू हिंसा और क्रूरता को रोकना है।

 

कोर्ट ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत केवल IPC की धारा 498A तक ही सीमित रहेगा और इस व्याख्या का असर किसी अन्य कानूनी प्रावधान पर नहीं पड़ेगा।

8वें वेतन आयोग का बड़ा गणित, क्या DA मर्जर से कर्मचारियों की सैलरी में आएगा डबल उछाल? ये है पूरा कैलकुलेशन

8th Central Pay Commission updates: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वां केंद्रीय वेतन आयोग इस समय सबसे बड़ा और चर्चा का विषय बना हुआ है। कर्मचारी संगठनों की मांगों और वित्तीय विश्लेषण के मुताबिक अगर 8वें वेतन आयोग में महंगाई भत्ते (DA) का बेसिक वेतन में विलय और वार्षिक इंक्रीमेंट दर में बढ़ोतरी की मांग स्वीकार कर ली जाती है तो नियमित वेतन वृद्धि और DA संशोधनों के संयुक्त प्रभाव से केंद्रीय कर्मचारियों की ग्रॉस सैलरी अगले 7 वर्षों के भीतर लगभग दोगुनी हो सकती है।

आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को आधिकारिक तौर पर 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। इसके साथ ही लगभग 55 लाख से अधिक कार्यरत कर्मचारियों और करीब 69 लाख पेंशनभोगियों (जिसमें सेवानिवृत्त रक्षा कर्मी भी शामिल हैं) के वेतन, पेंशन, भत्तों, सेवा शर्तों और अन्य लाभों की समीक्षा व सिफारिश के लिए नियम एवं शर्तें जारी की गई थीं।

क्षेत्रीय परामर्श जारी: दिल्ली, चेन्नई और पुडुचेरी में होंगी आगामी बैठकें

अभी 8वां वेतन आयोग विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपना क्षेत्रीय परामर्श आयोजित कर रहा है। इसके तहत आगामी बैठकों का कार्यक्रम इस प्रकार तय किया गया है:

दिल्ली: 7 और 10 अगस्त 2026

चेन्नई: 7 और 8 सितंबर 2026 (अपॉइंटमेंट की अंतिम तिथि: 18 अगस्त 2026)

पुडुचेरी: 9 सितंबर 2026 (अपॉइंटमेंट की अंतिम तिथि: 18 अगस्त 2026)

पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित है आयोग

8वें वेतन आयोग की संरचना और नेतृत्व की बात करें तो इसकी कमान पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस के हाथों में है। इसकी अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई हैं। सदस्य-सचिव पूर्व आईएएस अधिकारी पंकज जैन और सदस्य प्रोफेसर पुलक घोष हैं जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। यह आयोग लगभग 50 लाख से 55 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और करीब 65 लाख से 69 लाख पेंशनभोगियों के जीवन को प्रभावित करने वाले बदलावों की सिफारिश करेगा।

कर्मचारी यूनियनों (NC-JCM) की प्रमुख मांगें

कर्मचारी प्रतिनिधि निकायों में सबसे बड़े संगठनों में से एक नेशनल काउंसिल-जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) ने आयोग कई मांगें रखी हैं। इसमें न्यूनतम बेसिक पे को बढ़ाकर ₹69000 करने की मांग है। इसके अलावा मौजूदा 7वें वेतन आयोग के तहत मिलने वाले 3% वार्षिक इंक्रीमेंट को बढ़ाकर 6% करने का सुझाव है। दूसरे संगठनों की मांगों में DA को समय-समय पर बेसिक सैलरी में मर्ज करना शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक 8वें वेतन आयोग में अगर DA मर्जर और 6% इंक्रीमेंट लागू होता है, तो चक्रवृद्धि प्रभाव से सैलरी में भारी उछाल आएगा। जब महंगाई भत्ता 50% से ऊपर चला जाता है, तो इसे मूल वेतन में शामिल करने की मांग बढ़ जाती है। जैसे ही DA का बेसिक पे में विलय होता है, कर्मचारी की बेसिक सैलरी बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप बेसिक पे पर निर्भर अन्य सभी भत्ते (जैसे HRA, TA आदि) भी स्वतः बढ़ जाते हैं।

अभी सरकारी कर्मचारियों को 3% का सालाना इंक्रीमेंट मिलता है। अगर इसे बढ़ाकर 6% किया जाता है और साथ ही नियमित आधार पर DA को बेसिक पे में जोड़ा जाता है, तो वेतन वृद्धि की दर बहुत तेज हो जाएगी। उच्च वार्षिक वेतन वृद्धि और DA मर्जर का यह संयुक्त प्रभाव चक्रवृद्धि की तरह काम करेगा, जिससे 7 साल के भीतर ग्रॉस सैलरी दोगुनी हो सकती है।

फिटमेंट फैक्टर की भूमिका सबसे ज्यादा

नए वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर सबसे निर्णायक भूमिका निभाएगा। अगर पिछला इतिहास दोहराते हुए नया फिटमेंट फैक्टर तय किया जाता है तो कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी में शुरुआती स्तर पर ही बड़ा उछाल देखने को मिलेगा। वैसे एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि 7 साल में सैलरी दोगुनी होने का गणित एक प्रोजेक्शन है। वास्तविक वेतन वृद्धि कितनी होगी, यह 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशों और उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली अंतिम मंजूरी पर ही निर्भर करेगा।

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जापान बैकअप कैपिटल बनाने की तैयारी में, क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की जरूरत है, दिल्ली के अलावा कौन से ऑप्शन चर्चा में रहे?

Japan second capital: जापान एक बड़े भूकंप जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा के दौरान सरकारी कामकाज को बिना किसी रुकावट के जारी रखने के लिए एक बैकअप राजधानी बनाने पर विचार कर रहा है। इसके बाद भारत में भी एक पुरानी बहस फिर से छिड़ गई है कि क्या भारत को भी अपनी एक दूसरी राजधानी की जरूरत है? जापान में जहां यह चर्चा पूरी तरह से आपदा प्रबंधन और आपदा की स्थिति से निपटने की तैयारियों पर केंद्रित है। वहीं भारत में दूसरी राजधानी की मांग ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

यह विचार भारत के लिए नया नहीं है। संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. बी.आर अंबेडकर से लेकर विभिन्न राजनीतिक नेताओं ने समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया है। उनका तर्क रहा है कि भारत का शासन आज भी काफी हद तक नई दिल्ली में ही केंद्रित है।

डॉ. बीआर. अंबेडकर चाहते थे हैदराबाद बने भारत की दूसरी राजधानी

भारत में दूसरी राजधानी के पक्ष में सबसे शुरुआती और मजबूत तर्कों में से एक डॉ बीआर अंबेडकर का था। अपनी 1955 में प्रकाशित पुस्तक थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स में उन्होंने तर्क दिया था कि नई दिल्ली भारत की एकमात्र राजधानी के लिए आदर्श जगह नहीं है। अंबेडकर ने तीन प्रमुख चिंताओं की ओर इशारा किया था।

पहली ये कि दिल्ली दक्षिण भारत से काफी दूर है, जिससे दक्षिण के नागरिकों और अधिकारियों को यहां आने-जाने में भारी असुविधा होती है। दूसरा दिल्ली की भीषण गर्मी और अत्यधिक ठंड इसे एक आरामदायक प्रशासनिक केंद्र नहीं बनने देती। अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि दिल्ली की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से निकटता युद्ध के समय इसे बेहद संवेदनशील और असुरक्षित बनाती है।

इसके विकल्प के रूप में उन्होंने हैदराबाद को देश की दूसरी राजधानी बनाने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने हैदराबाद को एक केंद्रीय रूप से स्थित और कॉस्मोपॉलिटन शहर बताया, जो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक स्थायी संतुलन स्थापित कर सकता है।

बेंगलुरु प्रस्ताव ने फिर ताजा की थी बहस

दूसरी राजधानी का यह मुद्दा साल 2018 में तब फिर से चर्चा में आया जब कर्नाटक के तत्कालिक आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी के रूप में मान्यता देने की मांग की।

इस प्रस्ताव में तर्क दिया गया था कि भारत के टेक्नोलॉजी हब के रूप में बेंगलुरु की स्थिति, वहां का अनुकूल मौसम और मजबूत आर्थिक आधार इसे दक्षिण भारत में एक आदर्श प्रशासनिक केंद्र बनाते हैं। समर्थकों का यह भी मानना था कि इस कदम से देश के शासन ढांचे में दक्षिणी राज्यों का एकीकरण और मजबूत होगा।

दुनिया के कई देशों में हैं एक से अधिक राजधानियां

अगर भारत अपनी प्रशासनिक संस्थाओं को अलग-अलग शहरों में बांटता है तो ऐसा करने वाला वह पहला देश नहीं होगा। दुनिया के कई देशों ने अपनी सरकारी शक्तियों को विभिन्न शहरों में बांट कर रखा हुआ है। दक्षिण अफ्रीका यह मल्टी-कैपिटल मॉडल का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। यहां प्रिटोरिया में कार्यपालिका, केप टाउनमें संसद और ब्लोएमफोनटेन में न्यायपालिका है। इसी तरह मलेशिया ने अपने प्रशासनिक कार्यालयों को पुत्राजया में ट्रांसफर कर दिया है जबकि संसद कुआलालंपुर से ही चलती है।

श्रीलंका की संसद श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे में बैठती है जबकि कोलंबो इसका वाणिज्यिक केंद्र और कई सरकारी संस्थानों का मुख्यालय बना हुआ है। नीदरलैंड एम्स्टर्डम को अपनी संवैधानिक राजधानी मानता है, लेकिन सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट द हेग में स्थित हैं। बोलीविया की भी दो राजधानियां हैं, जहां ला पाज प्रशासनिक राजधानी है और सुक्रे संवैधानिक राजधानी व न्यायपालिका का केंद्र है।

जापान का प्रस्ताव भारत की बहस से अलग क्यों है?

जापान का बैकअप कैपिटल का प्रस्ताव भारत में चल रही दूसरी राजधानी की बहस से एक बड़े मायने में अलग है। टोक्यो जापान की मुख्य राजधानी बना रहेगा। जापानी सरकार केवल एक आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र की संभावनाओं की स्टडी कर रही है ताकि अगर कोई भीषण भूकंप या बड़ी आपदा राजधानी टोक्यो को प्रभावित करती है तो वहां से देश का शासन निर्बाध रूप से चलता रहे। जापान का मुख्य उद्देश्य सरकार का निरंतर संचालन है, न कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व।

क्या भारत को वास्तव में दूसरी राजधानी की जरूरत है?

हालांकि समय-समय पर दूसरी राजधानी का विचार उभरता रहा है, लेकिन दिल्ली में किए गए भारी निवेश (जैसे सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास) को देखते हुए एक नई दूसरी राजधानी बनाना फिलहाल व्यावहारिक नजर नहीं आता। इसके बजाय विशेषज्ञों ने कुछ अधिक व्यावहारिक विकल्प सुझाए हैं। महाराष्ट्र विधानसभा के नागपुर में होने वाले शीतकालीन सत्र की तर्ज पर, हर साल संसद का कम से कम एक सत्र दक्षिण भारत के किसी शहर में आयोजित किया जा सकता है।

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एक्सपर्ट्स के मुताबिक न्याय तक आम जनता की पहुंच आसान बनाने के लिए चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं। फिलहाल नई दिल्ली ही भारत की एकमात्र राजधानी बनी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया भर के देश अपने शासन को अधिक लचीला, सुरक्षित और सुलभ बनाने के रास्ते तलाश रहे हैं, भारत में भी कुछ संस्थानों के विकेंद्रीकरण का सवाल समय-समय पर उठता रहेगा।

Abhijeet Dipke: रिटायर्ड पिता ने विदेश में अभिजीत दिपके की पढ़ाई का खर्च कैसे उठाया? RTI कार्यकर्ता ने CJP के फंड पर उठाए सवाल, जांच की मांग

Abhijeet Dipke: सूरत के एक RTI कार्यकर्ता ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत डिपके के पिता की आर्थिक स्थिति की जांच की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी अपने बेटे की विदेश में हायर एजुकेशन का खर्च कैसे उठा सकता है? RTI एक्टिविस्ट ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) और सेंट्रल GST अधिकारियों से CJP के कानूनी स्टेटस और फंडिंग की जांच करने का भी आग्रह किया है।

RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने अधिकारियों को पत्र लिखकर महाराष्ट्र सरकार के रिटायर्ड कर्मचारी और अभिजीत डिपके के पिता भगवान राव डिपके की आर्थिक स्थिति की जांच की मांग की है। तिवारी ने सवाल किया कि रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद भगवानराव डिपके अपने बेटे को हायर एजुकेशन के लिए विदेश कैसे भेज पाए। इसी आधार पर उनकी आर्थिक स्थिति की जांच की मांग की है।

लीगल डिफेंस फंड भी जांच के दायरे में

डिपके के पिता की आर्थिक जांच की मांग के अलावा, तिवारी ने CJP के उन प्रदर्शनकारियों के लिए घोषित लीगल डिफेंस फंड पर भी आपत्ति जताई है, जिन पर कथित NEET पेपर लीक आंदोलन से जुड़े पुलिस केस चल रहे हैं। तिवारी ने चुनाव आयोग को एक लेटर लिखकर यह पता लगाने को कहा है कि क्या लीगल डिफेंस फंड की घोषणा के बाद कॉकरोच जनता पार्टी को ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 29A के तहत रजिस्टर किया गया है।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक तिवारी ने कहा, “कॉकरोच जनता पार्टी एक अनरजिस्टर्ड संस्था है। लेकिन एक पॉलिटिकल पार्टी के तौर पर काम कर रही है। अगर इसे लीगल डिफेंस फंड के तौर पर 1 करोड़ रुपये देने का वादा किया गया है, तो चुनाव आयोग को यह जांचना चाहिए कि क्या CJP ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 29A के तहत उसके पास रजिस्टर्ड है।” उन्होंने आगे कहा कि अगर पार्टी रजिस्टर्ड नहीं है, तो पॉलिटिकल पार्टी के नाम पर उसका काम करना और फंड इकट्ठा करना या लेना जांच का विषय हो सकता है।

कपिल सिब्बल ने दिया 1 करोड़

एक अलग अर्जी में तिवारी ने सेंट्रल GST अधिकारियों से यह जांचने का आग्रह किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिबल CJP प्रदर्शनकारियों के कानूनी बचाव के लिए दिए गए 1 करोड़ रुपये के योगदान पर 18 प्रतिशत GST देने के लिए जिम्मेदार होंगे। NEET पेपर लीक के आरोपों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों को कानूनी मदद देने के लिए CJP ने एक लीगल डिफेंस फंड बनाया है। सिब्बल ने इस फंड में 1 करोड़ रुपये का योगदान देने की घोषणा की है।

विवाद के बीच अभिजीत दिपके बीमार पड़े

यह नया विवाद सामने आने के बाद महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में अपने घर पर अभिजीत दिपके बीमार पड़ गए। डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी है। न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, दिपके शनिवार सुबह करीब 11:45 बजे अपने घर के पार्किंग एरिया में इंतजार कर रहे लोगों के एक समूह से मिलने के लिए नीचे आए। हालांकि, जल्द ही उन्हें बेचैनी महसूस हुई, जिसके बाद वे घर के पिछले हिस्से में गए और उल्टी की। इसके बाद वे मीडिया से बात किए बिना ही वापस ऊपर चले गए। उनके पिता भगवान दिपके ने बताया कि उनकी जांच के लिए तुरंत डॉक्टरों को बुलाया गया।

दिपके का इलाज करने वाले डॉ. विशाल लहाने ने पत्रकारों को बताया कि उनका ब्लड प्रेशर गिरकर 100/60 mmHg हो गया था। उन्होंने उनकी इस हालत का कारण तनाव और चिंता को बताया। डॉक्टर ने कहा, “दिपके का ब्लड प्रेशर 100/60 के स्तर पर थोड़ा कम है। तनाव और चिंता के कारण उन्हें सुबह से ही बेचैनी और जी मिचलाने की समस्या हो रही है। उन्हें कुछ बार उल्टी हुई है और दस्त की भी शिकायत है।”

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डॉक्टर ने बताया कि दिपके को IV (नस के ज़रिए) फ्लूइड दिया गया। उन्हें दिन भर आराम करने की सलाह दी गई है। उन्होंने आगे कहा कि दिपके को बुखार नहीं है। उम्मीद है कि पर्याप्त आराम करने से वे ठीक हो जाएंगे। अगर उनकी हालत में सुधार नहीं होता है, तो डॉक्टर इलाज के अगले कदम पर फैसला लेने से पहले ब्लड टेस्ट करेंगे।

भोपाल में रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों पर सख्ती, नगर निगम ने शुरू की सीलिंग कार्रवाई, व्यापरियों में हड़कंप

भोपाल। राजधानी भोपाल के रिहायशी क्षेत्रों में नियमों के विपरीत संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर अब प्रशासन का शिकंजा कसने लगा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में भोपाल नगर निगम ने अरेरा कॉलोनी के ई-1 से ई-5 सेक्टर सहित विभिन्न आवासीय क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील करने की कार्रवाई शुरू कर दी है।

 

इसी के तहत भोपाल नगर निगम ने अरेरा कॉलोनी के ई-1 से ई-5 क्षेत्रों में करीब 20 प्रतिष्ठानों के विरुद्ध सीलिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नगर निगम के अनुसार, अब तक शहर में अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर समेत विभिन्न इलाकों के 1,018 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। आवासीय क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के विरुद्ध नगर निगम भोपाल द्वारा कार्रवाई लगातार जारी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में नगर निगम ऐसे भवनों पर कार्रवाई कर रहा है, जहां आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत परिसरों में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।

शनिवार को  शाहपुरा थाना क्षेत्र के रघुनाथ नगर, शाहपुरा थाना के पास स्थित एसके प्लाजा को नगर निगम भोपाल ने सील कर दिया है। नगर निगम द्वारा भवन पर चस्पा किए गए आदेश में उल्लेख है कि नगर निगम भोपाल के आदेशानुसार इस भवन में व्यावसायिक गतिविधियां बंद कर दी गई हैं।  इसके साथ ही भवन को सील कर दिया गया है। इस आवासीय भवन में शर्मा विष्णु फास्ट फूड सहित अन्य व्यावसायिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। नगर निगम की इस कार्रवाई के बाद संबंधित प्रतिष्ठानों का संचालन बंद करा दिया गया।

भोपाल में नगर निगम के अधिकारियों का  कहना है कि आवासीय क्षेत्रों में नियमों के विपरीत संचालित व्यावसायिक गतिविधियों के विरुद्ध अभियान आगे भी जारी रहेगा। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शहरी नियोजन एवं भवन उपयोग संबंधी नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

 

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को तमिलनाडु से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियों में आवासीय क्षेत्रों के व्यावसायिक उपयोग के विरुद्ध कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने राज्य सरकारों से 4 अगस्त तक अनुपालन रिपोर्ट (एक्शन टेकन रिपोर्ट) प्रस्तुत करने को कहा है।

 

दूसरी ओर, व्यापारिक संगठनों ने इस कार्रवाई पर चिंता जताई है। भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स के प्रवक्ता अजय देवनानी का कहना है कि वर्ष 2005 के बाद से भोपाल का नया मास्टर प्लान लागू नहीं हुआ है, जिससे कई व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। उनका सुझाव है कि प्रशासन को गुजरात की तर्ज पर ऐसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जिसमें आवासीय क्षेत्रों में सीमित और नियमनबद्ध व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी जा सके। नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, सीलिंग अभियान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती की जा रही है। कार्रवाई के दायरे में मुख्य रूप से छोटी दुकानें, होटल, अस्पताल, बैंक तथा अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान शामिल हैं।

PM Modi के खिलाफ अभद्र टिप्पणी मामले में नोएडा में मुकदमा दर्ज, युवती और परिजन फरार, केस दिल्ली ट्रांसफर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में नोएडा के एक्सप्रेसवे थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, यह टिप्पणी 23 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन के दौरान की गई थी। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करने के बाद केस को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया है। अब मामले की जांच दिल्ली पुलिस करेगी।

 

शिकायतकर्ता स्मृति सिंह ने पुलिस को बताया कि वह गाजियाबाद के वसुंधरा की रहने वाली हैं और सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। उनके मुताबिक, 23 जुलाई को उनके संज्ञान में आया कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के दौरान एक युवती ने देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कथित तौर पर अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया।

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शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि युवती की टिप्पणी से संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंची और जानबूझकर लोक शांति भंग करने का प्रयास किया गया।

 

नोएडा की सोसाइटी में रहती है युवती

शिकायतकर्ता के मुताबिक, कथित टिप्पणी करने वाली युवती की पहचान नोएडा के सेक्टर-168 स्थित लोट्स जिंग सोसाइटी निवासी रुचिका सिंह के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, वह मूल रूप से फरीदाबाद के ऊंचागांव की रहने वाली बताई गई है। जानकारी के मुताबिक, युवती ब्यूटी पार्लर संचालित करती है और इसी साल जनवरी में उसने नोएडा में फ्लैट खरीदा था।

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घटना के बाद से युवती और परिजन घर पर नहीं मिले

पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से युवती और उसके परिजन कथित तौर पर अपने आवास पर नहीं मिले हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है और मामले से जुड़े तथ्यों की जांच की जा रही है।

BNS की इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला

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पुलिस ने बताया कि शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत शून्य अपराध संख्या (Zero FIR) दर्ज की गई है। इसके बाद केस को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया है, क्योंकि कथित घटना दिल्ली के जंतर-मंतर से संबंधित है। अब मामले की आगे की विवेचना दिल्ली पुलिस द्वारा की जाएगी। फिलहाल पुलिस युवती की तलाश के साथ-साथ वायरल वीडियो और शिकायत में लगाए गए आरोपों से जुड़े तथ्यों की भी जांच कर रही है। मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जाएगी।

धमकी के बाद छिपकर रहे थे दीपके के माता-पिता, CJP नए आंदोलन की तैयारी में

Abhijit Dipke Cockroach Janata Party

Abhijit Dipke Cockroach Janata Party: 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके के परिवार पर आए राजनीतिक दबाव और धमकियों के सनसनीखेज मामले ने तूल पकड़ लिया है। अभिजीत की मां अनीता दीपके ने 29 जुलाई को एक मराठी समाचार चैनल के सामने खुलासा किया कि उनके बेटे को एक वीडियो के जरिए सीधे धमकी दी गई थी। इस वीडियो में साफ चेतावनी दी गई थी कि अगर अभिजीत भाजपा में शामिल नहीं हुए तो उनके माता-पिता को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। दूसरी ओर, सीजेपी ने कहा कि उसे न सरकार पर भरोसा और न ही सुप्रीम कोर्ट पर। अब वह सरकार के खिलाफ अगले आंदोलन की तैयारी कर रही है। 

16 दिनों तक कोंकण में छिपा रहा परिवार

अभिजीत दीपके के नई दिल्ली से वापस लौटने से पहले मराठी समाचार चैनल से बातचीत करते हुए उनकी मां अनीता दीपके का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने बताया कि धमकी के बाद परिवार में ऐसा डर समा गया था कि उन्हें अपना घर छोड़कर कोंकण क्षेत्र में अपने एक रिश्तेदार के घर पर 16 दिनों तक शरण लेनी पड़ी। ALSO READ: जेन-जी को 'गटर जनरेशन' कहकर घिरीं कंगना रनौत, CJP ने दिया करारा जवाब

आप यह वीडियो मत देखना

अनीता दीपके ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि अभिजीत को काफी समय से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन उसने शुरुआत में हमें परेशान न करने की नीयत से कुछ नहीं बताया। बाद में उसने एक धमकी भरे वीडियो का जिक्र किया और मुझसे खास हिदायत दी कि मैं उस क्लिप को बिल्कुल न देखूं। उस क्लिप में अभिजीत को खुली चेतावनी दी गई थी कि यदि वह बीजेपी में शामिल नहीं होता है, तो उसके माता-पिता के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। इस सीधी धमकी के बाद अभिजीत ने खुद हमसे घर छोड़कर कहीं सुरक्षित जगह पर चले जाने का आग्रह किया। ALSO READ: CJP के प्रोटेस्ट में घुसे थे हत्या, लूट और रेप के आरोपी, 989 क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले शातिर, 480 पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल जांच के घेरे में

 

मां अनीता ने कहा कि अभिजीत खुद ऐसी धमकियों और राजनीतिक दबाव से नहीं डरते हैं, लेकिन चूंकि उनका परिवार राजनीति और इन खतरनाक चीजों का आदी नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने माता-पिता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। अभिजीत दीपके के पिता ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन में काम करने वाले व्यक्ति को आलोचनाओं का सामना करना ही पड़ता है। लेकिन कुछ लोग 'फिक्स्ड सोच' के होते हैं जो रचनात्मक विरोध के बजाय सीधी धमकियों और दुश्मनी पर उतर आते हैं। ALSO READ: CJP के आंदोलन की चेतावनी के बीच दिल्ली में कड़ी सुरक्षा, पार्टी का आरोप- राज्यों में जारी है गिरफ्तारियां, कानूनी सहायता के लिए बनाया फंड

नए आंदोलन की तैयारी में सीजेपी

दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी CJP को एतराज है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि उन प्रदर्शनकारियों के साथ कोई नरमी न बरती जाए, जिनका आपराधिक रिकार्ड रहा है, जबकि सीजेपी नेता सभी प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की बात कह रहे हैं। सीजेपी ने पेपर लीक रोकने की सरकार की पहल को भी नाकाफी बताया है। अब सीजेपी नए आंदोलन की तैयारी में जुट गई है। सीजेपी ने सरकार से बातचीत के बाद धरना-प्रदर्शन तो रोक दिया, लेकिन सरकार पर शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए फिर से आंदोलन की चेतावनी भी दी है। 

 

दरअसल, पेपर लीक रोकने के लिए सरकार के कानून से सीजेपी संतुष्ट नहीं है। उसके प्रवक्ता आशुतोष रांका कहते हैं कि सरकार ने जो बिल लोकसभा में पास कराया है, वह कारगर नहीं होगा। उनका कहना है कि परीक्षाओं के पेपर लीक रोकने के लिए सीजेपी ने कई सुझाव दिए थे, पहले उन पर अमल होना चाहिए।

पेपर लीक कैसे रोकेंगे! मल्लिकार्जुन खरगे ने क्यों कहा अधूरा बिल लाई सरकार

Mallikarjun Kharge Paper Leak Bill

Mallikarjun Kharge Paper Leak Bill: संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में 'परीक्षा संशोधन बिल' पर चर्चा के दौरान उस समय माहौल गरमा गया जब नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर करारा हमला बोला। खरगे ने सरकार की नीयत और बिल की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यह नया संशोधन विधेयक युवाओं की समस्या को सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में उबल रहे छात्रों के गुस्से को ठंडा करने के लिए लाया गया है। उन्होंने साफ लहजे में पूछा कि जब इस बिल में यही नहीं बताया गया है कि असल में 'पेपर लीक' कैसे रोका जाएगा, तो फिर इस अधूरे बिल का क्या मतलब?

युवाओं के संघर्ष के आगे झुकी सरकार

राज्यसभा में चर्चा में भाग लेते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि बीते एक महीने से देश के युवा सड़कों पर धरने पर बैठे थे और अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। यह युवाओं और छात्रों के अनवरत संघर्ष की ही ताकत है कि आखिरकार सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा। खरगे ने कहा कि सरकार ने खुद अपनी विफलता छिपाने और अपनी कुर्सी बचाने के लिए इस बिल को जल्दबाजी में पेश किया है। जो कदम सरकार आज उठा रही है, उसे 2024 की शुरुआत में ही क्यों नहीं उठाया गया? ALSO READ: सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली सरकार को निर्देश, पैलेट गन से जख्मी छात्रों का करवाए निशुल्क इलाज

केवल आंकड़े बदले हैं, समस्या वहीं की वहीं

विधेयक की कमियों को उजागर करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि इस नए संशोधन बिल से जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदलने वाला। इसमें कानून की धाराओं और आंकड़ों में भले ही हेरफेर कर दी गई हो, लेकिन मूलभूत समस्या के समाधान पर यह बिल पूरी तरह मौन है। खरगे ने सवाल उठाया कि बिल में सजा और जुर्माने की बातें तो कह दी गईं, लेकिन 'पेपर लीक' के उस नेक्सस (गिरोह) को कैसे खत्म किया जाएगा और भविष्य में लीक रोकेंगे कैसे, इसका कोई खाका या उल्लेख इस पूरे बिल में है ही नहीं। यह बिल आधा-अधूरा और सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। ALSO READ: किसने दिया ऑर्डर?' पोस्टर लेकर संसद पहुंची कांग्रेस, छात्रों पर पैलेट गन मामले में अमित शाह से मांगा जवाब

पीएम और गृहमंत्री की चुप्पी पर सवाल

सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते हुए खरगे ने कहा कि देश का भविष्य यानी युवा सड़कों पर लाठियां खा रहा था, लेकिन न तो प्रधानमंत्री इस संवेदनशील मुद्दे पर कुछ बोले और न ही गृहमंत्री अमित शाह कहीं नजर आए। खरगे ने पूछा कि इतनी बड़ी-बड़ी धांधलियां और धांधलेबाजों के हौसले बुलंद होने के बावजूद गृहमंत्री आखिर क्यों चुप हैं? जब छात्र अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे, तो सरकार ने उन्हें 'अराजक' करार दे दिया। खरगे ने सवाल किया कि सरकार ने महीनों से प्रदर्शन कर रहे इन मासूम छात्रों से समय रहते बातचीत करने की जहमत तक क्यों नहीं उठाई? ALSO READ: अमित शाह को जाना होगा, छात्रों पर चलवाईं गोलियां, गृह मंत्री को हटाए सरकार, प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी

'प्रधान' को हटाना पड़ा, पर व्यवस्था कब बदलेगी?

मल्लिकार्जुन खरगे ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर तंज कसते हुए कहा कि बढ़ते जनाक्रोश और चौतरफा घिरने के बाद आखिरकार सरकार को प्रधान को हटाना ही पड़ा। लेकिन सिर्फ चेहरे बदलने से या दिखावे के लिए ऐसा बिल लाने से काम नहीं चलेगा। जब तक पेपर लीक के सिंडिकेट को खत्म करने का पुख्ता मैकेनिज्म नहीं बनता, तब तक लाखों छात्रों का भविष्य अंधेरे में ही रहेगा।

विपक्ष ने बुलंद की छात्रों की आवाज

खरगे ने राज्यसभा के पटल से देश के युवाओं को भरोसा दिलाया कि विपक्ष उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा है। उन्होंने कहा कि विपक्ष सदन से लेकर सड़क तक छात्रों के हक की लड़ाई लड़ता रहेगा और सरकार को युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत बिल्कुल नहीं देगा।

गृहमंत्री से इस्तीफा मांगा

सरकार पर निशाना साधते हुए खरगे ने कहा कि पेपर बाजार में बिकता रहा और पता नहीं चला। क्या सरकार सो रही थी? हमारी खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं? उन्होंने कहा कि गृहमंत्री अमित शाह विपक्ष के सवालों का जवाब दें। यदि वे सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं तो इस्तीफा दे दें। यदि वे इस्तीफा नहीं देते हैं पीएम मोदी को उन्हें हटा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेपर लीक का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2016, 21, 24 और अब 26 में पेपर लीक हो चुके हैं। कहां है कड़ी से कड़ी सजा? उन्होंने पूछा कि छात्रों पर लाठीचार्ज और पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? इस्तीफे के बाद संसद में धर्मेन्द्र प्रधान के स्वागत को भी उन्होंने सरकार की नाकामी बताया। 

सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली सरकार को निर्देश, पैलेट गन से जख्मी छात्रों का करवाए निशुल्क इलाज

Supreme Court Jantar Mantar Protest

Supreme Court Jantar Mantar Protest: संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुए खौफनाक एक्शन और पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को साफ-साफ निर्देश दिए हैं कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल छात्रों का इलाज सरकार अपने खर्चे पर कराएगी। 

 

सुप्रीम कोर्ट ने ने केंद्र सरकार को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है और पैलेट गन की SOP पर जवाब मांगा है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हम जल्द ही प्रोटोकॉल भी बनाने वाले हैं। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के हथियारों के इस्तेमाल के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया है। ALSO READ: NEET विवाद, CJP प्रमुख अभिजीत दिपके ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी, छात्रों के उत्पीड़न का लगाया आरोप

क्या है पूरा मामला?

बीती 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले पेपर लीक के खिलाफ निकले 'संसद मार्च' के दौरान पुलिस की कार्रवाई का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में गरमा गया है। आरोपों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने हक की आवाज उठा रहे निहत्थे छात्रों पर न केवल बेदर्दी से लाठियां भांजीं, बल्कि पैलेट गन का भी इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई में कई छात्र गंभीर रूप से जख्मी हुए, जबकि एक छात्र की आंखों की रोशनी जाने का दावा जा रहा है। ALSO READ: CJP के प्रोटेस्ट में घुसे थे हत्या, लूट और रेप के आरोपी, 989 क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले शातिर, 480 पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल जांच के घेरे में

CJI सूर्यकांत की बेंच का कड़ा रुख

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी मोहाना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता और पैलेट गन के शिकार पीड़ितों का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में पुलिसिया कार्रवाई की खौफनाक तस्वीर पेश की। दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फौरन निर्देश जारी किया कि पैलेट गन से घायल याचिकाकर्ता समेत तमाम लोगों को बिना किसी देरी के सबसे बेहतरीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। ALSO READ: विदेशी मीडिया ने CJP की जीत पर क्या कहा, पाकिस्तान से लेकर मिडिल-ईस्ट और अमेरिका में सुर्खियों में 'कॉकरोच'

हथियारों के इस्तेमाल का रिकॉर्ड रखना होगा सुरक्षित

कोर्ट ने सिर्फ इलाज तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि पुलिस की कार्रवाई पर शिकंजा कसते हुए बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा इस्तेमाल किए गए तमाम हथियारों और कारतूसों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के सख्त निर्देश दिए हैं। 

 

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद और घायल छात्रों द्वारा दायर इस जनहित याचिका में धातु वाली पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि बेहद असाधारण परिस्थितियों में पुलिस को पैलेट गन के इस्तेमाल का अधिकार है। लेकिन, कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि वह 20 जुलाई की घटना में हुए पैलेट गन के इस्तेमाल की जांच और सुनवाई के लिए पूरी तरह तैयार है।

8th Pay Commission: 3 नहीं, 5 ‘फैमिली यूनिट्स’ का नया फॉर्मूला! समझिए वो एक अकेला फैक्टर, जो आपकी सैलरी में करेगा बंपर इजाफा

8th Pay Commission Family Unit Formula: केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन में कितना बड़ा उछाल आएगा, इसका फैसला केवल महंगाई दर (DA) या आम आंकड़ों से तय नहीं होने वाला। इस बार एक ऐसा ‘मास्टर फैक्टर’ चर्चा में है, जो अगर लागू हो गया, तो आपकी न्यूनतम बेसिक सैलरी में 283% का ऐतिहासिक इजाफा हो सकता है।

यह मास्टर फैक्टर है ‘फैमिली यूनिट’ की संख्या में बदलाव। आसान भाषा में समझें तो अब तक सरकार आपके परिवार में सिर्फ 3 लोगों (आप, आपकी पत्नी/पति और बच्चे) का पेट पालने का खर्च जोड़कर सैलरी तय करती थी। लेकिन 8वें वेतन आयोग से मांग की जा रही है कि इसमें आश्रित माता-पिता को जोड़कर 5 फैमिली यूनिट्स का खर्च शामिल किया जाए।

आइए आसान गणित और सटीक उदाहरणों से समझते हैं कि यह ‘फैमिली यूनिट’ का नियम आपकी इनहैंड सैलरी और फिटमेंट फैक्टर पर कितना बड़ा असर डालेगा।

क्या है ‘फैमिली यूनिट’ और अब तक कैसे तय होती थी सैलरी?

वेतन आयोग कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन तय करने के लिए 1957 के 15वें इंडियन लेबर कांफ्रेंस (ILC) के मानकों का इस्तेमाल करता है। 7th पे कमीशन में 3 यूनिट्स का नियम था।

कर्मचारी = 1 यूनिट

पति/पत्नी = 1 यूनिट

2 बच्चे = 1 यूनिट (0.5 + 0.5)

कुल योग = 3 यूनिट्स

इसी 3 यूनिट के फॉर्मूले पर 7वें वेतन आयोग ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर दिया और आपकी न्यूनतम बेसिक पे ₹18,000 तय हुई।

8th Pay Commission में 5 यूनिट्स का नया प्रस्ताव

कर्मचारी = 1 यूनिट

पति/पत्नी = 1 यूनिट

2 बच्चे = 1.6 यूनिट (0.8 + 0.8)

आश्रित माता-पिता = 1.6 यूनिट (0.8 + 0.8)

कुल योग = 5.2 यूनिट्स (राउंड ऑफ करके 5 यूनिट्स)

3 बनाम 5 यूनिट से आपकी सैलरी में कितना फर्क आएगा?

मान लीजिए, एक परिवार के प्रति व्यक्ति महीने भर का न्यूनतम लिविंग कॉस्ट यानी राशन, कपड़ा, बिजली, मकान किराया, बच्चों की पढ़ाई, डॉक्टर का खर्च आज की महंगाई में ₹13,800 बैठता है।

केस A: पुराने फॉर्मूले (3 यूनिट) के तहत

3 यूनिट × ₹13,800 = ₹41,400 (अनुमानित न्यूनतम सैलरी)

केस B: नए प्रस्ताव (5 यूनिट) के तहत

5 यूनिट × ₹13,800 = ₹69,000 (प्रस्तावित न्यूनतम सैलरी)

फर्क साफ है कि सिर्फ 2 यूनिट्स माता-पिता का खर्च जुड़ने से ही आपकी बेसिक सैलरी सीधे ₹27,600 प्रति महीना अतिरिक्त बढ़ जाती है!

‘फिटमेंट फैक्टर’ में कैसे आएगा बंपर उछाल?

फिटमेंट फैक्टर वह मल्टीप्लायर होता है, जिससे आपकी पुरानी बेसिक सैलरी में गुणा करके नई बेसिक सैलरी निकाली जाती है।

7वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर: 2.57 (न्यूनतम बेसिक पे: ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हुई)।

5 यूनिट लागू होने पर 8वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर: 3.83

उदाहरण से समझें अपनी सैलरी की कैलकुलेशन:

अगर किसी केंद्रीय कर्मचारी (लेवल-1) की मौजूदा बेसिक सैलरी ₹18,000 है:

नई बेसिक सैलरी=मौजूदा बेसिक सैलरी×फिटमेंट फैक्टर

नई बेसिक सैलरी=₹18,000×3.83=₹68,940(≈₹69,000)

यानी 5 यूनिट्स का फॉर्मूला मंजूर होते ही आपकी बेसिक सैलरी ₹18,000 से बढ़कर सीधे ₹69,000 हो जाएगी। इसके ऊपर से मिलने वाला महंगाई भत्ता (DA), HRA और अन्य अलाउंस अलग से जुड़ेंगे।

कर्मचारी यूनियनों ने 5 यूनिट्स के लिए क्या कानूनी तर्क दिए हैं?

नेशनल काउंसिल ऑफ जेसीएम (NC-JCM) ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे ज्ञापन में 5 यूनिट्स लागू करने के लिए बेहद ठोस आधार पेश किए हैं:

सीनियर सिटीजन एक्ट का हवाला: ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम’ के तहत अपने बुजुर्ग माता-पिता का ध्यान रखना कर्मचारी की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।

सोशल सिक्योरिटी कोड 2020: नए लेबर कोड्स में भी कर्मचारी के परिवार की परिभाषा में आश्रित माता-पिता को कानूनी रूप से शामिल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश: सुप्रीम कोर्ट (1991 और भूपेंद्र नाथ हजारिका केस) ने भी माना है कि सरकार को अपने कर्मचारियों को सिर्फ ‘जीवित रहने लायक’ नहीं, बल्कि एक ‘सम्मानजनक जीवन’ जीने लायक वेतन देना चाहिए।

8वें वेतन आयोग की चर्चाओं में ‘फिटमेंट फैक्टर 3.83’ की चाबी इसी ‘5 फैमिली यूनिट’ वाले नियम में छिपी है। अगर पे-पैनल माता-पिता के खर्च को आधार मानते हुए 5 यूनिट्स का नियम अपनाता है, तो यह देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन में अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उछाल लेकर आएगा।