अजय राय की छुट्टी! कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को सौंपी यूपी की कमान, जानिए कौन हैं ये, क्यों बनाया गया इन्हें अध्यक्ष?

उत्तर प्रदेश में संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया है। कांग्रेस आलाकमान ने अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाते हुए उत्तर प्रदेश विधानमंडल दल की नेता और वरिष्ठ विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष बनाया है। लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय और लगातार तीन बार विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचने वाली आराधना मिश्रा को यह जिम्मेदारी सौंपकर कांग्रेस ने प्रदेश में अपने पारंपरिक वोट बैंक और महिला नेतृत्व दोनों को एक साथ साधने का बड़ा राजनीतिक दांव खेला है।

कौन हैं आराधना मिश्रा ‘मोना’? जानिए पारिवारिक और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि

20 अप्रैल 1974 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में जन्मी आराधना मिश्रा ‘मोना’ उत्तर प्रदेश के दिग्गजों में गिने जाने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। प्रमोद तिवारी का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक मिसाल माना जाता है। प्रमोद तिवारी ने प्रतापगढ़ जिले की ऐतिहासिक रामपुर खास विधानसभा सीट से लगातार 9 बार चुनाव जीतकर रिकॉर्ड कायम किया था। आराधना मिश्रा की शुरुआती और उच्च शिक्षा प्रयागराज में ही हुई। उन्होंने 1997 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.कॉम की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन किया और मानवाधिकार विषय की पढ़ाई भी पूरी की। चुनावी हलफनामे के मुताबिक वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनकी कुल घोषित संपत्ति लगभग 34.1 करोड़ रुपये है। इसमें 6.1 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 28 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल है।

त्रिस्तरीय पंचायत से विधानमंडल तक: ऐसा रहा राजनीतिक सफर

आराधना मिश्रा को राजनीति विरासत में जरूर मिली, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत धरातल से की। उन्होंने वर्ष 2001 से लगातार तीन कार्यकाल के लिए ब्लॉक प्रमुख के रूप में काम किया और स्थानीय निकायों में काम करने का लंबा अनुभव हासिल किया। वह ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत मनरेगा की उत्तर प्रदेश राज्य निगरानी एवं सतर्कता समिति की सदस्य भी मनोनीत की गईं। इसके अलावा 2012 के विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस की मीडिया कैंपेन कमेटी की सक्रिय सदस्य रहीं।

वर्ष 2014 में जब उनके पिता प्रमोद तिवारी राज्यसभा के लिए चुने गए, तब रामपुर खास सीट पर हुए उपचुनाव में आराधना मिश्रा ने जीत दर्ज कर पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में कदम रखा। वर्ष 2017 की प्रचंड बीजेपी लहर में भी उन्होंने रामपुर खास सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। वह उन चुनिंदा 7 कांग्रेस विधायकों में शामिल थीं जो उस चुनाव में जीत दर्ज कर पाए थे। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार को 14000 से अधिक वोटों से हराकर लगातार तीसरी बार जीत हासिल की।

2019 से संभाल रही हैं विधानमंडल दल की नेता की कमान

आराधना मिश्रा ‘मोना’ की सांगठनिक क्षमता को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने अक्टूबर 2019 में उन्हें उत्तर प्रदेश विधानमंडल दल का नेता नियुक्त किया था। इसके बाद से वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के भीतर कांग्रेस की मुख्य रणनीतिकार बनी हुई हैं। इसके अलावा वह ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) के प्रमुख पैनलों की सदस्य हैं और राष्ट्रीय टीवी बहसों में पार्टी का मजबूती से पक्ष रखती रही हैं।

क्यों बनाया गया उत्तर प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे कई अहम रणनीतिक और राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं का एक बड़ा प्रभाव रहा है। आराधना मिश्रा एक प्रमुख और स्थापित ब्राह्मण चेहरा हैं। कांग्रेस लंबे समय से अपने पारंपरिक ब्राह्मण वोट बैंक को वापस जोड़ने की कोशिश कर रही है, ऐसे में उन्हें कमान सौंपना एक बड़ा राजनीतिक कदम माना जा रहा है।

महिला नेतृत्व को बढ़ावा

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर लगातार जोर देती रही है। आराधना मिश्रा राज्य की अग्रिम पंक्ति की महिला नेताओं में शामिल हैं। इसके अलावा प्रतापगढ़ और आसपास के इलाकों में प्रमोद तिवारी का मजबूत जनाधार रहा है। आराधना मिश्रा ने उस विरासत को न सिर्फ संभाला है बल्कि तीन बार लगातार चुनाव जीतकर अपनी खुद की मजबूत जनस्वीकार्यता भी साबित की है। ब्लॉक स्तर से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी संगठन को नए सिरे से खड़ा करने में मददगार साबित हो सकता है। कांग्रेस आलाकमान को उम्मीद है कि आराधना मिश्रा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पार्टी एक नए उत्साह और मजबूत रणनीति के साथ जमीन पर उतरेगी।

Diwali 2026 Dates: कब मनाया जाएगा दिवाली का त्योहार? जानें दिवाली से लेकर चित्रगुप्त पूजा तक की सही तारीख और पूजा मुहूर्त

Diwali 2026 Dates: हिंदू धर्म में दिवाली का पर्व विशेष स्थान रखता है। यह पूरे साल में आने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। लोग इसके लिए काफी पहले से तैयारियां करते हैं। दिवाली का पर्व हर साल कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है। यह पांच दिनों का त्योहार है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और चित्रगुप्त पूजा या भाई दूज के साथ संपन्न होता है। घर, बाजार, आस-पड़ोस हर तरफ इस त्योहार की तैयारियों की धूम रहती है। आइए जानें इस साल ये पंच दिवसीय पर्व कब से शुरू होगा और किस दिन मनाई जाएगी दिवाली? दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त क्या है?

दिवाली 2026 तारीख

वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक अमावस्या तिथि का प्रारंभ 8 नवंबर को दिन में 11 बजकर 27 मिनट पर होगा और यह तिथि 9 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक मान्य रहेगी। उदयातिथि और लक्ष्मी पूजा मुहूर्त के आधार पर दिवाली का त्योहार 8 नवंबर दिन रविवार को है।

दिवाली 2026 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

8 नवंबर को दिवाली की लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त 1 घंटा 56 मिनट का रहेगा। आप शाम में 05 बजकर 54 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 50 मिनट के बीच लक्ष्मी पूजा विधि विधान से कर सकते हैं।

आयुष्मान योग में मनेगी दिवाली

इस बार की दिवाली पर आयुष्मान् योग बन रहा है, जो पूरे दिन रहेगा। दिवाली पर आयुष्मान् योग प्रात:काल से लेकर 9 नवंबर को 03:03 ए एम तक मान्य है। उसके बाद से सौभाग्य का प्रारंभ होगा। आयुष्मान् योग व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है। दिवाली पर स्वाति नक्षत्र है, जो प्रात:काल से लेकर पूरी रात तक है।

धनतेरस 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि को मनाते हैं। इस साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10 बजकर 30 मिनट पर शुरू हो रही है और 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट तक है। उदयातिथि के आधार पर त्रयोदशी तिथि 7 नवंबर को है, लेकिन धनतेरस का त्योहार 6 नवंबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। उस दिन ही प्रदोष व्रत की पूजा भी होगी। 6 नवंबर को धनतेरस पूजा का मुहूर्त शाम में 6 बजकर 02 मिनट से शाम 7 बजकर 57 मिनट तक है।

दिवाली कैलेंडर 2026

6 नवंबर, शुक्रवार : धनतेरस, धन त्रयोदशी

7 नवंबर, शनिवार : काली चौदस, हनुमान पूजा

8 नवंबर, रविवार : दिवाली, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा

10 नवंबर, मंगलवार : गोवर्धन पूजा, अन्नकूट

11 नवंबर, बुधवार : भाई दूज, यम द्वितीया, चित्रगुप्त पूजा

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Tata Motors के लिए शानदार रहा सितंबर, कारों की बिक्री 15% बढ़ी; EV की डिमांड में आया जबरदस्त उछाल

Tata Motors September 2026 Sales: फेस्टिव सीजन शुरू होने से पहले Tata Motors के लिए सितंबर 2026 का महीना काफी अच्छा रहा। इस दौरान कंपनी ने कुल 70,210 कारें और SUV बेचकर महीना खत्म किया, जिसमें साल-दर-साल (YoY) 15% की बढ़ोतरी देखी गई। त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले टाटा मोटर्स की इलेक्ट्रिक और दूसरे पर्यावरण के अनुकूल पावरट्रेन वाली कारों की बिक्री भी अच्छी रही।

कंपनी ने FY27 की दूसरी तिमाही में भी शानदार प्रदर्शन किया। इस दौरान Tata Motors ने कुल 2.02 लाख पैसेंजर व्हीकल बेचे। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने 1.44 लाख गाड़ियां बेची थीं। यानी सालाना आधार पर बिक्री में करीब 40% की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी तिमाही में हुई कुल बिक्री में से 1.97 लाख गाड़ियां घरेलू बाजार में बिकीं। जो FY26 की दूसरी तिमाही में बिकी 1.41 लाख गाड़ियों के मुकाबले 40% ज्यादा है। वहीं, ग्लोबल मार्केट में बिक्री 20% बढ़कर 5,049 यूनिट हो गई।

कंपनी ने बताया कि FY27 की दूसरी तिमाही के दौरान ‘पंच’ (Punch) भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली SUV रही। आइए, बिक्री के प्रदर्शन को विस्तार से समझते हैं।

Punch, Nexon, Sierra और दूसरी गाड़ियों की बदौलत Tata ने 70,000 यूनिट का आंकड़ा किया पार

Tata Motors Passenger Vehicles ने बताया है कि उसने सितंबर 2026 में कुल 70,210 यूनिट बेचे। यह पिछले साल इसी महीने में बेची गई 60,907 यूनिट के मुकाबले 15% की बड़ी बढ़ोतरी है। कंपनी के मुताबिक, फेस्टिव सीजन शुरू होने से ठीक पहले Tata Motors ने एक महीने में 70 हजार से ज्यादा गाड़ियां बेचने का आंकड़ा हासिल किया है। घरेलू बाजार की बात करें तो सितंबर 2026 में Tata Motors ने 68,810 पैसेंजर व्हीकल बेचे, जबकि पिछले साल इसी महीने यह आंकड़ा 59,667 यूनिट था। यानी घरेलू बिक्री में भी 15% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

वहीं, इंटरनेशनल शिपमेंट भी साल-दर-साल 13% बढ़कर सितंबर 2026 में 1,400 यूनिट हो गई, जो पिछले साल 1,240 यूनिट थी।

EV की बिक्री में 67% की बढ़ोतरी

इस महीने कंपनी की ग्रोथ में टाटा के पोर्टफोलियो में शामिल इलेक्ट्रिक कारों – जैसे Punch EV, Nexon EV, Tiago EV और अन्य – का अहम योगदान रहा। कंपनी ने सितंबर में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कुल 15,384 EV बेचीं, जो पिछले साल इसी अवधि में बेची गई 9,191 यूनिट्स के मुकाबले 67% ज्यादा है।

वहीं, FY 2026-27 की दूसरी तिमाही यानी Q2 FY27 में कंपनी ने अब तक की सबसे ज्यादा तिमाही EV बिक्री दर्ज की। इस दौरान Tata Motors ने कुल 47,150 इलेक्ट्रिक कारें बेचीं। पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले यह 90% ज्यादा है।

कंपनी की कुल पैसेंजर व्हीकल बिक्री में EV मॉडल्स की हिस्सेदारी 23% रही। वहीं, CNG कारों की हिस्सेदारी 28% रही। यानी EV और CNG दोनों को मिलाकर Tata Motors की तिमाही बिक्री में इन दोनों पावरट्रेन की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा रही।

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Jitiya 2026 Date: 3 या 4 अक्टूबर, कब है जितिया व्रत? संतान की अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए माताएं इस दिन करेंगी निर्जला उपवास, जानें मुहूर्त और पारण समय

Jitiya 2026 Date: हिंदू धर्म में जितिया या जिउतिया व्रत को सबसे कठिन उपवासों में से एक माना जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान को हर मुसीबत से रक्षा करने, लंबी उम्र, अच्छी सेहत और उसकी खुशहाली के लिए करती हैं। इस व्रत को करने वाली माताएं 24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास करती हैं और अपनी संतान की सलामती की प्रार्थना करती हैं। जितिया व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। जितिया को जिउतिया और जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहते हैं। इस साल इस व्रत की तारीख को लेकर भक्तों में कुछ कंफ्यूजन की स्थिति है, क्योंकि आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि 3 और 4 अक्टूबर को दोनों ही दिन प्राप्त हो रही है। आइए जानें पंचांग से इस साल ये व्रत किस दिन किया जाएगा?

जितिया व्रत 2026 सही तारीख

पंचांग के अनुसार, आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर प्रारंभ हो रही है। लेकिन उस दिन उदयातिथि नहीं होगी क्योंकि सूर्योदय के बाद ही अष्टमी तिथि शुरू हो रही है। अष्टमी तिथि का समापन 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर होगा। अब समस्या यह है कि 4 अक्टूबर को सूर्योदय से पहले ही अष्टमी तिथि खत्म हो जा रही है।

प्रदोष काल मुहूर्त के आधार पर तय होगी जितिया व्रत की तारीख

जितिया व्रत की तारीख का निर्धारण प्रदोष पूजा मुहूर्त के आधार पर करते हैं, क्योंकि इस व्रत में पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होती है। इस आधार पर देखा जाए तो जितिया व्रत के लिए प्रदोष काल 3 अक्टूबर को प्राप्त होगा, न कि 4 अक्टूबर को। ऐसे में इस साल जितिया व्रत 3 अक्टूबर, दिन शनिवार को रखा जाएगा। प्रदोष मुहूर्त के अलावा सुबह में 7:59 बजे से अष्टमी तिथि रहेगी।

जितिया व्रत 2026 पूजा मुहूर्त

जितिया के लिए पूजा का प्रदोष मुहूर्त शाम 6:05 बजे से प्रारंभ है। इस मुहूर्त से माताएं गंधर्व राजा जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। जितिया के दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:38 ए एम से 05:26 ए एम तक रहेगा, वहीं अभिजीत मुहूर्तत्र 11:46 ए एम से दोपहर 12:34 पी एम तक है।

जितिया व्रत का पारण समय

जितिया का निर्जला व्रत करने वाली व्रती माताएं, 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद यानि सुबह 06:15 ए एम के बाद इस व्रत का पारण करेंगी।

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Karwa Chauth 2026: खुशहाल दांपत्य के लिए कब किया जाएगा करवाचौथ का व्रत? जानें सही तारीख, महत्व और पूजा विधि

Karwa Chauth 2026: करवा चौथ का व्रत विवाहित महिलाओं का बेहद महत्वपूर्ण उपवास माना जाता है। यह व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाल दांपत्य के लिए करती हैं। इस व्रत में विवाहित मिहलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास करती हैं, रात को चंद्र दर्शन, पूर्जा और अर्घ्य देने के बाद अपने उपवास का पारण करती हैं। हर साल करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश भगवान की पूजा और कथा सुनी जाती है। आइए जानें इस साल अखंड सौभाग्य का यह व्रत किस तारीख को किया जाएगा?

करवा चौथ 2026 कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 28 अक्तूबर की रात 1 बजकर 7 मिनट से आरंभ होगी और 29 अक्तूबर की रात 10 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार करवा चौथ का व्रत 29 अक्तूबर 2026 को रखा जाएगा।

परिधि योग में होगा करवा चौथ का व्रत

इस साल अखंड सौभाग्य के व्रत करवा चौथ पर परिधि योग का निर्माण होगा। साथ ही, चंद्रमा वृषभ राशि में गोचर करेंगे और गौरी योग का भी संयोग बनेगा।

करवा चौथ व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक परंपराओं में करवा चौथ को दांपत्य सुख और अखंड सौभाग्य से जुड़ा व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती की आराधना करने से सुहाग की रक्षा और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस अवसर पर करवा माता के साथ भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, कुछ स्थानों पर अविवाहित कन्याओं द्वारा मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत रखने की परंपरा है।

करवा चौथ व्रत पूजा विधि

  • प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।
  • कई स्थानों पर सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने की परंपरा है।
  • इसके बाद पूरे दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हुए भगवान का स्मरण करें।
  • शाम के समय पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की पूजा करें।
  • इसके बाद करवा माता की आराधना करें और दीपक जलाएं।
  • पूजा के दौरान करवा चौथ की कथा का श्रवण करें।

च्रदोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें

शाम की पूजा पूरी होने के बाद चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा की जाती है। चंद्र दर्शन के समय छलनी के माध्यम से चंद्रमा को देखा जाता है और उन्हें जल अर्पित कर अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद इसी छलनी से पति का चेहरा देखने की परंपरा है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से पानी पीकर व्रत का पारण किया जाता है।

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Asian Games में इन 3 मुक्केबाजों ने किए मेडल पक्के, खोलेंगे खाता

भारत के सचिन सिवाच पुरुष 60 किग्रा क्वार्टरफाइनल में जापान के विश्व कांस्य पदक विजेता शुनसुके कितामोटो से 0-5 से हारकर बाहर हो गए जबकि परवीन हुड्डा,अंकुश पंघाल और नरेंद्र बेरवाल ने सेमीफाइनल में पहुंचकर देश के लिए तीन पदक पक्के कर दिए हैं।

परवीन ने रविवार को एशियाई खेलों में महिलाओं के 65 किग्रा भार वर्ग की स्पर्धा के क्वार्टरफाइनल में उज्बेकिस्तान की नवबखोर खमिदोवा को 5-0 से हराकर सेमीफाइनल में जगह बनाई। वहीं अंकुश पंघाल ने पुरुषों के 80 किग्रा वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बना ली है जबकि नरेंद्र बेरवाल ने पुरुष 90 किग्रा क्वार्टरफाइनल में थाईलैंड के अदथापोंग सेंगतेप को रेफरी स्टॉपेज के जरिए पहले राउंड में हराकर अपना पदक पक्का कर लिया।

आज परवीन हुड्डा ने महिलाओं के 65किग्रा वर्ग के क्वार्टरफाइनल में नवबखोर खमिदोवा पर शानदार 5-0 से जीत हासिल करके एशियन गेम्स में अपनी पिछली निराशा को पीछे छोड़ कर अपना पदक पक्का कर लिया। डोपिंग उल्लंघन के कारण परवीन का 2022 हांगझोउ एशियन गेम्स का कांस्य पदक छीन लिया गया था, लेकिन उन्होंने एक बार फिर अपने लिए पदक हासिल कर लिया है। खमिदोवा की एकमात्र उम्मीद इस मुक़ाबले को ज़बरदस्त टक्कर वाले मुक़ाबले में बदलने की थी और वह तेज़ी से आगे बढ़ीं, लेकिन परवीन ने एक बार फिर दूरी बनाए रखी और फिर तेजी से हमला करते हुए कुछ बॉडी शॉट्स और चेहरे पर जैब्स मारे, और फिर पीछे हट गईं।

उज्बेकिस्तान की मुक्केबाज ने अपनी रणनीति बदली और कुछ काउंटर-पंच मारने के लिए पीछे रहीं, लेकिन जब परवीन ने खुद हमला किया तो उनकी स्पीड और पहुंच उनके काम आई और उन्होंने आसानी से कुछ हिट्स किए। अंत में काफ़ी हलचल रही, लेकिन परवीन ने मेडल जीतने के लिए बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और परवीन 5-0 से जीतीं और सेमीफाइनल में पहुँच गईं।

फाइनल में पहुंचना परवीन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि संभावना है कि उनका मुकाबला चीन की ली शू से होगा जिन्होंने मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन कजाकिस्तान की आइदा अबिकेयेवा को क्वार्टरफाइनल में हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया है और अब सेमीफाइनल में परवीन से भिड़ेंगी।

इससे पहले वहीं शानदार फॉर्म में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन अंकुश पंघाल ने पुरुषों के 80 किग्रा वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बनाकर एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला बॉक्सिंग मेडल पक्का कर लिया। एशियाई खेलों में अपना पहला मुकाबला खेल रहे हरियाणा के 21 वर्षीय बॉक्सर ने क्वार्टर फाइनल में ताजिकिस्तान के नेक्रुज़ सलीमोव को 5-0 से हराकर परिपक्व और नियंत्रित खेल दिखाया।अंकुश ने मुकाबले की शुरुआत से ही अपनी पकड़ बनाए रखी; उन्होंने तेज़ फुटवर्क के साथ सटीक सीधे पंच और सही समय पर काउंटर-पंच का इस्तेमाल किया। उन्होंने मुकाबले की दूरी को अपने हिसाब से तय किया और सलीमोव को अपनी लय में नहीं आने दिया।

पहले दो राउंड में स्पष्ट बढ़त बनाने के बाद, अंकुश ने आखिरी राउंड में भी शानदार संयम दिखाया। जल्दबाजी में उलझने के बजाय, उन्होंने समझदारी से मुकाबला खेला, अपने प्रतिद्वंद्वी को दूर रखा और अपनी बढ़त को बचाए रखते हुए सर्वसम्मत निर्णय से जीत हासिल की। इस जीत से अंकुश का कम से कम कांस्य पदक पक्का हो गया है और इससे आइची-नागोया में भारत के बॉक्सिंग अभियान को शुरुआती बढ़त मिली है।

यह युवा बॉक्सर के लिए हाल के शानदार सफर में एक और महत्वपूर्ण कदम है। अंकुश 80 किग्रा वर्ग में कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीतकर जापान पहुंचे थे और अब उन्होंने उसी आत्मविश्वास को एशियाई मंच पर भी बरकरार रखा है। उन्होंने राउंड ऑफ़ 16 में बहरीन के हम्सा वोगेल पर 5-0 की शानदार जीत के साथ एशियाई खेलों में अपने अभियान की शुरुआत की थी। प्रतियोगिता में दो मुकाबले खेलने के बाद भी अंकुश ने अभी तक एक भी राउंड नहीं गंवाया है, जो उनके अभियान में निरंतरता और नियंत्रण को दर्शाता है।

नरेंद्र बेरवाल ने पुरुष 90 किग्रा क्वार्टरफाइनल में थाईलैंड के अदथापोंग सेंगतेप को रेफरी स्टॉपेज के जरिए पहले राउंड में हराकर अपना पदक पक्का कर लिया। नरेंद्र ने शुरुआत से ही मुकाबले पर नियंत्रण बनाए रखा। अदथापोंग को दो बार स्टैंडिंग काउंट मिला और तीसरी बार काउंट मिलने के बाद रेफरी ने मुकाबला रोक दिया। मुकाबला दो मिनट से भी कम समय में खत्म हो गया। इसके साथ ही नरेंद्र, अंकुश पंघाल और परवीन हुड्डा के साथ भारत के लिए दिन का तीसरा बॉक्सिंग पदक पक्का करने वाले मुक्केबाज बन गए।

Badrinath Dham DJ Video Row: जहां शंख बजाना मना, वहां कैसे बजा तेज डीजे और लाउड म्यूजिक! बद्रीनाथ धाम विवाद पर DM गौरव ने अब उठाया ये कदम

Badrinath Dham DJ Video Row: उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में हाल में सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान हुए शोर-शराबे के साथ तेज आवाज में म्यूजिक बजाने और नाच-गाने के कार्यक्रम को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है। इसके बाद चमोली जिला प्रशासन ने भारतीय सेना की स्थानीय बटालियन गढ़वाल स्काउटस को एक कारण बताओ नोटिस भेजा है। बद्रीनाथ धाम में ऐसे आयोजन की अनुमति प्रदान करने को वरिष्ठ बीजेपी नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी द्वारा सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताए जाने के बाद पिछले सप्ताह हुए महोत्सव को लेकर विरोध ने जोर पकड़ लिया है।

19 और 20 सितंबर को हुए कार्यक्रम में तेज आवाज में म्यूजिक और डांस के वीडियो सामने आने के बाद साधु-संतों, पुजारियों और नेताओं ने बी आपत्ति जताई। मामला इतना बढ़ा कि चमोली जिला प्रशासन ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांग लिया।

कमांडिंग आफिसर को भेजा गया नोटिस

चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट के कमांडिंग आफिसर को भेजे नोटिस में कहा है कि बद्रीनाथ धाम में इस प्रकार के सामूहिक आयोजन और उसमें ऊंची आवाज में म्यूजिक का प्रयोग करना उसकी गरिमा के विपरीत है। इससे वहां प्रतिदिन होने वाले पूजा कार्यक्रमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही धार्मिक विद्वानों को असप्रसन्नता होती है एवं स्थानीय प्रशासन की छवि भी प्रभावित होती है।

उन्होंने इस प्रकार के आयोजन के औचित्य पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या बदरीनाथ धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने के संबंध में कोई अनुमति सक्षम स्तर से प्राप्त की गई थी। कार्यक्रम में तेज म्यूजिक का प्रयोग किन कारणों से किया गया?” जिलाधिकारी ने यह ताकीद भी की कि भविष्य में बदरीनाथ धाम में इस प्रकार की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाए।

DM गौरव कुमार ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा, “मैं आपको बताना चाहता हूँ कि 19 और 20 सितंबर को भारतीय सेना ने बामनी और माणा गाँवों के इलाकों में ‘वाइब्रेंट विलेज’ स्कीम के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। सेना के अनुरोध पर जिला प्रशासन ने इस कार्यक्रम के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के प्रचार के लिए स्टॉल लगाए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को तय करने या उनसे जुड़े भुगतान को संभालने में जिला प्रशासन या राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।”

जिलाधिकारी ने आगे कहा, “ये सभी गतिविधियाँ भारतीय सेना द्वारा की गईं। भारतीय सेना को एक नोटिस जारी कर पूछा गया है कि बद्रीनाथ धाम इलाके में बिना पूर्व अनुमति के ऐसा कार्यक्रम क्यों आयोजित किया गया। इसके अलावा, वहां भविष्य में ऐसे किसी भी कार्यक्रम पर रोक लगा दी गई है। मंदिर की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप किसी भी कार्यक्रम के लिए SDM से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।”

सेना का बयान

इस बारे में भारतीय सेना ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है। सेना के एक प्रवक्ता ने इस संबंध में पूछे जाने पर न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा, “इस संबंध में आधिकारिक बयान आने पर उसे मीडिया के साथ साझा किया जाएगा।” पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. जोशी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बदरीनाथ में शोर-शराबे वाले म्यूजिक इवेंट के आयोजन को अनुमति दिए जाने पर सवाल उठाते हुए उसे न केवल सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन,बल्कि धाम की पवित्रता पर भी सीधा आघात बताया।

दिग्गज BJP नेता नाराज

डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने इस धाम की स्थापना हिमालयी पर्यावरण में शांतिपूर्ण तरीके से भगवत भजन के लिए की थी। नाराजगी व्यक्त करते हुए BJP नेता ने कहा, “उल्लेखनीय है कि इस स्थान पर शंख बजाना भी मना है परंतु हम उसे भूलकर शोर-शराबे वाले संगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय मूल्यों की घोर उपेक्षा तो कर ही रहे है, साथ में इतनी ऊंचाई पर हजारों लोगो के नाचने से उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की भी उपेक्षा कर रहे है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब देवभूमि को बाजारू संस्कृति के रूप में बदला जा रहा है।”

उन्होंने शंकराचार्यों तथा महात्माओं से संस्कृति के इस क्षरण को रोकने के लिए प्रभावी रूप से आवाज उठाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकारों से भी उनका आग्रह है कि वे ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगाकर देवभूमि की मर्यादा को बनाये रखें। उन्होंने कहा, “हिमालय देवात्मा है, भगवान शंकर का निवास और मां गंगा का उद्गम है, इसे नाच ग्रह बनाना करोड़ो भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात है।”

क्या है पूरा मामला?

बद्रीनाथ धाम में 19 और 20 सितंबर को ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026’ का आयोजन किया गया था। इसका उद्देश्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपरा और सीमांत क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उद्यमिता और पर्यटन को बढ़ावा देना बताया गया था। महोत्सव के समापन समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बतौर चीफ गेस्ट शामिल हुए थे ।

हालांकि, उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आरोप लगाया कि आयोजकों ने बताए गए उद्देश्यों की बजाय धाम की धार्मिक परपंराओं और मान्यताओं के विपरीत नाच गाने और शोर-शराबे वाले कार्यक्रम किए। धाम में स्थित अराइवल प्लाजा में हुए कार्यक्रमों की निंदा करते हुए महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने कहा, “हमारा विरोध सांस्कृतिक महोत्सव के आयोजन को लेकर नहीं बल्कि उसके स्वरूप और प्रस्तुति को लेकर है। यहां बद्रीनाथ की धार्मिक और पौराणिक मर्यादाओं के अनुरूप कार्यक्रम होने चाहिए।”

उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम में शंख की ध्वनि की भी मनाही है। वहां तेज ध्वनि और संगीत का शोर उत्पन्न करना धाम की धार्मिक गरिमा के अनुरूप नहीं है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य मठ ने भी इस आयोजन को परंपरा-विरुद्ध, सांस्कृतिक फूहड़ता एवं धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए इस पर घोर आपत्ति जताई।

संतों ने किया कड़ा विरोध

शंकराचार्य स्वामी अवधेशानंद के शिष्य और मठ के प्रभारी स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने कहा कि बदरिकाश्रम वह पावन क्षेत्र है जहां ऋषियों-मुनियों ने अत्यंत शांति और संयम के नियम तय किये है। उन्होंने कहा, “इस क्षेत्र में शंख बजाना तक वर्जित है, ताकि तपस्यारत भगवान नर-नारायण एवं साधकों की एकाग्रता में कोई विघ्न न पड़े । लेकिन इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से यहां का धार्मिक वातावरण बिगाड़ा जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि जहां ब्रह्मकमल जैसे अति संवेदनशील पुष्प को भी विशेष नियमों, पवित्रता और श्रद्धा के साथ प्रभु चरणों में अर्पित किया जाता है, वहां संगीत की तेज ध्वनि में नाच-गाने और फूहड़ता का सांस्कृतिक प्रदूषण कहां तक उचित है? स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने मुख्यमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए परंपराओं के उल्लंघन, मर्यादाहीन कृत्यों और फूहड़ आयोजनों के जिम्मेदार आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।

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विवाद के बीच, उत्तराखंड DIPR की तरफ से X पर एक पोस्ट में बड़ा ऐलान किया गया है। DIPR ने कहा, “श्री बद्रीनाथ धाम सहित जनपद चमोली के सभी धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से जिलाधिकारी श्री गौरव कुमार द्वारा धार्मिक स्थलों के आस-पास उच्च आवृत्ति (हाई फ्रीक्वेंसी) वाले साउंड सिस्टम का प्रयोग कर धार्मिक स्थलों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कार्यक्रमों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया गया है।”

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

Shraddh Paksha 2026

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है।

 

लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं है। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं और दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, मगर अपने ही परदादा की तस्वीर कहाँ है, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने परिवार के लिए क्या किया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हम भविष्य की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि उस अतीत को भूलते जा रहे हैं, जिसकी नींव पर हमारा वर्तमान खड़ा है।

 

यहीं से श्राद्ध पक्ष की सार्थकता आरंभ होती है। यह केवल पंचांग की कुछ तिथियां नहीं हैं; यह हमारी सामूहिक स्मृति को जगाने वाला वह अवसर है, जब वर्तमान कुछ क्षण के लिए अतीत के सामने खड़ा होता है और स्वीकार करता है कि हम अकेले नहीं हैं—हमारे अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है।

 

‘श्राद्ध’ का वास्तविक अर्थ और पितृऋण

‘श्राद्ध’ शब्द का सीधा संबंध ‘श्रद्धा’ से है। इसलिए श्राद्ध का मूल अर्थ केवल पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मण भोजन कराना ही नहीं है। ये भले ही परंपरागत विधियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में जो मूल भाव है, वह है—अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय स्मरण।

 

भारतीय सनातन परंपरा ने मृत्यु को संबंधों का पूर्ण विराम नहीं माना है। शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु स्मृति और संस्कार जीवित रहते हैं। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके कर्म परिवार की अगली पीढ़ियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में पितरों के प्रति दायित्व को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे ‘पितृऋण’ कहा जाता है।

 

हमारे माता-पिता ने हमें जीवन दिया और हमारे दादा-दादी व पूर्वजों ने परिवार को संभाला। किसी ने अभाव में जीवन जिया, किसी ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, तो किसी ने परिवार के लिए अपने सुख त्याग दिए और उन संस्कारों की परंपरा को सुरक्षित रखा जो आज हमारे हाथों में है। हम जिस जीवन को अपना कहते हैं, उसकी नींव में उन सबका योगदान है। इसलिए पितृऋण कोई ऐसा ऋण नहीं है जिसे धन देकर चुकाया जा सके। इसे चुकाने का सबसे सुंदर मार्ग है—माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, परिवार में प्रेम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देना।

 

तर्पण और परंपराओं के पीछे छिपा भाव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जल, तिल और कुश आदि के माध्यम से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है। आस्था मानती है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति व शांति प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है। लेकिन तर्पण को केवल एक बाहरी कर्मकांड मानना, उसके भीतर छिपे गहरे भाव से वंचित रहना है।

 

तर्पण की जलधारा केवल जल नहीं होती; वह स्मृति और कृतज्ञता की धारा होती है। जब कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा, परदादा या अन्य पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अतीत को प्रणाम करता है। वह मानो यह स्वीकार करता है कि उसके वर्तमान में उसका अपना श्रम जितना है, उतना ही योगदान उन लोगों का भी है जो आज उसके साथ नहीं हैं।

 

श्राद्ध परंपरा में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना तथा ब्राह्मण, अतिथि या किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का विधान है। इन परंपराओं में जीव-दया, अन्नदान, सेवा और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। पूर्वजों के नाम पर यदि किसी भूखे का पेट भर जाए या किसी जीव को अन्न मिल जाए, तो श्रद्धा का दायरा और विस्तृत हो जाता है।

 

भारतीय धार्मिक साहित्य और महाकाव्यों में पितृकर्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। चाहे महाभारत में कर्ण से जुड़ी कथा हो या रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा पिता राजा दशरथ के निमित्त किया गया श्राद्ध—ये प्रसंग भारतीय समाज में पितरों के प्रति दायित्व की गहरी भावना को दर्शाते हैं।

 

इसी श्रृंखला में ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी व्यापक स्मरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो सका, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह तिथि बनी है। यह ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करने का दिन है।

 

आधुनिक दौर में श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता

आज श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच का संवाद घटता जा रहा है। बच्चे अपने दादा-दादी के जीवन-संघर्षों से परिचित नहीं हैं और अनेक बार उन्हें अपने परदादा का नाम तक मालूम नहीं होता। ऐसे समय में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों को बचाने का माध्यम बन सकता है:

  • घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों की कहानियां सुनाएं।
  • परिवार का एक ‘वंश-वृक्ष’ (Family Tree) तैयार किया जाए।
  • पुरानी तस्वीरों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए।
  • पूर्वजों के संघर्षों, उनके व्यवसाय, सामाजिक योगदान और जीवन-मूल्यों की जानकारी नई पीढ़ी को दी जाए।
  • क्योंकि जिसे अपनी जड़ों का पता नहीं होता, उसकी पहचान की ऊंचाई भी अधूरी रह जाती है।

 

भय नहीं, कृतज्ञता का नाम है श्राद्ध

पितृदोष जैसी धार्मिक मान्यताएं भी श्राद्ध परंपरा से जुड़ी हुई हैं। अनेक श्रद्धालु पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से तर्पण, पाठ और आध्यात्मिक साधनाएं करते हैं। इन आस्थाओं का सम्मान करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि श्राद्ध का व्यापक संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सदाचार सिखाना है।

 

यदि हम पितरों की शांति की कामना करते हैं, तो केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं हो सकता। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का आदर, परिवार में प्रेम, जरूरतमंदों की सहायता, जीवों के प्रति करुणा और अपने आचरण में सत्य व संयम रखना भी पितृ-सम्मान का ही विस्तार है।

 

  • आखिर पूर्वजों को सबसे बड़ा सम्मान क्या है?
  • क्या केवल एक दिन जल अर्पित कर देना?
  • क्या केवल भोजन करा देना और दान दे देना?
  • या फिर उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना?

 

उत्तर स्पष्ट है—यदि उन्होंने परिवार को जोड़कर रखा था, तो हम भी परिवार को जोड़ें। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखा था, तो हम भी धैर्य रखें। यदि उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की थी, तो हम भी सेवा करें। और यदि उन्होंने हमें संस्कार दिए थे, तो हम उन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। यहीं पर श्राद्ध कर्मकांड से ऊपर उठकर ‘जीवन का संस्कार’ बन जाता है।

 

स्मृति की अंजलि

श्राद्ध पक्ष मृत्यु का शोक नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह अतीत में लौटने का हठ नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम किसी शून्य से पैदा नहीं हुए हैं; हमारे पीछे अनेक पीढ़ियों का श्रम, संघर्ष, त्याग और संस्कार खड़े हैं।

 

इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में जब हम पितरों को जल अर्पित करें, तो अपने भीतर भी कृतज्ञता का दीप जलाएं। जब अन्न अर्पित करें, तो सेवा का संकल्प लें। जब पूर्वजों का नाम लें, तो उनके जीवन से कोई एक श्रेष्ठ गुण अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। और जब अपने बच्चों को उनके पूर्वजों की कहानियां सुनाएं, तो उन्हें यह अहसास कराएं कि वे केवल वर्तमान के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा के उत्तराधिकारी हैं।

 

पूर्वज चले जाते हैं, उनकी स्मृतियां नहीं।

चेहरे मिट जाते हैं, संस्कार नहीं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं, विरासत नहीं।

 

इसीलिए श्राद्ध केवल पितरों को स्मरण करने का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने का पर्व है। अंततः पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल जल की एक अंजलि भर नहीं है; सच्ची श्रद्धांजलि है—एक ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कार दिखाई दें, और ऐसा परिवार बनाना जिसे देखकर हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों पर गर्व कर सके।

 

श्राद्ध की सबसे बड़ी अंजलि जल की नहीं, स्मृति की है। सबसे बड़ा तर्पण कर्मकांड का नहीं, कृतज्ञता का है; और पितरों को सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उनके अच्छे संस्कार हमारे जीवन में निरंतर सांस लेते रहें।

Agra Metro: क्या 10 अक्टूबर से आगरा में चलना शुरू होगी मेट्रो? 5 नए स्टेशनों पर सर्विस शुरू करने को लेकर आया ये अपडेट

26 सितम्बर, आगरा: आदित्य मुदगल की रिपोर्ट की मुताबिक, आगरा में मेट्रो सेवा का विस्तार होने जा रहा है। पहले कॉरिडोर के तहत मनकामेश्वर स्टेशन से ISBT तक पांच नए स्टेशन तैयार हो चुके हैं। इनमें SN मेडिकल कॉलेज, आगरा कॉलेज, राजा की मंडी, RBS कॉलेज और ISBT स्टेशन शामिल हैं। इन सभी स्टेशनों पर ट्रैक, सिग्नल और पैसेंजर से जुड़ी सभी सुविधाओं की जांच भी पूरी हो चुकी है।

यूपी मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर पंचानन मिश्रा ने बताया कि पांचों स्टेशनों पर मेट्रो चलाने की तैयारी पूरी है। इसकी रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। अब सेवा शुरू करने की तारीख का इंतजार है। ISBT तक मेट्रो चलाने के लिए 10 अक्टूबर 2026 की तारीख प्रस्तावित की गई है।

लोगों को मेट्रो शुरू होने का इंतजार

शहरवासियों को इन पांच नए स्टेशनों पर मेट्रो चलने का बेसब्री से इंतजार है क्योंकि मेट्रो शुरू होने से रोज सफर करने वाले लोगों को आसानी होगी। कंस्ट्रक्शन में कई जगह जाम की परेशानी होती थी, लेकिन मेट्रो सेवा शुरू होने से रोड ट्रैफिक कम हो सकता है। इससे पॉल्यूशन भी कम होगा। मेट्रो शुरू होने से लोग बिना जाम में फंसे अपने ऑफिस, कॉलेज के साथ और भी जगह आसानी से पहुंच सकेंगे।

नए स्टेशनों से बढ़ेगी कनेक्टिविटी, टूरिस्ट और स्टूडेंट्स को भी फायदा

पांचों स्टेशनों के शुरू होने से शहर के कई इलाके मेट्रो से कनेक्ट हो जायेंगे। SN मेडिकल कॉलेज, राजा की मंडी रेलवे स्टेशन और ISBT जाने वाले लोगों को सफर में आसानी होगी। आगरा मेट्रो का पहला कॉरिडोर ताज पूर्वी गेट से सिकंदरा तक करीब 14 किलोमीटर लंबा है, जिसमें 13 स्टेशन बनाए जाने हैं।

ISBT से शहर के बड़े इलाकों तक मेट्रो चलने से आगरा आने वाले टूरिस्ट का सफर भी आसान होगा है और रोड पर जाम की वजह से होने वाली परेशानी भी कम हो सकती है। SN मेडिकल कॉलेज आने वाले पेशेंट के लिए भी मेट्रो एक आसान सफर बन सकती है। वहीं RBS कॉलेज आने-जाने वाले स्टूडेंट्स और फैकल्टी को भी सफर में आसानी होगी।

बिचौलियों का खेल खत्म! आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए योगी सरकार का नया प्लान, जानिए कैसे 20 लाख लोगों की बदलेगी जिंदगी

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत जल्द बिचौलियों का खेल खत्म करने की तैयारी की रही है। राज्य सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर तेजी से काम कर रही है। उत्तर प्रदेश कॉरपोरेशन फॉर आउटसोर्सिंग सर्विसेज (UPCOS) के लॉन्च से करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारी और उनके परिवार एक नए कल्याणकारी ढांचे के केंद्र में आ गए हैं। सरकार का कहना है कि परिवार के सदस्यों को शामिल करने पर इस पहल से 17 से 20 लाख लोग लाभांवित हो सकते हैं।

सरकार की व्यवस्था से दूर होंगी आउटसोस वर्करों की चिंताएं

बीजेपी के लिए यह प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों, हॉस्पिटल, लोकल बॉडी और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों में काम करते हैं। इससे वे एक बड़ा कार्यबल बन जाते हैं जिनका सीधा लिंक सरकारी मशीनरी से होता है। नए सिस्टम का मकसद उनकी कुछ पुरानी चिंताओं को दूर करना है, जिसमें वेतन में देरी, एजेंसियों द्वारा कटौती, सामाजिक सुरक्षा की कमी और नौकरी को लेकर अनिश्चितता शामिल है।

आउटसोर्स कर्मियों के बैंक खाते में जाएगी सैलरी

यूपीसीओएस के तहत, सैलरी सीधे वर्कर के बैंक अकाउंट में भेजी जाएगी, जबकि ईपीएफ और ईएसआई योगदान नियमित जमा किए जाएंगे। सरकार ने कहा है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों को वर्कर की सैलरी से सर्विस चार्ज काटने की इजाजत नहीं होगी। कैटेगरी के आधार पर 20 लाख रुपये से 40 लाख रुपये के एक्सीडेंट इंश्योरेंस की भी घोषणा की गई है।

बड़े वेलफेयर मॉडल पर काम कर रही सरकार

प्रदेश सरकार के हाल के फैसले बताते हैं कि वह एक बड़े वेलफेयर मॉडल पर आगे बढ़ रही है। इसके तहत नकद लाभ को एक बड़े वेलफेयर मॉडल का केंद्र बिंदु माना जा रहा है। इसमें स्वास्थ्य, बीमा और रोजगार सुरक्षा भी शामिल है। हाल ही में पंचायत असिस्टेंट का मानदेय बढ़ाने पर सहमती के साथ ही सरकार ने रोजगार और सामाजिक आर्थिक सुरक्षा से जुड़े कई सहूलियतें प्रदान करने की घोषणा की। इसी तरह अगस्त में 3.5 लाख से अधिक मिड-डे मील कुक का मानदेय बढ़ाने का फैसला किया था। सरकार ने उन्हें कैशलेस हेल्थ कवर सहित कई अन्य सुविधाओं की घोषणा की थी। आंगनवाड़ी वर्कर्स को भी बढ़ते वेलफेयर नेट में लाया गया है। 8 सितंबर को, योगी ने हेल्पर्स और हेल्थ इंश्योरेंस के लिए उनके महीने के मानदेय को 8,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने की घोषणा की। बड़ी वेलफेयर स्कीमों की तुलना में अलग-अलग रकम कम लग सकती है, लेकिन राजनीतिक महत्व कवर किए जा रहे ग्रुप्स की संख्या और नेचर में है।

कल्याणकारी योजनाओं की सोच में बदलाव

लखनऊ में गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर नोमिता पी कुमार ने कहा कि इन उपायों से सरकार की कल्याकारी योजनाओं की सोच में बदलाव का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा, “पंचायत असिस्टेंट के मानदेय में 50% की बढ़ोतरी से लेकर आंगनवाड़ी वर्कर, मिड-डे मील कुक और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए बढ़ी हुई आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तक, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वेलफेयर पॉलिटिक्स का एक नया पैटर्न उभर रहा है।”