BHEL Vacancy 2026: आईटीआई वालों के लिए 380 पदों पर सीधी भर्ती, 10वीं पास भी कर सकते हैं आवेदन

BHEL Vacancy 2026: भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) आईटीआई कर चुके युवाओं के लिए अप्रेंटिस भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत 380 पदों पर आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। बीएचईएल अप्रेंटिस भर्ती 2026 के तहत 10वीं पास उम्मीदवार भी आवेदन कर सकते हैं। इसके तहत फ्रेशर भी आवेदन कर 12 महीने की ट्रेनिंग के दौरान बीएचईएल जैसी दमदार संस्था में काम करते हुए अच्छा अनुभव ले सकते हैं। बीएचईएल की इस अप्रेंटिसशिप की खास बात यह है कि इसके लिए उम्मीदवारों का चयन मेरिट आधार पर किया जाएगा, कोई लिखित परीक्षा नहीं होगी।

चयनित उम्मीदवारों के लिए खाने-पीने और हॉस्टल की सुविधा भी दी जाएगी। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार इस ट्रेड अप्रेंटसशिप के लिए ऑनलाइन पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। रजिस्ट्रेशन करने का लिंक खुला हुआ है। इस अप्रेंटिसशिप में इच्छुक और योग्य अभ्यर्थी अंतिम तिथि 12 सितंबर 2026 तक अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले RDSE (NAPS) पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा।

09 ट्रेड में होगी अप्रेंटिस भर्ती

यह अप्रेंटिसशिप फिटर, वेल्डर, इलेक्ट्रीशियन, टर्नर, मशीनिस्ट, इंस्ट्रूमेंट मैकेनिक, मोटर मैकेनिक समेत 09 ट्रेड के लिए निकाली गई है। चयन प्रक्रिया में कोई भी लिखित परीक्षा नहीं रखी गई है। क्वालिफाइंग योग्यता में आए नंबरों के आधार पर ही उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा।

बीएचईएल अप्रेंटिस भर्ती 2026 के लिए योग्यता

शैक्षिक योग्यता : मान्यता प्राप्त बोर्ड से हाई स्कूल (10वीं) पास की हो। साथ में NCVT/SCVT से फुल टाइम आईटीआई कोर्स किया हो। वेल्डर ट्रेड के लिए केवल NCVT से प्राप्त ट्रेड सर्टिफिकेट ही वैलिड होगा।

उम्र सीमा : उम्मीदवारों की उम्र कम से कम 18 वर्ष और अधिकतम 27 वर्ष तक होनी चाहिए। यह उम्र सीमा सामान्य श्रेणी वालों के लिए है। वहीं, एससी/एसटी को 5 साल, ओबीसी (एनसीएल) को 03 साल , पीडब्ल्यूबीडी को 10 साल की नियमानुसार छूट दी जाएगी। आयु सीमा की गणना 1 अगस्त 2026 के आधार पर की जाएगी।

बीएचईएल ट्रेड वाइज वैकेंसी और स्टाइपेंड

ट्रेड वैकेंसी स्टाइपेंड (प्रति माह)

फिटर 125 ₹11040

वेल्डर 115 ₹10560

इलेक्ट्रीशियन 30 ₹11040

टर्नर 20 ₹11040

मैकेनिस्ट 20 ₹11040

इंस्ट्रूमेंट मैकेनिक 12 ₹11040

मैकेनिक R & AC 06 ₹11040

COPA 45 ₹10560

कुल 380

चयन के लिए नहीं होगी लिखित परीक्षा

बीएचईएल तिरुच्चिराप्पल्लि में अप्रेंटिसशिप के लिए उम्मीदवारों का चयन क्वालिफाइंग परीक्षा के जरिए किया जाएगा। मेरिट लिस्ट इन्हीं अंकों के आधार पर तैयार की जाएगी। अगर दो अभ्यर्थियों को टाई की स्थिति बनती है, तो उम्र में बड़े अभ्यर्थी को चुना जाएगा। जो अभ्यर्थी पहले से अप्रेंटिसशिप की ट्रेनिंग ले रहे हैं या पूरी कर चुके हैं, वो आवेदन के योग्य नहीं हैं। चयनित उम्मीदवारों को जॉइनिंग के बाद एक साल की ट्रेनिंग दी जाएगी।

रजिस्ट्रेशन कहां करना होगा?

इच्छुक और योग्य उम्मीदवारों को सबसे पहले RDSE (NAPS) पोर्टल www.apprenticeshipindia.gov.in पर पंजीकरण करना होगा। यहां रजिस्ट्रेशन करने के बाद पंजीकरण संख्या नोट कर लें। इसके बाद बीएचईएल त्रिची पोर्टल trichy.bhel.com पर संबंधित रजिस्ट्रेशन नंबर भरकर एप्लिकेशन में अन्य डिटेल्स भी भर दें। साथ ही, जरूरी डॉक्यूमेंट्स, पासपोर्ट साइज कलर फोटोग्राफ, हस्ताक्षर, 10वीं की मार्कशीट, जाति प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज अगर हैं, भी अपलोड करने होंगे। सेलेक्शन और अन्य कोई भी जानकारी के लिए अभ्यर्थियों से ईमेल/एसएमएस के जरिए संपर्क किया जाएगा।

DRDO Vacancy 2026: डीआरडीओ कर रहा ग्रेजुएट अप्रेंटिस भर्ती, रक्षा मंत्रालय के संस्थान में अनुभव के साथ हर महीने मिलेगा स्टाइपेंड

हिंदुस्तान कॉपर के शेयर में OFS के बाद फिर आ सकती है तेजी, आनंद राठी ने ₹715 का टारगेट दिया

सरकारी कंपनी Hindustan Copper के शेयर में मंगलवार को काफी दबाव देखने को मिला है। इसकी बड़ी वजह सरकार की हिस्सेदारी बिक्री यानी OFS है। इसके बावजूद घरेलू ब्रोकरेज फर्म Anand Rathi ने शेयर पर Buy रेटिंग बरकरार रखी है। ब्रोकरेज ने ₹715 का टारगेट प्राइस दिया है। यह मंगलवार के बंद भाव से 34.65% अधिक है। OFS की वजह से स्टॉक 7.45% गिरकर 531.40 रुपये पर बंद हुआ।

Anand Rathi Institutional Equities के वाइस प्रेसिडेंट पार्थिव झोंसा का मानना है कि कंपनी के फंडामेंटल मजबूत हैं। बढ़ता प्रोडक्शन, कॉपर की ऊंची कीमत और कमाई में सुधार की उम्मीद शेयर को सपोर्ट कर सकती है।

OFS के बाद दबाव कम हो सकता है

झोंसा के मुताबिक, OFS के बाद कुछ समय तक शेयर में दबाव रह सकता है। लेकिन अगले कुछ महीनों में ₹490-500 के स्तर से रिकवरी देखने को मिल सकती है।

उनका कहना है कि सरकार की हिस्सेदारी बिक्री से कंपनी के फंडामेंटल नहीं बदले हैं। कारोबार की बुनियाद अब भी मजबूत है। इसलिए OFS को कंपनी की कमाई या ऑपरेशन में बदलाव के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

कॉपर प्रोडक्शन-प्राइस बनेगा बड़ा ट्रिगर

Anand Rathi के मुताबिक, आगे शेयर के लिए सबसे बड़ा ट्रिगर प्रोडक्शन वॉल्यूम होगा। Hindustan Copper की कमाई पर कॉपर की कीमत का सीधा असर पड़ता है। कॉपर की कीमत मजबूत रहने से कंपनी की कमाई को सपोर्ट मिल सकता है।

इसके अलावा रुपये में कमजोरी भी कंपनी के लिए फायदेमंद हो सकती है। यही वजह है कि ब्रोकरेज को आने वाले वर्षों में कंपनी की कमाई में अच्छी बढ़त की उम्मीद है।

वैल्यूएशन पर क्या कहना है?

Hindustan Copper अभी दो साल के फॉरवर्ड EV/EBITDA के आधार पर करीब 16-18 गुना पर ट्रेड कर रहा है। यह वैल्यूएशन पहली नजर में ज्यादा लग सकती है।

लेकिन Anand Rathi का कहना है कि दुनियाभर की कॉपर माइनिंग कंपनियां भी कॉपर के मजबूत लॉन्ग टर्म आउटलुक की वजह से ऊंची वैल्यूएशन पर कारोबार कर रही हैं।

सरकार की हिस्सेदारी बड़ी चिंता नहीं

झोंसा को सरकार की बची हुई हिस्सेदारी से ज्यादा परेशानी नहीं दिखती। पूरे OFS के बाद भी सरकार के पास Hindustan Copper की 60% से ज्यादा हिस्सेदारी रहेगी।

वहीं पब्लिक फ्लोट बढ़ने से शेयर में लिक्विडिटी बेहतर हो सकती है। ज्यादा निवेशकों के लिए शेयर में ट्रेडिंग और निवेश करना आसान होगा।

DRDO Missile: सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी, इन 7 डिफेंस स्टॉक्स पर रखें नजर

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पावर सेक्टर में 2030 के बाद SCADA इंपोर्ट बंद होगा, देश में बनाने की तैयारी; इन स्टॉक्स पर रखें नजर

सरकार ने पावर सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले SCADA सिस्टम का आयात 2030 के बाद बंद करने का फैसला किया है। लक्ष्य 2028-29 तक इसका स्वदेशी विकल्प तैयार करना है। अभी इन सिस्टम में लोकल कंटेंट 20% से भी कम है। सरकार इसे बढ़ाना चाहती है।

आप SCADA को पावर ग्रिड का कंट्रोल सिस्टम समझ सकते हैं। इससे पावर प्लांट, सब-स्टेशन और ग्रिड की रियल टाइम निगरानी होती है। जरूरत पड़ने पर कई इक्विपमेंट को दूर से कंट्रोल भी किया जा सकता है।

स्वदेशीकरण क्यों जरूरी हुआ?

यह पूरा मामला सिर्फ मेक इन इंडिया तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी भी बड़ी वजह है। अभी SCADA के कई अहम सॉफ्टवेयर और कंपोनेंट विदेशों से आते हैं। ऐसे में अपडेट, तकनीकी मदद और साइबर सिक्योरिटी सपोर्ट के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता रहती है।

ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के दौरान यह चिंता और बढ़ी। पावर मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, मई 2025 में 8-10 दिनों के दौरान भारत के पावर सिस्टम पर करीब 2 लाख साइबर अटैक की कोशिशें हुई थीं। ऐसे में सरकार चाहती है कि देश के पावर ग्रिड को चलाने वाली अहम टेक्नोलॉजी पर भारत का अपना नियंत्रण हो।

2028-29 तक तैयार होगा स्वदेशी सिस्टम

CEA ने SCADA के स्वदेशीकरण के लिए रोडमैप तैयार किया है। इसमें 38 सॉफ्टवेयर मॉड्यूल और 25 हार्डवेयर कंपोनेंट शामिल हैं।

सरकार National SCADA Mission या एक स्पेशल वर्किंग ग्रुप बनाने पर भी विचार कर रही है। इसमें Power Grid, GRID-India और घरेलू टेक्नोलॉजी कंपनियों को साथ लाया जा सकता है।

किन स्टॉक्स पर नजर रखें?

शेयर बाजार में इस थीम का सबसे सीधा नाम Power Grid है। प्रस्तावित मॉडल में कंपनी का नाम सीधे आया है। उसके पास ग्रिड ऑटोमेशन और SCADA का अनुभव भी है।

इसके अलावा Siemens, Hitachi Energy India, GE Vernova T&D और ABB India जैसी कंपनियां भी ग्रिड ऑटोमेशन और SCADA के कारोबार में हैं। स्वदेशी सिस्टम के विकास और पुराने सिस्टम के अपग्रेड से इन्हें अवसर मिल सकते हैं। TCS जैसी IT कंपनियों के लिए भी सॉफ्टवेयर, साइबर सिक्योरिटी और सिस्टम इंटीग्रेशन का मौका बन सकता है।

कंपनीसंभावित फायदा
Power Grid
SCADA, ग्रिड ऑटोमेशन और इंटीग्रेशन

Siemens
SCADA और एनर्जी मैनेजमेंट

Hitachi Energy India
ग्रिड ऑटोमेशन और SCADA

GE Vernova T&D Indiaट्रांसमिशन और ग्रिड ऑटोमेशन
ABB Indiaपावर ऑटोमेशन और डिजिटल ग्रिड
TCSसॉफ्टवेयर, साइबर सिक्योरिटी और इंटीग्रेशन

निवेशकों के लिए क्या अहम?

अभी इसे सीधे खरीदने का संकेत मानना ठीक नहीं है। असली फायदा तब साफ होगा जब सरकार कंपनियों का चयन करेगी और SCADA के अलग-अलग हिस्सों के लिए ऑर्डर जारी होंगे। फिलहाल Power Grid समेत SCADA, ग्रिड ऑटोमेशन और साइबर सिक्योरिटी से जुड़ी कंपनियों पर नजर रखी जा सकती है।

सीधी बात है। सरकार अब पावर ग्रिड की अहम टेक्नोलॉजी पर विदेशी निर्भरता घटाना चाहती है। Operation Sindoor के दौरान सामने आए साइबर खतरे ने इस जरूरत को और गंभीर बना दिया। इससे आने वाले वर्षों में पावर और टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए बड़ा घरेलू बाजार बन सकता है।

DRDO Missile: सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी, इन 7 डिफेंस स्टॉक्स पर रखें नजर

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

बिहार से गुजरात के लिए एक और ट्रेन, 26 अगस्त से दौड़ेगी नई अमृत भारत एक्सप्रेस, जानिए इसका रूट, स्टॉपेज और टाइमिंग

Ahmedabad-Bhagalpur Amrit Bharat Express: भारतीय रेलवे भागलपुर और अहमदाबाद के बीच एक नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेन शुरू करने जा रहा है। इससे बिहार और गुजरात के बीच रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी। ईस्टर्न रेलवे के मुताबिक, नई ट्रेन से यात्रियों की बढ़ती मांग पूरी होगी और देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच रेल संपर्क मजबूत होगा।

ईस्टर्न रेलवे ने कहा, “भागलपुर को ‘भारत की सिल्क सिटी’ के नाम से जाना जाता है और यह बिहार का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। नई ट्रेन से भागलपुर की गुजरात के बड़े औद्योगिक और आर्थिक केंद्र अहमदाबाद से रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी।”

बता दें कि भारतीय रेलवे ने मौजूदा 09447/09448 अहमदाबाद-पटना-अहमदाबाद क्लोन स्पेशल ट्रेन को अब नियमित ट्रेन के तौर पर चलाने का फैसला किया है। इसे 19423/19424 अहमदाबाद-भागलपुर-अहमदाबाद साप्ताहिक अमृत भारत एक्सप्रेस के रूप में चलाया जाएगा।

कल से शुरू होगी बिहार और अहमदाबाद के बीच ट्रेन

इसका परिचालन अहमदाबाद से 26 अगस्त, 2026 से प्रत्येक बुधवार को तथा भागलपुर से 28 अगस्त, 2026 से प्रत्येक शुक्रवार को किया जायेगा।

इस गाड़ी में LSLRD के 2, पेट्रीकार का 1, जनरल सेकेंड क्लास के 11 तथा स्लीपर क्लास के 08 कोचों सहित कुल 22 कोच लगाये जायेंगे।

भागलपुर-अहमदाबाद अमृत भारत एक्सप्रेस: दूरी और सफर का समय

भागलपुर-अहमदाबाद अमृत भारत एक्सप्रेस पूरी यात्रा लगभग 36 घंटे 10 मिनट में तय करेगी। इसमें जनरल अनरिजर्व्ड और स्लीपर क्लास के डिब्बे होंगे। ट्रेन 110 से 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी।

भागलपुर-अहमदाबाद अमृत भारत एक्सप्रेस: रूट, कितनी बार चलेगी और कहां रुकेगी?

भागलपुर-अहमदाबाद अमृत भारत एक्सप्रेस हफ्ते में एक दिन चलेगी। रास्ते में यह कई प्रमुख स्टेशनों पर रुकेगी। इनमें आनंद, छायापुरी, गोधरा, दाहोद, रतलाम, भवानी मंडी, रामगंज मंडी, कोटा, सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी, हिंडौन सिटी, बयाना, ईदगाह आगरा, टूंडला, गोविंदपुरी, सुबेदारगंज, पं. दीन दयाल उपाध्याय, बक्सर, आरा, दानापुर, पटना, बख्तियारपुर, मोकामा, किऊल, अभयपुर, जमालपुर और सुल्तानगंज शामिल हैं।

गाड़ी नंबर 19423 अहमदाबाद-भागलपुर अमृत भारत एक्सप्रेस का शेड्यूल

ट्रेन नंबर 19423 अहमदाबाद-भागलपुर वीकली अमृत भारत एक्सप्रेस 26 अगस्त, 2026 से हर बुधवार शाम 6:30 बजे अहमदाबाद से रवाना होगी और यह गुरूवार को 21.13 बजे डीडीयू, 22.30 बजे बक्सर, 23.15 बजे आरा, 23.50 बजे दानापुर, शुक्रवार को 00.43 बजे पटना स्टेशन, 01.25 बजे बख्तियारपुर, 02.08 बजे मोकामा, 03.30 बजे किउल, 04.01 बजे अभयपुर, 04.30 बजे जमालपुर, 05.13 बजे सुलतानगंज रूकते हुए 06.40 बजे भागलपुर पहुंचेगी।

गाड़ी नंबर 19424 भागलपुर-अहमदाबाद अमृत भारत एक्सप्रेस का शेड्यूल

वापसी की दिशा में, ट्रेन नंबर 19424 भागलपुर-अहमदाबाद वीकली अमृत भारत एक्सप्रेस 28 अगस्त, 2026 से हर शुक्रवार शाम 4:45 बजे भागलपुर से रवाना होगी और यह 17.03 बजे सुलतानगंज, 17.48 बजे 18.13 बजे अभयपुर, 19.15 बजे किउल, 19.56 बजे मोकामा, 20.30 बजे बख्तियारपुर, 21.58 बजे पटना स्टेशन 22.21 बजे दानापुर, 22.53 बजे आरा, 23.41 बजे बक्सर, शनिवार को 02.53 बजे डीडीयू सहित अन्य स्टेशनों पर रूकते हुए रविवार को 05.25 बजे अहमदाबाद पहुंचेगी।

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DRDO Missile: सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी, इन 7 डिफेंस स्टॉक्स पर रखें नजर

DRDO Missile: भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए 25 अगस्त का दिन अहम रहा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO की डेवलप सभी पारंपरिक मिसाइल सिस्टम्स की टेक्नोलॉजी भारतीय कंपनियों को ट्रांसफर करने को मंजूरी दे दी। इससे देश में मिसाइलों का प्रोडक्शन बढ़ाने और विदेशी हथियारों पर निर्भरता घटाने का रास्ता खुलेगा।

इसका फायदा सिर्फ मिसाइल बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स, लॉन्चर, गाइडेंस सिस्टम और दूसरे उपकरण बनाने वाली कंपनियों को भी नए ऑर्डर मिल सकते हैं। हालांकि, हर कंपनी को टेक्नोलॉजी या ऑर्डर मिलेगा, यह अभी तय नहीं है। कंपनियों को योग्यता और दूसरी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी।

Bharat Dynamics

इस खबर से सबसे सीधा जुड़ा नाम सरकारी डिफेंस कंपनी भारत डायनेमिक्स यानी BDL है। कंपनी पहले से DRDO की कई मिसाइलों का उत्पादन करती है। आकाश, नाग, अस्त्र और MRSAM जैसी मिसाइल प्रणालियों से इसका कारोबार जुड़ा है।

देश में मिसाइल उत्पादन बढ़ता है तो BDL को नए ऑर्डर मिलने का फायदा हो सकता है। कंपनी के पास पहले से जरूरी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अनुभव भी है। हालांकि, निजी कंपनियों की एंट्री से आगे प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

Bharat Electronics

सरकारी कंपनी BEL सिर्फ मिसाइल नहीं बनाती। मिसाइल सिस्टम में रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंट्रोल सिस्टम भी जरूरी होते हैं। इस हिस्से में BEL की मजबूत मौजूदगी है।

आकाश और MRSAM जैसे सिस्टम में कंपनी की अहम भूमिका है। इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने के साथ रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मांग बढ़ी तो BEL को भी फायदा मिल सकता है।

L&T

प्राइवेट सेक्टर में L&T बड़ा नाम है। कंपनी मिसाइल सिस्टम, लॉन्चर, रडार और एयर डिफेंस सिस्टम से जुड़े काम करती है। आकाश मिसाइल के लिए भी कंपनी कई अहम हिस्सों का उत्पादन कर चुकी है।

सरकार अगर प्राइवेट कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाती है तो L&T मजबूत दावेदार हो सकती है। कंपनी के पास बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट संभालने का अनुभव और क्षमता दोनों हैं।

Bharat Forge

भारत फोर्ज का डिफेंस कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। Kalyani Strategic Systems के जरिए कंपनी हथियार, गोला-बारूद, एयर डिफेंस और दूसरे डिफेंस सिस्टम पर काम करती है।

मिसाइल और एयर डिफेंस का उत्पादन बढ़ा तो कंपनी को नए मौके मिल सकते हैं। इसे सीधे मिसाइल कंपनी की बजाय बड़े डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्ले के तौर पर देखना बेहतर होगा।

Solar Industries

प्राइवेट सेक्टर की Solar Industries डिफेंस में प्रोपेलेंट, विस्फोटक और दूसरे हाई-एनर्जी मटेरियल बनाती है। कंपनी ब्रह्मोस मिसाइल के लिए प्रोपेलेंट से जुड़े काम में भी रही है।

मिसाइलों का प्रोडक्शन बढ़ेगा तो उनके लिए जरूरी सामग्री की मांग भी बढ़ सकती है। इसलिए Solar को मिसाइल सप्लाई चेन के एक अहम खिलाड़ी के तौर पर देखा जा सकता है।

Data Patterns

डेटा पैटर्न्स डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स पर काम करती है। कंपनी रडार, गाइडेंस सिस्टम, टेस्टिंग सिस्टम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाती है।

मिसाइलों में लगे सीकर और गाइडेंस सिस्टम काफी अहम होते हैं। इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने पर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मांग बढ़ सकती है।

Astra Microwave

Astra Microwave रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी सिस्टम बनाती है। मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम में इनकी अहम भूमिका होती है।

इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने का फायदा सीधे न सही, लेकिन डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती मांग के जरिए कंपनी को मिल सकता है।

एक नजर में

कंपनीमुख्य फायदा
भारत डायनेमिक्समिसाइल उत्पादन
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स
रडार और इलेक्ट्रॉनिक्स

L&T
मिसाइल और एयर डिफेंस

भारत फोर्जडिफेंस मैन्युफैक्चरिंग
Solar Industriesप्रोपेलेंट और विस्फोटक
Data Patternsमिसाइल इलेक्ट्रॉनिक्स
Astra Microwaveरडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी

निवेशकों के लिए जरूरी बात

अभी इसे सीधे शेयर खरीदने का संकेत नहीं मानना चाहिए। सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी है। आगे कंपनियों का चयन होगा। फिर प्रोडक्शन और ऑर्डर की तस्वीर साफ होगी।

फिलहाल BDL, BEL, L&T, भारत फोर्ज, Solar Industries, Data Patterns और Astra Microwave पर नजर रखी जा सकती है। असली फायदा किसे मिलेगा, यह आने वाले ऑर्डर और उनके असर से कंपनी की कमाई पर पता चलेगा।

Market Mantra : कंप्लीट सर्किल के गुरमीत चड्ढा से जाने, किन सेक्टर्स और शेयरों पर फोकस करना बेहतर

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

अपोलो माइक्रो सिस्टम्स ने नई डिफेंस कंपनी में 34% हिस्सेदारी खरीदी, वैज्ञानिक वीके सारस्वत करेंगे अगुवाई

Apollo Micro Systems: डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर की कंपनी Apollo Micro Systems ने नई रक्षा तकनीक कंपनी ShauryAstra Defence Systems में 34% हिस्सेदारी खरीदी है। कंपनी ने इसके लिए ₹34,000 का निवेश किया है। ShauryAstra का फोकस ऐसी रक्षा तकनीकों पर रहेगा, जिनकी जरूरत भारतीय सेना को है, लेकिन अभी उनके स्वदेशी समाधान उपलब्ध नहीं हैं।

ShauryAstra में 34% हिस्सेदारी

Apollo Micro Systems ने ShauryAstra के 3,400 इक्विटी शेयर खरीदे हैं। इनकी फेस वैल्यू ₹10 प्रति शेयर है। इस निवेश के बाद ShauryAstra में Apollo Micro Systems की हिस्सेदारी 34% हो गई है।

ShauryAstra को 21 अगस्त 2026 को शामिल किया गया था। अब यह Apollo Micro Systems की एसोसिएट कंपनी बन गई है।

डॉ. वी.के. सारस्वत का मिलेगा अनुभव

नई कंपनी का वैज्ञानिक नेतृत्व डॉ. वी.के. सारस्वत करेंगे। वह DRDO के पूर्व महानिदेशक और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के पूर्व सचिव रह चुके हैं। वह रक्षा मंत्री के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे हैं।

डॉ. सारस्वत भारत के कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों से जुड़े रहे हैं। इनमें पृथ्वी, धनुष, प्रहार और अग्नि-5 मिसाइल कार्यक्रम शामिल हैं। वह भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम, तेजस और INS अरिहंत से भी जुड़े रहे हैं।

फोकस होगा अगली पीढ़ी की रक्षा तकनीक पर

ShauryAstra संपूर्ण हथियार प्रणालियों, लंबी दूरी की प्रणालियों और मानव रहित प्लेटफॉर्म्स पर काम करेगी। कंपनी का फोकस एडवांस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करने पर रहेगा।

खास बात यह है कि कंपनी सिर्फ मौजूदा जरूरतों पर काम नहीं करेगी। वह भविष्य के युद्धक्षेत्र में आने वाली तकनीकी जरूरतों और संभावित कमियों की भी पहचान करेगी।

Apollo की मौजूदा क्षमता का मिलेगा फायदा

Apollo Micro Systems पिछले चार दशक से डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में है। कंपनी मिशन-क्रिटिकल इलेक्ट्रॉनिक्स, एवियोनिक्स, रग्ड कंप्यूटिंग, फ्यूज, एक्ट्यूएटर्स और वेपन इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में काम करती है।

ShauryAstra रिसर्च और सिस्टम डिजाइन पर ज्यादा फोकस करेगी। वहीं Apollo Group की इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन क्षमता का इस्तेमाल उत्पादन के लिए किया जा सकेगा।

कंपनी का लक्ष्य क्या है?

Apollo Micro Systems अब सिर्फ कंपोनेंट और सबसिस्टम बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी संपूर्ण स्वदेशी हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म्स के विकास में बड़ी भूमिका बनाना चाहती है।

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर बी. करुणाकर रेड्डी के मुताबिक ShauryAstra इसी दिशा में अगला कदम है। यह पहल भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के मुताबिक भी है।

Apollo Micro Systems के शेयर NSE पर 0.14% गिरकर ₹384 प्रति शेयर पर बंद हुए।

Hyundai Motor India पर नोमुरा बुलिश, दोहराई ‘बाय’ रेटिंग; कहा- नई लॉन्चिंग्स से वॉल्यूम को मिलेगा बूस्ट

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

BrahMos और Agni-V में कौन ज्यादा ताकतवर? दोनों मिसाइलों का काम बिल्कुल अलग, समझिए फर्क

भारत के पास दुनिया की सबसे ताकतवर और खतरनाक मिसाइल है। जिसकी गति और मारक क्षमता देखकर पूरी दुनिया हैरान रहती है। भारत के इन मिसाइलों का एक नजारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में दिखा था।  पिछले 40 साल में भारत ने मिसाइल तकनीक विकसित करने की शुरुआत से लेकर आधुनिक और बेहद ताकतवर मिसाइल सिस्टम तैयार करने तक लंबा सफर तय किया है। आज देश जमीन, समुद्र और हवा से होने वाले खतरों का मुकाबला करने की अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। इस सफर में ब्रह्मोस और अग्नि-5 भारत की मिसाइल ताकत के दो बड़े उदाहरण हैं।

हालांकि ब्रह्मोस और अग्नि-5 दोनों ही भारत की ताकतवर मिसाइलों में शामिल हैं, लेकिन इन्हें एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए नहीं बनाया गया है। दोनों का काम और इस्तेमाल अलग है।

ब्रह्मोस का इस्तेमाल पारंपरिक सैन्य अभियानों में दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। वहीं, अग्नि-5 भारत की रणनीतिक सुरक्षा का अहम हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन को किसी बड़े हमले से रोकना और भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को मजबूत करना है।

इसलिए ब्रह्मोस और अग्नि-5 की तुलना उनकी ताकत के आधार पर करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि दोनों मिसाइलें अलग-अलग भूमिकाएं निभाती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से दोनों का अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान है।

अलग-अलग मिशन तय करते हैं दोनों मिसाइलों की भूमिका

ब्रह्मोस और अग्नि-5 के बीच अंतर समझने का सबसे आसान तरीका यह जानना है कि दोनों को किस मकसद से बनाया गया है। दोनों आधुनिक और ताकतवर मिसाइलें हैं, लेकिन युद्ध में उनका इस्तेमाल अलग-अलग काम के लिए होता है।

ब्रह्मोस नाम ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्क्वा नदियों के नाम से लिया गया है। यह भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की कंपनी एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया ने मिलकर विकसित की है। यह एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, यानी यह आवाज की रफ्तार से भी कई गुना तेज उड़ सकती है।

ब्रह्मोस का इस्तेमाल पारंपरिक सैन्य अभियानों में दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। इसमें युद्धपोत, एयरफील्ड, रडार स्टेशन और सैन्य कमांड सेंटर जैसे लक्ष्य शामिल हो सकते हैं। यह मिसाइल भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल है और भारत की प्रमुख स्ट्राइक मिसाइलों में से एक है।

वहीं, अग्नि-5 एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसे डीआरडीओ ने भारत की रणनीतिक सुरक्षा और दुश्मन को हमले से रोकने की क्षमता मजबूत करने के लिए विकसित किया है।

ब्रह्मोस के विपरीत अग्नि-5 का इस्तेमाल आम युद्ध के मैदान में किसी ठिकाने पर हमला करने के लिए नहीं किया जाता। इसका मुख्य उद्देश्य लंबी दूरी से आने वाले बड़े खतरों के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को मजबूत करना है। यह भारत की परमाणु प्रतिरोध नीति का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल अलग-अलग तरीके से काम करती हैं

ब्रह्मोस और अग्नि-5 दोनों ही मिसाइलें हैं, लेकिन इनके उड़ने और टारगेट तक पहुंचने का तरीका बिल्कुल अलग है। इसी वजह से दोनों का इस्तेमाल भी अलग-अलग काम के लिए किया जाता है।

ब्रह्मोस एक क्रूज मिसाइल है। यह वायुमंडल के अंदर एक विमान की तरह उड़ते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इसमें रैमजेट इंजन का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसे बहुत तेज गति से उड़ने में मदद करता है। यह कम ऊंचाई पर भी उड़ सकती है, जिससे दुश्मन के लिए इसे समय रहते पहचानना और रोकना मुश्किल हो सकता है।

वहीं, अग्नि-5 एक बैलिस्टिक मिसाइल है। यह ब्रह्मोस से बिल्कुल अलग तरीके से लक्ष्य तक पहुंचती है। लॉन्च होने के बाद यह बहुत ऊंचाई तक जाती है और फिर तेज गति से नीचे आते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इस तरह यह लॉन्च वाली जगह से हजारों किलोमीटर दूर तक स्थित लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम होती है।

आसान शब्दों में कहें तो ब्रह्मोस तेज गति से कम ऊंचाई पर उड़कर सटीक हमला करने वाली मिसाइल है, जबकि अग्नि-5 लंबी दूरी की रणनीतिक मिसाइल है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की सुरक्षा और दुश्मन को हमले से रोकने की क्षमता को मजबूत करना है।

स्पीड और रेंज

ब्रह्मोस अपनी तेज रफ्तार के लिए जानी जाती है। यह करीब मैक 3 की गति से उड़ सकती है। इतनी तेज गति के कारण यह कुछ ही समय में अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। कम ऊंचाई पर उड़ने और लक्ष्य के करीब पहुंचने के दौरान दिशा बदलने की क्षमता के कारण इसे रोकना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

दूसरी ओर, अग्नि-5 को लंबी दूरी के लिए बनाया गया है। इसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है। इसका इस्तेमाल युद्ध के मैदान में तुरंत हमला करने के बजाय भारत की लंबी दूरी की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करने के लिए किया जाता है।

आसान भाषा में समझें तो ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत उसकी रफ्तार और सटीक हमला करने की क्षमता है, जबकि अग्नि-5 की खासियत उसकी लंबी दूरी और रणनीतिक भूमिका है।

कौन सी मिसाइल ज्यादा ताकतवर है?

ब्रह्मोस और अग्नि-5 की तुलना करते समय अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि दोनों में से कौन ज्यादा ताकतवर है। लेकिन इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों मिसाइलों को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाया गया है। इसलिए इनकी ताकत का आकलन मिशन के हिसाब से करना ज्यादा सही होगा।

अगर लक्ष्य दुश्मन के युद्धपोत, एयरबेस या सैन्य कमांड सेंटर पर तेजी से हमला करना है, तो ब्रह्मोस ज्यादा उपयोगी है। इसकी तेज रफ्तार, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता इसे एक प्रभावी क्रूज मिसाइल बनाती है।

वहीं, अगर बात लंबी दूरी की रणनीतिक सुरक्षा और दुश्मन को बड़े हमले से रोकने की है, तो अग्नि-5 की भूमिका अहम हो जाती है। इसकी 5,000 किलोमीटर से ज्यादा की मारक क्षमता भारत की रणनीतिक मिसाइल ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस भूमिका में मिसाइल की रफ्तार से ज्यादा उसकी लंबी दूरी और रणनीतिक क्षमता मायने रखती है।

इसलिए ब्रह्मोस और अग्नि-5 को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी कहना सही नहीं होगा। ब्रह्मोस भारत की तेज और सटीक पारंपरिक हमला करने की क्षमता को मजबूत करती है, जबकि अग्नि-5 लंबी दूरी की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करती है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं और इसी वजह से दोनों भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आधी वजनी लेकिन दोगुनी घातक! भारत की BrahMos-NG के सामने दुश्मन के एयर डिफेंस फेल, जानिए ब्रह्मोस और NG में क्या है फर्क

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक के रूप में अपनी खास पहचान बनाई है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल होने के बाद से इसने देश की हमलावर क्षमता को काफी मजबूत किया है। अब इसी कड़ी में एक नया नाम चर्चा का विषय बना है और वो है ‘ब्रह्मोस एनजी’ (BrahMos Next Generation)। आइए समझते हैं भारत के इस नए विनाशक हथियार की जर्नी और ये भी जानते हैं कि ये मूल ब्रह्मोस से कितनी अलग है, क्या-क्या खास है इसमें?

क्यों पड़ी ब्रह्मोस NG को विकसित करने की जरूरत?

आपतो बता दें कि ब्रह्मोस मिसाइल जमीन पर हमला करने और समुद्री जहाजों को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन में काफी सफल रही। इसके बावजूद अपने भारी-भरकम आकार और वजन की वजह से इसे ले जाने सकने वाले विमान कम थे। काफी वजन होने की वजह से भारतीय वायु सेना के मौजूदा विमानों में मूल ब्रह्मोस मिसाइल को सिर्फ सुखोई सु-30एमकेआई (Su-30MKI) फाइटर जेट पर ही तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस एनजी का डेवलपमेंट इसी चुनौती से पार पाने के लिए किया गया है। सुपरसोनिक रफ्तार को बरकरार रखते हुए इसके छोटे आकार और कम वजन की वजह से भारत इसे कई तरह के लड़ाकू और नौसैनिक विमानों पर तैनात करने की योजना बना रहा है। इससे सशस्त्र बलों को अपने अभियानों में अधिक संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल करने की सुविधा मिलेगी।

आकार और वजन में बड़ा बदलाव

दोनों मिसाइलों के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके आकार और वजन का है। मूल ब्रह्मोस मिसाइल लगभग 8.4 मीटर लंबी है और इसके हवा से दागे जाने वाले वर्जन का वजन करीब 3 टन है। इसके उलट ब्रह्मोस एनजी करीब 6 मीटर लंबी होगी और इसका वजन करीब 1.3 से 1.6 टन के बीच होगा। अपने छोटे और कॉम्पैक्ट डिजाइन की वजह से इसे कई अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर ले जाना और तैनात करना बहुत आसान हो जाएगा। जो विमान अभी मूल ब्रह्मोस को ले जाने में सक्षम नहीं हैं, वे भी इस नई मिसाइल को ले जा सकेंगे। इसके अलावा आकार छोटा होने से एक ही फाइटर जेट एक भारी मिसाइल के बजाय कई ब्रह्मोस एनजी मिसाइलें ले जा सकता है जिससे लड़ाकू विमान की हमलावर क्षमता काफी बढ़ जाती है।

रफ्तार और रेंज में नहीं होगी कोई कमी

मिसाइल का आकार छोटा करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसकी रफ्तार से कोई समझौता किया गया है। ब्रह्मोस एनजी से उसी सुपरसोनिक क्षमता को बनाए रखने की उम्मीद है जिसने पुरानी ब्रह्मोस को दुनिया भर में फेसम बनाया है। मौजूदा ब्रह्मोस करीब 3 मैक की रफ्तार से उड़ान भरती है, जिससे यह सबसोनिक क्रूज मिसाइलों की तुलना में अपने टारगेट तक बहुत तेजी से पहुंचती है। इसकी तेज स्पीड दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को रिएक्शन देने का बेहद कम वक्त देती है और इसीलिए इसे हवा में रोकना बेहद कठिन हो जाता है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुताबिक ब्रह्मोस एनजी भी करीब 3 मैक की गति से उड़ान भरेगी।

रेंज के मामले में भी मूल ब्रह्मोस मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) में भारत के शामिल होने के बाद अपनी शुरुआती 290 किमी की सीमा से काफी आगे बढ़ चुकी है। ब्रह्मोस एनजी भी उसी के समकक्ष ऑपरेटिंग रेंज देगी, जबकि इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, गाइडेंस सिस्टम और टोटोल एफिशियंसी में सुधार देखने को मिलेगा।

कई फाइटर जेट्स से दागी जा सकेगी मिसाइल

मूल ब्रह्मोस मोबाइल लैंड लॉन्चर्स, भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और विशेष रूप से संशोधित सु-30एमकेआई लड़ाकू विमानों से फायर होती है। हल्की ब्रह्मोस एनजी सु-30एमकेआई के अलावा तेजस एमके1ए (Tejas Mk1A), एचएएल तेजस एमके2 (HAL Tejas Mk2), टीइडीबीएफ (TEDBF) और भविष्य में एएमसीए (AMCA) जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों के साथ इंटिग्रेट हो सकती है। इससे भारतीय वायु सेना अपनी पूरी फ्लीट के माध्यम से इन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को तैनात कर सकेगी।

गाइडेंस, सटीकता और पेलोड क्षमता

ब्रह्मोस ने न सिर्फ अपनी रफ्तार बल्कि अपनी अचूक क्षमता की वजह से भी फेमस है। यह चलते हुए जहाजों और जमीन पर बने दुश्मन के ठिकानों को सटीक निशाना बनाने के लिए इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, सैटेलाइट नेविगेशन और टर्मिनल फेज़ में एक्टिव रडार सीकर का इस्तेमाल करती है। ब्रह्मोस एनजी इन्हीं सिद्धांतों पर काम करेगी, लेकिन नए इलेक्ट्रॉनिक्स और छोटे आकार की वजह से इसके ऑनबोर्ड सिस्टम टारगेट को खोजने और नेविगेशन में ज्यादा बेहतर होंगे।

आकार छोटा होने की वजह से ब्रह्मोस एनजी का पेलोड वजन थोड़ा कम होगा। मूल ब्रह्मोस करीब 200 से 300 किग्रा का पारंपरिक वॉरहेड ले जाती है, जो भारी सुरक्षा वाले सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। ब्रह्मोस एनजी लगभग 200 किग्रा का थोड़ा हल्का वॉरहेड ले जाएगी। पेलोड हल्का होने के बावजूद यह युद्धपोतों, कमांड सेंटरों, रडार प्रतिष्ठानों और एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हाई वैल्यू टारगेट्स का काम तमाम कर पाएगी।

एक ही विमान से दागी जा सकेंगी कई मिसाइलें

ब्रह्मोस एनजी का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा यह है कि एक विमान अब ज्यादा मिसाइलें ले जा सकेगा। पहले वाली ब्रह्मोस भारी होने की वजह से एक सु-30एमकेआई विमान आमतौर पर एक मिशन के दौरान सिर्फ एक ही मिसाइल ले जा पाता है। हल्की ब्रह्मोस एनजी इस समीकरण को बदल देगी। वही विमान अब तीन ब्रह्मोस एनजी मिसाइलें ले जा सकेगा।

कौन सी मिसाइल है ज्यादा बेहतर?

ये बात मिसाइल के स्पेसिफिकेशन के बजाय मिशन की जरूरत पर डिपेंड करती है। मूल ब्रह्मोस एक बेहद प्रभावी मिसाइल है जो पहले से ही तीनों सेनाओं में सेवा दे रही है। यह अधिकतम मारक क्षमता वाले अभियानों के लिए इस्तेमाल होती रहेगी। ब्रह्मोस एनजी, मूल मिसाइल की जगह लेने के लिए नहीं बल्कि उसके सप्लिमेंट के रूप में काम करेगी। जहां अधिकतम विनाशात्मक क्षमता की जरूरत होगी वहां मूल ब्रह्मोस का इस्तेमाल किया जाएगा और जहां लड़ाकू विमानों की क्षमता बढ़ाने और एक साथ कई मिसाइलें दागने की जरूरत होगी वहां ब्रह्मोस एनजी काम आएगी। भारतीय सशस्त्र बल इन दोनों मिसाइलों का एक साथ इस्तेमाल करेंगे।