DRDO Missile: सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी, इन 7 डिफेंस स्टॉक्स पर रखें नजर

DRDO Missile: भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए 25 अगस्त का दिन अहम रहा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO की डेवलप सभी पारंपरिक मिसाइल सिस्टम्स की टेक्नोलॉजी भारतीय कंपनियों को ट्रांसफर करने को मंजूरी दे दी। इससे देश में मिसाइलों का प्रोडक्शन बढ़ाने और विदेशी हथियारों पर निर्भरता घटाने का रास्ता खुलेगा।

इसका फायदा सिर्फ मिसाइल बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स, लॉन्चर, गाइडेंस सिस्टम और दूसरे उपकरण बनाने वाली कंपनियों को भी नए ऑर्डर मिल सकते हैं। हालांकि, हर कंपनी को टेक्नोलॉजी या ऑर्डर मिलेगा, यह अभी तय नहीं है। कंपनियों को योग्यता और दूसरी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी।

Bharat Dynamics

इस खबर से सबसे सीधा जुड़ा नाम सरकारी डिफेंस कंपनी भारत डायनेमिक्स यानी BDL है। कंपनी पहले से DRDO की कई मिसाइलों का उत्पादन करती है। आकाश, नाग, अस्त्र और MRSAM जैसी मिसाइल प्रणालियों से इसका कारोबार जुड़ा है।

देश में मिसाइल उत्पादन बढ़ता है तो BDL को नए ऑर्डर मिलने का फायदा हो सकता है। कंपनी के पास पहले से जरूरी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अनुभव भी है। हालांकि, निजी कंपनियों की एंट्री से आगे प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

Bharat Electronics

सरकारी कंपनी BEL सिर्फ मिसाइल नहीं बनाती। मिसाइल सिस्टम में रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंट्रोल सिस्टम भी जरूरी होते हैं। इस हिस्से में BEL की मजबूत मौजूदगी है।

आकाश और MRSAM जैसे सिस्टम में कंपनी की अहम भूमिका है। इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने के साथ रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मांग बढ़ी तो BEL को भी फायदा मिल सकता है।

L&T

प्राइवेट सेक्टर में L&T बड़ा नाम है। कंपनी मिसाइल सिस्टम, लॉन्चर, रडार और एयर डिफेंस सिस्टम से जुड़े काम करती है। आकाश मिसाइल के लिए भी कंपनी कई अहम हिस्सों का उत्पादन कर चुकी है।

सरकार अगर प्राइवेट कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाती है तो L&T मजबूत दावेदार हो सकती है। कंपनी के पास बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट संभालने का अनुभव और क्षमता दोनों हैं।

Bharat Forge

भारत फोर्ज का डिफेंस कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। Kalyani Strategic Systems के जरिए कंपनी हथियार, गोला-बारूद, एयर डिफेंस और दूसरे डिफेंस सिस्टम पर काम करती है।

मिसाइल और एयर डिफेंस का उत्पादन बढ़ा तो कंपनी को नए मौके मिल सकते हैं। इसे सीधे मिसाइल कंपनी की बजाय बड़े डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्ले के तौर पर देखना बेहतर होगा।

Solar Industries

प्राइवेट सेक्टर की Solar Industries डिफेंस में प्रोपेलेंट, विस्फोटक और दूसरे हाई-एनर्जी मटेरियल बनाती है। कंपनी ब्रह्मोस मिसाइल के लिए प्रोपेलेंट से जुड़े काम में भी रही है।

मिसाइलों का प्रोडक्शन बढ़ेगा तो उनके लिए जरूरी सामग्री की मांग भी बढ़ सकती है। इसलिए Solar को मिसाइल सप्लाई चेन के एक अहम खिलाड़ी के तौर पर देखा जा सकता है।

Data Patterns

डेटा पैटर्न्स डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स पर काम करती है। कंपनी रडार, गाइडेंस सिस्टम, टेस्टिंग सिस्टम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाती है।

मिसाइलों में लगे सीकर और गाइडेंस सिस्टम काफी अहम होते हैं। इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने पर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मांग बढ़ सकती है।

Astra Microwave

Astra Microwave रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी सिस्टम बनाती है। मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम में इनकी अहम भूमिका होती है।

इसलिए मिसाइल उत्पादन बढ़ने का फायदा सीधे न सही, लेकिन डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती मांग के जरिए कंपनी को मिल सकता है।

एक नजर में

कंपनीमुख्य फायदा
भारत डायनेमिक्समिसाइल उत्पादन
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स
रडार और इलेक्ट्रॉनिक्स

L&T
मिसाइल और एयर डिफेंस

भारत फोर्जडिफेंस मैन्युफैक्चरिंग
Solar Industriesप्रोपेलेंट और विस्फोटक
Data Patternsमिसाइल इलेक्ट्रॉनिक्स
Astra Microwaveरडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी

निवेशकों के लिए जरूरी बात

अभी इसे सीधे शेयर खरीदने का संकेत नहीं मानना चाहिए। सरकार ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को मंजूरी दी है। आगे कंपनियों का चयन होगा। फिर प्रोडक्शन और ऑर्डर की तस्वीर साफ होगी।

फिलहाल BDL, BEL, L&T, भारत फोर्ज, Solar Industries, Data Patterns और Astra Microwave पर नजर रखी जा सकती है। असली फायदा किसे मिलेगा, यह आने वाले ऑर्डर और उनके असर से कंपनी की कमाई पर पता चलेगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

BrahMos और Agni-V में कौन ज्यादा ताकतवर? दोनों मिसाइलों का काम बिल्कुल अलग, समझिए फर्क

भारत के पास दुनिया की सबसे ताकतवर और खतरनाक मिसाइल है। जिसकी गति और मारक क्षमता देखकर पूरी दुनिया हैरान रहती है। भारत के इन मिसाइलों का एक नजारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में दिखा था।  पिछले 40 साल में भारत ने मिसाइल तकनीक विकसित करने की शुरुआत से लेकर आधुनिक और बेहद ताकतवर मिसाइल सिस्टम तैयार करने तक लंबा सफर तय किया है। आज देश जमीन, समुद्र और हवा से होने वाले खतरों का मुकाबला करने की अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। इस सफर में ब्रह्मोस और अग्नि-5 भारत की मिसाइल ताकत के दो बड़े उदाहरण हैं।

हालांकि ब्रह्मोस और अग्नि-5 दोनों ही भारत की ताकतवर मिसाइलों में शामिल हैं, लेकिन इन्हें एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए नहीं बनाया गया है। दोनों का काम और इस्तेमाल अलग है।

ब्रह्मोस का इस्तेमाल पारंपरिक सैन्य अभियानों में दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। वहीं, अग्नि-5 भारत की रणनीतिक सुरक्षा का अहम हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन को किसी बड़े हमले से रोकना और भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को मजबूत करना है।

इसलिए ब्रह्मोस और अग्नि-5 की तुलना उनकी ताकत के आधार पर करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि दोनों मिसाइलें अलग-अलग भूमिकाएं निभाती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से दोनों का अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान है।

अलग-अलग मिशन तय करते हैं दोनों मिसाइलों की भूमिका

ब्रह्मोस और अग्नि-5 के बीच अंतर समझने का सबसे आसान तरीका यह जानना है कि दोनों को किस मकसद से बनाया गया है। दोनों आधुनिक और ताकतवर मिसाइलें हैं, लेकिन युद्ध में उनका इस्तेमाल अलग-अलग काम के लिए होता है।

ब्रह्मोस नाम ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्क्वा नदियों के नाम से लिया गया है। यह भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की कंपनी एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया ने मिलकर विकसित की है। यह एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, यानी यह आवाज की रफ्तार से भी कई गुना तेज उड़ सकती है।

ब्रह्मोस का इस्तेमाल पारंपरिक सैन्य अभियानों में दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। इसमें युद्धपोत, एयरफील्ड, रडार स्टेशन और सैन्य कमांड सेंटर जैसे लक्ष्य शामिल हो सकते हैं। यह मिसाइल भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल है और भारत की प्रमुख स्ट्राइक मिसाइलों में से एक है।

वहीं, अग्नि-5 एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसे डीआरडीओ ने भारत की रणनीतिक सुरक्षा और दुश्मन को हमले से रोकने की क्षमता मजबूत करने के लिए विकसित किया है।

ब्रह्मोस के विपरीत अग्नि-5 का इस्तेमाल आम युद्ध के मैदान में किसी ठिकाने पर हमला करने के लिए नहीं किया जाता। इसका मुख्य उद्देश्य लंबी दूरी से आने वाले बड़े खतरों के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को मजबूत करना है। यह भारत की परमाणु प्रतिरोध नीति का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल अलग-अलग तरीके से काम करती हैं

ब्रह्मोस और अग्नि-5 दोनों ही मिसाइलें हैं, लेकिन इनके उड़ने और टारगेट तक पहुंचने का तरीका बिल्कुल अलग है। इसी वजह से दोनों का इस्तेमाल भी अलग-अलग काम के लिए किया जाता है।

ब्रह्मोस एक क्रूज मिसाइल है। यह वायुमंडल के अंदर एक विमान की तरह उड़ते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इसमें रैमजेट इंजन का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसे बहुत तेज गति से उड़ने में मदद करता है। यह कम ऊंचाई पर भी उड़ सकती है, जिससे दुश्मन के लिए इसे समय रहते पहचानना और रोकना मुश्किल हो सकता है।

वहीं, अग्नि-5 एक बैलिस्टिक मिसाइल है। यह ब्रह्मोस से बिल्कुल अलग तरीके से लक्ष्य तक पहुंचती है। लॉन्च होने के बाद यह बहुत ऊंचाई तक जाती है और फिर तेज गति से नीचे आते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इस तरह यह लॉन्च वाली जगह से हजारों किलोमीटर दूर तक स्थित लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम होती है।

आसान शब्दों में कहें तो ब्रह्मोस तेज गति से कम ऊंचाई पर उड़कर सटीक हमला करने वाली मिसाइल है, जबकि अग्नि-5 लंबी दूरी की रणनीतिक मिसाइल है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की सुरक्षा और दुश्मन को हमले से रोकने की क्षमता को मजबूत करना है।

स्पीड और रेंज

ब्रह्मोस अपनी तेज रफ्तार के लिए जानी जाती है। यह करीब मैक 3 की गति से उड़ सकती है। इतनी तेज गति के कारण यह कुछ ही समय में अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। कम ऊंचाई पर उड़ने और लक्ष्य के करीब पहुंचने के दौरान दिशा बदलने की क्षमता के कारण इसे रोकना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

दूसरी ओर, अग्नि-5 को लंबी दूरी के लिए बनाया गया है। इसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है। इसका इस्तेमाल युद्ध के मैदान में तुरंत हमला करने के बजाय भारत की लंबी दूरी की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करने के लिए किया जाता है।

आसान भाषा में समझें तो ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत उसकी रफ्तार और सटीक हमला करने की क्षमता है, जबकि अग्नि-5 की खासियत उसकी लंबी दूरी और रणनीतिक भूमिका है।

कौन सी मिसाइल ज्यादा ताकतवर है?

ब्रह्मोस और अग्नि-5 की तुलना करते समय अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि दोनों में से कौन ज्यादा ताकतवर है। लेकिन इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों मिसाइलों को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाया गया है। इसलिए इनकी ताकत का आकलन मिशन के हिसाब से करना ज्यादा सही होगा।

अगर लक्ष्य दुश्मन के युद्धपोत, एयरबेस या सैन्य कमांड सेंटर पर तेजी से हमला करना है, तो ब्रह्मोस ज्यादा उपयोगी है। इसकी तेज रफ्तार, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता इसे एक प्रभावी क्रूज मिसाइल बनाती है।

वहीं, अगर बात लंबी दूरी की रणनीतिक सुरक्षा और दुश्मन को बड़े हमले से रोकने की है, तो अग्नि-5 की भूमिका अहम हो जाती है। इसकी 5,000 किलोमीटर से ज्यादा की मारक क्षमता भारत की रणनीतिक मिसाइल ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस भूमिका में मिसाइल की रफ्तार से ज्यादा उसकी लंबी दूरी और रणनीतिक क्षमता मायने रखती है।

इसलिए ब्रह्मोस और अग्नि-5 को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी कहना सही नहीं होगा। ब्रह्मोस भारत की तेज और सटीक पारंपरिक हमला करने की क्षमता को मजबूत करती है, जबकि अग्नि-5 लंबी दूरी की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करती है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं और इसी वजह से दोनों भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आधी वजनी लेकिन दोगुनी घातक! भारत की BrahMos-NG के सामने दुश्मन के एयर डिफेंस फेल, जानिए ब्रह्मोस और NG में क्या है फर्क

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक के रूप में अपनी खास पहचान बनाई है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल होने के बाद से इसने देश की हमलावर क्षमता को काफी मजबूत किया है। अब इसी कड़ी में एक नया नाम चर्चा का विषय बना है और वो है ‘ब्रह्मोस एनजी’ (BrahMos Next Generation)। आइए समझते हैं भारत के इस नए विनाशक हथियार की जर्नी और ये भी जानते हैं कि ये मूल ब्रह्मोस से कितनी अलग है, क्या-क्या खास है इसमें?

क्यों पड़ी ब्रह्मोस NG को विकसित करने की जरूरत?

आपतो बता दें कि ब्रह्मोस मिसाइल जमीन पर हमला करने और समुद्री जहाजों को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन में काफी सफल रही। इसके बावजूद अपने भारी-भरकम आकार और वजन की वजह से इसे ले जाने सकने वाले विमान कम थे। काफी वजन होने की वजह से भारतीय वायु सेना के मौजूदा विमानों में मूल ब्रह्मोस मिसाइल को सिर्फ सुखोई सु-30एमकेआई (Su-30MKI) फाइटर जेट पर ही तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस एनजी का डेवलपमेंट इसी चुनौती से पार पाने के लिए किया गया है। सुपरसोनिक रफ्तार को बरकरार रखते हुए इसके छोटे आकार और कम वजन की वजह से भारत इसे कई तरह के लड़ाकू और नौसैनिक विमानों पर तैनात करने की योजना बना रहा है। इससे सशस्त्र बलों को अपने अभियानों में अधिक संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल करने की सुविधा मिलेगी।

आकार और वजन में बड़ा बदलाव

दोनों मिसाइलों के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके आकार और वजन का है। मूल ब्रह्मोस मिसाइल लगभग 8.4 मीटर लंबी है और इसके हवा से दागे जाने वाले वर्जन का वजन करीब 3 टन है। इसके उलट ब्रह्मोस एनजी करीब 6 मीटर लंबी होगी और इसका वजन करीब 1.3 से 1.6 टन के बीच होगा। अपने छोटे और कॉम्पैक्ट डिजाइन की वजह से इसे कई अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर ले जाना और तैनात करना बहुत आसान हो जाएगा। जो विमान अभी मूल ब्रह्मोस को ले जाने में सक्षम नहीं हैं, वे भी इस नई मिसाइल को ले जा सकेंगे। इसके अलावा आकार छोटा होने से एक ही फाइटर जेट एक भारी मिसाइल के बजाय कई ब्रह्मोस एनजी मिसाइलें ले जा सकता है जिससे लड़ाकू विमान की हमलावर क्षमता काफी बढ़ जाती है।

रफ्तार और रेंज में नहीं होगी कोई कमी

मिसाइल का आकार छोटा करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसकी रफ्तार से कोई समझौता किया गया है। ब्रह्मोस एनजी से उसी सुपरसोनिक क्षमता को बनाए रखने की उम्मीद है जिसने पुरानी ब्रह्मोस को दुनिया भर में फेसम बनाया है। मौजूदा ब्रह्मोस करीब 3 मैक की रफ्तार से उड़ान भरती है, जिससे यह सबसोनिक क्रूज मिसाइलों की तुलना में अपने टारगेट तक बहुत तेजी से पहुंचती है। इसकी तेज स्पीड दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को रिएक्शन देने का बेहद कम वक्त देती है और इसीलिए इसे हवा में रोकना बेहद कठिन हो जाता है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुताबिक ब्रह्मोस एनजी भी करीब 3 मैक की गति से उड़ान भरेगी।

रेंज के मामले में भी मूल ब्रह्मोस मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) में भारत के शामिल होने के बाद अपनी शुरुआती 290 किमी की सीमा से काफी आगे बढ़ चुकी है। ब्रह्मोस एनजी भी उसी के समकक्ष ऑपरेटिंग रेंज देगी, जबकि इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, गाइडेंस सिस्टम और टोटोल एफिशियंसी में सुधार देखने को मिलेगा।

कई फाइटर जेट्स से दागी जा सकेगी मिसाइल

मूल ब्रह्मोस मोबाइल लैंड लॉन्चर्स, भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और विशेष रूप से संशोधित सु-30एमकेआई लड़ाकू विमानों से फायर होती है। हल्की ब्रह्मोस एनजी सु-30एमकेआई के अलावा तेजस एमके1ए (Tejas Mk1A), एचएएल तेजस एमके2 (HAL Tejas Mk2), टीइडीबीएफ (TEDBF) और भविष्य में एएमसीए (AMCA) जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों के साथ इंटिग्रेट हो सकती है। इससे भारतीय वायु सेना अपनी पूरी फ्लीट के माध्यम से इन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को तैनात कर सकेगी।

गाइडेंस, सटीकता और पेलोड क्षमता

ब्रह्मोस ने न सिर्फ अपनी रफ्तार बल्कि अपनी अचूक क्षमता की वजह से भी फेमस है। यह चलते हुए जहाजों और जमीन पर बने दुश्मन के ठिकानों को सटीक निशाना बनाने के लिए इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, सैटेलाइट नेविगेशन और टर्मिनल फेज़ में एक्टिव रडार सीकर का इस्तेमाल करती है। ब्रह्मोस एनजी इन्हीं सिद्धांतों पर काम करेगी, लेकिन नए इलेक्ट्रॉनिक्स और छोटे आकार की वजह से इसके ऑनबोर्ड सिस्टम टारगेट को खोजने और नेविगेशन में ज्यादा बेहतर होंगे।

आकार छोटा होने की वजह से ब्रह्मोस एनजी का पेलोड वजन थोड़ा कम होगा। मूल ब्रह्मोस करीब 200 से 300 किग्रा का पारंपरिक वॉरहेड ले जाती है, जो भारी सुरक्षा वाले सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। ब्रह्मोस एनजी लगभग 200 किग्रा का थोड़ा हल्का वॉरहेड ले जाएगी। पेलोड हल्का होने के बावजूद यह युद्धपोतों, कमांड सेंटरों, रडार प्रतिष्ठानों और एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हाई वैल्यू टारगेट्स का काम तमाम कर पाएगी।

एक ही विमान से दागी जा सकेंगी कई मिसाइलें

ब्रह्मोस एनजी का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा यह है कि एक विमान अब ज्यादा मिसाइलें ले जा सकेगा। पहले वाली ब्रह्मोस भारी होने की वजह से एक सु-30एमकेआई विमान आमतौर पर एक मिशन के दौरान सिर्फ एक ही मिसाइल ले जा पाता है। हल्की ब्रह्मोस एनजी इस समीकरण को बदल देगी। वही विमान अब तीन ब्रह्मोस एनजी मिसाइलें ले जा सकेगा।

कौन सी मिसाइल है ज्यादा बेहतर?

ये बात मिसाइल के स्पेसिफिकेशन के बजाय मिशन की जरूरत पर डिपेंड करती है। मूल ब्रह्मोस एक बेहद प्रभावी मिसाइल है जो पहले से ही तीनों सेनाओं में सेवा दे रही है। यह अधिकतम मारक क्षमता वाले अभियानों के लिए इस्तेमाल होती रहेगी। ब्रह्मोस एनजी, मूल मिसाइल की जगह लेने के लिए नहीं बल्कि उसके सप्लिमेंट के रूप में काम करेगी। जहां अधिकतम विनाशात्मक क्षमता की जरूरत होगी वहां मूल ब्रह्मोस का इस्तेमाल किया जाएगा और जहां लड़ाकू विमानों की क्षमता बढ़ाने और एक साथ कई मिसाइलें दागने की जरूरत होगी वहां ब्रह्मोस एनजी काम आएगी। भारतीय सशस्त्र बल इन दोनों मिसाइलों का एक साथ इस्तेमाल करेंगे।