ब्रिक्स की बातों से बनेगा क्या?

ब्रिक्स को लेकर कूटनीतिक और सामरिक जानकारों की राय बंटी हुई है। एक वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है और इससे भारत को कुछ भी हासिल नहीं होगा। सुरजीत भल्ला जैसे आर्थिक जानकार और राजेश राजगोपालन जैसे विश्व मामलों के जानकार इस श्रेणी में आते हैं। दूसरी ओर जानकारों का एक समूह है, जो मानता है कि यह पश्चिमी दुनिया के वर्चस्व के बीच संतुलन बनाने वाला मंच है और नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स सम्मेलन की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था के बीच एक वैकल्पिक बहुपक्षीय मंच उभरा है, जिसमें सबकी आवाज बराबर है और जो बहुत बड़े आर्थिक, राजनीतिक व सामरिक वजन वाला है। भाजपा और सरकार के लोगों के अलावा प्रतिष्ठित सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चैलानी इस राय के हैं। असल में वास्तविकता इन दोनों अतिवादी विचारों के बीच है। ब्रिक्स न तो बिल्कुल अप्रासंगिक है और न इतना प्रासंगिक है कि वह अमेरिका व यूरोप केंद्रित विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सके या उसका विकल्प बन सके।

इस बात को समझने के लिए सबसे पहले ब्रिक्स सम्मेलन में बार बार दोहराए गए आंकड़ों की वास्तविकता समझने की जरुरत है। नई दिल्ली सम्मेलन की मेजबानी कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन आंकड़ों को कई बार दोहराया तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इनका जिक्र किया। भारतीय मीडिया तो उन्हीं आंकड़ों पर खेल ही रहा है। जैसे कहा गया कि ब्रिक्स दुनिया की 50 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। यह मैटर ऑफ फैक्ट है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। दुनिया के आठ अरब लोगों में से तीन अरब तो भारत और चीन में ही रहते हैं। लेकिन इसके बाद का जो आंकड़ा है उसे वस्तुनिष्ठ तरीके से देखने की जरुरत है। कहा गया कि ब्रिक्स देशों की जीडीपी 40 फीसदी है और जी 7 देशों की जीडीपी 29 फीसदी है। यह नहीं बताया गया कि यह आंकड़ा पीपीपी यानी परचेज पावर पैरिटी पर आधारित है। जब नॉमिनल जीडीपी यानी बाजार विनियम दर पर जीडीपी को देखते हैं तो  जी 7 देशों की जीडीपी 44 फीसदी है और ब्रिक्स की 29 फीसदी है। पीपीपी के आधार पर गणना में ब्रिक्स की जीडीपी इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि स्थानीय बाजार में कीमतें कम हैं और लोगों के जीवन यापन का खर्च भी बहुत कम है।

इन आंकड़ों का हवाला देने वाले इस सामान्य बात की भी अनदेखी कर देते हैं कि ब्रिक्स में से चीन की अर्थव्यवस्था को निकाल दें तो कुछ नहीं बचता है। अगर ब्रिक्स की ऩॉमिनल जीडीपी 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर की है तो उसमें अकेले चीन की जीडीपी करीब 21 ट्रिलियन की है। एक आंकड़ा यह भी दिया गया कि ब्रिक्स देशों की साझा आय़ 2011 में 21.9 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़ कर 28.9 फीसदी हो गई। यानी करीब डेढ़ दशक में इसमें सात फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसमें से चीन को निकाल दें तो बाकी दस देशों की साझा आय इसी अवधि में 11.9 से घट कर 11.5 फीसदी हो गई है। असल में विश्व की आय में चीन की हिस्सेदारी 2011 में 10 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़ कर 17.4 फीसदी हुई है। जीडीपी, आय और व्यापार के आंकड़ों के बीच इस बात को भी छिपा दिया गया कि ब्रिक्स के देश आपस में सात से आठ सौ बिलियन डॉलर का कारोबार करते हैं, जबकि पश्चिमी देशों खास कर जी 7 देशों के साथ उनका व्यापार सात से आठ ट्रिलियन डॉलर का है। यानी आपसी व्यापार से दस गुने के बराबर। इसलिए आधे अधूरे आंकड़ों के आधार पर ब्रिक्स देशों को महान अर्थव्यवस्था या महान सामरिक ताकत वाला बताने की जरुरत नहीं है। उसकी असल ताकत चीन है।

ब्रिक्स देशों ने कुछ समय पहले बहुत जोर शोर से प्रचार किया था कि डॉलर का वर्चस्व खत्म करने के लिए ब्रिक्स की नई मुद्रा लाई जाएगी। कई देशों ने मिल कर चीन की मुद्रा को आपसी लेन देन का माध्यम बनाने का प्रयास भी किया था। लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति की एक घुड़की के बाद सारे प्रयास बंद हो गए। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर किसी ने कोई वैकल्पिक मुद्रा बनाने का प्रयास किया तो सौ फीसदी टैरिफ लगाएंगे। उसके बाद सारे देश पीछे हट गए। अब बात स्थानीय मुद्रा में कारोबार की हो रही है। कुल मिला कर ब्रिक्स एक ऐसा मंच है, जिस पर व्यापार की बातें हो सकती हैं और कुछ सामरिक चर्चा भी संभव है। लेकिन सभी देशों को चीन की विस्तारवादी नीतियों से सावधान रहते हुए काम करना होगा। उनको ध्यान रखना होगा कि चीन और रूस मिल कर इस मंच को अमेरिका और पश्चिमी दुनिया के विरोध में न खड़ा कर दें। इससे उन दोनों को कोई खास नुकसान नहीं होगा लेकिन बाकी देशों के लिए मुश्किल होगी। पुतिन और जिनपिंग दोनों भी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ दोस्ताना बढ़ा रहे हैं। इसी महीने जिनपिंग अमेरिका जाएंगे और नवंबर में राष्ट्रपति ट्रंप चीन का दौरा करेंगे, जहां पुतिन भी मौजूद रहेंगे।

बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रिक्स का नई दिल्ली में आयोजन सफल रहा। इस सफल आयोजन से भारत का वजन भी कुछ बढ़ा है लेकिन असल में क्या हासिल हुआ है या क्या हासिल होगा? ‘नई दिल्ली घोषणा’ के हवाले से कहा गया कि चीन और रूस संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में सीट के लिए भारत का समर्थन करेंगे। हालांकि उसमें सिर्फ इतना लिखा हुआ है कि भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन किया जाएगा। लेकिन सबको पता है कि 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हुआ था, जिसमें यह मुद्दा उठा था और तब कहा गया था कि सुरक्षा परिषद में अफ्रीकी देशों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा, यह तय नहीं है और इस आधार पर मामले को टाल दिया गया था। उसके पीछे चीन का हाथ था। चीन कतई नहीं चाहेगा कि भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बने।

चीन के साथ भारत के संबंध कैसे रहते हें इस पर भी ब्रिक्स का भविष्य टिका हुआ है। जहां तक चीन और भारत के संबंधों की बात है तो वह तीन मुद्दों से जुड़ा है। पहला, पाकिस्तान के प्रति चीन का क्या रुख रहता है। दूसरा, हिमालय में भारत व चीन के नियंत्रण वाली रेखा को लेकर उसका क्या रुख रहता है और तीसरा, व्यापार को लेकर वह भारत को छूट देता है या नहीं। गौरतलब है कि पाकिस्तान उसका ऑल वेदर फ्रेंड है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने उसकी मदद की थी। अगर उसका यही रवैया रहा तो भारत का विश्वास नहीं बहाल होगा। जहां तक सीमा की बात है तो चीन लगातार भारतीय सीमा में अतिक्रमण कर रहा है और अफसोस की बात है कि भारत सरकार उसके हिसाब से समझौते कर रही है। व्यापार के मामले में भी चीन दुर्लभ खनिज और प्रौद्योगिकी भारत को देने में हिचकता है। गौरतलब है कि भारत और चीन के व्यापार में भारत का घाटा बहुत बड़ा है। भारत के पास अपना विनिर्माण का इकोसिस्टम बहुत मजबूत नहीं है। चीन इसका फायदा उठाता है। सो, अगर चीन की शर्तों पर भारत उसके साथ संबंध रखे तब तो सारी चीजें ठीक चलेंगी, जिस दिन भारत ने अपनी शर्तें रखनी शुरू की उसी दिन से सब बिगड़ने लगेगा।

मलेशियाई PM की बॉलीवुड प्लेलिस्ट वायरल:PM मोदी, पुतिन और राहुल गांधी के साथ वाली तस्वीरों पर सॉन्ग लगाए; BRICS डिनर में गाने गाए थे

18वें BRICS समिट के बाद मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की बॉलीवुड प्लेलिस्ट सोशल मीडिया पर चर्चा में है। उन्होंने भारत दौरे की अलग-अलग तस्वीरों और वीडियो के साथ बॉलीवुड के मशहूर गाने लगाए हैं। हर तस्वीर के लिए चुना गया गाना उसके मौके से जुड़ा नजर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे नेताओं के साथ अपनी रील पर अनवर इब्राहिम ने शाहरुख खान और काजोल की फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का गाना ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम’ लगाया। मोदी के साथ एक दूसरी तस्वीर पर शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर की फिल्म ‘दिल तो पागल है’ का टाइटल सॉन्ग इस्तेमाल किया। पुतिन के साथ लगान का ‘चले चलो’

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोटो पर अनवर इब्राहिम ने आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ का ‘चले चलो’ गाना लगाया। इस गाने के जरिए भी साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया गया। अपनी तस्वीरों पर ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ BRICS समिट को संबोधित करते हुए अपनी तस्वीरों के साथ अनवर ने सलमान खान, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा की फिल्म ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ का गाना लगाया। भारत से विदाई के वीडियो में उन्होंने फिल्म ‘लक्ष्य’ का ‘कंधों से मिलते हैं कंधे’ गाना इस्तेमाल किया। दोनों गाने साथ आने और एकजुटता का संदेश देते हैं।
राहुल और प्रियंका गांधी के साथ ‘ऐसा देश है मेरा’

भारत दौरे के दौरान अनवर इब्राहिम ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से भी मुलाकात की। उनके साथ भोजन की तस्वीरें शेयर करते हुए उन्होंने फिल्म ‘वीर-जारा’ का ‘ऐसा देश है मेरा’ गाना लगाया। यह गाना भारत की सांस्कृतिक विविधता को दिखाता है। ईरानी राष्ट्रपति के साथ ‘साथी हाथ बढ़ाना’

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान के साथ मुलाकात की तस्वीर पर अनवर ने 1957 की फिल्म ‘नया दौर’ का ‘साथी हाथ बढ़ाना’ गाना लगाया। यह गाना साथ मिलकर आगे बढ़ने का संदेश देता है। BRICS डिनर में किशोर-मुकेश के गाने गाए अनवर इब्राहिम ने 12 सितंबर को BRICS समिट के डिनर में किशोर कुमार का मशहूर गाना ‘ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत…’ गाया था। साथ ही उन्होंने मुकेश का गीत दोस्त दोस्त ना रहा… भी गुनगुनाया। अनवर ने इसका वीडियो अपने सोशल मीडिया X के अकाउंट पर शेयर किया। उन्होंने लिखा था- गुरु, थोड़ा सा गाने की इजाजत है? वीडियो करीब डेढ़ मिनट का है। अनवर किशोर कुमार के फैन हैं, पहले भी यह गाना गुनगुना चुके मलेशिया के पीएम पहले भी किशोर कुमार के फैन होने की बात कह चुके हैं। उन्होंने 2024 में भारत में एक इंटरव्यू के दौरान भी यही गीत गुनगुनाया था। इसके अलावा, फरवरी 2026 में पीएम मोदी की मलेशिया यात्रा के दौरान उन्होंने एक आधिकारिक वीडियो मोंटाज साझा किया था। इसमें ‘कभी खुशी कभी गम’ का लोकप्रिय गाना ‘बोले चूड़ियां’ इस्तेमाल किया गया था। मलेशिया में 27 लाख लोग भारतीय मूल के, बॉलीवुड और तमिल फिल्में लोकप्रिय विदेश मंत्रालय के अनुसार मलेशिया में करीब 27.5 लाख भारतीय मूल के लोग हैं, जो देश की आबादी का लगभग 9% हैं। इनमें करीब 20 लाख लोग तमिल बोलते हैं। यहां बॉलीवुड और तमिल फिल्में काफी देखी जाती हैं। शाहरुख खान की ‘दिलवाले’ ने मलेशिया में करीब 29 करोड़ रुपए की कमाई की थी। वहीं, ‘जवान’ ने करीब 22 करोड़ और ‘पठान’ ने करीब 9 करोड़ रुपए का कारोबार किया था। तमिल फिल्मों का भी यहां बड़ा बाजार है। 2025 में रिलीज हुई रजनीकांत की ‘कुली’ ने मलेशिया में करीब ₹26-27 करोड़, जबकि अजित कुमार की ‘ गुड बैड अग्ली’ ने करीब ₹22 करोड़ का कारोबार किया था। 2026 की सूर्या स्टारर ‘ करुप्पु’ भी करीब ₹22 करोड़ के कलेक्शन के साथ मलेशिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्मों में शामिल है। वहीं, विजय की ‘G.O.A.T.’ ने करीब ₹32 करोड़ और शिवकार्तिकेयन की ‘अमरन’ ने करीब ₹26 करोड़ का कारोबार किया था। डिप्टी पीएम भी रह चुके हैं अनवर अनवर इब्राहिम मलेशिया के 10वें प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने 24 नवंबर 2022 को पदभार ग्रहण किया था। इससे पहले वे 1993 में मलेशिया के 7वें डिप्टी पीएम बने थे। 1998 में, अनवर को तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने सभी सरकारी पदों से हटा दिया गया था। उन्हें अप्रैल 1999 में भ्रष्टाचार और समलैंगिकता के आरोपों में जेल भेज दिया गया था और 2004 में उनकी सजा पलटने के बाद रिहा कर दिया गया था। इसके बाद अनवर 2008 से 2015 तक विपक्ष के नेता रहे। 2022 के आम चुनावों में जीत के बाद प्रधानमंत्री बने। ————— ये खबरें भी पढ़ें… BRICS समिट- दिल्ली में मोदी की डिनर पार्टी:पनीर के साथ सूखी सब्जी, चुकंदर का रायता; मिठाई में फ्रूट क्रीम विद जलेबी पीएम मोदी ने शनिवार को भारत मंडपम में BRICS सदस्य देशों के नेताओं के लिए डिनर पार्टी को होस्ट किया। मेन्यू में पनीर के साथ सूखी सब्जी, चुकंदर का रायता और मिलेट्स का पुलाव रखा गया है। मिठाई में फ्रूट क्रीम विद जलेबी मिलेगी। पूरी खबर पढ़ें…

ब्रिक्स से दक्षिण की राजनीति पर नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान तमिल कवि तिरुवल्लुर की किताब तिरूवक्कुल की प्रति रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भेंट की। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया भर के नेताओं का स्वागत जिस बैकग्राउंड में किया वह तमिलनाडु के रामनाथस्वामी मंदिर का था। हालांकि कहने को कहा जा सकता है कि हर वैश्विक कार्यक्रम में देश के किसी न किसी हिस्से का बैकग्राउंड बनाया जाता है, जिसके सामने प्रधानमंत्री विश्व नेताओं का स्वागत करते हैं। इसलिए इसमें कुछ ज्यादा राजनीतिक पहलू देखने की जरुरत नहीं है। लेकिन इन दोनों घटनाक्रमों में दक्षिण भारत और खास कर तमिलनाडु की राजनीति से जोड़ कर देखा जाने लगा है।

इसे परिसीमन के मसले पर समर्थन जुटाने के भाजपा के अभियान से भी जोड़ा जा रहा है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार को महिला आरक्षण बिल पास कराने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरुरत है और वह बहुमत तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक डीएमके साथ नहीं दे। समाजवादी पार्टी का साथ भाजपा को नहीं मिलेगा क्योंकि वहां पांच महीने में चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले सपा किसी तरह से भाजपा के साथ नहीं दिखना चाहेगी। इसलिए डीएमके पर निर्भरता है। माना जा रहा है कि तमिल गौरव का प्रदर्शन भाजपा की उस जरुरत से जुड़ा है। प्रधानमंत्री बार बार संगम लिटरेचर और तमिल भाषा की श्रेष्ठता की बात भी करते रहते हैं।

3 दिन, 15 मुलाकातें और बड़े फैसले… BRICS Summit में PM मोदी का रहा ‘पावर पैक्ड’ शेड्यूल, ग्लोबल साउथ पर दिया जोर

BRICS Summit 2026: दिल्ली के भारत मंडपम में हुए हाई-प्रोफाइल ब्रिक्स समिट का समापन रविवार को ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ के साथ हुआ, जो भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत थी। वहीं, इस समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शेड्यूल काफी व्यस्त रहा। प्रधानमंत्री ने कम से कम 15 देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं, जिनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के मसूद पेजेशकियन शामिल थे। इन बैठकों के जरिए पीएम मोदी ने भारत के अहम सहयोगियों और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखा।

प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का भी आयोजन किया, जिसमें उन्होंने ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों के बीच मजबूत संबंध बनाने और वैश्विक संस्थागत सुधारों की वकालत की। साथ ही, उन्होंने ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों को लाभ पहुंचाने के लिए कई पहल भी प्रस्तावित कीं।

पहला दिन: मोदी की पुतिन और पेजेश्कियान के साथ बैठक

11 सितंबर को, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत मंडपम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक की। यह बैठक ऐसे समय में हुई जब यूक्रेन युद्ध के कारण मॉस्को और पश्चिमी देशों के संबंध प्रभावित हो रहे थे। उन्होंने भारत-रूस संबंधों पर व्यापक चर्चा की, जिसमें 2030 तक सालाना द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने की रणनीतियां भी शामिल थीं। चर्चाओं में रक्षा, ऊर्जा और उर्वरक सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग पर भी बात हुई।

इसके कुछ घंटों बाद, उन्होंने भारत मंडपम में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात की; यह दो हफ्तों में उनकी दूसरी बैठक थी। प्रधानमंत्री ने भारत के इस रुख को दोहराया कि पश्चिम एशिया क्षेत्र के सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए किया जाना चाहिए। उन्होंने इस क्षेत्र में समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। पेजेश्कियान ने भी इस संघर्ष के बीच भारत से बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाने का आग्रह किया।

प्रधानमंत्री ने UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ भी द्विपक्षीय बैठक की। गुटेरेस ने पीएम मोदी को ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता मिलने पर बधाई दी। दोनों नेताओं ने मल्टीपोलैरिटी (बहु-ध्रुवीयता) के महत्व और UN सुरक्षा परिषद सहित बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया।

बैठकों के बाद PM मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया, जहां उन्होंने ग्लोबल इनोवेशन, व्यापार और आर्थिक सहयोग में इस समूह की बढ़ती मजबूती को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के बीच भारत ने अपनी आर्थिक और व्यापारिक नीतियों का आधार मजबूती और इनोवेशन को बनाया है।

दूसरा दिन: सबकी नजरें शी-मोदी पर

प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत किया, जो सात साल बाद भारत की अपनी पहली यात्रा पर आएं। यह यात्रा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों में सुधार के माहौल में हो रही है। शनिवार को ब्रिक्स समिट की भी औपचारिक शुरुआत हुई, जिसमें ग्लोबल गवर्नेंस, मल्टीलेटरलिज्म, आर्थिक सहयोग और ब्रिक्स समूह के विस्तार के बाद उसके भविष्य जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

ब्रिक्स समिट के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि BRICS किसी देश या समूह के खिलाफ नहीं है। उन्होंने ऐसे समय में ज्यादा सहयोग की अपील की जब ‘ग्लोबल साउथ’ मुश्किल दौर से गुजर रहा है। उन्होंने ग्लोबल गवर्नेंस संस्थानों में सुधार के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी बात की।

प्रधानमंत्री ने शी के साथ एक अहम द्विपक्षीय बैठक भी की, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत सीमा सुरक्षा और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर चीन के साथ “अर्थपूर्ण बातचीत” के लिए तैयार है। शी ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत और चीन एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं और उन्होंने वैश्विक मंच पर दोनों देशों की बड़ी भूमिका की वकालत की। दोनों पक्षों ने फिर से कहा कि दोनों देशों को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखना चाहिए और मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए।

शी के अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबिय अहमद अली, मलेशिया के अनवर इब्राहिम, यूएई के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के ले मिन्ह हंग के साथ भी द्विपक्षीय बैठकें कीं।

तीसरा दिन: ब्रिक्स समिट का समापन

ईरान और UAE के बीच तनाव के बावजूद ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ पर पूरी सहमति बनने के बाद, प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स समिट के समापन की औपचारिक घोषणा की। ब्रिक्स की ‘फैमिली फोटो’ में उनके साथ पुतिन और शी भी मौजूद थे। पीएम मोदी ने इसे ब्रिक्स परिवार की बढ़ती ताकत और वैश्विक प्रभाव का एक सशक्त उदाहरण बताया।

अन्य नेताओं के भारत से रवाना होने के दौरान, पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और मिस्र के अब्देल फतह अल-सिसी के साथ भी बैठकें कीं।

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ब्रिक्स के दौरान सर्जियो गोर दिल्ली छोड़ गए

दिल्ली में दुनिया भर के नेताओं का जमावड़ा था। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स के 18वें सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दोनों भारत आए थे। यह बहुत बड़ा घटनाक्रम था। दो साल पहले दिल्ली में हुए जी 20 शिखर सम्मेलन में ये दोनों नेता शामिल नहीं हुए थे। उसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भारत आए थे। इसलिए ब्रिक्स सम्मेलन में जिनपिंग और पुतिन दोनों का आना बड़ी बात थी। उनके अलावा ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों और 10 पार्टनर देशों के नेता भी दिल्ली में मौजूद थे।

लेकिन उसी समय अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर दिल्ली छोड़ गए थे। सोचें, भारत आए कई नेता ऐसे भी थे, जिनके साथ अमेरिका के बहुत अच्छे संबंध हैं। लेकिन सबसे बचते हुए सर्जियो गोर भारत के पूर्वोत्तर की यात्रा पर चले गए। उन्होंने पूर्वोत्तर की पहली यात्रा के लिए हिंसा से प्रभावित मणिपुर का चयन किया, जहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले सर्जियो गोर जम्मू कश्मीर भी गए थे, जहां उन्होंने कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताया। इस पर पाकिस्तान बहुत नाराज हुआ था। बहरहाल, सर्जियो गोर मणिपुर गए और वहां से वीडियो, तस्वीरें आदि सोशल मीडिया में डालीं। क्या अमेरिका इस बहाने भी कोई मैसेज करना चाहता है?

ब्रिक्स का समापन, मोदी की नसीहत

नई दिल्ली। ब्रिक्स के 18वें सम्मेलन का रविवार को समापन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के दूसरे सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में दुनिया के देशों को नसीहत दी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी और दुर्लभ खनिजों को हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। मोदी ने कहा कि इससे दुनिया की तरक्की पर असर पड़ता है। मोदी ने कहा कि प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में समावेशिता होनी चाहिए न कि किसी एक देश का एकाधिकार।

प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार की सुबह ब्रिक्स के नेता की ग्रुप फोटो सेशन के बाद ओपन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया भर में तनाव बढ़ रहा है और आज की आपस में जुड़ी दुनिया में एक जगह के तनाव का असर हर देश पर हो रहा है। उन्होंने कहा कि महामारी, जलवायु आपदाओं और सप्लाई चेन में रुकावटों ने दिखाया है कि दुनिया के देश एक दूसरे से जुड़े हैं। एक जगह आया संकट दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है।

मोदी ने ब्रिक्स देशों से आपसी सहयोग बढ़ाने और मजबूत सप्लाई चेन बनाने पर जोर दिया। इससे पहले भारत मंडपम में सदस्य देशों के नेताओं का ग्रुप फोटो सेशन हुआ। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी के दोनों ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नजर आए। इसके बाद अपने भाषण में मोदी ने कहा, ‘ब्रिक्स अब अपने तीसरे दशक में प्रवेश करने जा रहा है। दुनिया को अब ब्रिक्स से सिर्फ विचार और वादे नहीं, बल्कि ठोस नतीजों की उम्मीद है। मुझे भरोसा है कि हम मिलकर इन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे’।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुए फैसलों की जानकारी देते हुए मोदी ने कहा कि ‘ब्रिक्स कनेक्ट’ के जरिए लोगों को काम के लिए जरूरी स्किल सिखाने, रोजगार बढ़ाने और महिलाओं को ज्यादा काम के मौके देने पर काम किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि छोटे कारोबारों को मदद देने के लिए ‘ब्रिक्स एमएसएमई’ पोर्टल शुरू किया गया है। इससे छोटे कारोबारी नई जानकारी, पैसे और नए बाजार से जुड़ सकेंगे। उन्होंने बताया कि शहरों में आने जाने की व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए भी ब्रिक्स देशों के बीच अनुभव साझा किए जाएंगे। उन्होंने सप्लाई चेन को और बेहतर बनाने के बारे में हुए विचार के बारे में बताया

प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स के अगले सम्मेलन की मेजबानी चीन को सौंपी और इसके लिए उसको शुभकामनाएं दीं। मोदी ने नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सभी नेताओं और उनकी टीमों की सराहना की। अंत में उन्होंने सभी को सुरक्षित और सुखद यात्रा की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने समापन भाषण में कहा, ‘हम अब समापन की ओर बढ़ रहे हैं। 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अपने समापन की ओर बढ़ रहा है, मैं आप सभी की सक्रिय भागीदारी और बहुमूल्य योगदान के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूं’। मोदी ने आगे कहा, ‘सदस्य देशों की सक्रिय भागीदारी ने सम्मेलन को सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सम्मेलन के दौरान सामने आए महत्वपूर्ण विचारों और सुझावों ने ब्रिक्स के बीच सहयोग को व्यापकता और गहराई, दोनों प्रदान की हैं’।

Gala Dinner: PM मोदी के गाला डिनर में नहीं शामिल हुए जिनपिंग, सामने आई ये बड़ी वजह

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी मेहमानों के लिए आयोजित भव्य गाला डिनर से एक बड़ी खबर सामने आई है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस हाई-प्रोफाइल डिनर में शामिल नहीं हुए।

उनके अलावा अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद भी सम्मेलन के बाद वापस अपने देश रवाना हो जाने के कारण इस डिनर में मौजूद नहीं थे।

क्यों गायब रहे शी जिनपिंग? सामने आई यह वजह

चीनी राष्ट्रपति के डिनर में शामिल न होने का सटीक और आधिकारिक कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक शी जिनपिंग सम्मेलन के व्यस्त शेड्यूल के बाद आराम करने के लिए सीधे अपने होटल चले गए थे।

गौरतलब है कि शी जिनपिंग शनिवार दोपहर को ही नई दिल्ली पहुंचे थे। उन्होंने दिन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के सत्रों में हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक भी की थी।

पुतिन से लेकर कई दिग्गजों की रही मौजूदगी

शी जिनपिंग भले ही डिनर में मौजूद नहीं रहे, लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं ने पीएम मोदी द्वारा आयोजित इस शाही भोज में शिरकत की। इस डिनर में केंद्र सरकार के कई दिग्गज मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए:

केंद्रीय मंत्री: अमित शाह, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, अश्विनी वैष्णव और शिवराज सिंह चौहान।

मुख्यमंत्री व नेता: यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस, असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा, पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला।

ये सभी केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री संसद भवन से दो बसों में सवार होकर डिनर के वेन्यू यानी भारत मंडपम पहुंचे थे।

डिनर के मेन्यू में क्या था खास?

विदेशी और देसी मेहमानों के लिए परोसे गए भोजन में भारतीय व्यंजनों का खास स्वाद देखने को मिला:

मेन कोर्स: खांडवी मिल-फॉय, खुंब गलोटी, पनीर लबाबदार, गुच्ची मार्मिक, गाजर-बीन्स पोरियल और मिलेट्स (बाजरा) पुलाव।

डेजर्ट (मीठा): पुरानी दिल्ली की फ्रूट क्रीम के साथ गरमा-गरम जलेबी और शहतूत फिरनी परोसी गई।

VIDEO: ‘ख्वाब हो तुम या…’; BRICS में दिखा बॉलीवुड का रंग! किशोर कुमार के जबरा फैन निकले मलेशियाई PM अनवर इब्राहिम, हिंदी गायकी का वीडियो वायरल

ब्रिक्स की साझा करेंसी नहीं आएगी:सदस्य देश अपनी करेंसी में लेनदेन करेंगे; आज PM मोदी की 4 वर्ल्ड लीडर्स के साथ बैठक

BRICS समिट का आज आखिरी दिन है। आज ओपन मीटिंग होगी, जिसमें सदस्य देशों के नेता और दूसरे आमंत्रित देशों के प्रमुख शामिल होंगे। बैठक में BRICS से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। इसके बाद PM मोदी 4 देशों के नेताओं के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। समिट के पहले दिन भारत ने साफ कर दिया कि फिलहाल BRICS देशों की अपनी कोई साझा करेंसी बनाने का प्रस्ताव नहीं है। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने कहा कि BRICS में स्थानीय करेंसी में आपसी व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देने पर चर्चा जरूर चल रही है। इसका मकसद देशों के बीच व्यापार को आसान बनाना और लेन-देन की लागत कम करना है। BRICS देशों ने नई दिल्ली डेक्लरेशन को मंजूरी दी BRICS देशों ने शनिवार को समिट के दौरान नई दिल्ली डेक्लरेशन को मंजूरी दी। इसमें कई मुद्दों पर साझा बयान जारी किया गया। डेक्लरेशन में रूस और चीन समेत BRICS देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की। देशों ने कहा कि आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही, आतंकियों तक पहुंचने वाली फंडिंग रोकने और उन्हें सुरक्षित ठिकाने देने वालों पर कार्रवाई करने पर भी सहमति बनी। BRICS देशों के बीच संयुक्त बयान जारी करने पर सहमति ऐसे समय में बनी है, जब पश्चिम एशिया में तनाव है और ईरान, सऊदी अरब और UAE के कई मुद्दों पर अलग-अलग रुख हैं। ब्रिक्स समिट में PM मोदी के बयान की 5 अहम बातें तनाव के बीच ईरान-UAE राष्ट्रपतियों ने बातचीत की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने BRICS समिट से इतर UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की। दोनों नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है और कई क्षेत्रीय मुद्दों पर दोनों देशों के रुख अलग हैं। हालांकि, ईरान और UAE पिछले कुछ सालों से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में यह मुलाकात तनाव के बीच दोनों देशों के बातचीत का रास्ता खुला रखने का संकेत है। पश्चिमी देशों के लिए BRICS की बढ़ती चुनौती BRICS देश अब आपस में कारोबार करते समय डॉलर का इस्तेमाल कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे एक-दूसरे की अपनी-अपनी करेंसी में लेन-देन बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही, अलग-अलग देशों के ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर भी काम हो रहा है। हालांकि, अभी BRICS का अपना कोई एक पेमेंट सिस्टम या एक साझा करेंसी नहीं है। इस साल भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS समिट में भी अपनी करेंसी में कारोबार और आसान ऑनलाइन पेमेंट पर जोर दिया जाएगा। भारत चाहता है कि BRICS देशों के डिजिटल पेमेंट सिस्टम और उनकी डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ा जाए। इससे एक देश से दूसरे देश में पैसे भेजना आसान हो सकता है और हर बार डॉलर की जरूरत कम हो सकती है। एक बैंक की रिपोर्ट से निकला BRICS का नाम BRICS की शुरुआत किसी सरकार ने नहीं, बल्कि एक बैंक की रिपोर्ट से हुई थी। 2001 में अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने अपनी रिपोर्ट में BRIC शब्द इस्तेमाल किया। उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बताया। तब BRIC कोई संगठन नहीं था। 2006 में चारों देश साथ आए और BRIC समूह बना। 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में इसकी पहली आधिकारिक बैठक हुई। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया। पिछले साल ईरान, मिस्र और इथियोपिया भी पूर्ण सदस्य बने। आज BRICS दुनिया के बड़े आर्थिक मंचों में शामिल है। इसके सदस्य देशों की ग्लोबल GDP में हिस्सेदारी 27% से ज्यादा है, जबकि यूरोपियन यूनियन की करीब 14% है। ———————- BRICS से जुड़ी यह खबरें भी पढ़ें… 1. BRICS के साझा बयान में पहलगाम हमले की निंदा: टेरर फंडिंग रोकने पर जोर; कहा- आतंकियों को पनाह देने वालों पर मिलकर एक्शन लेंगे रूस और चीन समेत BRICS देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की है। देशों ने कहा कि आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्रवाई की जाएगी। पूरी खबर पढ़ें… 2. पुतिन का अमेरिका-यूरोप पर तंज:कमजोर देश खुद को G7 क्यों कहते हैं; मोदी बोले- ब्रिक्स देशों में दुनिया की 40% GDP प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत ब्रिक्स लीडर्स ने शुक्रवार को ब्रिक्स बिजनेस फोरम में ग्लोबल ट्रेड पर बात की। पूरी खबर पढ़ें…

पुतिन की भारत यात्रा से पहले जेवर पहुंचा रूस का Ilyushin Il-76, जानें क्यों खास है ये ‘भारी-भरकम’ विमान

Ilyushin Il-76: 2026 ब्रिक्स समिट के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे से एक दिन पहले, रूसी वायु सेना का Ilyushin Il-76 भारी मालवाहक विमान जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरा। इस विमान में रूसी राष्ट्रपति के दौरे की तैयारियों के तहत सुरक्षा के लिए एक एडवांस टीम और जरूरी सामान लाया गया था।

राष्ट्रपति पुतिन आमतौर पर Ilyushin Il-96-300PU विमान से यात्रा करते हैं। यह रूस का राष्ट्रपति विमान है। वहीं, Il-76 का इस्तेमाल भारी सामान, जरूरी सामान, सैनिकों और अन्य लॉजिस्टिक सामान को ले जाने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि पुतिन जैसे बड़े नेता की यात्रा से पहले तैयारियों के लिए इस विमान का इस्तेमाल किया गया।

Ilyushin Il-76 क्या है?

Ilyushin Il-76, जिसे NATO रिपोर्टिंग नाम “कैंडिड” (Candid) से भी जाना जाता है, चार इंजन वाला टर्बोफैन स्ट्रैटेजिक एयरलिफ्टर है। इसे मूल रूप से सोवियत संघ के इल्यूशिन डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया था। अब इस विमान के प्रोडक्शन और आधुनिकीकरण का काम रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन देखती है।

इस विमान को मुश्किल हालात में काम करने के लिए डिजाइन किया गया था और यह छोटे, बिना पक्के या बिना तैयारी वाले एयरफील्ड पर भी उतर सकता है। इसे दूर-दराज या कम सुविधा वाले इलाकों तक भारी मशीनरी, मिलिट्री गाड़ियां और भारी मात्रा में सामान पहुंचाने के लिए बनाया गया था।

Il-76 में टाइटेनियम का कार्गो फ्लोर और एक इंटीग्रेटेड रैंप सिस्टम है, जिससे सामान को आसानी से अंदर-बाहर (रोल-ऑन/रोल-ऑफ) किया जा सकता है। इसमें दो इंटरनल इलेक्ट्रिक विंच हैं, जिनमें से हर एक तीन टन तक का वजन खींच सकता है, और चार ओवरहेड इलेक्ट्रिक होइस्ट हैं जिनकी कुल उठाने की क्षमता 10 टन तक है।

इसका मजबूत, मल्टी-व्हील लैंडिंग गियर खास फ्यूजलेज फेयरिंग में लगा होता है, जिससे यह विमान जमी हुई बर्फ, मिट्टी और घास जैसी सतहों से भी ऑपरेट कर सकता है।

भारत Il-76 का भी इस्तेमाल करता है

भारत 1985 से Il-76 का इस्तेमाल कर रहा है और भारतीय वायु सेना इसे अपनी रणनीतिक भारी-भरकम सामान ढोने की क्षमता के एक अहम हिस्से के तौर पर इस्तेमाल करती है। भारत में इस विमान को “गजराज” या “हाथियों का राजा” के नाम से भी जाना जाता है।

IAF के पास 17 Il-76MD रणनीतिक भारी ट्रांसपोर्ट विमान हैं, जिनमें 44 स्क्वाड्रन, यानी “माइटी जेट्स” के विमान भी शामिल हैं। इनका इस्तेमाल सैनिकों, बख्तरबंद गाड़ियों और भारी सामान को लाने-ले जाने के लिए किया जाता है।

भारत छह Il-78MKI विमानों का भी इस्तेमाल करता है, जो Il-78MKI के खास वर्जन हैं और हवा में ही ईंधन भरने के लिए तैयार किए गए हैं। Il-78MKI का इस्तेमाल हवा में ही IAF के फाइटर जेट्स में ईंधन भरने के लिए किया जाता है।

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BRICS Summit 2026: ‘कमजोर कड़ी’ से ग्रोथ इंजन तक: 14 साल में कैसे बदली भारत की BRICS कहानी

BRICS Summit 2026: जब भारत ने 2012 में नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी, तब देश की अर्थव्यवस्था आज के मुकाबले काफी अलग स्थिति में थी। उस समय BRICS समूह भी काफी नया था। इसकी शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया।

गौरतलब है कि भारत पहले से ही इस ऐसे समूह का हिस्सा था, जिसे 21वीं सदी की उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधि माना जाता था। लेकिन उस समय यह सवाल भी उठ रहे थे कि क्या भारत वास्तव में इस उम्मीद पर खरा उतर पाएगा?

14 साल बाद, जब भारत 2026 में एक बार फिर BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, तो स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

अब भारत ऐसा देश नहीं है, जो BRICS में अपनी जगह साबित करने की कोशिश कर रहा हो। बल्कि अब भारत को इस समूह की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक और BRICS की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।

2012 और 2026 के इन दोनों मौकों के बीच का अंतर यह समझने का अच्छा तरीका है कि इन 14 सालों में भारत कितना बदल गया है।

जब भारत BRICS की ‘कमजोर कड़ी’ था

2012 में सवाल यह नहीं था कि क्या भारत BRICS को आकार दे सकता है, बल्कि यह था कि क्या वह इस समूह का सबसे कमजोर सदस्य बनता जा रहा है।

क्या भारत सच में BRICS में अपनी जगह का हकदार था? क्या BRIC में “I” (इंडिया) की जगह इंडोनेशिया को ले लेना चाहिए था? क्या भारत इस समूह की सबसे कमजोर कड़ी था? ये सवाल उस समय के आर्थिक माहौल को दिखाते थे।

भारत की विकास दर तेजी से धीमी हो गई थी, महंगाई ज्यादा थी, रुपया दबाव में था और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की सरकार की क्षमता को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं।

जून 2012 में, Standard & Poor’s (S&P) ने चेतावनी दी थी कि भारत अपनी इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इसके पीछे धीमी विकास दर और पॉलिसी बनाने में आ रही राजनीतिक रुकावटों का हवाला दिया गया था। उस समय भारत की रेटिंग BBB- थी, जो स्पेक्युलेटिव ग्रेड से बस एक पायदान ऊपर थी।

यह चेतावनी उस समय भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर फैली निराशा का एक अहम संकेत बन गई थी।

Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O’Neill, जिन्होंने BRIC (ब्रिक) शब्द गढ़ा था, भारत के वैल्यूएशन को लेकर भी बहुत उत्साहित नहीं थे। अगस्त 2012 के एक इंटरव्यू में, उन्होंने वैल्यूएशन के मामले में भारत को चार BRIC अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम आकर्षक बताया था; उन्होंने चीन को पहले स्थान पर रखा, जिसके बाद ब्राज़ील, रूस और फिर भारत का नंबर था।

उस समय भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति भी उतनी ही मुश्किल थी। 2012-13 में विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे गिर गई थी, जबकि महंगाई का स्तर ऊंचा बना रहा। भारत के बारे में धारणा बदलने लगी थी; अब उसे एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के बजाय ऐसी अर्थव्यवस्था के तौर पर देखा जाने लगा था जो पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत गतिरोध), महंगाई और धीमी होती विकास दर से जूझ रही थी।

दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत BRICS का हिस्सा तो था, लेकिन इस बात पर संदेह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई ताकतों के साथ कदम मिलाकर चल पाएगा।

2026 की ओर आगे बढ़ते हुए

आज स्थिति काफी अलग है।

भारत 2026 के ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में एक ऐसी अर्थव्यवस्था के साथ शामिल हो रहा है जिसने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज विकास दर बनाए रखी है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी (GDP) में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सरकार ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था ने अपनी विकास की गति बनाए रखी है।

यह 2010 के दशक की शुरुआत में मंदी के दौरान भारत की 5 प्रतिशत से कम विकास दर के मुकाबले एक बड़ा अंतर है।

बता दें कि यह बदलाव सिर्फ एक तिमाही के जीडीपी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत के आर्थिक आधार और वैश्विक संस्थानों द्वारा उनके मूल्यांकन के तरीके में भी बदलाव आया है।

‘फॉलन एंजेल’ (Fallen Angel) के डर से ‘A-‘ रेटिंग तक का सफर

शायद इस बदलाव को समझने का एक सबसे साफ उदाहरण भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग है।

2012 में S&P की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी थी कि भारत इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को लेकर सवाल उठने लगे थे।

लेकिन सितंबर 2026 में Japan Credit Rating Agency (JCR) ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को एक पायदान बढ़ाकर BBB+ से A- कर दिया। रेटिंग के साथ Stable Outlook भी दिया गया। JCR ने इसकी वजह भारत की मजबूत और मुश्किल परिस्थितियों में भी टिके रहने वाली आर्थिक विकास दर, वित्तीय स्थिति में सुधार, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और बेहतर बाहरी आर्थिक स्थिति को बताया।

JCR ने भारत की लगातार तेज आर्थिक विकास दर, मजबूत निजी खपत और सरकारी निवेश को भी अहम कारण माना। इसके अलावा GST और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे नीतिगत कदमों का भी उल्लेख किया गया।

एजेंसी ने सरकारी खर्च की गुणवत्ता में सुधार की भी तारीफ की। खास तौर पर पूंजीगत खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते निवेश को भारत की आर्थिक मजबूती का अहम हिस्सा बताया गया।

इस रेटिंग में बढ़ोतरी की अहमियत सिर्फ रेटिंग बढ़ने तक सीमित नहीं है। असली बदलाव यह है कि 2012 के मुकाबले आज भारत की अर्थव्यवस्था और उसके जोखिम को लेकर चर्चा पूरी तरह बदल गई है।

2012 में चिंता इस बात की थी कि क्या भारत अपनी इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग बचा पाएगा? वहीं आज चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या भारत की तेज आर्थिक विकास दर उसे आने वाले समय में दुनिया की एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत बनने में मदद कर सकती है।

BRICS में बदलाव आया है और इसमें भारत की जगह भी बदली है

जिस ग्रुप में भारत BRIC के तौर पर शामिल हुआ था, उसमें भी जबरदस्त बदलाव आया है।

BRICS का दायरा इसके शुरुआती चार सदस्यों से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ और बाद में हुए विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसमें जुड़ गए।

अब यह ग्रुप दुनिया की आबादी और अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, यह सिर्फ एक आर्थिक नाम से बदलकर उभरते और विकासशील देशों के लिए एक व्यापक राजनीतिक और कूटनीतिक मंच बन गया है।

इस विस्तार ने BRICS में भारत की स्थिति को और भी अहम बना दिया है।

ध्यान दें कि भारत BRICS की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से काफी बड़ी है, लेकिन आर्थिक विकास, बड़ी आबादी, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और दूसरे देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंधों का मेल भारत को BRICS में काफी महत्वपूर्ण बनाता है।

वहीं, 2012 के BRICS की तुलना में आज स्थिति अलग है। तब भारत को मुख्य रूप से BRICS के दूसरे देशों से तुलना करके देखा जाता था। लेकिन अब भारत सिर्फ समूह के दूसरे सदस्यों के साथ अपनी स्थिति की तुलना नहीं कर रहा है, बल्कि यह भी कोशिश कर रहा है कि बदला हुआ BRICS आगे किस दिशा में जाए और उसका स्वरूप कैसा हो।

आर्थिक कहानी से रणनीतिक अहमियत तक

BRICS में भारत का उभार सिर्फ GDP तक सीमित नहीं है। यह भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दूसरे देशों से संबंध बनाए रखने की भारत की क्षमता के बारे में भी है।

जानकारी के मुताबिक, 2026 का यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया का संकट और व्यापक भू-राजनीतिक बंटवारा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नए सिरे से आकार दे रहे हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) के प्रति भारत की लंबे समय से चली आ रही प्राथमिकता और उन देशों के साथ एक ही समय में जुड़ने की उसकी क्षमता—जिनके हित हमेशा एक जैसे नहीं होते—इस माहौल में और भी अहम हो गई है।

चैथम हाउस ने रणनीतिक स्वायत्तता को भारत की विदेश नीति की एक पुरानी विशेषता बताया है। साथ ही, यह भी कहा है कि भारत का यह नजरिया नई दिल्ली को उन देशों के साथ संबंध बनाए रखने में मदद करता है जिनके साथ पश्चिम के संबंध मुश्किल भरे रहे हैं। संस्थान ने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा से तेजी से बदलती दुनिया में ‘मध्यम शक्तियों’ (middle powers) के लिए ‘रणनीतिक हेजिंग’ (strategic hedging) के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया है।

बता दें कि भारत के लिए, इसका मतलब है कि ब्रिक्स सिर्फ एक आर्थिक ग्रुप नहीं है। यह उन कई मंचों में से एक है जिनके जरिए नई दिल्ली किसी एक बड़े पावर ब्लॉक के साथ औपचारिक रूप से जुड़े बिना अपने हितों को आगे बढ़ा सकती है।

2026 के समिट का महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अन्य बड़े नेता नई दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं क्योंकि भारत इस ग्रुप की मेजबानी कर रहा है। भू-राजनीतिक बंटवारे के दौर में इन नेताओं का भारत आना ही नई दिल्ली की बढ़ती ‘इकट्ठा करने की क्षमता’ (convening power) को दिखाता है।

इन देशों के साथ भारत के रिश्ते जटिल हैं और अक्सर उनमें काफी मतभेद भी रहे हैं। चीन भारत का रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है; रूस भारत के रक्षा और ऊर्जा हितों से गहराई से जुड़ा है; ईरान भारत की कनेक्टिविटी और पश्चिम एशिया से जुड़ी रणनीतियों के लिए अहम है। फिर भी, भारत इन सभी के साथ एक ही कूटनीतिक ढांचे के भीतर काम करने में सक्षम है।

भारत की आर्थिक कहानी में गुणात्मक बदलाव भी आया है।

पहले भारत की BRIC वाली छवि मुख्य रूप से उसके सर्विस सेक्टर, IT इंडस्ट्री, बढ़ते कंज्यूमर मार्केट और डेमोग्राफिक क्षमता से जुड़ी थी। आज, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उभरती हुई टेक्नोलॉजी देश की आर्थिक कहानी का बहुत बड़ा हिस्सा बन गई हैं।

UPI और आधार जैसे प्लेटफॉर्म के विकास ने भारत को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का एक खास मॉडल दिया है, जबकि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली पहलों का मकसद आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक वैकल्पिक जगह के तौर पर स्थापित करना रहा है।

JCR ने खास तौर पर भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और GST का जिक्र उन नीतियों के तौर पर किया है जिन्होंने देश की आर्थिक नींव को मजबूत किया है।

आसान शब्दों में कहें तो, 2012 में जब भारत BRICS समिट में शामिल हुआ, तो सवाल यह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाएगा। 2026 में, भारत एक बड़े हो चुके BRICS की मेजबानी कर रहा है। ऐसे समय में जब वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, उसे JCR से ‘A-‘ सॉवरेन रेटिंग मिली है, और वह उस ग्रुप के एजेंडे को आकार देने की कोशिश कर रहा है जिसका आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है।

इस अंतर ने सवाल को ही बदल दिया है। 2012 में बहस यह थी कि—क्या भारत BRICS में शामिल होने के लायक है? 2026 में, ज्यादा अहम सवाल यह है कि: भारत BRICS के भविष्य को किस हद तक आकार दे सकता है?

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