UP News: ‘जो भगवान श्री राम का विरोध करें…’; यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव को बड़ा झटका, अभय सिंह समेत सपा के 3 विधायक BJP में शामिल

UP News: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव को बड़ा झटका लगा है। बुधवार (14 अक्टूबर) को SP के तीन बागी विधायक भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। समाजवादी पार्टी के ये तीन बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी हैं। राकेश प्रताप सिंह अमेठी की गौरीगंज विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि अभय सिंह अयोध्या की गोसाईंगंज सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, विनोद चतुर्वेदी जालौन की कालपी विधानसभा सीट से विधायक हैं।

इन विधायकों ने 2022 का चुनाव SP के टिकट पर जीता था। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर दिया था। यूपी के अमेठी में बुधवार (14 अक्टूबर) को BJP प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी में तीनों बागी सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुवेर्दी BJP में शामिल हुए।

कौन हैं MLA अभय सिंह?

अभय सिंह भगवान राम की नगरी अयोध्या की गोसाईगंज विधानसभा सीट से विधायक हैं। सिंह भी समाजवादी पार्टी के एक प्रमुख नेता हैं। राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग के बाद अभय सिंह पर कार्रवाई हुई थी। बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग के बाद समाजवादी पार्टी ने अभय सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों और राजनीतिक बयानों के कारण उनका नाम पहले भी सुर्खियों में रहा है। औपचारिक सदस्यता से पहले भी अभय सिंह कई मौकों पर भगवा पार्टी के मंच पर दिखाई दिए थे। 2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासत का प्रमुख केंद्र बन चुकी अयोध्या का सियासी तापमान अब और बढ़ने की उम्मीद है।

बुधवार को गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह आधिकारिक तौर पर भगवा पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद अब वह BJP के लिए निर्भय होकर मैदान में उतर सकेंगे। अभय सिंह ने SP के टिकट पर 2012 और 2022 में गोसाईंगंज विधानसभा सीट जीती। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार इंद्र प्रताप उर्फ खब्बू तिवारी से हार गए थे। जबकि 2022 में सिंह ने BJP उम्मीदवार आरती तिवारी को 13,079 वोटों से हराया।

‘जो श्री राम का विरोध करेगा, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे’

समाजवादी पार्टी के विधायक अभय सिंह ने BJP में शामिल होने पर न्यूज एजेंसी ANI से कहा, “जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का विरोध करें, जो राष्ट्र का विरोध करेंगे, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारे में जन-जन तक हिंदी और अवधि में पहुंचाने वाले, तुलसीदास ने राम चरित मानस को लिखा। उस रामचरित मानस को जलाया जाए, फाड़ा जाए। उसके बाद इस घटना पर कोई टिप्पणी न की जाए। उसके बाद दर्शन से रोका जाए। ये सब चीजें ऐसी हैं जो उचित नहीं हैं।”

कौन हैं राकेश प्रताप सिंह?

राकेश प्रताप सिंह अमेठी के गौरीगंज से विधायक हैं। सिंह हाईस्कूल तक की पढ़ाई की हुई है। वह साल 2012, 2017 और 2022 में तीन बार विधायक चुने गए हैं। 2022 में राकेश प्रताप सिंह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उन्होंने शानदार जीत भी दर्ज की थी। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव के बाद से राकेश प्रताप सिंह सपा को धोखा देकर अपनी पार्टी के अन्य बागी विधायकों के साथ चले गए। इसके बाद अखिलेश यादव ने साल 2025 के जून महीने में राकेश सिंह को सपा से निकाल दिया था।

विनोद चतुर्वेदी के बारे में जानें

जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी भी  BJP में शामिल हो गए हैं। उन्होंने 2022 में समाजवादी पार्टी (SP) के टिकट पर निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह को 2,816 वोटों से हराकर कालपी विधानसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। कालपी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने से पहले चतुर्वेदी ने यूपी के जालौन जिले में उरई विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। वे 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) के उम्मीदवार के तौर पर उरई सीट से चुने गए थे।

अखिलेश पर बोला हमला

राकेश प्रताप सिंह ने उनके BJP में शामिल होने पर ANI से कहा, “मैं अपने क्षेत्रवासियों का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने हमारा समर्थन किया और मुझसे अनुरोध किया कि भाजपा की सदस्यता लीजिए। उन लोगों ने मुझसे कहा कि वे मेरे साथ हैं… 98% लोग जो अपना बूथ जिताते या हराते थे, वे समाजवादी पार्टी का परित्याग करेंगे और BJP की सदस्यता लेंगे।” उन्होंने आगे कहा, “विधायक विनोद चतुर्वेदी, अभय सिंह और मैं स्वयं भाजपा में शामिल हो रहा हूं। हमारे साथ ऐसे करीब 1000 लोग जो जनप्रतिनिधि या पूर्व जनप्रतिनिधि हैं वो शामिल होंगे…लगभग 1 दर्जन विधायक मंच पर मौजूद रहेंगे।”

इसके अलावा राकेश प्रताप सिंह ने एक X पोस्ट में लिखा, “14 अक्टूबर 2026 का दिन मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन है। यह मेरे लिए केवल भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने का अवसर नहीं, बल्कि सनातन की रक्षा, अपनी आस्था, अपने संस्कारों और अपने सिद्धांतों के साथ एक नई राजनीतिक यात्रा प्रारंभ करने का बहुमूल्य दिन है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने अपने राजनीतिक जीवन में सदैव अपनी सनातन संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा है। बीते समय में समाजवादी पार्टी के भीतर सनातन धर्म, हमारी धार्मिक परंपराओं और पवित्र ग्रंथों को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियां और घटनाएं सामने आईं, उनसे मेरी भावनाएँ बार-बार आहत हुईं। विशेष रूप से जब मुझ जैसे सैकड़ों विधायकों एवं राजनैतिक व्यक्तियों को आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी के दर्शन करने ना जाने देना, तो वह क्षण मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक था। उसी दिन मेरे मन में यह विचार दृढ़ हो गया था कि जिस राजनीतिक विचारधारा के साथ मेरी आस्था और मेरा अंतर्मन सहमत नहीं है, उसके साथ आगे बढ़ना मेरे लिए संभव नहीं होगा।”

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Gaon Chalo Andolan: गुजरात से यूपी-बिहार में वापस अपने घर लौट रहे हैं लाखों माइग्रेंट वर्कर, जानें सूरत के ‘गांव चलो आंदोलन’ का सच

गुजरात के बड़े टेक्सटाइल और डायमंड हब सूरत में काम कर रहे लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर में हाल के समय में बड़ा और अहम ट्रेंड देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार के यह प्रवासी कामगार अपने गृह नगर वापस लौट रहे हैं। स्थानीय खबरों में इसे ‘गांव चलो आंदोलन’ कहा जा रहा है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर माइग्रेंट वर्कर्स की भीड़ और एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल यूनिट्स से वर्कर्स के जाने की खबरों में बड़े पैमाने पर पलायन का दावा किया जा रहा है। कुछ खबरों का कहना है कि इसमें 10 लाख तक वर्कर्स शामिल हो सकते हैं।

बताया जा रहा है कि ‘गांव चलो आंदोलन’ है एक कैंपेन है जो वर्कर्स को लंबे समय तक काम करने, साप्ताहिक अवकाश न मिलने, सैलरी में कटौती और नौकरी से निकाले जाने के आरोपों के बीच अपने गांवों में लौटने को बढ़ावा दे रही है। सीएनएन न्यूज 18 की खबर के मुताबिक मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्कर्स उन काम करने के हालात को मानने को तैयार नहीं हैं जिन्हें वे सही नहीं मानते हैं। हालांकि, सूरत से मिली दूसरी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई वर्कर्स दिवाली और छठ पूजा से पहले बस घर जा रहे हैं, जैसा कि वे हर साल करते हैं। तो, सूरत में असल में क्या हो रहा है? क्या माइग्रेंट वर्कर्स को गुजरात से बाहर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, या यह रेगुलर सीजनल माइग्रेशन बढ़ते लेबर विवाद के साथ हुआ है?

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?

‘गांव चलो आंदोलन’, सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों से जुड़ा एक अभियान है। काम के घंटे, हर हफ्ते की छुट्टियां, सैलरी और मजदूर सुरक्षा लागू करने को लेकर कामगारों और फैक्ट्री मालिकों के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेद के बीच इसने ध्यान खींचा है। अक्टूबर की शुरुआत में इस कैंपेन ने फिर से जोर पकड़ा, जब लेबर कोड के पालन से जुड़े भरोसे और श्रम विभाग के निर्देश के बाद पहले के विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए थे। इसके बाद वर्कर के प्रतिनिधि अजय दुबे ने वर्कर्स से कहा कि अगर उनकी चिंताओं का समाधान नहीं होता है तो वे कम से कम दो महीने के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 3 अक्टूबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने वर्कर्स से कहा कि वे मालिकों से साफ जवाब की मांग करें, जहां जरूरी हो वहां लेबर अधिकारियों को अलग-अलग शिकायतें दें, और उन जगहों पर जाने पर विचार करें जो लेबर की जरूरतों का पालन करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हर हफ्ते की छुट्टियां देने से मना किया जाता रहा तो वर्कर्स रविवार को मशीनरी बंद कर दें।

इसलिए यह आंदोलन सिर्फ वर्कर्स के शहर छोड़ने के बारे में नहीं है। यह लेबर की कमी की संभावना का इस्तेमाल करके नियोक्ताओं पर लंबे समय से चली आ रही काम की जगह की शिकायतों को दूर करने का दबाव बनाने की भी एक कोशिश है।

वर्कर्स सूरत क्यों छोड़ रहे हैं? फैक्ट्री मालिकों पर आरोप

सूरत से मिली खबरों में इंटरव्यू किए गए कामगारों का कहना है कि उन्हें आराम करने के लिए बहुत कम समय मिलता है और उनके काम की अवधि पर उनका नियंत्रण कम होता है। कई वर्कर्स का आरोप है कि उनसे दिन में लगभग 12 घंटे और कुछ जगहों पर तो महीने में 30 दिन तक काम करने की उम्मीद की जाती है। उनका कहना है कि हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मांगने पर मैनेजमेंट के साथ झगड़े हो सकते हैं, जबकि छुट्टी मांगने पर सैलरी कट सकती है, पेमेंट रोका जा सकता है या नौकरी से निकाला जा सकता है।

मुख्य मांगों में से एक है काम के घंटे घटाकर दिन में आठ घंटे करना, साथ ही पेड वीकली छुट्टी, बेहतर होगा कि रविवार को दी जाए। मजदूरों ने समय पर वेतन देने और मज़दूरों की सुरक्षा को बेहतर तरीके से लागू करने की भी मांग की है, जिसमें प्रोविडेंट फंड, एम्प्लॉई स्टेट इंश्योरेंस (ESI) और जहां लागू हो, वहां ग्रेच्युटी बेनिफिट शामिल हैं।

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संसदीय बोर्ड में पहली वैकेंसी

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम के गठन के बाद भाजपा के संसदीय बोर्ड में बदलाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में फेरबदल की चर्चा चल रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक के बाद एक रिक्तियां पैदा हो रही हैं। इससे लग रहा है कि जल्दी ही मोदी अपनी सरकार में फेरबदल करेंगे। अब वे अपनी तीसरी सरकार के मिडटर्म में पहुंच गए हैं। इस बीच भाजपा संसदीय बोर्ड में भी रिक्तियां बनने लगी हैं। इससे लग रहा है कि संसदीय बोर्ड में बदलाव की भी शुरुआत हो गई है। पहली रिक्ति सुधा यादव की बनी है। हरियाणा की रहने वाली भाजपा नेता सुधा यादव को राज्यपाल बनाया गया है। वे कर्नाटक राजभवन में थावरचंद गहलोत की जगह लेंगी। पहले भी कहा जा रहा था कि सुधा यादव की संसदीय बोर्ड से विदाई होगी।

अब इस बात की चर्चा है कि उनकी जगह कौन लेगा। संसदीय बोर्ड में एक महिला को जगह मिलेगी। अभी इकलौती महिला सुधा यादव थीं। कई साल से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नाम की चर्चा चल रही है। जब सुधा यादव संसदीय बोर्ड में शामिल की गई थीं तब भी निर्मला के नाम की चर्चा थी। लेकिन पिछले 12 साल से नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति देखने के बाद अब कम से कम एक अनुमान लगाना बहुत आसान हो गया है। वह ये कि ये दोनों किसी हाई प्रोफाइल नाम की चर्चा तो कराते हैं लेकिन जगह तय करने की बारी आती है तो सबको चौंका देते हैं। हाल में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के जो आठ नाम तय किए गए हैं उनमें से किसी के नाम की भविष्यवाणी किसी ने नहीं की थी। जिन नामों की चर्चा थी उनमें से किसी को जगह नहीं मिली। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि निर्मला सीतारमण आ ही जाएंगी। हो सकता है कि किसी और महिला का नाम हो, जो सबको चौंका दे। लेकिन यह तय है कि एक महिला संसदीय बोर्ड में शामिल की जाएगी। एक महिला के अलावा एक दलित, एक ओबीसी, एक आदिवासी, एक मुख्यमंत्री और एक महामंत्री को संसदीय बोर्ड में जगह मिल सकती है।

चार लोग तय हैं, जिनमें से तीन लोग पदेन हैं। पार्टी अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और संगठन महामंत्री पदेन सदस्य होंगे। इन तीन के अलावा अमित शाह की जगह भी आरक्षित हैं। पहले यह माना जाता था कि सभी पूर्व अध्यक्ष इसके सदस्य होंगे। लेकिन नितिन गडकरी को संसदीय बोर्ड में नहीं रख कर इस नियम को भंग कर दिया गया। इसलिए राजनाथ सिंह और जेपी नड्डा बाई डिफॉल्ट संसदीय बोर्ड में शामिल होने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। हालांकि इन दोनों के रहने की संभावना है। जिनके हटाए जाने की चर्चा है उनमें कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा हैं, पंजाब के नेता इकबाल सिंह लालपुरा, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष रहे के लक्ष्मण और पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया का नाम शामिल है। जिस समय इन लोगों को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था उस समय भी सबको हैरानी हुई थी। येदियुरप्पा को छोड़ कर किसी का कोई बहुत बड़ा राजनीतिक कद अपने राज्य में नहीं था। फिर भी उनको भाजपा में फैसला करने वाली सर्वोच्च बॉडी का सदस्य बनाया गया। किसी को अंदाजा नहीं होगा कि इन्होंने वहां क्या भूमिका निभाई। अब ये सभी वहां से विदा हो ..जाएंगे।

कई नेताओं के प्रयास जारी हैं

भाजपा के कई वरिष्ठ नेता संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। जिनको संगठन में या सरकार में जगह मिल गई है वे भी प्रयास कर रहे हैं। कई मुख्यमंत्री इस कोशिश में लगे हैं तो कई केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री भी प्रयास कर रहे हैं। हालांकि संसदीय बोर्ड को लेकर अब पहले वाली बात नहीं है। पहले इसका सदस्य होने का मतलब था कि आप शीर्ष नेतृत्व हैं। लेकिन पिछली बार जो बदलाव हुए थे उसमें जिन नए लोगों को शामिल किया गया था उनमें एक बीएस येदियुरप्पा को छोड़ कर कोई अपने राज्य के भी शीर्ष 10 नेताओं में होने का दावा नहीं कर सकता। संसदीय बोर्ड का सदस्य बन जाने के बाद भी उनका राजनीतिक कद जस का तस रहा था। वैसे तो अब भाजपा के पदाधिकारियों या केंद्रीय मंत्रियों की भी हैसियत पहले वाली नहीं रह गई है। लेकिन भाजपा के जो नेता अपने दम पर बड़े हैं वे जरूर अपना कद बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

तभी इस बात की बहुत चर्चा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। दोनों अपने अपने स्तर पर जोर लगा रहे हैं। सीएम रहते शिवराज सिंह चौहान संसदीय बोर्ड के सदस्य बने थे। लेकिन उसके बाद किसी सीएम को मौका नहीं मिला है। हालांकि जरूरी नहीं है कि दो सबसे मजबूत मुख्यमंत्रियों में से किसी को जगह मिले। हो सकता है कि रेखा गुप्ता शामिल हो जाएं, जिससे महिला औ मुख्यमंत्री दोनों कोटा पूरा हो जाए। वैसे शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा और नायब सिंह सैनी के नाम की भी चर्चा है। यह भी संभव है कि पर्ची के जरिए सीएम बने किसी नेता को शामिल कर लिया जाए।

बहरहाल, आदिवासी के तौर पर असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नाम की चर्चा है। संगठन महामंत्री के अलावा एक और महामंत्री इसमें शामिल हो सकता है। विनोद तावड़े सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। दलित चेहरे के तौर पर यूपी, बिहार का कोई जाटव या रविदास समाज का नेता हो सकता है। केंद्रीय मंत्रियों में शिवराज सिंह चौहान और पीयूष गोयल की चर्चा हो रही है। अल्पसंख्यक के रूप में पंजाब से किसी सिख नेता को भी जगह मिलने की चर्चा है।

यूपी का राज्यपाल नहीं बदलेगा!

छह राज्यों के राज्यपाल बदल गए हैं। दो राज्यपालों के राजभवन बदले हैं, जबकि चार नए राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं। पिछले कई दिनों से राज्यपाल और उप राज्यपाल बदले जाने की चर्चा चल रही थी। लेकिन जिस राज्य में बदलाव की सबसे ज्यादा चर्चा थी वहां बदलाव नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश के राजभवन में ऐसा लग रहा है कि अभी आनंदी बेन पटेल रहेंगी। वे पांच साल से ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। उससे पहले दो साल वे मध्य प्रदेश की भी राज्यपाल रही थीं। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटने के कुछ दिन बाद ही वे राज्यपाल बनी थीं और पिछले सात साल से ज्यादा समय से राज्यपाल हैं।

पिछले महीने जब वे लंबी छुट्टी पर गईं तो कहा गया कि अब उनकी विदाई तय हो गई है। उससे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर में जाकर वहां शिक्षा व्यवस्था और यूनिवर्सिटी के हालात पर बहुत तीखी टिप्पणी की थी। उससे भी उनके हटने का अंदाजा लगाया जा रहा था। लेकिन वे 10 दिन की छुट्टी पर रहीं और किसी अन्य राज्यपाल को उत्तर प्रदेश का प्रभार नहीं दिया गया। उन्होंने लौट कर कार्यभार संभाल लिया। जब वे छुट्टी पर गई थीं तब सूत्रों के हवाले से खबर आ रही थी कि किसी बड़े ब्राह्मण नेता को लखनऊ राजभवन में लाया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब चार महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। देखना है कि आनंदी बेन पटेल ही चुनाव तक रहती हैं या कोई नया चेहरा लाया जाता है।

दलित समाज पर भाजपा की नजर

कह सकते हैं कि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पलामू क्षेत्र के रहने वाले बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजा तो भाजपा की केंद्र सरकार ने उसी क्षेत्र के रहने वाले अपने नेता ब्रजमोहन राम को राज्यपाल बना दिया। पहले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया था। उन्होंने बीच में ही इस्तीफा दे दिया। अब झारखंड के एक बिल्कुल गुमनाम नेता को ओडिशा का राज्यपाल बना दिया गया है। इस नियुक्ति से ऐसा लग रहा है कि दलित समाज के अंदर भी भाजपा की नजर जाटव या रविदास समाज के ऊपर है। ऐसा माना जा रहा है कि दलित समाज की इस जाति का रूझान कांग्रेस की ओर है। उत्तर प्रदेश में यह समाज भावनात्मक रूप से मायावती और उनकी पार्टी से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय दलित नेता दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बना कर भेजा गया है।

बहरहाल, ब्रजमोहन राम की बात करें तो हाल के दिनों में रविदास समाज से हुई यह दूसरी हाई प्रोफाइल नियुक्ति है। इस साल जून में राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार के शिवेश राम को उच्च सदन भेजा था। उनके पिता आईएएस अधिकारी रहे थे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे थे। शिवेश राम को लोकसभा का चुनाव भी लड़ाया गया था लेकिन वे हार गए थे। असल में जब से कांग्रेस पार्टी ने मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बनाया है तब से अलग अलग राज्यों के चुनाव में और लोकसभा चुनाव में भी यह कांग्रेस की ओर दलित रूझान दिखाई दिया। इसी भरोसा कांग्रेस अपने मुस्लिम, दलित वोट आधार को रिवाईव करने की कोशिश कर रही है। भाजपा को इसकी चिंता हुई है। इसलिए उसने दलित आउटरीच का प्रयास शुरू किया। सरकार की योजनाओं के स्तर पर यह काम हो रहा है तो पार्टी संगठन और अन्य नियुक्तियों में भी यह देखने को मिल रहा है।

Varanasi Durga Puja: एक मूर्ति पर 5000-8000 तक का मुनाफा, कोलकाता के कारीगर यूं सवार रहे बनारस में मूर्तियों का कारोबार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी को मिनी बंगाल कहा जाता है। इस शहर में दुर्गा पूजा उत्सव का अलग ही रंग देखने को मिलता है। नवरात्रि के पहले यहां कोलकाता से आए कारीगर बंगाली थीम पर देवी की प्रतिमा को अंतिम रूप दे रहे हैं। इन प्रतिमाओं की डिमांड वाराणसी के अलावा पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों में है। नवरात्रि में मूर्तियों को बनाने का ये कारोबार करोड़ों का है। इसके लिए वाराणसी में कई कारखाने हैं जहां दर्जनों लोग काम करते हैं। नवरात्रि से करीब 4 महीने पहले से इस काम को शुरू किया जाता है।

शहर के पांडेय हवेली इलाके में देवी की प्रतिमा को तैयार करने वाले कई कारखाने हैं। तंग गलियों में बसे इन कारखानों में सैकड़ो प्रतिमाएं तैयार होती हैं। कारीगर ऑर्डर के हिसाब से इन प्रतिमाओं को अलग-अलग आकार में तैयार करते हैं। विश्वनाथ मूर्ति कला केंद्र के सुनील पाल ने बताया की वो लोग दुर्गा पूजा उत्सव के लिए हर साल देवी की पारंपरिक यानी बंगाली थीम पर आधारित प्रतिमा को तैयार करते हैं। उनके कारखाने में कोलकाता के आधा दर्जन कारीगर काम करते हैं।

सामान्य तौर पर वो 5 फीट से लेकर 12 फीट तक की देवी प्रतिमा बनाते हैं। बाजार में इस आकार की प्रतिमा की खूब मांग होती है। उन्होंने बताया की साइ और डिजाइन के हिसाब से ही इनकी कीमत तय होती है। देवी की जो प्रतिमाएं 8 से 12 फीट की होती हैं उसकी कीमत 22,000 से 30,000 के बीच होती है। अलग-अलग कई स्टेप्स में इसे तैयार किया जाता है,इसलिए एक प्रतिमा को बनाने में करीब 20 से 25 दिन का वक्त लगता है। उनके कारखाने में दशकों से यह काम होता चला आ रहा है। बताते चलें की सुनील के कारखाने में हर साल 50 से ज्यादा मां दुर्गा की बड़ी प्रतिमाएं तैयार होती हैं।

इसके अलावा भी इस इस इलाके में बंशीचरण पाल का कारखाना भी हैं जहां वो भी लगभग 50 के करीब प्रतिमाओं को तैयार करते हैं। उन्होंने बताया की वाराणसी के साथ ही मिर्जापुर, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया सहित कई जिलों में उनकी बनाई प्रतिमा सालों से जा रही हैं। हालांकि बदलते दौर में अब वहां भी कुछ कारीगर इस काम को कर रहें है। इसके अलावा वाराणसी के कई पूजा पंडालों के लिए कारीगर सीधे कोलकाता से आते हैं। जो विशेष ऑर्डर पर 15 से 20 फीट ऊंची प्रतिमाओं को तैयार करते हैं। हालांकि इन प्रतिमाओं की कीमत 50 हजार से 80 हजार के बीच होती है।

सुनील पाल ने बताया की एक प्रतिमा को तैयार करने में जो लागत आती है मौजूदा समय पर उसपर 40 से 45% तक फायदा होता है, हालांकि इसमें ज्यादातर पैसे कारीगरी पर खर्च होते हैं। लेकिन फिर भी एक प्रतिमा पर आसानी से 5000 से 8000 रुपये तक की बचत होती है। अकेले वाराणसी जिले में शहर से लेकर गांव तक छोटे बड़े 500 से ज्यादा सार्वजनिक पूजा पंडाल सजते हैं।

वाराणसी से अभिषेक जायसवाल की रिपोर्ट

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प्रेमी संग भागी पत्नी तो मोबाइल टावर पर चढ़ा पति, हरिद्वार में घंटों तक चला हाई-वोल्टेज ड्रामा

उत्तराखंड के हरिद्वार में प्रेम प्रसंग से जुड़ा एक अनोखा मामला देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश का एक व्यक्ति पत्नी के धोखे से परेशान होकर मोबाइल टावर पर चढ़ गया और फिर नीचे उतरने से इनकार कर दिया। वहीं मोबाइल टावर के पास भारी भीड़ जमा हो गई। सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन की टीम भी मौके पर पहुंची और युवक को सुरक्षित नीचे उतारने की कोशिश में जुट गई। उन्होंने काफी देर तक व्यक्ति को समझाने और सुरक्षित नीचे उतारने की कोशिश की।

मोबाइल टावर पर चढ़े युवक को देखकर मौके पर मौजूद लोगों की चिंता बढ़ गई। प्रेम प्रसंग से जुड़े इस मामले ने पूरे इलाके में लोगों का ध्यान खींच लिया। घटना के बाद वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई और हर कोई युवक के सुरक्षित नीचे उतरने का इंतजार करने लगा।

मौके पर पहुंची पुलिस

बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में रहने वाले युवक की पत्नी किसी अन्य युवक के साथ भागकर हरिद्वार आ गई थी। इसके बाद वह शिवालिक नगर इलाके में लगे एक मोबाइल टावर पर चढ़ गया। कुछ ही देर में स्थानीय लोगों की नजर उस पर पड़ी, जिसके बाद मौके पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। इसके बाद उसने पत्नी को मौके पर बुलाने की मांग की। मंगलवार को हुई इस घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे।

नीचे उतरने के लिए रखी शर्त

घटना की खबर मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और व्यक्ति को टावर से नीचे उतारने की कोशिश करने लगी। लेकिन वह नीचे आने को तैयार नहीं था और अपनी जिद पर अड़ा रहा। काफी समझाने के बाद भी वह नहीं माना। टावर पर चढ़े व्यक्ति ने पुलिस के सामने शर्त रखी कि जब तक उसकी पत्नी को वहां नहीं बुलाया जाएगा, वह नीचे नहीं उतरेगा। उसकी इस जिद के बाद पुलिस ने उसे शांत करने और सुरक्षित नीचे आने के लिए समझाने की कोशिश की, ताकि मामले को बिना किसी परेशानी के सुलझाया जा सके।

अंधेरा होने पर खुद उतर गया

पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने व्यक्ति को टावर से नीचे उतारने के लिए कई घंटों तक समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। दिन ढलने के बाद रात हो गई और काफी देर तक चले इस घटनाक्रम का आखिरकार अंत हुआ। घंटों तक टावर पर रहने के बाद व्यक्ति अंधेरा होने पर खुद ही नीचे उतर आया, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन ने राहत की सांस ली।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर केरल के राज्यपाल नियुक्त

राज्यपालों के फेरबदल के तहत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा के पूर्व सदस्य ओम प्रकाश माथुर को केरल का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। वे राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर की जगह लेंगे।

केरल में नियुक्ति से पहले सिक्किम के राज्यपाल रह चुके श्री माथुर का भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में लंबा करियर रहा है और उन्होंने राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई अहम पदों पर काम किया है। उनके राजनीतिक अनुभव में कई राज्यों में चुनाव प्रबंधन, राज्यसभा में दो कार्यकाल और पार्टी के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष के तौर पर काम करना शामिल है। दो जनवरी 1952 को राजस्थान के पाली जिले के बेडल गांव में जन्मे माथुर ने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक किया।

उन्होंने 1972 में प्रचारक के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) के साथ अपना सफर शुरू किया और 1979 तक राजस्थान के विभिन्न जिलों में काम किया। 1979 से 1989 तक उन्होंने किसान संघ के ‘संगठन मंत्री’ के तौर पर काम किया।

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उनके आधिकारिक प्रोफाइल में यह भी दर्ज है कि आपातकाल के दौरान उन्हें 11 महीने जेल में रहना पड़ा था। इसके बाद श्री माथुर राजस्थान में भाजपा के संगठनात्मक पदों पर आगे बढ़े और 1989 से 2002 तक महासचिव (संगठन) रहे। उन्होंने अखिल भारतीय सचिव और महासचिव समेत राष्ट्रीय स्तर की कई जिम्मेदारियां संभालीं और 1989 से 2024 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में काम किया। उन्हें 2008 में भाजपा राजस्थान का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उसी साल वे राज्यसभा सदस्य के तौर पर संसद पहुंचे। उन्होंने 2008 से 2014 तक अपना पहला कार्यकाल पूरा किया और 2016 से 2022 तक दूसरे कार्यकाल के लिए उच्च सदन में लौटे; इस दौरान वे सदन की समिति के अध्यक्ष भी रहे।

श्री माथुर ने 2015 से 2022 तक भाजपा के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष के तौर पर काम किया। वे 2022 से 2024 तक पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी रहे। उनके संगठनात्मक कार्यों में अपने करियर के अलग-अलग समय पर मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भाजपा की गतिविधियों और चुनाव अभियानों की देखरेख करना शामिल था। इन जिम्मेदारियों से उन्हें अलग-अलग राज्यों में पार्टी संगठन और चुनावी प्रबंधन का व्यापक अनुभव मिला। उनकी नियुक्ति से केरल लोक भवन में बदलाव हुआ है, क्योंकि राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया है, जबकि दुष्यंत गौतम सिक्किम के राज्यपाल के तौर पर माथुर की जगह लेंगे।

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IMD Weather Update: दक्षिण भारत में दस्तक दे रहा पूर्वोत्तर मानसून, 14 से 19 अक्टूबर तक इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

North-East Monsoon 2026: देश के मौसम में एक बार फिर बड़ा और मौसमी बदलाव दर्ज किया जा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा मौसम बुलेटिन के मुताबिक देश के शेष हिस्सों से दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और अगले दो दिनों के दौरान इसके पूरी तरह पीछे हटने के साथ ही दक्षिण प्रायद्वीप में पूर्वोत्तर मानसून की औपचारिक शुरुआत होने जा रही है। मौसम विभाग का अनुमान है कि पूर्वोत्तर मानसून के आगमन के साथ ही दक्षिण भारत के कई राज्यों में 14 से 19 अक्टूबर के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश का एक लंबा और व्यापक दौर शुरू होने वाला है।

पिछले 24 घंटों के मौसम की बात करें तो तमिलनाडु के अलग-अलग हिस्सों में 7 से 11 सेमी तक भारी बारिश हुई है जबकि पूर्वी राजस्थान में छिटपुट जगहों पर ओलावृष्टि की घटनाएं सामने आई हैं।

दक्षिण भारत में पूर्वोत्तर मानसून सक्रिय, इन राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी

दक्षिण प्रायद्वीप में मौसमी प्रणालियों के सक्रिय होने से बारिश का जोर काफी बढ़ गया है। श्रीलंका तट के पास दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी पर एक ऊपरी हवा का चक्रवाती परिसंचरण बना हुआ है जिससे जुड़ी एक ट्रफ रेखा मध्य बंगाल की खाड़ी तक फैली है। इसके अलावा दक्षिण अंडमान सागर पर भी एक चक्रवाती सिस्टम मौजूद है। इन प्रणालियों के असर से दक्षिण भारत के अलग अलग राज्यों में 14 से 19 अक्टूबर के दौरान भारी बारिश का कड़ा पहरा रहेगाय़ तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराइकल में 14 से 19 अक्टूबर के दौरान व्यापक बारिश होगी और कई जगहों पर भारी बारिश दर्ज की जाएगी।

केरल और माहे में 15 से 19 अक्टूबर के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश होने की पूरी संभावना है। तटीय और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में 15 से 18 अक्टूबर के दौरान और उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में 16 से 18 अक्टूबर के बीच भारी बारिश होगी। तटीय आंध्र प्रदेश और यनम तथा रायलसीमा के कुछ हिस्सों में 14 से 18 अक्टूबर तक भारी बारिश का दौर चलेगा। तेलंगाना में भी 17 अक्टूबर को भारी वर्षा का अनुमान है। तमिलनाडु, केरल, तटीय आंध्र प्रदेश और रायलसीमा के तटीय इलाकों में 15 से 17 अक्टूबर के दौरान 40 से 60 किमी/घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं और आकाशीय बिजली चमकने की गतिविधियां देखने को मिलेंगी।

उत्तर-पश्चिम भारत और पहाड़ों पर पश्चिमी विक्षोभ का असर

उत्तर-पश्चिम भारत के मौसम पर नजर डालें तो उत्तर पाकिस्तान और उससे सटे जम्मू-कश्मीर पर तथा उत्तर-पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हैं। इसके अलावा पूर्वी राजस्थान पर भी चक्रवाती परिसंचरण बना हुआ है। इन प्रणालियों के असर से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में 13 से 15 अक्टूबर के दौरान व्यापक रूप से बारिश और बर्फबारी होगी।

हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पंजाब में 14 और 15 अक्टूबर को झमाझम बारिश के साथ-साथ 40 से 60 किमी/घंटे की गति से तेज आंधी और ओलावृष्टि होने की चेतावनी जारी की गई है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी 13 से 19 अक्टूबर के बीच रुक-रुक कर बारिश और 15 अक्टूबर को कुछ स्थानों पर ओलावृष्टि व आंधी का दौर रहेगा। राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 14 से 16 अक्टूबर के दौरान छिटपुट बौछारें और तेज हवाएं चल सकती हैं।

मध्य, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत का मौसम हाल

मध्य भारत के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और विदर्भ क्षेत्र में 13 से 19 अक्टूबर के दौरान हल्की से मध्यम बारिश दर्ज की जाएगी। पूर्वी भारत में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 13 और 14 अक्टूबर को व्यापक बारिश होगी, जबकि ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों में 14 से 19 अक्टूबर के बीच छिटपुट बारिश और गरज-चमक की स्थिति बनी रहेगी। पूर्वोत्तर भारत के असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में 13 से 17 अक्टूबर के दौरान हल्की से मध्यम छिटपुट बारिश का दौर जारी रहेगा। पश्चिम भारत के कोंकण, गोवा और मध्य महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में 14 से 19 अक्टूबर के दौरान हल्की बारिश के साथ-साथ गरज-चमक की गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।

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