23 साल के BBA ग्रेजुएट ने नौकरी छोड़ चुना स्टार्टअप का रास्ता, डेढ़ साल में खड़ी कर दी 20 करोड़ की कंपनी

सफलता हासिल करने के लिए हमेशा लंबा अनुभव जरूरी नहीं होता, कई बार एक मजबूत सोच और सही दिशा भी कम उम्र में बड़ी उपलब्धि दिला सकती है। तेलंगाना के युवा साईतेजा गोपिशेट्टी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया। BBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पारंपरिक नौकरी के रास्ते के बजाय अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया। कृषि क्षेत्र में संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने Luminara Legacy नाम से स्टार्टअप शुरू किया, जो किसानों को बेहतर बीज, कृषि उत्पाद और खेती से जुड़े समाधान उपलब्ध कराने पर काम करता है।

खास बात यह है कि शुरुआत के महज डेढ़ साल में ही उनकी कंपनी ने करोड़ों रुपये की वैल्यूएशन हासिल कर ली। साईतेजा की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है, जो नए आइडिया के साथ अपना रास्ता खुद बनाना चाहते हैं।

कृषि क्षेत्र में उतरे साईतेजा, शुरू किया Luminara Legacy

साईतेजा गोपिशेट्टी Saiteja Gopishetty ने Luminara Legacy Pvt. Ltd. की शुरुआत की। यह एग्रीकल्चर स्टार्टअप किसानों को बेहतर बीज, कीटनाशक, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और खेती से जुड़े समाधान उपलब्ध कराने पर काम करता है। उनका लक्ष्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों और बेहतर उत्पादों के जरिए ज्यादा उत्पादन हासिल करने में मदद करना है।

23 की उम्र में ₹20 करोड़ का सफर

सोशल मीडिया पर शेयर की गई जानकारी के मुताबिक, साईतेजा ने ग्रेजुएशन के करीब डेढ़ साल बाद अपनी कंपनी को ₹20 करोड़ के स्तर तक पहुंचा दिया। उनकी कंपनी अब 2028 तक ₹100 करोड़ के आंकड़े तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है।

छोटी उम्र, बड़ा विजन

साईतेजा की कहानी यह दिखाती है कि सफलता सिर्फ उम्र या अनुभव पर निर्भर नहीं करती। सही सोच, मेहनत और किसी समस्या का समाधान देने वाला आइडिया किसी भी युवा को आगे बढ़ा सकता है। कृषि जैसे क्षेत्र में उतरकर उन्होंने यह साबित किया कि नए विचारों और तकनीक के जरिए पारंपरिक सेक्टर में भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने की जमकर तारीफ

साईतेजा की उपलब्धि सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। कई यूजर्स ने उनकी मेहनत और बिजनेस सोच की तारीफ की। लोगों का कहना है कि कम उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालना और किसानों से जुड़े क्षेत्र में काम करना प्रेरणादायक है।

एक यूजर ने लिखा कि 23 साल की उम्र में ₹20 करोड़ की कंपनी बनाना दिखाता है कि जब विजन और मेहनत साथ आते हैं तो बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। वहीं अन्य यूजर्स ने उनके भविष्य के लक्ष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।

किसानों की समस्या को बनाया बिजनेस का आधार

साईतेजा की सफलता का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्होंने सिर्फ कंपनी बनाने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि खेती से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को समझकर समाधान देने की कोशिश की। यही सोच उनके स्टार्टअप को अलग पहचान दिला रही है।

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इतिहास रचने को तैयार Vikram-1: PM मोदी का हाथ से लिखा ‘वंदे मातरम’ पोस्टकार्ड भी जाएगा अंतरिक्ष

Vikram 1 Launch

Vikram 1 Launch : प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस 18 जुलाई को विक्रम-1 टेस्ट फ्लाइट-1 के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'वंदे मातरम' लिखा हाथ से लिखा पोस्टकार्ड अंतरिक्ष में भेजेगा। यह भारत के पहले निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट की टेस्ट उड़ान होगी, जिसमें कई टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन और विशेष पेलोड भी शामिल हैं।

 

सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में स्काईरूट एयरोस्पेस ने कहा कि इस मिशन में ले जाए जाने वाले खास पेलोड में पीएम मोदी का हाथ से लिखा संदेश भी शामिल होगा। इसके साथ ही, कंपनी की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के शुभचिंतकों के हाथ से लिखे नोट भी इसमें शामिल होंगे।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, भारत की अंतरिक्ष यात्रा के लिए एक ऐतिहासिक नया सवेरा! आज सुबह 11:30 बजे, स्काईरूट एयरोस्पेस भारत के पहले निजी तौर पर विकसित लॉन्च व्हीकल, विक्रम-1 (Vikram-1) का पहला ऑर्बिटल लॉन्च करेगा। यह चार चरणों वाला रॉकेट त्वरित और ऑन-डिमांड लॉन्च सेवाएं प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि यह मिशन हमारे युवाओं की प्रतिभा, दृढ़ संकल्प और उद्यमशीलता की भावना को रेखांकित करता है। यह यह भी दर्शाता है कि कैसे हमारे अंतरिक्ष-क्षेत्र के सुधार नवाचार और उद्यम के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रहे हैं।

 

 सफल लॉन्च के लिए पूरी स्काईरूट एयरोस्पेस टीम को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। विक्रम-1 नई ऊंचाइयों को छुए, इतिहास रचे और नवप्रवर्तकों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित करे।

 

 मैं सभी भारतीयों, विशेषकर अपने युवा मित्रों से इस ऐतिहासिक मिशन को देखने और #IndiaWithVikram1 का उपयोग करके टीम स्काईरूट को सफलता की शुभकामनाएं देने का आग्रह करता हूं।

 

क्यों खास है विक्रम 1 का मिशन?

यादगार चीजों के अलावा, विक्रम-1 में कॉस्मोसर्व, डी-क्यूब्ड और स्काईरूट के अपने स्कोप से टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड ले जाए जाएंगे। साथ ही, इसमें कॉसमॉस डायमंड्स का बनाया आर्टवर्क ‘कॉस्मिक ब्लूम’ और एक माइक्रो-आर्ट पेलोड भी होगा। विक्रम-1 स्काईरूट एयरोस्पेस का पहला ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल, भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक अहम उपलब्धि साबित हो सकता है। इस मिशन का मकसद देश में बने इस लॉन्च व्हीकल की क्षमताओं को दिखाना और देश के कमर्शियल स्पेस लक्ष्यों को मज़बूत करना है।

 

44 साल की उम्र में 6.5 करोड़ का पोर्टफोलियो बनाकर मजे से नौकरी छोड़ रिटायर हो गया ये इंजीनियर, फिर बताया अपना फॉर्म्युला

Viral News: कॉर्पोरेट लाइफ की भागदौड़, काम के लंबे घंटे और ऑफिस की राजनीति से परेशान होकर क्या कोई अपनी सफल नौकरी को अलविदा कह सकता है? एक 44 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने ऐसा ही कर दिखाया है. लेकिन उन्होंने यह कदम किसी बिना तैयारी के नहीं बल्कि 6.5 करोड़ रुपये का एक मजबूत इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो बनाने के बाद उठाया है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट (Reddit) पर My FIRE Journey: Walking Away at 44 टाइटल के साथ इस शख्स ने अपनी कहानी शेयर की है. अब उनकी ये स्टोरी टॉकिंग प्वाइंट बन गई है. इस इंजीनियर ने बताया कि वह इंजीनियरिंग से रिटायर नहीं हुए हैं बल्कि कॉर्पोरेट जीवन के बर्नआउट से रिटायर हुए हैं.

My FIRE Journey: Walking Away at 44

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आइए जानते हैं कि इस टेक पेशेवर ने इतनी कम उम्र में इतना बड़ा फंड कैसे खड़ा किया और उनका वह सीक्रेट फॉर्म्युला क्या है जिसने उन्हें काम के दबाव से मुक्ति और आजादी की जिंदगी दी.

14 घंटे काम और खराब होती सेहत: जीवन का वो टर्निंग पॉइंट

रेडिट पोस्ट के मुताबिक इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर की शादी हो चुकी है और उनका एक 11 साल का बेटा है. उन्होंने देश के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से अपनी यूजी और पीजी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और अपने करियर का लगभग पूरा हिस्सा स्टार्टअप कंपनियों में बिताया. कई बार तो उन्होंने कंपनी पर भरोसे के चलते महीनों तक बिना सैलरी के भी काम किया. उनकी पत्नी हमेशा से एक होममेकर रही हैं.

करियर के दौरान एक स्टार्टअप में रेफरल के जरिए शामिल होना उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना. वहां का माहौल बेहद टॉक्सिक था और हर तरफ बस ऑफिस पॉलिटिक्स चलती थी. उन्हें हफ्ते में 6 दिन और रोजाना 14-14 घंटे काम करना पड़ता था.

इस भयानक दबाव के कारण उनको नींद न आने की समस्या हो गई. वह बॉर्डरलाइन डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे का शिकार हो गए. आखिरकार साल 2023 में उन्होंने एक ब्रेक लिया और रुककर अपनी सेहत व अपनी वित्तीय स्थिति दोनों का बारीकी से देखा.

कैसे बना 6.5 करोड़ का यह विशाल पोर्टफोलियो?

शुरुआत में वह पैसों को लेकर बहुत अधिक अनुशासित नहीं थे और न ही FIRE (Financial Independence, Retire Early) टाइप मूवमेंट उनका कोई टारगेट था. लेकिन उनके एक सही फैसले ने उनकी किस्मत बदल दी। एक फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेने के बाद उन्होंने साल 2018 में एसआईपी के जरिए निवेश करना शुरू किया.

ESOP से मिला बड़ा बूस्ट

साल 2019 में जिस स्टार्टअप में वह काम कर रहे थे, उसका अधिग्रहण हो गया. इससे उन्हें ईशॉप के रूप में लगभग 1.4 करोड़ रुपये का पेआउट मिला. उन्होंने इस बड़ी रकम को खर्च करने के बजाय पूरी तरह इन्वेस्टेड रखा. नियमित निवेश और शेयर बाजार की शानदार ग्रोथ की बदौलत आने वाले सालों में उनका पैसा तेजी से बढ़ता चला गया.

अप्रैल 2026 में एसेट एलोकेशन कैसा था?

अप्रैल 2026 तक उनका कुल इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो करीब 6.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. उन्होंने अपने इस फंड को इस तरह से बांट रखा था। पोर्टफोलियो का लगभग 60% हिस्सा शेयरों में निवेशित था. शेष 40% हिस्सा डेट फंड्स, लिक्विड इन्वेस्टमेंट्स और प्रोविडेंट फंड (PF) की सेविंग्स में फैला हुआ था.

खर्च का गणित

इंजीनियर ने बताया कि उनके परिवार का सालाना खर्च लगभग 14 लाख रुपये है और टियर 1 शहर में उनका अपना खुद का घर भी है. जब उन्होंने देखा कि उनके पास जरूरत से ज्यादा पैसा है और काम करना अब मजबूरी नहीं बल्कि एक चॉइस बन चुका है तो उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी.

नौकरी छोड़ने के बाद जिंदगी में आए ये बड़े बदलाव

नौकरी छोड़ने के तीन महीने बाद ही उनके जीवन में बैंक बैलेंस से परे कई चमत्कारी बदलाव देखने को मिले हैं. उनका वजन काफी कम हो गया है. उनकी नींद की समस्या दूर हो गई है और अब उनका ब्लड प्रेशर पूरी तरह से नियंत्रण में है. अब उनका रोज का रूटीन पूरी तरह बदल चुका है. वह अपना समय ध्यान करने, एक्सरसाइज करने, अपने परिवार के साथ रहने, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर रिसर्च करने और ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट्स में योगदान देने में बिताते हैं.

इंजीनियर ने बताए जल्दी रिटायर होने के 5 बड़े फॉर्म्युले

अपनी इस यात्रा से सीख लेते हुए उन्होंने उन लोगों के लिए कुछ जरूरी टिप्स और सबक साझा किए हैं जो जल्दी रिटायर होना चाहते हैं.

1- अपने फाइनेंशियल टारगेट तय करें: उन्होंने कहा कि काश उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में ही अपना FIRE टारगेट तय कर लिया होता. हर व्यक्ति को पता होना चाहिए कि उसे कितनी रकम के बाद काम छोड़ना है.

2- सैलरी के लिए नेगोशिएट करें: उन्होंने अपने पूरे 20 साल के करियर में एक बार भी अपनी सैलरी के लिए नेगोशिएट नहीं किया था जिससे उन्हें करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ होगा. इसलिए अपनी सैलरी को लेकर हमेशा नेगोशिएट करें.

3- लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन से बचें: वह कभी भी बहुत बड़े खर्च करने वाले इंसान नहीं रहे. फिजूलखर्ची से दूर रहने के कारण उनके लिए नियमित निवेश करना बहुत आसान हो गया.

4- खुद का घर होना फायदेमंद: उन्होंने बताया कि खुद का घर होने की वजह से उन्हें किराए का भुगतान नहीं करना पड़ता था. इससे उनके मासिक खर्चे बेहद कम हो गए और रिटायरमेंट के लिए आवश्यक कुल फंड का आकार भी छोटा हो गया.

5- पारिवारिक सहयोग: वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उनके माता-पिता और उनकी पत्नी के माता-पिता उनके बेटे की उच्च शिक्षा का खर्च उठाने वाले हैं, जिससे उनका भविष्य का एक बहुत बड़ा खर्च पहले ही हट गया.

क्या वह दोबारा नौकरी करेंगे?

इंजीनियर ने स्पष्ट किया कि उन्होंने पूरी तरह से काम करना बंद नहीं किया है. यदि भविष्य में उन्हें कोई सार्थक और अच्छा अवसर मिलता है तो वह दोबारा काम करने पर विचार कर सकते हैं. लेकिन फिलहाल वह अपने समय को अपनी शर्तों पर, अपने परिवार के साथ और कुछ नया सीखने में बिता रहे हैं.

अस्वीकरण (Disclaimer): यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर किसी यूजर द्वारा शेयर की गई सामग्री पर आधारित है. मनीकंट्रोल (Moneycontrol) ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और न ही वह इनका समर्थन करती है.

उड़ते हुए मच्छर का कर लेता है हवा में ही शिकार, मच्छरों का काम तमाम करने वाला 40 ग्राम का छोटू ड्रोन आया!

घर में उड़ते मच्छरों और उनसे होने वाली खतरनाक बीमारियों से हर कोई परेशान रहता है। इनसे छुटकारा पाने के लिए लोग तरह-तरह के केमिकल रिपेलेंट्स, कॉइल्स और लिक्विड का इस्तेमाल करते हैं। ये सभी सेहत के लिए नुकसानदेह भी होते हैं। पर अब टेक्नोलॉजी की दुनिया से आपकी इस शास्वत समस्या के इलाज के लिए एक बेहद अनोखी और क्रांतिकारी जानकारी सामने आई है। फ्रांस के एक स्टार्टअप ने एक ऐसा छोटा और अनोखा ऑटोनॉमस माइक्रोड्रोन तैयार किया है जो हवा में उड़ते हुए मच्छरों को ढूंढकर उनका शिकार कर लेता है। हवा में उड़ते कीड़ों को ट्रैक कर उसे मार गिराने वाले इस अनोखे और हथेली के आकार के ड्रोन का वीडियो सामने आने के बाद यह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है।

सिर्फ 40 ग्राम का प्रोटोटाइप और कमाल की तकनीक

इस कमाल की तकनीक को फ्रांस के स्टार्टअप टॉर्नयॉल ने तैयार है। यह एक माइक्रोड्रोन प्रोटोटाइप है। इसका वजन महज 40 ग्राम है और यह इंसान की हथेली के आकार का है। इस ड्रोन को बनाने का मुख्य उद्देश्य मलेरिया, डेंगू और जिका जैसी जानलेवा बीमारियों को फैलाने वाले मच्छरों की आबादी को बिना किसी केमिकल के खत्म करना है। कंपनी का कहना है कि यह टेक्नोलॉजी अभी सिर्फ टेस्टिंग स्टेज में है और व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने के लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं है।

बिना कैमरे के करता है शिकार: जानिए कैसे काम करता है यह ड्रोन?

आमतौर पर ड्रोन किसी भी चीज को देखने के लिए कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन टॉर्नयॉल का यह ड्रोन काफी अलग और एडवांस है। यह ड्रोन मुख्य रूप से कैमरों पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय यह कारों में मिलने वाले पार्किंग सेंसर की तरह अल्ट्रासोनिक सोनार तकनीक का इस्तेमाल करता है। यह ड्रोन उड़ते समय लगातार अल्ट्रासोनिक तरंगें छोड़ता है और फिर लौटकर आने वाली गूंज को अपने छोटे-छोटे माइक्रोफोन्स के जरिए रिसीव कर उसका विश्लेषण करता है।

पंखों की फड़फड़ाहट से पहचान

मच्छरों और दूसरे कीड़ों के उड़ने के दौरान उनके पंखों की फड़फड़ाहट से एक अनोखा डॉपलर पैटर्न बनता है। यह ड्रोन का सिस्टम उस पैटर्न को मापता है और यह सुनिश्चित करता है कि सामने उड़ने वाला कीड़ा मच्छर ही है। इसके बाद यह हवा में सीधे टारगेट से टकराता है और उसे मार गिराता है।

लैब टेस्ट में मिली पहली बड़ी सफलता

हाल ही में कंपनी द्वारा किए गए एक लाइव प्रदर्शन में इस ड्रोन ने एक कंट्रोल्ड इनडोर वातावरण के भीतर उड़ते हुए एक पतंगे खुद से खोजा, उसे ट्रैक किया और हवा में ही मार गिराया। स्टार्टअप ‘टॉर्नयॉल’ के मुताबिक किसी माइक्रोड्रोन द्वारा हवा में उड़ते हुए कीड़े को बिना इंसानी हस्तक्षेप के मार गिराने का यह दुनिया का पहला सफल प्रदर्शन है।

हालांकि ने स्वीकार किया है कि इस सफल प्रदर्शन के दौरान बाहरी मोशन ट्रैकिंग और ऑफबोर्ड कंप्यूटिंग का उपयोग किया गया था। ड्रोन के भीतर ही पूरी प्रोसेसिंग की क्षमता विकसित करने पर अभी काम चल रहा है।

नर और मादा मच्छर में भी कर सकेगा फर्क!

टॉर्नयॉल स्टार्टअप इस तकनीक को और भी एडवांस बनाने पर काम कर रहा है। कंपनी का मानना है कि भविष्य के वर्शन्स इतने एडवांस होंगे जो पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज से न सिर्फ मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों की पहचान कर सकेंगे, बल्कि नर और मादा मच्छर के बीच भी अंतर कर पाएंगे। कंपनी का लक्ष्य भविष्य में ऐसे छोटे-छोटे ऑटोनॉमस ड्रोन के बेड़े तैयार करना है, जो अपने चार्जिंग स्टेशनों से खुद उड़ान भरकर घरों, बगीचों और पूरे पड़ोस में लगातार गश्त करेंगे और मच्छरों का सफाया करेंगे।

कंपनी का दावा है कि इस सिस्टम से मच्छरों के नियंत्रण पर आने वाला खर्च काफी हद तक कम हो जाएगा। हालांकि इस दावे को अभी तक किसी इंडिपेंडेंट एजेंसी ने वेरिफाई नहीं किया है।

ये चुनौतियां अभी भी बनी हैं रुकावट

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से केमिकल कीटनाशकों के विकल्प तलाश रहे हैं क्योंकि मच्छरों में इन रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक अकेले साल 2024 में दुनिया भर में मलेरिया के कारण लगभग 610000 लोगों की मौत हुई थी। इस खतरनाक आंकड़े के बीच यह तकनीक उम्मीद की किरण तो है लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। यह ड्रोन अभी तक सिर्फ बंद और नियंत्रित इनडोर वातावरण में ही टेस्ट किया गया है। इसे बाहरी वातावरण में सुरक्षित रूप से उड़ाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि बाहर चलने वाली हवा, बारिश और दूसरी मौसमी वजहें ड्रोन की उड़ान और कीड़ों को डिटेक्ट करने की क्षमता को काफी प्रभावित करते हैं। पूरी प्रोसेसिंग को ड्रोन के छोटे से शरीर के भीतर ही समाहित करना अभी बाकी है।

डीपसीक के सीईओ बने सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर:8वीं में कॉलेज मैथ्स सुलझाने वाले लियांग अब 3.47 लाख करोड़ के मालिक हैं

चीन की एआई कंपनी डीपसीक के संस्थापक और सीईओ लियांग वेनफेंग (41) दुनिया के सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर बन गए हैं। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार, कंपनी के नए फंडिंग राउंड के बाद उनकी नेटवर्थ करीब 3.47 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है, जो पहले 1.61 लाख करोड़ रुपए थी। इस बढ़ोतरी के साथ वे ओपनएआई के को-फाउंडर ग्रैग ब्रोकमैन और एंथ्रोपिक के फाउंडर व सीईओ डारियो अमोदेई से आगे निकल गए हैं। पढ़िए लियांग के जीवन से जुड़े किस्से… लगन- एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहने लगे थे लियांग हर मशीन को समझने की जिद लियांग बचपन से जिज्ञासु थे। स्कूल में जो भी कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक मशीन हाथ लगती, उसे खोलकर ठीक करने लगते। कई बार पुर्जे निकालने और उसे ठीक करने के चक्कर में घरवालों और शिक्षकों की डांट भी खाई, लेकिन आदत नहीं बदली। यही जिद आगे एआई चिप बनाने में उनके काम आई। स्कूल में बन गए मैथ जीनियस वे आठवीं में ही कॉलेज स्तर का गणित पढ़ने लगे। एक बार शिक्षक ने कॉलेज लेवल का सवाल देकर परखा, लेकिन लियांग ने कुछ मिनटों में उसका हल निकाल दिया। इसके बाद उन्हें स्कूल में ‘मैथ जीनियस’ कहा जाने लगा। इसमें माता-पिता का काफी रोल है। पेशे से शिक्षक लियांग के माता-पिता ने कभी बेटे के रिजल्ट या रैंक पर ज्यादा जोर नहीं दिया। वे बस यही पूछते ‘आज क्या नया सीखा?’ या ‘कौन-सी नई समस्या हल की?’ वे जवाब याद करने से ज्यादा सवालों के हल खोजते थे। चिप्स पर लगाया दांव 2019 में जब कंपनियां एआई को गंभीरता से नहीं ले रही थीं, तब लियांग ने एआई मॉडल बनाने के लिए 10 हजार चिप खरीदी। लोगों ने इसे मूर्ख व फिजूलखर्ची बताया। लियांग ने कहा, ‘एआई के दौर में चिप्स नहीं मिलेंगी।’ बाद में लोगों को यह बात समझ आई। एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहते थे इंजीनियरिंग में मास्टर्स लियांग काम को लेकर इतने जुनूनी थे कि नया घर खरीदने के बाद भी उसे पूरा नहीं कराया। उनका पूरा ध्यान कोड और एआई मॉडल बनाने पर था। रहने के लिए उन्होंने अधूरे मकान के अंदर ही एक टेंट लगा लिया और वहीं रातें बिताने लगे। कुछ साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 2025 में डीपसीक की सफलता के बाद चीनी नववर्ष पर उनके गांव मिलिलिंग में स्वागत के पोस्टर लग गए। तब लियांग नहीं मिले तो लोग उनके दादा के साथ ही फोटो खिंचवाकर लौट जाते।

स्टार्टअप को मिली ₹5 करोड़ की फंडिंग, फाउंडर ने खरीदी लग्जरी कार और…; इन्वेस्टर ने लगा दी क्लास

मुंबई के प्रमुख वेंचर कैपिटलिस्ट और Ice VC के फाउंडिंग पार्टनर मृणाल झावेरी ने एक युवा एंटरप्रेन्योर की खुलकर आलोचना की है। फंडिंग मिलते ही फाउंडर द्वारा लग्जरी खर्च करने को उन्होंने अनुचित बताते हुए कहा कि स्टार्टअप फंडिंग को सैलरी हाइक की तरह नहीं लेना चाहिए।

AI Bubble: क्या AI का बबल फूट रहा? इन 5 बड़े ‘क्रैश’ ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई

AI Bubble: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने पिछले कुछ सालों में शेयर बाजार को नई रफ्तार दी है। AI से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में जबरदस्त तेजी आई। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। दुनिया भर के बाजारों में AI शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिल रही है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या AI का बूम भी डॉट-कॉम बबल की तरह खत्म होने वाला है?

दक्षिण कोरिया का Kospi Index गुरुवार को 6% से ज्यादा टूट गया। AI चिप बनाने वाली SK Hynix के शेयर 11% और Samsung Electronics के शेयर 8% गिर गए। निवेशकों को अब कंपनियों की ऊंची वैल्यूएशन और भविष्य की कमाई की चिंता सता रही है।

आइए जानते हैं हाल के समय में AI थीम से जुड़े 5 बड़े झटकों के बारे में।

IBM

आईटी और कंसल्टिंग कंपनी IBM के शेयर जुलाई 2026 में करीब 25% टूट गए। इससे कंपनी का करीब 70 अरब डॉलर का मार्केट कैप साफ हो गया। कमजोर शुरुआती नतीजों के साथ यह चिंता भी बढ़ी कि AI कंपनी के पारंपरिक कंसल्टिंग कारोबार पर असर डाल सकता है।

SaaS सेक्टर

सॉफ्टवेयर कंपनियों के शेयर फरवरी 2026 में बुरी तरह टूटे। इसकी वजह Anthropic का नया Agentic AI प्लेटफॉर्म रहा। इसके बाद Salesforce, Adobe और ServiceNow जैसे शेयरों में तेज बिकवाली हुई। निवेशकों को लगा कि AI पारंपरिक सॉफ्टवेयर कंपनियों के बिजनेस मॉडल को बदल सकता है।

Nvidia

AI चिप बनाने वाली कंपनी Nvidia को जनवरी 2025 में बड़ा झटका लगा। कंपनी का मार्केट कैप एक ही दिन में करीब 600 अरब डॉलर घट गया। इसकी वजह चीन के AI स्टार्टअप DeepSeek का सस्ता AI मॉडल था। इसके बाद निवेशकों को डर सताने लगा कि महंगे AI चिप्स की मांग उम्मीद से कम हो सकती है।

Alphabet और Big Tech

टेक दिग्गज कंपनियों Alphabet, Amazon, Meta और Microsoft के शेयर जून 2026 में फिसल गए। Alphabet करीब 6% और Amazon लगभग 5% टूट गया। निवेशकों को चिंता थी कि AI पर हो रहा भारी खर्च कब मुनाफे में बदलेगा।

भारतीय आईटी सेक्टर

भारतीय आईटी कंपनियां भी इस दबाव से नहीं बचीं। IBM की गिरावट के बाद AI को लेकर चिंता बढ़ गई। Infosys, TCS, Wipro, HCLTech, Persistent Systems, Coforge और LTIMindtree जैसे शेयरों में बिकवाली देखने को मिली। Nifty IT Index करीब 2% टूट गया। जबकि Nifty 50 और Sensex बढ़त के साथ बंद हुए।

फिलहाल AI सेक्टर की लंबी अवधि की कहानी मजबूत मानी जा रही है। लेकिन ऊंची वैल्यूएशन, मुनाफे को लेकर सवाल और AI से बदलते कारोबार की वजह से इस सेक्टर में आगे भी तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

Stocks to Watch : 17 जुलाई को इन 9 शेयरों पर रखें नजर, मिल सकता है तगड़ी कमाई का मौका

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

3500 रुपये के इन्वेस्टमेंट से खड़ा कर लिया 1.5 करोड़ का मिलेट बिजनेस! नासिक के इंजीनियर तुषार ने किया कमाल

Business idea: जीवन में कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों के दौरान ही बड़े अवसर क्रिएट करने का मौका मिलता है। ऐसा ही कुछ हुआ नासिक के एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग ग्रैजुएट के साथ। भारत समेत पूरी दुनिया जब कोरोना की महामारी से जूझ रही थी तो उसी समय इस इंजीनियर ने एक शानदार बिजनेस की शुरुआत के लिए कदम बढ़ा दिया। ये कहानी है तुषार तलवारे की जिन्होंने कोरोना लॉकडाउन के दौरान महज 3500 रुपये के शुरुआती निवेश से अपने घर से मिलेट (बाजरा/मोटा अनाज) बेचने का एक छोटा सा प्रयोग शुरू किया था।

आज उनका यह स्टार्टअप फूडोनिक नाम के एक बड़े ब्रांड में बदल चुका है। इसका सालाना रेवेन्यू 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह कंपनी आज पूरे भारत में मिलेट खाखरा, आटा, पास्ता, नूडल्स और कई तरह के हेल्दी स्नैक्स बेच रही है।

कॉलेज के रूममेट और IIT बॉम्बे के सेमिनार से मिला आइडिया

तुषार की इस एंटरप्रेन्योरशिप जर्नी की शुरुआत बेहद दिलचस्प रही। 30Stades के साथ एक इंटरव्यू में तुषार ने बताया कि जब वह नवी मुंबई में पढ़ाई कर रहे थे तब उनके एक कॉलेज रूममेट ने उन्हें उनकी फिटनेस और वेलनेस के प्रति रुचि को देखते हुए हेल्दी फूड सेक्टर में करियर तलाशने की सलाह दी थी।

तुषार की यह रुचि तब एक ठोस बिजनेस आइडिया में बदल गई जब उन्होंने पवई स्थित IIT बॉम्बे में प्रसिद्ध मिलेट रिसर्चर डॉ खादर वली के एक सेमिनार में हिस्सा लिया। इस सेशन से उन्हें मिलेट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू का पता चला और उन्होंने महसूस किया कि उस समय बाजार में मिलेट-आधारित प्रोडक्ट्स बहुत ही कम उपलब्ध थे।

इस सेक्टर को बेहतर ढंग से समझने के लिए तुषार ने कई दूसरे सेमिनार्स में हिस्सा लिया और मिलेट की खेती, इसके स्वास्थ्य लाभ व सप्लाई चेन को समझने के लिए ऑनलाइन कोर्सेज भी पूरे किए।

₹3500 का पहला ऑर्डर और लॉकडाउन में डिलीवरी की चुनौती

बड़ा निवेश करने के बजाय तुषार ने पहले इस आइडिया को छोटे स्तर पर टेस्ट करने का फैसला किया। साल 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान नासिक में अपने घर पर रहते हुए तुषार ने मात्र 3500 रुपये निवेश किए। उन्होंने डॉ खादर वली के नेटवर्क के जरिए तमिलनाडु के एक किसान से 5 अलग-अलग किस्मों के 5-5 किलो मिलेट्स खरीदे।

परिवार, दोस्तों और शुरुआती ग्राहकों से मिले सकारात्मक फीडबैक से उत्साहित होकर उन्होंने अपने अगले ऑर्डर को बढ़ाकर हर किस्म का 20-20 किलो कर दिया। लॉकडाउन के कारण जब लॉजिस्टिक्स सेवाएं पूरी तरह प्रभावित थीं तब तुषार ने ऑर्डर हासिल करने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप्स और लोगों की सिफारिशों का सहारा लिया। उस समय सिर्फ इंडिया पोस्ट की सेवाएं चालू थीं, इसलिए वे घर पर ही अपने हाथों से एक-एक किलो के पाउच पैक करते थे और डाक के जरिए पूरे देश में ग्राहकों को भेजते थे।

किफायती कीमत की वो रणनीति जो कर गई काम

मार्केट रिसर्च के दौरान तुषार ने देखा कि कई विक्रेता 5 किलो मिलेट्स के लिए करीब 1200 रुपये तक चार्ज कर रहे थे। चूंकि उनकी खरीद लागत काफी कम थी, इसलिए उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स की कीमत को किफायती रखने का फैसला किया। तुषार बताते हैं कि उतनी ही मात्रा के लिए उनकी खरीद लागत सिर्फ 400 रुपये के आसपास थी।

इसलिए उन्हें अपने पैक्स की कीमत पोस्टल चार्ज और प्रॉफिट मार्जिन मिलाकर 700 रुपये रखी। इससे ग्राहकों को काफी किफायती दाम में हेल्दी फूड मिलने लगा और तुषार को भी एक बेहतर मार्जिन मिला। यह प्राइसिंग स्ट्रेटजी पूरी तरह सफल रही और देश के अलग अलग हिस्सों से ताबड़तोड़ ऑर्डर आने शुरू हो गए।

₹1.5 लाख से ₹1.5 करोड़ तक का सफर

जैसे-जैसे मांग बढ़ी तुषार ने नासिक में ही 2000 रुपये महीने के किराए पर एक कमरा लिया और अपने काम को वहां शिफ्ट कर दिया। रेडी-टू-ईट मिलेट प्रोडक्ट्स की मांग को देखते हुए उन्होंने कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ पार्टनरशिप की और आटा, पास्ता व नूडल्स जैसे प्रोडक्ट तैयार करवाने लगे जबकि उनका खुद का ध्यान ब्रांडिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन पर रहा।

कंपनी ने भी फिर रफ्तार पकड़ी। साल 2020 में 1.5 लाख का टर्नओवर, साल 2021 में 12 लाख के टर्नओवर में बदल गया। साल 2023 में उन्होंने अपने पोर्टफोलियो में मिलेट चिवड़ा, फ्लेक्स और दूसरे स्नैक्स शामिल किए।

कारोबार के विस्तार के साथ तुषार को केंद्र सरकार की PMFME योजना (PM Formalisation of Micro Food Processing Enterprises Scheme) के तहत 10 लाख रुपये की सब्सिडी मिली। इस मदद से उन्होंने 15 अलग-अलग वैरायटी के मिलेट खाखरा बनाने के लिए अपनी खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित की।

हीरो हैं ये 8 महिलाएं: बिना किसी केमिकल के तैयार होता है खाखरा

फैक्ट्री स्थापित करना तो केवल शुरुआत थी, मिलेट खाखरा को बड़े पैमाने पर बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। शुरुआत में आटा मशीनों से चिपक जाता था और सही खाखरा नहीं बन पाता था। फूड कंसल्टेंट्स ने इसमें बाइंडर्स और एडिटिव्स मिलाने की सलाह दी लेकिन तुषार इसे 100% नेचुरल रखना चाहते थे।

महीनों की कड़ी मेहनत और 2000 किलो से अधिक मिलेट आटा इस्तेमाल करने के बाद उनकी टीम ने परफेक्ट रेसिपी तैयार की। ये खाखरे बिना किसी प्रिजर्वेटिव, एडिटिव्स या सिंथेटिक बाइंडर्स के बनाए जाते हैं और स्वाद को बरकरार रखने के लिए कंपनी अपने खुद के मसालों का मिश्रण तैयार करती है।

वर्तमान में नासिक स्थित Fudonik की इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को 8 महिलाएं संभाल रही हैं। बाजार में खाखरा लॉन्च करने से पहले कंपनी ने 6 महीने तक ग्राहकों का फीडबैक लिया और लैबोरेटरी टेस्ट भी पूरे किए।

भविष्य की योजनाएं

आज यह कंपनी इन-हाउस खाखरा और चिवड़ा बनाती है जिसके पास 2500 से अधिक रिटेल ग्राहक हैं और यह अपने B2B बिजनेस का भी तेजी से विस्तार कर रही है। अपनी आगे की योजनाओं को लेकर तुषार बताते हैं कि वे अगले साल मिलेट कुकीज भी लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं।

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Disclaimer: यह रिपोर्ट पूरी तरह से थर्ड पार्टी मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट पर आधारित है। मनीकंट्रोल ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और न ही वह इनका समर्थन करता है।

AI के दौर में नौकरी गई तो क्या करें? 15 दिन में नई जॉब पाने वाले इंजीनियर ने बताए टिप्स

AI के बढ़ते प्रभाव और कंपनियों में लगातार हो रही छंटनी ने नौकरीपेशा लोगों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर टेक सेक्टर में बदलते हालात के बीच कर्मचारियों के लिए हर दिन नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। ऐसे माहौल में एक भारतीय टेक प्रोफेशनल की कहानी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Reddit पर खूब चर्चा बटोर रही है। नौकरी जाने के बाद जहां कई लोग लंबे समय तक नए अवसर की तलाश में संघर्ष करते हैं, वहीं इस शख्स ने मुश्किल वक्त में हार मानने के बजाय तेजी से कदम उठाए। उसने अपने अनुभव, नेटवर्क और लगातार कोशिशों के दम पर कुछ ही दिनों में नई नौकरी हासिल कर ली।

उसकी पोस्ट अब हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है। कई यूजर्स इसे मौजूदा जॉब मार्केट की सच्चाई और सही रणनीति का उदाहरण बता रहे हैं। यह कहानी बताती है कि बदलते दौर में सिर्फ स्किल्स ही नहीं, बल्कि नेटवर्किंग, तैयारी और धैर्य भी सफलता की बड़ी कुंजी बन चुके हैं।

घबराने के बजाय अपनाई नई रणनीति

नौकरी जाने के बाद उसने समय बर्बाद नहीं किया और तुरंत नए अवसरों की तलाश शुरू कर दी। उसने LinkedIn पर रिक्रूटर्स से संपर्क किया, लेकिन सबसे ज्यादा फायदा उसे अपने नेटवर्क और दोस्तों से मिला। उसने अपने परिचितों से अलग-अलग कंपनियों में रेफरल दिलाने के लिए मदद मांगी।

15 दिनों में बदली तस्वीर, मिले कई ऑफर

लगातार कोशिशों का नतीजा यह रहा कि उसे पांच कंपनियों में इंटरव्यू के मौके मिले। इनमें से दो कंपनियों ने मना कर दिया, लेकिन तीन कंपनियों ने उसे जॉब ऑफर दे दिए। आखिरकार उसने नोएडा की एक HCM डोमेन वाली प्रोडक्ट कंपनी का ऑफर स्वीकार किया और पुणे की दो स्टार्टअप कंपनियों के प्रस्ताव ठुकरा दिए।

लेऑफ के बावजूद नहीं मिला सेवरेंस

टेक प्रोफेशनल ने बताया कि पुरानी कंपनी ने उसे 31 जुलाई तक पेरोल पर रखा था, लेकिन प्रोबेशन पीरियड में होने के कारण उसे सेवरेंस पैकेज नहीं मिला। इसके बावजूद उसने इस मुश्किल दौर को हार मानने की बजाय नई शुरुआत का मौका बनाया।

नौकरी मिल गई, लेकिन तैयारी नहीं रुकेगी

अपने अनुभव से सीख लेते हुए उसने अन्य प्रोफेशनल्स को सलाह दी कि नौकरी मिलने के बाद भी तैयारी बंद नहीं करनी चाहिए। उसका कहना है कि मौजूदा जॉब मार्केट काफी चुनौतीपूर्ण है और भविष्य में प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। इसलिए वह नई नौकरी मिलने के बाद भी DSA और सिस्टम डिजाइन जैसी स्किल्स पर काम जारी रखेगा।

Reddit पर लोगों ने की हिम्मत की तारीफ

इस पोस्ट पर कई यूजर्स ने उसकी मेहनत और सही समय पर नेटवर्किंग करने की रणनीति की सराहना की। कुछ लोगों ने कहा कि लेऑफ के बाद जल्दी नौकरी मिलना आत्मविश्वास बढ़ाता है, वहीं कई यूजर्स ने इसे आज के अनिश्चित जॉब मार्केट में तैयारी की जरूरत का उदाहरण बताया।

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Semiconductor Mission 2.0: ₹1.27 लाख करोड़ के मिशन को मंजूरी, भारत को चिप हब बनाने की तैयारी

India Semiconductor Mission (ISM 2.0): केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को India Semiconductor Mission (ISM 2.0) को मंजूरी दे दी। इस मिशन के लिए ₹1.27 लाख करोड़ का बजट तय किया गया है। यह पहले चरण के ₹76,000 करोड़ से करीब 68% ज्यादा है। सरकार का लक्ष्य सिर्फ चिप बनाना नहीं है। अब पूरी सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन भारत में तैयार करने पर जोर रहेगा, ताकि देश आयात पर कम निर्भर हो और दुनिया का बड़ा चिप हब बन सके।

आखिर ISM 2.0 में नया क्या है?

पहले चरण यानी ISM 1.0 का फोकस चिप मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लाने पर था। अब ISM 2.0 का दायरा और बड़ा कर दिया गया है। सरकार अब चिप डिजाइन से लेकर मशीनें, केमिकल, गैस, कच्चा माल, एडवांस पैकेजिंग और रिसर्च तक पूरा इकोसिस्टम देश में तैयार करना चाहती है।

6 बड़े पिलर पर तैयार हुआ मिशन

सरकार ने ISM 2.0 को छह बड़े हिस्सों में बांटा है।

  • सबसे पहले भारत को चिप डिजाइन के क्षेत्र में मजबूत बनाया जाएगा। सरकार स्टार्टअप और डिजाइन कंपनियों को मदद देगी, ताकि वे दुनिया के लिए चिप डिजाइन कर सकें।
  • दूसरा फोकस सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर रहेगा। चिप बनाने वाली मशीनें, स्पेशलिटी केमिकल, गैस और जरूरी कच्चा माल देश में ही तैयार करने की कोशिश होगी।
  • तीसरे चरण में नई सिलिकॉन फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब, डिस्प्ले फैब और दूसरी निर्माण इकाइयों में निवेश बढ़ाया जाएगा।
  • चौथा लक्ष्य ATMP और OSAT यानी चिप की एडवांस पैकेजिंग और टेस्टिंग क्षमता को मजबूत करना है।
  • पांचवें हिस्से में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर जोर रहेगा। सरकार चाहती है कि भारत सिर्फ मौजूदा तकनीक तक सीमित न रहे, बल्कि अगली पीढ़ी की चिप टेक्नोलॉजी भी विकसित करे।
  • छठा फोकस स्किल डेवलपमेंट पर होगा। इस सेक्टर के लिए बड़ी संख्या में इंजीनियर और एक्सपर्ट तैयार किए जाएंगे।

105 स्टार्टअप पहले से कर रहे हैं काम

सरकार के मुताबिक, देश में 105 स्टार्टअप पहले से सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन पर काम कर रहे हैं। नई योजना के तहत इन्हें तकनीकी और वित्तीय मदद दी जाएगी। सरकार चाहती है कि भारत चिप डिजाइन के क्षेत्र में भी दुनिया के बड़े देशों में शामिल हो।

2028 तक शुरू हो सकती है पहली चिप फैक्ट्री

सरकार ने कहा है कि भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) यूनिट 2028 तक शुरू होने की उम्मीद है। इससे देश में चिप निर्माण को नई रफ्तार मिलेगी।

पहले चरण में क्या हासिल हुआ?

सरकार के मुताबिक, India Semiconductor Mission (ISM) 1.0 के तहत अब तक 12 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक गैलियम नाइट्राइड माइक्रो LED डिस्प्ले फैब और 9 पैकेजिंग यूनिट शामिल हैं। इन परियोजनाओं में ₹1.64 लाख करोड़ से ज्यादा के निवेश को मंजूरी मिली है।

Micron, Kaynes और CG Semi में कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। एक और यूनिट इस साल के अंत तक प्रोडक्शन शुरू कर सकती है।

68 हजार छात्रों को मिली ट्रेनिंग

सरकार सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए कुशल ह्यूमन रिसोर्स भी तैयार कर रही है। अभी 315 विश्वविद्यालयों में आधुनिक Electronic Design Automation (EDA) टूल्स के जरिए पढ़ाई हो रही है। अब तक 68,000 से ज्यादा छात्रों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है।

बड़ी कंपनियों की भी दिलचस्पी

भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर में विदेशी कंपनियों का भरोसा भी बढ़ रहा है। AMD और Applied Materials ने 40-40 करोड़ डॉलर, Microchip Technology ने 30 करोड़ डॉलर, Lam Research ने 110 करोड़ डॉलर और KLA ने 40 करोड़ डॉलर के निवेश का ऐलान किया है।

वहीं ASML, Merck और IBL Electron ने टाटा ग्रुप के साथ समझौते किए हैं। इनका मकसद भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करना है।

सरकार का बड़ा लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि भारत सिर्फ चिप आयात करने वाला देश नहीं बनना चाहता। सरकार का लक्ष्य पूरी वैल्यू चेन भारत में तैयार करना है। आने वाले वर्षों में भारत की सेमीकंडक्टर मांग 50 अरब डॉलर से बढ़कर 100 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है। सरकार चाहती है कि इस बढ़ती मांग का बड़ा हिस्सा देश में ही पूरा हो।मजबूत बनाना है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।