IIT कानपुर की ग्रेजुएट ने बताया, आखिर क्यों दोस्त ने वर्क फ्रॉम होम की नौकरी छोड़ दी? 10 से 6 की शर्त बनी वजह

वर्क फ्रॉम होम को अक्सर आजादी और सुविधा से जोड़कर देखा जाता है। लोगों को लगता है कि घर से काम करने पर वे अपने समय के हिसाब से जिंदगी और नौकरी के बीच संतुलन बना सकते हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा है? एक महिला ने इसी सवाल के बीच अपनी पूरी तरह रिमोट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। वजह थी कंपनी की यह शर्त कि उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार ऑनलाइन और उपलब्ध रहना होगा। इस घटना ने काम के घंटों, कर्मचारियों की आजादी और कंपनियों के भरोसे को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

ऑफिस से बचने के लिए चुना वर्क फ्रॉम होम

इस मामले को IIT कानपुर की पूर्व छात्रा और McKinsey में काम कर चुकीं कनक अग्रवाल ने LinkedIn पर साझा किया। उन्होंने अपनी एक दोस्त का अनुभव बताते हुए सवाल उठाया कि अगर कर्मचारी को घर से काम करते हुए भी ऑफिस जैसी समय-सारणी का पालन करना पड़े, तो रिमोट वर्क का असली फायदा क्या है? कनक के मुताबिक, उनकी दोस्त ने इसी वजह से नौकरी छोड़ दी। वह घर से काम तो कर रही थीं, लेकिन कंपनी चाहती थी कि वह तय समय के दौरान लगातार ऑनलाइन रहें और अपनी उपलब्धता दिखाती रहें। कनक ने इस स्थिति को केवल ऑफिस बनाम घर से काम करने का मामला नहीं, बल्कि अपने समय पर नियंत्रण रखने की आजादी से जुड़ा मुद्दा बताया।

काम पूरा करना जरूरी या पूरे दिन ऑनलाइन दिखना?

कनक का कहना है कि रिमोट वर्क की असली ताकत सिर्फ काम करने की जगह बदलने में नहीं, बल्कि काम करने के समय पर कुछ हद तक नियंत्रण मिलने में है। कर्मचारी अपनी ऊर्जा, उत्पादकता और निजी जरूरतों के अनुसार दिन की योजना बना सकें, तो उनके लिए काम और जिंदगी के बीच संतुलन बनाना आसान हो सकता है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कई कंपनियां कर्मचारियों के काम के नतीजों के बजाय उनकी ऑनलाइन मौजूदगी को प्रतिबद्धता का पैमाना क्यों मानती हैं। उनके अनुसार, जब कर्मचारी अपने समय को खुद व्यवस्थित करने लगते हैं, तो कुछ संगठनों को नियंत्रण कम होने का डर सताने लगता है।

क्या हर नौकरी में मिल सकती है समय की पूरी आजादी?

LinkedIn पर इस पोस्ट के बाद लोगों की अलग-अलग राय सामने आई। कुछ यूजर्स ने माना कि अपने समय पर नियंत्रण मिलने के बाद उसे छोड़ना मुश्किल होता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि रिमोट वर्क और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स दोनों अलग-अलग चीजें हैं। कुछ लोगों ने टीमवर्क की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, अगर हर कर्मचारी अपनी सुविधानुसार अलग-अलग समय पर काम करेगा, तो मीटिंग, बातचीत और जरूरी कामों में तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। एक यूजर ने तो यह भी कहा कि कंपनी की 10 में से 9 भूमिकाओं में पूरी तरह लचीले समय की व्यवस्था लागू करना संभव नहीं होगा।

आखिर कर्मचारी चाहते क्या हैं?

यह बहस बताती है कि आज कर्मचारियों के लिए केवल घर से काम करना ही पर्याप्त नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके काम की गुणवत्ता और परिणामों को महत्व मिले, साथ ही उन्हें अपनी निजी जिंदगी के लिए भी समय मिल सके। हालांकि, हर नौकरी में एक जैसी आजादी संभव नहीं है। कंपनियों को टीम की जरूरतों और कर्मचारियों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कर्मचारी कहां से काम करते हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें अपने काम और समय को व्यवस्थित करने की कितनी आजादी मिलती है।

जैक याडेगरी कौन हैं? 15 विश्वविद्यालयों ने किया रिजेक्ट, अब 19 साल की उम्र में अपने AI स्टार्टअप के लिए जुटाए 10 मिलियन डॉलर

जैक याडेगरी कौन हैं? 15 विश्वविद्यालयों ने किया रिजेक्ट, अब 19 साल की उम्र में अपने AI स्टार्टअप के लिए जुटाए 10 मिलियन डॉलर

आज के दौर में जहां युवा अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं, वहीं अमेरिका के 19 वर्षीय जैक याडेगरी अपनी उद्यमशीलता और AI तकनीक के दम पर बिजनेस की दुनिया में चर्चा बटोर रहे हैं। कम उम्र में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से एक खास पहचान बनाई है। जैक ने महज सात साल की उम्र में कोडिंग सीखना शुरू कर दिया था और धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपनी रुचि को एक बड़े अवसर में बदल दिया। उन्हें सबसे पहले Cal AI ऐप से पहचान मिली, जिसने उनकी सफलता की कहानी को नई दिशा दी। अब वह अपने नए AI स्टार्टअप Persona को लेकर सुर्खियों में हैं।

इस स्टार्टअप के लिए 10 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाना उनकी उपलब्धियों में एक और बड़ी कड़ी माना जा रहा है। जैक की कहानी दिखाती है कि सही सोच, तकनीकी कौशल और नए विचारों के साथ कम उम्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

7 साल की उम्र में सीखी कोडिंग, 16 में बेची पहली कंपनी

अमेरिका के लॉन्ग आइलैंड, न्यूयॉर्क में रहने वाले जैक याडेगरी को बचपन से ही तकनीक में दिलचस्पी थी। उन्होंने स्कूल के दिनों में Totally Science नाम की गेमिंग वेबसाइट बनाई थी। इस प्लेटफॉर्म के जरिए छात्र स्कूल नेटवर्क पर ब्लॉक किए गए गेम खेल सकते थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैक ने महज 16 साल की उम्र में इस वेबसाइट को करीब 1 लाख डॉलर में बेच दिया था।

हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड ने किया रिजेक्ट, फिर भी नहीं मानी हार

जैक की कहानी का एक दिलचस्प पहलू कॉलेज एडमिशन से भी जुड़ा है। अप्रैल 2025 में उन्होंने बताया था कि जिन 18 विश्वविद्यालयों में उन्होंने आवेदन किया, उनमें से 15 ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। इनमें हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी शामिल थे।

रिपोर्ट के अनुसार, उनका GPA 4.0 और ACT स्कोर 34 था। इसके बावजूद उन्हें कई बड़े विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिला। बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी में पढ़ाई शुरू की। हालांकि, एडमिशन में मिली निराशा उनके बिजनेस सफर में बाधा नहीं बनी।

Cal AI ऐप ने बनाया करोड़ों का बिजनेस

साल 2024 में जैक ने Cal AI नाम का कैलोरी ट्रैकिंग ऐप लॉन्च किया। इसकी मदद से यूजर्स खाने की तस्वीर अपलोड करके उसमें मौजूद कैलोरी का अनुमान लगा सकते थे। ऐप को लोगों के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली।

मार्च 2026 में फिटनेस प्लेटफॉर्म MyFitnessPal ने Cal AI का अधिग्रहण करने की घोषणा की। सौदे की रकम सार्वजनिक नहीं की गई। TechCrunch की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐप के 1.5 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हो चुके थे और दो साल में इसका सालाना राजस्व 3 करोड़ डॉलर से अधिक पहुंच गया था।

अब Persona से AI की दुनिया में नई शुरुआत

MyFitnessPal से जून में अलग होने के बाद जैक ने Persona पर काम शुरू किया। यह AI असिस्टेंट यूजर्स को रोजमर्रा के कामों में मदद देने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसके लिए जुटाई गई 10 मिलियन डॉलर की फंडिंग का नेतृत्व Vine Ventures ने किया, जबकि अन्य निवेशकों में Cory Levy और Collective Global शामिल हैं।

दिसंबर में आ सकता है AI डिवाइस

Persona के तहत दिसंबर में 179 डॉलर का एक पहनने योग्य डिवाइस लॉन्च करने की योजना है। इसे बटन दबाकर या कलाई की हलचल से सक्रिय किया जा सकेगा। जैक का कहना है कि कंपनी यूजर्स की बातचीत विज्ञापनदाताओं को नहीं बेचेगी, हालांकि प्रायोजित शॉपिंग सुझाव इसके बिजनेस मॉडल का हिस्सा होंगे। फिलहाल Persona iMessage पर बीटा वर्जन में उपलब्ध है और इसके कुछ हजार शुरुआती यूजर्स हैं।

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Waste to Wealth: कचरे के ढेर से खड़ा किया ₹250 करोड़ का स्टार्टअप! जयपुर के दो दोस्तों की ये अनोखी कहानी हैरान कर देगी

Jaipur Waste Management Startup: देशभर में आज स्वच्छता अभियान को लेकर शहरों में इंदौर से आगे निकलने की होड़ है, जिसके लिए प्रशासन और शहरों की संस्थाएं लगातार लोगों को कचरे और साफ-सफाई के प्रति जागरूक करती हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इस बीड़े को खुद उठाते हैं। ऐसे ही जयपुर के दो युवा हैं, जिन्होंने कचरे और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के स्टार्टअप से ₹250 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर दिया। आज यह सिर्फ एक सफल स्टार्टअप ही नहीं है, बल्कि ‘फोर्ब्स अंडर-30’ की लिस्ट तक इनके स्टार्टअप का डंका बज चुका है।

जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने 2018 में ‘वीवॉइस लैब’ (WeVOIS Labs) कंपनी की शुरुआत की और आज उनका यह स्टार्टअप 25 से अधिक शहरों में काम कर रहा है। ‘वीवॉइस लैब’ के इस क्लीन-टेक स्टार्टअप की कहानी जयपुर के इन दोनों युवाओं के 2016 में कॉलेज कैंपस सफाई अभियान और वेस्ट अवेयरनेस कैंपेन से शुरू हुई थी। उस समय कॉलेज के इस सफाई अभियान को उन्होंने सिर्फ एक प्रोजेक्ट के रूप में नहीं देखा, बल्कि कचरे और सफाई के स्थाई समाधान पर विचार शुरू किया और यहीं से ‘वीवॉइस लैब’ स्टार्टअप की नींव पड़ी।

6 लाख टन से ज्यादा वेस्ट कचरा प्रोसेस करती है ‘वीवॉइस लैब’

आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल 62 मिलियन टन कचरा निकलता है, जिसे या तो खुले में फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। लेकिन जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर की कंपनी ‘वीवॉइस लैब’ वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के रूप में अपनी खास पहचान रखती है। इस कंपनी का सिस्टम पूरी तरह इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) पर आधारित है। इसमें हर घर, होटल और अस्पताल को ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ (RFID) टैग दिया जाता है, जिससे कचरा उठाने से लेकर प्रोसेस होने तक रियल-टाइम मॉनिटरिंग होती है। इसमें कचरा कब उठा, किसने उठाया, कितना उठा, वर्कर की उपस्थिति, परफॉर्मेंस और प्रोसेस पर खास निगरानी रखी जाती है।

जयपुर की इस ‘वीवॉइस लैब’ कंपनी के जरिए हजारों वर्कर्स को रोजगार भी मिल रहा है। फिलहाल वीवॉइस लगभग ₹250 करोड़ का क्लीन-टेक स्टार्टअप बन चुका है, जो 25 शहरों में काम कर रहा है और हर साल 6 से 7 लाख टन से ज्यादा वेस्ट प्रोसेस कर रहा है।

गांवों में भी शुरू किया ‘रूरल स्मार्ट विलेज सेंटर’

कचरे का निपटान और जागरूकता फैलाने का ‘वीवॉइस लैब’ का काम सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों में भी ‘रूरल स्मार्ट विलेज सेंटर’ के रूप में काम कर रहा है। यहां वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के साथ-साथ लोगों को रोजगार और स्वच्छता की शिक्षा भी दी जा रही है। हाल ही में ‘वीवॉइस लैब’ ने बिसलेरी के साथ मिलकर जयपुर में हर महीने 30 टन प्लास्टिक वेस्ट उठाना शुरू किया है। साथ ही 300 टन क्षमता वाला टेक्सटाइल वेस्ट रीसाइकलिंग प्लांट भी शुरू किया है। आने वाले समय में 10 और शहरों को इस सिस्टम से जोड़ा जाएगा, ताकि 3 हजार टन प्लास्टिक वेस्ट को लैंडफिल में जाने से रोका जा सके।

लंबे समय से जयपुर के ये दो युवा टेक्सटाइल कचरे के वैज्ञानिक रीसाइक्लिंग से रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को एक नई दिशा देने पर काम कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में राजधानी जयपुर में ‘वीवॉइस लैब’ द्वारा टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट शुरू की गई है, जिसके बाद से कचरे के सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लक्ष्यों पर काम किया जा रहा है।

‘वीवॉइस लैब’ के जरिए किस प्रकार होती है टनों कचरे की रीसाइकलिंग

‘वीवॉइस लैब’ खासतौर पर शहरों को स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में मील का पत्थर साबित हो चुकी है, जो अलग-अलग तरीकों से कचरे की रीसाइकलिंग करती है। ‘वीवॉइस लैब’ के वर्कर्स द्वारा एकत्रित कचरे का उपयोग अलग-अलग रूपों में किया जाता है; जैसे गीले कचरे को खाद बनाने के लिए भेजा जाता है, जबकि सूखे कचरे से कागज, प्लास्टिक, धातु, कांच और वस्त्र जैसी सामग्रियां बनाने के लिए उसे अलग-अलग छांटा जाता है।

कंपनी की ‘रीसूत्र’ यूनिट में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाता है, जो कपड़ा अपशिष्ट को ट्रैक, प्रोसेस और पुनः उपयोग योग्य उत्पादों में परिवर्तित करने में सक्षम है। आमतौर पर एकत्रित कचरे का अधिकांश भाग लैंडफिल स्थलों (कचरे के ढेरों) में डाल दिया जाता है, जिससे हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है और पर्यावरण प्रदूषित होता है। लेकिन लैंडफिल स्थलों पर कचरे के ढेर को रोकने के लिए, ‘वीवॉइस लैब’ ने नगर निकायों की सहायता से प्रायोगिक परीक्षण भी किया है।

‘वीवॉइस लैब’ जनरेट कर रही है लोगों के लिए रोजगार

जयपुर की ‘वीवॉइस लैब’ एक अपशिष्ट प्रबंधन कंपनी है जो कचरे के संग्रहण, ट्रैकिंग, पृथक्करण और पुनर्चक्रण  में सुधार के लिए तकनीक का उपयोग करती है। इसके साथ ही कंपनी का मुख्य फोकस टेक्सटाइल अपशिष्ट को पुनः उपयोगी संसाधनों में बदलकर सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने पर रहता है। इसके अलावा कंपनी अधिक से अधिक लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध करा रही है, जो एक स्मार्ट सिस्टम के जरिए काम करता है।

कंपनी में एक खास ‘रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर’ डिजाइन किया गया है, जो सहायकों के लिए आपके घर तक पहुंचने और समय पर सेवा प्रदान करने का मार्ग निर्धारित करता है। साथ ही, कंपनी का सुव्यवस्थित अलर्ट प्रबंधन प्रणाली वाला मोबाइल ऐप उपभोक्ताओं को निर्धारित पिकअप से पहले हर बार सूचना प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।

रिपोर्ट: अंकित राजपूत

CM Youth Conclave MP 2026: अगले साल से दो बार होंगी एमपीपीएससी परीक्षा, यूथ कॉन्क्लेव में मुख्यमंत्री यादव का बड़ा ऐलान

CM Youth Conclave MP 2026: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने राज्य में आयोजित युवा महोत्सव 2027 के दौरान कई बड़ी और प्रमुख पहल की घोषणा की है। एमपी यूथ कॉन्क्लेव 2026 में उन्होंने कहा कि 2027 से एमपी लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा साल में दो बार कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने 12 नए मेडिकल कॉलेज और इतनी ही स्किल यूनिवर्सिटी बनाने का ऐलान किया है।

“CM यूथ कॉन्क्लेव-2026” में बोलते हुए, यादव ने कहा कि हायर एजुकेशन में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए, शोधकर्ताओं के लिए स्टाइपेंड 16,000 रुपये प्रति महीने से बढ़ाकर 25,000 रुपये किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगले साल से मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन (MPPSC) की परीक्षाएं साल में दो बार होंगी और राज्य भर के सरकारी कॉलेजों में कॉम्पिटिटिव परीक्षाओं के लिए फ्री कोचिंग क्लास शुरू की जाएंगी।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार की योजना 12 नए मेडिकल कॉलेज और 12 स्किल यूनिवर्सिटी बनाने की तैयारी कर रही है। राज्य में यह संस्थान रोजगार देने वाले कोर्स ऑफर करेंगे। कॉन्क्लेव में राज्य भर के मेधावी लोग मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के लिए इकट्ठा हुए थे। एक छात्रा मायशा खान ने पूछा कि सरकार युवाओं के बीच खेती को कैसे बढ़ावा देने की योजना बना रही है? इस सवाल पर यादव ने कहा कि सरकार भविष्य में फूड-प्रोसेसिंग से लेकर खेतों तक एक वैल्यू चेन बनाने की योजना बना रही है।

उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और स्टार्टअप सेक्टर में सरकार के काम पर भी ज़ोर दिया, भोपाल में AI सिटी पर चल रहे काम और स्टार्टअप के लिए युवाओं को दी जाने वाली 5 लाख रुपये की सब्सिडी का ज़िक्र किया। यादव ने आगे कहा कि 2027 में खेल सरकार की टॉप प्रायोरिटी में से एक होगा, उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों ने हाल ही में हुए एशियन गेम्स में पाँच मेडल जीते।

उन्होंने कहा, “हमने खेलों को एक सब्जेक्ट के तौर पर शामिल किया है और कोचों के प्रमोशन का इंतज़ाम किया है। हमारी सरकार हर असेंबली सीट पर स्टेडियम बनाएगी। अब, हम शूटिंग और आर्चरी में भी मेडल जीत रहे हैं। 2027 में खेल टॉप प्रायोरिटी में रहेगा।”

Gen Z के अकेलेपन का इलाज! 32 साल की कृष्णा ने बनाया ऐसा ऐप, जुटाई ₹33.5 करोड़ की फंडिंग

आज के दौर में सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ना बेहद आसान है, लेकिन आमने-सामने दोस्त बनाना और प्रोफेशनल नेटवर्क तैयार करना कई युवाओं के लिए मुश्किल होता जा रहा है। इसी समस्या को 32 वर्षीय उद्यमी कृष्णा दोसापति एक नए तरीके से हल करने की कोशिश कर रही हैं। उनका मानना है कि Gen Z के अकेलेपन का जवाब शायद ज्यादा सोशल मीडिया नहीं, बल्कि लोगों को असल जिंदगी में मिलवाना हो सकता है।

उन्होंने ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसका मकसद युवाओं को उनके आसपास रहने वाले समान रुचियों और प्रोफेशन वाले लोगों से जोड़ना है।

₹33 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग, बढ़ी उम्मीदें

कृष्णा दोसापति Clockout की फाउंडर और CEO हैं। उनकी कंपनी ने हाल ही में $3.5 मिलियन यानी करीब ₹33.5 करोड़ की फंडिंग जुटाई है। इस फंडिंग राउंड की अगुवाई 114 Ventures ने की, जबकि Evite Ventures, Allied Ventures, Sher Ventures, Gaingels और BMPB VC ने भी इसमें हिस्सा लिया। अक्टूबर 2024 में लॉन्च हुआ Clockout खुद को LinkedIn और Meetup के बीच का मिश्रण बताता है। इसका मकसद सिर्फ ऑनलाइन कनेक्शन बनाना नहीं, बल्कि उन कनेक्शनों को वास्तविक मुलाकातों और कम्युनिटी में बदलना है।

आइडिया की शुरुआत खुद कृष्णा की परेशानी से हुई

इस स्टार्टअप के पीछे कोई काल्पनिक समस्या नहीं, बल्कि कृष्णा का अपना अनुभव है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने न्यूयॉर्क में काम शुरू किया, तो उन्हें महसूस हुआ कि इतने बड़े शहर में रहने के बावजूद नए प्रोफेशनल लोगों से मिलना आसान नहीं था। यहीं से उनके मन में सवाल आया कि अगर उन्हें नई कम्युनिटी बनाने में परेशानी हो रही है, तो युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह समस्या कितनी बड़ी होगी? इसी सोच ने Clockout का रास्ता तैयार किया।

ऐप सिर्फ प्रोफाइल नहीं, असली मुलाकात पर देता है जोर

Clockout पर यूजर्स अपनी रुचियों, इंडस्ट्री और साझा कनेक्शन के आधार पर दूसरे प्रोफेशनल्स को खोज सकते हैं। इसके बाद प्लेटफॉर्म का लक्ष्य उन्हें डिजिटल बातचीत से निकालकर क्लब, इवेंट और आमने-सामने मुलाकातों तक पहुंचाना है। यानी यहां सिर्फ किसी को ‘कनेक्ट’ करना ही मंजिल नहीं है, बल्कि उस कनेक्शन को असल जिंदगी की दोस्ती या प्रोफेशनल कम्युनिटी में बदलना अहम है।

10 महीने में 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड

Clockout के मुताबिक, लॉन्च के बाद प्लेटफॉर्म को 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड मिल चुके हैं। कंपनी का दावा है कि पेड फीचर्स शुरू करने के सिर्फ 10 महीनों में उसका वार्षिक आवर्ती राजस्व (ARR) $1.1 मिलियन तक पहुंच गया। 2025 में यूजर्स ने करीब 4 लाख इनवाइट्स भी भेजे।

क्या डिजिटल दौर में असली लोगों की जरूरत बढ़ रही है?

Clockout का मॉडल इस बड़े सवाल के बीच आया है कि ऑनलाइन कनेक्शन बढ़ने के बावजूद युवा पेशेवर अकेलापन क्यों महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में Gallup के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2025 में 35 साल से कम उम्र के करीब 22% कर्मचारियों ने अकेलापन महसूस किया। फिलहाल Clockout फ्रीमियम मॉडल पर काम करता है। अतिरिक्त फीचर्स और क्लबों व इवेंट्स तक अनलिमिटेड पहुंच के लिए सालाना $99 की सदस्यता उपलब्ध है।

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कभी ₹3,000 महीना कमाते थे पवन, आज ₹58 लाख सालाना की नौकरी, NIT छोड़कर ऐसे बनाई पहचान

कभी आर्थिक तंगी के चलते NIT की पढ़ाई छोड़ने वाला एक युवक आज अपनी कमाई को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में है। पवन चिंडकुर ने NIT आंध्र प्रदेश में B.Tech ECE की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन परिवार की खराब आर्थिक स्थिति और पिता की तबीयत से जुड़ी परेशानियों के बीच उन्हें पहले ही साल पढ़ाई छोड़नी पड़ी। हालात ऐसे थे कि एक समय उन्होंने Uber ड्राइवर बनने तक का विचार किया। इसके बाद दोस्तों की सलाह पर लोन लेकर लैपटॉप खरीदा और YouTube से टेक्नोलॉजी सीखना शुरू किया।

Reddit और Discord जैसी ऑनलाइन कम्युनिटीज से जुड़कर उन्होंने अपनी स्किल्स को निखारा और ₹3,000 महीने की नौकरी से शुरुआत की।  धीरे-धीरे उनकी कमाई बढ़ती गई और अब रिपोर्ट के मुताबिक वह करीब ₹58 लाख सालाना की रिमोट नौकरी कर रहे हैं। उनकी कहानी ने सोशल मीडिया पर पढ़ाई, स्किल्स और करियर के रास्तों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

परिवार की हालत ने बदल दी पढ़ाई की राह

COVID-19 महामारी के दौरान पवन के परिवार की आर्थिक स्थिति काफी मुश्किल हो गई थी। उनके पिता ऑटो चलाते थे और उस दौरान उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए पवन ने NIT आंध्र प्रदेश में B.Tech ECE की पढ़ाई पहले साल के बाद छोड़ दी। उस समय उनके सामने आगे पढ़ने से ज्यादा जरूरी परिवार को संभालना था।

कभी Uber ड्राइवर बनने का भी आया ख्याल

पढ़ाई छोड़ने के बाद पवन के सामने करियर को लेकर कोई आसान रास्ता नहीं था। एक समय उन्होंने Uber ड्राइवर बनने तक के बारे में सोचा। लेकिन दोस्तों की सलाह ने उनकी दिशा बदल दी। उन्होंने लोन लेकर एक लैपटॉप खरीदा और YouTube के जरिए टेक्नोलॉजी सीखना शुरू कर दिया।

YouTube से शुरू हुई असली तैयारी

पवन ने सिर्फ वीडियो देखकर सीखने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने Reddit और Discord जैसी ऑनलाइन कम्युनिटीज से जुड़कर अपनी स्किल्स पर काम करना शुरू किया। इसी दौरान उन्हें पहली नौकरी मिली, जहां उनकी कमाई महज ₹3,000 प्रति माह थी। छोटी शुरुआत के बावजूद उन्होंने सीखना और काम करना जारी रखा।

₹3,000 से ₹60 हजार महीना

करियर में अगला बड़ा मोड़ तब आया, जब पवन ने दुबई की एक स्टार्टअप कंपनी जॉइन की। यहां उनकी कमाई बढ़कर करीब ₹60,000 प्रति माह हो गई। इसके बाद LinkedIn पर बने एक कनेक्शन ने उन्हें Cactro में नौकरी दिलाने में मदद की। यहां उनकी मासिक सैलरी करीब ₹1.2 लाख तक पहुंच गई।

फिर आया ₹58 लाख वाला बड़ा ब्रेक

पवन की सबसे बड़ी छलांग इसके बाद लगी। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने Lingk.io में रिमोट रोल हासिल किया, जहां उनका सालाना पैकेज करीब ₹58 लाख बताया जा रहा है। उनकी कहानी को शेयर करने वाले पोस्ट में इसे एक लाइन में समेटा गया “Skills >>>>>> Traditional Path.”

क्या डिग्री से ज्यादा जरूरी हैं स्किल्स?

पवन की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर शिक्षा और करियर को लेकर बहस छिड़ गई। कई लोगों ने कहा कि सेल्फ-लर्निंग, प्रैक्टिकल स्किल्स और नेटवर्किंग भी करियर बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि, कुछ यूजर्स ने यह भी याद दिलाया कि पवन का मामला एक असाधारण उदाहरण है और इसे हर छात्र के लिए पारंपरिक कॉलेज शिक्षा का विकल्प नहीं माना जा सकता।

सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

एक यूजर ने पवन की सफलता की तारीफ करते हुए NIT आंध्र प्रदेश के 2025 NIRF आंकड़ों का संदर्भ दिया और कहा कि पवन की कमाई एक आउटलेयर उदाहरण है। वहीं दूसरे यूजर ने उनकी लगातार सीखने की आदत और वास्तविक काम से जुड़ी स्किल्स की तारीफ की। एक अन्य प्रतिक्रिया में कहा गया कि कई बार स्किल्स ऐसे मौके खोल सकती हैं, जो पारंपरिक रास्ते से आसानी से नहीं मिलते।

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इंटरनेशनल ट्रेड शो में दिखाई दे रही यूपी की ताकत : मुख्यमंत्री योगी

इंटरनेशनल ट्रेड शो में दिखाई दे रही यूपी की ताकत : मुख्यमंत्री योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 25 से 29 सितंबर तक ग्रेटर नोएडा में आयोजित इंटरनेशनल ट्रेड शो (यूपीआईटीएस-2026) में उत्तर प्रदेश की ताकत दिखाई दे रही है। यहां उत्तर प्रदेश में निर्मित तमाम उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है, जिसमें गोरखपुर के टेराकोट उत्पाद भी शामिल हैं। रविवार को वहां 1.5 लाख से अधिक लोग आए, सोमवार को भी भारी भीड़ उमड़ी है। इस ट्रेड शो में 90 देशों के खरीदार पहुंचे हैं, जो यूपी की सामर्थ्य दिखाता है। शो में शिल्पकारों के उत्पादों की बिक्री और उनकी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

 

सीएम योगी सोमवार को गोरखपुर में एक मीडिया समूह द्वारा आयोजित बाल मेला सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे। दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा कि 2017 के पहले भी उत्तर प्रदेश के पास सामर्थ्य था, लेकिन नेतृत्व के पास इच्छाशक्ति नहीं थी। इसके परिणामस्वरूप यूपी बीमारू और बदनाम प्रदेश बनकर रह गया था। इसे देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता था। किंतु, बीते साढ़े नौ सालों में सम-विषम परिस्थितियों में नेतृत्व के जूझने और अनथक प्रयास का परिणाम है कि उत्तर प्रदेश आज बीमारू की छवि से उबरकर देश की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बन चुका है।

चुनौतियों से जूझकर किए हर क्षेत्र में रिफॉर्म

मुख्यमंत्री ने कहा कि साढ़े नौ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश में कई चुनैतियां थीं। बाहर के लोग यूपी का नाम सुनकर चौंकते थे। पहचान का संकट ऐसा था कि युवाओं के लिए राज्य, देश या विदेश में नौकरी नहीं थी। कर्फ्यू-दंगे प्रदेश की नियति बन गए थे। पुलिस में दो लाख पद खाली थे तो कानून व्यवस्था कैसे ठीक रहती। सरकार में आने के बाद हमने हर क्षेत्र में रिफॉर्म किए। युवाओं के हित में सरकार ने न केवल भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया, बल्कि प्रशिक्षण और इससे जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी आगे बढ़ाया। साढ़े नौ सालों में प्रदेश सरकार ने शुचिता व पारदर्शिता के साथ 9.5 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी है। इसमें अकेले यूपी पुलिस में 2 लाख 30 हजार नौकरियां दी गईं। 

कर्फ्यू-दंगे से मुक्त होकर तेजी से बढ़ी अर्थव्यवस्था

मुख्यमंत्री ने कहा कि बीते साढ़े नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था तीन गुना बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय में भी तीन गुना वृद्धि हुई है। कभी बीमारू के तमगे वाला प्रदेश अब देश की टॉप-थ्री इकॉनमी में है। कर्फ्यू-दंगे से मुक्त होने के बाद यूपी तेज प्रगति की वजह से देश की अर्थव्यवस्था और प्रगति का ग्रोथ इंजन कहला रहा है। यूपी वही है, लेकिन प्रयास से परिणाम की यात्रा में बदलाव हर क्षेत्र में देखने को मिल रहा। 2017  से पहले राज्य में सिर्फ 130 स्टार्टअप थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 24 हजार से अधिक हो चुकी है। 

कविता सुनाकर बोले सीएम- प्रयास से ही मिलेगी मंजिल

समारोह में विद्यार्थियों को शिक्षक व अभिभावक की तरह समझाते हुए सीएम योगी ने कहा कि किसी प्रतियोगिता में पदक जीतने से पहले सबसे महत्वपूर्ण प्रतिभाग करना है। उन्होंने महान कवि सोहनलाल द्विवेदी की कविता, ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ सुनाते हुए कहा कि सबसे जरूरी है प्रयास करना, क्योंकि प्रयास ही मंजिल तक पहुंचाएगा। मुख्यमंत्री ने बच्चों को प्रेरित करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का भी उदाहरण दिया। कहा कि डॉ. कलाम फाइटर पायलट बनना चाहते थे, लेकिन फेल होने पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। परिवार में कम साधन होने के बावजूद वह भारत के मिसाइल मैन बने। राष्ट्रपति बनने के पहले उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न मिला। सीएम ने विद्यार्थियों को सीख दी कि वे अपने हौसलों को कभी कमजोर न होने दें। जो ठान लेता है, वही करके भी दिखाता है। इसलिए जीवन में कभी हिम्मत नहीं हारना है। 

500 खिलाड़ियों के लिए सीधी भर्ती अगले सप्ताह से

मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को खेल क्षेत्र में भी बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा कि सरकार शिक्षा, तकनीक, स्टार्टअप के साथ ही खेलों को भी बढ़ावा दे रही है। ओलंपिक, एशियाड, कामनवेल्थ गेम्स में पदक विजेता को खूब नकद पुरस्कार देने साथ ही उन्हें सीधे सरकारी नौकरी दी जा रही है। अब तक 550 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी दी गई है। अगले सप्ताह 500 और खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी की सीधी भर्ती शुरू होगी।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने सभी उपस्थितजन को पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, यातायात नियमों के पालन और नशे से दूर रहने की शपथ दिलाई तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया। इस अवसर पर सांसद रविकिशन शुक्ल, महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव, विधायक विपिन सिंह, मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा शर्मा कौशिक, दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ओपी सिंह आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

कानपुर में 96 करोड़ की लागत से तैयार हुआ पहला कन्वेंशन सेंटर, लेदर और टेक्सटाइल हब को मिला नया मंच, जानिए खासियतें

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर के उद्यमियों के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक खुशखबरी सामने आई है। शहर में पहला भव्य कन्वेंशन सेंटर बनकर पूरी तरह तैयार हो चुका है, जो यहां के औद्योगिक कारोबार को एक नई वैश्विक पहचान देने जा रहा है। 96.10 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह कन्वेंशन सेंटर महज एक भव्य इमारत नहीं है, बल्कि कानपुर के लेदर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और प्लास्टिक जैसे तमाम बड़े उद्योगों के लिए व्यापार विस्तार का एक नया और विशाल प्लेटफॉर्म साबित होगा।

अब तक कानपुर में ऐसी किसी आधुनिक संरचना का अभाव था, जहां बड़े स्तर के ट्रेड फेयर, एक्सपो, प्रोडक्ट लॉन्च, बिजनेस कॉन्फ्रेंस और B2B (बिजनेस-टू-बिजनेस) मीटिंग्स का आयोजन एक साथ किया जा सके। इसके चलते स्थानीय उद्यमियों को अपने उत्पादों की नुमाइिश लगाने या विदेशी खरीदारों से बैठक करने के लिए दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों का रुख करना पड़ता था। अब इस कन्वेंशन सेंटर के शुरू होने से कानपुर के व्यापारियों को देश-विदेश के सप्लायरों, डीलरों, निवेशकों और खरीदारों को सीधे अपने ही शहर में आमंत्रित करने का शानदार मौका मिलेगा।

एक्सपो से लेकर B2B मीटिंग तक, कानपुर बनेगा नया बिजनेस डेस्टिनेशन

कानपुर की पहचान लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन के एक मजबूत केंद्र के रूप में रही है, लेकिन बड़े व्यावसायिक आयोजनों के हिसाब से इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी हमेशा खटकती थी। यह नया कन्वेंशन सेंटर इसी कमी को हमेशा के लिए दूर करने का काम करेगा।

इस सेंटर में अब लेदर फेयर, फुटवियर एक्सपो, टेक्सटाइल शो, इंजीनियरिंग व मशीनरी प्रदर्शनी, स्टार्टअप इवेंट्स, निवेशक सम्मेलन और कॉर्पोरेट B2B मीटिंग्स का आसानी से संचालन किया जा सकेगा। इससे एक ही छत के नीचे उत्पादों के प्रदर्शन, खरीदारों से संवाद और मौके पर ही कारोबारी सौदे फाइनल करने का पूरा सिस्टम काम करेगा। विशेष रूप से निर्यात आधारित (एक्सपोर्ट ओरिएंटेड) उद्योगों के लिए यह व्यवस्था कारगर साबित होगी, क्योंकि विदेशी बायर्स अब सीधे कानपुर आकर उत्पादों की गुणवत्ता देख सकेंगे और नए ऑर्डर दे सकेंगे।

होटल से लेकर ट्रांसपोर्ट तक, पूरे सर्विस सेक्टर को मिलेगा बड़ा आर्थिक लाभ

कन्वेंशन सेंटर का सकारात्मक प्रभाव केवल एक्सपो लगाने वाले उद्योगपतियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका बड़ा आर्थिक लाभ शहर के पूरे सर्विस सेक्टर को मिलेगा। जब देश और दुनिया भर से खरीदार, उद्यमी और व्यापारी आयोजनों में शामिल होने कानपुर आएंगे, तो शहर के होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी और ट्रांसपोर्ट सेवाओं की मांग में भारी उछाल आएगा।

इसके साथ ही इवेंट मैनेजमेंट, प्रिंटिंग, विज्ञापन और स्थानीय खान-पान से जुड़ी गतिविधियों को भी अतिरिक्त काम मिलेगा। यह कन्वेंशन सेंटर एक तरफ जहां स्थानीय उद्योगों को सीधा बाजार उपलब्ध कराएगा, वहीं दूसरी तरफ अप्रत्यक्ष रूप से कानपुर की पूरी अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसरों को मजबूत गति प्रदान करेगा।

औद्योगिक विकास का मील का पत्थर: जानिए अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय

काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट के वाइस चेयरमैन मुख्तारुल अमीन ने इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि यह कन्वेंशन सेंटर कानपुर की औद्योगिक ग्रोथ के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानपुर में विभिन्न क्षेत्रों के उद्योग बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं, लेकिन अपने उत्पादों के प्रदर्शन और विदेशी खरीदारों से सीधे संवाद के लिए शहर में ऐसी आधुनिक सुविधा नहीं थी। अब कन्वेंशन सेंटर शुरू होने से उद्योगों को अपने ही घर में एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मंच मिल गया है।

कानपुर मंडल के मंडलायुक्त एवं डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज विजयंत पांडियन ने बताया कि कन्वेंशन सेंटर के बन जाने से शहर में बड़े एक्सपो और बिजनेस मीट आयोजित करने का रास्ता साफ हो गया है। उन्होंने कहा कि शहर को लंबे समय से इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की दरकार थी। हालांकि सेंटर के निर्माण के बाद इसके संचालन की प्रक्रियाओं में थोड़ा समय लगा, लेकिन अब इसके शुरू होने से उद्यमियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी बड़ा फायदा मिलेगा और दूसरे बड़े शहरों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है कानपुर का कन्वेंशन सेंटर

96.10 करोड़ रुपये की परियोजना लागत से तैयार यह कन्वेंशन सेंटर विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस है। इसमें प्रदर्शनियों के लिए 16000 वर्गफुट और 12000 वर्गफुट के दो विशाल प्रदर्शनी हॉल बनाए गए हैं। इसके अलावा 300 लोगों की क्षमता वाला एक कॉन्फ्रेंस हॉल और 100-100 लोगों की क्षमता वाले 3 अलग-अलग मीटिंग रूम तैयार किए गए हैं।

बाहर से आने वाले विशेष मेहमानों और कारोबारियों के ठहरने के लिए परिसर में ही 6 अतिथि कमरे और 2 लग्जरी सुइट डेवलप किए गए हैं। खान-पान की बेहतरीन व्यवस्था के लिए 8,000 वर्गफुट में फैला एक बड़ा फूड कोर्ट बनाया गया है, जबकि वाहनों की सुविधा के लिए 68 गाड़ियों की क्षमता वाली कवर्ड पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। एक्सपो, ट्रेड फेयर, बिजनेस मीटिंग, कॉन्फ्रेंस और प्रोडक्ट लॉन्च जैसे बड़े आयोजनों के लिए अब यह केंद्र कानपुर की नई पहचान बनने जा रहा है।

(कानपुर से अखंड प्रताप सिंह की रिपोर्ट)

ISRO Roadmap: 2028 तक लॉन्च होगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल, इसरो का मून प्लान जानिए

ISRO Roadmap Bharatiya Antariksh Station:  चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अब स्पेस टेक्नोलॉजी के एक नए और महत्वाकांक्षी युग में प्रवेश करने की तैयारी में है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब सिर्फ रॉकेट लॉन्चिंग और उपग्रह भेजने तक सीमित नहीं है बल्कि इसका मुख्य फोकस अब मानव अंतरिक्ष उड़ान (ह्यूमन स्पेसफ्लाइट), भारत का अपना स्पेस स्टेशन, चंद्रमा से मिट्टी व पत्थरों के सैंपल वापस लाना और साल 2040 तक चांद पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजने पर है।

IIT दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ISRO के चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ वी नारायणन ने भारत के भावी अंतरिक्ष रोडमैप, आगामी बड़े मिशनों और इस क्षेत्र में हो रहे ऐतिहासिक बदलावों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की।

440 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप कर रहे हैं काम

भारत के स्पेस सेक्टर में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी संस्थानों के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी है। डॉ नारायणन के कहा कि 2020 में स्पेस सेक्टर रिफॉर्म्स के बाद देश में करीब 440 स्पेस स्टार्टअप चल रहे हैं। कंपनियों को सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल, स्पेस एप्लीकेशन और दूसरी नई टेक्नोलॉजी से जुड़े एरिया में काम करने के मौके बढ़े हैं। नतीजतन भारत का प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम भी ISRO के बड़े मिशन के साथ-साथ डेवलप हो रहा है।

भारत ने खुद डेवलप किया क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी

स्पेस सेक्टर में भारत की आत्मनिर्भरता का एक उदाहरण देते हुए डॉ नारायणन ने क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में भारत को यह टेक्नोलॉजी नहीं दी गई थी। इसके बाद ISRO ने इस टेक्नोलॉजी को देश में ही डेवलप करने पर काम किया। भारत ने अब तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम डेवलप कर लिए हैं। इसका मतलब है कि भारत ने अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी में अपनी क्षमताएं डेवलप कर ली हैं जिसके लिए पहले दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह क्षमता भविष्य के बड़े और भारी स्पेस मिशन के लिए भी बहुत जरूरी होगी।

अब चंद्रयान-4 की तैयारी

23 अगस्त 2023 भारत के स्पेस प्रोग्राम के लिए एक अहम दिन था। चंद्रयान-3 ने चांद के साउथ पोलर रीजन के पास सक्सेसफुली सॉफ्ट-लैंडिंग की। इसके बाद ISRO अब चांद के सैंपल धरती पर वापस लाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ नारायणन ने चंद्रयान-4 को इस बड़े लक्ष्य से जोड़ा और बताया कि इसका मकसद चांद के सैंपल निकालकर उन्हें धरती पर वापस लाना है। इसके अलावा भारत ने स्पेस में डॉकिंग टेक्नोलॉजी को सक्सेसफुली दिखाया। इस टेक्नोलॉजी को भविष्य के स्पेस स्टेशन और दूसरे मुश्किल मिशन के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।

गगनयान के बाद भारतीय स्पेस स्टेशन

भारत का अगला बड़ा कदम इंसानों को स्पेस में भेजना है। ISRO गगनयान मिशन के तहत इंसानों को स्पेसफ्लाइट भेजने की तैयारी कर रहा है। अभी बिना पायलट वाली उड़ानों के जरिए मिशन की तैयारियों को आगे बढ़ा रहा है। भारत अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भी डेवलप कर रहा है। डॉ. नारायणन के मुताबिक, स्टेशन का पहला मॉड्यूल 2028 तक लॉन्च करने का प्लान है। आने वाले सालों में दूसरे मॉड्यूल भी जोड़े जाएंगे। इसका लक्ष्य 2035 तक इसे डेवलप करना है। यह भारत के लिए न सिर्प एक साइंटिफिक मिशन होगा बल्कि स्पेस में लंबे समय तक रिसर्च और टेक्नोलॉजी करने की क्षमता बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

2040 तक चंद्रमा पर इंसान भेजने का प्लान

ISRO का रोडमैप सिर्फ लूनर मिशन तक ही खत्म नहीं होता है। भारत 2040 तक चांद पर ह्यूमन मिशन की दिशा में भी काम कर रहा है। इसके अलावा वीनस मिशन और नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर भी काम चल रहा है। डॉ नारायणन ने कहा कि ISRO एक नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर काम कर रहा है जो लो अर्थ ऑर्बिट में 30,000 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है। पार्शियली रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल सिस्टम पर भी काम चल रहा है।

स्पेस इकोनॉमी के लिए क्यों अहम है यह मिशन?

डॉ नारायणन ने कहा कि गगनयान, स्पेस स्टेशन, चंद्रयान-4, और भविष्य के बड़े लॉन्च व्हीकल सिर्फ साइंटिफिक उपलब्धियां नहीं हैं। वे प्राइवेट कंपनियों के लिए नई टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और काम के नए एरिया भी शुरू कर सकते हैं।जैसे-जैसे स्पेस मि न की संख्या और कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ेगी वैसे ही लॉन्च सिस्टम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, स्पेस कम्युनिकेशन, डेटा और दूसरे स्पेस एप्लीकेशन से जुड़े एरिया में भी एक्टिविटी बढ़ेगी। यही वजह है कि स्पेस सेक्टर में सुधारों के बाद भारत में स्टार्टअप्स की बढ़ती संख्या को अहम माना जा रहा है। आने वाले सालों में ISRO के सरकारी मिशन के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों की भूमिका कैसे बढ़ती है, यह भारत की स्पेस इकॉनमी के विकास के लिए बहुत जरूरी होगा।

(दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट)

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दो दोस्तों ने अचार बेच खड़ा किया 80 करोड़ का कारोबार! जानें कैसे बदली किस्मत

मेरिका में दो दोस्तों का अचार से जुड़े वीडियो बनाने का शौक करोड़ों के बिजनेस में बदल गया। दोनों पहले सोशल मीडिया पर अचार के वीडियो बनाकर शेयर करते थे। लोगों को उनके वीडियो पसंद आने लगे और धीरे-धीरे उनकी पहचान बढ़ गई। इसके बाद दोनों ने नौकरी छोड़कर अपना फूड स्टार्टअप शुरू किया। आज उनका अचार ब्रांड बड़े रिटेल स्टोर्स तक पहुंच चुका है और कंपनी अब अचार से आगे नए फूड प्रोडक्ट्स लॉन्च करने की तैयारी में है। आज उनका यह कारोबार 80 करोड़ रुपये से ज्यादा का बन चुका है।

लीह मार्कस और यासमन बख्तियार ने 2023 में TikTok पर अचार से जुड़े वीडियो शेयर करना शुरू किया। लोगों की बढ़ती दिलचस्पी देखकर दोनों ने नौकरी छोड़कर अपना फूड ब्रांड शुरू करने का फैसला किया। आइए जानते हैं क्या है पूरी कहानी

कैसे शुरू किया अचार बिजनेस

लीह मार्कस और यासमन बख्तियार के स्टार्टअप ‘गुड गर्ल स्नैक्स’ ने फरवरी 2024 में ‘हॉट गर्ल पिकल्स’ नाम से अपना अचार ब्रांड शुरू किया। ‘हॉट गर्ल पिकल्स’ को फरवरी 2024 में बाजार में उतारा गया था। शुरुआत में कंपनी ने अपनी वेबसाइट के जरिए सीधे ग्राहकों तक अचार पहुंचाया। ब्रांड का नाम और उसकी पहचान बनाने में सोशल मीडिया पर चलने वाले ट्रेंड्स का भी असर रहा। सीधे ग्राहकों को ऑनलाइन अचार बेचने से फाउंडर्स को यह समझने का मौका मिला कि उनके प्रोडक्ट को लोग कितना पसंद कर रहे हैं। उनके पोडक्ट पर किस तरह का रिस्पॉन्स मिल रहा है। इस अनुभव के बाद कंपनी ने बड़े रिटेल स्टोर्स में विस्तार किया।

बड़े स्टोर तक पहुंच रहा कारोबार

लॉस एंजिल्स की यह कंपनी ऑनलाइन बिक्री से शुरू होकर अब बड़े स्टोर्स तक पहुंच गई है। कंपनी के कारोबार ने अब बड़ा विस्तार कर लिया है। ‘हॉट गर्ल पिकल्स’ की बिक्री वेबसाइट के अलावा होल फूड्स मार्केट और इरेवन जैसे स्टोर्स में भी होने लगी है। ग्राहकों की सुविधा के लिए कंपनी ने छोटे ग्रैब-एंड-गो पैक भी बाजार में उतारे हैं। अब लोग पारंपरिक जार के साथ इन छोटे पैकेट्स में भी अचार खरीद सकते हैं। कंपनी युवाओं को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग फ्लेवर और आकर्षक पैकेजिंग पर फोकस कर रही है। CNBC Make It की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने 30 लाख डॉलर की सीड फंडिंग जुटाई है और हाल ही में इसकी अनुमानित वैल्यू 85 लाख डॉलर यानी करीब 81.4 करोड़ रुपये आंकी गई।

लोगों से ली मदद

अचार के कारोबार को शुरू करने के लिए लीह मार्कस और यासमन बख्तियार ने कई लोगों से मदद और सलाह ली। उन्होंने USC के कुछ दोस्तों से बिजनेस के बारे में सीखा और LinkedIn के जरिए इंडस्ट्री के लोगों से फंडिंग, कामकाज और सामान की सप्लाई की जानकारी जुटाई। शुरुआत में दोनों ने दोस्तों और परिवार की मदद से कंपनी के लिए पैसे जुटाए। लीह मार्कस और यासमन बख्तियार ने अपने परिवार और संस्कृति से जुड़े स्वाद को अचार में शामिल किया है। दोनों के परिवारों पर पर्शियन, इजिप्शियन और ट्यूनीशियाई खाने का असर रहा है। अब वे अचार के अलावा नए स्नैक्स और दूसरे फूड प्रोडक्ट्स भी लॉन्च करना चाहते हैं, जिन्हें युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा।