Siddharth Saxena: कौन हैं सिद्धार्थ सक्सेना? जिन्होंने 26 साल की उम्र में एक दिन में कमाए 76.99 करोड़ रुपये!

Who is Siddharth Saxena: इंटरनेट और सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भारतीय टेक एंटरप्रेन्योर की कहानी तेजी से वायरल हो रही है। इस शख्स का नाम है सिद्धार्थ सक्सेना। इन्होंने हाल ही में खुलासा किया है कि उन्होंने महज 26 साल की उम्र में एक ही दिन में 8 मिलियन डॉलर (करीब 76.99 करोड़ रुपये) की कमाई की थी। कंटेंट क्रिएटर विराज अला के साथ हुए एक स्ट्रीट इंटरव्यू में सिद्धार्थ ने भारत के एक छोटे से शहर से अमेरिका में मल्टी-मिलियन डॉलर की कंपनियां खड़ी करने तक के अपने इस शानदार सफर के बारे में खुलकर बात की है। आइए जानते हैं कि कौन हैं सिद्धार्थ सक्सेना और उन्होंने यह मुकाम कैसे हासिल किया।

IIT कानपुर से की पढ़ाई, बोले- हार्वर्ड से 20 गुना मुश्किल है एडमिशन

विराज अला को दिए इंटरव्यू में सिद्धार्थ सक्सेना ने अपनी पढ़ाई और करियर के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं। सिद्धार्थ ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बी. टेक की डिग्री हासिल की है। वह साल 2019 में आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट हुए थे। इंटरव्यू के दौरान सिद्धार्थ ने दावा किया कि आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस प्रोग्राम में दाखिला पाना अमेरिका की प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलने से 20 गुना ज्यादा कठिन है।

एक दिन में ₹76.99 करोड़ की कमाई का सच

जब इंटरव्यूअर विराज अला ने सिद्धार्थ से पूछा कि उन्होंने एक साल में अधिकतम कितनी कमाई की है, तो सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि उन्होंने एक ही दिन में 8 मिलियन डॉलर (लगभग 76.99 करोड़ रुपये) कमाए हैं। इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब यह है कि वह रातों-रात करोड़पति बन गए, तो उन्होंने कहा कि हां, कुछ ऐसा ही कह सकते हैं। उन्होंने महज 26 साल की उम्र में यह मुकाम हासिल कर लिया था। सिद्धार्थ ने बताया कि जब वह 16 साल के थे तब उन्होंने अपने भविष्य में इस तरह की सफलता की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की थी।

कैसा रहा है सिद्धार्थ का करियर और बिजनेस?

आईआईटी कानपुर से 2019 में पास आउट होने के बाद सिद्धार्थ ने मशीन लर्निंग इंजीनियर के रूप में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम किया। उनके करियर के सफर में Envestnet, Yodlee, Wadhwani AI जैसी कंपनियों और एल्टो यूनिवर्सिटी, जूमियो कॉर्पोरेशन जैसे संस्थान रहे।

Merlin और Thine के को-फाउंडर

नौकरी के बाद सिद्धार्थ ने एंटरप्रेन्योरशिप की राह चुनी। साल 2022 में सिद्धार्थ ने अपने आईआईटी कानपुर के बैचमेट्स प्रत्यूष राय और शीर्षेंदु सरकार के साथ मिलकर Merlin नाम की एक एआई-पावर्ड क्रोम एक्सटेंशन कंपनी की सह-स्थापना की। रिपोर्ट्स के मुताबिक आज इस कंपनी की वैल्यूएशन लगभग 50 मिलियन डॉलर (करीब 418 करोड़ रुपये से अधिक) है। इसके अलावा सिद्धार्थ एक दूसरे स्टार्टअप Thine के भी को-फाउंडर हैं।

स्टार्टअप्स को लेकर क्या है उनकी सोच?

स्टार्टअप और बिजनेस को लेकर सिद्धार्थ का मानना है कि भारत में सीमित संसाधनों की वजह से बहुत से लोग स्कार्सिटी माइंडसेट (कमी की सोच/सुरक्षित चलने की मानसिकता) के साथ बड़े होते हैं। उनका कहना है कि सफल उद्यमी बनने के लिए इस मानसिकता को बदलकर अबंडेंस माइंडसेट (प्रचुरता की सोच) अपनाना बेहद जरूरी है, जहां लोग खुलकर जोखिम लेने और नए अवसरों की तलाश करने के लिए तैयार रहें।

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सिद्धार्थ ने दोनों देशों के वर्क-कल्चर की तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका में लोग अक्सर काम को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे उसे पसंद करते हैं जबकि भारत में कई बार लोग मजबूरी या जरूरत की वजह से काम करते हैं।

Shadowfax Technologies में हो सकती है ब्लॉक डील, ₹700 करोड़ के शेयर बेचने की तैयारी में Flipkart

ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप शैडोफैक्स टेक्नोलोजिज में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेच रही है। इस हिस्सेदारी की कीमत 700-750 करोड़ रुपये हो सकती है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने मनीकंट्रोल को बताया, “फ्लिपकार्ट जुलाई महीने के आखिर में एक बड़ी ब्लॉक डील के तहत शैडोफैक्स में शेयर बेच सकती है। शैडोफैक्स के शेयरहोल्डर्स के​ लिए 6 महीने का लॉक-इन पीरियड जुलाई के आखिर में खत्म हो रहा है।”

शैडोफैक्स टेक्नोलोजिज जनवरी 2026 में शेयर बाजारों में लिस्ट हुई थी। इसका IPO ₹1,907.27 करोड़ का था। फ्लिपकार्ट ने शैडोफैक्स के IPO में ऑफर-फॉर-सेल (OFS) के तहत कुछ शेयर बेचे और शैडोफैक्स में अपनी हिस्सेदारी घटाकर लगभग 8 प्रतिशत कर ली। उसके पास अभी भी लगभग 4.26 करोड़ शेयर हैं। शैडोफैक्स के शेयर की कीमत फिलहाल 230 रुपये के आसपास ट्रेड कर रही है।

फ्लिपकार्ट ने पहली बार 2019 में शैडोफैक्स में निवेश किया था और बाद के फंडिंग राउंड में भी इस लॉजिस्टिक्स कंपनी को सपोर्ट किया। आज शैडोफैक्स, फ्लिपकार्ट के मुख्य लास्ट-माइल डिलीवरी पार्टनर्स में से एक है। यह हाइपरलोकल और ई-कॉमर्स शिपमेंट संभालती है, खासकर पीक डिमांड के समय जब कंपनी का अपना लॉजिस्टिक्स नेटवर्क दबाव में होता है। साथ ही यह उन कई कारोबारों के लिए मुख्य डिलीवरी पार्टनर के तौर पर भी काम करती है, जो पूरी तरह से थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं।

पूरी हिस्सेदारी नहीं बेच सकती फ्लिपकार्ट

सूत्रों ने मनीकंट्रोल को बताया कि फ्लिपकार्ट एक बड़ी ब्लॉक डील के तहत 700-750 करोड़ रुपये के शेयर बेच सकती है। यह डील आने वाले हफ्तों में होने की उम्मीद है। हालांकि फ्लिपकार्ट, शैडोफैक्स में अपनी पूरी हिस्सेदारी नहीं बेच सकती। मौजूदा 4.26 करोड़ शेयरों में से, फ्लिपकार्ट के लगभग 3.37 करोड़ शेयर बेचने की संभावना है। अगर यह डील हो जाती है, तो फिर फ्लिपकार्ट के पास शैडोफैक्स में लगभग 2 प्रतिशत हिस्सेदारी रह जाएगी। बाकी बचे 89 लाख शेयर फ्लिपकार्ट को अपने पास रखने होंगे क्योंकि वे ‘मिनिमम प्रमोटर कॉन्ट्रीब्यूशन’ का हिस्सा हैं।

मिनिमम प्रमोटर कॉन्ट्रीब्यूशन वह न्यूनतम हिस्सेदारी है, SEBI किसी IPO के बाद लॉक-इन रखने के लिए जरूरी मानता है। ऐसा इसलिए ताकि यह पक्का किया जा सके कि प्रमोटर्स का कंपनी में लंबे समय तक हित बना रहे और पब्लिक इनवेस्टर्स को भरोसा दिलाया जा सके कि मुख्य शेयरधारक लिस्टिंग के तुरंत बाद बाहर नहीं निकल सकते। इन शेयरों पर एक अनिवार्य लॉक-इन पीरियड लागू होता है, जो कि आमतौर पर 18 महीने होता है। इस दौरान इन्हें बेचा नहीं जा सकता।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

यूरोप की सिलिकॉन वैली बना विलनियस:शहर की आबादी 29 लाख, 6 यूनिकॉर्न काम कर रहीं; स्टार्टअप के मामले में दुनिया में 13वें नंबर पर

सुबह के करीब दस बजे हैं। लिथुआनिया की राजधानी विलनियस की साइबर सिटी में कांच की ऊंची इमारतों के बीच तेज कदमों से युवा प्रोफेशनल्स गुजर रहे हैं। एक तरफ नॉर्ड सिक्योरिटी जैसे दुनियाभर में मशहूर यूनिकॉर्न का दफ्तर है, तो कुछ ही कदम पर हॉस्टिंगर का। हॉस्टिंगर यानी एक ऐसा स्टार्टअप जिसके यूजर 150 से ज्यादा देशों में हैं। यहां फ्यूचर, एआई और स्टार्टअप जैसे शब्द हर बातचीत में सुनाई देते हैं। विलनियस को अब यूरोप की ‘सिलिकॉन वैली’ भी कहा जाने लगा है। यूरोप के इस छोटे से देश लिथुआनिया की आबादी मात्र 29 लाख के करीब है, लेकिन यहां हजारों स्टार्टअप काम कर रहे हैं। आकार और आबादी में भले ही यह देश छोटा है, लेकिन सोच बड़ी और ग्लोबल है। यूनिकॉर्न लिथुआनिया की सीईओ गिन्तारे वेरबिकाइते बताती हैं कि आज विलनियस यूरोप की सबसे तेजी से बढ़ती स्टार्टअप सिटी है। इस मामले में दुनिया में भी ये 13वें नंबर पर है। यहां कारोबार स्थानीय नहीं, वैश्विक सोच के साथ शुरू होता है। यहां के लोग कहते हैं कि जब हम कोई स्टार्टअप शुरू करते हैं तो उसे दुनिया की समस्याओं और जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाते हैं, क्योंकि हम सिर्फ लिथुआनिया तक सीमित रहना नहीं चाहते हैं। आबादी यानी प्रति व्यक्ति के हिसाब से लिथुआनिया दुनिया के सबसे अधिक यूनिकॉर्न स्टार्टअप वाले देशों में है। यहां विंटेड, नॉर्ड सिक्योरिटी, बीसीजी, फ्लो, कास्ट एआई और ऑक्सीलैब्स, छह यूनिकॉर्न कंपनियां हैं। विंटेड ने यूनिकॉर्न बिल्ड करने का एक अलग मॉडल पेश किया है। उसने पुराने कपड़े खरीदने और बेचने का ऑनलाइन मॉडल शुरू किया और वो यहां की पहली यूनिकॉर्न बनी। इन्वेस्ट लिथुआनिया की स्ट्रैटजिस्ट डायना गिरडेनाइट कहती हैं कि बढ़ती स्किल्ड वर्कफोर्स, फाइनेंशियल इन्सेंटिव और सरकार की नीतियां जैसे प्रमुख कारण हैं, जिनके कारण लिथुआनिया स्टार्टअप पावरहाउस बन रहा है। सीखने-सिखाने का कल्चर, भारत इनका बड़ा बाजार चार कारण… लिथुआनिया कैसे बन रहा स्टार्टअप पावरहाउस 1. तेजी से बढ़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम देश में 300 से ज्यादा फिनटेक कंपनियां काम कर रही हैं। 2020 से 2025 के बीच स्टार्टअप इकोसिस्टम का मूल्य 5.9 गुना बढ़कर करीब 1.56 लाख करोड़ रु. हो गया। 2025 में स्टार्टअप्स ने करीब 2400 करोड़ रु. की वेंचर कैपिटल जुटाई। 2. वैश्विक निवेशकों का भरोसा बढ़ा एक्सेल, जनरल कैटलिस्ट, इनसाइट पार्टनर जैसी विश्व की प्रमुख निवेशक कंपनियां, जिन्होंने फेसबुक, स्पाॅटिफाई, एयर बीएनबी जैसी कंपनियों में निवेश किया है, वे भी लिथुआनिया के स्टार्टअप्स में निवेश कर रही हैं। सार्वजनिक वाई-फाई स्पीड में लिथुआनिया पहले स्थान पर व साइबर सुरक्षा सूचकांक में छठे स्थान पर है। 3. एआई प्रतिभा से बनी मजबूत नींव देश में 77,600 से अधिक आईसीटी (सूचना और संचार तकनीक) विशेषज्ञ कार्यरत हैं। सरकार ने एआई विकास के लिए करीब 457 करोड़ रु. से अधिक का निवेश किया और 2018 में ही राष्ट्रीय एआई रणनीति लागू कर दी। 13 हजार छात्र आईसीटी की पढ़ाई कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर रीस्किलिंग कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। 4. कंपनी शुरू करना आसान यहां नई कंपनी का रजिस्ट्रेशन कुछ ही दिनों में हो जाता है। सरकारी प्रक्रियाएं सरल और ऑनलाइन होने से उद्यमियों का समय और लागत दोनों बचते हैं। कॉर्पोरेट प्रॉफिट टैक्स 0-16% के बीच, फ्री इकोनॉमिक जोन में पहले 10 वर्षों तक 0% टैक्स, RD प्रोत्साहन, पेटेंट बॉक्स, तेज लाइसेंसिंग प्रक्रिया, विश्वस्तरीय डिजिटल नेटवर्क और 2030 तक 100% रिन्यूएबल बिजली का लक्ष्य- ये तमाम ऐसे कारण हैं जिनके कारण निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।

16 साल की उम्र में क्रेक किया AIIMS एग्जाम, 22 साल की उम्र में बना IAS अधिकारी, नहीं भरा मन तो 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की खड़ी कर दी कंपनी

लाखों भारतीय छात्रों के लिए, AIIMS में दाखिला लेना या UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास करना जीवन भर का सपना होता है। ज़्यादातर छात्र इनमें से किसी एक लक्ष्य को पाने के लिए सालों तक तैयारी करते हैं। रोमन सैनी ने 23 साल की उम्र तक ये दोनों ही मुकाम हासिल कर लिए थे।

लेकिन भारत की सबसे प्रतिष्ठित सरकारी नौकरियों में से एक को चुनने के बजाय, उन्होंने एक ऐसा फैसला किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने एक एजुकेशन स्टार्टअप बनाने के लिए IAS की नौकरी छोड़ दी। यह कदम आगे चलकर एक ऐसी कंपनी में बदल गया जिसकी कीमत आज 2,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा है।

राजस्थान के जयपुर में एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्मे सैनी ने कम उम्र से ही पढ़ाई-लिखाई में अपनी काबिलियत दिखाई थी। 2008 में, उन्होंने सिर्फ़ 16 साल की उम्र में AIIMS की प्रवेश परीक्षा पास कर ली। उस समय, AIIMS की अपनी मेडिकल प्रवेश परीक्षा होती थी। 2020 में इसे नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) में मिला दिया गया।

उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई के लिए AIIMS नई दिल्ली में दाखिला लिया और 21 साल की उम्र तक अपना MBBS पूरा कर लिया। ग्रेजुएशन के बाद, उन्होंने उसी संस्थान में जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के तौर पर काम किया। मेडिकल के क्षेत्र में उनका करियर आगे बढ़ सकता था, लेकिन सैनी एक और चुनौती लेने के लिए तैयार थे।

उन्होंने देश की सबसे मुश्किल प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक, UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई। 22 साल की उम्र में, उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में परीक्षा पास कर ली और शानदार ऑल इंडिया रैंक (AIR) 18 हासिल की। ​​वे इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS) के 2014 बैच में शामिल हुए और उन्हें मध्य प्रदेश कैडर मिला।

कई उम्मीदवारों के लिए, IAS अफ़सर बनना ही आख़िरी मंज़िल होती है। लेकिन सैनी के लिए, यह बस एक और पड़ाव था। लगभग एक साल तक नौकरी करने के बाद, उन्होंने सिविल सर्विस छोड़ने और एक अलग लक्ष्य की ओर काम करने का फ़ैसला किया: पूरे भारत में छात्रों तक अच्छी क्वालिटी की शिक्षा पहुँचाना।

2015 में, उन्होंने इंजीनियर से यूट्यूबर बने गौरव मुंजाल और हेमेष सिंह के साथ मिलकर ‘अनएकेडमी’ (Unacademy) की शुरुआत की। सोच सीधी-सी थी: कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम की तैयारी करने वाले छात्र कोचिंग क्लास पर लाखों रुपये खर्च किए बिना टॉप एजुकेटर्स से सीख सकें।

यह वेंचर एक YouTube चैनल के तौर पर शुरू हुआ था, जिस पर मुफ़्त एजुकेशनल वीडियो मिलते थे। जैसे-जैसे ज़्यादा छात्र इस प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करने लगे, यह एक पूरी तरह से ऑनलाइन लर्निंग कंपनी बन गई, जिसमें UPSC, IIT-JEE, NEET और कई दूसरे कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम के लिए लाइव क्लास, रिकॉर्डेड लेक्चर, मॉक टेस्ट और कोर्स उपलब्ध थे।

जल्द ही अनएकेडमी एडटेक सेक्टर में भारत के सबसे बड़े नामों में से एक बन गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑनलाइन लर्निंग के दौर में इसने बड़े इन्वेस्टर्स को आकर्षित किया और इसकी वैल्यूएशन लगभग 28,700 करोड़ रुपये (3.44 बिलियन डॉलर) तक पहुँच गई थी। 2026 के मध्य तक, इसकी वैल्यूएशन लगभग 2,055 करोड़ रुपये है और कंपनी को upGrad द्वारा खरीदा जा रहा है।

सैनी का सफ़र हाल ही में X (पहले Twitter) पर फिर से चर्चा में आया, जहाँ लोगों ने न सिर्फ़ उनकी उपलब्धियों की तारीफ़ की, बल्कि उस हिम्मत की भी सराहना की जिसके तहत उन्होंने अपना रास्ता बदला, जबकि कई लोग सुरक्षित करियर में बने रहना पसंद करते।

एक यूज़र ने कमेंट किया, “अद्भुत कहानी। कभी-कभी रिस्क लेना फायदेमंद होता है।” एक और ने कहा, “यह इस बात का सबूत है कि सफलता का मतलब सिर्फ़ एक ही रास्ते पर चलना नहीं, बल्कि अपना रास्ता खुद बनाना है। रोमन सैनी के लिए बहुत सम्मान।”एक ने लिखा, “डॉक्टर, IAS, एंटरप्रेन्योर। हर पड़ाव पर खुद को नए सिरे से ढालने की हिम्मत बहुत कम लोगों में होती है।

एक महीने में भेजे 500 रिज्यूमे, नहीं आया एक भी कॉल, फ्रेशर्स की मुश्किलें आईं सामने

भारत में इंजीनियरिंग करने के बाद अच्छी नौकरी पाना आज कई युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी परेशानी को दिखाती है बेंगलुरु के एक बीटेक ग्रेजुएट की कहानी, जिसने नौकरी की तलाश में एक महीने के भीतर 500 से ज्यादा आवेदन भेजे, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उसे एक भी इंटरव्यू कॉल नहीं मिला। इस युवा इंजीनियर ने लिंक्डइन, अलग-अलग जॉब पोर्टल और कंपनियों की करियर वेबसाइटों पर लगातार प्रयास किया, लेकिन हर जगह से निराशा हाथ लगी।

उसका कहना है कि वो किसी बड़ी सैलरी या नामी कंपनी की तलाश में नहीं है, बल्कि सिर्फ एक ऐसा मौका चाहता है जहां वह काम सीख सके और अपने करियर की शुरुआत कर सके। उसकी पोस्ट ने सोशल मीडिया पर हजारों फ्रेशर्स की परेशानियों को उजागर कर दिया है।

बड़ी सैलरी नहीं, बस शुरुआत का एक मौका चाहिए

युवा इंजीनियर ने कहा कि उसका लक्ष्य किसी बड़ी कंपनी में भारी पैकेज हासिल करना नहीं है। वह सिर्फ ऐसा अवसर चाहता है जहां वह काम सीख सके, इंडस्ट्री का अनुभव हासिल कर सके और अपने करियर की मजबूत शुरुआत कर सके।

उसने लिखा कि वह किसी भी अच्छे टेक रोल, यहां तक कि शुरुआती दौर के स्टार्टअप में भी काम करने के लिए तैयार है, जहां उसे सीखने और योगदान देने का मौका मिले।

जब ऑनलाइन आवेदन भी बेअसर हुए तो रेडिट से मांगी मदद

लगातार कोशिशों के बाद जब कोई रास्ता नजर नहीं आया, तो इंजीनियर ने रेडिट पर अपनी परेशानी साझा की। उसने नौकरी देने वालों, स्टार्टअप फाउंडर्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से मदद की अपील की।

उसकी पोस्ट का शीर्षक था  “एक महीने में 500+ नौकरियों के लिए आवेदन किया, लेकिन एक भी इंटरव्यू नहीं मिला।”

पोस्ट वायरल होते ही कई फ्रेशर्स ने अपनी-अपनी परेशानियां साझा करनी शुरू कर दीं।

फ्रेशर्स की सबसे बड़ी चुनौती

कई यूजर्स ने कहा कि आज के समय में सिर्फ ऑनलाइन आवेदन करना काफी नहीं रह गया है। एक यूजर ने सलाह दी कि उम्मीदवारों को सीधे कंपनी के फाउंडर्स, एचआर या कर्मचारियों से संपर्क करने की कोशिश करनी चाहिए।

हालांकि, कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने भी ऐसा करके देखा, लेकिन 100 से ज्यादा एचआर को मैसेज करने के बाद भी उन्हें इंटरव्यू का मौका नहीं मिला।

स्किल्स हैं, फिर भी दरवाजे बंद हैं

एक कमेंट में एक टेक उम्मीदवार ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि उसके पास इंटर्नशिप अनुभव और कई आधुनिक टेक्नोलॉजी की जानकारी होने के बावजूद नौकरी पाना मुश्किल हो रहा है। उसने बताया कि वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एजेंट ऑर्केस्ट्रेशन, ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर, लैंगचेन और लैंगग्राफ जैसी तकनीकों पर काम कर चुका है, फिर भी कंपनियों तक पहुंच बनाना चुनौती बनी हुई है।

सोशल मीडिया पर बंटी राय

इस पोस्ट के बाद इंटरनेट पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने कहा कि मौजूदा जॉब मार्केट में फ्रेशर्स के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद बढ़ गई है, जबकि कुछ ने उम्मीदवारों को नेटवर्किंग और सीधे संपर्क जैसे तरीकों पर ध्यान देने की सलाह दी।

वहीं कुछ लोगों ने उम्मीद भी दिखाई। एक यूजर ने बताया कि उसे एक जॉब प्लेटफॉर्म के जरिए इंटरव्यू मिला और पूरी प्रक्रिया में करीब एक महीना लगा।

नौकरी बाजार की नई हकीकत

इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ डिग्री और तकनीकी ज्ञान आज के जॉब मार्केट में पर्याप्त हैं? बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन कंपनियां अनुभव, प्रोजेक्ट्स और नेटवर्किंग को भी तेजी से महत्व दे रही हैं।

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यूपी में 10 हजार युवाओं की होगी भर्ती, प्रोजेक्ट गंगा से गांव में होगी 20 हजार से एक लाख तक की इनकम, जानिए पूरी स्कीम

Project Ganga Scheme Explained: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदलने और गांवों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार ने एक बड़ी पहल की है। राज्य सरकार एक महत्वाकांक्षी योजना प्रोजेक्ट गंगा लेकर आ रही है। सरकार का दावा है कि प्रोजेक्ट गंगा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण डिजिटल भविष्य की आधारशिला बनने जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की 57000 ग्राम पंचायतों, गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों तक हाई-स्पीड फाइबर ब्रॉडबैंड इंटरनेट पहुंचाकर डिजिटल असमानता को पूरी तरह खत्म करना है।

इस परियोजना के जरिए गांवों को शहरों जैसी आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेस, स्मार्ट कृषि, डिजिटल भुगतान और रोजगार के नए अवसरों का द्वार खुलेगा। अब ग्रामीणों को सरकारी सेवाओं, बैंकिंग और विभिन्न प्रमाणपत्रों के लिए शहरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। इस योजना के तहत 8 से 10 हजार युवाओं की भर्ती की जाएगी। इनकी मासिक आमदनी 1 लाख रुपये तक हो सकती है।

प्रोजेक्ट गंगा की प्रमुख विशेषताएं और बड़े माइलस्टोन

प्रोजेक्ट गंगा के सभी प्रमुख माइलस्टोन पूरे कर लिए गए हैं और सरकार व पार्टनर्स ने इसकी तैयारियों को तेज कर दिया है। इस योजना की मुख्य बातें यहां नीचे दी गई हैं-

10 हजार युवाओं को रोजगार: डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर के रूप में 8000 से 10000 युवाओं की भर्ती की जाएगी। युवाओं को अपने ही गांव में डिजिटल सेवा केंद्र स्थापित करने का सुनहरा अवसर मिलेगा।

₹20 हजार से ₹1 लाख तक की इनकम: शुरुआत में डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर के रूप में काम करने वाले युवाओं की मासिक आय करीब 20000 रुपये होगी। जैसे-जैसे ग्राहकों की संख्या बढ़ेगी यह आमदनी बढ़कर 1 लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुंच सकती है।

महिलाओं की 50% भागीदारी: महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए गंगा प्रोजेक्ट के अंतर्गत बनने वाले डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की सुनिश्चित की गई है। इससे ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकेंगी।

ब्याज मुक्त लोन: अपने गांव या घर में इंटरनेट उद्यम शुरू करने के लिए सरकार मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत युवाओं को 5 लाख रुपये तक का ब्याज-मुक्त लोन उपलब्ध करा रही है।

पहले चरण में 21 जिले शामिल, नेपाल सीमा को प्राथमिकता

यह परियोजना चरणबद्ध तरीके से पूरे उत्तर प्रदेश में लागू की जाएगी। योजना के पहले चरण में राज्य के 21 जिलों को शामिल किया गया है। इसमें नेपाल सीमा से सटे श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे सीमावर्ती जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी। अगले 2 से 3 वर्षों में इस परियोजना का विस्तार पूरे उत्तर प्रदेश में कर दिया जाएगा। इस योजना से प्रदेश की सभी 57 हजार ग्राम पंचायतों और करीब 20 लाख परिवारों को सीधे तौर पर डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाएगा। इसके माध्यम से पूरे प्रदेश में 1 लाख से अधिक रोजगार सृजन की दिशा में कदम बढ़ाया जा रहा है।

गांवों में रुकगा पलायन, मिलेंगे फ्रीलांसिंग और रिमोट वर्क के अवसर

हाई-स्पीड इंटरनेट और फ्री वाई-फाई की उपलब्धता से ग्रामीण यूपी में डिजिटल क्रांति आएगी। इससे युवाओं को बड़े फायदे मिलेंगे। गांवों में ही ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी होने से युवाओं को फ्रीलांसिंग, रिमोट वर्क, ऑनलाइन वोकेशनल ट्रेनिंग और डिजिटल लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं मिलेंगी। हाई-स्पीड इंटरनेट की मदद से अब गांवों के युवाओं को कोडिंग सीखने, फ्रीलांसिंग करने या अपना खुद का टेक-स्टार्टअप शुरू करने के लिए दिल्ली या नोएडा जैसे बड़े शहरों में पलायन नहीं करना पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को आसानी से जोड़ने के लिए सरकार बेहद किफायती दरों पर इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराएगी।

साइबर सिक्योरिटी और स्मार्ट कनेक्टिविटी पर विशेष फोकस

इस प्रोजेक्ट का टारगेट सिर्फ इंटरनेट पहुंचाना ही नहीं है बल्कि गांवों को भविष्य की डिजिटल तकनीकों के लिए तैयार करना है। योजना के तहत सीसीटीवी आधारित सुरक्षा समाधान, साइबर सिक्योरिटी सेवाएं और विभिन्न संस्थानों की डिजिटल कनेक्टिविटी को बेहद मजबूत किया जाएगा। साइबर सुरक्षा, सीसीटीवी और स्मार्ट कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि ग्रामीण डेटा और परिसर पूरी तरह सुरक्षित रहें।

हिंदुजा समूह की कंपनी है नॉलेज पार्टनर

इस विशाल और महत्वाकांक्षी डिजिटल परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने मजबूत साझेदारी की है। दिग्गज हिंदुजा समूह की ब्रॉडबैंड इकाई वनओटीटी इंटरटेनमेंट लिमिटेड इस पूरे प्रोजेक्ट में नॉलेज पार्टनर और इम्प्लीमेंटेशन एनैबलर के रूप में शामिल है।

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15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने वाली सहारनपुर की हर्षिता ने बना दी 7000 करोड़ रुपये की कंपनी

यूपी के सहारनपुर जैसे शहरों में आम तौर पर परिवार अपने बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं। इसके लिए पूरे परिवार का फोकस बच्चे की पढ़ाई पर होता है। ऐसे में अगर कोई 15 साल की लड़की स्कूल छोड़ने का प्लान बना ले तो परिवार पर क्या बीतेगी? हम बात कर रहे हैं हर्षिता अरोड़ा की। स्कूल छोड़ने के उसके फैसले ने न सिर्फ परिवार बल्कि टीचर्स को भी हैरान कर दिया था।

16 साल की उम्र में क्रिप्टो पोर्टफोलियो ट्रैकिंग ऐप बनाया

हर्षिता की दिलचस्पी कोडिंग में इस कदर बढ़ गई थी कि वह इसके सिवाय दूसरा कुछ करने के बारे में सोच ही नहीं सकती थी। 16 साल की उम्र में उसने क्रिप्टो पोर्टफोलियो ट्रैकिंग ऐप बनाया। एपल जैसी कंपनी को यह ऐप बहुत पसंद आया। जल्द एक कंपनी ने इसे खरीद लिया। फिर यह अमेरिका और कनाडा में यह दूसरा सबसे लोकप्रिय फाइनेंस ऐप बन गया।

पीएम मोदी से 2020 में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिला

सरकार ने 2020 में हर्षिता की उपलब्धियों का सम्मान किया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार दिया। उसी साल उसने अमेरिका जाने के लिए O-1 वीजा के लिए अप्लाई किया। यह वीजा उन लोगों को इश्यू होता है, जिन्होंने अपने फील्ड में असाधारण टैलेंट का प्रदर्शन किया होता है। एक साल पहले हर्षिता ने विगनान वेलिवेला और तुषार मिश्रा के साथ मिलकर AtoB नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया था। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को पहुंचने पर उनके स्टार्टअप को पहचान मिली।

कोविड ने पूरे प्लान पर फेर दिया था पानी

इस स्टार्टअप को Y Combinator के समर 2020 बैच में जगह मिल गई थी। लेकिन, कोविड की महामारी आने के बाद पूरे प्लान पर पानी फिर गया। लेकिन, हर्षिता और उसकी टीम के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने ट्रक ड्राइवर्स से उनकी समस्याओं के बारे में बातचीत शुरू की। उनके पेमेंट्स के बारे में पूछा। फिर अमेरिकी ट्रक इंडस्ट्री के लिए फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर फोकस किया।

कंपनी की वैल्यू करीब 7600 करोड़ रुपये पहुंची

उन्होंने नए सिरे से AtoB को बनाया। फिर ट्रक इंडस्ट्री के लिए एक मॉडर्न टूल पेश किया। आज अमेरिका में 30,000 से ज्यादा ट्रक एटूबी का इस्तेमाल कर रहे हैं। कंपनी की वैल्यू करीब 80 करोड़ डॉलर पहुंच गई है। यह 7,600 करोड़ रुपये के बराबर है। हर्षिता के टैलेंट को देख 2026 में Y Combinator ने उन्हें प्रमोट कर जनरल पार्टनर बना दिया। आज वह दुनिया के कुछ सबसे टैलेंटेड लोगों के साथ काम कर रही हैं।

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आज दूसरे स्टार्टअप की मदद कर रहीं हर्षिता

हर्षिता ने यह साबित किया है कि टैलेंट के बल पर कोई व्यक्ति छोटे शहर में होने के बावजूद अपने सपने को पंख दे सकता है। आज वह वाय कंबिनेटर ने यह तय करती हैं कि किस स्टार्टअप को कितनी वित्तीय मदद दी जा सकती है। आज वह सफलता के बड़े मुकाम पर हैं, जबकि उनकी उम्र के लोग अपना करियर शुरू करने की कोशिशों में लगे हैं।

यूपी की नई स्टार्टअप पॉलिसी का एलान, स्टार्टअप मासिक भत्ता 17500 रुपए से बढ़कर 20000 रुपए किया गया

उत्तर प्रदेश सरकार ने नई स्टार्टअप पॉलिसी 2026 और नए स्टार्टअप मिशन को मंजूरी दी है। इसके तहत स्टार्टअप्स के मासिक भत्ते से लेकर सीड फंडिंग तक को बढ़ाया गया है। लखनऊ जिले के छोटे से गांव भुलभुलपुर में 10 हजार रुपए की छोटी सी लागत से अंजलि सिंह ने एकेले ही जूट फॉर लाइफ नाम से स्टार्टअप शुरू किया था,जो अब 5 करोड़ के टर्न-ओवर तक पहुंच चुका है। इस सफर में अंजलि ने अपने साथ 250 महिलाओं को रोजगार का मौका भी दिया है। यूपी में ऐसे ही स्टार्टअप्स के लिए माहौल बनाने के मकसद से यूपी सरकार ने नई स्टार्टअप्स पॉलिसी बनाई है।

उत्तर प्रदेश सरकार की नई नीति के तहत स्टार्टअप्स के लिए शुरुआती मदद भत्ते को 17,500 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया है और ये रकम अब 1 साल की बजाय 2 साल तक मिलेगी। इसी के तरह प्रोटोटाइप अनुदान 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये और सीड फंडिंग 7.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दी गई है। विशेष परिस्थितियों में इसे 50 लाख रुपए तक बढ़ाया जा सकेगा।

इसके साथ ही स्वतंत्र स्टार्टअप मिशन का भी गठन किया गया है, जिसकी कमान मुख्य सचिव के पास होगी। इसमें प्रति वर्ष 2 लाख रुपये तक का क्लाउड रिम्बर्समेंट और 1,000 करोड़ रुपये का स्टार्टअप फंड भी रखा गया है। AI और Deep-tech जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। जूट फॉर लाइफ जैसे स्टार्टअप को सफलता तक पहुंचाने वाली अंजलि मानती हैं कि यूपी सरकार की नई स्टार्ट अप नीति छोटे उद्यमियों के लिए वरदान साबित हो सकती है।

खास बात यह है कि इस नीति में AI,मशीन लर्निंग,रोबोटिक्स और एयरोस्पेस जैसे डीप-टेक क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन क्षेत्रों की बड़ी परियोजनाओं को ₹100 करोड़ तक की पेशेंट कैपिटल मिल सकती है। नई नीति के तहत यूपी स्टार्टअप मिशन को एक स्वायत्त संस्था के रूप में मंजूरी दी गई है, जो अब यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की जगह स्टार्टअप्स से जुड़े कामकाज को संभालेगी और जिसकी अगुवाई मुख्य सचिव करेंगे।

नई नीति में महिला उद्यमियों,दिव्यांगजन,ट्रांसजेंडर उद्यमियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बरकरार रखे गए हैं। पूर्वांचल और बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थापित स्टार्टअप्स को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता रहेगा, ताकि राज्य के पिछड़े इलाकों में भी उद्यमिता को बढ़ावा मिल सके।

यह स्टार्टअप नीति राज्य को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी बनाने के लक्ष्य से सीधे जुड़ी हुई है। 2030 के लिए निर्धारत इस लक्ष्य में योगी सरकार स्टार्टअप्स की अहम भूमिका देख रही है।

 

 

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