ये AI स्टार्टअप कर्मचारियों को दफ्तर के पास रहने के लिए दे रही 17 लाख का हाउसिंग स्टाइपेंड, 3 टाइम खाना, जिम-सॉना और न जाने क्या-क्या!

आज के समय में टेक कंपनियां अपने एम्प्लॉई को अट्रैक्ट करने के लिए कई तरह की फैसिलिटीज देती हैं, लेकिन न्यूयॉर्क की AI स्टार्टअप कंपनी रिला ने एक अलग पहल शुरू की है। कंपनी अपने एम्प्लॉई को ऑफिस के पास रहने के लिए लाखों रुपये का हाउसिंग स्टाइपेंड देती है। इसका मकसद एम्प्लॉई का आने-जाने का समय बचाना और उन्हें काम पर ज्यादा ध्यान फोकस करने में मदद करना है। हालांकि, इस सुविधा के साथ कंपनी का वर्क कल्चर भी काफी सख्त बताया जाता है:

एम्प्लॉई के रहने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है कंपनी

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न्यूयॉर्क की AI स्टार्टअप कंपनी रिला अपने एम्प्लॉई के हाउसिंग अलाउंस पर हर साल करीब 1.7 मिलियन डॉलर (लगभग 16-17 करोड़ रुपये) खर्च करती है। कंपनी के CEO सेबेस्टियन जिमेनेज़ का मानना है कि एम्प्लॉई को ऑफिस के करीब रहने से समय की बचत होती है और उनकी प्रोडक्टिविटी बेहतर हो सकती है। यह फैसिलिटी कंपनी की खास रणनीति का हिस्सा है, जिससे एम्प्लॉई अपने काम पर ज्यादा ध्यान दे सकें।

ऑफिस के पास रहने पर मिलता है ₹17 लाख से ज्यादा का स्टाइपेंड

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रिला कंपनी अपने एम्प्लॉई को सालाना करीब 18,000 डॉलर (लगभग 17 लाख रुपये) का हाउसिंग स्टाइपेंड देती है। यह लाभ उन एम्प्लॉई को मिलता है, जो ब्रुकलिन के विलियम्सबर्ग इलाके में कंपनी के ऑफिस से करीब 10 मिनट की बाइक दूरी के अंदर रहना पसंद करते हैं। विलियम्सबर्ग न्यूयॉर्क के सबसे पॉपुलर और एक्सपेंसिव एरिया में शामिल है, जहां स्टूडियो अपार्टमेंट का किराया लगभग 4,000 डॉलर प्रति महीने तक हो सकता है।

ज्यादातर एम्प्लॉई उठा रहे हैं इस सुविधा का लाभ

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रिला में करीब 120 एम्प्लॉई काम करते हैं, जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत एम्प्लॉई इस अल्टरनेटिव हाउसिंग फैसिलिटी का यूज कर रहे हैं। इसी वजह से कंपनी का सालाना खर्च करीब 1.7 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाता है। CEO के अनुसार, यह एम्प्लॉई को आराम देने के बजाय उनके काम करने के तरीके को बेहतर बनाने की कोशिश है।

आने-जाने का समय बचाना है कंपनी का प्राइमरी ऑब्जेक्टिव

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रिला के CEO सेबेस्टियन जिमेनेज़ का कहना है कि रोजाना ऑफिस आने-जाने में लगने वाला समय लोगों के दिन का सबसे स्ट्रेस्फुल बन जाता है। कंपनी चाहती है कि एम्प्लॉई लॉन्ग कम्युटेस में समय गंवाने के बजाय फैमिली के साथ समय बिताएं, किताब पढ़ें, एक्सरसाइज करें या कोई अच्छा काम कर सकें। इस तरह हाउसिंग अलाउंस को एम्प्लॉई की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।

हाउसिंग के अलावा भी मिलती हैं कई फैसिलिटीज

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रिला अपने एम्प्लॉई को हाउसिंग स्टाइपेंड के अलावा दिन में तीन बार खाने की सुविधा भी देती है। कंपनी एम्प्लॉई के लिए सॉना और कोल्ड प्लंज जैसी सुविधाओं वाली जिम भी तैयार कर रही है। हालांकि, इन सुविधाओं के साथ कंपनी का काम करने का माहौल काफी डिमांडिंग है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एम्प्लॉई अक्सर हफ्ते में छह दिन और रोजाना करीब 12 घंटे काम करते हैं, यानी लगभग 72 घंटे प्रति सप्ताह। CEO ने कंपनी के कल्चर को “बेहद सख्त” बताया है, जहां ज्यादा परफॉरमेंस और हार्ड रोक पर जोर दिया जाता है।

करोड़ों की नौकरी को कहा ना! Meta का पैकेज भी नहीं डिगा सका IIT बॉम्बे के इस इंजीनियर का इरादा, जानिए क्यों

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में बड़ी टेक कंपनियां टैलेंट को अपने साथ जोड़ने के लिए करोड़ों रुपये के पैकेज दे रही हैं। लेकिन कुछ लोग अच्छी खासी सैलरी छोड़कर अपना सपना पूरा करने का रास्ता चुनते हैं। ऐसा ही एक मामला आईआईटी बॉम्बे से पढ़े AI रिसर्चर ऋषभ अग्रवाल का सामने आया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसमें दावा किया गया कि उन्होंने मेटा की सुपरइंटेलिजेंस लैब्स से मिले 10 लाख डॉलर (करीब 9.5 करोड़ रुपये) के नौकरी के ऑफर को ठुकरा दिया।

पोस्ट के मुताबिक, ऋषभ ने यह बड़ा ऑफर इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह अपना खुद का AI स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। यह खबर तेजी से सोशल मीडिया पर फैल गई और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई। हालांकि, बाद में खुद ऋषभ अग्रवाल ने इस दावे पर सफाई दी। उनके बयान के बाद इस पूरी कहानी ने नया मोड़ ले लिया और कई लोग हैरान रह गए।

IIT बॉम्बे के AI रिसर्चर ने ठुकराया करोड़ों का ऑफर

यह पूरा मामला तब चर्चा में आया, जब X पर एक यूज़र विकास ऑलवेज ने ऋषभ अग्रवाल को लेकर एक पोस्ट शेयर की। पोस्ट में उनके आईआईटी बॉम्बे से लेकर दुनिया की बड़ी AI कंपनियों तक के सफर का जिक्र किया गया। पोस्ट में दावा किया गया कि ऋषभ अग्रवाल ने जेईई परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 33 हासिल की थी और इसके बाद आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया। आगे चलकर उन्होंने गूगल ब्रेन, डीपमाइंड और वेमो जैसी दुनिया की प्रमुख AI कंपनियों में काम किया।

पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने उन्हें करीब 10 लाख डॉलर (लगभग 9.5 करोड़ रुपये) का नौकरी का ऑफर दिया था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार करने के बजाय ठुकरा दिया। यही दावा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

AI की दुनिया में बड़ी पहचान, अब बना रहे हैं अपना स्टार्टअप

वायरल पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि ऋषभ अग्रवाल AI की दुनिया का एक बड़ा नाम हैं। पोस्ट के अनुसार, वह इस समय पीरियॉडिक लैब्स (Periodic Labs) नाम की नई पीढ़ी की AI कंपनी तैयार कर रहे हैं। पोस्ट में लिखा गया कि भले ही आम लोग उन्हें ज्यादा न जानते हों, लेकिन AI क्षेत्र में उनकी अच्छी पहचान है। इसकी वजह यह बताई गई कि उन्होंने दुनिया की कई प्रमुख AI कंपनियों और रिसर्च लैब्स में काम किया है। इनमें गूगल ब्रेन, डीपमाइंड, वेमो और मेटा सुपरइंटेलिजेंस लैब्स जैसी संस्थाएं शामिल हैं।

करोड़ों का ऑफर छोड़कर अपने स्टार्टअप से जुड़े

वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि ऋषभ अग्रवाल ने मेटा में करीब पांच महीने काम करने के बाद मिले करीब 9.5 करोड़ रुपये सालाना के नौकरी के ऑफर को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पीरियॉडिक लैब्स (Periodic Labs) में सह-संस्थापक (को-फाउंडर) के रूप में जुड़ गए। पोस्ट के अनुसार, पीरियॉडिक लैब्स अगली पीढ़ी की AI तकनीक पर काम कर रही है। इस स्टार्टअप को एनवीडिया (NVIDIA) और जेफ बेजोस का समर्थन भी मिला हुआ है।

बताया गया है कि कंपनी ऐसा AI वैज्ञानिक (AI Scientist) तैयार कर रही है, जो नई सामग्री, नई दवाओं और यहां तक कि भौतिक विज्ञान से जुड़ी नई खोजों के लिए वास्तविक दुनिया के प्रयोगों के आधार पर नए विचार और परिकल्पनाएं तैयार करने में मदद कर सके।

वायरल पोस्ट पर खुद ऋषभ अग्रवाल ने दी सफाई

यह पोस्ट देखते ही देखते X पर तेजी से वायरल हो गई। कई लोगों ने करोड़ों रुपये की नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करने के फैसले के लिए ऋषभ अग्रवाल की जमकर तारीफ की। जब यह चर्चा बढ़ने लगी, तो ऋषभ अग्रवाल ने खुद इस पोस्ट पर जवाब दिया। उन्होंने लोगों के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया, लेकिन साथ ही एक अहम बात भी साफ कर दी। उन्होंने कहा कि मेटा की ओर से मिला ऑफर 10 लाख डॉलर (करीब 9.5 करोड़ रुपये) से भी कहीं बड़ा था। हालांकि, ऋषभ ने ऑफर की वास्तविक रकम का खुलासा नहीं किया। लेकिन उनके बयान से इतना जरूर साफ हो गया कि वायरल पोस्ट में बताई गई राशि से कहीं ज्यादा बड़ा पैकेज उन्हें दिया गया था।

ब्रह्मोस डील, सबांग पोर्ट और IIM कैंपस… PM Modi की इंडोनेशिया यात्रा की 20 बड़ी उपलब्धियां ये रहीं

PM Modi Indonesia visit 20 outcomes list: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया की राजकीय यात्रा दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के लिहाज से बेहद ऐतिहासिक साबित हुई है। जकार्ता में पीएम मोदी का भव्य स्वागत किया गया। इसके बाद उन्होंने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ एक उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता की। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी द्विपक्षीय सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए करीब एक दर्जन समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें क्रिटिकल मिनरल्स, टेक्नोलॉजी, खाद्य सुरक्षा, दवाएं और समुद्री सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं।

वार्ता के बाद पीएम मोदी ने अपने बयान में कहा कि साल 2018 में हमने जो व्यापक रणनीतिक साझेदारी बनाई थी वह आज एक नई उड़ान भर रही है। हम विकास, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, संस्कृति और शिक्षा जैसे हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने पूरे भरोसे के साथ कहा कि आज से भारत-इंडोनेशिया साझेदारी का एक स्वर्ण अध्याय शुरू हो रहा है।

रक्षा, डिजिटल पेमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े मील के पत्थर

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल द्वारा साझा किए गए आधिकारिक विवरण और पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक इस यात्रा के दौरान कई बड़े और रणनीतिक ऐलान किए गए हैं।

सबांग पोर्ट का संयुक्त विकास: दोनों देश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबांग पोर्ट का संयुक्त रूप से विकास करने पर सहमत हुए हैं। ये स्ट्रेट ऑफ मक्का के ठीक सामने स्थित है और भारत के ग्रेट निकोबार पोर्ट प्रोजेक्ट से महज 100 मील की दूरी पर है।

UPI और डिजिटल पेमेंट इंटीग्रेशन: भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम UPI अब इंडोनेशिया के भुगतान सिस्टम के साथ इंटिग्रेट होने के लिए पूरी तरह तैयार है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और यात्रा दोनों को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

ब्लू इकोनॉमी और समुद्री व्यापार: दोनों पक्षों ने ब्लू इकोनॉमी, समुद्री व्यापार और बंदरगाह विकास के क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने का निर्णय लिया है।

वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा: दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की स्थिति सहित विभिन्न वैश्विक चुनौतियों पर भी चर्चा की, जहां पीएम मोदी ने फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत के पुराने रुख को दोहराते हुए टू-स्टेट सॉल्यूशन और दीर्घकालिक शांति का समर्थन किया।

पीएम मोदी की यात्रा के 20 टॉप आउटकम

यहां दोनों देशों के बीच हुए उन 20 महत्वपूर्ण समझौतों और निर्णयों की पूरी सूची दी गई है, जो इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धियां बनकर सामने आई हैं:

1- स्टील सप्लाई चेन और मिनरल्स सहयोग

समझौता: स्टील सप्लाई चेन के मिनरल्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग के लिए दोनों देशों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) हुआ है।

मायने: यह खनिज और खनन क्षेत्र में आपसी निवेश को बढ़ावा देगा। इसके साथ ही एडवांस्ड एक्सट्रैक्शन और प्रोसेसिंग तकनीकों तक पहुंच में सुधार होगा, संयुक्त अध्ययनों व परियोजनाओं को प्रोत्साहन मिलेगा और क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन मजबूत होगी।

2- समुद्री सुरक्षा सहयोग का विस्तार

समझौता: मैरीटाइम सेफ्टी एंड सिक्योरिटी कोऑपरेशन पर MoU और इम्प्लीमेंटेशन अरेंजमेंट का विस्तार किया गया है।

मायने: इससे दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग और मजबूत होगा। मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, सर्च एंड रेस्क्यू और क्षमता निर्माण में तालमेल बढ़ेगा जिससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता को बढ़ावा मिलेगा।

3- रेयर अर्थ मैग्नेट्स का विकास

समझौता: भारत के NFTDC, मिडवेस्ट लिमिटेड और इंडोनेशिया के PT PERMINAS के बीच रेयर अर्थ मैग्नेट्स के विकास को लेकर MoU पर हस्ताक्षर हुए हैं।

मायने: यह कदम रेयर अर्थ्स (दुर्लभ तत्वों) और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में आपसी सहयोग को आगे बढ़ाएगा। इससे इस क्षेत्र की वैश्विक सप्लाय चेन में विविधता आएगी और अन्य देशों पर निर्भरता कम होगी।

4- ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम पर सहयोग

समझौता: इंडोनेशियाई सेना को ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति और इस पर सहयोग को लेकर दोनों देशों के बीच आधिकारिक सहमति बनी है।

मायने: यह रक्षा समझौता भारतीय रक्षा उद्योग की क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करता है। इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को बल मिलेगा और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण के साथ-साथ नवाचार, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

5- एयर-टू-एयर मिसाइल सहयोग

समझौता: हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल सहयोग को लेकर दोनों देशों के बीच समझौता हुआ है। इसके तहत इंडोनेशिया भारत की अस्त्र मिसाइलों का आयात करेगा।

मायने: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस भारतीय मिसाइल की अचूक सफलता को देखते हुए इंडोनेशियाई सेना ने इसे खरीदने का फैसला लिया है। यह समझौता भारत के रक्षा निर्यात और मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड के संकल्प को गति देगा, जिससे भारत के स्वदेशी मिसाइल विकास इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी।

6- स्टेनलेस-स्टील स्लैब विनिर्माण के लिए संयुक्त उद्यम

समझौता: स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया और इंडोनेशिया की पीटी क्रकाटाऊ स्टील के बीच इंडोनेशिया में स्टेनलेस-स्टील स्लैब विनिर्माण सुविधा स्थापित करने के लिए एक रणनीतिक संयुक्त उद्यम का गठन किया गया है।

मायने: यह साझा उत्पादन और आधुनिक तकनीक तक पहुंच को आगे बढ़ाएगा, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और यह ‘विकसित भारत’ के औद्योगिक लक्ष्यों में योगदान देगा।

7- अंतरिक्ष सहयोग समझौते का विस्तार

समझौता: शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बाहरी अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग में सहयोग पर चल रहे फ्रेमवर्क समझौते का विस्तार किया गया है।

मायने: यह कदम दोनों देशों के बीच संयुक्त अनुसंधान, प्रौद्योगिकी साझाकरण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देता है, जिससे भारत और इंडोनेशिया की तीन दशक पुरानी अंतरिक्ष साझेदारी और अधिक मजबूत होगी।

8- प्रंबानन मंदिर परिसर का संरक्षण और जीर्णोद्धार

समझौता: ऐतिहासिक प्रंबानन मंदिर परिसर के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए भारत की तरफ से सहायता प्रदान की जाएगी।

मायने: विकास भी, विरासत भी के दृष्टिकोण के तहत, यह दोनों देशों के बीच साझा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को आगे बढ़ाता है और हेरिटेज कंजर्वेशन में भारत की वैश्विक विशेषज्ञता को प्रदर्शित करता है।

9- कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में सहयोग

समझौता: कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में व्यापक सहयोग के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

मायने: यह टिकाऊ कृषि, फसलों और कृषि मशीनरी के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाएगा, जिससे किसानों को सीधा लाभ पहुंचाने वाले संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

10- चिकित्सा उत्पाद विनियमन में सहयोग

समझौता: भारत के CDSCO और इंडोनेशिया के BPOM के बीच चिकित्सा उत्पाद विनियमन के क्षेत्र में सहयोग के लिए MoU हुआ है।

मायने: यह वैश्विक नियामक मानकों और सर्वोत्तम प्रथाओं पर ज्ञान के आदान-प्रदान को सक्षम बनाएगा, जिससे भारतीय चिकित्सा उत्पादों पर भरोसा बढ़ेगा और इंडोनेशियाई बाजार में भारतीय दवाओं व उत्पादों की पहुंच आसान होगी।

11- आपदा प्रबंधन में आपसी सहयोग

समझौता: भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और इंडोनेशिया की नेशनल एजेंसी फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट के बीच MoU हुआ है।

मायने: इससे रक्षा एक्सचेंजों, आपदा प्रबंधन और औद्योगिक सहयोग में आपसी समन्वय बेहतर होगा। यह समझौता आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान, शुरुआती चेतावनी और जोखिम मूल्यांकन के लिए तकनीक-आधारित ऐप्लिकेशंस के उपयोग को बढ़ावा देगा।

12- दूरसंचार प्रौद्योगिकियों और सेवाओं में साझेदारी

समझौता: दूरसंचार प्रौद्योगिकियों और सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन हुआ है।

मायने: यह कदम वायरलेस और क्वांटम सिस्टम सहित उन्नत टेलीकॉम तकनीकों तक पहुंच में सुधार करेगा और दोनों देशों के बीच संयुक्त नवाचार और प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान को भी मजबूती प्रदान करेगा।

13- अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहयोग

समझौता: रिसर्च, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन कोऑपरेशन पर दोनों देशों के बीच MoU हुआ है।

मायने: यह प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को सक्षम बनाकर भारत के इनोवेशन इकोसिस्टम को सुदृढ़ करेगा, जिससे ‘स्टार्टअप इंडिया मिशन’ सहित दोनों देशों के स्टार्टअप और नवाचार इकोसिस्टम को गति मिलेगी।

14- स्वास्थ्य कार्यबल सहयोग

समझौता: हेल्थ कार्यबल सहयोग पर कार्यान्वयन व्यवस्था लागू की गई है।

मायने: यह स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए फेलोशिप कार्यक्रमों की सुविधा देगा और योग्य भारतीय स्वास्थ्य पेशेवरों को इंडोनेशिया में काम करने के अवसर व विशिष्ट चिकित्सा क्षेत्रों में व्यावहारिक नैदानिक प्रशिक्षण प्रदान करेगा।

15- समुद्री सुरक्षा के लिए इन्फोसेंटर में तैनाती

समझौता: भारत के IFC-IOR में एक इंडोनेशियाई संपर्क अधिकारी की तैनाती की जाएगी।

मायने: यह रणनीतिक कदम वास्तविक समय में समुद्री सूचनाओं के साझाकरण को बढ़ाएगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में द्विपक्षीय समुद्री सुरक्षा सहयोग को और अधिक मजबूती मिलेगी।

16- इंडोनेशिया को उच्च गुणवत्ता वाले गेहूं के बीजों की आपूर्ति

समझौता: भारत द्वारा इंडोनेशिया को 100 टन उच्च गुणवत्ता वाले ‘DWR 162’ गेहूं के बीजों की आपूर्ति की जाएगी।

मायने: यह कदम इंडोनेशिया और पूरे ग्लोबल साउथ की खाद्य सुरक्षा का मजबूती से समर्थन करता है और कृषि क्षेत्र में दोनों देशों के व्यापक जुड़ाव को दर्शाता है।

17- टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक और शैक्षिक कूटनीति वर्ष

समझौता: ‘टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक और शैक्षिक कूटनीति वर्ष’ के आयोजन की आधिकारिक घोषणा की गई है।

मायने: यह गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और इंडोनेशिया के की हजार देवान्तारा के साझा शैक्षिक दृष्टिकोण का उत्सव मनाता है। रवींद्रनाथ टैगोर की 1927 की इंडोनेशिया यात्रा के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले संयुक्त सांस्कृतिक, शैक्षिक और जन-दर-जन संपर्क कार्यक्रमों की शुरुआत की जाएगी।

18- इंडोनेशिया में IIM बैंगलोर का नया कैंपस

समझौता: इंडोनेशिया के सिंघासारी SEZ में भारतीय प्रबंधन संस्थान, बैंगलोर के एक ब्रांच कैंपस की स्थापना की जाएगी।

मायने: यह वैश्विक स्तर पर भारत की शैक्षणिक उत्कृष्टता को प्रदर्शित करता है और दुनिया भर में एक ‘नॉलेज हब’ के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को और मजबूत करेगा।

19- डिजिटल कॉमर्स और पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग

समझौता: भारत के ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) और इंडोनेशिया ओपन नेटवर्क (ION) के बीच सहयोग पर सहमति बनी है।

मायने: यह डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगा, जिससे भारत के ONDC आर्किटेक्चर पर आधारित यह मॉडल आम लोगों के लिए डिजिटल सेवाओं को अधिक सुलभ, कुशल और समावेशी बनाएगा।

20- निर्वाचन आयोगों के बीच ऐतिहासिक समझौता

समझौता: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और इंडोनेशिया के सामान्य चुनाव आयोग (KPU) के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

मायने: यह दोनों बड़े लोकतांत्रिक देशों के चुनाव निकायों के बीच ज्ञान, अनुभवों और सर्वोत्तम चुनावी प्रथाओं को साझा करने की सुविधा प्रदान करेगा, जिससे मानव संसाधन विकास और कुशल प्रशासनिक प्रथाओं के लिए तकनीक के उपयोग को आगे बढ़ाया जाएगा।

इंडोनेशिया में रक्षा, शिक्षा और आर्थिक सहयोग के इन तमाम ऐतिहासिक मील के पत्थरों को स्थापित करने के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यापार और सुरक्षा सहयोग को और आगे बढ़ाने के लिए अपने तीन देशों के इस दौरे के अगले चरणों के तहत ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए रवाना होंगे।

14 साल की उम्र में AI कंपनी बनाकर छा गया ये लड़का, बुर्ज खलीफा में ऑफिस, कौन हैं जैनम जैन?

जहां 14 साल की उम्र में ज्यादातर बच्चे स्कूल, खेल और सोशल मीडिया में अपना समय बिताते हैं, वहीं जैनम जैन ने बहुत कम उम्र में एक अलग ही पहचान बना ली है। उन्होंने इतनी छोटी उम्र में एक AI स्टार्टअप की शुरुआत की, जिसने टेक्नोलॉजी और एंटरप्रेन्योरशिप की दुनिया में सभी को हैरान कर दिया है। उनकी यह उपलब्धि सिर्फ एक सफलता नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी है जो ये दिखाती है कि अगर सोच बड़ी हो तो उम्र कोई बाधा नहीं बनती।

जैनम का नाम अब उन युवा फाउंडर्स में शामिल हो चुका है जो कम उम्र में बड़े सपने देख रहे हैं और उन्हें हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कहानी तेजी से चर्चा में है और लोग इसे एक प्रेरणादायक उदाहरण के तौर पर देख रहे हैं, जो युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

AI स्टार्टअप “Mengo Engine” की शुरुआत

जैनम जैन ने “Mengo Engine” नाम का AI प्लेटफॉर्म बनाया है, जो बिजनेस को आसान बनाने में मदद करता है। यह टूल कंपनियों के लिए मार्केटिंग, कस्टमर मैनेजमेंट, लीड जनरेशन और कंटेंट बनाने जैसे काम ऑटोमेट करता है। इसका मकसद है AI को हर बिजनेस के लिए आसान बनाना।

दुनिया की सबसे ऊंची इमारत में ऑफिस

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उनका स्टार्टअप दुबई की मशहूर इमारत Burj Khalifa के 141वें फ्लोर पर स्थित है। इतनी प्रतिष्ठित जगह से कंपनी चलाना उन्हें दुनिया के सबसे कम उम्र के AI फाउंडर्स में शामिल करता है।

6 साल की उम्र से शुरू हुआ बिजनेस का सफर

जैनम की दिलचस्पी बिजनेस में तब जागी जब वो सिर्फ 6 साल के थे। उनके पिता उन्हें एक बिजनेस मीटिंग में ले गए थे, जहां से उनके मन में यह समझ और जिज्ञासा पैदा हुई कि असल दुनिया में बिजनेस कैसे काम करता है।

105 दिनों में पूरा किया 10वीं का कोर्स

13 साल की उम्र में उन्होंने IGCSE 10वीं की पढ़ाई सिर्फ 105 दिनों में पूरी कर ली। उनका मानना है कि तेज लर्निंग से उन्हें अपने स्टार्टअप पर ज्यादा ध्यान देने का समय मिला।

खुद से सीखी AI की दुनिया

जैनम ने कोई खास AI कोर्स नहीं किया। उन्होंने खुद प्रोजेक्ट्स बनाए, इंटरनेट से सीखा और लगातार एक्सपेरिमेंट करते रहे। यही सेल्फ-लर्निंग उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

छोटी उम्र में बड़ा रिज्यूमे

उनके नाम पहले से ही कई उपलब्धियां हैं—2 पेटेंट फाइल किए, TEDx स्पीच दी, किताब लिखी, यूट्यूब पर 1.45 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर बनाए और कई अवॉर्ड्स भी जीते। यह सब उनकी मेहनत और सीखने की लगन दिखाता है।

50 दिन के चैलेंज से बदलते रहे खुद को

10 साल की उम्र से उन्होंने खुद के लिए 50 दिन के चैलेंज सेट किए। इनमें 50 किताबें पढ़ना, 50 नेटवर्किंग इवेंट्स अटेंड करना और हजारों किलोमीटर की यात्रा करके नए लोगों से सीखना शामिल था।

बड़ा सपना यूनिकॉर्न कंपनी बनाना

इतनी कम उम्र में सफलता पाने के बाद भी उनका सपना बड़ा है। वो एक ग्लोबल यूनिकॉर्न टेक कंपनी बनाना चाहते हैं। उनका मानना है कि उम्र नहीं, बल्कि मेहनत और निरंतर सीखना सफलता की असली कुंजी है।

कौन से हैं भारत के वो 2 एयरपोर्ट, जिनकी डिजाइन और खूबसूरती ने ग्लोबल लिस्ट में बनाई जगह?

2.9 करोड़ रुपये की US नौकरी छोड़ी, IIT टॉपर ने कानपुर में खोली किराने की दुकान, वजह हैरान कर देगी!

सोशल मीडिया पर एक ऐसी भावुक कहानी तेजी से वायरल हो रही है, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया है। IIT Bombay के एक टॉपर ने विदेश में मिले करोड़ों रुपये के जॉब ऑफर को छोड़कर अपने माता-पिता के साथ रहने का फैसला किया। बताया जा रहा है कि उन्हें अमेरिका की एक कंपनी से शानदार पैकेज मिला था, लेकिन परिवार की परिस्थितियों और जिम्मेदारियों को देखते हुए उन्होंने यह बड़ा निर्णय लिया। इस कहानी ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि असली सफलता पैसा है या अपने अपनों के साथ खड़ा रहना।

जहां एक तरफ युवा विदेश जाकर करियर बनाने का सपना देखते हैं, वहीं इस फैसले ने एक अलग ही उदाहरण पेश किया है। यह कहानी अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही है और लोग इसे भावनात्मक और प्रेरणादायक बता रहे हैं।

2.9 करोड़ रुपये का शानदार ऑफर ठुकराया

रिपोर्ट्स के अनुसार, कंप्यूटर साइंस से B.Tech गोल्ड मेडलिस्ट विवेक शर्मा को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को स्थित एक स्टार्टअप से करीब $240,000 (लगभग ₹2.9 करोड़) सालाना का जॉब ऑफर मिला था। इस ऑफर में वीजा, रिलोकेशन और ग्लोबल करियर का शानदार मौका भी शामिल था।

साधारण परिवार से निकलकर IIT तक का सफर

विवेक का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता रेलवे में क्लर्क थे और मां ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाने में मदद करती थीं। परिवार ने उनकी पढ़ाई के लिए कई त्याग किए, यहां तक कि गहने बेचकर और बचत से उन्हें कोटा भेजा गया।

अचानक बदली जिंदगी की कहानी

जब सब कुछ ठीक चल रहा था और वह अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी जिंदगी में बड़ा मोड़ आया। उनके पिता को हार्ट अटैक आ गया और मां को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का पता चला।

विदेश नहीं, परिवार चुना

इस मुश्किल समय में विवेक ने बड़ा फैसला लिया और विदेश जाने की बजाय कानपुर में ही रुकने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने माता-पिता की देखभाल शुरू की और उनके साथ रहना चुना।

ग्रोसरी शॉप से नई शुरुआत

रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक अब अपने घर के नीचे एक छोटी किराने की दुकान चला रहे हैं और साथ ही जरूरतमंद बच्चों को कोडिंग भी सिखा रहे हैं। उनका कहना है कि परिवार से बढ़कर कुछ नहीं होता।

सोशल मीडिया पर भावुक प्रतिक्रियाएं

इस कहानी को पढ़कर लोग सोशल मीडिया पर भावुक हो गए हैं। कई यूजर्स ने कहा कि असली सफलता पैसा नहीं बल्कि परिवार और जिम्मेदारी है। उनकी यह कहानी लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है।

 

जापानी कंपनियों को भारत के गांवों तक लेकर आएंगे श्रीधर वेम्बु! इसके लिए वो पहुंच रहे जापान और उनका ये है प्लान

Sridhar Vembu: जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने एक बड़ी योजना का ऐलान किया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वेम्बु जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। उनका मकसद जापान की छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी तलाशना है। इस अनूठी पहल का उद्देश्य जापान की इन कंपनियों को भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों से जोड़ना है ताकि देश के गांवों में कारीगरी व शिल्प कौशल की संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सके।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए श्रीधर वेम्बु ने अपने इस पूरे एजेंडे की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह जापान के छोटे शहरों में स्थित व्यवसायों के साथ काम करना चाहते हैं और उनकी विशेषज्ञता को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाना चाहते हैं। वेम्बु ने लिखा कि मैं कल जापान जा रहा हूं। एजेंडा जापान के छोटे शहरों की छोटी से मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी करना और उन्हें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लाना है।

शिल्प कौशल और कारीगरी को पुनर्जीवित करने पर फोकस

श्रीधर वेम्बु की मुताबिक इस पहल की जड़ें पारंपरिक शिल्प कौशल को फिर से बहाल करने की इच्छा से जुड़ी हैं। इसे उन्होंने तमिल शब्द आसारी (Aasaari) और संस्कृत शब्द विश्वकर्मा (Vishwakarma) के जरिए भी अपने विजन को समझाने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि जापान की कई छोटी कंपनियां आज भी इन मूल्यों को संजोए हुए हैं। इन कंपनियों ने प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और अन्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले क्षेत्रों में विश्व स्तरीय क्षमताएं विकसित की हैं। वेम्बु ने कहा कि जापानी लोग उन क्षेत्रों में वैश्विक लीडर हैं जिनमें जटिल और बारीक शिल्प कौशल की आवश्यकता होती है।

पुराने दोस्त ब्रिट्टो-सान से मिली इस मिशन की प्रेरणा

वेम्बु ने बताया कि इस पूरे मिशन में उन्हें उनके एक पुराने मित्र ब्रिट्टो से मार्गदर्शन मिल रहा है। मूल रूप से मदुरै के रहने वाले ब्रिट्टो ने जापान में कई दशक बिताए हैं और वहां की व्यावसायिक संस्कृति की उन्हें गहरी समझ है। ब्रिट्टो ने बाद में ताकुमी मोशन कंट्रोल्स की स्थापना की थी। जोहो के संस्थापक ने रेखांकित किया कि जापानी शब्द ताकुमी का अर्थ शिल्पकार होता है। ये जो जापानी विनिर्माण परंपराओं के प्रति उनके साझा सम्मान को दर्शाता है। वेम्बु ने लिखा कि जापानी शिल्प कौशल के प्रति हमारे आदर और प्रशंसा ने ब्रिट्टो-सान और मुझे एक साथ जोड़ा। अब यह हमारे लिए एक मिशन बन गया है।

वेम्बु के रूरल-फर्स्ट विजन से मेल खाती है यह पहल

यह घोषणा ग्रामीण विकास और विकेंद्रीकरण पर वेम्बु के लंबे समय से चले आ रहे फोकस के बिल्कुल अनुकूल है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि विश्व स्तरीय तकनीक और नवाचार का निर्माण बड़े महानगरों से बाहर भी किया जा सकता है। इसी सोच के तहत जोहो छोटे शहरों और गांवों में अपने परिचालन और प्रशिक्षण पहलों का विस्तार कर रही है।

यह जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले वेम्बु ने बताया था कि जोहो के रेवेन्यू का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत के बाहर से आता है। भारतीय सरकार से उन्हें सिर्फ 2 प्रतिशत रेवेन्यू मिलता है। जोहो की वैश्विक स्तर पर बड़ी मौजूदगी है। इसके कार्यालय जापान, अमेरिका, नीदरलैंड, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में हैं।

ग्रामीण भारत के विकास के लिए पहले भी किए हैं बड़े प्रयास

जोहो प्रमुख का यह ताजा जापान मिशन उनके उस ग्रामीण-विकास दर्शन का हिस्सा है जिसकी वे एक दशक से अधिक समय से वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में अपार प्रतिभा छिपी है, और यदि उन्हें अवसर व इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो वे नवाचार, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र बन सकते हैं।

तेनकासी का सफल मॉडल

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए जोहो ने 2011 में ग्रामीण तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव मथलमपराई में एक टेक्नोलॉजी सेंटर शुरू किया था। उद्योग की इस धारणा को तोड़ते हुए कि हाई-एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल बड़े शहरों में हो सकता है, यह सेंटर आज एक बड़े रूरल टेक इकोसिस्टम में बदल चुका है। यहां सैकड़ों स्थानीय पेशेवर काम करते हैं। चेन्नई जैसे बड़े शहरों में नौकरियों के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने के लिए वेम्बु ने जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया। इसके तहत तिरुनेलवेली, मदुरै और कुंभकोणम क्षेत्रों सहित पूरे तमिलनाडु में अतिरिक्त ग्रामीण परिसर और सैटेलाइट कार्यालय स्थापित किए गए हैं।

स्थानीय स्टार्टअप्स में निवेश

महानगरों से बाहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ड्रोन स्टार्टअप याली एयरोस्पेस और पावर-टूल्स वेंचर करुवी जैसे स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी उपक्रमों में भी निवेश किया है।

गांवों की तरफ रिवर्स माइग्रेशन की अपील

श्रीधर वेम्बु ने हाल ही में गांवों की ओर रिवर्स माइग्रेशन का आह्वान किया है। उनका तर्क है कि दशकों से बड़े शहरों की ओर हो रहे पलायन ने ग्रामीण समुदायों से प्रतिभाओं को पूरी तरह निचोड़ लिया है। वेम्बु के मुताबिक, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए लोगों के निवास स्थान के करीब ही रोजगार, उद्यमिता और दीर्घकालिक निवेश लाने की सख्त जरूरत है।

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विराट कोहली के निवेश वाली एजिलिटास Sports365 का कर सकती है अधिग्रहण, दोनों में चल रही बातचीत

एजिलिटास स्पोर्ट्स जल्द स्पोर्ट्स365 का अधिग्रहण कर सकती है। इस बारे में बातचीत अंतिम चरण में है। एजिलिटास एक स्टार्टअप है, जो स्पोर्ट्स गुड्स बनाती है। स्पोर्ट्स365 स्पोर्ट्स एक्सेसरीज की रिटेलिंग में मदद करती है। एजिलिटास अपने प्रोडक्ट्स ज्यादातर कस्टमर्स तक ले जाना चाहती है। इस काम में स्पोर्ट्स365 उसकी मदद कर सकती है। मामले से जुड़े लोगों ने मनीकंट्रोल को यह बताया।

स्पोर्ट्स365 की शुरुआत 2012 में हुई थी

स्पोर्ट्स365 की शुरुआत 2012 में हुई थी। इसे शेखर गारिसा और विशाल गुप्ता ने शुरू किया था। यह स्पोर्ट्स गुड्स पर फोकस करने वाली देश के शुरुआती स्टार्टअप्स में से एक थी। शुरुआत में इसे इंडियन टेनिस स्टार महेश भूपति का भी सपोर्ट हासिल था। बाद में कई हाई प्रोफाइल क्रिकेटर्स और दूसरे खिलाड़ी भी इस कंपनी से जुड़ गए। इनमें युवराज सिंह, एक्टर लारा दत्त और इंटरनेशनल स्कवैश प्लेयर दीपिका पल्लीकल शामिल थी।

पहले साल स्पोर्ट्स365 का रेवेन्यू 7 करोड़

स्पोर्ट्स365 का रेवेन्यू इसके पहले साल यानी FY14 में करीब 7 करोड़ रुपये था। FY21 में रेवेन्यू बढ़कर 46 करोड़ हो गया। लेकिन, कोविड की महामारी शुरू होने पर कंपनी के कारोबार पर तगड़ी चोट लगी। FY25 में कंपनी का रेवेन्यू गिरकर करीब 2 करोड़ रुपये रह गया था। यह जानकारी Tracxn के डेटा पर आधारित है।

अधिग्रहण की शर्तों के बारे में जानकारी नहीं

दोनों कंपनियों के बीच अधिग्रहण की शर्तों के बारे में अभी पता नहीं चला है। लेकिन, मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि अधिग्रहण के लिए स्पोर्ट्स365 की वैल्यूएशन इसके रिकॉर्ड 46 करोड़ रुपये के रेवेन्यू के मुकाबले काफी कम रह सकती है। स्पोर्ट्स365 ने पावरहाउस वेंचर्स और कुछ इनवेस्टर्स से 15 करोड़ रुपये से कम जुटाए थे। इसे YouWeCan का भी सपोर्ट हासिल था, जो क्रिकेटर युवराज सिंह का नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है।

पहले कर चुकी है Mochiko Shoes का अधिग्रहण 

Agilitas और Sports365 ने इस बारे में मनीकंट्रोल के सवालों के जवाब नहीं दिए। एजिलिटास के लिए स्पोर्ट्स365 नया अधिग्रहण होगा। कंपनी पहले Mochiko Shoes का अधिग्रहण कर चुकी है। इस कंपनी के पास काफी समय से Lotto का लाइसेंसिंग राइट्स रहा है। एजिलिटास ने बाद में क्रिकेटर विराट कोहली के स्पोर्टिंग ब्रांड One8 को भी दोबारा शुरू किया था।

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अभिषेक गांगुली ने की थी एजिलिटास की शुरुआत

एजिलिटास की शुरुआत अभिषेक गांगुली ने की थी। वह पहले Puma India और इसके साऊथईस्ट एशिया बिजनेस के एमडी थे। उन्होंने अतुल बजाज और अमित प्रभु के साथ मिलकर एजिलिटास की शुरुआत की थी। तब से कंपनी अब तक 850 करोड़ रुपये से ज्यादा फंड जुटा चुकी है। कंपनी ने यह पैसा विराट कोहली, एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा, रेनमैटर, युवराज सिंह, कनवर्जेंट सहित कई इनवेस्टर्स से जुटाए हैं।

Google में ₹9.3 करोड़ की नौकरी छोड़ शुरू किया AI स्टार्टअप! अब मालामाल हुए यूसुफ इमरान, युवाओं की दी ये सलाह

Startup News: गूगल (Google) के एक पूर्व कर्मचारी ने करीब 9.3 करोड़ रुपये (लगभग 10 लाख डॉलर) सालाना की नौकरी छोड़कर अपना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) स्टार्टअप शुरू किया है। 41 वर्षीय यूसुफ इमरान (Yousuf Imran) का कहना है कि AI ने लोगों के लिए अपना बिजनेस शुरू करने और नए अवसर बनाने के रास्ते खोल दिए हैं।

पूर्व गूगल अकाउंट एग्जीक्यूटिव यूसुफ इमरान ने कहा कि Google में अच्छी कमाई के बावजूद उन्हें FOMO (कुछ छूट जाने का डर) महसूस हुआ क्योंकि OpenAI और Anthropic जैसी AI कंपनियाँ ऐसे स्टॉक पैकेज दे रही थीं जिनमें जिंदगी बदलने की क्षमता थी।

एक साल में कमाए करीब 9.3 करोड़ रुपये

Business Insider में प्रकाशित एक आर्टिकल के अनुसार, यूसुफ इमरान ने बताया कि उन्होंने पिछले साल Google में अकाउंट एग्जीक्यूटिव के तौर पर करीब 9.86 लाख डॉलर (लगभग 9.3 करोड़ रुपये) कमाए थे। उन्होंने बताया कि उनकी बेस सैलरी करीब 1.70 लाख डॉलर (करीब 1.6 करोड़ रुपये) थी। जबकि उनकी अधिकांश कमाई कमीशन से हुई।

AI बूम के बीच महसूस हुआ ‘FOMO’

इमरान ने कहा कि Google में अच्छी कमाई के बावजूद उन्हें AI इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ते अवसरों को लेकर फियर ऑफ मिसिंग आउट (FOMO) महसूस होने लगा। उन्होंने कहा कि OpenAI और Anthropic जैसी AI कंपनियां कर्मचारियों को ऐसे स्टॉक विकल्प दे रही थीं। इनकी भविष्य में बड़ी वैल्यू हो सकती है। इसी वजह से उन्होंने नौकरी की सुरक्षा के बजाय अपने स्टार्टअप में हिस्सेदारी को ज्यादा महत्वपूर्ण माना।

बिना इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के शुरू किया AI प्रोजेक्ट

करीब 15 साल सेल्स सेक्टर में काम करने के बाद इमरान 2020 में Google से जुड़े थे। वहां वे ग्राहकों को Google के AI और मशीन लर्निंग समाधान अपनाने में मदद करते थे। उन्होंने बताया कि नौकरी के बाद रात और वीकेंड में वे ChatGPT, Claude और Gemini जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल कर ऐप्स और साइड प्रोजेक्ट्स बनाते थे। जबकि उनका सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का कोई औपचारिक अनुभव नहीं था।

छंटनी ने बदल दी सोच

इमरान के मुताबिक, Google में हाल के वर्षों में हुई छंटनी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि केवल बड़ी कंपनी में नौकरी ही सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं है। उन्होंने देखा कि कई प्रतिभाशाली कर्मचारियों की भी नौकरी चली गई। इसके बाद उन्होंने अपना उद्यम शुरू करने का फैसला किया।

सेल्स में लगभग 15 साल बिताने के बाद, इमरान 2020 में गूगल से जुड़े और क्लाइंट्स को गूगल के AI मशीन लर्निंग सॉल्यूशन को लागू करने में मदद की। इमरान ने बताया कि उनकी बेस सैलरी लगभग 170,000 डॉलर (करीब 1.6 करोड़ रुपये) थी, जबकि उनकी ज़्यादातर कमाई कमीशन से होती थी, जिससे उनकी सालाना W-2 कमाई लगभग 986,000 डॉलर (करीब 9.3 करोड़ रुपये) हो गई।

शुरू किया अपना AI स्टार्टअप

अप्रैल 2026 में उन्होंने Google छोड़कर Mangosteen Studio नाम से अपना AI स्टार्टअप शुरू किया। यह कंपनी सेल्स प्रोफेशनल्स के लिए AI आधारित टूल विकसित करती है। इमरान ने बताया कि उन्होंने पहले से पूरी वित्तीय योजना बनाई थी। स्टार्टअप को दो साल तक चलाने के लिए करीब 2 लाख डॉलर अलग रखे थे। जबकि अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए 1.5 लाख डॉलर की बचत भी की थी।

‘AI हर किसी को नया मौका दे रहा है’

इमरान का कहना है कि AI केवल इंजीनियरों के लिए नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभवी लोगों के लिए भी नए अवसर लेकर आया है। उन्होंने कहा, “जो लोग अपने करियर में ठहराव महसूस कर रहे हैं या नई चुनौती चाहते हैं, उनके लिए AI कुछ नया बनाने का अवसर दे रहा है। सबसे जरूरी चीज आपके क्षेत्र का अनुभव है। मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं था, लेकिन मैंने 20 साल तक सेल्स प्रोफेशनल्स की समस्याओं को समझा और उसी अनुभव के आधार पर अपना बिजनेस शुरू किया।”

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Viral Post: ‘ह्यूमैनिटीज छात्रों के लिए प्लेसमेंट नहीं’, DU में 84% नंबर के बाद भी नौकरी के लिए भटकती रही छात्रा, वायरल हुई कहानी

Viral Post: सोशल मीडिया पर इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के एक इतिहास (ऑनर्स) ग्रेजुएट की कहानी चर्चा का विषय बनी हुई है। एक वायरल लिंक्डइन पोस्ट में ह्यूमैनिटीज के छात्रों को प्लेसमेंट के दौरान आने वाली मुश्किलों और कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। पोस्ट में कहा कि जब कंपनियांअक्सर कम्युनिकेशन और क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स की अहमियत पर जोर देते हैं, फिर भी कैंपस रिक्रूटमेंट में ह्यूमैनिटीज ग्रेजुएट्स को नजरअंदाज क्यों किया जाता है। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

स्टार्टअप फाउंडर हर्षित खरे ने लिंक्डइन पर अपने एक दोस्त की कहानी शेयर की, तब ये मामला चर्चा में आया। उनके दोस्त ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास (ऑनर्स) में पढ़ाई की और 84 प्रतिशत अंक हासिल किए और बेहतरीन प्रदर्शन के कारण उनका नाम डीन की सूची में भी शामिल हुआ। इसके बावजूद उन्हें नौकरी पाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

शेयर किया पोस्ट

पोस्ट में हर्षित ने लिखा, “मेरी एक दोस्त ने पिछले साल दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास (ऑनर्स) में ग्रेजुएशन किया था। उसके 84 प्रतिशत अंक आए थे और उसका नाम डीन की लिस्ट में भी शामिल था। वह औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (कॉलोनियल इकोनॉमिक्स) जैसे विषयों पर घंटों चर्चा कर सकती थी और मेरी जानकारी में ज्यादातर लोगों से बेहतर लिखती थी।” लेकिन जब उसने नौकरी के लिए कॉलेज के प्लेसमेंट सेल से संपर्क किया, तो उसे जवाब मिला, “माफ कीजिए, हमारे पास ह्यूमैनिटीज के छात्रों के लिए कोई कंपनी नहीं आ रही है।”

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12k की मिली नौकरी

हर्षित खरे के अनुसार, प्लेसमेंट सेल से जवाब मिलने के बाद छात्रा को कोई खास मदद या मार्गदर्शन नहीं मिला। इसके बाद उसने करीब आठ महीने तक अलग-अलग कंपनियों को ईमेल भेजे और कई इंटरव्यू दिए। लेकिन हर बार उसके इतिहास विषय की पढ़ाई को देखते हुए उसे उपयुक्त उम्मीदवार नहीं माना गया। लगातार निराशा मिलने के बाद वह अपने करियर के फैसले पर ही सवाल उठाने लगी। उन्होंने आगे बताया कि काफी कोशिशों के बाद छात्रा को एक छोटे स्टार्टअप में कंटेंट से जुड़ी नौकरी मिली, जहां उसे 12,000 रुपये प्रति महीने की सैलरी दी गई।

उन्होंने लिखा, “ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उसमें टैलेंट की कमी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि सिस्टम ने उसके ग्रेजुएट होने से पहले ही तय कर लिया था कि उसकी डिग्री प्लेसमेंट ड्राइव के लिए योग्य नहीं है।”

प्लेसमेंट सिस्टम पर उठाएं सवाल

हर्षित खरे ने मौजूदा प्लेसमेंट व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, कंपनियां कम्युनिकेशन और क्रिटिकल थिंकिंग की बात तो करती हैं, लेकिन ह्यूमैनिटीज के छात्रों को अक्सर मौका नहीं देतीं। उन्होंने लिखा, “हमने ऐसा प्लेसमेंट सिस्टम बना दिया है, जो सिर्फ इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए काम करता है और बाकी छात्रों को चुपचाप पीछे छोड़ देता है।” पोस्ट के अंत में उन्होंने कंपनियों से अपील की कि वे ह्यूमैनिटीज ग्रेजुएट्स को नौकरी देने के अपने अनुभव शेयर करें। उन्होंने लिखा, “आपकी डिग्री समस्या नहीं है, बल्कि सिस्टम अभी तक उसे सही तरीके से समझ नहीं पाया है।”

लोगों ने किया कमेंट

इस पोस्ट के वायरल होने के बाद कमेंट सेक्शन में लोगों ने अपनी-अपनी राय रखी। एक यूजर ने लिखा, “ह्यूमैनिटीज हमें सोचने का नया नजरिया देती है और सभी को साथ लेकर चलने की समझ भी विकसित करती है। लेकिन अफसोस की बात है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद इस क्षेत्र के छात्रों के पास नौकरी के बहुत कम ऑप्शन होते हैं।” दूसरे यूजर ने लिखा, “पहले हम रोल रिडंडेंसी की बात करते थे, अब डिग्री रिडंडेंसी का दौर आ गया है। आने वाले समय में भारत का शिक्षा सिस्टम भी अमेरिका की तरह हो सकता है, जहां कंपनियां डिग्री से ज्यादा स्किल्स को महत्व देती हैं।”

जेवर में 6,785 करोड़ का बड़ा निवेश! इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ा उत्तर प्रदेश

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जेवर में 6,785 करोड़ रुपये के निवेश से अंबर एंटरप्राइजेज एवं कोरिया सर्किट्स के ज्वाइंट वेंचर ‘एसेंट के सर्किट्स’ का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग प्लांट क्षेत्र में रोजगार व नए उद्योगों को गति प्रदान करेगा। उन्होंने यूपी के प्रोजेक्ट्स को त्वरित स्वीकृति मिलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी व केंद्रीय मंत्रियों का आभार भी प्रकट किया। सीएम ने कहा कि कभी जंगलराज के लिए जाना जाने वाला जेवर क्षेत्र अब मंगलराज की पहचान बना है। 

 

मुख्यमंत्री शनिवार को गौतम बुद्ध नगर के जेवर में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के भूमिपूजन एवं शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि 6,785 करोड़ रुपये से अधिक का यह निवेश क्षेत्र में नए रोजगार के अवसर पैदा करेगा और कई एंकर यूनिट्स की स्थापना में योगदान देगा। यह प्रदेश के औद्योगिक विकास को भी नई गति देगा। उत्तर प्रदेश पहले ही एमएसएमई का सबसे बड़ा हब है, जहां लगभग 96 लाख इकाइयां कार्यरत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा से शुरू हुई 'वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट' योजना ने प्रदेश के उत्पादों को देश व दुनिया में नई पहचान दिलाई है।

 

देश के 55 प्रतिशत मोबाइल नोएडा-ग्रेटर नोएडा में बन रहे

मुख्यमंत्री ने कहा कि पीएम मोदी जी के विजन का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। देश में बनने वाले 55 प्रतिशत मोबाइल फोन नोएडा-ग्रेटर नोएडा में निर्मित हो रहे हैं, जबकि इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का भी 55 से 60 प्रतिशत उत्पादन यहीं हो रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अंबर ग्रुप और कोरिया सर्किट का यह संयुक्त उपक्रम इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम साबित होगा और उत्तर प्रदेश के माध्यम से भारत को नई उड़ान देगा।

 

केंद्र से यूपी के प्रोजेक्ट्स को मिलती है त्वरित स्वीकृति

सीएम ने कहा कि उत्तर प्रदेश से संबंधित किसी प्रस्ताव को केंद्र सरकार में आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार को फोन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रस्ताव केंद्र सरकार तक पहुंचते ही सूचना मिल जाती है कि उसे अंतिम स्वीकृति प्रदान कर दी गई है और आप कार्य को आगे बढ़ाएं। ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है। जब अपनत्व का भाव हो, देश के प्रति जज्बा हो, तब ये चीजें देखने को मिलती हैं। मैं इस स्वीकृति के लिए पीएम मोदी जी व केंद्रीय मंत्रियों का आभार प्रकट करता हूं।

 

कोरिया से उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक व आत्मीय संबंध

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश का कोरिया से बहुत पुराना संबंध है। इतिहास में यह मान्यता है कि कोरिया की रानी क्वीन हो वस्तुत: अयोध्या की राजकुमारी रत्ना थीं, जो जलमार्ग से कोरिया पहुंची थीं। कोरिया की प्रथम महिला के उत्तर प्रदेश आगमन पर अयोध्या में एक पार्क का निर्माण कराया गया था। कोरिया के राजदूत भी अयोध्या आए थे और उस ऐतिहासिक संबंध को स्मरण करते हुए भावुक हुए थे। यही आत्मीय संबंध भारत व कोरिया को और अधिक निकट लाता है। कोरिया इस बात का उदाहरण है कि आक्रामक रणनीति, अनुशासन और समर्पण के बल पर कोई देश इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बन सकता है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और देश की अर्थव्यवस्था नए प्रतिमान स्थापित कर रही है।

 

हर नागरिक के कर्तव्य से साकार होगा विकसित भारत का सपना

मुख्यमंत्री ने कहा कि मोदी जी का लक्ष्य वर्ष 2047 तक भारत को विकसित, आत्मनिर्भर और खुशहाल राष्ट्र बनाना है। इस संकल्प की शुरुआत प्रदेश, जनपद, नगर, गांव और प्रत्येक नागरिक से होती है। प्रधानमंत्री जी ने भी नागरिक कर्तव्य पर विशेष बल दिया है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने क्षेत्र में पूरी निष्ठा से कार्य करेगा तो विकसित भारत का सपना निश्चित रूप से साकार होगा। इस प्रकार के निवेश उत्तर प्रदेश को नई पहचान दिलाते हैं, युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध कराते हैं, नए स्टार्टअप्स के लिए मंच तैयार करते हैं, निर्यात क्षमता को मजबूत करते हैं और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को गति प्रदान करते हैं।

 

जंगलराज नहीं, अब मंगलराज बना जेवर की पहचान

मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी जंगलराज के रूप में पहचाना जाने वाला जेवर आज आक्रामक रणनीति और मोदी जी के प्रेरणादायी नेतृत्व के कारण मंगलराज का प्रतीक बन चुका है। आज जब वह जेवर एयरपोर्ट पर उतरे तो उन्हें मोदी जी के कर कमलों से मिले शानदार एयरपोर्ट की सौगात दिखाई दी। अब यहां से कमर्शियल फ्लाइट्स भी शुरू हो चुकी हैं और लगातार निवेश के नए प्रस्ताव प्राप्त हो रहे हैं।

 

निवेशकों की पहली पसंद बना उत्तर प्रदेश

मुख्यमंत्री ने कहा कि एक समय था जब उत्तर प्रदेश पहचान के संकट से जूझ रहा था, लेकिन आज प्रदेश अपनी नई पहचान के साथ देश-दुनिया के निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। कानून व्यवस्था में सुधार, सेक्टोरल पॉलिसियों और 75 हजार एकड़ के विशाल लैंड बैंक के कारण हर क्षेत्र के निवेशकों के लिए उत्तर प्रदेश सबसे उपयुक्त बन चुका है। सरकार प्रत्येक क्षेत्र के लिए स्पष्ट नीति लेकर आई है। कोई भी निवेशक इन नीतियों के दायरे में आकर निवेश कर सकता है। सरकार समय पर इंसेंटिव देती है, सिंगल विंडो प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है और बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के निवेश की पूरी प्रक्रिया संपन्न होती है। इसका परिणाम यह है कि प्रदेश के युवाओं को तेजी से रोजगार मिल रहा है।

 

कानपुर व झांसी के बीच बन रही इंडस्ट्रियल सिटी

सीएम योगी ने कहा कि राज्य सरकार कानपुर व झांसी के बीच 56 हजार एकड़ क्षेत्र में बीडा के रूप में एक बड़े इंडस्ट्रियल सिटी का निर्माण कर रही है। इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति का प्रस्ताव भारत सरकार के पास भेजा गया था। प्रस्ताव जब केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव जी के पास गया तो उन्होंने तत्काल सभी कार्यों को समय-सीमा में पूरा करते हुए इसकी स्वीकृति दी और फोन करके अवगत भी कराया। केंद्र व राज्य सरकार के बीच इसी प्रकार का समन्वय और त्वरित निर्णय देश के विकास को नई गति प्रदान करता है। मैं विश्वास करता हूं कि इस परियोजना को भी हम समय-सीमा में पूरा कर प्रधानमंत्री जी के विजन को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।

 

सेमीकंडक्टर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले दिनों उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर यूनिट के शिलान्यास कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव जी का सानिध्य उत्तर प्रदेश की जनता को प्राप्त हुआ था। सेमीकंडक्टर आज दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है और भारत को इसी ताकत का केंद्रबिंदु बनना है। इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट हब के रूप में देश को स्थापित करने की दिशा में उत्तर प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। मोदी जी का विजन है कि भारत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट हब के रूप में अपनी पहचान स्थापित करे। जो चीजें विभिन्न देशों से आयात होती हैं, वे भारत में बनें और दुनिया को निर्यात हों।

 

इस अवसर पर केंद्रीय रेलवे, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव,  यूपी के मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’, प्रभारी मंत्री ब्रजेश सिंह, सांसद महेश शर्मा, सुरेंद्र सिंह नागर, विधायक धीरेंद्र सिंह, तेजपाल सिंह नागर, भाजपा क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर, नगर अध्यक्ष महेश चौहान, अंबर ग्रुप के कार्यकारी अध्यक्ष जसवीर सिंह, मैनेजिंग डायरेक्टर दलजीत सिंह, सीईओ कोरिया सर्किट चो यांग-हो आदि मौजूद रहे। Edited by : Sudhir Sharma