हवाई जहाज को टक्कर देगी चीन की ट्रेन! फ्लाइंग ट्रेन ने मचाया तहलका

चीन तेज रफ्तार वाली ट्रेनों के मामले में लगातार नई टेक्निक पर काम कर रहा है। देश में पहले से ही शंघाई मैग्लेव जैसी तेज ट्रेन चलती है, जो करीब 460 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से दौड़ती है। अब साइंटिस्ट इससे भी ज्यादा तेज ट्रेन बनाने की तैयारी में जुटे हैं। इसी कड़ी में एक ऐसी ‘फ्लाइंग ट्रेन’ पर काम किया जा रहा है, जिसे फ्यूचर की बेहद तेज ट्रेन कहा जा रहा है।

इस ट्रेन का शुरुआती ट्रायल भी किया जा चुका है। बताया जा रहा है कि टेस्टिंग के दौरान इसकी स्पीड लगभग 800 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंची। यानी इसकी स्पीड शंघाई मैग्लेव से काफी ज्यादा है। इतनी हाई स्पीड वाली ट्रैन से कम टाइम में लंबी दुरी तय की जा सकती है। यह टेक्निक अभी टेस्टिंग में है और इसे पैसेंजर के लिए शुरू करने में समय लग सकता है। यदि आगे के ट्रायल सफल रहते हैं, तो आने वाले समय में ट्रेन से ट्रैवल करने का एक्सपीरियंस बदल सकता है।

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एरोप्लेन जैसी स्पीड

चीन के साइंटिस्ट ऐसी ट्रेन तैयार करने में जुटे हैं, जिसे ‘फ्लाइंग ट्रेन’ कहा जा रहा है। यह आम ट्रेन से काफी अलग होगी और खास टेक्निक की मदद से पटरी के ऊपर चलेगी। शुरुआती टेस्टिंग में इस ट्रेन की करीब 800 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड है। इतनी तेज स्पीड के कारण यह ट्रेन फ्यूचर में एयर ट्रैवल का एक ऑप्शन बन सकती है।

 

 

बिना पहिये चलेगी ट्रेन

इस ट्रेन को तेज रफ्तार देने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक यानी मैग्नेटिक फाॅर्स का इस्तेमाल किया जाएगा। इस टेक्निक में ट्रेन के पहिए सीधे पटरी के कॉन्टैक्ट में नहीं आते, बल्कि मैग्नेटिक फाॅर्स से ट्रेन पटरी के ऊपर थोड़ी दूरी पर आगे बढ़ती है। इससे पहिए और पटरी के बीच फ्रिक्शन काफी कम हो जाता है। फ्रिक्शन कम होने पर ट्रेन को ज्यादा तेज स्पीड से चलाना आसान होता है।

हवा नहीं रोकेगी रफ्तार

800 किलोमीटर प्रति घंटे जैसी हाई स्पीड पर ट्रेन के सामने हवा का दबाव एक बड़ी समस्या बन सकता है। इसी वजह से इस ट्रेन के लिए खास ट्यूब या सुरंग तैयार की जा रही है। इस ट्यूब के अंदर से पंप की मदद से हवा को बाहर निकाला जाएगा, जिससे ट्रेन को कम हवा वाले वातावरण में चलने में मदद मिलेगी। हवा का दबाव कम होने से ट्रेन के लिए तेज रफ्तार हासिल करना आसान हो सकता है और सफर के दौरान एनर्जी की बचत भी हो सकती है। चीन के हुबेई में साइंटिस्ट ने करीब एक किलोमीटर लंबे ट्रैक पर इस टेक्निक का टेस्ट किया। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रायल में ट्रेन ने सिर्फ 5.3 सेकंड में 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल की। अब साइंटिस्ट इस टेक्निक को और बेहतर बनाने और फ्यूचर में इसकी स्पीड को 1000 किलोमीटर प्रति घंटे तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।

 

 

टेस्टिंग के लिए तैयार

इस फ्यूचर ट्रेन पर चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन (CASIC) काम कर रहा है। इतनी हाई स्पीड वाली ट्रेन के लिए ट्रैक और ट्यूब को स्टैंडर्ड रेलवे ट्रैक की तुलना में कहीं ज्यादा सटीक बनाना जरूरी है। टेस्टिंग के लिए तैयार किए गए करीब एक किलोमीटर लंबे कंक्रीट और स्टील ट्रैक में अलाइनमेंट को सिर्फ 0.5 मिलीमीटर तक रखने की बात कही गई है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट शुरुआती ट्रायल में है टेक्निक सफल हुई तो लंबी दूरी की जर्नी कम टाइम में पूरी हो सकती है।

टाटा की TCS 8900 खास इंजीनियरों की टीम बनाएगी, OpenAI और माइक्रोसॉफ्ट को टक्कर देने की तैयारी

देश की सबसे बड़ी आईटी सर्विसेज कंपनी Tata Consultancy Services (TCS) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है। टाटा ग्रुप की यह कंपनी AI से जुड़ी नई सर्विसेज को बढ़ाने के लिए 5,900 से 8,900 तक फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स (FDEs) की टीम तैयार करेगी। इसके साथ ही AI से जुड़ी कंपनियों को खरीदने (Acquisition) के विकल्प भी तलाश रही है।

आखिर FDE क्या होते हैं?

फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स (FDEs) ऐसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर होते हैं, जो सिर्फ कंपनी के ऑफिस में बैठकर कोड नहीं लिखते। वे सीधे क्लाइंट के साथ काम करते हैं और उसकी समस्याओं के हिसाब से AI या टेक्नोलॉजी सॉल्यूशन तैयार करते हैं।

अब मान लीजिए किसी बैंक को AI से अपने कस्टमर सर्विस सिस्टम को बेहतर बनाना है। ऐसे में TCS का FDE उस बैंक के साथ मिलकर काम करेगा। वह बैंक के मौजूदा सॉफ्टवेयर, डेटा और बिजनेस प्रोसेस को समझेगा। फिर AI मॉडल को उसी हिसाब से जोड़ेगा और उसे लागू करेगा।

इन इंजीनियरों का काम क्या होगा?

TCS के CEO के. कृतिवासन ने रॉयटर्स से कहा कि कंपनी अपने कुल कर्मचारियों में से 1% से 1.5% को फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर बनाना चाहती है।

ये इंजीनियर सीधे क्लाइंट के साथ काम करेंगे। उनका काम कंपनियों में AI टूल्स को लागू करना, उन्हें मौजूदा सिस्टम से जोड़ना और कारोबार की जरूरत के हिसाब से AI सॉल्यूशन तैयार करना होगा।

OpenAI और Microsoft से मुकाबला

TCS की यह रणनीति ऐसे समय आई है, जब OpenAI, Anthropic और Microsoft जैसी कंपनियां भी फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स की भर्ती बढ़ा रही हैं। इन इंजीनियरों की मदद से कंपनियां अपने ग्राहकों के यहां AI को तेजी से लागू कर रही हैं।

AI, डेटा सिक्योरिटी में अधिग्रहण की तैयारी

TCS अब AI, डेटा सिक्योरिटी और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े अधिग्रहणों पर भी विचार कर रही है। TCS के CFO समीर सेक्सरिया ने कहा कि कंपनी ऐसे कारोबार तलाश रही है, जो उसकी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत बना सकें।

AI से आउटसोर्सिंग मॉडल को खतरा नहीं

कई निवेशकों को डर है कि AI की वजह से आईटी कंपनियों को मिलने वाले प्रोजेक्ट कम हो सकते हैं। लेकिन TCS के CEO का मानना है कि ऐसा नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि कंपनियों को AI अपनाने के लिए ऐसे पार्टनर की जरूरत होगी, जो उनके मौजूदा सिस्टम, डेटा और प्रक्रियाओं को अच्छी तरह समझते हों। यही TCS की सबसे बड़ी ताकत है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ कम लागत का मामला नहीं, बल्कि कंपनी के अनुभव और प्रतिभा का फायदा है।

AI कारोबार की ग्रोथ धीमी हुई

हालांकि, जून तिमाही में TCS के AI कारोबार की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी है। पहली तिमाही में AI से होने वाली सालाना आय की ग्रोथ 13% रही, जबकि पिछली तिमाही में यह 28% थी।

CEO ने कहा कि लंबी अवधि में वह AI कारोबार में करीब 25% तिमाही-दर-तिमाही ग्रोथ देखना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने माना कि यह बढ़ोतरी हर तिमाही एक जैसी नहीं रहेगी।

AI पर ₹8,500 करोड़ खर्च

TCS हर साल करीब 1 अरब डॉलर (लगभग ₹8,500 करोड़) टैलेंट डेवलपमेंट और AI पर खर्च करती है। इसमें कर्मचारियों की ट्रेनिंग, AI स्किल्स डेवलप करना और नई AI तकनीकों के लिए एक्सपर्ट्स की हायरिंग शामिल है।

*रॉयटर्स से इनपुट के साथ

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ये AI स्टार्टअप कर्मचारियों को दफ्तर के पास रहने के लिए दे रही 17 लाख का हाउसिंग स्टाइपेंड, 3 टाइम खाना, जिम-सॉना और न जाने क्या-क्या!

आज के समय में टेक कंपनियां अपने एम्प्लॉई को अट्रैक्ट करने के लिए कई तरह की फैसिलिटीज देती हैं, लेकिन न्यूयॉर्क की AI स्टार्टअप कंपनी रिला ने एक अलग पहल शुरू की है। कंपनी अपने एम्प्लॉई को ऑफिस के पास रहने के लिए लाखों रुपये का हाउसिंग स्टाइपेंड देती है। इसका मकसद एम्प्लॉई का आने-जाने का समय बचाना और उन्हें काम पर ज्यादा ध्यान फोकस करने में मदद करना है। हालांकि, इस सुविधा के साथ कंपनी का वर्क कल्चर भी काफी सख्त बताया जाता है:

एम्प्लॉई के रहने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है कंपनी

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न्यूयॉर्क की AI स्टार्टअप कंपनी रिला अपने एम्प्लॉई के हाउसिंग अलाउंस पर हर साल करीब 1.7 मिलियन डॉलर (लगभग 16-17 करोड़ रुपये) खर्च करती है। कंपनी के CEO सेबेस्टियन जिमेनेज़ का मानना है कि एम्प्लॉई को ऑफिस के करीब रहने से समय की बचत होती है और उनकी प्रोडक्टिविटी बेहतर हो सकती है। यह फैसिलिटी कंपनी की खास रणनीति का हिस्सा है, जिससे एम्प्लॉई अपने काम पर ज्यादा ध्यान दे सकें।

ऑफिस के पास रहने पर मिलता है ₹17 लाख से ज्यादा का स्टाइपेंड

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रिला कंपनी अपने एम्प्लॉई को सालाना करीब 18,000 डॉलर (लगभग 17 लाख रुपये) का हाउसिंग स्टाइपेंड देती है। यह लाभ उन एम्प्लॉई को मिलता है, जो ब्रुकलिन के विलियम्सबर्ग इलाके में कंपनी के ऑफिस से करीब 10 मिनट की बाइक दूरी के अंदर रहना पसंद करते हैं। विलियम्सबर्ग न्यूयॉर्क के सबसे पॉपुलर और एक्सपेंसिव एरिया में शामिल है, जहां स्टूडियो अपार्टमेंट का किराया लगभग 4,000 डॉलर प्रति महीने तक हो सकता है।

ज्यादातर एम्प्लॉई उठा रहे हैं इस सुविधा का लाभ

A row of colorful houses with a blue sky and trees in the background | Premium AI-generated image

रिला में करीब 120 एम्प्लॉई काम करते हैं, जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत एम्प्लॉई इस अल्टरनेटिव हाउसिंग फैसिलिटी का यूज कर रहे हैं। इसी वजह से कंपनी का सालाना खर्च करीब 1.7 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाता है। CEO के अनुसार, यह एम्प्लॉई को आराम देने के बजाय उनके काम करने के तरीके को बेहतर बनाने की कोशिश है।

आने-जाने का समय बचाना है कंपनी का प्राइमरी ऑब्जेक्टिव

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रिला के CEO सेबेस्टियन जिमेनेज़ का कहना है कि रोजाना ऑफिस आने-जाने में लगने वाला समय लोगों के दिन का सबसे स्ट्रेस्फुल बन जाता है। कंपनी चाहती है कि एम्प्लॉई लॉन्ग कम्युटेस में समय गंवाने के बजाय फैमिली के साथ समय बिताएं, किताब पढ़ें, एक्सरसाइज करें या कोई अच्छा काम कर सकें। इस तरह हाउसिंग अलाउंस को एम्प्लॉई की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।

हाउसिंग के अलावा भी मिलती हैं कई फैसिलिटीज

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रिला अपने एम्प्लॉई को हाउसिंग स्टाइपेंड के अलावा दिन में तीन बार खाने की सुविधा भी देती है। कंपनी एम्प्लॉई के लिए सॉना और कोल्ड प्लंज जैसी सुविधाओं वाली जिम भी तैयार कर रही है। हालांकि, इन सुविधाओं के साथ कंपनी का काम करने का माहौल काफी डिमांडिंग है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एम्प्लॉई अक्सर हफ्ते में छह दिन और रोजाना करीब 12 घंटे काम करते हैं, यानी लगभग 72 घंटे प्रति सप्ताह। CEO ने कंपनी के कल्चर को “बेहद सख्त” बताया है, जहां ज्यादा परफॉरमेंस और हार्ड रोक पर जोर दिया जाता है।

पहली LinkedIn पोस्ट और उसमें नौकरी जाने की खबर! 37 साल तक Microsoft का दिया साथ, फिर एक झटके में गई जॉब

37 साल… किसी नौकरी में बिताया गया यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मेहनत, भरोसे और अनगिनत यादों का सफर होता है। केविन लाचैपल ने माइक्रोसॉफ्ट में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में शुरुआत की और अपनी मेहनत के दम पर Xbox प्लेटफॉर्म के वाइस प्रेसिडेंट बने। उन्होंने कंपनी के कई बड़े प्रोजेक्ट्स को नई पहचान दी, लेकिन आखिरकार एक दिन उनका भी नाम छंटनी की लिस्ट में शामिल हो गया। सबसे भावुक बात यह रही कि 21 साल पुराने LinkedIn अकाउंट पर उन्होंने पहली बार कोई पोस्ट की और वह भी अपने 37 साल लंबे करियर के खत्म होने की खबर शेयर करने के लिए।

37 साल बाद नौकरी जाने की खबर बनी Xbox VP की पहली LinkedIn पोस्ट

केविन लाचैपल ने माइक्रोसॉफ्ट में 37 साल तक काम किया और इस दौरान कंपनी की कई बड़ी कंज्यूमर टेक्नोलॉजी विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में शुरुआत की और बाद में Xbox प्लेटफॉर्म के वाइस प्रेसिडेंट बने। उन्होंने Xbox बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी और क्लाउड गेमिंग जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व किया। लेकिन इस बार उनकी LinkedIn पोस्ट किसी नई उपलब्धि या प्रोडक्ट लॉन्च के बारे में नहीं थी, बल्कि नौकरी जाने की खबर थी। लाचैपल ने LinkedIn पर बताया कि वे Microsoft के Xbox डिवीजन में हाल ही में हुई छंटनी का हिस्सा बने हैं। उन्होंने लिखा, “आज Xbox से निकाले गए कर्मचारियों की सूची में मेरा भी नाम शामिल हो गया। इसके साथ ही माइक्रोसॉफ्ट में मेरा 37 साल का सफर खत्म हो गया।”

37 साल बाद पहली LinkedIn पोस्ट में सुनाई अपनी कहानी

केविन लाचैपल की यह पोस्ट उनके LinkedIn अकाउंट की पहली और अब तक की इकलौती पोस्ट है। उनका अकाउंट मई 2005 में बना था, लेकिन करीब 21 साल तक उस पर कोई अपडेट नहीं किया गया। आखिरकार उन्होंने अपने लगभग चार दशक लंबे करियर के खत्म होने की जानकारी इसी पोस्ट के जरिए साझा की। माइक्रोसॉफ्ट में बिताए अपने समय को याद करते हुए लाचैपल ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक Xbox की उस टीम का नेतृत्व करना था, जिसने Xbox बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी फीचर तैयार किया। इसकी मदद से पुराने Xbox गेम्स नए कंसोल पर भी खेले जा सकते हैं।

उन्होंने लिखा कि उनकी सबसे अच्छी यादें उन बेहतरीन इंजीनियरों के साथ काम करने की हैं, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को सफल बनाया। लाचैपल ने यह भी बताया कि उन्हें आज भी वह पल याद है, जब E3 2015 इवेंट में उस समय के Xbox प्रमुख फिल स्पेंसर ने पहली बार इस फीचर की घोषणा की थी। उस दौरान वह खुद भी ऑडिटोरियम में मौजूद थे।

लाचैपल ने बताया कि जब Xbox बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी फीचर की घोषणा की गई थी, तब दर्शकों की प्रतिक्रिया शानदार थी। उनके मुताबिक, वह पल उनके करियर की सबसे यादगार घटनाओं में से एक था। इसके बाद उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट की क्लाउड गेमिंग टीम का नेतृत्व किया। आगे चलकर यही प्रोजेक्ट ‘प्रोजेक्ट xCloud’ बना, जो Xbox की रणनीति का अहम हिस्सा बन गया। लाचैपल का मानना है कि आने वाले समय में लोग कहीं भी हों, मनोरंजन का ज्यादातर कंटेंट स्ट्रीमिंग के जरिए ही देखेंगे और इस्तेमाल करेंगे। कंपनी छोड़ते समय उन्होंने Xbox के पूर्व प्रमुख करीम चौधरी का भी धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट में अपने 37 साल के करियर के दौरान करीम चौधरी उनके सबसे अच्छे मैनेजर रहे।

विंडोज से लेकर Xbox क्लाउड गेमिंग तक, 37 साल का शानदार सफर

केविन लाचैपल ने तीन दशक से भी ज्यादा समय पहले माइक्रोसॉफ्ट में अपने करियर की शुरुआत की थी। Xbox प्लेटफॉर्म के वाइस प्रेसिडेंट बनने से पहले उन्होंने कंपनी के कई बड़े विभागों में काम किया और कई महत्वपूर्ण तकनीकी प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहे। उनके योगदान में Project xCloud को शुरू करने में अहम भूमिका निभाना, Microsoft Expression Encoder बनाने वाली टीम की स्थापना करना, HighMAT मल्टीमीडिया फॉर्मेट का सह-विकास करना, Windows के शुरुआती संस्करणों पर काम करना, Windows Movie Maker का पहला संस्करण लॉन्च करना और Xbox में वीडियो स्ट्रीमिंग व बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी जैसे फीचर विकसित करना शामिल है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्हें स्ट्रीमिंग, वीडियो एडिटिंग और मल्टीमीडिया तकनीक से जुड़े 17 पेटेंट भी मिले।

माइक्रोसॉफ्ट छोड़ने से पहले लाचैपल Xbox के क्लाउड, कंसोल और पीसी प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वह बड़ी इंजीनियरिंग टीमों का नेतृत्व करते थे और कंपनी की तकनीकी योजनाओं को बिजनेस रणनीति के साथ जोड़ने का काम करते थे।

Xbox में बड़े बदलाव के बीच गई केविन लाचैपल की नौकरी

केविन लाचैपल ऐसे समय में माइक्रोसॉफ्ट से अलग हुए हैं, जब Xbox अपने इतिहास के सबसे बड़े पुनर्गठन से गुजर रहा है। हाल ही में Xbox की सीईओ आशा शर्मा ने कर्मचारियों को बताया कि कंपनी बड़े बदलाव के तहत करीब 3,200 पद खत्म करेगी। यह Xbox के कुल कर्मचारियों का लगभग 20 प्रतिशत है। इनमें से 1,600 नौकरियां तुरंत समाप्त की जाएंगी, जबकि बाकी कटौती वित्त वर्ष 2027 तक पूरी की जाएगी। इसके अलावा कंपनी चार गेम स्टूडियो बेच रही है और एक अन्य स्टूडियो को भी अलग करने की तैयारी में है।

कर्मचारियों को भेजे गए एक संदेश में आशा शर्मा ने कहा कि कंपनी का कारोबार उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रहा है। उन्होंने बताया कि Xbox का मुनाफा (मार्जिन) इस क्षेत्र की दूसरी कंपनियों की तुलना में काफी कम है। उन्होंने गेमिंग इंडस्ट्री में चल रही हार्डवेयर से जुड़ी चुनौतियों का भी जिक्र किया और कहा कि अब Xbox के कारोबार को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है।

Apple के शौकीनों को बड़ा झटका! मैकबुक समेत इन प्रोडक्ट्स के बढ़े दाम, कंपनी ने AI को बताया वजह

अमेरिकी टेक्नोलॉजी दिग्गज Apple ने भारत में अपने कई प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ा दी हैं। इनमें Mac डेस्कटॉप, MacBook, Apple TV और HomePod समेत कई डिवाइस शामिल हैं। Apple का कहना है कि AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की वजह से मेमोरी और स्टोरेज चिप्स की कीमतें दुनिया भर में तेजी से बढ़ी हैं। अब कंपनी बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल रही है।

Mac Mini की कीमत में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी

  • सबसे बड़ी बढ़ोतरी Mac Mini M4 (256GB) की कीमत में हुई है। इसकी कीमत ₹59,900 से बढ़कर ₹82,900 हो गई है, यानी करीब 38% का इजाफा।
  • इसके अलावा Mac Mini M4 Pro अब ₹1,99,900 में मिलेगा। पहले इसकी कीमत ₹1,49,900 थी।
  • वहीं MacBook Air M5 की कीमत में ₹29,000 की बढ़ोतरी हुई है। अब यह ₹1,49,900 में मिलेगा।

Apple TV और HomePod भी हुए महंगे

  • Apple ने अपने स्मार्ट होम डिवाइस भी महंगे कर दिए हैं।
  • Apple TV 4K (64GB) की कीमत ₹14,900 से बढ़कर ₹25,900 हो गई है।
  • Apple TV 4K (128GB) अब ₹31,900 का हो गया है। पहले इसकी कीमत ₹16,900 थी।
  • HomePod की कीमत ₹32,900 से बढ़कर ₹44,900 हो गई है।
  • HomePod Mini अब ₹15,900 में मिलेगा, जबकि पहले इसकी कीमत ₹10,900 थी।
  • हाल ही में लॉन्च हुआ MacBook Neo भी ₹69,900 से बढ़कर ₹79,900 का हो गया है।

आखिर कीमतें बढ़ाने की नौबत क्यों आई?

Apple का कहना है कि इस समय पूरी कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। दरअसल, दुनिया भर में AI डेटा सेंटर तेजी से बन रहे हैं। इन डेटा सेंटरों को बड़ी मात्रा में मेमोरी और स्टोरेज चिप्स की जरूरत पड़ती है। मांग इतनी तेज हो गई है कि इन चिप्स की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं।

कंपनी का कहना है कि उसने अब तक बढ़ी लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला था। लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि कुछ प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाना जरूरी हो गया है। Apple ने अपने बयान में कहा, ‘हमें पता है कि यह ग्राहकों के लिए अच्छी खबर नहीं है। लेकिन हम लगातार ऐसे तरीके खोजने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे कीमतों पर दबाव कम किया जा सके।’

Tim Cook पहले ही दे चुके थे संकेत

Apple के निवर्तमान CEO टिम कुक ने हाल ही में The Wall Street Journal को दिए इंटरव्यू में कहा था कि मेमोरी चिप्स की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण प्रोडक्ट्स महंगे होना अब लगभग तय है।

उन्होंने कहा था कि Apple अब तक बढ़ी लागत का बोझ खुद उठा रही थी। लेकिन कंपोनेंट्स की कीमतों में जिस रफ्तार से बढ़ोतरी हुई है, उसके बाद ऐसा लंबे समय तक करना मुमकिन नहीं है।

AI की वजह से क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?

मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि मेमोरी चिप बनाने वाली कंपनियां अब अपने प्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा AI डेटा सेंटरों के लिए दे रही हैं। इसकी वजह से लैपटॉप, स्मार्टफोन और दूसरे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स के लिए चिप्स की सप्लाई कम हो गई है।

जब सप्लाई घटती है और मांग बढ़ती है तो कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। यही वजह है कि पूरी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री पर लागत का दबाव बढ़ गया है। Deutsche Bank ने इसे ग्राहकों पर पड़ने वाला संभावित ‘मेमोरी इन्फ्लेशन टैक्स’ बताया है। यानी AI की बढ़ती मांग का खर्च आखिरकार ग्राहकों की जेब पर पड़ सकता है।

मेमोरी कंपनियां रिकॉर्ड कमाई कर रही हैं

मेमोरी चिप बनाने वाली कंपनी Micron ने हाल ही में 86% ग्रॉस मार्जिन दर्ज किया है। एक साल पहले यह सिर्फ 15% था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मेमोरी चिप्स की कीमतों में कितनी बड़ी तेजी आई है।

वहीं Morgan Stanley ने अपनी ‘Chipflation’ रिपोर्ट में कहा है कि सेमीकंडक्टर की बढ़ती लागत का असर आने वाले समय में लगभग सभी इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की कीमतों पर दिखाई देगा।

क्या iPhone भी महंगा हो सकता है?

फिलहाल Apple ने भारत या दूसरे देशों में iPhone की कीमत बढ़ाने का ऐलान नहीं किया है।

हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर DRAM और NAND मेमोरी की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और AI डेटा सेंटरों की मांग ऊंची बनी रही, तो आने वाले समय में iPhone की कीमतें बढ़ने की भी पूरी संभावना है। ऐसे में स्मार्टफोन खरीदने वाले ग्राहकों को भी जल्द महंगे iPhone का सामना करना पड़ सकता है।

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