गोवा फॉरवर्ड पार्टी का मोहभंग हो गया!

गोवा में गठबंधन की नई तस्वीर बन रही है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने गोवा की राजनीति में हलचल मचा दी थी। उन्होंने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ अलायंस बना कर इसका ऐलान कर दिया था। एक बड़े कार्यक्रम में गोवा फॉरवर्ड पार्टी के नेता विजय सरदेसाई केसाथ केजरीवाल ने मीडिया से बात की और ‘गोवा फर्स्ट’ अलांयस का ऐलान किया। गौरतलब है कि पहले गोवा फॉरवर्ड पार्टी यानी जीएफपी कांग्रेस के साथ थी। इस गठबंधन को कांग्रेस के लिए झटका माना गया। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि विजय सरदेसाई का मोहभंग हो रहा है या उनको गोवा की राजनीति की वास्तविकता का अंदाजा हो रहा है।

विजय सरदेसाई ने अब ‘गोवा फर्स्ट’ की बजाय ग्रैंड अलायंस की बात शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि वे चाहते हैं कि इस गठबंधन में कांग्रेस को भी रखा जाए। हालांकि कांग्रेस किसी हाल में आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल नहीं करेगी। इसका कारण पंजाब का चुनाव है। अगर कांग्रेस और आप ने तालमेल किया तो पंजाब में कांग्रेस की उम्मीदें पंक्चर होंगी। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल चाहेंगे कि ग्रैंड अलायंस बन जाए। उनको इसका गोवा में तो लाभ होगा ही पंजाब में ज्यादा फायदा हो जाएगा। 2021 में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट से तालमेल किया था, जिसका बड़ा नुकसान उसको केरल में उठाना पड़ा था। वैसे ही अगर इस बार कांग्रेस ने गोवा में आप से तालमेल किया तो पंजाब में नुकसान होगा। तभी कांग्रेस नेता विजय सरदेसाई के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह संभव है कि वे केजरीवाल से तालमेल तोड़ें तब कांग्रेस से उनका गठबंधन हो सकता है।

Drishyam 3 box office collection day 13: अजय देवगन स्टारर की रफ्तार दूसरे हफ्ते में धीमी पड़ी, बुद्धवार को सबसे कम कमाई दर्ज की गई

Drishyam 3 box office collection day 13: अजय देवगन की क्राइम थ्रिलर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक शानदार शुरुआती हफ्ते के बाद अब धीरे-धीरे धीमी पड़ रही है। फिल्म ने अपने दूसरे बुधवार को 5.25 करोड़ रुपये की कमाई की, जो अब तक की सबसे कम एक दिन की कमाई है। इसके साथ ही फिल्म की कुल घरेलू नेट कमाई 328.75 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। रजनीकांत की ‘जेलर 2’ के सिनेमाघरों में आने के बाद ‘दृश्यम 3’ का तीसरे हफ्ते खेल बिगड़ सकता है।

‘दृश्यम 3’ की कमाई में मिडवीक गिरावट

अजय देवगन के करियर में ‘दृश्यम 3’ को सबसे बड़ी ओपनिंग मिली। ‘दृश्यम द कंक्लूजन’ के लिए एडवांस बुकिंग 27 सितंबर को शुरू हुई थी और रिलीज से पहले ही फिल्म ने 27 करोड़ रुपये की कमाई कर ली थी। पहले दिन के अंत तक, फिल्म ने पूरे भारत में 66.75 करोड़ रुपये (नेट) की कमाई की। यह किसी भी हिंदी फिल्म की अब तक की तीसरी सबसे बड़ी ओपनिंग है और अजय देवगन के करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग है। पहले शनिवार को फिल्म ने 53.50 करोड़ रुपये कमाए, और रविवार को इसमें भारी उछाल आया, जिससे फिल्म ने 61 करोड़ रुपये की कमाई की। यह फिल्म की अब तक की एक दिन की सबसे ज्यादा कमाई है।

सोमवार को पहली गिरावट देखने को मिली, जब फिल्म ने 21 करोड़ रुपये कमाए, जो रविवार के आंकड़ों से लगभग 65.6% कम था। मंगलवार को भी यह गिरावट जारी रही, जब ‘दृश्यम 3’ ने 19.50 करोड़ रुपये कमाए और बुधवार को 15.50 करोड़ रुपये की कमाई हुई। फिल्म का पहला हफ्ता 245.50 करोड़ रुपये की कुल कमाई के साथ समाप्त हुआ। रिलीज के दस दिनों के भीतर ही फिल्म ने 300 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया। ‘सैकनिल्क’ (Sacnilk) के ताजा अपडेट के अनुसार, ‘दृश्यम 3’ ने अपने दूसरे बुधवार को सिनेमाघरों में 5.25 करोड़ रुपये की कमाई की। यह फिल्म की अब तक की सबसे कम एक दिन की कमाई है। इसके साथ ही फिल्म का कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 328.75 करोड़ रुपये हो गया है।

‘दृश्यम 3’ को रजनीकांत की बड़ी फिल्म ‘जेलर 2’ से कड़ी टक्कर मिलेगी। यह फिल्म इस साल की सबसे बहुप्रतीक्षित फिल्मों में से एक है और बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने के लिए तैयार है। उम्मीद है कि यह फिल्म अपनी रिलीज के पहले ही दिन ₹140 करोड़ की शानदार कमाई करेगी। 14 अक्टूबर (बुधवार) की सुबह तक, फिल्म की ओपनिंग वीकेंड के लिए दुनिया भर में एडवांस बुकिंग ₹80 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी थी।

‘दृश्यम 3’ के बारे में

‘दृश्यम 3’ में अजय देवगन एक बार फिर विजय सलगांवकर के किरदार में नजर आएंगे। उनके साथ तब्बू, श्रिया सरन, रजत कपूर, इशिता दत्ता, मृणाल जाधव और कमलेश सावंत भी होंगे। सौरभ शुक्ला भी दूसरे भाग वाले अपने किरदार में एक कैमियो रोल निभाते नजर आएंगे।

‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ को स्टार स्टूडियो18 और पैनोरमा स्टूडियो का सहयोग प्राप्त है, और अभिषेक पाठक इसके तीसरे भाग का निर्देशन कर रहे हैं। उन्होंने आमिल कीयान खान और परवेज़ शेख के साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा भी लिखी है। आलोक जैन, अजीत अंधारे, कुमार मंगत पाठक और अभिषेक पाठक इस फिल्म का निर्माण कर रहे हैं।

सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)

Bank Holiday: अगले 15 दिनों में 10 दिन बंद रहेंगे बैंक, देखिए RBI की ये पूरी लिस्ट

Bank Holiday October: अगर अक्टूबर के बचे हुए दिनों में बैंक से जुड़ा आपका कोई भी जरूरी काम अटका है, तो यह खबर आपके लिए बेहद काम की है। त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े यानी 15 अक्टूबर से 30 अक्टूबर 2026 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में बैंक कई दिनों तक बंद रहने वाले हैं।

दुर्गा पूजा, विजयादशमी, लक्ष्मी पूजा और करवा चौथ जैसे बड़े त्योहारों के चलते विभिन्न राज्यों में बैंकों में छुट्टियों की भरमार है। आइए आपको बताते हैं कि अगले 15 दिनों में किस-किस दिन बैंक बंद रहेंगे, ताकि आप अपनी ब्रांच जाने का प्लान पहले से बना सकें।

15 से 30 अक्टूबर 2026: बैंक छुट्टियों की पूरी लिस्ट

17 अक्टूबर (शनिवार): महा सप्तमी- केवल अगरतला में बैंक बंद (नोट: बाकी भारत के लिए यह महीने का तीसरा शनिवार है और बैंक खुले रहेंगे)

18 अक्टूबर (रविवार): साप्ताहिक अवकाश- पूरे देश में बैंक बंद

19 अक्टूबर (सोमवार): महा नवमी / आयुध पूजा- अगरतला, आइजोल, भुवनेश्वर, चेन्नई, गुवाहाटी, इम्फाल, ईटानगर, कोहिमा, कोलकाता, पटना, रांची और शिलांग।

20 अक्टूबर (मंगलवार): विजया दशमी / दशहरा- लगभग पूरे देश में (गंगटोक और इम्फाल को छोड़कर)।

21 अक्टूबर (बुधवार): दुर्गा पूजा / विजया दशमी- अगरतला, बेंगलुरु, गंगटोक, गुवाहाटी, कोच्चि, कोलकाता और तिरुवनंतपुरम।

22–23 अक्टूबर (गुरुवार – शुक्रवार): दुर्गा पूजा / दसैन- केवल गंगटोक (सिक्किम)।

24 अक्टूबर (शनिवार): चौथा शनिवार- पूरे देश में बैंकों की छुट्टी।

25 अक्टूबर (रविवार): साप्ताहिक अवकाश / लक्ष्मी पूजा- पूरे देश में साप्ताहिक अवकाश (ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी पूजा का विशेष अवकाश)।

26 अक्टूबर (सोमवार): लक्ष्मी पूजा / एसेशन डे / वाल्मीकि जयंती- अगरतला, चंडीगढ़, जम्मू, शिमला और श्रीनगर।

29 अक्टूबर (गुरुवार): करवा चौथ- केवल शिमला में स्थानीय अवकाश।

ग्राहकों के लिए जरूरी सलाह

त्योहारी सीजन के इन दिनों में लगातार छुट्टियों के कारण बैंक शाखाओं में कामकाज प्रभावित हो सकता है। वैसे राहत की बात यह है कि बैंक बंद रहने के बावजूद ऑनलाइन बैंकिंग, UPI, मोबाइल बैंकिंग और ATM सेवाएं पूरी तरह चालू रहेंगी। इसलिए, कैश निकालने या पैसों के लेन-देन से जुड़े जरूरी काम डिजिटल माध्यम से आसानी से निपटाए जा सकते हैं।

ऑस्ट्रेलियाई महिला टीम ने बंगलादेश को आठ विकेट से हराया

मेगन शूट (चार विकेट) और ऐनाबेल सदरलैंड (दो विकेट/ नाबाद74), एलिस पेरी (नाबाद 64) रन के शानदार प्रदर्शन की बदौलत ऑस्ट्रेलिया महिला टीम ने तीसरे एकदिवसीय मुकाबले में बंगलादेश को 164 गेंदे शेष रहते आठ विकेट से शिकस्त दी। इसी के साथ ऑस्ट्रेलिया ने तीन मैचों सीरीज 3-0 से अपने नाम कर ली। मेगन शूट को उनके शानदार प्रदर्शन के लिए ‘प्लेयर ऑफ द मैच तथा प्लेयर ऑफ सीरीज’ के पुरस्कार से नवाजा गया।

173 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलिया ने 22.4 ओवरों में दो विकेट पर 175 रन बनाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया। बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलियाको पहला झटका दूसरे ही ओवर में जॉर्जिया वॉल (11) रन के रूप में लगा। इसके बाद बेथ मूनी (21) रन बनाकर आउट हुई। इसके बाद एलिस पेरी और ऐनाबेल सदरलैंड ने 137 रनों की अविजित साझेदारी कर अपनी टीम को जीत दिला दी। एलिस पेरी ने 64 गेंदों में आठ चौके लगाते हुए (नाबाद 65) रन बनाये। ऐनाबेल सदरलैंड ने 52 गेंदेां में 12 चौके लगाते हुए (नाबाद 74) रनों की मैच विजयी पारी खेली।

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बंगलादेश के लिए सुल्ताना खातून और दिशा बिस्वास ने एक-एक बल्लेबाज को आउट किया। इससे पहले ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों ने बंगलादेश को 49.5 ओवरों में 172रनों के स्कोर पर समेट दिया था। आज यहां टॉस जीतकर ऑस्ट्रेलियाई महिला टीम ने पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया। बंगलादेश की शुरुआत अच्छी नहीं रही और उसने 45 रन के स्कोर तक अपने चार विकेट गंवा दिये। मुर्शीदा खातून (एक), शर्मिन सुल्ताना (छह), कप्तान निगार सुल्तान (तीन) और शोभना मोस्तारी (नौ) रन बनाकर आउट हुई। इन चारों बल्लेबाजों को मेगन शूट ने आउट किया।

इसके बाद शर्मीन अख्तर और शोरना अख्तर की जोड़ी ने बंगलादेश की पारी को संभालने का प्रयास किया। इन दोनों के बीच पांचवें विकेट के लिए 54 रनों की साझेदारी हुई। 34वें ओवर में एलिस पैरी ने शर्मीन अख्तर (50) रन को आउट कर इस साझेदारी का अंत किया। इसके बाद ऋतु मोनी (नौ) और राबेय खान (13) रन बनाकर आउट हुई। 49वें ओवर में एनाबेल सदरलैंड ने शोरना अख्तर (54) को आउटकर पवेलियन भेज दिया। इसी ओवर की अखिरी गेंद पर सदरलैंड ने हबीबा इस्लाम (शून्य) का भी शिकार कर लिया। 50वें ओवर की पांचवीं गेंद पर गार्डनर ने सुल्ताना ख़ातून (पांच) रन को आउट कर बंगलादेश की पारी का 172 रन के स्कोर पर अंत कर दिया।

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शुभमन गिल और शेफाली वर्मा ने जीता सितंबर माह का प्लेयर ऑफ द मंथ अवार्ड

Shubhman Gill

पिछले महीने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए एशिया कप और एशियन गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन के बाद शेफाली वर्मा ने सितंबर के लिए महिला आईसीसी प्लेयर ऑफ द मंथ का पुरस्कार जीता जबकि भारत के कप्तान शुभमन गिल ने वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला में शानदार प्रदर्शन के बाद रिकॉर्ड पांचवें आईसीसी प्लेयर ऑफ द मंथ का पुरस्कार जीता है।

शेफाली के साथ श्रीलंका की कप्तान चामरी अथापथु और भारतीय बाएं हाथ की स्पिनर श्री चरणी भी महिला सम्मान की दौड़ में थीं। वर्मा, जिन्होंने पिछले साल नवंबर में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ महिला एकदिवसीय विश्व कप फाइनल में अपनी मैच विजयी पारी के बाद पुरस्कार जीता था, ने बड़े मैचों में अपने प्रदर्शन के लिए सुर्खियों में आने के बाद दूसरी बार यह सम्मान हासिल किया।

आक्रामक सलामी बल्लेबाज अपनी टीम के लिए सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी थी क्योंकि भारत ने महिला एशिया कप जीता था। उन्होंने 184.61 की स्ट्राइक रेट से 360 रन बनाए और इस दौरान छह विकेट भी लिए। एशियाई खेलों में, उन्होंने सेमीफाइनल में बांग्लादेश के खिलाफ नाबाद 100 रन और फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ 48 रन बनाये। वर्मा ने कहा, “आईसीसी प्लेयर ऑफ द मंथ का पुरस्कार फिर से जीतना एक अविश्वसनीय सम्मान है। एशिया कप और एशियाई खेलों में हमारी जीत में अपनी भूमिका निभाना बेहद संतोषजनक था और यह पुरस्कार जीतना उन जीतों को और भी खास बनाता है।”

उन्होंने कहा, “मैं आने वाले महीनों को लेकर उत्साहित हूं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हूं, अगले साल फरवरी में आईसीसी महिला चैंपियंस ट्रॉफी एक और टूर्नामेंट है। विश्व कप जीतने की यादें अभी भी ताजा और विशेष हैं, और मैं घरेलू धरती पर आईसीसी टूर्नामेंट के लिए मैदान पर वापस आने का इंतजार नहीं कर सकती। यह एक अविस्मरणीय अनुभव होने का वादा करता है।” इस बीच गिल ने वेस्ट इंडीज की कप्तान हेली मैथ्यूज का अनुकरण करते हुए पुरुषों के लिए अपना रिकॉर्ड बढ़ाने के लिए अपना पांचवां पुरस्कार जीता, जो पांच मौकों पर आईसीसी प्लेयर ऑफ द मंथ भी रहे हैं। उनके पिछले पुरस्कार जनवरी और सितंबर 2023 और फरवरी और जुलाई 2025 के महीनों में आए थे।

Shefali Verma

भारत के टेस्ट और एकदिवसीय कप्तान ने तिरुवनंतपुरम में वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले एकदिवसीय मैच में 110 रन बनाए, जिससे मेजबान टीम की आठ विकेट की जीत में योगदान हुआ जिसने उन्हें श्रृंखला में 1-0 से आगे कर दिया।इसके बाद उन्होंने अब तक का सबसे तेज दोहरा शतक जड़ा, 133 गेंदों पर 223 रनों की पारी खेलकर उनकी टीम ने 406 रन के विशाल लक्ष्य को आठ विकेट शेष रहते हासिल कर लिया और 39 गेंदें अभी बाकी थीं।

गिल ने कहा, “मेरा पांचवां आईसीसी प्लेयर ऑफ द मंथ अवॉर्ड जीतना शानदार लग रहा है। उन रनों को स्कोर करना बेहद संतोषजनक था और हमारे घरेलू प्रशंसकों के सामने सफल रन चेज़ का हिस्सा बनना और भी विशेष था, जिनके समर्थन से हमें हमेशा अतिरिक्त बढ़ावा मिलता है। एकदिवसीय क्रिकेट की गति काफी बढ़ गई है, और आपको अपने पैरों पर खड़े होकर सोचना चाहिए, परिस्थितियों का तुरंत आकलन करना चाहिए और पिच और लक्ष्य की मांगों के अनुसार खुद को ढालना चाहिए। अगले साल दक्षिणी अफ्रीका में आईसीसी पुरुष क्रिकेट विश्व कप के साथ, हम अपने मानकों को ऊपर उठाने और एक मजबूत और संतुलित टीम बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो।”

हेजलवुड के 6 विकेट से ऑस्ट्रेलिया ने दक्षिण अफ्रीका को हराया

जोश हेजलवुड ने टेस्ट में अपनी सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी (49 रन पर छह विकेट) के दम पर दक्षिण अफ्रीका के बाकी छह विकेटों में से चार विकेट चटकाए, जिससे ऑस्ट्रेलिया ने डरबन में पहले टेस्ट के पांचवें दिन मंगलवार को दूसरे सत्र की शुरुआत में ही 214 रनों से जीत हासिल कर ली और तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली।

हेजलवुड ने 5वें दिन वियान मुल्डर के विकेट के साथ कार्यवाही शुरू की और एनरिक नॉर्टजे के अंतिम विकेट के साथ फिनिशिंग टच भी दिया। इस बीच, एडेन मार्करम ने वही करने का प्रयास किया जो फाफ डु प्लेसिस ने एडिलेड 2012 में किया था, लेकिन निचले क्रम के अधिकांश अन्य बल्लेबाजों का सहयोग नहीं मिला। आख़िरकार, कप्तान टेम्बा बावुमा के नेतृत्व में दक्षिण अफ़्रीका को अपनी पहली टेस्ट हार का सामना करना पड़ा।

चौथी पारी में दक्षिण अफ्रीका का खराब प्रदर्शन चौथे दिन देर से शुरू हुआ जब उसने चार विकेट खो दिए। मार्करम और वियान मुल्डर ने अंत में संघर्ष का कुछ साहस दिखाया, जो पांचवें दिन सुबह के लगभग पूरे सत्र तक चला और घरेलू टीम में आशा की किरण जगाई। उन्होंने 29 रन बनाने के लिए 109 गेंदों तक संघर्ष करने के बाद वियान मुल्डर को लेग साइड पर पीछे से कैच कराया। हेजलवुड ने 204 गेंदों तक चले स्टैंड को तोड़ा और अपनी टीम को ओपनिंग दिलाई। स्टीव स्मिथ ने स्लिप में खेल का तीसरा ब्लाइंडर लेकर काइल वेरेन को वापस भेजा और मैट रेनशॉ को दूसरा विकेट दिया।

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156/6 पर, ऐसा लग रहा था कि लिखावट तब तक दीवार पर थी जब तक मार्को यानसन नहीं आए और ऑस्ट्रेलिया की विजय यात्रा को रोकने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। उन्होंने मार्करम के साथ 103 गेंदों तक बल्लेबाजी की और दक्षिण अफ्रीका को सुबह के सत्र से आगे और दूसरे सत्र में पहुंचाया। लेकिन एक बार फिर, हेजलवुड दक्षिण अफ्रीका के विरोधी के रूप में सामने आये।

उन्हें एक असाधारण निप बैकर मिला – जिसने 1.4 डिग्री में सीम किया, जिसने यानसन की रक्षा को तोड़ दिया और उसके स्टंप को वापस मारकर ऑस्ट्रेलिया को जीत की राह पर ला दिया। उसी ओवर में, उन्होंने साइमन हार्मर को तेजी से उठती हुई डिलीवरी से आश्चर्यचकित कर दिया, जो कि सीम में भी थी। हार्मर नुकसान के रास्ते से बाहर नहीं निकल सके और कैरी के पीछे पहुंच गए। इसके साथ, हेजलवुड ने टेस्ट में अपना 15वां पांच विकेट लेने का कारनामा किया।

दक्षिण अफ्रीका के ताबूत में आखिरी कील अगले ओवर में मिशेल स्टार्क ने ठोक दी, जब उन्होंने स्टंप के पीछे कैरी की गेंद पर मार्करम को इनसाइड एज पर कैच कराया। मार्करम को 237 गेंदों में 75 रनों की संघर्षपूर्ण पारी खेलने के लिए भेजने के लिए अंपायर की समीक्षा की आवश्यकता पड़ी। गुस्से से भरे हेजलवुड ने नॉर्टजे को एक छोटी गेंद देकर कार्यवाही पूरी की, जो गेंद को केवल मिड-विकेट पर नाथन लियोन तक ही मार सके। हेजलवुड 6/49 के साथ समाप्त हुए – मार्च 2017 में बेंगलुरु में भारत के खिलाफ 6/67 के अपने पिछले सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से बेहतर।

संक्षिप्त स्कोर: ऑस्ट्रेलिया 390 (मैट रेनशॉ 190, पैट कमिंस 43; वियान मुल्डर 4-68, मार्को यानसन 3-68) और 314/6 पारी घोषित। (मैथ्यू रेनशॉ 82, निक मैडिनसन 48; एनरिक नॉर्टजे 2-56, केशव महाराज 2-56) दक्षिण अफ्रीका 284 और 206 से आगे (एडेन मार्करम 75, डेविड बेडिंघम 46; जोश हेजलवुड 6-49, मैट रेनशॉ 2-39)।

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ऋषभ पंत न्यूजीलैंड के खिलाफ ए मैचों से बाहर, यह कीपर हुआ शामिल

 

न्यूजीलैंड ए के खिलाफ पहले दो चार-दिन के मैचों के लिए ऋषभ पंत की जगह कुमार कुशाग्र इंडिया ए में शामिल किया गया है।ऋषभ पंत को बाईं पसली में खिंचाव से उबरने की प्रक्रिया के कारण न्यूजीलैंड दौरे पर इंडिया ए के पहले दो चार-दिन के मैचों से बाहर कर दिया गया है और उनकी जगह कुमार कुशाग्र को टीम में शामिल किया गया है।

गौरतलब है कि ऋषभ पंत टीम इंडिया के लिए सिर्फ लाल गेंद की क्रिकेट ही खेलते हैं ऐसे में यह उनके करियर के लिए ठीक संकते तो नहीं है। लेकिन विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के लिए फाइनल में जाने के लिए मेहनत करने वाली टीम इंडिया के लिए भी झटका है।

ईरानी कप में शेष भारत की अगुआई करने वाले पंत की मांसपेशियों में खिंचाव आ गया है जिसके कारण वह शुरुआती दो मैच से बाहर हो गए हैं।इस दौरे के लिए पंत की उपलब्धता उनकी फिटनेस पर निर्भर थी। बीसीसीआई ने कहा कि वह बोर्ड की चिकित्सा टीम की निगरानी में हैं और अच्छी तरह उबर रहे हैं।

बीसीसीआई ने बयान में कहा कि तीसरे मैच के लिए उनकी उपलब्धता पर फैसला बाद में लिया जाएगा। पंत की चोट शुरुआती अनुमान से अधिक गंभीर लग रही है।

पुरुष चयन समिति ने पहले दो मैच के लिए पंत की जगह कुशाग्र को टीम में शामिल किया है।भारत ए टीम की कप्तानी ध्रुव जुरेल करेंगे। वह विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी भी संभालेंगे। टीम में यशस्वी जायसवाल, लोकेश राहुल और वाशिंगटन सुंदर जैसे अनुभवी खिलाड़ियों के अलावा देवदत्त पडिक्कल और साई सुदर्शन भी शामिल हैं।

पिछले 4 साल में सिर्फ 1 वनडे मैच खेलने वाले ऋषभ पंत, जो वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला के लिए जगह बनाने में असफल रहे थे। ऋषभ पंत चैंपियन्स ट्रॉफी 2025 की विजयी टीम में भी शामिल थे लेकिन पूरे टूर्नामेंट में वह बैंच पर बैठे रहे थे।कुछ ऐसा ही दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारत की घरेलू सीरीज के दौरान हुआ जब चयनित हुए ऋषभ पंत को तीन मैचों की सीरीज में एक बार भी मौका नहीं मिला।

ऋषभ पंत को बीते कुछ सालों में लगभग हर दौरे में चोट लगी है। इंग्लैंड दौरे पर उनको पैर के अंगूठे और कोहनी में चोट लगी। इसके बाद उनको श्रीलंका में दूसरे टेस्ट में भी चोट लगी।

Dhruv Jurel

इंडिया A टीम:यशस्वी जयसवाल, केएल राहुल, देवदत्त पडिक्कल, रविचंद्रन स्मरण, ध्रुव जुरेल (कप्तान, विकेटकीपर), वॉशिंगटन सुंदर, औकिब नबी, आकाश दीप, अंशुल कंबोज, मानव सुथार, मुकेश चौधरी, साई सुदर्शन, यश राठौड़, मुकेश कुमार और कुमार कुशाग्र (विकेटकीपर)।

Andhra Pradesh: डिवाइडर से टकराई EV, धू-धू कर जली कार, चार लोगों की जिंदा जलकर मौत

आंध्र प्रदेश के NTR जिले में विजयवाड़ा वेस्ट बाईपास पर सोमवार शाम एक दर्दनाक सड़क हादसा हुआ। विजयवाड़ा वेस्ट बाईपास पर एक इलेक्ट्रिक गाड़ी (EV) डिवाइडर से टकराने के बाद आग की चपेट में आ गई। इस हादसे में तीन साल के बच्चे समेत चार लोगों की जिंदा जलकर मौत हो गई, जबकि एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, कार में सवार लोग गुंटूर जिले के नंबुरु गांव में एक कार्यक्रम से लौट रहे थे। ये एक्सीडेंट शाम करीब 6 बजे हुआ।

हादसे में 4 लोगों की हुई मौत

हादसे में जान गंवाने वालों की पहचान विजयवाड़ा के नुन्ना इलाके के रहने वाले 39 वर्षीय कोम्मारेड्डी रामदेव के रूप में हुई है। उनके साथ उनकी 65 वर्षीय मां कोम्मारेड्डी अरुणा और 30 वर्षीय बहन तिगुरु विजया की भी मौत हो गई। दोनों महिलाएं गुंटूर जिले के नंबुरु की रहने वाली थीं। हादसे में एक बच्चे की भी जान चली गई, जिसकी पहचान फिलहाल नहीं हो सकी है। गंभीर रूप से घायल व्यक्ति का इलाज जारी है।

कुछ ही देर में फैल गई आग

हादसे से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें कार को आग की तेज लपटों में घिरा देखा जा सकता है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, तेज रफ्तार कार सड़क के किनारे लगे डिवाइडर या रेलिंग से टकरा गई, जिसके बाद उसमें आग लग गई। आग कुछ ही समय में पूरी गाड़ी में फैल गई और अंदर बैठे चार लोग बाहर नहीं निकल सके। उनकी मौके पर ही मौत हो गई।  हादसे में घायल हुए पांचवें व्यक्ति को स्थानीय लोगों की मदद से अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई है।

पुलिस कर रही मामले की जांच

घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस और दमकल की टीम मौके पर पहुंची। फायर ब्रिगेड ने कार में लगी आग बुझाई, जबकि पुलिस ने हादसे की जांच शुरू कर दी और दुर्घटना के कारणों का पता लगाने में जुट गई। अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआती जांच में कार की तेज रफ्तार को हादसे की संभावित वजह माना जा रहा है। हालांकि, पुलिस अभी पूरे मामले की जांच कर रही है। हादसा कैसे हुआ और टक्कर के बाद कार में आग किस वजह से लगी, इसका पता लगाने के लिए सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।

OTT Crime Thrillers: अगर आप भी हैं डिजिटल क्राइम थ्रिलर्स के दीवाने, ओटीटी पर इन फिल्मों और सीरीज का उठा सकते हैं लुत्फ

OTT Crime Thrillers: इन्फ्लुएंसर अंकुश बहुगुणा के 40 घंटे के ‘डिजिटल-अरेस्ट’ के बुरे अनुभव से लेकर हाल ही में जाह्नवी कपूर के AI-जनरेटेड डीपफेक वीडियो तक, भारत में डिजिटल धोखाधड़ी एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। जहां एक घटना साइबर फ्रॉड और आर्थिक शोषण के खतरे को उजागर करती है, वहीं दूसरी यह दिखाती है कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का गलत इस्तेमाल करके तस्वीरों में हेरफेर की जा सकती है और लोगों की प्राइवेसी का उल्लंघन किया जा सकता है।

ऐसी घटनाएं टेक्नोलॉजी के बुरे पहलुओं को सामने लाती हैं। इसलिए भारतीय एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भी दिलचस्प ड्रामा, थ्रिलर और डॉक्युसीरीज के जरिए इन विषयों को दिखा रही है। फिशिंग नेटवर्क से लेकर फाइनेंशियल स्कैम और AI-आधारित हेरफेर तक, यहा कुछ ऐसे भारतीय शो और फिल्में हैं, जो डिजिटल धोखाधड़ी के कई रूपों पर रोशनी डालते हैं।

1. स्कैम 1992 द हर्षद मेहता स्टोरी-Sony LIV

1992 के सिक्योरिटीज स्कैम पर आधारित, ‘स्कैम 1992’ स्टॉकब्रोकर हर्षद मेहता के उत्थान और पतन की कहानी है। हर्षद मेहता मुंबई के स्टॉक मार्केट में मशहूर हुए थे, लेकिन बाद में भारत के सबसे कुख्यात फाइनेंशियल स्कैम में फंस गए। प्रतीक गांधी अभिनीत और हंसल मेहता द्वारा निर्देशित यह सीरीज बैंकिंग की कमियों, फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन और उन मीडिया इन्वेस्टिगेशन को दिखाती है, जिनकी वजह से यह स्कैम सबके सामने आया। पत्रकार सुचेता दलाल और देबाशीष बसु की किताब ‘द स्कैम हू वॉन, हू लॉस्ट, हू गॉट अवे’ पर आधारित यह सीरीज फाइनेंशियल मार्केट की जटिलताओं और सिस्टम की कमियों का फायदा उठाने के नतीजों की झलक दिखाती है। यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि स्कैम तब पनपते हैं जब लोग और संस्थाएँ उन सिस्टम पर सवाल नहीं उठाते जिन पर वे भरोसा करते हैं।

2. CTRL- Netflix

अनन्या पांडे और विहान सामत अभिनीत, ‘CTRL’ एक इन्फ्लुएंसर की कहानी है, जो अपनी डिजिटल जिंदगी से अपने एक्स-बॉयफ्रेंड की यादें मिटाने के लिए एक AI ऐप का सहारा लेती है। लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि उस टेक्नोलॉजी का मकसद बहुत खतरनाक है। विक्रमादित्य मोटवाने द्वारा निर्देशित यह नेटफ्लिक्स थ्रिलर दिखाती है कि कैसे पर्सनल डेटा, AI टूल्स और टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता का इस्तेमाल लोगों को मैनिपुलेट करने के लिए किया जा सकता है।

3. स्कैम 2003 द तेलगी स्टोरी- Sony LIV

स्टॉक मार्केट से नकली कागजात के मामले की ओर बढ़ते हुए, ‘स्कैम 2003 द तेलगी स्टोरी’ अब्दुल करीम तेलगी के स्टाम्प पेपर के नकली कारोबार की कहानी दिखाती है। गगन देव रियार की मुख्य भूमिका वाली यह सीरीज दिखाती है कि कैसे स्टाम्प पेपर सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर यह रैकेट एक बड़े नेटवर्क में बदल गया। पत्रकार संजय सिंह की किताब ‘तेलगी स्कैम: रिपोर्टर्स डायरी’ पर आधारित यह शो इस कारोबार के दायरे और उस नेटवर्क के बारे में बताता है जिसने इसे एक बड़े फाइनेंशियल स्कैम में बदल दिया।

4. जामताड़ा सबका नंबर आएगा-Netflix

बड़े फाइनेंशियल संस्थानों से हटकर आम फोन यूजर्स पर फोकस करते हुए, ‘जामताड़ा सबका नंबर आएगा’ झारखंड के जामताड़ा शहर से जुड़े फिशिंग स्कैम की कहानी दिखाती है, जो ऑनलाइन धोखाधड़ी के लिए बदनाम है। यह क्राइम ड्रामा उन युवा लड़कों की कहानी है जो फोन कॉल के जरिए अनजान लोगों को धोखा देकर उनकी जरूरी बैंकिंग जानकारी हासिल कर लेते हैं।

5. बैड बॉय बिलियनेयर्स इंडिया-Netflix

यह डॉक्यूमेंट्री सीरीज विजय माल्या, नीरव मोदी और सुब्रत रॉय जैसे मशहूर भारतीय बिजनेस दिग्गजों से जुड़े विवादों और आरोपों की पड़ताल करती है। आर्काइवल फ़ुटेज, इंटरव्यू और इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीटेलिंग के जरिए, यह ताकतवर बिजनेस एम्पायर के बनने और उसके बाद हुए कानूनी और फाइनेंशियल विवादों को दिखाती है।