Gold Price Today: सावन के पहले सोमवार को सोना फिसला, दिल्ली में ₹132240 पर आया 22 कैरेट

देश में सोने की कीमत में गिरावट नजर आ रही है। सावन के पहले सोमवार को ज्यादातर शहरों में दाम फिसला है। 3 अगस्त की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत घटकर 144360 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गई। मुंबई में कीमत 144210 रुपये प्रति 10 ग्राम है। बीते एक सप्ताह में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 710 रुपये तक ​गिरी। वहीं 22 कैरेट गोल्ड का भाव 750 रुपये तक नीचे आया।

रॉयटर्स के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना महंगा हुआ है। कीमत बढ़कर 4,067.06 डॉलर प्रति औंस हो गई है। इसकी वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जल्द समझौते की उम्मीद जताई है और नया हमला करने का फैसला टाल दिया है। इसके कारण महंगाई और ऊंची ब्याज दरों को लेकर चिंताएं कुछ कम हुईं।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमतदिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 144360 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 132240 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 132190 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 144210 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 144600 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 132550 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 144210 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 132190 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली132240144360
मुंबई132190144210
अहमदाबाद132240144260
चेन्नई132550144600
कोलकाता132190144210
हैदराबाद132190144210
जयपुर132240144360
भोपाल132240144260
लखनऊ132240144360
चंडीगढ़132240144360

Silver Price Outlook: चांदी इस साल ₹65000 सस्ती हुई, एक्सपर्ट्स से जानिए अब दाम घटेंगे या बढ़ेंगे

चांदी का भाव

चांदी की कीमत में भी देश के अंदर गिरावट है। 3 अगस्त की सुबह चांदी 234900 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। बीते एक सप्ताह में इसका भाव 5000 रुपये ​लुढ़का। रॉयटर्स के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत बढ़कर 58.02 डॉलर प्रति औंस हो गई है।

8वें वेतन आयोग का बड़ा गणित, क्या DA मर्जर से कर्मचारियों की सैलरी में आएगा डबल उछाल? ये है पूरा कैलकुलेशन

8th Central Pay Commission updates: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वां केंद्रीय वेतन आयोग इस समय सबसे बड़ा और चर्चा का विषय बना हुआ है। कर्मचारी संगठनों की मांगों और वित्तीय विश्लेषण के मुताबिक अगर 8वें वेतन आयोग में महंगाई भत्ते (DA) का बेसिक वेतन में विलय और वार्षिक इंक्रीमेंट दर में बढ़ोतरी की मांग स्वीकार कर ली जाती है तो नियमित वेतन वृद्धि और DA संशोधनों के संयुक्त प्रभाव से केंद्रीय कर्मचारियों की ग्रॉस सैलरी अगले 7 वर्षों के भीतर लगभग दोगुनी हो सकती है।

आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को आधिकारिक तौर पर 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। इसके साथ ही लगभग 55 लाख से अधिक कार्यरत कर्मचारियों और करीब 69 लाख पेंशनभोगियों (जिसमें सेवानिवृत्त रक्षा कर्मी भी शामिल हैं) के वेतन, पेंशन, भत्तों, सेवा शर्तों और अन्य लाभों की समीक्षा व सिफारिश के लिए नियम एवं शर्तें जारी की गई थीं।

क्षेत्रीय परामर्श जारी: दिल्ली, चेन्नई और पुडुचेरी में होंगी आगामी बैठकें

अभी 8वां वेतन आयोग विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपना क्षेत्रीय परामर्श आयोजित कर रहा है। इसके तहत आगामी बैठकों का कार्यक्रम इस प्रकार तय किया गया है:

दिल्ली: 7 और 10 अगस्त 2026

चेन्नई: 7 और 8 सितंबर 2026 (अपॉइंटमेंट की अंतिम तिथि: 18 अगस्त 2026)

पुडुचेरी: 9 सितंबर 2026 (अपॉइंटमेंट की अंतिम तिथि: 18 अगस्त 2026)

पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित है आयोग

8वें वेतन आयोग की संरचना और नेतृत्व की बात करें तो इसकी कमान पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस के हाथों में है। इसकी अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई हैं। सदस्य-सचिव पूर्व आईएएस अधिकारी पंकज जैन और सदस्य प्रोफेसर पुलक घोष हैं जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। यह आयोग लगभग 50 लाख से 55 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और करीब 65 लाख से 69 लाख पेंशनभोगियों के जीवन को प्रभावित करने वाले बदलावों की सिफारिश करेगा।

कर्मचारी यूनियनों (NC-JCM) की प्रमुख मांगें

कर्मचारी प्रतिनिधि निकायों में सबसे बड़े संगठनों में से एक नेशनल काउंसिल-जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) ने आयोग कई मांगें रखी हैं। इसमें न्यूनतम बेसिक पे को बढ़ाकर ₹69000 करने की मांग है। इसके अलावा मौजूदा 7वें वेतन आयोग के तहत मिलने वाले 3% वार्षिक इंक्रीमेंट को बढ़ाकर 6% करने का सुझाव है। दूसरे संगठनों की मांगों में DA को समय-समय पर बेसिक सैलरी में मर्ज करना शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक 8वें वेतन आयोग में अगर DA मर्जर और 6% इंक्रीमेंट लागू होता है, तो चक्रवृद्धि प्रभाव से सैलरी में भारी उछाल आएगा। जब महंगाई भत्ता 50% से ऊपर चला जाता है, तो इसे मूल वेतन में शामिल करने की मांग बढ़ जाती है। जैसे ही DA का बेसिक पे में विलय होता है, कर्मचारी की बेसिक सैलरी बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप बेसिक पे पर निर्भर अन्य सभी भत्ते (जैसे HRA, TA आदि) भी स्वतः बढ़ जाते हैं।

अभी सरकारी कर्मचारियों को 3% का सालाना इंक्रीमेंट मिलता है। अगर इसे बढ़ाकर 6% किया जाता है और साथ ही नियमित आधार पर DA को बेसिक पे में जोड़ा जाता है, तो वेतन वृद्धि की दर बहुत तेज हो जाएगी। उच्च वार्षिक वेतन वृद्धि और DA मर्जर का यह संयुक्त प्रभाव चक्रवृद्धि की तरह काम करेगा, जिससे 7 साल के भीतर ग्रॉस सैलरी दोगुनी हो सकती है।

फिटमेंट फैक्टर की भूमिका सबसे ज्यादा

नए वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर सबसे निर्णायक भूमिका निभाएगा। अगर पिछला इतिहास दोहराते हुए नया फिटमेंट फैक्टर तय किया जाता है तो कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी में शुरुआती स्तर पर ही बड़ा उछाल देखने को मिलेगा। वैसे एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि 7 साल में सैलरी दोगुनी होने का गणित एक प्रोजेक्शन है। वास्तविक वेतन वृद्धि कितनी होगी, यह 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशों और उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली अंतिम मंजूरी पर ही निर्भर करेगा।

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Silver Price Outlook: चांदी इस साल ₹65000 सस्ती हुई, एक्सपर्ट्स से जानिए अब दाम घटेंगे या बढ़ेंगे

Silver Price Outlook: इस साल चांदी ने निवेशकों को निराश किया है। साल की शुरुआत से अब तक इसकी कीमत करीब 23% गिर चुकी है। सिर्फ जून महीने में ही इसमें 22% की बड़ी गिरावट आई। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी करीब 58 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही है। भारत में इसका भाव करीब ₹2.20 लाख प्रति किलो है। इसका मतलब है कि इस साल चांदी ₹65,000 प्रति किलो सस्ती हो चुकी है।

हालांकि, पिछले एक साल में चांदी ने 50% से ज्यादा का रिटर्न दिया था। लेकिन अब कीमतें दिसंबर 2025 के स्तर के आसपास लौट आई हैं। सवाल यह है कि आखिर चांदी पर दबाव क्यों बना हुआ है?

तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी वजह

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। ईरान युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ा है। इससे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा और कीमतें चढ़ गईं। फिलहाल ब्रेंट क्रूड करीब 86 डॉलर प्रति बैरल पर है, जो युद्ध शुरू होने से पहले के मुकाबले करीब 20% ज्यादा है। अगर तनाव और बढ़ता है, तो तेल महंगा हो सकता है। इससे महंगाई बढ़ेगी और दुनिया भर के बाजारों पर दबाव आएगा।

फेड की ब्याज दरें क्यों हैं अहम?

तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ती है। ऐसे में अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बनता है। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो डॉलर मजबूत होता है। ऐसे समय में निवेशक सोना और चांदी जैसे बिना ब्याज वाले एसेट छोड़कर डॉलर आधारित निवेश की ओर रुख करते हैं। यही वजह है कि चांदी की कीमतों पर दबाव बना रहता है।

चांदी सोने से ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली

चांदी की कीमतें सोने के मुकाबले ज्यादा तेजी से ऊपर-नीचे होती हैं। इसकी वजह यह है कि चांदी सिर्फ निवेश का जरिया नहीं, बल्कि औद्योगिक धातु भी है। इसका इस्तेमाल सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल, डेटा सेंटर और पावर ग्रिड जैसे सेक्टरों में होता है। इसलिए औद्योगिक मांग में थोड़ा भी बदलाव कीमतों पर बड़ा असर डाल सकता है।

गोल्ड सिल्वर रेशियो क्या होता है

जून 2026 में जब सोना 4,000-4,060 डॉलर प्रति औंस के बीच था, तब चांदी 60-61 डॉलर प्रति औंस पर थी। उस समय गोल्ड-सिल्वर रेशियो करीब 67 था। इससे पहले मई में यह 55 और जनवरी में 50 तक आ गया था।

गोल्ड-सिल्वर रेशियो बताता है कि 1 औंस सोना खरीदने के लिए कितने औंस चांदी चाहिए। इसे सोने की कीमत को चांदी की कीमत से भाग देकर निकाला जाता है। अगर रेशियो 75 या उससे ज्यादा हो, तो इसका मतलब माना जाता है कि चांदी सोने के मुकाबले सस्ती है। वहीं, अगर यह 50-60 या उससे नीचे हो, तो सोना सस्ता माना जाता है।

क्या अभी चांदी सस्ती है?

Bonanza के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निरपेन्द्र यादव का कहना है कि 70 का रेशियो अपने लंबे समय के औसत के करीब है। यह बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी चांदी सोने के मुकाबले थोड़ी सस्ती नजर आती है। खासकर तब, जब औद्योगिक मांग मजबूत बनी रहे। भारत में दिसंबर 2025 से चांदी की कीमत लगातार ₹2 लाख प्रति किलो से ऊपर बनी हुई है।

आगे किस धातु में ज्यादा दम?

निरपेन्द्र यादव का मानना है कि फिलहाल गोल्ड-सिल्वर रेशियो 65 से 75 के बीच रह सकता है। यह काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति और वैश्विक आर्थिक स्थिति पर निर्भर करेगा। अगर फेड ब्याज दरें घटाता है, डॉलर कमजोर पड़ता है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुधार आता है, तो चांदी सोने से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। इससे Gold-Silver Ratio घटकर 60-65 तक आ सकता है।

वहीं, अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, मंदी का खतरा गहराता है या निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ भागते हैं, तो सोना चांदी से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। ऐसे में यह रेशियो 70 से ऊपर बना रह सकता है।

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा समय में सिर्फ सोना या सिर्फ चांदी चुनने के बजाय दोनों में संतुलित निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है।

अगर आपका लक्ष्य पूंजी की सुरक्षा है और आप कम जोखिम लेना चाहते हैं, तो सोना बेहतर विकल्प माना जा सकता है। लेकिन अगर आप थोड़ा ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं और लंबी अवधि के निवेशक हैं, तो धीरे-धीरे चांदी में हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है। क्योंकि मौजूदा वैल्यूएशन के हिसाब से चांदी में आगे बेहतर प्रदर्शन की संभावना बनी हुई है।

Gold Price Today: अगस्त के पहले दिन सोना हुआ और महंगा, 24 और 22 कैरेट दोनों का बढ़ गया भाव

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RBI MPC Meet: फिर एक बार जस की तस छोड़ी जा सकती है रेपो रेट, 5 अगस्त को आएगा फैसला

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में भी प्रमुख नीतिगत दर रेपो को बिना किसी बदलाव के जस का तस छोड़ सकता है। देश के 10 अर्थशास्त्रियों और ट्रेजरी प्रमुखों के एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की मीटिंग 3-5 अगस्त को होने वाली है। इस साल जून की बैठक में रेपो रेट में लगातार तीसरी बार कोई बदलाव न करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर स्थिर छोड़ा गया था।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सर्वे में ज्यादातर उत्तरदाताओं का अनुमान रहा कि केंद्रीय बैंक आक्रामक रुख अपनाते हुए अपनी नीतिगत स्थिति को ‘न्यूट्रल’ बनाए रखेगा। ऐसा भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और असमान मानसून से महंगाई के बढ़ते जोखिमों को देखते हुए किया जा सकता है। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि केंद्रीय बैंक ‘देखो और इंतजार करो’ मोड में रहेगा क्योंकि वह महंगाई की स्थिति का आकलन कर रहा है।

पीटीआई के मुताबिक, इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर का कहना है, ‘‘फिलहाल, महंगाई नरम बनी हुई है और ऐसे में यथास्थिति ही सबसे अच्छा नीतिगत विकल्प है।” जना स्मॉल फाइनेंस बैंक के ट्रेजरी प्रमुख गोपाल त्रिपाठी का मानना है कि केंद्रीय बैंक मानसून की स्थिति और एफसीएनआर (बी) योजना की सफलता का इंतजार करेगा।

पूरे FY27 में रेपो रेट में हो सकती है वृद्धि

सर्वे के अधिकांश उत्तरदाताओं का मानना है कि भले ही अगस्त में पॉलिसी रेट को स्थिर रखा जाए लेकिन पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान इसमें बढ़ोतरी हो सकती है। अगर महंगाई का दबाव बढ़ा तो चालू वित्त वर्ष के दौरान रेपो रेट में कम से कम 2 बार बढ़ोतरी हो सकती है।

ग्रॉस GST कलेक्शन जुलाई में 15% बढ़ा, FY27 में दूसरी बार ₹2 लाख करोड़ के पार

महंगाई और ग्रोथ के अनुमानों को लेकर क्या राय

कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल के बावजूद, ज्यादातर लोगों को उम्मीद है कि RBI महंगाई के अनुमान में कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना ​​है कि अगर भूराजनीतिक तनाव बना रहा है तो इसमें बढ़ोतरी हो सकती है। धनलक्ष्मी बैंक के ट्रेजरी हेड बालासुब्रमण्यन आर का मानना है कि RBI वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1% कर देगा।

ग्रोथ के अनुमानों को लेकर भी राय बंटी हुई है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि मजबूत घरेलू मांग के कारण वित्त वर्ष 2027 के GDP ग्रोथ अनुमान में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं कुछ अन्य का मानना है कि कोई बदलाव नहीं होगा।

बच्चे की परवरिश पर 1.39 करोड़ रुपये का दावा कर फंसे इन्फ्लुएंसर, लोगों ने लगा दी क्लास

क्या भारत में एक बच्चे की परवरिश पर करोड़ों रुपये खर्च हो सकते हैं? सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने इसी सवाल को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक कंटेंट क्रिएटर ने बच्चे की परवरिश का अनुमानित खर्च बताते हुए दावा किया कि माता-पिता को जन्म से लेकर 18 साल की उम्र तक बड़ी रकम खर्च करनी पड़ सकती है। हालांकि, उनके आंकड़ों से ज्यादा लोगों का ध्यान उस तुलना ने खींचा, जिसमें उन्होंने पैरेंटहुड की तुलना एक लग्जरी कार खरीदने से कर दी।

वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कुछ यूजर्स ने इसे व्यावहारिक गणना बताया, जबकि कई लोगों ने इस सोच को गलत और भावनाओं से परे करार दिया। आखिर इस वीडियो में ऐसा क्या कहा गया कि इंटरनेट पर बहस छिड़ गई और लोग दो हिस्सों में बंट गए? जानिए पूरा मामला।

क्यों चुना ‘Child-Free’ रहने का फैसला?

करीब 2.88 लाख फॉलोअर्स वाले विख्यात ने बताया कि उन्होंने खुद माता-पिता न बनने का फैसला किया है। उनका कहना है कि उन्होंने बच्चे की परवरिश से जुड़े संभावित खर्चों का आकलन किया और इसी आधार पर अपनी सोच लोगों के सामने रखी।

गर्भावस्था से शुरू किया पूरा हिसाब

विख्यात ने सबसे पहले गर्भावस्था और डिलीवरी के खर्च का अनुमान लगाया। डॉक्टर की फीस, जांच, दवाइयां, मैटरनिटी कपड़े और निजी अस्पताल में डिलीवरी को मिलाकर उन्होंने करीब 3 लाख रुपये का खर्च बताया। इसके बाद उन्होंने बच्चे के शुरुआती दो साल में डायपर, दूध, टीकाकरण, खिलौने, किताबें, स्ट्रोलर, पालना और अन्य जरूरी सामान पर करीब 6 लाख रुपये खर्च होने का दावा किया।

पढ़ाई बनी सबसे महंगी जिम्मेदारी

उनके अनुसार बच्चे की शिक्षा सबसे बड़ा खर्च है। प्री-स्कूल से लेकर स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और स्कूल एक्टिविटीज को जोड़ते हुए उन्होंने करीब 33 लाख रुपये का अनुमान लगाया। उनका कहना था कि यह आंकड़ा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के औसत खर्च के निचले स्तर को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

खाने से गैजेट्स तक, हर चीज का लगाया हिसाब

विख्यात ने 2 से 18 साल की उम्र तक खाने पर 15 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया। इसके अलावा ट्यूशन पर 9 लाख, इलाज और हेल्थकेयर पर 5.4 लाख, मनोरंजन पर 9 लाख, कपड़ों पर 7.2 लाख, गैजेट्स पर 4 लाख, खेल और अन्य गतिविधियों पर 8 लाख और ट्रांसपोर्ट पर भी करीब 8 लाख रुपये जोड़े।

बड़े घर का किराया भी जोड़ा

उन्होंने दावा किया कि बच्चे के लिए अतिरिक्त कमरे की जरूरत पड़ने पर बड़े घर का किराया भी बड़ा खर्च बन जाता है। इसी वजह से उन्होंने 18 साल में अतिरिक्त किराए के रूप में 32.4 लाख रुपये का अनुमान शामिल किया। विख्यात का कहना था कि इस हिसाब में कॉलेज की पढ़ाई, महंगाई और निवेश से मिलने वाले संभावित रिटर्न को शामिल नहीं किया गया है। यानी वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है।

BMW से तुलना ने भड़का दिया इंटरनेट

अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने कहा कि बच्चे की परवरिश पर इतना पैसा खर्च करने के बजाय कोई व्यक्ति लगभग उसी रकम में BMW M4 Competition जैसी लग्जरी स्पोर्ट्स कार खरीद सकता है। यही तुलना लोगों को पसंद नहीं आई और वीडियो देखते ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई।

किसी ने कहा ‘गलत तुलना’, तो किसी ने बताया ‘बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया’

वीडियो वायरल होने के बाद कई यूजर्स ने उनके खर्च के अनुमान पर सवाल उठाए। कुछ लोगों ने कहा कि बच्चे की परवरिश का खर्च हर परिवार के लिए अलग होता है और 1.39 करोड़ का आंकड़ा वास्तविकता से काफी दूर है। एक यूजर ने लिखा कि उसने अपने घर में छोटे बच्चे की परवरिश देखी है और इतना खर्च कभी नहीं हुआ।

‘बच्चे की मुस्कान की कोई कीमत नहीं’

कई लोगों ने इस बहस में भावनात्मक पक्ष भी रखा। एक यूजर ने लिखा कि उसके छह महीने के बेटे की एक मुस्कान किसी भी रकम से ज्यादा कीमती है और बच्चों की परवरिश को सिर्फ पैसों के तराजू में नहीं तौला जा सकता।

सोशल मीडिया पर जमकर हुई आलोचना

कई यूजर्स ने इन्फ्लुएंसर की सोच की आलोचना करते हुए कहा कि बच्चों की तुलना किसी लग्जरी कार से करना गलत है। कुछ लोगों ने इसे “बेकार तुलना” बताया, तो कुछ ने ऐसे कंटेंट पर सवाल उठाते हुए कहा कि पैरेंटहुड सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि भावनाओं, जिम्मेदारियों और खुशियों का भी नाम है।

महंगाई की मार! त्योहारों से पहले डिटर्जेंट से लेकर पेंट तक के बढ़ सकते हैं दाम; कंपनियां कर रहीं तैयारी

भारत की बड़ी कंज्यूमर कंपनियां त्योहारों के मौसम से पहले और लगातार दूसरी तिमाही में प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। हो सकता है कि डिटर्जेंट से लेकर टायर और पेंट तक और महंगे हो जाएं। मिडिल ईस्ट में लंबे समय से चल रहे अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण कच्चे माल की लागत बढ़ रही है। ऐसे में महंगाई के ऊंचे स्तर पर बने रहने का खतरा है। कंपनियां होम अप्लायंसेज से लेकर किचन की जरूरी चीजों तक हर चीज की कीमतों में बढ़ोतरी के दूसरे दौर की योजना बना रही हैं।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड आने वाली तिमाही में डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग बार जैसी कैटेगरी में कीमतों में नपी-तुली बढ़ोतरी करने वाली है। इसके अलावा डोडला डेयरी लिमिटेड और एशियन पेंट्स लिमिटेड समेत कम से कम 7 और कंपनियां भी कीमतें बढ़ाने की सोच रही हैं।

जून 2026 में कितनी रही खुदरा महंगाई

इस साल जून में देश में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई। मई महीने में यह 3.93 प्रतिशत थी। खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई 5.32 प्रतिशत रही, जबकि मई में 4.78 प्रतिशत थी। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है क्योंकि कंपनियां कीमतें बढ़ा रही हैं। कम मॉनसून के कारण खाने-पीने की चीजों की कीमतें और बढ़ने का खतरा है। ईरान युद्ध के कारण एनर्जी कॉस्ट लगातार ऊंची बनी हुई है। इसका मतलब है कि जल्द ही कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।

भारत में त्योहारों का सीजन आमतौर पर अगस्त से नवंबर तक चलता है। इस दौरान कंज्यूमर खर्च भी आमतौर पर बढ़ जाता है, खासकर दिवाली के समय। कई कंपनियों की सालाना बिक्री में से लगभग एक तिहाई बिक्री इसी त्योहारी सीजन में होती है।

प्रोडक्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी न केवल भारत में खपत की मांग की मजबूती की परीक्षा लेगी, बल्कि पॉलिसी मेकर्स की भी परीक्षा लेगी क्योंकि वे महंगाई के दबाव पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। RBI ने कहा है कि वह तभी कोई कदम उठाएगा जब महंगाई का दबाव और गहरा हो जाएगा। भारत के वित्त मंत्रालय ने हाल ही में चेतावनी दी कि महंगाई का असर अब खाने-पीने की चीजों से आगे भी फैल रहा है। ग्लोबल स्तर पर ईंधन की बढ़ती कीमतें और खराब मौसम का असर कई तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट्स की कीमतों पर पड़ रहा है।

RBI की मीटिंग के फैसले 5 अगस्त को

RBI की मौद्रिक नीति समिति ने इस साल जून की बैठक में रेपो रेट में लगातार तीसरी बार कोई बदलाव न करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर स्थिर छोड़ दिया। उम्मीद है कि 3-5 अगस्त को होने वाली अगली मीटिंग में भी ऐसा ही किया जाएगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि भूराजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या नहीं। साथ ही इस पर भी नजर रहेगी कि मॉनसून से गर्मियों की फसल को नुकसान होता है या नहीं।

PoJK में कार्रवाई पर भारत का पाकिस्तान पर हमला, New York Times की रिपोर्ट पर क्यों जताई आपत्ति

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भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कथित कड़ी कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान पर निशाना साधा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान की कार्रवाई की जांच करने और उसे जवाबदेह ठहराने की अपील की है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 'निर्दय बल' का इस्तेमाल किया गया।

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PoJK में 40 से ज्यादा लोगों की मौत का दावा

 

जायसवाल के मुताबिक, PoJK में बढ़ती महंगाई, प्रशासनिक उपेक्षा, राजनीतिक भेदभाव और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित अत्याचारों को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हुए हैं। उन्होंने कहा कि 27 जुलाई से स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान हुई सुरक्षा कार्रवाई में 40 से अधिक नागरिकों की मौत हुई है और कई लोग घायल हुए हैं। इन प्रदर्शनों का नेतृत्व Joint Awami Action Committee (JAAC) कर रही है।

 

भारत ने कहा कि PoJK के लोगों ने इन मौतों की स्वतंत्र जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपील की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान की कार्रवाई पर नजर रखनी चाहिए और कथित अत्याचारों के लिए उसे जवाबदेह ठहराना चाहिए।

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भारत ने 'मुजाहिदीन' को लेकर पाकिस्तान पर साधा निशाना

जायसवाल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के राजनीतिक मामलों के विशेष सहायक के कथित बयान का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रतिष्ठान ने जिन 'मुजाहिदीन' को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित, हथियारबंद और वित्त पोषित किया, वही अब पाकिस्तान के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यह बयान पाकिस्तान की नीतियों और उसके द्वारा लंबे समय से अपनाए गए आतंकवाद से जुड़े दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भारत ने यह भी आरोप लगाया कि PoJK के लोगों के प्रति पाकिस्तान के प्रतिष्ठान में 'पूर्ण उदासीनता' दिखाई दे रही है। जायसवाल ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की कथित टिप्पणी का भी जिक्र किया, जिसमें प्रदर्शनकारियों को 'दुश्मन' बताया गया था।

 

'पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा'

 

जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत ने एक बार फिर अपनी स्थिति स्पष्ट की। रणधीर जायसवाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारत की स्थिति स्पष्ट है कि ये क्षेत्र पहले भी भारत का हिस्सा थे, आज भी भारत का हिस्सा हैं और आगे भी भारत का हिस्सा बने रहेंगे। विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और संबंधित पक्षों से इस क्षेत्र के लिए भारत के अनुसार सही नाम और शब्दावली का इस्तेमाल करने की अपील की।

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New York Times की रिपोर्ट पर भी भारत ने जताई आपत्ति

यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत ने The New York Times की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लिए 'Pakistani Kashmir' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। अमेरिका स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अखबार की हेडलाइन को 'भ्रामक और गलत' बताते हुए कहा था कि 'Pakistani Kashmir' नाम का कोई क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह Pakistan-occupied Kashmir है। भारत ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर के संबंध में इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली देश की संप्रभुता और उसके आधिकारिक रुख के अनुरूप होनी चाहिए।

Gold Silver Prices Today: दिल्ली में सोना 300 रुपये महंगा, चांदी की कीमतें स्थिर

दिल्ली सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में 31 जुलाई को 300 रुपये इजाफा हुआ। चांदी की कीमतें स्थिर रहीं। रिटेलर्स और ज्वेलर्सी की खरीदारी से सोने को सपोर्ट मिला। सोने की कीमत 1,48,300 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुईं। चांदी 2,24,700 रुपये प्रति किलोग्राम पर स्थिर रही।

विदेश में सोने और चांदी में गिरावट 

अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 1.18 फीसदी गिरकर 4,055 डॉलर प्रति औंस था। चांदी भी 2 फीसदी की गिरावट के साथ 57.98 डॉलर प्रति औंस रही। कोटक सिक्योरिटीज की एवीपी (कमोडिटी रिसर्च) कायनात चेनवाला ने कहा, “गुरुवार रात के लेवल से कीमत में नरमी आई है। यह 4,060 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया है। सिल्वर में भी नरमी दिखी है।”

सोने की कीमतों पर दबाव की दो वजहें 

एनालिस्ट्स के मुताबिक, क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी का असर बुलियन की कीमतों पर पड़ा है। अमेरिकी डॉलर में मजबूती का असर भी सोने पर पड़ा है। हालांकि, फरवरी के बाद जुलाई पहला महीना है, जब सोने की कीमतें चढ़ी हैं। स्वतंत्र विश्लेषक रॉस नॉरमैन ने कहा, “सोना चढ़ने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, अभी यह कंसॉलिडेशन फेज में है।”

सितंबर में इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर दबाव में आएगा सोना

फेडरल रिजर्व ने 29 जुलाई को इंटरेस्ट रेट में बदलाव नहीं किया। इससे सोने को थोड़ी राहत मिली है। लेकिन, माना जा रहा है कि फेड सितंबर में इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। इसका निगेटिव असर सोने पर पड़ेगा। इंटरेस्ट रेट बढ़ने के माहौल में सोने की चमक घट जाती है। क्रूड की बढ़ती कीमतों से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हुआ है।

क्रूड में तेजी से महंगाई का खतरा बढ़ रहा

महंगाई को काबू में करने के लिए फेड सहित दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि मध्यपूर्व में जियोपॉलिटिकल टेंशन कम होता नहीं दिख रहा है। इससे क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं। 31 जुलाई को ब्रेंट क्रूड का भाव 1.76 फीसदी चढ़कर 88.37 डॉलर पर चल रहा था। क्रूड में तेजी जारी रहने पर सोने की कीमतों पर दबाव बना रहेगा

सोना गिरकर ₹1.42 पर आया, चांदी ₹2400 हुई सस्ती, आखिर भारतीय खरीदारों के लिए कीमतों में उतार-चढ़ाव क्या दे रहा संकेत

Gold Silver Price Today: भारत में सोने- चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली। इस गिरावट की बड़ी वजह ग्लोबल मार्केट में कमजोरी रही। डॉलर में निचले स्तर से रिकवरी के कारण सोने-चांदी की हालिया तेजी को ब्रेक लगा है।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, 5 अगस्त की डिलीवरी के लिए सोने का वायदा भाव 0.79% गिरकर ₹1.42 लाख प्रति 10 ग्राम हो गया, जबकि 4 सितंबर की डिलीवरी के लिए चांदी का वायदा भाव 2400 रुपये यानी 1% गिरकर ₹2.18 लाख प्रति किलोग्राम के नीचे फिसल गया है।

वहीं इंटरनेशनल मार्केट में COMEX गोल्ड फ्यूचर्स 0.39% गिरकर $4,144.40 प्रति औंस पर आ गया, जबकि COMEX सिल्वर फ्यूचर्स 0.22% गिरकर $58.89 प्रति औंस पर आ गया। पिछले सेशन में एक हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद स्पॉट गोल्ड की कीमत में भी थोड़ी गिरावट आई।

कीमतों में गिरावट क्यों?

घरेलू कीमतों में गिरावट काफी हद तक ग्लोबल ट्रेंड्स को दिखाती है। इस हफ्ते की शुरुआत में तेजी के बाद, सोने और चांदी पर दबाव बना क्योंकि अमेरिकी डॉलर जनवरी 2023 के बाद अपनी सबसे बड़ी एक-दिवसीय गिरावट से उबर गया। मजबूत डॉलर आमतौर पर कीमती धातुओं पर दबाव डालता है क्योंकि यह दूसरी करेंसी रखने वालों के लिए इन्हें महंगा बना देता है।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के फैसले के बाद बुलियन की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद मुनाफावसूली ने भी गिरावट में योगदान दिया।

गिरावट के बावजूद सोने को क्यों मिल रहा सपोर्ट

हालांकि शुक्रवार 31 जुलाई की गिरावट के बावजूद, सोना 5 महीनों में अपनी पहली मासिक बढ़त दर्ज करने की राह पर है। इसे अमेरिकी मौद्रिक सख्ती (monetary tightening) की उम्मीदों में कमी और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से सपोर्ट मिल रहा है, जिससे सुरक्षित निवेश (safe-haven assets) के तौर पर सोने की मांग बढ़ी है।

हालिया अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने भी इन उम्मीदों को मजबूत किया है कि फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों के फैसलों पर सावधानी से आगे बढ़ सकता है। महंगाई के नरम आंकड़ों और आर्थिक विकास में नरमी के संकेतों ने बुलियन को सपोर्ट दिया है, हालांकि बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और मजबूत डॉलर ने बढ़त को सीमित रखा है।

अब क्या होनी चाहिए निवेश रणनीति

कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी रिसर्च की AVP कायनात चेनवाला ने कहा, “कीमती धातुएं एक दायरे में बनी हुई हैं। अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों में नरमी से सपोर्ट मिल रहा है, जबकि मजबूत डॉलर, ऊंची बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व के सख्त रुख (hawkish stance) से तेज बढ़त सीमित हो रही है। सोना और चांदी दोनों ही कई महीनों में अपनी पहली मासिक बढ़त की राह पर हैं।”

भारतीय खरीदारों के लिए इसका क्या मतलब है?

देश में सोने और चांदी की कीमतें इंटरनेशनल बुलियन की कीमतों, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल और इंपोर्ट से जुड़ी लागतों से प्रभावित होती हैं। नतीजतन, लोकल कीमतें अक्सर ग्लोबल ट्रेंड्स के हिसाब से चलती हैं, हालांकि घरेलू मांग और करेंसी में उतार-चढ़ाव इन बदलावों को बढ़ा या घटा सकते हैं।

अप्रैल-जून तिमाही के दौरान भारत में सोने की फिजिकल मांग पर दबाव बना रहा। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, सोने की मांग में सालाना आधार पर 6% की गिरावट आई क्योंकि ऊंची कीमतों ने खरीदारी पर असर डाला। हालांकि, सोने पर कुल कंज्यूमर खर्च वैल्यू के हिसाब से रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया, जबकि त्योहारों और शादियों से जुड़ी खरीदारी के कारण पिछली तिमाही के मुकाबले ज्वैलरी की मांग में सुधार हुआ।

इन्वेस्टर्स को आगे किस पर नज़र रखनी चाहिए?

मार्केट आज बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के कंज्यूमर सेंटीमेंट और महंगाई की उम्मीदों (इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशन्स) के डेटा पर बारीकी से नज़र रखेगा, ताकि अमेरिकी महंगाई के आउटलुक और फेडरल रिजर्व की पॉलिसी की दिशा के बारे में नए संकेत मिल सकें।

एनालिस्ट्स को यह भी उम्मीद है कि अमेरिकी डॉलर में उतार-चढ़ाव, ट्रेजरी यील्ड और वेस्ट एशिया में घटनाक्रम निकट भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों के लिए मुख्य कारक बने रहेंगे।

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(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

US ETFs: बच्चे की विदेश में पढ़ाई के लिए अमेरिकी ETFs क्यों हैं बेस्ट? जानिए सही करेंसी में बचत का फॉर्मूला

US ETFs for Overseas Education: बच्चों को विदेश की टॉप यूनिवर्सिटीज (US, UK या यूरोप) में पढ़ाना आज कई भारतीय माता-पिता का सपना है। इसके लिए अधिकांश पेरेंट्स सालों पहले से भारतीय म्यूचुअल फंड्स में SIP शुरू कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रुपए में की गई आपकी बचत डॉलर में बढ़ते कॉलेज फीस के खर्च के सामने कम पड़ सकती है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब आपका वित्तीय लक्ष्य डॉलर या विदेशी मुद्रा में है, तो निवेश भी उसी करेंसी में होना चाहिए। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि विदेश में पढ़ाई के लिए US ETFs में सीधा निवेश क्यों सबसे समझदारी भरा विकल्प है।

रुपए में बचत क्यों पड़ सकती है कम?

अगर आपका लक्ष्य डॉलर में है, तो सिर्फ रुपए में कंपाउंडिंग करना मुश्किल हो सकता है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:

1- ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी: विदेशी यूनिवर्सिटीज की फीस हर साल 5% से 8% की दर से बढ़ती है।

2- रुपए की कमजोरी: ऐतिहासिक रूप से भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले हर साल औसतन 4% से 5% टूटता है।

एक उदाहरण से समझे तो जैसे आज किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी की 4 साल की फीस $2,00,000 है, तो अगले 10 साल बाद रुपए के अवमूल्यन और महंगाई को मिलाकर यह बिल ₹3.5 करोड़ से भी अधिक का हो सकता है।

भारतीय इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स के बजाय Direct US ETFs क्यों बेहतर?

पहले पेरेंट्स भारतीय फंड हाउसेज के ‘फंड ऑफ फंड्स’ के जरिए विदेश में निवेश करते थे। लेकिन अब Direct US-listed ETFs एक बेहतर विकल्प बन गए हैं:

SEBI ओवरसीज कैप की सीमा नहीं: भारतीय म्यूचुअल फंड्स पर SEBI द्वारा लगाई गई विदेशी निवेश की लिमिट (करीब $7 बिलियन) बार-बार पूरी हो जाती है, जिससे फंड्स को अपनी SIP बार-बार रोकनी पड़ती है।

LRS के जरिए सीधा निवेश: RBI की लिब्रलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत हर भारतीय नागरिक (नाबालिग सहित) को हर साल $2,50,000 तक विदेश भेजने और सीधे US ETFs में निवेश करने की पूरी छूट मिलती है।

कम एक्सपेंस रेशियो: डायरेक्ट US ETFs (जैसे- Vanguard या iShares) का एक्सपेंस रेशियो बेहद कम (0.03% से 0.09%) होता है, जबकि घरेलू इंटरनेशनल फंड्स में यह 1.25% से 1.75% तक हो सकता है।

ऐतिहासिक रिटर्न का गणित

अगर पिछले 10 वर्षों का ट्रैक रिकॉर्ड देखें, तो S&P 500, Nasdaq 100 और ग्लोबल इक्विटीज के 60/20/20 पोर्टफोलियो ने डॉलर (USD) टर्म में 13% से 14% वार्षिक रिटर्न दिया है। जब इसमें रुपए की 4-5% सालाना गिरावट को जोड़ दिया जाता है, तो भारतीय निवेशकों के लिए यह सालाना रिटर्न रुपए के टर्म में 17% से 19% के करीब बैठता है। यानी डॉलर में निवेश करना फायदे वाला सौदा रहा है।

निवेश शुरू करने से पहले इन 3 बातों का रखें ध्यान

अमेरिकी ETFs में ऐप या ब्रोकरेज के जरिए निवेश करते समय इन व्यावहारिक पहलुओं को न भूलें:

Micro-SIP से बचें: हर महीने ₹1,000 या ₹2,000 जैसी छोटी SIP पर बैंक वायर चार्ज और फॉरेक्स स्प्रेड का खर्च भारी पड़ सकता है। इसलिए पैसे को रुपए में इकट्ठा करें और हर 3 या 6 महीने में एक बार में रेमिटेंस करें।

TCS के नियम: एक वित्त वर्ष में ₹10 लाख तक के रेमिटेंस पर अतिरिक्त टीसीएस नहीं लगता। ₹10 लाख से ऊपर 20% TCS कटता है, जिसे आप अपने वार्षिक इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में एडजस्ट या रिफंड क्लेम कर सकते हैं।

Schedule FA रिपोर्टिंग: विदेश में शेयर या ETF खरीदते ही ITR-2 या ITR-3 भरते समय Schedule FA में उसका ब्योरा देना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर ‘ब्लैक मनी एक्ट’ के तहत भारी जुर्माना लग सकता है।

टारगेट तक पहुंचने की सही रणनीति

जैसे-जैसे आपके बच्चे के कॉलेज एडमिशन का समय करीब आए, आपको अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित मोड में शिफ्ट करना चाहिए:

Build Phase (शुरुआती 5-10 साल): इक्विटी ETFs (जैसे S&P 500 / Nasdaq) में आक्रामक तरीके से निवेश करें।

Protect Phase (3-4 साल पहले): जब एडमिशन में 3-4 साल बचें, तो धीरे-धीरे इक्विटी से पैसा निकालकर US डेट/बॉन्ड फंड्स में शिफ्ट करें।

Deploy Phase (आखिरी 1-2 साल): फीस भुगतान से 1-2 साल पहले फंड को USD कैश या लिक्विड बकेट में रखें, ताकि शेयर बाजार में किसी तात्कालिक गिरावट से आपकी फीस का बजट प्रभावित न हो।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।