RBI MPC Meet: 5 अगस्त के फैसले से क्या आपकी FD पर बढ़ेगा ब्याज? जानिए क्या है एक्सपर्ट्स की उम्मीदें

RBI Monetary Policy Repo Rate Update: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) 5 अगस्त 2026 को अपनी अहम पॉलिसी का ऐलान करने वाली है। इस घोषणा से पहले फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश करने वाले निवेशक टकटकी लगाए बैठे हैं कि क्या बैंक अब उन्हें एफडी पर ज्यादा ब्याज देंगे?

यह सवाल इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि जून में रिटेल महंगाई दर बढ़कर 4.38% हो गई है, जो पिछले 17 महीनों में पहली बार RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर निकली है। हालांकि, महंगाई अभी भी RBI के 2% – 6% के दायरे में है, लेकिन कोर इन्फ्लेशन भी 4% के करीब बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि कीमतों का दबाव अभी पूरी तरह कम नहीं हुआ है।

तो क्या इस पॉलिसी के बाद FD निवेशकों को ज्यादा रिटर्न मिलेगा? आइए समझते हैं पूरा सिनेरियो।

क्या RBI रेपो रेट में करेगा बदलाव?

अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि RBI फिलहाल रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और इसे 5.25% पर ही बरकरार रखेगा। आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक फिलहाल ‘वेट-एंड-वॉच’ की नीति अपना सकता है।

पीएल कैपिटल की लीड इकोनॉमिस्ट प्राची केले का कहना है, ‘हमें उम्मीद है कि मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच MPC सतर्क रुख अपनाएगी। भविष्य की नीतियों के लिए वह डेटा-आधारित अप्रोच रखेगी। अगस्त की बैठक में हम रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रहने की उम्मीद कर रहे हैं।’

अगर रेपो रेट नहीं बढ़ा, तो क्या FD रेट्स बढ़ेंगे?

अगर RBI रेपो रेट में बढ़ोतरी नहीं करता है, तो निवेशकों को तत्काल कोई बड़ी खुशखबरी नहीं मिलेगी, लेकिन इसका एक फायदा यह भी है कि बैंक फिलहाल डिपॉजिट रेट्स में कटौती भी नहीं करेंगे। FD की ब्याज दरें सिर्फ रेपो रेट पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इन 3 प्रमुख कारकों पर भी तय होती हैं:

लिक्विडिटी: बैंकों के पास नकदी की स्थिति कैसी है।

लोन की डिमांड: अगर बाजार में कर्ज की मांग ज्यादा है और बैंकों को अतिरिक्त फंड की जरूरत है, तो वे बिना रेपो रेट बढ़े भी FD पर ब्याज बढ़ा सकते हैं।

प्रतिस्पर्धा: ग्राहकों के डिपॉजिट को आकर्षित करने के लिए बैंकों के बीच की आपसी प्रतिस्पर्धा।

बैंकबाजार के सीईओ आदिल शेट्टी ने कहा, ‘वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद उम्मीद है कि RBI अपना रुख जस का तस रखेगा। अगर ऐसा होता है, तो FD निवेशकों को इस स्थिर ब्याज दर वाले माहौल का फायदा मिलता रहेगा और रिटर्न पहले की तरह अनुमानित रहेगा।’

सीनियर सिटीजन्स के लिए कैसा है माहौल?

वरिष्ठ नागरिकों के लिए एफडी पर अभी भी शानदार मौके हैं। कई बैंक वरिष्ठ नागरिकों को चुनिंदा अवधियों पर आम जमाकर्ताओं के मुकाबले 0.50% से ज्यादा का प्रीमियम दे रहे हैं, जिससे उनका कुल ब्याज 8% से भी ऊपर चला जाता है। हालांकि, यह दरें बैंक-दर-बैंक अलग होती हैं।

FD निवेशकों को क्या करना चाहिए?

महंगाई दर और वैश्विक हालात को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि ब्याज दरें फिलहाल ऊंचे स्तर पर बनी रहेंगी। हालांकि, FD रेट्स में कोई भी बड़ी बढ़ोतरी केवल एक पॉलिसी पर नहीं, बल्कि बैंकों की फंडिंग जरूरतों पर निर्भर करेगी। वैसे अगर आप निवेश करने का प्लान बना रहे हैं, तो लंबी अवधि की एफडी लॉक करने से पहले बैंकों के अलग-अलग रेट्स की तुलना जरूर कर लें।

Market outlook : लाल निशान में बंद हुआ बाजार, जानिए 5 अगस्त को कैसी रह सकती है सेंसेक्स-निफ्टी की चाल

Market outlook :मंगलवार, 4 अगस्त के उतार-चढ़ाव भरे कारोबारी सत्र में भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी 24,650 से नीचे गिरकर बंद हुआ। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 210.08 अंक या 0.27 प्रतिशत गिरकर 78,428.95 पर और निफ्टी 159.40 अंक या 0.64 प्रतिशत गिरकर 24,614.90 पर बंद हुआ। लगभग 2030 शेयर बढ़े,2037 शेयर गिरे और 174 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

निफ्टी में सबसे ज़्यादा गिरावट ग्रासिम इंडस्ट्रीज,HDFC लाइफ,मैक्स हेल्थकेयर,बजाज ऑटो और रिलायंस इंडस्ट्रीज में हुई। जबकि बढ़त वाले शेयरों में हिंडाल्को,ट्रेंट,अपोलो हॉस्पिटल्स,जियो फाइनेंशियल और इटरनल शामिल रहे।

मेटल और मीडिया को छोड़कर,बाकी सभी सेक्टोरल इंडेक्स लाल निशान पर बंद हुए। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी,ऑयल एंड गैस,रियल्टी,इंफ्रा,प्राइवेट बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और FMCG इंडेक्स 0.5-2 प्रतिशत नीचे बंद हुए।

निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.3 प्रतिशत गिरा,जबकि स्मॉलकैप इंडेक्स 0.2 प्रतिशत बढ़ा।

स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट में रिसर्च हेड संतोष मीणा का कहना है कि नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के पहले दिन,निफ्टी आखिरी मिनटों में लगभग 200 अंक उछल गया। बड़े इंस्टीट्यूशनल बॉय ऑर्डर्स थिन ऑक्शन विंडो के दौरान ज्यादा लिक्विड NSE पर फोकस करते हुए नजर आए जिससे कई हैवीवेट कंपनियों को बड़ा फायदा हुआ। BSE पर इंस्टीट्यूशनल कैश-मार्केट एक्टिविटी बहुत कम होने के बावजूद,सेंसेक्स अपने 3:15 बजे के लेवल के बहुत करीब रहा। जिससे यह अंतर पैदा हुआ। यह नए सिस्टम के तहत पूरी तरह से डिमांड-सप्लाई का असंतुलन था, न की कोई टेक्निकल गड़बड़ी।

आगे कैसी रह सकती है बाजार की चाल?

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड,विनोद नायर का कहना है कि मंगलवार की वीकली एक्सपायरी और F&O क्लोजिंग प्राइस तय करने के नए सिस्टम के लागू होने से मार्केट ट्रेंड्स में गड़बड़ी आई है। निफ्टी स्टॉक्स और इंडेक्स की दोपहर 3:30 बजे और 3:40 बजे की क्लोजिंग प्राइस के बीच बड़ा अंतर,साथ ही सेंसेक्स से इनका अंतर,यह बताता है कि नया सिस्टम जैसा सोचा गया था वैसा काम नहीं कर रहा है,जिससे प्राइस में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। इससे 15 मिनट के ब्लाइंड डेरिवेटिव्स विंडो क्लोजिंग सेशन से पहले,खासकर रिटेल इन्वेस्टर्स के बीच,पोजीशन्स का फोर्स्ड स्क्वेयर-ऑफ शुरू हो गया है।

ये नए सिस्टम की शुरुआती दिक्कतें लग रही हैं और एक्सचेंज और मार्केट रेगुलेटर को इन कमियों को दूर करने की जरूरत है। अभी,इसका असर स्टॉक्स और मेन इंडेक्स में ट्रेडिंग के F&O सेगमेंट तक ही सीमित है। खास बात यह है कि ये फंडामेंटल स्ट्रक्चरल परेशानियां नहीं हैं और इन पर कंट्रोल कर लेने की उम्मीद है।

आर्थिक और फाइनेंशियल आउटलुक मजबूत बना हुआ है और इससे लंबे समय के निवेशकों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। उम्मीद है कि जैसे ही एक्सचेंज अपने नॉर्मल ऑपरेटिंग स्ट्रक्चर पर लौटेंगे,मौजूदा उतार-चढ़ाव थम जाएगा।

मार्केट का फोकस होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की घटनाओं पर बना हुआ है। इस इलाके में शांति लौटने और स्टेबिलिटी आने से क्रूड ऑयल की कीमतों को कम करने और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा ग्लोबल अनिश्चितताओं और महंगाई की चिंताओं के बीच RBI की पॉलिसी मीटिंग पर सबकी नजरें लगी हुई हैं। इन्वेस्टर्स इन चुनौतियों से निपटने के लिए RBI से पॉलिसी उपायों की उम्मीद कर रहे हैं,साथ ही बैंकिंग सिस्टम के लिए लिक्विडिटी सपोर्ट की भी उम्मीद है। इससे मार्केट का भरोसा बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

बोनान्जा में रिसर्च एनालिस्ट अभिनव तिवारी का कहना है कि आगे मार्केट की दिशा काफी हद तक RBI की पॉलिसी कमेंट्री और तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी।

SBI सिक्योरिटीज में हेड-टेक्निकल और डेरिवेटिव्स रिसर्च सुदीप शाह का कहना है कि आगे,24750-24780 जोन निफ्टी के लिए एक बड़ी रुकावट बना रहेगा। 24780 से ऊपर का ब्रेकआउट इसके लिए 24900 की ओर और ऊपर जाने का रास्ता बना सकता है,जिसके बाद 25050 का लेवल भी देखने को मिल सकता है। नीचे की तरफ, निफ्टी के लिए 24460-24430 जोन से तत्काल सपोर्ट का काम करेगा।

बैंक निफ्टी व्यू

सुदीप शाह का कहना है कि बैंक निफ्टी भी आज गैप-डाउन के साथ खुला और पूरे ट्रेडिंग सेशन में दबाव में रहा। इसमें धीरे-धीरे गिरावट आई। हालांकि,CAS सेटलमेंट प्राइस में तेज रिकवरी (जो 3:15 PM क्लोजिंग लेवल से 400 अंक से ज्यादा ऊपर थी। ने नुकसान को काफी कम करने में मदद की। इंडेक्स आखिरकार 0.58% नीचे 57907 पर सेटल हुआ। डेली चार्ट पर,बैंक निफ्टी ने एक छोटी कैंडल बनाई,जिसकी निचली शैडो लंबी थी। यह निचले लेवल पर खरीदारी बढ़ने का संकेत है।

टेक्निकल नज़रिए से,इंडेक्स अपने शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म मूविंग एवरेज से ऊपर ट्रेड कर रहा है,जो एक पॉजिटिव ट्रेंड का संकेत है। हालांकि,मोमेंटम इंडिकेटर और ऑसिलेटर अभी साइडवेज़ रुझान का संकेत दे रहे हैं,जो शॉर्ट टर्म में मजबूत डायरेक्शनल मूव की कमी का संकेत देते हैं।

आगे 58200-58300 का जोन बैंक निफ्टी के लिए एक अहम रेजिस्टेंस एरिया के तौर पर काम करेगा। 58300 से ऊपर मूव करने पर 58800 की तरफ एक नया अपस्विंग हो सकता है,जिसके बाद शॉर्ट टर्म में 59200 का टारगेट भी देखने को मिल सकता है।

वहीं, नीचे की तरफ,57400-57300 का जोन एक अहम सपोर्ट बैंड के तौर पर काम करेगा। जब तक इंडेक्स इस सपोर्ट से ऊपर रहता है,तब तक बड़ा पॉजिटिव स्ट्रक्चर बना रहने की उम्मीद है।

 

भारत में विदेशी निवेश लाने के लिए सरकार ने पेश किया बिल, विदेशी निवेशकों को मिलेगी बड़ी राहत

 

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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध प्रदर्शन:12 रिजर्व सीटें क्यों खत्म करना चाहते हैं प्रदर्शनकारी, मांगे क्यों नहीं मान रही सरकार

पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत के साथ कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान का पूरा ध्यान रहा। इसलिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी राजनीतिक समस्याएं लंबे समय तक दबकर रह गईं। लेकिन अब वहां हालात ऐसे हो गए हैं कि पाकिस्तान सरकार के लिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय राजनीतिक नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन आंदोलनों के सफल होने से JAAC का जनाधार बढ़ा। अब संगठन महंगाई के मुद्दे से आगे बढ़कर PoK को ज्यादा स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी मांग PoK विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का कहना है कि जो लोग पाकिस्तान के दूसरे शहरों में रहते हैं, उन्हें PoK की सरकार बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। JAAC के मुताबिक इन 12 सीटों की वजह से स्थानीय मतदाताओं की राय का असर कम हो जाता है और अक्सर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए जून की शुरुआत में JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च शुरू होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलन के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के वर्षों में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर अब तक अपेक्षाकृत शांत माना जाता था। लेकिन JAAC के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने इस धारणा को बदल दिया है। अब पहली बार पाकिस्तान को उसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसे वह लंबे समय से स्थिर और शांत बताता रहा है। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलन के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यही से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हुई। JAAC बोली- पाकिस्तान से अलग होना नहीं चाहते PoK एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था के तहत चलता है। यहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और अलग झंडा है। हालांकि रक्षा, विदेश नीति और कई अहम मामलों पर अंतिम फैसला पाकिस्तान की केंद्र सरकार का ही होता है। यहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर कई लोग मानते हैं कि उनके पास सीमित अधिकार हैं और बड़े फैसले इस्लामाबाद में लिए जाते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि वह न तो पाकिस्तान से अलग होना चाहती है और न ही भारत में शामिल होना चाहती है। संगठन का कहना है कि उसकी सिर्फ इतनी मांग है कि PoK के लोगों को अपने इलाके के फैसले लेने का ज्यादा अधिकार मिले। इसके लिए वह ज्यादा स्थानीय अधिकार और संवैधानिक बदलाव की मांग कर रहा है। सेना बोली- आंदोलनकारी कानूनी तरीके से मांग उठाएं पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी का कहना है कि सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ संयम बरता है। चौधरी ने कहा कि सरकार ने कई बार JAAC से कहा कि वह 27 जुलाई से शुरू हुए स्थानीय चुनाव में हिस्सा ले और अपनी मांगें कानूनी तरीके से उठाए। लेकिन आंदोलनकारी सड़क पर दबाव बनाकर अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया है। संगठन का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र बिना कोई वजह बताए खारिज कर दिए गए। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है। इस्लामाबाद के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा का कहना है कि 2024 और 2025 के आंदोलनों के दौरान सरकार ने बिजली सस्ती करने और आटे पर सब्सिडी जैसी रियायतें दी थीं। इससे लोगों में यह धारणा बन गई कि सड़क पर उतरकर दबाव बनाने से सरकार झुक जाती है। इसी वजह से JAAC अब राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर भी बड़े आंदोलन कर पा रही है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन:12 रिजर्व सीटें क्यों खत्म कराना चाहते हैं प्रदर्शनकारी, मांगे क्यों नहीं मान रही सरकार

पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। पाकिस्तान ने हमेशा भारत के साथ कश्मीर विवाद को सबसे बड़ा मुद्दा माना। इस वजह से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी परेशानियों पर कम ध्यान दिया गया। अब वहां हालात ऐसे हैं कि सरकार के लिए उनकी आवाज दबाना मुश्किल हो रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के कुछ साल में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में PoK इनकी तुलना में अब तक शांत माना जाता था, लेकिन अब यह धारणा बदल चुकी है। जिस PoK को पाकिस्तान हमेशा शांत बताता रहा, वहीं अब उसके खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यहीं से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हुई। JAAC बोली- पाकिस्तान से अलग होना नहीं चाहते PoK एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था के तहत चलता है। यहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और अलग झंडा है। हालांकि रक्षा, विदेश नीति और कई अहम मामलों पर अंतिम फैसला पाकिस्तान की केंद्र सरकार का ही होता है। यहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर कई लोग मानते हैं कि उनके पास सीमित अधिकार हैं और बड़े फैसले इस्लामाबाद में लिए जाते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि वह न तो पाकिस्तान से अलग होना चाहती है और न ही भारत में शामिल होना चाहती है। संगठन का कहना है कि उसकी सिर्फ इतनी मांग है कि PoK के लोगों को अपने इलाके के फैसले लेने का ज्यादा अधिकार मिले। इसके लिए वह ज्यादा स्थानीय अधिकार और संवैधानिक बदलाव की मांग कर रहा है। सेना बोली- आंदोलनकारी कानूनी तरीके से मांग उठाएं पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी का कहना है कि सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ संयम बरता है। चौधरी ने कहा कि सरकार ने कई बार JAAC से कहा कि वह 27 जुलाई से शुरू हुए स्थानीय चुनाव में हिस्सा ले और अपनी मांगें कानूनी तरीके से उठाए। लेकिन आंदोलनकारी सड़क पर दबाव बनाकर अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया है। संगठन का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र बिना कोई वजह बताए खारिज कर दिए गए। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है। इस्लामाबाद के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा का कहना है कि 2024 और 2025 के आंदोलनों के दौरान सरकार ने बिजली सस्ती करने और आटे पर सब्सिडी जैसी रियायतें दी थीं। इससे लोगों में यह धारणा बन गई कि सड़क पर उतरकर दबाव बनाने से सरकार झुक जाती है। इसी वजह से JAAC अब राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर भी बड़े आंदोलन कर पा रही है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… PoK में पाकिस्तानी फोर्स ने लोगों पर गोलियां चलाईं:पाकिस्तान सरकार के खिलाफ 40 हजार प्रदर्शनकारी जुटे थे; कई लोग घायल
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के शांतिपूर्ण प्रदर्शन रैली पर पाकिस्तानी फोर्स ने गोलियां चला दीं। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC ने दावा किया कि अब्बासपुर के सरदार गुलाम हुसैन खान स्पोर्ट्स स्टेडियम में करीब 40 हजार लोग जुटे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Silver Gold Price Today: भारत में सोना ₹1.42 के पार निकला, चांदी ₹2600 चढ़ी,तेजी की क्या है वजह

Silver Gold Price Today: भारत में सोने चांदी की कीमतों में बढ़त देखने को मिल रही है। MCX पर सोने का भाव 904 रुपये यानी 0.64 फीसदी की बढ़त के साथ 1, 42, 059 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंचा। वहीं चांदी 2600 रुपये यानी 1.2 फीसदी की बढ़त के साथ 2,19,448 रुपये किलोग्राम पर पहुंचा।

वहीं इंटरनेशनल मार्केट में कॉमेक्स (Comex) पर,स्पॉट गोल्ड 0.47 प्रतिशत बढ़कर $4,109.90 प्रति औंस हो गया, जबकि चांदी 1.84 प्रतिशत बढ़कर $58.92 प्रति औंस हो गई।

बाजारों की नजर अब इस हफ्ते आने वाली अमेरिकी लेबर मार्केट की कई रिपोर्टों पर है, जिनमें मंगलवार को बाद में आने वाला JOLTS जॉब ओपनिंग्स डेटा, बुधवार को ADP प्राइवेट एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट और शुक्रवार को नॉन-फार्म पेरोल्स रिपोर्ट शामिल हैं। उम्मीद है कि यह डेटा फेडरल रिजर्व की ब्याज दर की चाल के बारे में नए संकेत देगा।

इस बीच, भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी चर्चा में रहे, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है और इसे तेहरान के लिए किसी समझौते पर सहमत होने का “आखिरी मौका” बताया। हालांकि, ईरान ने इस बात से इनकार किया कि कोई बातचीत हो रही है या इसकी कोई योजना है।

अमेरिका-ईरान तनाव कम होने से कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव पड़ा और रिस्क एसेट्स (जोखिम वाली संपत्तियों) को बढ़ावा मिला। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 3 पैसे बढ़कर 95.34 पर पहुंच गया, और ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 5.06 प्रतिशत गिरकर $83.48 प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जिससे महंगाई की चिंताएं कम हुईं और ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई। ट्रेडर्स अभी सितंबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की 65 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहे हैं।

अब क्या करें निवेश

ऑगमोंट (Augmont) की चीफ रिसर्च ऑफिसर रेनिषा चैनानी ने कहा कि जब तक लेबर मार्केट का आगामी डेटा अमेरिकी मॉनेटरी पॉलिसी के बारे में स्पष्ट संकेत नहीं देता, तब तक सोने की कीमतें एक निश्चित दायरे में रहने की संभावना है। “हमारी राय में, आज कीमती धातुओं में आई तेज़ी मुख्य रूप से जियोपॉलिटिकल तनाव और ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक को लेकर अनिश्चितता के बीच ‘सेफ-हेवन’ (सुरक्षित निवेश) की बढ़ती मांग के कारण है। मिडिल ईस्ट में हालिया घटनाक्रम के बाद निवेशक सतर्क हो गए हैं, जिससे सोना, चांदी, प्लेटिनम और पैलेडियम की खरीदारी बढ़ी है। एक और अहम वजह आने वाला US इकोनॉमिक डेटा है, खासकर लेबर मार्केट की रिपोर्ट, जो फेडरल रिजर्व के अगले ब्याज दर के फैसले से जुड़ी उम्मीदों पर असर डालेगी।

हमारा मानना ​​है कि निवेशकों को US मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा, ट्रेजरी यील्ड, डॉलर इंडेक्स, कच्चे तेल की कीमतों और जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये कारक तय करेंगे कि मौजूदा तेज़ी में आगे बढ़ने की ताकत है या नहीं,” तिवारी ने कहा।

ऑगमॉन्ट बुलियन की रिपोर्ट (4 अगस्त) का अनुमान है कि अगर सोने की कीमत $4,000 (₹1,41,000) से नीचे गिरती है, तो यह और गिरकर $3,900 (₹1,38,000) तक जा सकती है। लेकिन अगर यह $4,200 (₹1,46,000) से ऊपर बनी रहती है, तो एक नई तेज़ी इसे $4,500 (₹1,55,000) की ओर ले जा सकती है। चांदी के लिए, $63 (₹2,35,000) से ऊपर की मज़बूत चाल कीमतों को $70–71 की ओर धकेल सकती है। दूसरी ओर, $55 (₹2,14,000) से नीचे की गिरावट इसे $50 (₹2,00,000) तक नीचे ला सकती है।

Silver Price Today: फिर महंगी हुई चांदी, सावन के दूसरे दिन चढ़ा भाव, खरीदारी से पहले जान लें आपके अपने शहर के लेटेस्ट रेट

Gold Silver price: सोने-चांदी की कीमतों में तेजी, जानें बढ़त की क्या है वजह और क्या करें निवेशक

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वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के 25 राज्य ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ कोर्ट पहुंचे, फोर्स्ड लेबर के नाम पर लगाया शुल्क अवैध

अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नए टैरिफ फैसले को अदालत में चुनौती दी है। राज्यों ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दाखिल कर इन टैरिफ को अवैध घोषित करने की मांग की है। फैसले के तहत ट्रम्प ने 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। ये 60 देश अमेरिकी आयात का 99.4 फीसदी हिस्सा हैं। याचिका में कहा गया है कि इस कदम से देश में महंगाई बढ़ जाएगी। पिछले महीने अमेरिका ने जबरन मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दे पर 60 देशों पर 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच नए टैरिफ लगाए थे। भारत समेत 17 देशों पर 10 फीसदी की दर से टैरिफ लगाया गया है। डेमोक्रेटिक राज्यों का तर्क है कि प्रशासन ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का गलत इस्तेमाल कर रहा है। अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… इथियोपिया में भूस्खलन से 14 की मौत, पवित्र जल लेने थे पहुंचे थे लोग इथियोपिया के अम्हारा इलाके में भारी बारिश के कारण सोमवार को हुए भूस्खलन में 14 लोगों की मौत हो गई और 7 अन्य घायल हो गए। कई लोग अभी भी लापता हैं। यह भूस्खलन त्सदकाने डेब्रे मिटमाक सेंट मैरी मठ में हुआ, जहां सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र जल से शुद्धि की रस्म के लिए जमा हुए थे। डायोसिस के जनरल मैनेजर मेगाबे हादिस नेका तिबेब अबाबू ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया- “मरने वालों में से कई लोग पवित्र जल लेने के लिए जमा हुए थे। मरने वालों में से 11 लोगों को मठ में ही दफना दिया गया है, जबकि बाकी लोगों के शव उनके घर दिए गए हैं।”

वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के 25 राज्य ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ कोर्ट पहुंचे, दावा- फोर्स्ड लेबर के नाम पर लगाया शुल्क अवैध

अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नए टैरिफ फैसले को अदालत में चुनौती दी है। राज्यों ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दाखिल कर इन टैरिफ को अवैध घोषित करने की मांग की है। फैसले के तहत ट्रम्प ने 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। ये 60 देश अमेरिकी आयात का 99.4 फीसदी हिस्सा हैं। याचिका में कहा गया है कि इस कदम से देश में महंगाई बढ़ जाएगी। पिछले महीने अमेरिका ने जबरन मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दे पर 60 देशों पर 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच नए टैरिफ लगाए थे। भारत समेत 17 देशों पर 10 फीसदी की दर से टैरिफ लगाया गया है। डेमोक्रेटिक राज्यों का तर्क है कि प्रशासन ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का गलत इस्तेमाल कर रहा है। अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… इथियोपिया में भूस्खलन से 14 की मौत, पवित्र जल लेने थे पहुंचे थे लोग इथियोपिया के अम्हारा इलाके में भारी बारिश के कारण सोमवार को हुए भूस्खलन में 14 लोगों की मौत हो गई और 7 अन्य घायल हो गए। कई लोग अभी भी लापता हैं। यह भूस्खलन त्सदकाने डेब्रे मिटमाक सेंट मैरी मठ में हुआ, जहां सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र जल से शुद्धि की रस्म के लिए जमा हुए थे। डायोसिस के जनरल मैनेजर मेगाबे हादिस नेका तिबेब अबाबू ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया- “मरने वालों में से कई लोग पवित्र जल लेने के लिए जमा हुए थे। मरने वालों में से 11 लोगों को मठ में ही दफना दिया गया है, जबकि बाकी लोगों के शव उनके घर दिए गए हैं।”

येन को 40 साल के निचले स्तर से उबारेगा अमेरिका:15 साल बाद जापानी येन खरीदा, ट्रम्प बोले- कमजोर मुद्रा को सहारा देना दुनिया के लिए बेहतर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि अमेरिका ने एक दशक में पहली बार जापानी येन खरीदा है। येन को डॉलर के मुकाबले उसके 40 साल के सबसे निचले स्तर से उबारने के लिए ऐसा किया गया है। ट्रम्प ने कहा, “उनकी करेंसी कमजोर हो रही थी और वे थोड़ी मदद चाहते थे।” 10 सवाल-जवाब में जानें पूरी डिटेल्स… सवाल 1: जापान और अमेरिका ने हाल ही में बाजार में क्या और क्यों कदम उठाया है? जवाब: पिछले हफ्ते जापानी मुद्रा ‘येन’ डॉलर के मुकाबले 164 के स्तर पर पहुंच गई थी, जो पिछले 40 सालों का सबसे निचला स्तर है। इस तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए जापान और अमेरिका ने मिलकर फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में हस्तक्षेप किया। इस हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य येन की अत्यधिक अस्थिरता को रोकना और करेंसी स्पेक्युलेटर्स को नियंत्रित करना था। यह पिछले 15 सालों में यानी साल 2011 के बाद पहला मौका है जब जापान और अमेरिका ने करेंसी मार्केट में एक साथ मिलकर कदम उठाया है। इससे पहले 2011 में पूर्वी जापान में आए भूकंप और सुनामी के बाद दोनों देशों ने येन को कमजोर करने के लिए समन्वित कार्रवाई की थी। इस बार उद्देश्य येन को और अधिक गिरने से बचाना है। सवाल 2: इस हस्तक्षेप में दोनों देशों ने कितनी रकम का इस्तेमाल किया है? उत्तर: बैंक ऑफ जापान के आंकड़ों के अनुसार, टोक्यो ने शुक्रवार के आधिकारिक संयुक्त हस्तक्षेप से ठीक पहले, गुरुवार को न्यूयॉर्क बाजार में येन खरीदने के लिए लगभग 59 अरब डॉलर बेचे थे। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर अपनी खरीदी की राशि का खुलासा नहीं किया है, लेकिन कैबिनेट बैठक के दौरान अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की नोटबुक की तस्वीर से संकेत मिला है, जिस पर लिखा था: “To Do: Buy Japanese Yen $5-10 bil” यानी 5 से 10 अरब डॉलर का येन खरीदना। सवाल 3: इस संयुक्त कार्रवाई पर अमेरिका और जापान के अधिकारियों का क्या कहना है? जवाब: जापान का वित्त मंत्रालय: इस संयुक्त कार्रवाई से हाल के महीनों में येन में आई अत्यधिक अस्थिरता और अनियंत्रित चाल को रोकने में सफल रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी: स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि इस समन्वित कार्रवाई ने येन की अनियंत्रित चाल को नियंत्रित किया है। अमेरिका, येन के भारी अवमूल्यन को ठीक करने के लिए जापान के मौद्रिक और बाजार कदमों का पुरजोर समर्थन करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति: रविवार को संवाददाताओं से बात करते हुए ट्रम्प ने कहा, “जापानी मुद्रा कमजोर हो रही थी और वे थोड़ी मदद चाहते थे। हम जापान की मदद के लिए हमेशा तैयार हैं।” सवाल 4: अमेरिका को जापान की मदद करने से क्या फायदा है? जवाब: ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स में जापान इकोनॉमिक्स के प्रमुख शिगेतो नागाई ने बताया कि अमेरिका इस समन्वित हस्तक्षेप में शामिल होने के लिए इसलिए सहमत हुआ क्योंकि यह उसके अपने राष्ट्रीय हित में है। यदि येन और जापानी सरकारी बॉन्ड्स में बिकवाली जारी रहती, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता और वॉशिंगटन के लिए भी कर्ज लेने की लागत बढ़ सकती थी। सवाल 5: इस हस्तक्षेप का करेंसी मार्केट पर तुरंत क्या असर देखने को मिला? उत्तर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों के बाद डॉलर 0.2% गिरकर 157.07 येन पर आ गया, जो पिछले महीने के 164 के रिकॉर्ड निचले स्तर से काफी बेहतर स्थिति है। सवाल 6: आगे क्या उम्मीद है? क्या दोनों देश भविष्य में भी ऐसा हस्तक्षेप करेंगे? जवाब: विशेषज्ञ शिगेतो नागाई के अनुसार, दोनों देश आगे भी समय-समय पर रुक-रुक कर और समन्वित तरीके से हस्तक्षेप जारी रख सकते हैं। जापान के वित्त मंत्रालय और अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी दोनों ने स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर वे दोबारा कदम उठाने से नहीं हिचकेंगे। सवाल 7: जापानी येन 40 साल के निचले स्तर पर क्यों पहुंचा? इसके पीछे क्या कारण हैं? जवाब: 1990 के दशक की मंदी के बाद से जापान ने अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए लंबे समय तक अपनी ब्याज दरों को शून्य या नकारात्मक बनाए रखा था। 2024 में जापान ने ब्याज दरें बढ़ाईं जरूर, लेकिन फिर भी ये दुनिया के मुकाबले काफी कम रहीं। कम ब्याज दरों के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने येन में कर्ज लेकर उसे ज्यादा रिटर्न देने वाली करेंसी में लगाया। इसके अलावा जापानी कंपनियों का भारी विदेशी निवेश और उनकी विदेशी कमाई का विदेशों में ही बने रहना भी येन पर भारी पड़ा। इसने येन को 40 साल के निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। सवाल 8: क्या अमेरिका-ईरान जंग का असर भी येन की गिरावट पर पड़ा? जवाब: हां। ईरान जंग ने येन की गिरावट को और तेज कर दिया। केइओ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सायुरी शिराई के अनुसार, पूरी तरह ऊर्जा आयात पर निर्भर रहने के कारण तेल-गैस की बढ़ती कीमतों ने जापान के व्यापार संतुलन को बिगाड़ा। इससे महंगाई बढ़ी और येन की रिकवरी रुक गई। सवाल 9: मजबूत डॉलर और कमजोर येन से दोनों देशों को क्या फायदा-नुकसान हो रहा था? जवाब: अमेरिका के लिए: मजबूत डॉलर अमेरिकी एक्सपोर्ट को विदेशी उपभोक्ताओं के लिए महंगा बना देता है। इसका नुकसान अमेरिकी कंपनियों को होता है। जापान के लिए: कमजोर येन से जापानी एक्सपोर्टर्स और पर्यटकों को फायदा जरूर होता है, लेकिन जरूरी सामान का आयात महंगा हो जाता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ती है। सवाल 10: क्या इस खरीदारी से येन की स्थिति में स्थायी सुधार आ सकता है? जवाब: बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज के शुसुके यामादा का मानना है कि करेंसी मार्केट में ऐसी खरीदारी से केवल कुछ समय के लिए ही राहत मिलती है। वहीं बार्कलेज बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साझा कदम का असर शुरुआती दिनों में तो दिखेगा, लेकिन लंबी अवधि में येन पर नीचे जाने का दबाव बना रह सकता है।

8th Pay Commission: 3%, 5% और 6% एनुअल इंक्रीमेंट से 5 साल में कितनी बढ़ेगी बेसिक सैलरी? समझें लेवल 1 से 3 तक का पूरा कैलकुलेशन

8th Pay Commission Increment Calculation: पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित 8वें केंद्रीय वेतन आयोग को बने 9 महीने हो चुके हैं। जानकारी के मुताबिक, आयोग साल 2027 की शुरुआत में अपनी अंतिम सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपेगा। वेतन आयोग की सिफारिशों में जहां फिटमेंट फैक्टर की सबसे ज्यादा चर्चा है, वहीं सालाना वेतन वृद्धि दर भी कर्मचारियों की सैलरी तय करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

7वें वेतन आयोग के तहत केंद्रीय कर्मचारियों को बेसिक पे का 3% सालाना इंक्रीमेंट मिलता है। हालांकि, विभिन्न कर्मचारी यूनियनों ने 8वें वेतन आयोग से एनुअल इंक्रीमेंट को बढ़ाकर 5%, 6% या 7% करने की मांग की है। आइए अनुमानित आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि इंक्रीमेंट 3%, 5% या 6% होने पर अगले 5 सालों में कर्मचारियों की बेसिक सैलरी कितनी बढ़ सकती है।

कर्मचारी यूनियनों ने कितने % इंक्रीमेंट की मांग की है?

8वें केंद्रीय वेतन आयोग के समक्ष विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने सालाना वेतन वृद्धि की दर में बढ़ोतरी को लेकर अपनी मांगें रखी हैं। इसमें नेशनल काउंसिल ऑफ द जेसीएम (NC-JCM), ऑल इंडिया डिफेंस एंप्लाइज फेडरेशन (AIDEF) और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशंस (FNPO) ने मौजूदा 3% इंक्रीमेंट को बढ़ाकर 6% करने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा, इंडियन रेलवे सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने 5% और ऑल इंडिया एनपीएस एंप्लाइज फेडरेशन (AINPSEF) ने 7% वार्षिक इंक्रीमेंट की सिफारिश की है, ताकि लंबी अवधि में केंद्रीय कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में बेहतर बढ़ोतरी हो सके।

लेवल 1 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

7वें पे मैट्रिक्स के अनुसार लेवल 1 की शुरुआती बेसिक पे ₹18,000 है। अलग-अलग इंक्रीमेंट रेट के हिसाब से 5 साल में बेसिक सैलरी का ट्रेंड ऐसा हो सकता है:

लेवल 1 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

लेवल 2 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

लेवल 2 की शुरुआती बेसिक पे ₹19,900 होती है। 5 साल में यह इस प्रकार बढ़ सकती है:

लेवल 2 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

लेवल 3 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

लेवल 3 की शुरुआती बेसिक पे ₹21,700 है। देखिए 5 साल में यह कितनी बढ़ेगी:

लेवल 3 कर्मचारियों की सैलरी का गणित

बेसिक पे बढ़ने का अलाउंस और पेंशन पर क्या पड़ेगा असर?

सालाना इंक्रीमेंट से केवल टेक-होम सैलरी ही नहीं बढ़ती, बल्कि इससे जुड़े कई अन्य भत्तों में भी कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है:

महंगाई भत्ता (DA) & HRA: डीए और एचआरए की गणना बेसिक पे के प्रतिशत के आधार पर होती है। बेसिक पे ज्यादा होने पर डीए और एचआरए की रकम भी अपने आप बढ़ जाएगी।

NPS / PF योगदान: एनपीएस या प्रोविडेंट फंड में बेसिक+डीए का 10% कटता है, जिससे रिटायरमेंट कॉर्पस मजबूत होगा।

पेंशन और रिटायरमेंट बेनेफिट्स: रिटायरमेंट के समय मिलने वाली ग्रेच्युटी और पेंशन भी अंतिम बेसिक पे पर निर्भर करती है।

नोट: ये आंकड़े केवल 7वें पे मैट्रिक्स के आधार पर तैयार किए गए अनुमानित कैलकुलेशन हैं। 8वें वेतन आयोग ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।

घर ढूंढ़ने निकला शख्स रह गया हैरान, गुरुग्राम में 3BHK का किराया जान उड़ जाएंगे होश

गुरुग्राम में घर किराए पर लेना अब पहले जितना आसान या किफायती नहीं रह गया है। शहर के कई इलाकों में किराए लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए मनपसंद बजट में घर ढूंढ़ना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। हाल ही में इसी मुद्दे ने तब लोगों का ध्यान खींचा, जब एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Reddit पर अपना अनुभव साझा किया। घर की तलाश के दौरान उसे बार-बार एक ही सलाह मिली बजट बढ़ाइए। इसके बाद उसने सवाल उठाया कि क्या अब शहर में महंगा किराया ही नई सामान्य स्थिति बन चुका है। उसकी पोस्ट देखते ही देखते वायरल हो गई और सैकड़ों लोगों ने अपने अनुभव साझा किए।

किसी ने बढ़ते किराए को जिम्मेदार ठहराया तो किसी ने ब्रोकरों के रवैये पर सवाल उठाए। यह चर्चा अब सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि गुरुग्राम में तेजी से बदलते रेंटल मार्केट और बढ़ती महंगाई पर बड़ी बहस का रूप ले चुकी है।

पोस्ट ने छेड़ दी बड़ी बहस

Reddit के r/gurgaon समुदाय में शेयर की गई पोस्ट ने देखते ही देखते लोगों का ध्यान खींच लिया। कई यूजर्स ने माना कि वे भी घर खोजते समय इसी तरह के अनुभव से गुजर चुके हैं। चर्चा धीरे-धीरे केवल किराए तक सीमित नहीं रही, बल्कि गुरुग्राम में तेजी से बढ़ती महंगाई और रहने की लागत पर भी सवाल उठने लगे।

हर घर के साथ जुड़ जाता है ‘बस ₹5,000 और’

पोस्ट लिखने वाले यूजर ने बताया कि गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड पर करीब 1,700 वर्गफुट का 3BHK फ्लैट ₹50,000 से अधिक में मिल रहा है, जबकि शहर के कई प्रमुख सेक्टरों में ₹60,000 या उससे ज्यादा किराया सामान्य हो चुका है। उनका कहना था कि हर बार ब्रोकर सिर्फ इतना कहते हैं, “बस ₹5,000 और बढ़ा दीजिए।”

किराया ही नहीं, सालाना खर्च भी बढ़ रहा

यूजर ने हिसाब लगाते हुए बताया कि ₹50,000 मासिक किराए का मतलब सालभर में ₹6 लाख से ज्यादा खर्च है। यदि मेंटेनेंस, बिजली और अन्य शुल्क जोड़ दिए जाएं, तो यह रकम आसानी से ₹7 लाख के पार पहुंच जाती है। ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

क्या सैलरी इतनी तेजी से बढ़ी है?

यूजर ने सवाल उठाया कि जब वेतन में इतनी तेजी से बढ़ोतरी नहीं हुई, तो आखिर आम परिवार इतने महंगे किराए को कैसे वहन करें? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या लोग वास्तव में इतनी रकम चुका रहे हैं, या फिर मकान मालिकों और ब्रोकरों ने हर समस्या का समाधान सिर्फ “बजट बढ़ाइए” बना दिया है।

दूसरे यूजर्स ने भी साझा किए अपने अनुभव

पोस्ट पर कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए। एक यूजर ने लिखा कि 2BHK की तलाश में जब उसने ₹45,000 का बजट बताया, तो ब्रोकर ने साफ कह दिया कि उसकी जरूरतें और बजट मेल नहीं खाते। वहीं एक अन्य यूजर ने बताया कि ऑनलाइन कई 3BHK फ्लैट ₹90,000 से लेकर ₹1.5 लाख प्रति माह तक में सूचीबद्ध हैं।

लोगों ने सुझाए दूसरे विकल्प

कई Reddit यूजर्स ने सलाह दी कि अगर बजट सीमित है, तो गुरुग्राम के प्रीमियम इलाकों से बाहर घर तलाशना बेहतर रहेगा। कुछ लोगों ने नोएडा जैसे एनसीआर शहरों का भी सुझाव दिया, जहां समान सुविधाओं वाले फ्लैट अपेक्षाकृत कम किराए में मिल सकते हैं।

बदलती सोच या बढ़ता दबाव?

यह चर्चा सिर्फ एक व्यक्ति के घर खोजने की कहानी नहीं रही, बल्कि इसने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या गुरुग्राम में “अफोर्डेबल रेंट” की परिभाषा बदल चुकी है। बढ़ते किराए और स्थिर आय के बीच यह बहस अब शहर के हजारों किरायेदारों की साझा चिंता बनती दिखाई दे रही है।