विलोप के करीब पहुंची मध्यमार्गी राजनीति

समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच।

यूरोपीय राजनीति की खिसक रही भू-गर्भीय परतों (Tectonic Plates) से उठते भूकंपीय झटकों का सितंबर में जर्मनी शिकार बना। पहले हफ्ते में सैक्सनी-अनहाल्ट पहला जर्मन प्रांत बना, जहां नव-नाजीवादी ऑल्टरनेटिव्स फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) पार्टी प्रादेशिक चुनाव जीतने में कामयाब रही (वहां वह लगभग 44 फीसदी वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी)। यह किसी आम स्थिति में अचानक पैदा हुई विसंगति नहीं थी। बल्कि यह एक दशक से अधिक समय से उभरते रूझान का ठोस रूप ग्रहण कर लेना भर था। इस बात की पुष्टि 20 सितंबर को जर्मनी के मेक्लेनबर्ग– वेस्टर्न पोमेरेनिया प्रांत में एएफडी की जीत से हुई। वहां वह 38 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ पहले स्थान पर रही।

उसी रोज जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक दूसरे किस्म का सियासी भूकंप आया। वहां डाई लिंके (द लेफ्ट) पार्टी सबसे आगे रही, जिसे पश्चिमी मीडिया धुर-वामपंथी बताता है। इन तीन नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी की राजनीति तेजी से दक्षिण एवं वाम की ‘चरम’ (extreme) धुरियों के बीच बंटती जा रही है। इस तरह सेंटर राइट- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) और सेंटर लेफ्ट- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के बीच सत्ता की अदला-बदली का जारी लगभग आठ दशक से जारी खेल अब खत्म हो रहा है। उचित ही इसे जर्मन राजनीति में मध्य मार्ग के विलोप के रूप में देखा गया है।

और यह सिर्फ जर्मनी का रुझान नहीं है। वैसे तो यह ट्रेंड चुनावी लोकतंत्र वाले तमाम देशों में उभरा है, लेकिन पश्चिमी देशों में इस नई राजनीतिक परिघटना की खास झलक देखी जा सकती है। कुछ महीनों के बाद इस रुझान की पुष्टि संभवतः फ्रांस में भी होगी, जहां अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य गोलबंदी “धुर वामपंथी” नेता ज्यां ल्यूक मेलेन्शॉ और धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन के बीच हो रही है।

यह घटनाक्रम आने वाले वक्त में संभावित राजनीतिक टकराव का संकेत है। डाई लिंके की जीत और मेलेन्शॉ को मिल रही लोकप्रियता दुनिया में नए तेवर वाले वामपंथ के उदय की मिसाल हैं। और ऐसे संकेत सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं हैं। डाई लिंके की जीत के सिलसिले में यह बात सामने आई कि इस पार्टी ने बर्लिन में अपने चुनावी अभियान को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से सीख लेते हुए डिजाइन किया। बर्लिन में डाई लिंके का चेहरा तुर्किश मूल की सोशलिस्ट एलीफ एराल्प हैं। उनकी टीम ममदानी के प्रचार अभियान का अध्ययन करने न्यूयॉर्क गई। वहां से वह ये सबक लेकर लौटी कि बिखरे हुए अनगिनत मुद्दों को उठाने के बजाय दो या तीन ऐसे मुद्दे लिए जाएं, जिनकी वजह ‘लोगों की रात की नींद उड़ी रहती है’।

न्यूयॉर्क की तरह ही बर्लिन में भी नवोदित लेफ्ट ने मकान किराये को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाया। साथ में रोजमर्रा की चीजों की महंगाई और परिवहन पर ध्यान केंद्रित किया गया। उसके साथ हज़ारों स्वयंसेवकों को संगठित किया गया, ताकि वे घर घर जाकर चर्चा कर सकें। और उसका असर हुआ- ठीक न्यूयॉर्क की तरह। अब एराल्प बर्लिन की मेयर कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी हैं।

एक जर्मन विश्लेषक ने लिखा है- यह तथ्य कि पूंजीवादी विरोधी वामपंथ ने बर्लिन में जीत हासिल की है, पुष्टि करता है कि उदारवादी (लिबरल) और मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) विकल्पों का पतन और “बाज़ार लोकतंत्र” का ढहना जारी है। वह पार्टी सिस्टम ढह रहा है, जो नव-उदारवाद के दौरान एक ही केंद्र- पूंजी से नियंत्रित रहा, भले दिखावटी तौर पर कई पार्टियों के रूप में उसके अनेक चेहरे सामने रहे हों।

गुजरे डेढ़ दशक में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथ का बढ़ना सबसे मजबूत राजनीतिक परिघटना रही है। ऐसा उन विशाल निराश समूहों की प्रतिक्रिया से संभव हुआ, जिन्होंने नव-उदारवादी भूमंडलीकरण के विनाशकारी परिणामों को झेला और एक मुकाम आकर उसे ठुकराना शुरू किया। अर्थव्यवस्था का उत्तरोत्तर वित्तीयकरण, वेतन की अस्थिरता, बेरोजगारी, आवास का दुर्लभ होना, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षय- आदि के कारणों से उपजे जन असंतोष का लाभ धुर दक्षिणपंथी दलों ने उठाया। किसी ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ नफरत भरे अभियान चलाना, काल्पनिक प्रभु वर्ग (मोटे तौर पर पहले सत्ता से लाभान्वित रहे समूहों) को तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराना, अयथार्थ समाधान पेश करना- आदि ऐसा तरीका रहा है, जिसे लगभग हर देश में उन दलों ने अपनाया है। इनकी बदौलत धुर-दक्षिणपंथियों को कामयाबी मिली है।

उन्हें यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि पारंपरिक वामपंथ ने नव-उदारवाद के हाथों अपनी हार को स्वीकार कर लिया। वे दल बाजार, बड़ी कंपनियों, और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के समन्वित हमलों के आगे झुक गए। उन्होंने बिना आलोचनात्मक रुख अपनाए उस एजेंडे को स्वीकार कर लिया, जो शासक वर्ग उनके लिए तैयार किया था। मसलन, पहचान आधारित मुद्दों और woke culture के समर्थन में उन्होंने अपना सारा जोर लगाया, जबकि आम जन के रोजमर्रा के सवालों से उन्होंने नेता तोड़ लिया।

ट्रेड यूनियनों का बदलाव के बड़े सपनों को छोड़ देना, वर्ग-आधारित पार्टियों का विघटन और वर्ग चेतना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी से उनका मुंह मोड़ लेना- ये सब इसी दौर की कहानियां हैं। इस दौर में पूंजी बनाम श्रम की बहस को हाशिये में चले जाने दिया गया और यह शिक्षा नजरअंदाज दी गई कि पूंजी का बेलगाम संकेंद्रण धन उत्पन्न करने के अन्य दो स्रोतों- प्रकृति और श्रम- को नष्ट कर देता है।

इसी दौर में धुर-दक्षिणपंथ “समाधान” बनकर उभरा। उसने मुसीबत के असली स्रोतों से ध्यान हटा कर अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, या कम्युनिस्ट प्रतीकों को निशाने पर लिया। पश्चिमी देशों में पारंपरिक वामपंथ और मध्यमार्गी दलों ने इनमें से कुछ सवालों पर धुर-दक्षिणपंथ को अपनी मौन सहमति दी, जबकि कुछ मुद्दों पर उसे सीधे चुनौती देने से वे बचते रहे। उसी का नतीजा अब उनका खुद हाशिये पर चले जाना और उससे पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए नए तेवर वाले वामपंथ का उभरना है।

इस प्रक्रिया को फिलहाल अमेरिका भी साफ देखा जा सकता है। वहां नए वामपंथी तेवर की नुमाइंदगी Democratic Socialists of America (डीएसए) कर रहा है। हालांकि यह स्वायत्त राजनीतिक समूह है, लेकिन चुनावी सिस्टम की मजबूरियों के कारण वह डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर अपने को संगठित किए हुए है। इस समय जोहरान ममदानी डीएसए का सबसे प्रखर चेहरा हैं। लेकिन उसके अनेक चेहरे इस वर्ष डेमोक्रेटिक प्राइमरी (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) में कामयाब रहे, और तीन नवंबर को होने वाले मध्य-अवधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके नतीजों पर सबका ध्यान टिका हुआ है।

यह घटनाक्रम अमेरिका में आए एक बड़े बदलाव को जाहिर करता है। इस सिलसिले में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन रॉस की यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर हैः

“पिछली बार जब किसी सोशलिस्ट उम्मीदवार को अमेरिकी चुनाव में गंभीरता से लिया गया, तो वह 1912 में था, जब यूजीन डेब्स को राष्ट्रपति पद के लिए 6 फीसदी वोट मिले। यह बहुत कम था, लेकिन नगण्य नहीं था। उसके बाद पहली बार हो रहा है, जब डीएसए चुनाव जीत रहा है। उनके सदस्य कांग्रेस में हैं। उन्होंने दो सीटें जीतीं। उन्होंने सीनेट के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी हासिल की है। न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी डीएसए के सदस्य हैं। यह पहली बार है कि जब उम्मीदवार खुले तौर पर समाजवादी के रूप में खड़े हो रहे हैं। इसका अपवाद सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे।।।।।

अमेरिकी अखबार पढ़ें, तो मुझे लगता है वॉल स्ट्रीट जर्नल लगभग हर दिन डीएसए की निंदा करने वाला लेख छापता है, और न्यूयॉर्क टाइम्स आदि भी। और यह चौंकाने वाला है। यह तो शायद संवैधानिक भी न हो कि अमेरिकी कांग्रेस किसी विशिष्ट संगठन की निंदा करने के लिए मतदान करे, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के खिलाफ है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि अब मामला गंभीर है।।।।

इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका समाजवादी बनने जा रहा है। दुर्भाग्य से मेरे जीवन काल में ऐसा नहीं होगा। यहां मेरा मतलब वास्तविक समाजवाद से है- यानी उस अर्थ में, जिसमें अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा राजकीय स्वामित्व में आ जाता है, आपके सामने औपचारिक समाजवादी समाज होता है, और श्रमिक वर्ग समाज में अग्रणी शक्ति होता है।”

यहां जॉन रॉस ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया, वह निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने पिछले एक सितंबर को पारित किया। 192 के मुकाबले 220 मतों के बहुत से पारित इस प्रस्ताव में “समाजवाद” की निंदा की गई। डीएसए का इसमें नाम लेकर जिक्र किया गया। इसके अलावा हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार बार कम्युनिस्ट खतरे का जिक्र करते रहे हैं। उन्होंने डीएसए उम्मीदवारों का उल्लेख कर कहा है कि “कम्युनिज़्म हमारा दुश्मन है”। बीते चार जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने एक चौथाई से ज्यादा समय कम्युनिस्ट खतरे के उल्लेख और कम्युनिज्म के कथित अत्याचारों की चर्चा में लगाया।

इसके बावजूद हकीकत यह है कि समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच। और अब बात चर्चा से आगे निकल कर यहां पहुंच गई है कि खुद को सोशलिस्ट बताने वाले उम्मीदवार चुनाव जीतने लगे हैं।

इस घटनाक्रम ने डीएसए की नीतियों और कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में लाया है। आम धारणा यही है कि डीएसए नॉर्डिक सोशल डेमोक्रेसी का अमेरिकी संस्करण है। नॉर्डिक मॉडल निजी स्वामित्व, प्रतिस्पर्धी बाज़ार, और बड़े निजी कॉरपोरेट्स को चुनौती नहीं देता। वह महज सामूहिक सौदेबाजी (यानी यूनियन अधिकारों) को मजबूत करने और उदार कल्याणकारी राज्य की धारणा पर आधारित है। नॉर्डिक मॉडल के तहत राज्य अधिक कर लगाता है, अधिक विनियमन करता है, और अधिक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था का स्वामित्व और संचालन मुख्य रूप से निजी पूंजी ही करती है।

व्यवहार में डीएसए की राजनीति चाहे जो हो, अपने प्रोग्राम में वह इससे कहीं आगे गया है। उसका कार्यक्रम पूंजीवादी स्वामित्व को केंद्रीय समस्या मानता है। वह कंपनी संचालन, निवेश, संसाधन आवंटन आदि का दायित्व सार्वजनिक संस्थानों, श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक निकायों की ओर ट्रांसफर करना चाहता है। संघीय स्तर पर रोजगार गारंटी, 32 घंटे का कार्य सप्ताह, पूर्ण वेतन के साथ पर्यटन अवकाश,  व्यक्तिगत शुल्क के बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, प्री-स्कूल से विश्वविद्यालय तक मुफ्त शिक्षा, छात्र ऋण की समाप्ति, किराया नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सामाजिक आवास का निर्माण आदि उसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं। संसाधन जुटाने के लिए वह वेल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स की ऊंची दरों तथा उत्तराधिकार कर लगाने की मांग करता है।

डीएसए का राजनीतिक सुधार कार्यक्रम भी उतना ही व्यापक है। यह अमेरिकी सीनेट और इलेक्टॉरल कॉलेज को समाप्त करने, आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने, बहुदलीय लोकतंत्र लागू करने, राष्ट्रपति पद और सुप्रीम कोर्ट का ढांचा फिर से तय करने, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को कहीं अधिक कड़े विधायी नियंत्रण के अधीन लाने आदि जैसी बात करता है।

अमेरिकी सिस्टम के भीतर से ऐसे सुधारों को लागू करवा पाना असंभव समझा जाता है। जबकि बाहरी जन हस्तक्षेप से सिस्टम को पलटना डीएसए की रणनीति का हिस्सा नहीं है। इसीलिए उसके कार्यक्रमों को अक्सर हवाई बताया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका कोई महत्त्व नहीं है। डीएसए को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि उसने अमेरिका में उन मुद्दों को लोकप्रियता दिलाई, जिनसे वहां का शासक वर्ग ना सिर्फ नफरत करता है, बल्कि भयभीत भी होता है।

बीसवीं सदी वयस्क मताधिकार आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों के कारण जनता के राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ था। बोल्शेविक क्रांति ने उसमें आर्थिक एवं सामाजिक पक्ष जोड़े। लेकिन एक मुकाम के बाद शासक वर्ग उस चेतना को भटकाने और सिस्टम पर फिर से अपना पूरा शिकंजा कसने में कामयाब हो गया। मौजूदा दौर में धुर-दक्षिणपंथ को उसने अपना राजनीतिक औजार बनाया है। उसके प्रतिवाद के रूप में अब नए तेवर वाला वामपंथ सामने आया है। हालांकि इसकी सीमाएं हर जगह स्पष्ट हैं, फिर भी इसका उदय स्वागतयोग्य है, क्योंकि इनसे नई संभावनाएं खुलती हैं।

भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अभी ऐसी किसी संभावना के संकेत नजर नहीं आते, तो उसकी वजह यहां शासक वर्ग के चलाए उस वैचारिक एजेंडे का अभी भी प्रभावशाली बने रहना है, जिसके जरिए आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं को विमर्श से बाहर धकेला गया है। बहरहाल, यहां की नई पीढ़ी अगर सीखना चाहे, तो वह पश्चिम में उभरी संभावनाओं और उनकी सीमाओं का अध्ययन कर सकती है। हालांकि अपनी राजनीति विकसित करने के लिए शिक्षा का असल स्रोत तो अपनी वस्तुगत परिस्थितियां और आवाम हो ही सकते हैं। खैर, यह एक बिल्कुल अलग मुद्दा है।

Iran-US Conflict: ट्रंप ने ठुकराया ईरान का 7 दिन का सीजफायर प्लान, चुनाव बाद फिर बमबारी के संकेत

Iran-US Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बजाय एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सात दिन के युद्धविराम (सीजफायर) के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान पर अमेरिकी बमबारी फिर से शुरू हो जाएगी।

बता दें कि तेहरान कि ओर से अमेरिका को दिए गए इस प्रस्ताव के बदले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और परमाणु वार्ता शुरू करने की बात कही गई थी। ईरान चाहता था कि अमेरिका उसके बंदरगाहों की नाकाबंदी हटा दे, ताकि जहाजों की आवाजाही हो सके। गौरतलब है कि इस नाकाबंदी से ईरान की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप को इस बात पर शक है कि तेहरान उनकी मांगें मानेगा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि तेहरान मध्यावधि चुनावों के बाद एक ऐसी डील करना चाहता है जिससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म हो जाए।

ईरान ने सात दिन का प्लान पेश किया

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पत्रकारों को बताया था कि तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और सात दिनों के भीतर परमाणु बातचीत फिर से शुरू करने का प्रस्ताव दिया है।

ईरान ने कहा कि अगर अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा ले, तेल पर लगी पाबंदियां खत्म कर दे और लेबनान समेत युद्धविराम का पालन करे, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (जो दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा मार्ग है) को फिर से खोल देगा और अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत दोबारा शुरू करेगा।

अरागची ने कहा, “ईरान ने रणनीतिक रूप से अहम जलमार्ग को फिर से खोलने के लिए वॉशिंगटन के सामने सात दिन का एक “ठोस” प्लान पेश किया है। अगर जरूरी शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो होर्मुज को फिर से खोला जा सकता है और सात दिनों के भीतर सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल की जा सकती है। अब फैसला अमेरिका को करना है।”

ये कदम नए नहीं हैं’

ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका से जिन कदमों की मांग की जा रही है, वे नए नहीं हैं।

उन्होंने कहा, “अमेरिका को जो कदम उठाने चाहिए, वे नए नहीं हैं। ये सभी पहले से ही MOU में शामिल हैं।” उन्होंने जून में ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते (MOU) का जिक्र करते हुए यह बात कही।

ईरान का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी से देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना हुआ है और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) इस विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

हालांकि, वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, ट्रंप ने सात दिन के संघर्ष-विराम (ceasefire) के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और अपने सहयोगियों से कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान पर अमेरिकी बमबारी फिर से शुरू हो जाएगी।

बता दें कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच टकराव एक गतिरोध (stalemate) की स्थिति में पहुंच गया है और इसमें किसी समाधान की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।

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रिपोर्ट-अमेरिका का मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमला संभव:ट्रम्प ने 7 दिन में जंग रोकने का प्रस्ताव ठुकराया

अमेरिका ईरान पर दोबारा हमले कर सकता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के 7 दिन में जंग रोकने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रम्प ने अपने सहयोगियों से कहा है कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर फिर से बमबारी शुरू करनी चाहिए। ईरान ने गुरुवार को जंग रोकने के लिए 7 दिन का एक प्लान पेश किया था। इसके तहत संघर्ष रोकने, सातवें दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने और इसके बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत शुरू करने की बात कही गई थी। अराघची ने मध्यस्थों के जरिए प्रस्ताव दिया था ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पत्रकारों से कहा था कि ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका जंग रोकने का प्रस्ताव दिया है। उनके मुताबिक अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से पहले समझौता हो जाए तो यह बेहतर होगा। अब्बास अराघची ने बताया था कि यह योजना जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के जैसी ही है। ट्रम्प ने UN में ईरान को धमकी दी थी 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान ट्रम्प ने ईरान को लेकर बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि उनके सामने दो रास्ते हैं- ईरान के साथ ऐसा समझौता करना, जिससे वह दोबारा मजबूत हो सके, या इस्लामिक रिपब्लिक को खत्म कर देना। ट्रम्प ने साथ ही कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि चुनाव के बाद ईरान के साथ कोई समझौता हो सकता है। ईरान की मांग- अमेरिकी सैन्य कार्रवाई खत्म हो जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल से मुलाकात के दौरान अराघची ने कहा था कि ईरान ने अमेरिका के सामने बातचीत आगे बढ़ाने के लिए अपनी शर्तें रख दी हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सुरक्षा बहाल करने के लिए ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई खत्म होनी चाहिए। अराघची ने यह भी कहा कि ईरान अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत के लिए तैयार है। उनके मुताबिक, बातचीत के बीच अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पजशकियान ने ट्रम्प पर लगाया समझौता तोड़ने का आरोप ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में जून में हुए समझौते के अमल में न आने के लिए ट्रम्प को जिम्मेदार बताया था। पजशकियान ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता हुआ था और ईरान आगे बातचीत के लिए भी तैयार था। उन्होंने दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ईरान ने बंद नहीं किया था, लेकिन इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने बातचीत के बजाय सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुना। पजशकियान ने यह भी आरोप लगाया कि ईरान के सर्वोच्च नेता, वैज्ञानिकों, सैन्य कमांडरों और सरकारी अधिकारियों की हत्या की गई। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला-फिर हमला हुआ तो युद्ध हिंद महासागर तक फैलेगा: इससे भारत-चीन पर असर ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका या इजराइल ने दोबारा हमला किया तो पश्चिम एशिया की जंग हिंद महासागर तक फैल सकती है। पूरी खबर पढ़ें…

Xi-Trump Dinner: व्हाइट हाउस में शाही डिनर पर अपना ‘थर्मस’ लेकर पहुंचे जिनपिंग! सोशल मीडिया पर छा गईं ये 2 तस्वीरें

White House Dinner: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के सम्मान में आयोजित व्हाइट हाउस स्टेट बैंकवेट की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। टेक और वॉल स्ट्रीट के दिग्गजों से सजी इस दावत से जुड़ी दो ऐसी बातें और तस्वीरें सामने आई हैं, जो इंटरनेट पर तेजी से ट्रेंड कर रही हैं।

डिनर टेबल पर जिनपिंग की ‘थर्मस’ बनी चर्चा का विषय

व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में सजी भव्य रेड-थीम वाली मुख्य टेबल पर मेहमानों का ध्यान एक अनोखी चीज ने खींचा। टेबल पर महंगी वाइन ग्लासेज और शाही क्रॉकरी के बीच दो थर्मस बोतलें रखी दिखाई दीं। एक काले रंग की और दूसरी सफेद रंग की।तस्वीरों के मुताबिक, काली थर्मस बोतल शी जिनपिंग के पास और सफेद थर्मस बोतल उनकी पत्नी पेंग लियुआन के पास रखी थी।

चीन में पारंपरिक रूप से सेहत के लिए गुनगुना या गर्म पानी पीना दैनिक जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है। सोशल मीडिया पर यूजर चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि ‘शायद जिनपिंग इसमें गोजी बेरीज (Goji Berries) या अपनी खास ग्रीन टी लेकर आए थे।’

वैसे कूटनीतिक हलकों में विदेशी दौरों पर राष्ट्राध्यक्षों द्वारा अपना पानी या चाय इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन व्हाइट हाउस के आधिकारिक स्टेट डिनर की टेबल पर थर्मस का इस तरह नजर आना लोगों को काफी दिलचस्प लगा।

‘चलो कंस्ट्रक्शन साइट देखने चलते हैं…’ ट्रंप के बयान पर लगे ठहाके

डिनर के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने खास अंदाज में माहौल को हल्का-फुल्का बनाते नजर आए। ट्रंप ने शी जिनपिंग को अमेरिका के राष्ट्रीय प्रतीक ‘बाल्ड ईगल’ (Bald Eagle) की एक खास मूर्ति भेंट की।

अपने टोस्ट स्पीच के दौरान ट्रंप ने कहा कि व्हाइट हाउस का मौजूदा बैंक्वेट हॉल काफी छोटा पड़ता है, इसलिए वह $400 मिलियन की लागत से 1,000 लोगों की क्षमता वाला नया विशाल बॉलरूम बनवा रहे हैं।

ट्रंप ने मुस्कुराते हुए शी जिनपिंग और वहां मौजूद मेहमानों को आमंत्रित किया कि ‘डिनर के बाद चलिए, चलकर नए बॉलरूम की कंस्ट्रक्शन साइट देखते हैं, आप लोग इसके फर्श पर कदम रखने वाले पहले इंसान होंगे।’

जैसे ही दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली नेताओं के डिनर के बाद ‘कंस्ट्रक्शन साइट का मुआयना’ करने की बात सामने आई, टेबल पर बैठे एलन मस्क, टिम कुक, जेन्सन हुआंग और सैम ऑल्टमैन समेत तमाम बड़े उद्योगपति ठहाका लगाकर हंस पड़े।

White House Dinner

टेक जगत के दिग्गजों की रही मौजूदगी 

यह डिनर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सिलिकॉन वैली के लगभग सभी बड़े चेहरे मौजूद थे। टेस्ला के एलन मस्क, एपल के टिम कुक, एनवीडिया के जेन्सन हुआंग, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, गूगल के सुंदर पिचाई और मेटा के मार्क जुकरबर्ग जैसे दिग्गजों ने इसमें शिरकत की।

डॉलर, क्रूड, बॉन्ड यील्ड से सहमा बाजार! क्या बाजार बचा पाएगा 22800 का स्तर? जानें गिफ्ट निफ्टी क्या दे रहा संकेत

Gift Nifty Indicator: पिछले सेशन में भारी बिकवाली के बाद, शुक्रवार को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी के लगभग सपाट खुलने की उम्मीद है। GIFT निफ्टी में बहुत कम हलचल दिख रही है, जबकि US ट्रेजरी यील्ड और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार की धारणा पर दबाव बनाए हुए हैं। हालांकि की कीमतों में मामूली गिरावट और वॉल स्ट्रीट पर रात भर का स्थिर सेशन कुछ राहत दे सकता है, लेकिन विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारी बिकवाली घरेलू बाजार के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

सुबह करीब 8 बजे GIFT निफ्टी 23,092 पर ट्रेड कर रहा था, जो 5 अंक या 0.02 फीसदी नीचे था। कमजोर ग्लोबल संकेतों, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और US बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी के बीच गुरुवार को भारतीय इक्विटी बाजारों में भारी गिरावट आई। सेंसेक्स 1,247.71 अंक या 1.67 प्रतिशत गिरकर 73,580.54 पर आ गया, जबकि निफ्टी 383.70 अंक या 1.64 प्रतिशत गिरकर 23,063.10 पर बंद हुआ, जिससे मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 23,000 का स्तर चर्चा का विषय बन गया है।

बॉन्ड की बिकवाली ,एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख

शुक्रवार को एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख रहा क्योंकि निवेशक लगातार हो रही ग्लोबल बॉन्ड बिकवाली से जूझ रहे थे। इस बिकवाली ने लंबी अवधि की US यील्ड को दो दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है और सभी बाजारों में कर्ज लेने की लागत बढ़ा दी है। ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी ने इक्विटी वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, खासकर इसलिए क्योंकि 100 डॉलर से ऊपर कच्चे तेल की कीमतें महंगाई को ऊंचा रखने और US फेडरल रिजर्व द्वारा और मौद्रिक सख्ती की उम्मीदों को मजबूत करने का खतरा पैदा कर रही हैं।

जापान को छोड़कर एशिया-पैसिफिक शेयरों का MSCI का सबसे बड़ा इंडेक्स मोटे तौर पर सपाट रहा, हालांकि चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार छुट्टियों के कारण बंद होने से ट्रेडिंग कम रही। जापान के निक्केई में 1 फीसदी की बढ़त हुई, जबकि हांगकांग के हैंग सेंग में 1 प्रतिशत की गिरावट आई। ऑस्ट्रेलिया के रिसोर्स-हैवी बाजार में 0.6 प्रतिशत की गिरावट आई।

इंडेक्स पर क्या हो रणनीति

एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि US 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.20 प्रतिशत से ऊपर चली गई है और कई वर्षों के उच्चतम स्तर के करीब बनी हुई है, जिससे ग्लोबल वित्तीय स्थितियां सख्त हो रही हैं और उभरते बाजारों की इक्विटी का आकर्षण कम हो रहा है।

पोन्नमुडी का अनुमान है कि निफ्टी के लिए 23,200-23,300 का स्तर तुरंत रेजिस्टेंस ज़ोन का काम करेगा, जबकि 23,000 का स्तर अहम साइकोलॉजिकल सपोर्ट बना रहेगा। अगर निफ्टी 23,000 के नीचे निर्णायक रूप से टूटता है, तो गिरावट 22,900-22,800 तक बढ़ सकती है; वहीं, अगर यह 23,300 के ऊपर लगातार बंद होता है, तो 23,400-23,500 की ओर राहत भरी चाल (रिलीफ मूव) देखने को मिल सकती है।

चॉइस इक्विटी ब्रोकिंग के टेक्निकल रिसर्च VP सचिन गुप्ता ने कहा कि हाल ही में एक अहम सपोर्ट ज़ोन से नीचे गिरने के बाद, सेंसेक्स पर कुछ समय तक दबाव बना रह सकता है, क्योंकि टेक्निकल इंडिकेटर कमज़ोर मोमेंटम की ओर इशारा कर रहे हैं। हालांकि, इंडेक्स ‘ओवरसोल्ड’ ज़ोन के करीब पहुंच रहा है, जिससे 73,000-73,250 का दायरा यह तय करने के लिए अहम हो गया है कि मौजूदा कमज़ोरी और बढ़ेगी या स्थिर होगी।

“हालात को और बिगड़ने से रोकने के लिए 73,000–73,250 का दायरा अहम होगा, जबकि 73,850–74,000 का स्तर तुरंत रुकावट का काम कर सकता है। अगर यह 74,000 के ऊपर लगातार बना रहता है तो कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन अगर यह 73,000 के नीचे निर्णायक रूप से टूटता है तो मौजूदा कमज़ोरी और बढ़ सकती है।”

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, फ्लैट हो सकती है भारतीय बाजार की शुरुआत

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Global Market :एशिया बाजारों में मिला-जुला कारोबार, जापान 1% ऊपर, क्रूड के साथ US बॉन्ड यील्ड की टेंशन कायम

Asian Market Today: ग्लोबल संकेत कमजोर से मिले-जुले रहे। शुरुआती कारोबार में एशियाई बाजार मिले-जुले रहे। निवेशक ट्रंप-शी की बैठक, अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव, तेल की ऊंची कीमतों और ग्लोबल बॉन्ड की बिकवाली पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

वॉल स्ट्रीट में बॉन्ड की भारी बिकवाली के दबाव के बावजूद, शुरुआती कारोबार में इस क्षेत्र के शेयरों में 0.2% से ज़्यादा की बढ़त हुई। हैंग सेंग फ्यूचर्स 0.3% गिर गया, जबकि जापान का निक्केई 1.05% चढ़ा और टोपिक्स में 1.15% की बढ़त हुई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगातार दूसरे दिन ‘चूसोक’ (Chuseok) त्योहार के कारण बंद रहा। ताइवान का इंडेक्स और चीनी बाज़ार भी ‘मिड-ऑटम’ त्योहारों के कारण बंद रहे।

जापानी येन डॉलर के मुकाबले 158.78 पर काफी हद तक स्थिर रहा, और ऑफशोर युआन 6.7162 पर सपाट रहा।

इस बीच भारतीय बाजारों में हल्की शुरुआत के संकेत मिले, जिसमें GIFT निफ्टी ने नेगेटिव ज़ोन में शुरुआत का संकेत दिया। यह गुरुवार के खराब सत्र के बाद हुआ, जब निफ्टी 7 अप्रैल, 2026 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया था।

गुरुवार को भारतीय शेयरों पर ग्लोबल उथल-पुथल का सबसे ज़्यादा असर पड़ा, क्योंकि US बॉन्ड यील्ड में उछाल, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर के मजबूत होने से बाज़ार नीचे आ गया। 10-साल का US ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.13% हो गया, जो जुलाई 2007 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है, जबकि US-ईरान संघर्ष को लेकर नई चिंताओं के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत फिर से $106 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई।

मजबूत US डॉलर, जो 101 के पार चला गया, ने भारतीय रुपये और मेटल शेयरों पर और दबाव डाला।

IRDAI के ड्राफ्ट डिस्ट्रीब्यूशन नियमों के कारण भारी बिकवाली से बैंकिंग और इंश्योरेंस शेयरों में सबसे ज़्यादा गिरावट आई। PB फिनटेक 32% और टर्टलमिंट 20% गिर गए, जबकि एक्सिस बैंक और इंडसइंड बैंक में से प्रत्येक में लगभग 5% की गिरावट आई। मंथली एक्सपायरी से जुड़ी अस्थिरता और ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली ने गिरावट को और बढ़ा दिया।

क्रूड में दबाव

इस बीच, तेल बाजार के दबाव के पीछे एक मुख्य कारण बना रहा। ब्रेंट क्रूड लगातार दूसरे सत्र में बढ़कर $106.60 प्रति बैरल पर बंद हुआ, जिससे इस साल इसकी बढ़त 75% से ज़्यादा हो गई। हालांकि, शुक्रवार को कुछ राहत मिली क्योंकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.5% गिर गई। यह गिरावट उन खबरों के बीच आई जिनमें कहा गया था कि अमेरिका और ईरान के बातचीत करने वाले एक ऐसे चरणबद्ध समझौते पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत तेहरान ‘स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज’ को फिर से खोल देगा और बदले में वाशिंगटन ईरानी बंदरगाहों पर लगी नाकेबंदी हटा लेगा। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड की कीमत 0.8% गिरकर $93.87 प्रति बैरल हो गई।

उम्मीद है कि आने वाले समय में बाजार तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड पर ध्यान केंद्रित रखेंगे, क्योंकि स्वैप्स में अब अगले साल के दौरान US फेड द्वारा तीन बार और ‘क्वार्टर-पॉइंट’ (0.25%) की बढ़ोतरी की पूरी तरह से उम्मीद की जा रही है।

अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से दो साल की US ट्रेजरी यील्ड में 150 बेसिस पॉइंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसी अवधि में 30 साल की यील्ड में 80 बेसिस पॉइंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है।

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, फ्लैट हो सकती है भारतीय बाजार की शुरुआत

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ईरान के लिए ‘सीक्रेट हथियार’ बना रहा चीन! रिपोर्ट में हुए खुलासे से अमेरिका में हड़कंप

China Secret Support to Iran: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच चीन एक तरफ तो खुद को शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से ईरान की आर्थिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में लगा हुआ है। एक खोजी रिपोर्ट ने इस पूरे मामले से पर्दा उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन, ईरान के लिए एक खास ‘सीक्रेट हथियार’ भी बना रहा है।

अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान के रक्षा मंत्रालय को भेजे जाने वाले ‘डुअल-यूज’ पार्ट्स यानी दोहरे इस्तेमाल वाले घटकों की डिलीवरी में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। ईरानी सीमा शुल्क डेटा, अमेरिकी अधिकारियों और इस गुप्त व्यापार से जुड़े लोगों के हवाले से आई इस रिपोर्ट से कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। चीन और अमेरिका के शीर्ष नेताओं की मुलाकात के बीच इस खुलासे ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

चीन से क्या-क्या मिल रहा है ईरान को?

‘डुअल-यूज’ पार्ट्स वे सामान होते हैं जिनका उपयोग आम नागरिक उपकरणों के साथ-साथ खतरनाक हथियारों में भी किया जा सकता है। WSJ रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान भेजे गए सामान में ये प्रमुख चीजें शामिल हैं:

इलेक्ट्रॉनिक्स और जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण: जो मिसाइलों की सटीक निशाना लगाने की क्षमता बढ़ाते हैं।

इलेक्ट्रिक मोटर और एयरक्राफ्ट इंजन पार्ट्स: जिनका सीधा इस्तेमाल सैन्य ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम में होता है।

रासायनिक सामग्री: जिसका इस्तेमाल बैलिस्टिक मिसाइल के फ्यूल बनाने में किया जा सकता है।

उपग्रह तस्वीरें: अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि 17 जुलाई के उस हमले से पहले और बाद में ईरान ने चीनी सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया, जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।

कार्गो फ्लाइट्स में अचानक उछाल: ‘महान एयर’ का संदिग्ध रोल

फ्लाइट ट्रैकिंग साइट ‘FlightRadar24’ के डेटा के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित ईरानी एयरलाइन महान एयर ने मार्च के महीने में चीन के बीजिंग, शंघाई और गुआंगझू से तेहरान के लिए हर हफ्ते सिर्फ 4 उड़ानें भरी थीं।

लेकिन अप्रैल के अंत तक यह संख्या बढ़कर 27 उड़ानें प्रति सप्ताह हो गई। सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में महान एयर की फ्लाइट्स की संख्या 39 तक पहुंच गई। इन अधिकांश उड़ानों का इस्तेमाल यात्रियों को ले जाने के बजाय गुप्त सैन्य और तकनीकी कार्गो (हथियारों के पुर्जों) की डिलीवरी के लिए किया जा रहा था।

अमेरिकी पाबंदियों को दरकिनार कर खेल कर रहा तेल का ‘मास्टरमाइंड’

अमेरिकी पाबंदियों से पंगु हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था को चीन संजीवनी दे रहा है। अमेरिकी सांसदों के अनुसार, चीन ईरान के क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट का 80% से ज्यादा हिस्सा खुद खरीद रहा है। अमेरिकी वित्तीय पाबंदियों को चकमा देने के लिए चीनी बैंकों और छद्म कंपनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे तेहरान तक पैसा आसानी से पहुंच रहा है।

16 सितंबर को बीजिंग में हुई बैठक में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने साफ शब्दों में कहा था कि चीन और ईरान ‘व्यापक रणनीतिक भागीदार’ हैं और चीन ईरान के ‘वैध अधिकारों और हितों’ की रक्षा के लिए सहयोग मजबूत करने को तैयार है।

ट्रंप-जिनपिंग की मीटिंग के बीच अमेरिकी सियासत में भूचाल

वाशिंगटन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, एआई सुरक्षा और ताइवान जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है, लेकिन अमेरिकी संसद में ईरान का मुद्दा सबसे ऊपर आ गया है।

सीनेटर एलिसा स्लॉटकिन समेत कई डेमोक्रेट नेताओं ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखकर मांग की है कि राष्ट्रपति ट्रंप, शी जिनपिंग के सामने चीन की इस ‘सैन्य मदद’ का मुद्दा सख्ती से उठाएं। सीनेटरों ने आरोप लगाया कि चीनी कंपनियां अमेरिकी सैनिकों की हत्या और ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को जिंदा रखने में मदद कर रही हैं।

हालांकि, ट्रंप प्रशासन चीन से सीधे टकराने में थोड़ा हिचकिचा रहा है। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि शी जिनपिंग ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे ईरान को सीधे हथियार नहीं देंगे और वे शी पर भरोसा करते हैं।

चीन की सफाई: ‘हमारी छवि खराब करने की कोशिश’

इन गंभीर आरोपों पर चीन के विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजिंग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह ‘चीन को बदनाम करने की साजिश’ है। चीन का तर्क है कि वह दोहरे उपयोग वाले सामानों के निर्यात पर सख्त नियम लागू करता है और अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं।

कोर्ट ने ट्रम्प का फैसला 6 दिन बाद ही पलटा:CNN समेत 3 मीडिया हाउस की व्हाइट हाउस में एंट्री पर बैन हटाया

अमेरिकी कोर्ट ने CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों पर लगाए गए ट्रम्प प्रशासन के बैन को हटाने का आदेश दिया है। अब इन तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को फिर से व्हाइट हाउस में एंट्री मिल सकेगी। अमेरिकी फेडरल जज टिमोथी केली ने कहा कि मीडिया पर लगाया गया बैन अमेरिकी संविधान के खिलाफ हो सकता है। तीनों मीडिया संस्थानों ने ट्रम्प के फैसले के खिलाफ कोर्ट में अपील की थी। ट्रम्प ने 18 सितंबर को CNN, MS NOW और पॉलिटिको को व्हाइट हाउस से बैन करने का ऐलान किया था। उस समय तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकार व्हाइट हाउस प्रेस क्षेत्र में मौजूद थे और अपनी रिपोर्टिंग कर रहे थे। मीडिया संस्थानों ने कहा- बैन से पहले अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला CNN, MS NOW और पॉलिटिको ने कोर्ट में कहा कि ट्रम्प का फैसला उनके फर्स्ट अमेंडमेंट अधिकारों का उल्लंघन करता है। अमेरिकी संविधान का फर्स्ट अमेंडमेंट अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी की सुरक्षा करता है। तीनों मीडिया संस्थानों ने कहा था कि एक्सेस हटाने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया। मीडिया संस्थानों पर गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप ट्रम्प प्रशासन ने कोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था। उसका कहना था कि CNN, MS NOW और पॉलिटिको की कुछ खबरों में गलत जानकारी के साथ संवेदनशील और गोपनीय जानकारी भी लीक हुई। प्रशासन ने CNN की व्हाइट हाउस के नीचे बने बंकर से जुड़ी रिपोर्ट, MS NOW की ईरान युद्ध में अमेरिकी हथियारों की कमी वाली रिपोर्ट और पॉलिटिको की व्हाइट हाउस के बॉलरूम की फंडिंग से जुड़ी रिपोर्ट का उदाहरण दिया था। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने यह भी कहा कि इन मीडिया संस्थानों ने तय नियमों का पालन नहीं किया। ट्रम्प पहले भी मीडिया पर सवाल उठाते रहे हैं ट्रम्प 2016 से CNN की रिपोर्टिंग को लगातार ‘फेक न्यूज’ कहते रहे हैं। उनके कार्यकाल में पहले भी CNN के पत्रकारों का व्हाइट हाउस पास रोका जा चुका है। ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे बड़े अखबारों पर भी उनके खिलाफ पक्षपात करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए और आरोप लगाया कि ये संस्थान गलत नीयत से उनके खिलाफ खबरें प्रकाशित करते हैं। व्हाइट हाउस ने ट्रम्प टीवी शुरू की CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों पर बैन के बाद अमेरिका के बड़े टीवी चैनलों ने ट्रम्प के कार्यक्रमों की साझा लाइव कवरेज बंद कर दी थी। इसके बाद व्हाइट हाउस ने अपनी ऑनलाइन वीडियो फीड शुरू की, जिसका नाम ‘ट्रम्प टीवी’ रखा। ——————— ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी F-35 फाइटर जेट के पार्ट्स चीन के हाथ लगे: ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे थे अमेरिका के सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट F-35 के कुछ पार्ट्स चीन के हाथ लग गए हैं। ये पार्ट्स ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका भेजे जा रहे थे, लेकिन रास्ते में इनकी खेप हांगकांग पहुंच गई। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जेलेंस्की बोले- रूस भारतीयों को बहला-फुसलाकर जंग में भेज रहा:47 देशों के नागरिकों को भर्ती किया; जंग में भारत के 51 लोगों की मौत

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने बुधवार को UN महासभा में दावा किया कि रूस 47 देशों के नागरिकों को बहला-फुसलाकर अपनी सेना में भर्ती कर रहा है। इनमें भारत के लोग भी शामिल हैं। जेलेंस्की ने कहा कि इन देशों के नागरिकों को धोखे से रूस लाया गया और बाद में युद्ध के मैदान में भेज दिया गया। उन्होंने दूसरे देशों से अपने नागरिकों को रूस-यूक्रेन युद्ध से दूर रखने की अपील की। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, रूसी सेना में 227 भारतीय नागरिक भर्ती हुए थे। इनमें से 51 की मौत हो चुकी है और 139 को सेना से छुट्टी मिल चुकी है। भारत सरकार बाकी भारतीयों की वापसी के लिए रूस से बातचीत कर रही है। जेलेंस्की बोले- पुतिन ज्यादा जमीन कब्जाना चाहते हैं जेलेंस्की ने कहा कि रूस ज्यादा से ज्यादा लोगों को युद्ध में उतारकर यूक्रेन में अपनी पकड़ बढ़ाना चाहता है। उन्होंने दूसरे देशों से रूस पर दबाव बढ़ाने और उसकी युद्ध क्षमता कम करने की अपील की। रूस की कमाई रोकने की अपील जेलेंस्की ने रूस की आर्थिक कमाई पर रोक लगाने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि रूस के युद्ध को जारी रखने के लिए उसकी आर्थिक ताकत को कमजोर करना जरूरी है। उन्होंने भारत, चीन और तुर्किये से रूस के साथ ऊर्जा कारोबार कम करने की अपील की। द वॉल स्ट्रीट जर्नल से बातचीत में जेलेंस्की ने कहा कि इन देशों के साथ रूस का ऊर्जा कारोबार उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। उनके मुताबिक, अगर ये देश रूस से ऊर्जा खरीद कम करते हैं तो मॉस्को पर युद्ध रोकने का दबाव बढ़ेगा। उत्तर कोरिया पर रूस की मदद करने का आरोप जेलेंस्की ने उत्तर कोरिया पर भी रूस की मदद करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने रूस की मदद के लिए अपने सैनिक भेजे हैं। जेलेंस्की का दावा है कि इसके बदले उत्तर कोरिया को आधुनिक सैन्य तकनीक मिल रही है। इसमें बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन तकनीक से जुड़ी मदद भी शामिल है। उन्होंने यह भी कहा कि यूक्रेन ने दो उत्तर कोरियाई युद्धबंदियों को दक्षिण कोरिया भेजा है। उनके मुताबिक, दोनों सैनिकों को जिंदा पकड़ना आसान नहीं था। सर्दियों में रूस की ऊर्जा सुविधाओं पर हमले की चेतावनी जेलेंस्की ने चेतावनी दी कि अगर रूस यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर हमले जारी रखता है तो यूक्रेन भी रूस की हीटिंग और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बना सकता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका रूस और यूक्रेन के बीच ऊर्जा सुविधाओं पर हमले रोकने को लेकर समझौता कराने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा है कि अमेरिका ऐसे हमले रोकने के लिए समझौते की कोशिश कर रहा है। रूस के साथ व्यापार कम करने की अपील जेलेंस्की ने दूसरे देशों से रूस के साथ व्यापार कम करने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि रूस को व्यापार से जितना ज्यादा पैसा मिलेगा, उसके पास युद्ध जारी रखने के लिए उतने ही ज्यादा संसाधन रहेंगे। ——————— ये खबर भी पढ़ें… ईरानी राष्ट्रपति ने दिखाई मृत बच्चों की तस्वीर: UN में बोले- 200 साल में कोई हमला नहीं किया ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दिया। वे अपने साथ ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीर लेकर पहुंचे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Global Market: बॉन्ड यील्ड में उछाल से US मार्केट में बिकवाली, एशिया में जापान ऊपर, कोरिया के बाजार हैं बंद

Asian Market Today: वॉल स्ट्रीट पर अमेरिकी इंडेक्स के खराब प्रदर्शन के बाद एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है। जापान का निक्केई 225 इंडेक्स लगभग 1.38 फीसदी की बढ़त के साथ तेजी दिखा रहा है। दक्षिण कोरिया का अहम और बहुत उतार-चढ़ाव वाला इंडेक्स, KOSPI, हार्वेस्ट फेस्टिवल ‘चूसोक’ के कारण बंद है।

ताइवान का बाजार 0.38 फीसदी गिरकर 17,684.59 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। जबकि हैंगसेंग 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 24,744.00के स्तर पर नजर आ रहा है। वहीं शंघाई कम्पोजिट 0.44 फीसदी की गिरावट के साथ 3,918.46 के स्तर पर दिख रहा है।

इस बीच, भारत में GIFT निफ्टी ने 150 अंक से ज़्यादा की बड़ी ‘गैप-डाउन’ शुरुआत का संकेत दिया, जिससे पिछले दिन की सारी बढ़त खत्म हो सकती है।

वॉल स्ट्रीट को भारी नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ गईं और उम्मीद से बेहतर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने महंगाई की चिंता और ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीदों को बढ़ा दिया।

जापानी येन, जो तीन हफ्तों में अपने सबसे निचले स्तर के करीब है, पर सबकी नज़र रहेगी क्योंकि जापानी वित्तीय बाजार फिर से खुल रहे हैं।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, एशियाई कारोबार के शुरुआती दौर में न्यूजीलैंड के सरकारी बॉन्ड में गिरावट आई, जबकि ऑस्ट्रेलियाई बॉन्ड फ्यूचर्स ने संभावित गिरावट का संकेत दिया, जो ट्रेजरी बाजार में व्यापक गिरावट को दर्शाता है।

हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया के इक्विटी-इंडेक्स फ्यूचर्स ने गिरावट का संकेत दिया, जबकि बुधवार को S&P 500 में 0.8% और नैस्डैक 100 में 0.9% की गिरावट के बाद अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स काफी हद तक स्थिर रहे। दक्षिण कोरियाई बाजार बंद रहे।

एक अन्य मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती कारोबार के दौरान अमेरिकी पेट्रोलियम की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, क्योंकि ब्रेंट क्रूड 3.9% बढ़कर $103.08 प्रति बैरल पर बंद हुआ था। बुधवार को, दस-वर्षीय ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर यील्ड 15 बेसिस पॉइंट बढ़कर 5.11% हो गई, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अप्रैल 2025 में टैरिफ लागू करने से बाजार में आई उथल-पुथल के बाद से एक दिन में सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी।

इससे पहले, आर्थिक आंकड़ों से पता चला था कि अमेरिकी मॉर्गेज दरें दो साल से अधिक समय में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं, जबकि S&P ग्लोबल का शुरुआती अमेरिकी कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स सितंबर में जुलाई 2021 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी को दर्शाता है। पांच साल की सिक्योरिटीज़ के $70 बिलियन के कमज़ोर ट्रांज़ैक्शन के बाद बाज़ार की हालत और खराब हो गई। इससे यील्ड 2007 के बाद पहली बार 5% से ऊपर चली गई और साथ ही डॉलर की कीमत भी सभी मुख्य करेंसी के मुकाबले बढ़ गई।

दूसरी कमोडिटीज़ की बात करें तो, बॉन्ड यील्ड बढ़ने के कारण बुधवार को बुलियन (कीमती धातुएं) की कीमत में 2% तक की गिरावट आई और यह लगभग $4,275 प्रति औंस हो गई। आम तौर पर, ऊंची ब्याज दरों से कीमती धातुओं को नुकसान होता है क्योंकि उनसे कोई यील्ड नहीं मिलती।

इसके अलावा, वॉल स्ट्रीट गुरुवार को वॉशिंगटन में ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली मीटिंग और अमेरिका के बड़े बिज़नेस एग्जीक्यूटिव्स के साथ होने वाले रिसेप्शन की तैयारी कर रहा है। ट्रंप ने पिछले हफ़्ते मीडिया को बताया था कि उन्हें उम्मीद है कि इस मीटिंग के दौरान “कई अलग-अलग समझौते” होंगे।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।