Amber Enterprises: ओप्पो, वनप्लस और रियलमी के फोन बनाएगी कंपनी, अगले साल से प्रोडक्शन शुरू होगा

Amber Enterprises: इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Amber Enterprises India अगले साल से चीन की स्मार्टफोन कंपनियों Oppo, OnePlus और Realme के लिए भारत में फोन बनाना शुरू करेगी। कंपनी ने कहा है कि ट्रायल प्रोडक्शन वित्त वर्ष 2027 की चौथी तिमाही में शुरू होगा। वहीं, कमर्शियल प्रोडक्शन FY28 की पहली तिमाही यानी मार्च 2027 के बाद शुरू होने की उम्मीद है।

पहले साल 80 लाख का टारगेट

एंबर एंटरप्राइजेज के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और CEO जसबीर सिंह ने बताया कि पहले साल करीब 80 लाख स्मार्टफोन बनाने का लक्ष्य है। दूसरे साल इसे बढ़ाकर 1.5 से 1.6 करोड़ यूनिट तक पहुंचाने की योजना है। कंपनी ने अपने मोबाइल कारोबार के लिए नया COO भी नियुक्त किया है।

कंपनी ने Oppo Mobiles India के साथ मैन्युफैक्चरिंग सहयोग समझौता किया है। इसके तहत कंपनी Oppo, OnePlus और Realme तीनों ब्रांड के स्मार्टफोन बनाएगी।

चीन की कंपनियां अपना मॉडल बदल रहीं

ये कदम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चीन की स्मार्टफोन कंपनियां भारत में खुद फैक्ट्री चलाने की बजाय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अपनाने लगी हैं। अभी Oppo के कुछ फोन Vivo की नोएडा फैक्ट्री में भी बनते हैं। वहीं, Vivo अपनी फैक्ट्री को Dixon Technologies के साथ जॉइंट वेंचर में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में है।

भारतीय बाजार में मजबूत पकड़

Counterpoint Research के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में Vivo की भारतीय स्मार्टफोन बाजार में 17.8% हिस्सेदारी रही। Samsung 17.6% के साथ दूसरे नंबर पर रहा, जबकि Oppo की हिस्सेदारी 13.6% रही। अगर Vivo, iQOO, Oppo, Realme और OnePlus को मिलाकर देखें, तो इन ब्रांड्स की संयुक्त हिस्सेदारी 45.6% रही।

PCB कारोबार में दबाव

एंबर एंटरप्राइजेज ने बताया कि उसके PCB कारोबार में फिलहाल मार्जिन पर दबाव है। इसकी वजह Copper-Clad Laminate (CCL) की बढ़ती कीमतें हैं। हालांकि, कंपनी धीरे-धीरे इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचा रही है।

Amber Enterprises की योजना 2029-30 तक अपना CCL प्लांट लगाने की भी है। इससे भविष्य में कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

एंबर एंटरप्राइजेज के शेयरों का हाल

एंबर एंटरप्राइजेज का शेयर पिछले कारोबारी सत्र में 0.68% बढ़कर 7,224 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 महीने में स्टॉक 9.89% गिरा है। वहीं, 1 साल में यह 2.88% टूटा है। हालांकि, बीते 5 साल में इसने 158% का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। कंपनी का मार्केट कैप 24.48 हजार करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

MG Hector Tomahawk EV spied undisguised ahead of August 26 launch

MG Hector Tomahawk EV spied undisguised ahead of August 26 launch
MG Hector Tomahawk EV

JSW MG’s upcoming Hector Tomahawk has been spied undisguised on our roads ahead of its launch. The new model will be the first in the brand’s portfolio to be underpinned by the ADAPT (Advanced Drive Architecture Platform Technology) platform. The carmaker has teased the SUV previously, giving a glimpse of its design details and its 7-seat capacity.

  1. Hector Tomahawk to slot above the Hector in MG’s portfolio. 
  2. Likely to be powered by a 69.2kWh battery pack.
  3. Expected to be priced between Rs 18 lakh and Rs 25 lakh.

JSW MG Hector Tomahawk EV: What was spied?

The undisguised test mule that was spied hinted at the Hector Tomahawk’s final design. The front end comes with LED headlamps with dual LED DRLs connected by a black trim that has two silver strips and the MG badge at the centre. Being an EV, it gets a blanked-off grille, with a rectangular air inlet lower down. The front bumper has a dual-tone design, with vertical air curtains on its sides. The bonnet has subtle ridges, while the car is finished in an olive green shade with a black roof and rails. 

In profile, the sides look clean with chrome door handles, and the window line, finished in chrome, gets an upward kink at the back. Additionally, there’s plenty of black cladding for the squared-off wheel arches and door sills extending toward the rear bumper. The large alloy wheels were spotted with a dual-tone design. While the rear end was not spotted, it will likely come with wraparound tail-lamps and a dual-tone finish for the bumper.  

JSW MG Hector Tomahawk EV: What to expect

The JSW MG Hector Tomahawk is based on the Wuling Eksion that’s sold in the Indonesian market. The former is expected to retain the latter’s dimensions of 4,745mm in length, 1,850mm in width, 1,755mm in height, and a wheelbase of 2,810mm.  A previous teaser of the model confirmed a beige colour theme for the Hector Tomahawk’s cabin. While the dashboard is yet to be revealed, it is expected to retain the Eksion’s minimalistic layout. This includes screens for the driver’s display and infotainment system, a two-spoke steering wheel and a centre console with cupholders and storage spaces. 

MG is yet to confirm the feature list it is expected to come with a powered tailgate, leatherette upholstery, powered and ventilated front seats, a 12.8-inch touch-infotainment head unit, an 8.8-inch digital driver’s display, a 50-watt wireless charger, automatic climate control with AC vents for the second and third rows, a 360-degree camera system, an electronic parking brake, six airbags, and an ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) suite.

While exact powertrain specs of the Hector Tomahawk EV remain under wraps, the Eksion, for reference, is powered by a 69.2kWh LFP (Lithium Iron Phosphate) battery pack with a CLTC (China Light-Duty Vehicle Test Cycle) range of up to 530km. The battery is paired with a front-mounted motor delivering 201hp and 310Nm, and has a 160kph top speed.

As far as price is concerned, the MG Hector Tomahawk EV is expected to be priced between Rs 18 lakh and Rs 25 lakh. It will take on the likes of the Mahindra XEV 9S and the Kia Carens Clavis EV.

All prices are ex-showroom, India

How to read Company Result: मुनाफा बढ़ना रिजल्ट अच्छा होने की गारंटी नहीं, शेयर खरीदने से पहले ये बातें भी करें चेक

How to read Company Result: किसी कंपनी या बैंक के शेयरों की चाल पर कई बातों का फर्क पड़ता है जैसे कि उनके प्रोडक्ट की डिमांड कैसी है, वैश्विक मार्केट का हाल कैसा है, कच्चे तेल की धार कितनी तेज है या मौद्रिक नीतियां कैसी हैं इत्यादि। इसके अलावा वैल्यूएशन कैसा है, क्योंकि अच्छी कंपनी भी बहुत महंगे भाव पर खराब निवेश बन सकती है। इन सबके अलावा एक और अहम बात कंपनी के तिमाही रिजल्ट का ऐलान है। कंपनी जब कारोबारी नतीजे पेश करती है तो इसके शेयरों पर इसका पॉजिटिव या निगेटिव असर दिखता है।

कई बार ऐसा होता है कि कंपनी का मुनाफा रॉकेट की स्पीड से बढ़ा लेकिन शेयर फुस्स तो दूसरी तरफ कंपनी घाटे में रहती है लेकिन शेयर तूफानी स्पीड से ऊपर चढ़ते हैं। इससे समझ सकते हैं कि शेयरों की चाल सिर्फ मुनाफे से नहीं तय होती बल्कि कई और बातों का भी इसमें रोल होता है। यहां कंपनियों और बैंकों के रिजल्ट में क्या देखें, इसके बारे में बताया जा रहा है।

कंपनी के रिजल्ट में क्या देखें

कंपनी की सेल्स/रेवेन्यू कितनी बढ़ी या घटी। इसे सिर्फ सालाना नहीं बल्कि तिमाही आधार पर भी देखना चाहिए। हालांकि ध्यान दें कि बिक्री बढ़ रही है लेकिन मुनाफा नहीं तो इसकी वजह क्या है, इसे समझना जरूरी है।

मुनाफे की बात करें तो टैक्स काटकर यानी शुद्ध मुनाफा तिमाही और सालाना आधार पर कितना बढ़ा या घटा। मुनाफा लगातार बढ़ रहा है या सिर्फ एक तिमाही। इन सब बातों पर गौर करें। अगर कंपनी के मुनाफे में रेवेन्यू के हिसाब से बहुत अधिक उछाल है तो इसमें एक्सेप्श्नल गेन या टैक्स बेनेफिट की कितनी भूमिका है, यह देखना जरूरी है। अगर कंपनी घाटे में है तो इसकी वजह क्या है, कहीं एक्सेप्शनल लॉस तो नहीं। ये सब चेक करना जरूरी है।

ऑपरेटिंग लेवल पर ईबीआईटीडीए और मार्जिन की क्या स्थिति है, यह बहुत अहम है क्योंकि यह बताता है कि कंपनी अपने मुख्य कारोबार से कितना अच्छा कमा रही है।

कैश फ्लो भी चेक करना चाहिए। मान लीजिए कि कंपनी ने ₹100 करोड़ मुनाफा कमाया, लेकिन कारोबार से सिर्फ ₹30 करोड़ नकद आया तो सवाल उठता है कि बाकी मुनाफा वास्तव में नकदी में क्यों नहीं बदला।

कंपनी का कर्ज कितना घटा या बढ़ा, इसे चेक कर लें और इस पर ब्याज का खर्च कितना है। कर्ज लगातार बढ़ रहा हो और कैश फ्लो कमजोर हो रहा हो तो इसे अलर्ट सिग्नल समझें।

एक और अहम फैक्टर RoCE (रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड) और RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) देखना है जिससे पता चलता है कि कंपनी अपने लगाए हुए पैसे से कितना अच्छा रिटर्न कमा रही है। सिर्फ कंपनी का मुनाफा देखना पर्याप्त नहीं है।

इन सबके अलावा मैनेजमेंट कमेंटरी को ध्यान से पढ़ें क्योंकि आगे बिक्री, मार्जिन, डिमांड की स्थिति, नए निवेश या कैपिटल एक्सपेंडिचर और बडे़ रिस्क का संकेत मिलता है।

बैंक के नतीजे पढ़ने का तरीका

कंपनी के विपरीत बैंक के रिजल्ट में रेवेन्यू और ईबीआईटीडीए की भूमिका नहीं होती है। इसकी बजाय लोन ग्रोथ देखें कि बैंक ने कितना नया कर्ज दिया और सिर्फ यही नहीं, इसकी क्वालिटी भी देखनी होगी।

बैंक के पास जमा पैसा कितनी तेजी से बढ़ रहा है, यह भी अहम है। डिपॉजिट की ग्रोथ और लोन की ग्रोथ में तुलना करनी होगी। इसमें सीएएसए (करंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट) भी देखना होता है क्योंकि ये बैंक के लिए कम लागत में लोन के लिए पैसों का इंतजाम हैं।

नेट इंटेरेस्ट मार्जिन (NIM) से यह पता चलता है कि बैंक अपने दिए हुए कर्ज और जुटाए हुए पैसे के बीच कितना ब्याज मार्जिन कमा रहा है। इसका बढ़ना आमतौर पर अच्छा माना जाता है और लगातार गिरना चिंता की विषय है।

बैंक के नतीजे में एक अहम बात है एसेट क्वालिटी चेक करना। इसके तहत ग्रास एनपीए, नेट एनपीए, नए खराब लोन यानी स्लिपेज, क्रेडिट कॉस्ट और प्रोविजनिंग को देखना है। अगर एनपीए कम हो रहा है और नए खराब लोन भी नियंत्रण में हैं, तो बैंक की एसेट क्वालिटी अच्छी मानी जाती है।

बैंक के प्रोविजनिंग की क्या स्थिति है यानी खराब कर्ज के लिए बैंक को कितना पैसा अलग रखना पड़ रहा है और इसकी ग्रोथ क्या है।

RoA (रिटर्न ऑन एसेट्स) और RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) यानी बैंक अपने एसेट्स और शेयरहोल्डर्स के पैसे पर कितना रिटर्न कमा रहा है।

एक और अहम प्वाइंट कैपिटल एडेकेसी/सीईटी1 है जिससे पता चलता है कि बैंक के पास भविष्य में बढ़ने और नुकसान झेलने के लिए पर्याप्त पूंजी है या नहीं।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Audi India teases next-gen Q3 ahead of debut

Audi India teases next-gen Q3 ahead of debut
Audi Q3 teaser

Audi India has shared a teaser of the next-generation Q3, hinting at its design elements ahead of its official debut. It will replace the second-generation Q3, which has been on the market for four years. Secondly, the new Q3 will lead the German carmaker’s product onslaught in our market.

  1. Next-gen Q3 will have an all-new aggressive exterior design.
  2. Likely to continue with the previous-gen’s 2.0-litre turbo-petrol engine with AWD.
  3. Expected to be priced at Rs 60 lakh ex-showroom.

Next-generation Audi Q3: What to expect?

Global-spec Q3 used for reference.

The next-gen Q3 will have an all-new exterior design that’s more aggressive than its predecessor. For reference, the global-spec version’s front end ditches the traditional headlamp design for a split setup. At the same time, the grille is larger and sports a hexagonal pattern with the 2D Audi badge. The sides are replete with moulding for the wheel arches and lower sides of the doors, and a subtle character line on the rear fender. While the global-spec version has wheel sizes ranging from 17 to 20 inches, the India-spec model is expected to have 18-inch ones. Like the front, the rear features a split-lamp design, comprising a connected LED strip and the main units above it, with an illuminated Audi badge.

On the inside, the next-gen Q3 will have a revamped look with a tech-laden cabin. Dominating the dashboard is an 11.9-inch digital driver’s display and a 12.8-inch infotainment screen. You get a new three-spoke steering wheel, which sports a unique column-mounted stalk setup for light and wiper controls, while the layered dashboard is angled slightly toward the driver. Expect features like wireless Apple CarPlay and Android Auto, a panoramic sunroof, powered and ventilated front seats, a 360-degree camera and level 2 ADAS to be onboard.

As far as powertrains are concerned, the India-spec Audi Q3 is expected to continue with the predecessor’s 2.0-litre direct-injection turbo-petrol engine, which produces 204hp and 320Nm of torque. It is mated to a 7-speed DCT gearbox, sending power to all wheels with Audi’s Quattro AWD system.

With the generational update, Audi is likely to price the new Q3 from Rs 60 lakh. It will continue to take on the likes of rivals such as the Mercedes-Benz GLA and the BMW X1. 

All prices are ex-showroom, India

7 साल में ₹5 लाख से बनाया ₹1.30 करोड़ का पोर्टफोलियो! ट्रेडर की इस एक सीक्रेट ट्रिक ने बदली किस्मत, जानिए पूरा फॉर्मूला

Share Market Success Story: शेयर बाजार और ट्रेडिंग को लोग अक्सर रातों-रात अमीर बनने की ‘जैकपॉट मशीन’ समझते हैं। लेकिन बिना सोचे-समझे लगाया गया दांव आपको अमीर बनाने के बजाय कंगाल भी कर सकता है! इसी धारणा को पूरी तरह से झुठलाते हुए एक ट्रेडर ने साबित कर दिया कि बाजार में असली पैसा तुक्के से नहीं, बल्कि अनुशासन और सही सिस्टम से बनता है।

महज ₹5 लाख की शुरुआती पूंजी से सफर शुरू करने वाले इस ट्रेडर ने 7 सालों के उतार-चढ़ाव, भारी घाटे और अपनी गलतियों से सीखते हुए ₹1.30 करोड़ का विशाल पोर्टफोलियो खड़ा कर दिया। आइए आपको बताते हैं बिना किसी शॉर्टकट के शेयर बाजार में मिली इस शानदार कामयाबी की पूरी इनसाइड स्टोरी।

₹5 लाख से शुरुआत और ‘स्टॉक टिप्स’ की शुरुआती नाकामी

ट्रेडर ने अपने बाजार के सफर की शुरुआत साल 2018-19 में करीब ₹5 लाख के साथ की थी। नए निवेशकों की तरह वे भी शुरुआत में लोगों के दिए ‘स्टॉक टिप्स’ पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे और मार्केट खुलते ही शेयर्स में शॉर्टिंग करते थे। हालांकि इस रणनीति से कुछ पैसे जरूर बने, लेकिन ब्रोकरेज और टैक्स चुकाने के बाद हाथ में कुछ खास नहीं बचा।

ऑप्शन बाइंग से सेलिंग का सफर और ₹10 लाख के कर्ज का झटका

शुरुआती दौर के बाद उन्होंने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में कदम रखा और ऑप्शन बाइंग शुरू की। यूट्यूब पर वित्तीय एक्सपर्ट्स का वीडियो देखने के बाद उनके सोचने का तरीका बदला और वे ‘ऑप्शन बायर’ से ‘ऑप्शन सेलर’ बनने की तरफ बढ़े।

ऑप्शन सेलिंग के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने अपने दोस्त से ₹10 लाख उधार लिए। दुर्भाग्य से यह रणनीति पूरी तरह से फेल हो गई और उन्हें भारी नुकसान हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, दोस्त का पूरा कर्ज चुकाया और अपनी गलतियों से सीख लेकर नए सिरे से पढ़ाई शुरू की।

‘StockMock’ पर बैकटेस्टिंग ने बदली पूरी किस्मत

उनकी ट्रेडिंग जर्नी में असली टर्निंग प्वाइंट तब आया जब उन्होंने StockMock प्लेटफॉर्म पर अपने ट्रेडिंग सिस्टम की नियमबद्ध बैकटेस्टिंग शुरू की। उन्होंने ‘टाइम-बेस्ड शॉर्ट स्ट्रैडल्स’ का टेस्टिंग किया और बिना किसी इमोशन में बहे कड़े अनुशासन से नियमों का पालन किया:

    • 2020 का रिटर्न: 86% का बंपर मुनाफा।
    • 2021 का रिटर्न: 83% का शानदार रिटर्न हासिल किया।
    • उन्होंने जेरोधा का 60-डे चैलेंज लगातार 17 विन के साथ अपने नाम किया।

‘सफल ट्रेडिंग रोमांचक नहीं, बल्कि बोरिंग होती है’

ओवरट्रेडिंग और लालच से बचने के लिए उन्होंने किताबें पढ़ना शुरू किया। जोएल ग्रीनब्लाट की मशहूर किताब ‘The Little Book That Beats the Market’ से प्रेरणा लेकर उन्होंने सिस्टमैटिक इन्वेस्टिंग का तरीका समझा।

आज वे F&O से मिलने वाले मुनाफे को इक्विटी में अपने बनाए सिस्टमैटिक फ्रेमवर्क के जरिए लंबे समय के लिए इन्वेस्ट करते हैं। पिछले 7 सालों में उनका वास्तविक CAGR लगभग 48% रहा है। उनका सबसे बड़ा गुरुमंत्र है, ‘मैंने सब कुछ किताबों, यूट्यूब, वेबिनार और आर्टिकल्स से सीखा है, सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।’

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़

X पर उनकी यह कहानी सामने आते ही लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रियाएं आने लगीं। एक यूजर ने लिखा, ‘₹10 लाख के कर्ज में फेल होने के बाद आम तौर पर लोग ट्रेडिंग छोड़ देते हैं, लेकिन इन्होंने कर्ज चुकाया और सीखते रहे। यही असली कहानी है।’ दूसरे यूजर ने कहा, ‘ऑप्शन बाइंग के जाल से निकलकर सिस्टमैटिक ऑप्शन सेलिंग और बैकटेस्टिंग अपनाना ही सबसे समझदारी भरा कदम था।’

नए निवेशकों के लिए क्या है सीख?

ट्रेडर का यह सफर यह साबित करता है कि शेयर बाजार में टिके रहने के लिए ‘टिप्स’ नहीं, बल्कि ‘सिस्टम और अनुशासन’ काम आता है। अगर आप भी बाजार में लंबे समय के लिए टिकना चाहते हैं, तो बिना सीखे दांव लगाने के बजाय बैकटेस्टिंग, रिस्क मैनेजमेंट और सब्र को अपनी ताकत बनाएं।

Disclaimer: मनीकंट्रोल ने संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है। यह जानकारी पूरी तरह से  X पर उनके बयानों/पोस्ट पर आधारित है और केवल सूचना के उद्देश्यों के लिए है, इसे निवेश की सलाह न माना जाए।

Mukul Agrawal Portfolio: स्टार निवेशक का बदला मूड, पोर्टफोलियो में एक स्टॉक की एंट्री तो दूसरी ओर 3 की विदाई

Mukul Agrawal Portfolio: दिग्गज निवेशक मुकुल अग्रवाल के पोर्टफोलियो में पिछली तिमाही अप्रैल-जून 2026 में बड़े बदलाव हुए। एक तरफ उन्होंने अपने पोर्टफोलियो में एरिसइंफ्रा सॉल्यूशंस को शामिल किया तो दूसरी तरफ उन्होंने लक्ष्मी फाइनेंस समेत तीन स्टॉक्स का वजन और बढ़ाया। उन्होंने सिर्फ खरीदारी ही नहीं की बल्कि कुछ मुनाफा भी बुक किया। जून तिमाही में उनके पोर्टफोलियो से रेमंड लाइफस्टाइल समेत पांच स्टॉक्स का वजन हल्का हुआ तो तीन स्टॉक्स ऐसे रहे, जिनमें उनकी होल्डिंग या तो जीरो हो गई या 1% से नीचे आ गई। सेबी के नियमों के मुताबिक कंपनियों को सिर्फ 1% या इससे अधिक की होल्डिंग वाले शेयरहोल्डर्स के नाम का खुलासा करना अनिवार्य है।

इन स्टॉक्स में की और खरीदारी और एक की हुई एंट्री

मुकुल अग्रवाल के पोर्टफोलियो में जून 2026 तिमाही में एरिसइंफ्रा सॉल्यूशंस की एंट्री हुई। उन्होंने इसके 13 लाख शेयर खरीदे जो कंपनी में 1.6% होल्डिंग के बराबर है। इसके अलावा जून तिमाही में उन्होंने लक्ष्मी फाइनेंस में अपनी हिस्सेदारी 0.8 पर्सेंटेज प्वाइंट्स बढ़ाकर 4.6% (24 लाख शेयर), वेलर एस्टेट में 0.1 पर्सेंटेज प्वाइंट्स बढ़ाकर 1.6% (85 लाख शेयर) और लक्स इंडस्ट्रीज में 0.1 पर्सेंटेज प्वाइंट्स बढ़ाकर 1.6% (4,65,246 शेयर) कर ली।

इन स्टॉक्स में की बिकवाली तो ये हुए बाहर

मुकुल अग्रवाल ने जून तिमाही में कुछ स्टॉक्स में अपनी होल्डिंग हल्की की। उन्होंने जे कुमार इंफ्राप्रोजेक्ट्स में अपनी होल्डिंग 0.1 पर्सेंटेज प्वाइंट्स घटाकर 2.6% (19,30,920 शेयर), केआरएन हीट एक्सचेंजर में 0.1 पर्सेंटेज प्वाइंट्स कम कर 1.5% (10 लाख शेयर), इंटेलेक्ट डिजाइन एरेना में 0.2 पर्सेंटेज प्वाइंट्स बेचकर 1.3% (17.90 लाख), विधि स्पेशल्टी फूड में 0.2 पर्सेंटेज प्वाइंट्स घटाकर (6,90,924 शेयर) और रेमंड लाइफस्टाइल में 0.2 पर्सेंटेज प्वाइंट्स घटाकर (7 लाख शेयर) कर ली। वहीं दूसरी तरफ रेडिको खेतान, सूर्या रोशनी और विक्रान इंजीनियरिंग के इतने शेयर बेचे कि उनकी होल्डिंग या तो जीरो हो गई या 1% से कम हो गई। इससे पहले मार्च 2026 तिमाही में रेडिको खेतान में उनकी होल्डिंग 1.1%, सूर्या रोशनी की 1.0% और विक्रान इंजीनियरिंग की 1.4% थी।

समरी

स्टॉक जून तिमाही के आखिरी में होल्डिंग बदलाव (पर्सेंटेज प्वाइंट) शेयरों की संख्या शेयर का मौजूदा भाव 52 हफ्ते का निचला स्तर (तारीख) 52 हफ्ते का हाई लेवल (तारीख)
Arisinfra Solutions1.6%नया13,00,000₹134.09₹82.18 (09/02/26)₹178.30 (23/10/25)
Laxmi Finance4.6%0.824,00,000₹124.38₹71.06 (30/03/26)₹180.90 (18/09/25)
Valor Estate1.6%0.185,00,000₹111.91₹83.50 (30/03/26)₹187.05 (13/08/25)
Lux Industries1.6%0.14,65,246₹1,188.10₹824.05 (30/03/26)₹1,823.35 (24/04/26)
J Kumar Infraprojects2.6%(-)0.119,30,920₹497.65₹425.00 (30/03/26)₹685.40 (18/08/25)
KRN Heat Exchanger1.5%(-)0.110,00,000₹1,468.30₹589.80 (27/01/26)₹1,468.30 (14/08/26)
Intellect Design Arena1.3% (-)0.217,90,000₹700.60₹595.20 (30/03/26)₹1,244.60 (03/11/25)
Vidhi Specialty Food1.4%(-)0.26,90,924₹309.90₹258.60 (30/03/26)₹410.00 (04/09/25)
Raymond Lifestyle1.2%(-)0.27,00,000₹741.20₹677.00 (03/08/26)₹1,350.00 (16/09/25)
Radico Khaitan1% के नीचे₹4,650.00₹2,500.00 (02/03/26)₹4,675.20 (13/09/26)
Surya Roshni1% के नीचे₹222.98₹187.35 (30/03/26)₹320.15 (13/08/26)
Vikran Engineering1% के नीचे₹62.22₹51.10 (30/03/26)₹118.40 (20/11/25)

4 नियम पड़े रिटेल इंवेस्टर्स पर भारी, SEBI ने लाया था खास वजह से और पड़ा ऐसा असर

Share Market New Rule: सिर्फ 3 दिनों के लिए शेयर दें किराए पर, बिना बेचे कमाई, खास स्टॉक्स के लिए आए रहा नया सिस्टम

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

4 नियम पड़े रिटेल इंवेस्टर्स पर भारी, SEBI ने लाया था खास वजह से और पड़ा ऐसा असर

पिछले दो वर्षों में मार्केट रेगुलेटर सेबी देश के कैपिटल मार्केट को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और लेस स्पेक्यूलेटिव यानी कम सट्टेबाजी वाला बनाने के लिए कई नियम लागू किए हैं। इसका उद्देश्य रिटेल इंवेस्टर्स को बचाना, लेवरेज कम करना और रिस्क मैनेजमेंट को मजबूत करना है। ब्रोकरेज फर्म सैम्को सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी के मुताबिक सेबी की यह पहल बेहतर तो है रेगुलेशन के साथ-साथ मार्केट की एफिसिएंसी, लिक्विडिटी और फेयर एक्सेस भी बनी रहनी चाहिए। यहां ऐसे ही 4 नियमों के बारे में बताया जा रहा है, जिनसे रिटेल इंवेस्टर्स काफी प्रभावित हुए और जिमीत मोदी ने रिटेलर्स पर इसके असर को लेकर जिक्र किया है।

4 नियम और उनके असर

1.F&O पर लगाम से घटी सट्टेबाजी लेकिन एक्सेस भी हुआ कम

सेबी ने सबसे बड़ा दखल इक्विटी डेरिवेटिव्स में दिया है। इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट का साइज बढ़ाया गया, वीकली एक्सपायरी के ऑप्शन कम किए गए, एक्सपायरी-डे पर रिस्क कवर बढ़ाया गया, ऑप्शन प्रीमियम पहले से जमा करना जरूरी किया गया और पोजिशन लिमिट की इंट्रा-डे मॉनिटरिंग शुरू की गई। इसका उद्देश्य बहुत अधिक शॉर्ट-टर्म स्पेक्यूलेटिव को रोकना और रिटेल इन्वेस्टर्स को बड़े नुकसान से बचाना था।

हालांकि वित्त वर्ष 2026 में F&O में रिटेलर्स का नुकसान 18% घटकर ₹91,685 करोड़ रह गया लेकिन F&O में हिस्सेदारी भी लगभग 20% घटकर 78.6 लाख रह गई। रिटेलर्स का नुकसान कम तो हुआ लेकिन प्रति ट्रेडर औसत नुकसान ₹1.14 लाख से बढ़कर ₹1.17 लाख हो गया। इससे एक अहम सवाल उठता है कि क्या हम समस्या को हल कर रहे हैं, या हिस्सेदारी कम करके एक्सपोजर को कम कर रहे हैं?

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2.लॉट साइज में बढ़ोतरी: सुरक्षित मार्केट या हाई एंट्री बैरियर्स?

मिनिमम कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाने का मकसद छोटे निवेशकों को बहुत बड़ी स्पेक्यूलेटिव वाली पोजिशन लेने से रोकना था। हालांकि डेरिवेटिव्स रिस्क-मैनेजमेंट टूल का भी एक बड़ा जरिया है, खासतौर से उन निवेशकों के लिए जो अपने कैश-मार्केट एक्सपोजर को हेज करना चाहते हैं। लॉट साइज बड़ा होने से ऐसे हेज के लिए अधिक कैपिटल की जरूरत पड़ने लगी जिससे अंडरलाइंग पोजिशन के साथ हेज का तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में निवेशकों के लिए मार्केट में हिस्सा लेना मुश्किल बनाने करने की बजाय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि वे रिस्क को कैसे मैनेज करते हैं।

3.एक्सपायरी और मार्जिन के नियम

सेबी ने एक्सपायरी के समय मिलने वाले कई मार्जिन बेनेफिट्स को हटा दिया और वीकली इंडेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों को तार्किक बनाया। इसका उद्देश्य बहुत अधिक रिस्क वाली पोजिशन और एक्सपायरी के दिन होने वाले भारी उतार-चढ़ाव को कम करना था, लेकिन इनसे ट्रेडिंग और हेजिंग की चली आ रही स्ट्रैटेजीज भी बदल गई हैं। सेबी की साल 2025 की स्टडी से पता चला कि इससे इक्विटी डेरिवेटिव्स में यूनिक इंडिविजुअल ट्रेडर्स की संख्या सालाना आधार पर 20% गिर गई तो प्रीमियम के हिसाब से इंडिविजुअल टर्नओवर 11% घट गया। ऐसे में सेबी का नियम सिर्फ खराब तरीके ही नहीं हटा रहा, बल्कि मार्केट के तरीके को भी बदल रहा है।

4.क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS): बेहतर प्राइस डिस्कवरी लेकिन

3 अगस्त 2026 से सेबी ने F&O स्टॉक्स के लिए ‘क्लोजिंग ऑक्शन सेशन’ (CAS) शुरू किया, जिसने पहले के 30 मिनट वाले VWAP-बेस्ड क्लोजिंग सिस्टम की जगह ली। इसका उद्देश्य कीमत तय करने के तरीके को बेहतर बनाना, आखिरी मिनट के ट्रेड के असर को कम करना और भारतीय मार्केट को ग्लोबल तौर-तरीकों से जोड़ना। हालांकि शुरुआती कुछ सेशन में स्पॉट और फ्यूचर्स की कीमतों में असामान्य अंतर दिखा और शुरुआत में लोगों की भागीदारी कम रही। सेबी के मुताबिक इसमें कोई मैनिपुलेशन नहीं मिला है, और तब से भागीदारी में सुधार भी हुआ है। हालांकि इससे यह सबक मिलता है कि अच्छे ढंग से बनाए गए सुधार भी मार्केट में हिस्सा लेने वालों के लिए थोड़े समय के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

कहां आई दिक्कत?

सेबी के नियमों से एफएंडओ एक्टिविटी कम हुई। इसकी वित्त वर्ष 2026 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स 51.5% और फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स 17.7% घट गया। इसकी वजह एसटीटी में बढ़ोतरी के साथ-साथ सेबी के नियम भी हैं। जिमीत के मुताबिक स्पेक्यूलेशन में कमी तब अच्छी है, जब इससे अच्छा रुख दिखे लेकिन अगर वॉल्यूम भी गिरे क्योंकि मार्केट में एंट्री बहुत महंगी या कठिन हो गई है तो इससे लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि लक्ष्य सड़क को सुरक्षित बनाना होना चाहिए, सड़क को खाली करना नहीं। जिमीत के मुताबिक भारतीय मार्केट को देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के मजबूत निवेश की जरूरत है। जिमीत के मुताबिक बैरियर बढ़ाने की तुलना में बेहतर डिस्क्लोजर, इंवेस्टर एडुकेशन, सूटेबिलिटी चेक्स और रिस्क-बेस्ड सेफगार्ड्स अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

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Opinion: Why India needs a small car assault

Opinion: Why India needs a small car assault
Citroen AMI, Honda Super N, Renault 5, Nissan Micra.

The CAFE 3 norms are just eight months away. Things will certainly get tighter and tougher for automakers, in terms of upping the number of clean power options as well as light-weighting their current brawn-ish SUVs. If one has to bring a 30 percent reduction in fleet-average performance and move from MIDC to WLTP test results, an automaker has very little leeway in terms of just about making it. 

As a product planner, I would seriously take this as an opportunity to bring the focus back onto the entry-level small car. In fact, all product planners should be doing the same, irrespective of what your current portfolio is. The policymakers are sending out a clear message to the Indian automobile industry – relook and revive the small car, for you have neglected it for quite some time now!

And why not? It’s not just for developing markets; look at the developed world too. The otherwise ostentatious European is seriously evaluating the small car once again. Even the more aware and conscious American is. Japan has always been a ready reference for all. Tomorrow’s car buyer is going frugal and smart once again. Going back to the basics. Without compromising on comfort and features. And the automakers have prepared themselves for such times. Some started almost a decade ago, with varying outcomes, but the efforts have been commendable and great teachers on how to approach the future. 

The Citroën Ami. The Fiat Topolino and Multiplina. The Renault 5 and its hot hatchback cousin, the Alpine A290. The Nissan Micra. The Smart For2. The Honda Super N. The Microlino and Microletta. And I have not even gone into what the Chinese have launched over the last 12 months. 

This is the attack of the “minors”. Electric. Power-packed. Feature-rich. Head-turning looks. Both microcars as well as conventional entry-level little runabouts. They are not cheap-looking, frugally engineered, cost-compromised, low-on-status offers that one never wants. They are clean, conscious and very cool. They cater to the sceptical youth and the wizened elder alike.

For years, Japan and Europe have been the homes of such cars. It is time India takes over that role. And it makes perfect business sense too. If we are to increase car penetration and grow the market to a size even half of that of China, given our consumption power, there is no other way but to make the entry-level car the hero of the script. Whether electric, CNG or hybrid. It is the responsibility of brands like Maruti Suzuki, Hyundai, Toyota, Tata and Honda to make this happen. Only then will we create a mature and sustainable market with a rich and robust pipeline of two-wheeler owners who will want to look up!

Share Market New Rule: सिर्फ 3 दिनों के लिए शेयर दें किराए पर, बिना बेचे कमाई, खास स्टॉक्स के लिए आए रहा नया सिस्टम

Share Market New Rule: देश का पहला क्लियरिंग कॉरपोरेशन और एनएसई (NSE) की सब्सिडरी एनएसई क्लियरिंग लिमिटेड 17 अगस्त से सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) स्कीम के तहत कम समय वाले कॉन्ट्रैक्ट शुरू करेगा। इसके तहत महज तीन दिन के सेटलमेंट साइकिल के साथ स्टॉक-लेंडिंग ट्रांजैक्शन हो सकेगा। एनएसई क्लियरिंग ने इससे जुड़ा सर्कुलर 14 अगस्त को जारी किया जिसके मुताबिक नए कॉन्ट्रैक्ट R3 सीरीज के तहत शुरू किए जाएंगे और हर दिन उपलब्ध होंगे। ये कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ उन स्टॉक्स के लिए उपलब्ध होंगे जो इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ट्रेडिंग के लिए एलिजिबल हैं यानी कि जो F&O सेगमेंट का हिस्सा हैं।

क्या है नियम

नए स्ट्रक्चर के तहत ट्रांजैक्शन वाले दिन यानी T Day पर किए गए SLB ट्रांजैक्शन का पहला हिस्सा T+1 दिन पर यानी अगले दिन सेटल होगा, जबकि उससे जुड़ा रिवर्स हिस्सा T+3 दिन पर सेटल होगा इसमें सेटलमेंट की छुट्टियां शामिल नहीं होंगी। अभी के एसएलबी कॉन्ट्रैक्ट्स के उलट AGM (एनुअल जनरल मीटिंग) या EGM (एक्स्ट्राऑर्डिनरी जनरल मीटिंग) होने पर R3 कॉन्ट्रैक्ट्स को समय से पहले बंद नहीं किया जाएगा। साथ ही कम समय वाले इन कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए रीपेमेंट, रिकॉल और रोलओवर की सुविधाएं नहीं मिलेगी। मार्केट खुले रहने के दौरान यानी मार्केट टाइमिंग्स में क्लियरिंग और सेटलमेंट, रिस्क मैनेजमेंट और कॉरपोरेट एक्शन से जुड़े बाकी सभी नियम वैसे ही रहेंगे जैसे मौजूदा एसएलबी कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए हैं।

R3 सीरीज के आने से मार्केट पार्टिसिपेंट्स को सिक्योरिटीज लेंडिंग ट्रांजैक्शन के लिए कम होल्डिंग पीरियड मिलता है, जबकि SLB कॉन्ट्रैक्ट्स का समय ज्यादा होता है यानी कि अगर किसी ट्रेडर को किसी शेयर को शॉर्ट करने के लिए केवल कुछ दिनों के लिए शेयर चाहिए, तो R3 कॉन्ट्रैक्ट उसके लिए लंबी अवधि वाले SLB कॉन्ट्रैक्ट की तुलना में अधिक बेहतर हो सकता है। इससे ट्रेडर्स और निवेशकों को शॉर्ट-टर्म बॉरोइंग और लेंडिंग की जरूरतों को मैनेज करने में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है। इस प्रकार R3 कम अवधि वाला नया SLBM कॉन्ट्रैक्ट है, जिसमें शेयर T+3 पर वापस होंगे।

क्या है SLBM?

सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग मैकेनिज्म (SLBM) एक ऐसा सिस्टम है जिसके तहत निवेशक अपनी सिक्योरिटीज जैसे कि शेयर को एक तय समय के लिए दूसरे मार्केट पार्टिसिपेंट्स को उधार दे सकता है। इसके बदले में उन्हें लेंडिंग फीस मिलती है। यह सिस्टम उन निवेशकों के लिए बहुत काम का है जो अपनी सिक्योरिटीज से अतिरिक्त कमाई करना चाहते हैं, और उन ट्रेडर्स के लिए भी जिन्हें शॉर्ट-सेलिंग को लेकर शेयर उधार लेने की जरूरत होती है। इसके तहत उधार लेने वाला सिक्योरिटीज का इस्तेमाल करने के बदले उधार देने वाले को लेंडिंग फीस देता है। एक्सचेंज और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ट्रांजैक्शन को मैच करने और कोलेटरल, सेटलमेंट व अन्य रिस्क को मैनेज करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर देते हैं।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।