रामलीला मैदान में कांग्रेस करेगी रैली

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ कई दिन तक प्रदर्शन के बाद अब कांग्रेस पार्टी ने बड़ी रैली का ऐलान किया है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इसे लेकर एक महारैली का आय़ोजन किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इस रैली के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति हासिल कर ली है।

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस पार्टी को रामलीला मैदान में एक नवंबर को होने वाली रैली के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी एनओसी जारी कर दिया। सेंट्रल दिल्ली के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि पार्टी ने मैदान की बुकिंग के लिए 25 अक्टूबर से तीन नवंबर तक की तारीखें मांगी थी। उसे एक नवंबर को रैली करने की इजाजत मिल गई है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर छह अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक लगातार प्रदर्शन किया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए रामलीला मैदान सहित तीन जगहों को प्रदर्शन स्थल घोषित किया। इन तीन जगहों में रामलीला मैदान एक है, जहां 50 हजार लोगों तक की रैली हो सकती है। अभी यह तय नहीं है कि रैली सिर्फ कांग्रेस पार्टी की होगी या उसमें विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ कांग्रेस के आंदोलन में ‘इंडिया’ ब्लॉक की सभी पार्टियां शामिल रही हैं।

राहुल गांधी के खिलाफ महिला पत्रकार ने दर्ज कराई शिकायत, जानें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे इस पूरे मामले की असल वजह

राहुल गांधी के खिलाफ महिला पत्रकार ने दर्ज कराई शिकायत, जानें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे इस पूरे मामले की असल वजह

Rahul Gandhi Female Journalist Complaint

Rahul Gandhi Female Journalist Complaint: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के विरोध मार्च की कवरेज कर रही एक महिला पत्रकार के साथ अभद्रता और धक्का-मुक्की का मामला अब कानूनी रूप से तूल पकड़ता जा रहा है। पत्रकार ऋचा पाराशर ने नई दिल्ली के डीसीपी कार्यालय पहुंचकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। वहीं, दूसरी ओर यह मामला कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है।

क्या हैं महिला पत्रकार के आरोप?

पत्रकार ऋचा पाराशर ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया कि 12 अक्तूबर 2026 को जब वह इंडिया ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट मार्च को कवर कर रही थीं, तब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने उनका हाथ या कंधा पकड़कर पीछे की तरफ खींचा। इसके तुरंत बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दे दिया, जिससे वह सड़क पर गिर गईं और उनका मोबाइल फोन भी क्षतिग्रस्त हो गया। पत्रकार ने अपनी शिकायत में दावा किया है कि वह तीन महीने की गर्भवती हैं। अचानक गिर जाने के कारण उन्हें पेट में गंभीर दर्द उठा और शरीर पर अन्य चोटें आईं, जिसके चलते उन्हें इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। ALSO READ: गर्भवती पत्रकार ने राहुल गांधी पर लगाए गंभीर आरोप, मेरा हाथ पकड़ा, मुझे धक्का दिया

क्या कहना है कांग्रेस का?

दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के समर्थकों ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया है। कांग्रेस का कहना है कि विरोध मार्च के दौरान किसी भी वीडियो फुटेज में यह साबित नहीं होता कि पत्रकार को राहुल गांधी या उनके सुरक्षाकर्मियों द्वारा जानबूझकर निशाना बनाया गया या धक्का दिया गया। पार्टी के अनुसार, शिकायतकर्ता द्वारा किए जा रहे दावों और उपलब्ध तथ्यों में कई तकनीकी विसंगतियां साफ नजर आती हैं। ALSO READ: राहुल गांधी के घर चाय पर चर्चा की इनसाइड स्टोरी? CJP से नेहा बोरा तक कौन किसके साथ, कौन किसके खिलाफ?

अब हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भाजपा ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने पीड़ित महिला पत्रकार की ओर से इस मुद्दे को देश की शीर्ष अदालत के समक्ष उठाया। गौरव भाटिया ने CJI जस्टिस सूर्यकांत के सामने मामले की त्वरित सुनवाई की मांग रखी। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब इस याचिका पर 26 अक्टूबर को हाईकोर्ट में सुनवाई तय की गई है।

पूरा मामला क्या है?

12 अक्तूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ विपक्षी गठबंधन (इंडिया ब्लॉक) ने दिल्ली में संसद से सुप्रीम कोर्ट की ओर विरोध मार्च निकाला था। इस मार्च की कवरेज के दौरान एक निजी चैनल की महिला पत्रकार ऋचा पाराशर के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की और अभद्रता हुई। पत्रकार का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उनका हाथ या कंधा पकड़कर खींचा और उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें जोर से धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं और उनका फोन टूट गया। यह मामला अब कोर्ट तक पहुंच गया है।

ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बनें : राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि देश में ‘वोट चोरी’ करवाई जा रही है इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए।

श्री गांधी ने शनिवार को अपने पॉडकास्ट में परीक्षाओं में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र करते हुए ऐसे मुद्दों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत बतायी। उन्होंने पिछले एक महीने में इंदौर, नासिक, बालाघाट और दिल्ली में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान के अनुभव साझा करते हुए कहा कि छात्रों के सवाल ऐसी व्यवस्था को चुनौती देते हैं।

उन्होंने कहा कि आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों ने देश के संस्थानों पर कब्जा कर लिया है और आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों को जो सुविधाएं मिलती हैं उनमें कटौती की जा रही है इसलिए इन मामलों में सरकार की ओर से जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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श्री गांधी ने इस पॉडकास्ट में महाराष्ट्र के नासिक में आंदोलनरत आदिवासी विद्यार्थियों, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और मध्य प्रदेश के बालाघाट में कुपोषण तथा बीमारियों से बच्चों को खोने वाले आदिवासी परिवारों के साथ अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बालाघाट में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण पूरी तरह लागू करने का आग्रह किया और कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस संदर्भ में पत्र लिखा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली के बेला एस्टेट की झुग्गी बस्ती में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद 729 निवासियों में से 728 के नाम मतदाता सूची से हट गये। इसे मतदान के अधिकार के उल्लंघन का गंभीर मामला बताते हुए उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बनना चाहिए।

वोट चोरी को संविधान पर हमला बताते हुए श्री गांधी ने 30 सितंबर को यहां इंडिया गठबंधन के नेताओं के साथ हुई बैठक का उल्लेख किया और कहा कि उसमें प्रत्येक भारतीय के मतदान के अधिकार की रक्षा पर विचार-विमर्श किया गया है।

उन्होंने परीक्षा में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों के साथ ही दिल्ली के सत्य निकेतन की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा बजट में कटौती की वजह से ऐसा हो रहा है और इन सब मामलों में जवाबदेही तय होनी चाहिए।

Pic Credit : UNI

रूसी तेल और गैस की खरीद पर ट्रंप ने प्रतिबंधों से दी छूट, भारत से हटी 100% तक टैरिफ की तलवार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और ड्यूटीज यानि शुल्कों से छूट दी है। ट्रंप ने शुक्रवार रात जारी एक कार्यकारी आदेश में कहा कि कुछ प्रतिबंधों को लागू नहीं करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। ट्रंप ने कहा, ‘‘मैं ग्राहम कानून के तहत ऐसे प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे रहा हूं।’’ उन्होंने अमेरिकी संसद को एक सर्टिफिकेशन सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि इस समय ऐसी छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।

‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम’ ट्रंप को रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने और रूस से सबसे अधिक तेल व गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इस कानून को ग्राहम कानून के नाम से जाना जाता है। इसे अमेरिकी कांग्रेस ने 16 सितंबर को पास किया था और ट्रंप ने दो दिन बाद इसे साइन किया था।

इस कानून के तहत ट्रंप को इसे लागू किए जाने के 30 दिन के अंदर रूस से कच्चा तेल या गैस आयात करने वाले 5 सबसे बड़े देशों से अमेरिका में आने वाले सभी सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था। ग्राहम कानून की धारा 115 में यह प्रावधान भी है कि अगर प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में हो, तो राष्ट्रपति ऐसी छूट दे सकते हैं।

भारत से फिलहाल हटी 100 प्रतिशत टैरिफ की तलवार

रूस से सबसे अधिक तेल व गैस खरीदने वाले देशों में चीन और भारत शामिल हैं। ग्राहम कानून के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और ड्यूटीज से छूट के नए फैसले से अमेरिका जाने वाले भारतीय सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ की तलवार फिलहाल के लिए हट गई है। ट्रंप ने कहा, ‘‘ग्राहम कानून की धारा 115(ए) के तहत, मैं ग्राहम कानून की धारा 112 और 113 या इस आदेश में निर्धारित किसी भी शुल्क को लागू करने से छूट देता हूं।’’ धारा 113 में रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों या उसे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है।

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ग्राहम कानून पर विदेश मंत्री एस जयशंकर और मार्को रुबियो की हुई थी मीटिंग

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक के दौरान ग्राहम कानून को लेकर चिंता जताई थी। समझा जाता है कि जयशंकर ने रुबियो को बताया था कि भारत की तेल रिफाइनरियां मुख्य रूप से मध्यम श्रेणी के सल्फरयुक्त कच्चे तेल की प्रोसेसिंग के लिए तैयार की गई हैं, जिसकी आपूर्ति पश्चिम एशिया के देशों और रूस से होती है।उन्होंने रुबियो को यह भी बताया था कि वेनेजुएला से हैवी ग्रेड का कच्चा तेल मिलता है, जबकि अमेरिका से हल्के ग्रेड का कच्चा तेल आता है। भारत की रिफाइनरियों में इस्तेमाल से पहले इन्हें दूसरे तेल के साथ मिलाना होगा।

ईरान युद्ध के चलते पश्चिम एशिया के देशों से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो कुछ दिन बाद भारत आने वाले हैं।

अमित शाह का इतना भरोसा!

अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।

यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!

सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।

असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।

यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।

अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।

दीपके, नेहा पुलिस हिरासत में

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लेकर उनका तिरंगा मार्च रोक दिया। दीपके अपने समर्थकों के साथ शाम पांच बजे के करीब कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा मार्च निकालने जा रहे थे। लेकिन पुलिस ने वहां पहुंचने से पहले ही उनको हिरासत में ले लिया गया। हालांकि उनके कुछ समर्थक तिरंगा लेकर सेंट्रल पार्क पहुंच गए थे और वहां तिरंगा फहराया। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी पुलिस ने हिरासत में लिया है। सीजेपी ने देर शाम कहा कि दीपके को दिल्ली पुलिस किसी अज्ञात जगह ले गई है।

दिल्ली पुलिस ने डेढ़ सौ अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया है। दीपके को छह दिन में दूसरी बार दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए आए दीपके को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया था। एक दिन बाद 11 अक्टूबर को दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका एक बॉन्ड भर कर रिहा हुए थे। पांच दिन बाद उनको फिर से हिरासत में लिया गया। दीपके को हिरासत में लिए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने इसे अघोषित आपातकाल बताया।

गौरतलब है कि सीजेपी का तिरंगा मार्च रोकने के लिए एनडीएमसी ने सेंट्रल पार्क को दिन के लिए बंद कर दिया था और पुलिस ने नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी है। इसके तहत चार या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक है। बहरहाल, दीपके को हिरासत में लेने से पहले दिल्ली पुलिस झंडेवालान स्थित उस घर पर पहुंची थी, जहां वे ठहरे हुए थे। पुलिस ने उन्हें प्रदर्शन नहीं करने का नोटिस दिया था। यह घर शरद पवार की एनसीपी के एक नेता का है।

पुलिस जब उनको नोटिस देने गई तो इस दौरान दीपके की पुलिस से बहस हो गई थी। दीपके ने पुलिस से कहा कि यह कोई रैली या प्रोटेस्ट नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम सिर्फ सेंट्रल पार्क तक जाकर तिरंगा फहराना चाहते हैं’। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का ऐलान किया था। सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आने के लिए कहा था।

दूसरी ओर इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली में 28 हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था। अर्धसैनिक बलों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के जवानों ने पूरे कनॉट प्लेस को घेर लिया था। सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई थी। ऐसी की बैरिकेडिंग और सुरक्षा बंदोबस्त करके 10 अक्टूबर का जंतर मंतर का प्रदर्शन भी रोका गया था। उस दिन सात हजार के करीब लोग हिरासत में लिए गए थे।

सरकार बुला सकती संसद का विशेष सत्र

नई दिल्ली। केंद्र सरकार एक बार फिर संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार ने इस साल 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया था, जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधयेक पेश किए गए थे। हालांकि सरकार उसे पास कराने में कामयाब नहीं हुई थी। अब बताया जा रहा है कि इसी महीने एक बार फिर सरकार संसद का विशेष सत्र बुला सकती है।

इस सत्र में नारी शक्ति वंदन कानून को बदलने के लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। इसके अलावा परिसीमन से जुड़े दो बिल पेश किए जाएंगे। ये ही तीनों बिल अप्रैल के विशेष सत्र में भी पेश किया गया था। चूंकि 131वां संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए सरकार को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। इसलिए पिछली बार बिल पास नहीं हो पाया था। उसके बाद से तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना में टूट हुई है, जबकि कांग्रेस औऱ डीएमके अलग अलग हो गए हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार ने जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटा लिया है। गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हुआ था, लेकिन इसका अब तक सत्रावसान नहीं किया गया है। इसलिए विशेष सत्र बुलाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी की जरुरत नहीं है। सरकार एक हफ्ते पहले सूचना देकर विशेष सत्र आहूत कर सकती है।

बहरहाल, दो तिहाई बहुमत जुटा लेने के दावे के बरक्स वास्तविक स्थिति देखें तो अब भी सरकार इससे दूर है। इस समय लोकसभा की दो सीटें खाली हैं यानी 541 सांसद हैं। इनमें से एनडीए के 318 सांसद हैं। बिल को पास कराने के लिए 360 वोट चाहिए। अगर डीएमके के 22 सांसद बिल का समर्थन करते हैं तो बिल के समर्थन में 340 सांसद हो जाएंगे। इसके बाद भी भाजपा को लगभग 20 सांसदों की जरूरत है। ऐसे ही राज्यसभा में एनडीए के 153 सांसद हैं। वहां बिल पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए। वहां भी एनडीए को नौ सांसदों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि वहां संख्या जुटा लेना ज्यादा आसान है।

खड़गे ने पीएम को चेताया

कांग्रेस

नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुला पर नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन करने और परिसीमन बिल पास कराने की खबरों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी है। उन्होंने 13 अगस्त को खत्म हुए मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं करने पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि सरकार किसी भी विधेयक को जोर जबरदस्ती पास कराने का प्रयास न करे।

खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग भी की है। खड़गे ने परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार को आगाह किया है। उन्होंने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री से कहा है कि संसद में परिसीमन प्रस्तावों को अंतिम रूप देने से पहले सभी पार्टियों से विचार विमर्श करने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा है कि विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव पर हर तरह से चर्चा करना चाहता है।

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खड़गे ने प्रधानमंत्री को चेतावनी दी है सरकार किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को जबरन पास न कराए। खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि कहा कि मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। इसके बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। कांग्रेस महासचिव औऱ संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कांग्रेस अध्यक्ष का पत्र साझा करते हुए लिखा है कि खड़गे जी ने अभी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई अभूतपूर्व देरी और मोदी सरकार की संभावित योजनाओं के बारे में बात की है।

कितने भक्तों के भरोसे 2029 की जीत?

सवाल है भाजपा के पास ऐसे कितने करोड़ वोट हैं जो कुछ भी हो जाए, मोदी के नाम पर ही वोट देंगे? महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, रुपया गिरे, नौजवान सड़कों पर उतरें, मुसलमान नाराज हों, दलित और आदिवासी बिदकें, तब भी जिनका वोट नहीं बदलेगा। क्या ऐसे मतदाता बीस करोड़ हैं? पच्चीस करोड़ हैं? या तीस करोड़? पिछले तीन चुनावों का हिसाब देखें। 2014 में भाजपा को 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हुआ। फिर 2024 में घटकर 36.56 प्रतिशत रह गया। एनडीए को इन तीन चुनावों में क्रमशः लगभग 38.5, 45.4 और 43.8 प्रतिशत वोट मिले। मतलब 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा और एनडीए, दोनों का वोट प्रतिशत घटा। भाजपा की सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं। बावजूद इस ट्रेंड के अमित शाह को 2029 में जीत का पक्का भरोसा है!

सवाल है क्या उन्हें लगता है कि भाजपा के 2024 के लगभग 23.6 करोड़ मतदाता अब स्थायी मोदी भक्त बन चुके हैं? या एनडीए के लगभग 28.3 करोड़ वोटों में कोई कमी संभव नहीं? लेकिन इन संख्याओं में तो सब तरह के मतदाता हैं। हिंदुत्व के पक्के समर्थक हैं तो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी। जाति के हिसाब से वोट देने वाले हैं तो स्थानीय उम्मीदवार के कारण भाजपा को चुनने वाले भी। कुछ मोदी के नाम पर वोट देते हैं तो कुछ विपक्ष को पसंद नहीं करने के कारण। इनमें से कितने ऐसे हैं जो हर परिस्थिति में भाजपा को ही वोट देंगे?

ऐसी ही एक दूसरी गणित भी है। 2014 में भाजपा ने महज 31.34 प्रतिशत वोटों से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत बनाया था। यानी सौ वोट डालने वालों में लगभग 69 ने भाजपा को वोट नहीं दिया, फिर भी उसे पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में 37.7 प्रतिशत वोटों से 303 सीटें मिलीं। और 2024 में 36.56 प्रतिशत वोटों पर 240 सीटें। अंतर सिर्फ वोट प्रतिशत का नहीं था। वोट कहां पड़े, किस सीट पर विपक्ष बंटा, कहां उम्मीदवार मजबूत था, कहां गठबंधन बना, इन बातों से सीटों का गणित बदला और हमेशा बदलता है।

यहीं 2029 में मोदी-शाह की जीत का असली सूत्र याकि रहस्य है। भाजपा को देश के पचास प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलना जरूरी नहीं। उसे उन निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त वोट चाहिए जहां से लोकसभा की बहुमत वाली संख्या बनती है। इसलिए संभव है कि देश में असंतोष बढ़े, कई सामाजिक समूहों में नाराजगी हो, नौजवान आंदोलन करें, फिर भी पार्टी विशेष का चुनावी आधार बना रहे। हालांकि इसमें यह भी खतरा है कि राष्ट्रीय वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट से दर्जनों सीटें हाथ से निकल जाएं। जैसे 2024 में भाजपा का अनुभव था।

फिलहाल जेनरेशन ज़ेड का भौकाल मुखर है। नौजवानों में आज कितने मोदी समर्थक हैं और कितने विरोधी? मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों में कितने भाजपा को वोट देते हैं? पर इन्हें एक साथ जोड़कर कोई मोदी विरोधी आबादी नहीं बनाई जा सकती। जेनरेशन ज़ेड में भी मोदी समर्थक हैं। दलितों और आदिवासियों में भी भाजपा को वोट मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि एक ही मतदाता युवा भी हो सकता है, दलित भी और किसी आंदोलन का समर्थक भी। इसलिए इन समूहों की आबादी जोड़कर भाजपा विरोधी वोटों की संख्या निकालना संभव ही नहीं।

तो अमित शाह ने कैसे हिसाब लगाया हुआ होगा? मेरा मानना है कि वे भाजपा के प्रतिबद्ध वोटों पर निर्भर नहीं रहते। वह बूथवार वोट हिसाब के पारखी हैं। समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने से लेकर उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का हिसाब रखते हैं। अब इस सबके साथ मतदाता सूचियों के एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण की संभावनाएं भी हैं। इसलिए राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्ष के लिए जीवन-मरण का स्वाभाविक सवाल है कि 2029 का चुनाव आखिर किन मतदाता सूचियों, किन निर्वाचन क्षेत्रों और किन नियमों के अंतर्गत होगा?

कैसे? आखिर जब चुनावी जीत का अंतर कई जगह कुछ हजार वोटों का हो, तब मतदाताओं के नाम कटने या जुड़ने से ही चुनावी मुकाबला तय होता है। पश्चिम बंगाल उदाहरण है। दो-चार, दस लाख नहीं, लाखों (39 लाख) वैध दस्तावेजी सबूतों के बावजूद वोट डालने के अधिकार से वंचित किया गया। ऐसा चुनाव आयोग, ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट सभी के बावजूद हुआ।

तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के 2029 में चुनाव जीतने के अडिग विश्वास का कारण सत्ता का ऐसा दुरुपयोग और अहंकार क्या नहीं है? यदि 2024 के 23.6 करोड़ भाजपा वोटों को भक्तों की स्थायी संख्या भी मान लें तब भी इनके बूते जीत संभव नहीं है जब तक वोट सूची ईमानदार न हो। 2029 में कितने करोड़ नए या पुराने वोटर मतदान करने के पात्र रहेंगे? कितने कटेंगे, और कितने बंगाल की तरह लटकाए रखे जाएंगे, उससे अधिक तय होगा?

सो, भाजपा को 2029 में कितने करोड़ लोग पसंद करते हैं, से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि उसने सीटवार अपने वोट कितने करवाए हुए हैं? और यह काम ज्ञानेश कुमार की कमान के चुनाव आयोग के जरिए चुटकियों में संभव बना रहेगा।

एसआईआर के बाद परिसीमन सबसे बड़ा उपाय

भाजपा को इतना भरोसा कैसे है कि 2029 में भी राहुल गांधी और उनका गठबंधन चुनाव हारेगा और भाजपा पहले से ज्यादा बहुमत से जीतेगी? इस भरोसे का एक कारण तो भाजपा का अपना संगठन, पार्टी का आधार, समर्पित हिंदू मतदाताओं का वोट, आरएसएस का नेटवर्क, ध्रुवीकरण की राजनीति जैसी पारंपरिक चीजें दिखाई देंगी। लेकिन इन पारंपरिक चीजों से हट कर तीन चीजें ऐसी हैं, जिसने भाजपा को ज्यादा भरोसा दिया है। पहली चीज है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर। एसआईआऱ के जरिए करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और नए नाम जोड़े जा रहे हैं।

पूरी प्रक्रिया इतनी गोपनीय और नियंत्रित है कि सारी विपक्षी पार्टियां परेशान हैं। सोचें, अभी इस बात का विवाद चल रहा था कि करोड़ों नाम हटाए जा रहे हैं लेकिन खबर है कि अखिलेश यादव मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़े जाने के खिलाफ सड़क पर उतरने वाले हैं। सब कुछ इतने नियंत्रित और केंद्रीकृत तरीके से हो रहा है कि किसी को असली बात का पता नहीं चल रहा है।

एसआईआर से भाजपा को सबसे बड़ा फायदा इस वजह से हुआ है कि देश के ज्यादातर राज्यों में उसकी या उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकार है। सरकार में होना अपने आप में बहुत सारी चीजों को आसान बना देता है। उसमें अगर सरकार में बैठे लोगों को सत्ता के उपकरणों का मनमाना इस्तेमाल यानी दुरुपयोग करने में कोई हिचक नहीं हो तो चीजें और आसान हो जाती हैं। सरकार में होने के कारण भाजपा को पता है कि कहां से कितना नाम कट गया और कहां जुड़ गया। अभी तक की एसआईआर में मृत और फर्जी श्रेणी में चार करोड़ के करीब नाम कटे हैं। शिफ्टेड और अपने पते पर नहीं मिलने वालों की संख्या साढ़े नौ करोड़ के करीब है। पहले भी इन मतों का इस्तेमाल सत्ता में बैठी पार्टियां करती थीं। बोगस वोटिंग में इनका इस्तेमाल होता था। बड़ी संख्या में नए नाम जोड़े जाने की जो चर्चा है उसका इस्तेमाल भी बोगस वोटिंग के लिए ही होगा या तकनीक का इस्तेमाल करके वोट मैनिपुलेट करने के लिए होगा। अब ज्यादातर जगह भाजपा की सत्ता में है तो विपक्ष तो यह काम नहीं कर पाएगा।

एसआईआर के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार परिसीमन का है। हालांकि इसमें बहुत सारे अगर मगर हैं। अगर समय रहते परिसीमन बिल पास हो गया और समय रहते इस पर काम पूरा हो गया तो इसका लाभ है। लेकिन परिसीमन किस कदर लाभप्रद है इसे जम्मू कश्मीर और असम के उदाहरण से समझा जा सकता है। जम्मू कश्मीर में पहले 87 सीटें थीं। लद्दाख अलग होने के बाद 83 सीटें बचीं। परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढ़ा कर 90 कर दी गईं। यानी सात सीटों का इजाफा हुआ। इनमें से छह सीटें जम्मू संभाग बढ़ाई गईं। वहां सीटों की संख्या 37 से बढ़ कर 43 हो गई। कश्मीर घाटी में सिर्फ एक सीट बढ़ी। सबको पता है कि भाजपा कश्मीर घाटी में एक भी सीट नहीं जीत सकती है। तभी जम्मू में ज्यादा सीटें बढ़ीं और भाजपा ने उसमें से ज्यादातर सीटें जीत लीं। भाजपा ने परिसीमन के बाद हुए चुनाव में पांच सीटें ज्यादा जीतीं। उसकी सीटों की संख्या बढ़ कर 30 हो गई।

ऐसे ही असम में परिसीमन के बाद पूरा समीकरण बदल गया। इसे कई तरह से बदला गया। सीटों की संख्या 126 ही रखी गई लेकिन एससी और एसटी आरक्षित सीटों की संख्या 24 से बढ़ा कर 28 कर दी गई। ऐसे ही बोडोलैंड स्वायत्त परिषद  के इलाके में सीटों की संख्या 16 से बढ़ा कर 19 कर दी गईं। ककरीब 40 सीटों की भौगोलिक संरचना में इस तरह का बदलाव किया गया कि वहां की पूरा सामाजिक व धार्मिक संरचना बदल गई। इन 40 इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक संख्या होती थी। इसे इस तरह से विभाजित किया गया कि मुस्लिम आबादी करीब 25 सीटों पर बहुत सघन हो गई और बाकी सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका समाप्त हो गई।

इसका लाभ भाजपा को मिला। पहली बार ऐसा हुआ है कि 126 के सदन में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। उसने 82 सीटें जीत लीं। परिसीमन के असर को इस आंकड़े से भी समझ सकते हैं कि कांग्रेस सिर्फ 19 सीटों पर जीती, जिसमें से 18 मुस्लिम विधायक हैं। लोकसभा चुनाव में भी 14 सीटों में से भाजपा अकेले 10 सीटों पर जीती और दो सीटें उसकी सहयोगी पार्टियों को गईं। सो, असम में परिसीमन ने जादू का काम किया है। इस प्रयोग को पूरे देश में दोहराने की तैयारी है।

लोकसभा चुनाव में अब ढाई साल का समय बचा है क्या इतने कम समय में पूरे देश में परिसीमन का काम हो जाएगा? अगर इससे पहले हुए परिसीमन की बात करें तो उसमें करीब छह साल लगे थे। हालांकि वह मामला प्रशासनिक व राजनीतिक कारणों से उलझा रहा था। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में 12 जुलाई 2002 को चौथे परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इसे 2001 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 543 बनाए रखते हुए उसको रिस्ट्रक्चर करने की सिफारिश करना था। आयोग ने 2007 के अंत में अपनी सिफारिश सौंपी थी, जिसे फरवरी 2008 में स्वीकार किया गया था। लेकिन उससे पहले तीसरे परिसीमन आयोग ने अपना काम तीन साल में पूरा कर लिया था।

इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के लिए 1973 में तीसरे आयोग का गठन किया था। आयोग ने 1976 में अपनी सिफारिश की। इसकी सिफारिशों के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 522 से बढ़ा कर 543 कर दी गई। उसी समय इंदिरा गांधी ने परिसीमन के लिए 1971 के आंकड़े और लोकसभा की सीटों की संख्या 25 साल के लिए फ्रीज कर दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2001 में सीटों की संख्या पर फ्रीज को 25 साल के लिए बढ़ा दिया था।

बहरहाल, तीसरे और चौथे परिसीमन आयोग ने जो समय लिया हो लेकिन अगर केंद्र सरकार किसी तरह से परिसीमन बिल को पास कराने में कामयाब हो जाती है तो अगले चुनाव से पहले उसकी सिफारिशों को स्वीकार करने और लागू करने का प्रयास होगा। आज तक जनसंख्या के आंकड़ों से लेकर सीटों की भौगोलिक संरचना तक सब कुछ डिजिटल रूप में उपलब्ध है। इसलिए पहले की तरह इस काम में बहुत समय नहीं लगेगा। गौरतलब है कि परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर जज को बनाया जाता है। उसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त या उनकी ओर से नामित कोई आयुक्त इसका सदस्य होता है। फिर राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी इसके सदस्य होते हैं। सहयोगी सदस्य के रूप में हर राज्य से पांच लोकसभा सांसद और पांच विधायक नामित किए जाते हैं। चूंकि केंद्र से लेकर ज्यादातर जगहों पर भाजपा या एनडीए की सरकार है। तो नामित सदस्य उसकी पसंद के होंगे और वे कामकाज में ज्यादा अड़चन नहीं डालेंगे।

आबादी की संरचना को समझने या एससी, एसटी आबादी के हिसाब से सीटों की संरचना तय करने और आरक्षित सीटों की सिफारिश करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। समय लगने का काम यह है कि ड्राफ्ट तैयार होने के बाद उसे सार्वजनिक किया जाता है, उस पर आपत्ति मंगाई जाती है और जन सुनवाई आय़ोजित करनी पड़ती है। हालांकि इसमें भी सरकार जो चाहती है वही होता है। ज्यादातर काम दिखावे का ही होता है। इस बार समस्या यह है कि विपक्ष बहुत आंदोलित है और सहयोग करने के मूड में नहीं है। उधर दक्षिण भारत के राज्य भी टकराव के मूड में है। इसलिए वह उस लेवल पर भी काम को अटकाने की कोशिश होगी। सरकार के हाथ में एक अस्त्र यह है कि संविधान के मुताबिक आयोग की अनुशंसा अंतिम मानी जाती है। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है और लोकसभा व विधानसभा में भी जब इसे मंजूरी के लिए रखा जाता है तो कोई भी सदन इसमें बदलाव नहीं कर सकता है।