Belonging: राजनीति, प्‍यार और निजी जिंदगी तक, गांधी परिवार में हुईं हत्‍याओं के बाद कैसे बदल गई सोनिया गांधी की जिंदगी

Belonging: राजनीति, प्‍यार और निजी जिंदगी तक, गांधी परिवार में हुईं हत्‍याओं के बाद कैसे बदल गई सोनिया गांधी की जिंदगी

Sonia Gandhi

भारत में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित उनकी किताब Belonging 10 नवंबर को प्रकाशित होगी, लेकिन इसके पहले ही इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में जमकर हलचल है। सोनिया की इस किताब में उनकी राजनीति से लेकर उनकी जिंदगी, उनका संघर्ष और और निजी जीवन का भी जिक्र है। इसमें इटली से भारत तक के उनके सफ़र का ज़िक्र किया गया है। यह किताब प्यार, नुकसान और उन राजनीतिक फैसलों की निजी कहानी बताती है।

इसके साथ ही किताब उनके जीवन के साथ-साथ भारत में करीब छह दशकों के दौरान हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को देखने का एक अलग नजरिया भी देती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़ द्वारा रिलीज़ की जाने वाली 544 पन्नों की इस किताब को एक “खुलासा करने वाली” यादों की किताब बताया जा रहा है, जो युद्ध के बाद के इटली से भारत तक के उनके जीवन का सफ़र बताती है और एक बेहद निजी और राजनीतिक कहानी सुनाती है।

पेंगुइन रैंडम हाउस की वेबसाइट पर इसके बारे में कहा गया है कि यह “एक हैरान करने वाली यादों की किताब है जो प्यार, परिवार का एक बेहद दिलचस्प तरीके से जिक्र करती है। इसमें कहा गया है कि किताब में इटली में गांधी के शुरुआती सालों और राजीव गांधी से उनकी शादी से लेकर उनके संघर्षों तक का ज़िक्र होगा।

हिंदी, साड़ी और गांधी परिवार : जानकारी अनुसार, यह किताब इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से शुरू होती है, जहां “1965 में उन्नीस साल की छात्रा सोनिया माइनो को पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है”- भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पोते राजीव गांधी से। इसमें बताया गया है कि किताब में उनकी प्रभावशाली सास, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात का ज़िक्र है और दिखाया गया है कि कैसे राजीव के साथ रहते हुए सोनिया का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह हिंदी बोलना, साड़ी पहनना और भारतीय खाने का मज़ा लेना सीखती हैं।

राजीव की हत्‍या और संजय की प्‍लैन क्रैश में मौत : बता दें कि इस किताब में उन दुखद घटनाओं का भी ज़िक्र है जो राजीव गांधी के भाई संजय की प्लेन क्रैश में मौत और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार पर गुज़रीं। अपनी माँ की मौत के बाद और सोनिया के डर के बावजूद, राजीव प्रधानमंत्री बने, और सात साल बाद राजीव की भी चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती हमलावर द्वारा हत्या कर दी गई। इसमें यह भी बताया गया है कि सोनिया ने कई सालों तक राजनीति में आने के दबाव का विरोध किया, लेकिन बाद में वह इंडियन नेशनल कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं। एक अहम चुनाव के बाद जब पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस पद को ठुकराने का ‘हैरान करने वाला फैसला’ लिया और इसके बजाय उस गठबंधन में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया जिसने एक दशक तक देश पर शासन किया।

2004 में PM की कुर्सी ठुकराई थी : बता दें कि 2004 में कांग्रेस ने 14 सहयोगी दलों के साथ UPA बनाया। चुनाव के बाद लेफ्ट समेत कई दलों के समर्थन से UPA को 335 सांसदों का समर्थन मिला। सहयोगियों ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने 18 मई 2004 को पद ठुकरा दिया। इसके बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।

परदे के पीछे बागडोर : NDA ने सोनिया के विदेशी नागरिक का मुद्दा उठाकर उनके पीएम बनने का विरोध किया। इसके कारण सोनिया ने पीएम पद ठुकरा दिया और मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का प्रस्ताव रखा। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें। हालांकि, कहा जाता है कि पर्दे के पीछे रहकर सरकार की बागडोर सोनिया के हाथों में ही थी।

किताब के बारे में प्रकाशक का कहना है कि यह किताब आज़ादी के बाद के इतिहास, मौजूदा राजनीतिक संघर्षों और 60 सालों में हुए आर्थिक और सामाजिक बदलावों के ज़रिए “भारत को एक अनोखे नज़रिए से” दिखाती है, साथ ही सोनिया गांधी की निजी खुशियों और मुश्किलों की एक करीबी तस्वीर भी पेश करती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़, नॉफ़ डबलडे पब्लिशिंग ग्रुप का एक इम्प्रिंट है, जो पेंगुइन रैंडम हाउस का एक डिवीज़न है।

चीनी के दाम 65 रुपये किलो, 15 दिन में 15 रुपए बढ़े दाम; क्यों बढ़ रहे हैं कीमत?

चीनी के दाम 65 रुपये किलो, 15 दिन में 15 रुपए बढ़े दाम; क्यों बढ़ रहे हैं कीमत?

why sugar price in increasing

खुदरा बाजार में चीनी पहली बार 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। कारोबारियों के अनुसार, पिछले 15 दिन में इसके दाम करीब 15 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं। देश में चीनी के बढ़ते दामों और त्योहारी सीजन को देखते हुए सरकार ने चीनी के स्टॉक पर शिकंजा कसा है। ALSO READ: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ईरान पर सबसे बड़ा आर्थिक हमला, इकोनॉमिक डी-डे घोषित

 

क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम?

चीनी का कम स्टॉक : चीनी का स्टॉक घट रहा है। मौजूदा सीजन के अंत में घरेलू चीनी स्टॉक काफी कम रहने की आशंका है। कम उत्पादन और पिछले सीजन में हुए निर्यात ने उपलब्धता पर दबाव बढ़ाया है।

 

गन्ने की फसल पर मौसम का असर : महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी और अनियमित मानसून से अगले सीजन के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।

 

गन्ने से एथेनॉल उत्पादन : इस साल करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा गया। इससे बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हुई है। सरकार अब एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को सीमित करने पर विचार कर रही है।

 

त्योहारी सीजन की मांग : अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की खपत बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ रहा है। ALSO READ: वंदे मातरम् पर कांग्रेस का बड़ा फैसला, 1937 के प्रस्ताव पर कायम, पार्टी कार्यक्रमों में गाए जाएंगे सिर्फ पहले दो अंतरे

 

क्या और बढ़ेंगे दाम ?

दावा किया जा रहा है कि बाजार में मांग की तुलना में करीब आधी ही चीनी की आपूर्ति हो पा रही है। आने वाले दिनों में रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी और दिवाली जैसे त्योहारों से मांग और बढ़ेगी। इससे चीनी के दाम में और तेजी आने की आशंका है।


सरकार ने कसा शिकंजा

भारत सरकार ने 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक चीनी इस्तेमाल करने वाले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा तय की है। सरकारी अधिसूचना के अनुसार ऐसे डीलर 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर तक लागू रहेगा। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती है। इस दौरान बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियां पहले से स्टॉक बढ़ाती हैं। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री चीनी आयात की अनुमति देने पर विचार कर रही है। करीब एक दशक बाद भारत में चीनी आयात का रास्ता खुल सकता है।

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और ‘सद्भावना दिवस’ का कनेक्शन

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और 'सद्भावना दिवस' का कनेक्शन

Rajiv Gandhi

Rajiv Gandhi

भांति-भांति के धर्म, अनगिनत भाषाएं और ढेरों बोलियां—भारत की यही सतरंगी विविधता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। लेकिन इस विविधता को एक सूत्र में पिरोकर रखना कोई आसान काम नहीं। इसी आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और प्रेम के धागे को मजबूत करने के लिए हर साल 20 अगस्त को देश में 'सद्भावना दिवस' मनाया जाता है। यह खास दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की जयंती की याद में समर्पित है, जिसका एकमात्र मकसद देश के कोने-कोने में अमन, शांति और सौहार्द का संदेश फैलाना है।

 

सद्भावना दिवस का मर्म और इसकी गहराई

इस दिन का बुनियादी फलसफा यही है कि किसी भी मुल्क की तरक्की सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि वहां के लोगों के आपसी प्यार और समझ से तय होती है। अगर दिलों में दूरियां और भेदभाव की दीवारें होंगी, तो हर तरक्की अधूरी रह जाएगी।

 

वर्ष 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद, 1992 में कांग्रेस द्वारा 'राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार' की नींव रखी गई। राजीव गांधी का दृढ़ विश्वास था कि देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति है। उनका मानना था कि अगर युवा पीढ़ी को सही दिशा मिले और वे जात-पात या धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के नाते एक-दूसरे को गले लगाएं, तो देश में एक नई सामाजिक क्रांति आ सकती है।

 

क्यों चुना गया राजीव गांधी की जयंती का दिन?

राजीव गांधी ने अपने दौर में भारत को डिजिटल क्रांति, आधुनिक शिक्षा और सूचना तकनीक के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाया। लेकिन तकनीक के साथ-साथ उनका सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि एक बहुसांस्कृतिक देश में शांति और भाईचारा हर हाल में कायम रहना चाहिए। उनका साफ मानना था कि हिंसा, वैमनस्य और नफरत किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। उनकी इसी दूरदर्शी और शांतिप्रिय सोच को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के मकसद से उनकी जयंती को 'सद्भावना दिवस' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

 

इस दिन क्या-क्या खास होता है?

20 अगस्त को देशभर के सरकारी दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है:

 

सद्भावना की शपथ: लोग जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।

युवाओं की भागीदारी: स्कूलों-कॉलेजों में निबंध, भाषण और डिबेट कॉम्पिटिशन आयोजित किए जाते हैं ताकि नई पीढ़ी को राष्ट्रीय अखंडता का मतलब समझ आए।

सांस्कृतिक रंग: जगह-जगह ऐसे रंगारंग कार्यक्रम होते हैं जो 'विविधता में एकता' के भारत के मूल मंत्र को बयां करते हैं।

डिजिटल अवेयरनेस: आज के दौर में सोशल मीडिया पर भी भाईचारे और शांति के संदेशों की मुहिम चलाई जाती है।

 

आज के दौर में इसकी अहमियत क्यों बढ़ जाती है?

आज जब छोटी-छोटी बातों पर समाज में बिखराव और दूरियां देखने को मिलती हैं, तब सद्भावना दिवस की प्रासंगिकता और भी ज्यादा गहरी हो जाती है। यह दिन हमें आईना दिखाता है और याद दिलाता है कि भारत का असली वजूद उसकी एकजुटता में है। जब हम हर तरह के भेदभाव को भुलाकर एक भारतीय के रूप में साथ खड़े होते हैं, तभी हमारा देश दुनिया में सीना तानकर आगे बढ़ पाता है।

 

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग बोला- RSS पर बैन लगे:यहां आने वाले संघ के नेताओं को सम्मान न मिले; 29 अगस्त को न्यूयॉर्क जाएंगे मोहन भागवत

अमेरिका में आरएसएस पर बैन लगाने की मांग की जा रही है। यह मांग बुधवार को अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता पर सलाह देने वाले आयोग यानी USCIRF की तरफ से की गई है। USCIRF के अधिकारियों ने अमेरिकी सरकार से आरएसएस नेताओं को राजनयिक सम्मान नहीं देने और उनके साथ उच्चस्तरीय बैठकें नहीं करने को कहा है। आयोग के चेयरमैन आसिफ महमूद ने कहा कि पीएम मोदी आरएसएस के सदस्य हैं और आरएसएस के सहयोगी संगठनों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं। महमूद का यह बयान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से कुछ हफ्ते पहले आया है। भागवत 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) की ओर से आयोजित ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशंस’ में शामिल होने वाले हैं। आयोग के कमिश्नर बोले- भारत सरकार से जुड़े RSS नेताओं को सम्मान न मिले USCIRF कमिश्नर जीन मिल्स ने कहा कि RSS नेता अगर भारतीय सरकार से जुड़े भी हों, तब भी उन्हें उच्चस्तरीय बैठकों या राजनयिक सम्मान का हकदार नहीं माना जाना चाहिए। मिल्स ने कहा कि इसके बजाय अमेरिकी सरकार को धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए गए RSS सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए। USCIRF ने महमूद और मिल्स के बयान अपने X अकाउंट पर पोस्ट किए। महमूद ने पोस्ट में कहा, भारत के प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं। RSS एक भारतीय संगठन है, जिसके सहयोगी संगठनों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों, जिनमें ईसाई और मुस्लिम शामिल हैं उन पर हमले किए हैं। अब RSS प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका आने की योजना बना रहे हैं।” RSS पर बैन लगाने की मांग करने वाली USCIRF क्या है, कितनी है ताकत यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानी USCIRF अमेरिका की स्वतंत्र सरकारी संस्था है। इसे अमेरिकी कांग्रेस ने 1998 के इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट के तहत बनाया था। USCIRF का काम क्या है… USCIRF की कितनी ताकत है? इसे ऐसे समझिए: USCIRF- सिर्फ सलाह और निगरानी करने वाली संस्था।
US सरकार- अंतिम नीति और एक्शन लेने में सक्षम। यानी अगर USCIRF किसी देश या संगठन पर प्रतिबंध की सिफारिश करती है, तो प्रतिबंध अपने-आप लागू नहीं हो जाता। अमेरिकी सरकार को उस सिफारिश पर अलग से फैसला करना होता है। USCIRF खुद प्रतिबंध लगाने वाली एजेंसी नहीं है। फिर इसकी बात को गंभीरता से क्यों लिया जाता है? क्योंकि यह कोई निजी NGO नहीं है। यह अमेरिकी सरकार की आधिकारिक, कांग्रेस की बनाई गई संस्था है और इसके सदस्य राष्ट्रपति तथा अमेरिकी कांग्रेस के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं की तरफ से नियुक्त किए जाते हैं। इसकी रिपोर्ट्स अमेरिकी विदेश नीति में इनपुट और राजनीतिक दबाव का काम कर सकती हैं। हालांकि, इसकी सिफारिश और अमेरिकी सरकार का अंतिम फैसला अलग-अलग चीजें हैं। मार्च में USCIRF रिपोर्ट पर भारत ने आपत्ति जताई थी मार्च में USCIRF की सालाना रिपोर्ट में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों की आलोचना की गई थी। रिपोर्ट में RSS और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) जैसी संस्थाओं और कुछ लोगों पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन किया गया था। रिपोर्ट में इन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार बताया गया था। भारत ने USCIRF की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। भारत ने कहा था कि यह संगठन लगातार देश की खराब छवि पेश करता है जो संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक कथाओं पर आधारित होती है। भारत बोला था- USCIRF अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमले पर ध्यान दे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 16 मार्च को बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था कि भारत की चुनिंदा आलोचना जारी रखने के बजाय USCIRF को अमेरिका में हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाओं पर ध्यान देना चाहिए। ——————————– ये खबर भी पढ़ें… भागवत बोले- आज के युवा 30 साल बाद बुजुर्ग होंगे: वे केवल अपने बारे में न सोचें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को नागपुर में एक कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आज के युवा 30 साल बाद बुजुर्ग हो जाएंगे, इसलिए उन्हें केवल अपने बारे में नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए। पूरी खबर पढ़ें…

भास्कर अपडेट्स:दिल्ली में पाकिस्तानी हाई कमीशन के बाहर सुरक्षा घेरा हटाया गया

दिल्ली में भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर लगाए गए सुरक्षा बैरिकेड्स और ट्रैफिक बोलार्ड्स हटा दिए हैं। इन बैरिकेड्स से पहले हाई कमीशन के आसपास बाहरी सुरक्षा घेरा बना हुआ था। आज की अन्य बड़ी खबरें… केन्या में हेलिकॉप्टर क्रैश, 7 की मौत; 5 अमेरिकी नागरिक और इक्वाडोर के खुफिया प्रमुख भी मारे गए केन्या के सांबुरु काउंटी में बुधवार सुबह हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया। हादसे में सवार सभी 7 लोगों की मौत हो गई। इनमें 5 अमेरिकी नागरिक और इक्वाडोर की खुफिया एजेंसी के प्रमुख मिशेल सेंसी-कॉन्टुगी शामिल हैं। हेलिकॉप्टर माउंट ओलोलोक्वे के पास क्रैश हुआ था। यह लोइसाबा वाइल्डलाइफ कंजर्वेंसी से एवासो न्गिरो नदी की ओर जा रहा था। इक्वाडोर के खुफिया प्रमुख मिशेल सेंसी-कॉन्टुगी के साथ उनकी पत्नी स्टेफनी सेंसी भी हादसे में मारी गईं। स्टेफनी फैशन डिजाइनर थीं। स्पेनिश टीवी नेटवर्क टेलीमुंडो के एग्जीक्यूटिव जोसे सुआरेज के भी मारे जाने की खबर है। हेलिकॉप्टर ऑपरेटर के मुताबिक, हादसे की वजह अभी पता नहीं चली है। केन्या रेड क्रॉस ने बताया कि हादसे वाली जगह पर आग और मुश्किल रास्ते के कारण राहत और शव निकालने के काम में परेशानी हुई। केन्या के परिवहन मंत्रालय ने हादसे की जांच शुरू कर दी है। राहुल गांधी ने वीर भूमि पहुंचकर राजीव गांधी को दी श्रद्धांजलि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को पूर्व प्रधानमंत्री और अपने पिता राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने उनकी समाधि पर पुष्प अर्पित किए। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- मंदिरों में भेदभाव की कोई जगह नहीं, कांचीपुरम के मंदिर का मामला मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि भगवान की नजर में सभी जीव समान हैं और भगवान किसी के साथ भेदभाव नहीं करते। कोर्ट ने साफ किया कि मंदिरों और अन्य पूजा स्थलों में भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। कोर्ट ने भगवद् गीता के अध्याय 9 के श्लोक 29 का हवाला देते हुए कहा कि मैं सभी जीवों के प्रति समान भाव रखता हूं। न मैं किसी का पक्ष लेता हूं, न किसी से द्वेष करता हूं। जो भक्तिभाव से मेरी पूजा करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूं। मामला कांचीपुरम के अरुलमिगु देवराज स्वामीगल मंदिर, खासकर श्री मनवाला मामुनिगल श्राइन से जुड़ा था। यहां के एक निवासी ने याचिका में आरोप लगाया था कि गैर-ब्राह्मण भक्तों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि मनवाला मामुनिगल श्राइन में दो प्रवेश द्वार हैं- एक मुख्य और दूसरा साइड एंट्री। आरोप था कि गैर-ब्राह्मण भक्तों को मुख्य प्रवेश से जाने नहीं दिया जाता, जो साफ भेदभाव है। पुणे में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को पुलिस की मंजूरी, 30 शर्तें पुणे पुलिस ने राहुल गांधी के 22 अगस्त को होने वाले ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को मंजूरी दे दी है। हालांकि, पुलिस ने इसके लिए 30 शर्तें तय की हैं। आयोजकों को आपत्तिजनक तस्वीरें या बैनर लगाने से रोकने के साथ यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों। कार्यक्रम शहर के RTO चौक के पास SSPMS कॉलेज ग्राउंड में शाम 4:30 से रात 9:30 बजे तक होगा। पुलिस के मुताबिक, इसमें 8,000 से 10,000 लोगों के शामिल होने की संभावना है। मणिपुर में 3 दिन स्कूल-कॉलेज बंद, कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार का फैसला मणिपुर सरकार ने राज्य में 20 से 22 अगस्त तक सभी शैक्षणिक संस्थान बंद रखने का आदेश दिया है। सरकार ने यह फैसला मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए लिया है। इस दौरान बोर्ड से जुड़े सभी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और अन्य उच्च शिक्षण संस्थान बंद रहेंगे। यह आदेश सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी सभी संस्थानों पर लागू होगा। दरअसल, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) को अपडेट करने की मांग को लेकर JFD ग्रुप ने 48 घंटे की हड़ताल बुलाई है। बुधवार को हड़ताल के दूसरे दिन घाटी के कई जिलों में प्रदर्शनकारियों ने नेताओं के पुतले जलाए और रैलियां निकालीं।

‘फूलों का तारों का…,’ गाते-गाते सीएम डॉ. मोहन ने लाड़ली बहनों को दिया गिफ्ट, 1500 के साथ मिला 250 रुपये का शगुन

'फूलों का तारों का...,' गाते-गाते सीएम डॉ. मोहन ने लाड़ली बहनों को दिया गिफ्ट, 1500 के साथ मिला 250 रुपये का शगुन

भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुधवरा को प्रेम के अलग ही रंग में रंगे नजर आए। उन्होंने मैहर जिले में आयोजित कार्यक्रम में लाड़ली बहनों को विख्यात गाना 'फूलों का तारों का सबका कहना है..,' सुनाया और उनके खातों में 2148 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए। इस तरह राज्य की 1.25 करोड़ से ज्यादा लाड़ली बहनों को 1500 रुपये के साथ-साथ राखी का 250 रुपये का शगुन भी मिला। 

इसके अलावा सीएम डॉ. मोहन यादव ने 256 करोड़ से अधिक लागत के विकास कार्यों लोकार्पण एवं भूमि-पूजन भी किया। उन्होंने लाड़ली बहनों पर पुष्प वर्षा भी की और हितग्राहियों को हितलाभ वितरिए किया। उन्होंने यहां कई विभागों की प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया। दूसरी ओर, जनअभियान परिषद की सखियों ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को विशाल राखी भेंट की। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कई घोषणाएं भी कीं। 

 

इस मौके पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि हमारी सरकार हर महीने बहनों को लाड़ली बहना योजना की राशि प्रदान करती है। राखी त्योहार तो साल में एक बार आता है, लेकिन हम हर महीने इस उत्सव को मनाते हैं। आज लाड़ली बहनों के प्रेम को देखकर, उनकी संख्या देखकर आनंद आ रहा है। मैहर मां शारदा का अद्भुत स्थान है। बड़े लड़ैया महुआ वाले, जिनकी मार सही न जाए, एक को मारे दो मर जाए, तीसरा धौंस खाए मर जाए। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि मां शारदा के अनन्य भक्त आला की अमरता की कहानी आज भी जीवंत है। जब तक आला दर्शन नहीं कर लेते, मां को भी आनंद नहीं आता। सनातन संस्कृति भी अपने आप में अद्भुत है।

उन्होंने कहा कि हमारे तीज-त्योहारों की वजह से हमारे कुटुम्ब जीवित हैं। हमारी संस्कृति में पूरी वसुधा को परिवार माना गया है। हम अपने पेड़-पौधे-नदी-पहाड़, सबको परिवार का हिस्सा मानते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूरा देश दुनिया के सामने सिर ऊंचा करके खड़ा है। पिछले साल आतंकवादियों ने माताओं-बहनों के सिंदूर पर हाथ डालने का प्रयास किया, उस वक्त हमारे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सेना ने दुश्मन के घर में घुसकर मारने का रिकॉर्ड बनाया। हमारी सेना हर तरह से दुश्मन से निपटने में सक्षम है।

बहनों को दिया अतिरिक्त उपहार-मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि आज मेरे दोनों हाथों में प्रेम का धागा है। मैं सौभाग्यशाली हूं। आज मैं मन में क्या महसूस कर रहा हूं, बताना मुश्किल है। मेरी सरकार और आपका जो संबंध है, वो अद्भुत है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लोग दुर्भावना रखते हैं। हम जब भी लाड़ली बहनों को योजना की राशि ट्रांसफर करते हैं, तब कांग्रेसी हमें टोकते हैं। कांग्रेसी कहते हैं कि लाड़ली बहनों के खातों में पैसे मत डालो, ये शराब पी जाती हैं। कांग्रेसियों को डूब मरना चाहिए। सीएम डॉ. मोहन ने बहनों से अपील की, कि कांग्रेस की इस बात को गांठ बांधकर रखना। जिस दिन चुनाव आए, उस दिन कांग्रेस को बताना कि उसने क्या अपराध किया है। उनका हिसाब चुकता करना। लाड़ली बहनों का अपमान कोई बर्दाश्त नहीं करेगा।

उन्होंने कहा कि हमने चुनाव के पहले जो वादा किया और अभी तक हम महीने आपके खातों में राशि आ रही है। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी एक बार जो वचन देती है, उसे निभाती है। आज मुझे वो गीत याद आ रहा है, 'फूलों का तारों का कहना है, सबका कहना है, एक हजार में मेरी बहना है….'। हमारी सरकार को 1.25 करोड़ बहनों का आशीर्वाद मिल रहा है। आज हमारी सरकार ने नियमित राशि के अलावा 250 रुपये अतिरिक्त सावन के महीने का उपहार दिया है। 

 

बहनें परिवार को बांधे रखती हैं-मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बहनों से निवेदन किया कि ये राशि जब आपको मिले, तो अपने भाइयों को मिठाई खिलाना और टीका करना। मैं समझूंगा कि टीका मुझे लगा। मुझे आपका आशीर्वाद मिल गया। हमारी माताओं-बहनों में जो हिम्मत है, वो पुरुष में नहीं है। वे अपना परिवार छोड़कर अंजान परिवार को अपना भविष्य समर्पित कर देती हैं। उन्होंने कहा कि एक बार विश्व हिंदू परिषद का सम्मेलन विदेश में हुआ। उस समय मार्गरेट थ्रेचर वहां की प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने सम्मेलन में कहा कि भारत और लंदन में सबसे बड़ा अंतर कुटुम्ब परंपरा का है। आपके ऋषि-मुनियों ने परिवार की जो परंपरा खड़ी की है, इसकी धुरी माता है। माता अपने सारे बच्चों से जिस प्रकार प्रेम करती है, वह अद्भुत है। मां अपना पेट काटकर बच्चों की सारी मांग पूरी करती है। घर में भले कमाने वाला एक हो, लेकिन मां सबकी पूर्ति करती है। हमको खिलाते-खिलाते मां का पेट भर जाता है। यह संस्कृति केवल भारत में ही है। हमारी संस्कृति त्याग-परिवार की परंपरा को लेकर चलती है।

उन्होंने कहा कि हम लगातार विकास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2022 के बाद महाकाल लोक का लोकार्पण किया। उससे हमारा पूरा जिला बदल गया। हमने देव स्थान को धार्मिक स्थल बनाने का फैसला किया है। हमारी सरकार स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आय बढ़ाने का काम कर रही है। हमने फैसला किया है कि जो भी उद्योग बहनों को मौका देगा, वहां सरकार उसे प्रति बहन 5 हजार रुपये देगी। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार के लिए स्लोगन है, सच्चा वादा पक्का काम-प्रेम से बोलो सीताराम। चित्रकूट में हमने 3 हजार करोड़ से ज्यादा के काम मंजूर किए हैं। अब मां मैहर के लोक के पहले फेज का भूमि-पूजन आज यहां हुआ है। कल कैबिनेट में हमने फैसला किया कि लाड़ली बहनों को आने वाले 5 साल तक राशि देंगे। बहनें इस राशि से सिलाई मशीन खरीदती हैं, ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। बहने इस राशि से परिवार की पूर्ति करती हैं। 

 

कांग्रेस को लिया आड़े हाथ-मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पहले नक्सलियों को खत्म किया, और अब नशा विरोधी अभियान चला रहे हैं। हमारी सरकार ने 19 धार्मिक शहरों में शराब की दुकानें बंद की हैं। भविष्य की पीढ़ियों को बचाने के लिए, हर तरह के नशे के खिलाफ लड़ने के लिए हमारी सरकार संकल्पबद्ध है। परिवार के परिवार नशे की वजह से बर्बाद हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि आप बच्चों को पढ़ाओ-लिखाओ, बड़ा अधिकारी बनाओ, लेकिन नशे के मामले में उसे सावधान करो। उन्होंने कहा कि पहले कहा जाता था कि मां नर्मदा विंध्याचल पर्वत की तरह आ नहीं सकती है, उसे लाने के लिए नहर बनाई जा रही थी। जिस मशीन से नहर बन रही थी, वह कंपनी ही बंद हो गई। मशीनें खराब हो गईं। यह योजना बंद होने के कगार पर थी। लेकिन, हमने कहा कि खुशहाली के लिए इस इलाके में पानी आना जरूरी है। 2 हजार करोड़ की योजना 800 करोड़ से शुरू हुई। हमने कहा कि इसके लिए पैसे की कोई कमी नहीं है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि अब वो नहर पूरी हो गई है।

उन्होंने कहा कि अब इस क्षेत्र के हर गांव में नर्मदा का पानी पहुंचेगा। हमने फैसला किया कि किसानों को खाते पलटाने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा आने वाली फसल के समय सरकार दिन में बिजली देगी। जिन-जिन गरीबों के मकान रह गए हैं, उनका मकान बनेगा। मैहर में कलेक्टर सहित 16 बड़े पदों पर बहने हैं। 


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि अगर कांग्रेसी अनुचित आचरण नहीं करते, तो विधानसभा में भी बहनों के लिए 33 फीसदी का आरक्षण हो जाता। कांग्रेस को पता नहीं किस बात का डर है। अगर माताएं-बहनें लोकसभा-विधानसभा में आएंगी तो क्या गलत हो जाएगा।    

 

सीएम ने की ये प्रमुख घोषणाएं

– मैहर में 25 करोड़ की लागत से आधुनिक स्टेडियम बनेगा।

– लिलजी जलाशय का 50 करोड़ की लागत से नवीकरण किया जाएगा। 

– मैहर में बड़ा अस्पताल बनाया जाएगा।

– मैहर में 5000 गौवंश क्षमता की बड़ी गौशाला बनेगी।

– मैहर में आईटीआई संस्थान बनेगा, स्कूलों का उन्नय किया जाएगा।

– आल्हा गायकों की समितियों को 25-25 हजार रुपए देने की घोषणा।

2027 के चुनाव से पहले BJP को क्यों याद आईं स्मृति ईरानी? समझें पूरा सियासी समीकरण

Smriti Irani: BJP ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को फिर से राष्ट्रीय महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को एक बड़ा चेहरा दे दिया है। पार्टी को उम्मीद है कि उनकी राजनीतिक पकड़, दमदार भाषण शैली और खासतौर पर महिला वोटरों के बीच उनकी लोकप्रियता यूपी में चुनावी अभियान को मजबूती देने में मदद करेगी।

बता दें कि स्मृति ईरानी उन आठ नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश से BJP अध्यक्ष नितिन नबीन की नई राष्ट्रीय टीम में जगह मिली है। इससे साफ है कि पार्टी उत्तर प्रदेश को कितनी अहमियत दे रही है। ईरानी और पूर्व बस्ती सांसद हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। वहीं, पूर्व धौरहरा सांसद रेखा वर्मा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा डॉ. भोला सिंह और संगीता यादव को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। जबकि अमर पाल मौर्य को BJP OBC मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है।

हालांकि, स्मृति ईरानी के लिए यह नई जिम्मेदारी खास तौर पर अहम मानी जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार के बाद से ईरानी के पास पार्टी में कोई बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं थी। अब उत्तर प्रदेश में होने वाले बेहद अहम चुनाव से पहले उन्हें राष्ट्रीय संगठन में वापस लाया गया है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि BJP इस चुनाव में महिला वोटरों के साथ-साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ईरानी की वापसी को पार्टी की चुनावी रणनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक मनोज भद्रा ने कहा,  “ऐसे समय में जब सभी राजनीतिक दल महिला मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, तब भाजपा स्मृति ईरानी की वापसी के माध्यम से एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है। वह एक प्रभावशाली वक्ता हैं और कई भाषाओं में भाषण दे सकती हैं। वह विशेष रूप से महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण, राष्ट्रीय स्तर पर उनकी उपस्थिति से पार्टी महिला मतदाताओं को फिर से लुभाने और उन्हें अपने पाले में एकजुट करने के लिए जोरदार प्रयास करेगी।”

हालांकि, भाजपा के लिए ईरानी की राजनीतिक उपयोगिता केवल महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता तक ही सीमित नहीं है। उनकी आक्रामक शैली और कांग्रेस नेतृत्व से उनकी अच्छी जान-पहचान उन्हें उस राज्य में पार्टी के प्रमुख प्रचारकों में से एक बना सकती है, जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के भाजपा के खिलाफ संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने की उम्मीद है। उनका राजनीतिक कद उन्हें कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों को चुनौती देने में भी सक्षम बनाता है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश ईरानी के लिए एक जाना-पहचाना राजनीतिक क्षेत्र है। उन्होंने पहली बार 2014 में अमेठी से चुनाव लड़ा था, जहां उन्होंने कांग्रेस के गढ़ में राहुल गांधी को चुनौती दी थी। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र का दौरा करना जारी रखा और मतदाताओं से संपर्क बनाए रखा। भाजपा नेता अमेठी में पार्टी का संगठनात्मक आधार मजबूत करने में उनकी निरंतर जमीनी भागीदारी को श्रेय देते हैं।

ईरानी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को हराया था

उनके प्रयासों का फल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला, जब उन्होंने राहुल गांधी को सीधे मुकाबले में हराकर अमेठी पर गांधी परिवार के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को समाप्त कर दिया। इस जीत ने ईरानी को भाजपा के सबसे प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में से एक बना दिया और उन्हें “जायंट किलर” का खिताब दिलाया।

हालांकि, 2024 की हार उनके राजनीतिक करियर में एक झटका साबित हुई। वह अमेठी सीट किशोरी लाल शर्मा से हार गईं। उस हार के बाद, उन्हें अपनी हालिया नियुक्ति तक कोई महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं दी गई।

अमेठी में भाजपा नेताओं का मानना ​​है कि उनकी वापसी से क्षेत्र में पार्टी के चुनाव प्रचार को नई ऊर्जा मिल सकती है। अमेठी और रायबरेली में पार्टी कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर और मिठाई बांटकर उनकी नियुक्ति का जश्न मनाया। समर्थकों का कहना है कि ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ईरानी जल्द ही जमीनी स्तर पर वापसी करेंगी।

भाजपा के अमेठी स्थानीय नेता जनमजय शर्मा ने कहा कि ईरानी ने इस क्षेत्र के लोगों के लिए बहुत कुछ किया है। उन्होंने कहा कि 2014 में राहुल गांधी से हारने के बावजूद, वह नियमित रूप से अमेठी आती रहीं और लोगों के दिलों में उनकी एक खास जगह है।

हालांकि, अमेठी और पड़ोसी रायबरेली में चुनावी समीकरण भाजपा के लिए अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। 2022 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने अमेठी की चार सीटों में से दो, तिलोई और जगदीशपुर सीटें जीतीं। जबकि सपा ने गौरीगंज और अमेठी की सीटें जीतीं थी। हालांकि, गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह बाद में भाजपा में शामिल हो गए।

वहीं, रायबरेली में सपा ने 6 विधानसभा सीटों में से चार सीटें – बछरावां, हरचंदपुर, सरेनी और ऊंचाहार – जीतीं, जबकि भाजपा ने रायबरेली और सलोन सीटें जीतीं। हालांकि, ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडे बाद में भाजपा में शामिल हो गए और अब योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री हैं।

ईरानी जल्द शुरू कर सकती हैं यूपी का दौरा

भाजपा सूत्रों के अनुसार, ईरानी जल्द ही उत्तर प्रदेश में व्यापक दौरे शुरू कर सकती हैं और विधानसभा चुनावों की तैयारियों को तेज करते हुए विशेष रूप से अमेठी और रायबरेली पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं।

एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, “स्मृति ईरानी एक जाना-पहचाना चेहरा हैं, उन्होंने अमेठी से चुनाव जीता है और भाजपा के लिए भीड़ जुटाना आसान है।” उन्होंने आगे कहा, “दूसरा, वह राहुल गांधी का मुकाबला करने के लिए बेहतर स्थिति में होंगी… और इस खींचतान को मीडिया कवरेज मिलेगा, जिससे पार्टी को फायदा होगा।”

‘तुलसी’ से सियासत तक का सफर

बता दें कि ईरानी का राजनीतिक सफर टेलीविजन से शुरू हुआ, जहां लोकप्रिय धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में तुलसी विरानी के किरदार से वे घर-घर में मशहूर हो गईं। उन्होंने 2003 में भाजपा में प्रवेश किया और भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय सचिव के रूप में कार्य किया। बाद में उन्होंने गुजरात और महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद के रूप में कार्य किया और 2014 से 2024 के बीच मोदी सरकार में शिक्षा, वस्त्र, सूचना एवं प्रसारण, महिला एवं बाल विकास और अल्पसंख्यक मामलों सहित कई विभागों का कार्यभार संभाला।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे में स्मृति ईरानी की BJP के राष्ट्रीय संगठन में वापसी पार्टी के लिए काफी अहम मानी जा रही है। उनके पास उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार का अनुभव है और वह पार्टी के लिए एक पहचाना हुआ और आक्रामक चेहरा हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्मृति ईरानी 2019 में अमेठी की ऐतिहासिक जीत से बनी अपनी राजनीतिक पकड़ को पूरे उत्तर प्रदेश में BJP के लिए चुनावी फायदे में बदल पाएंगी? यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि पार्टी राज्य में अगले चुनाव के लिए अपना अभियान शुरू कर रही है।

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भारत के इन 5 राज्यों में बढ़ रहा इंसान और हाथी टकराव! WII ने मैप किए 5 राज्यों के बड़े हॉटस्पॉट्स

भारत में इंसानों और हाथियों के बीच बढ़ता टकराव एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और प्रोजेक्ट एलिफेंट डिवीजन ने देश के 5 प्रमुख राज्यों कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में मानव-हाथी संघर्ष के प्रमुख हॉटस्पॉट्स को मैप किया है। WII की इस रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य उन इलाकों की पहचान करना है जहां जोखिम सबसे अधिक है, ताकि संरक्षण और सुरक्षा प्रयासों को सही दिशा में फोकस किया जा सके।

रिसर्चर्स ने इन राज्यों के लंबे समय के डेटा की स्टडी की है। इनमें से कुछ आंकड़े साल 2000 तक पुराने हैं। इस पूरी सीरीज में ओडिशा की रिपोर्ट सबसे डिटेल है। 128 पन्नों की इस रिपोर्ट में कई सालों के डेटा का इस्तेमाल किया गया है। रिपोर्ट का लक्ष्य उन स्थानों और दोहराए जाने वाले पैटर्न की पहचान करना है जहां हाथियों और इंसानों का आमना-सामना सबसे ज्यादा होता है।

इंसानी बस्तियों में क्यों आ रहे हैं हाथी?

रिपोर्ट के मुताबिक इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष की मुख्य वजह उनके प्राकृतिक आवासों (हाथी पर्यावास) और इंसानी गतिविधियों के बीच बढ़ता ओवरलैप है। जंगल लगातार छोटे-छोटे हिस्सों में बंटते जा रहे हैं। जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कें और रेलवे लाइनें हाथियों के पारंपरिक रास्तों को काटती हैं। इसके अलावा बिजली की बाड़ और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर भी हाथियों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं। जंगलों के करीब गांवों और इंसानी बस्तियों के विस्तार ने लोगों और हाथियों को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है।

एलिफेंट कॉरिडोर के आसपास भी मुश्किलें

हाथियों को भोजन और पानी की तलाश के साथ-साथ एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित आवाजाही के लिए बड़े क्षेत्र की जरूरत होती है। जब हाथियों के ये पारंपरिक कॉरिडोर या रास्ते ब्लॉक हो जाते हैं, तो वे वैकल्पिक रास्तों की तलाश करते हैं। ये वैकल्पिक रास्ते अक्सर खेतों, गांवों या बस्तियों से होकर गुजरते हैं। हाथियों के इस मूवमेंट से फसलों को भारी नुकसान पहुंचता है। इंसानों से मुठभेड़ का खतरा बढ़ जाता है और कई बार इंसानों व हाथियों दोनों को अपनी जान गंवानी पड़ती है या गंभीर चोटों का सामना करना पड़ता है।

वैज्ञानिकों ने हॉटस्पॉट आधारित समाधान की उठाई मांग

WII की यह रिपोर्ट अधिकारियों को उन संवेदनशील क्षेत्रों की तुरंत पहचान करने में मदद करेगी जहां तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि इन हॉटस्पॉट्स में बेहतर अर्ली-वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) लागू की जानी चाहिए। सुरक्षित रेलवे और सड़क योजनाएं बनाना, वन विभागों द्वारा हॉटस्पॉट क्षेत्रों में रैपिड रिस्पॉन्स सिस्टम को मजबूत करना और हाथियों के गलियारों को सुरक्षा प्रदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।

संकट से निपटने के लिए बचाव रणनीति की जरूरत

यह रिपोर्ट सिर्फ अतीत में हुए संघर्षों का रिकॉर्ड भर नहीं है बल्कि यह दिखाती है कि संघर्ष कहां, कब और किन कारणों से हो रहे हैं। यह डेटा अधिकारियों को घटनाओं के होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें पहले से रोकने में मदद कर सकता है। भारत के लिए यह चुनौती बिल्कुल स्पष्ट है कि हाथियों की रक्षा करने का सीधा मतलब उन प्राकृतिक भू-भागों और रास्तों की सुरक्षा करना है, जिनका उपयोग हाथी अपनी आवाजाही के लिए करते हैं।

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हेमंत सोरेन के फैसले के बाद झारखंड में छात्र आंदोलन खत्म, लेकिन CBI जांच की मांग पर अड़े छात्र

हेमंत सोरेन के फैसले के बाद झारखंड में छात्र आंदोलन खत्म, लेकिन CBI जांच की मांग पर अड़े छात्र

jharkhand student protest ends

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा JSSC-CGL और TDPL परीक्षा को रद्द करने के फैसले के बाद झारखंड में छात्र आंदोलन समाप्त हो गया। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 15 दिन से जारी अनशन समाप्त कर किया। हालांकि भाजपा का कहना है कि झारखंड सरकार ने आधी बात मानी है। CBI जांच से झारखंड सरकार भाग रही है क्योंकि उन्हें पता है कि CBI जांच होगी तो मुख्यमंत्री तक आंच आएगी।

 

देवेंद्र महतो ने उम्मीदवारों की मांगें मानने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और राज्य के मंत्रियों दीपिका पांडे सिंह और इरफान अंसारी का धन्यवाद किया। उन्होंने परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और पेपर लीक को रोकने के लिए सख्त कानूनों और सुधारों की भी मांग की।
 

सरकार सभी मांगों पर सहमत

राज्य मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने कहा कि सरकार हमेशा से झारखंड में शुरू हुए बड़े छात्र आंदोलन, खासकर सुधारों से जुड़े मुद्दों को लेकर संवेदनशील रही है। मुख्यमंत्री ने आंदोलन की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखी है और राहुल गांधी ने भी लगातार छात्रों के हितों की बात की है। आज हम आंदोलनकारियों का धन्यवाद करना चाहते हैं। आपने जो आंदोलन शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से, राज्य और छात्रों दोनों के हित में चलाया, वह अब बहुत सम्मानजनक तरीके से समाप्त हो रहा है। सरकार आपकी सभी मांगों पर सहमत हो गई है और हम आपको भरोसा दिलाते हैं कि जांच निष्पक्ष होगी। किसी भी दोषी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

 

सीबीआई जांच क्यों नहीं कराना चाहती सरकार?

दीपिका पांडे सिंह ने कहा कि छात्र आंदोलन से पहले ही, देवेंद्र महतो ने CID जांच का प्रस्ताव दिया था और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई थी। इसके विपरीत, CBI नतीजे देने में विफल रही है, पेपर लीक से जुड़े उसके 17 मामले लंबित हैं।

उन्होंने कहा कि 2015 से देश भर में पेपर लीक और गड़बड़ी के 152 मामले सामने आए हैं, फिर भी न तो केंद्र सरकार और न ही केंद्रीय एजेंसियों को इन मामलों में कोई ठोस नतीजा मिला है। इसलिए, CID जांच के संबंध में हमने एक समय-सीमा तय की है। 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल की जानी चाहिए और मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए होनी चाहिए ताकि जल्द फैसला आ सके।

 

सीबीआई जांच की मांग पर अड़े छात्र

छात्र नेता रवीन्द्र पासवान ने कहा कि मंत्री दीपिका पांडे और इरफान अंसारी जी अभी आए थे उन्होंने हमसे अपील की ये आंदोलन और अनशन को खत्म करें। लेकिन जो हमारी मांगे CBI संबंधित हैं उस पर सरकार की अभी तक सहमति नहीं बन पाई है हमारी CBI से संबंधित जो मांगे है उसे हम अभी भी जारी रखें हुए हैं। कल सरकार की तरफ से जो भी नोटिफिकेशन आएगा उसको भी हम अध्ययन करेंगे उसके बाद हम अपने आंदोलन की रणनीति के बारे में बताएंगे। हमारी मांग है कि CBI जांच होनी चाहिए।

Nepal Sanatan Row: नेपाल की राजनीति में बड़ा भूचाल! सनातन को लेकर नेपाली कांग्रेस में मचा घमासान, समझिए शेर बहादुर देउबा चला ये कैसा दांव

Nepal Sanatan religion Row: नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी ‘नेपाली कांग्रेस’ में सनातन धर्म को देश की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने के प्रस्ताव को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले गुट में ही इस मुद्दे पर मतभेद सामने आए हैं। विवाद इतना बढ़ गया कि पार्टी की राष्ट्रीय सभा के निष्कर्षों को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। सोमवार 17 अगस्त को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस भी टालनी पड़ी।

दरअसल, देउबा के आग्रह पर सोमवार 17 अगस्त को बंद सत्र में पांच सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। इसके तीसरे बिंदु में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गई है। हालांकि, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

देउबा के प्रस्ताव पर वरिष्ठ नेताओं ने जताई आपत्ति

नेपाली मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सनातन धर्म से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करने वालों में कृष्ण प्रसाद सिटौला, विमलेंद्र निधि, प्रकाशमान सिंह और मिन विश्वकर्मा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं। विश्वकर्मा ने कहा कि धार्मिक मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाने के कारण अंतिम दस्तावेज तैयार करने में देरी हुई। इसी वजह से प्रेस कॉन्फ्रेंस स्थगित करनी पड़ी।

विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाली कांग्रेस ने मौजूदा संविधान के निर्माण और उसे लागू कराने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि पार्टी को ऐसी नई राजनीतिक दिशा नहीं अपनानी चाहिए। इससे संविधान में हासिल किए गए धर्मनिरपेक्षता और अन्य संवैधानिक प्रावधान कमजोर हों।

20 सूत्रीय निष्कर्ष में सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता की बात थी

राष्ट्रीय सभा के समापन के लिए पहले 20 सूत्रीय निष्कर्ष तैयार किए गए थे। नेताओं के बीच 19 पॉइंट पर सहमति बन चुकी थी। लेकिन 16वें बिंदु में धर्म से संबंधित प्रावधान को लेकर विवाद हो गया। मूल प्रस्ताव में नेपाल को बहुजातीय, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश बताते हुए सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म और संस्कृति का पालन एवं संरक्षण करने की संवैधानिक स्वतंत्रता मजबूत करने की बात कही गई थी।

इसमें सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान घोषित करने की मांग नहीं थी। देउबा ने इस बिंदु की भाषा पर आपत्ति जताई। इसके बाद मूल 20 सूत्रीय दस्तावेज को अंतिम रूप देने के बजाय अलग से पांच सूत्रीय प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसे बंद सत्र में पारित कर दिया गया।

पांच सूत्रीय प्रस्ताव में क्या है?

पांच सूत्रीय प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने से जुड़ा है। प्रस्ताव में कहा गया है कि नेपाल की लंबे समय से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं देश की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा हैं। इसमें हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात भी कही गई है।

साथ ही प्रस्ताव में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी जताई गई है। यानी प्रस्ताव को केवल हिंदू धर्म की स्थापना के रूप में पेश करने के बजाय नेपाल की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश की गई है। लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर मतभेद काफी गहरे हो गए हैं।

क्या धर्मनिरपेक्षता की जगह हिंदू राष्ट्र की मांग?

देउबा के समर्थकों और प्रस्ताव के विरोधियों के बीच सबसे बड़ा मतभेद इसी मुद्दे पर है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि देउबा की पहल नेपाल के संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता को बदलकर देश को हिंदू राष्ट्र की दिशा में ले जाने की कोशिश है। देउबा खेमे में शशांक कोइराला, प्रकाश शरण महत, एनपी साउद और शंकर भंडारी जैसे नेता प्रस्ताव के समर्थन में बताए गए हैं। शंकर भंडारी पिछले कुछ वर्षों से खुले तौर पर नेपाल को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने और संवैधानिक राजशाही की वकालत करते रहे हैं।

संविधान निर्माण के समय भी था मतभेद

देउबा खेमे के नेताओं का कहना है कि नेपाली कांग्रेस के भीतर सनातन धर्म को लेकर समर्थन संविधान निर्माण के समय भी मौजूद था। उनके अनुसार, संविधान लागू करते समय धर्मनिरपेक्षता को एक राजनीतिक समझौते के हिस्से के रूप में स्वीकार किया गया था। प्रकाश शरण महत का कहना है कि संविधान लागू होने के बाद भी नेपाली कांग्रेस के महाधिवेशन और अन्य औपचारिक मंचों पर सनातन धर्म का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय सभा के फैसले को पार्टी की पुरानी स्थिति से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बताया।

मंच पर नेताओं के बीच तीखी बहस

मूल 20 सूत्रीय निष्कर्षों को पेश करने से पहले पांच सूत्रीय प्रस्ताव पारित किए जाने को लेकर पार्टी के मंच पर भी नेताओं के बीच तीखी बहस हुई। विरोध कर रहे नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय सभा में चर्चा किए गए अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट गए। पूरा ध्यान हिंदू धर्म तथा सनातन धर्म के सवाल पर केंद्रित हो गया है।

नेपाली कांग्रेस के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती

सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का प्रस्ताव अब नेपाली कांग्रेस के लिए एक बड़ी राजनीतिक और वैचारिक चुनौती बन गया है। एक तरफ देउबा समर्थक नेता नेपाल की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।

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दूसरी तरफ पार्टी के कई नेता संविधान में स्थापित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और सभी धार्मिक समुदायों की समान स्वतंत्रता को बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। यही मतभेद पार्टी की राष्ट्रीय सभा के अंतिम निष्कर्षों को रोकने का कारण बना। अब यह देखना अहम होगा कि नेपाली कांग्रेस सनातन धर्म, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच किस तरह संतुलन बनाती है। साथ ही यह भी देखना होगा कि इस मुद्दे पर पार्टी की आधिकारिक राजनीतिक लाइन क्या तय होती है।