‘मैं आपके साथ हूं’, TMC और उद्धव सेना के बागी सांसदों से बोले PM मोदी

संसद के मानसून सत्र के बीच दिल्ली में शुक्रवार की सुबह विपक्ष से अलग होकर NDA के साथ आए सांसदों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाश्ते पर मुलाकात की। इस मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सांसदों को भरोसा दिलाया कि उन्हें किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। जानकारी के अनुसार, संसद के मानसून सत्र के दौरान बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच विपक्ष छोड़कर एनडीए में आए नेताओं के स्वागत के लिए यह बैठक बुलाई गई थी। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे कहा, “आपके बारे में कौन क्या कह रहा है, इसकी चिंता मत कीजिए। घबराने की कोई जरूरत नहीं है, मैं आपके साथ हूं।”

पीएम मोदी की बैठक में क्या हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस नाश्ता बैठक में करीब 45 सांसद शामिल हुए। इनमें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर हाल ही में एनसीपीआई में शामिल हुए 20 सांसद, उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के सात पूर्व सांसद (जिनमें से छह अब एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो चुके हैं), नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के 20 सांसद और अजित पवार गुट की एनसीपी के दो सांसद मौजूद थे। बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल के सांसदों से कहा कि वे लोगों के बीच अपनी मौजूदगी और संपर्क को और मजबूत करें। उन्होंने कहा कि देश की तरक्की के लिए पश्चिम बंगाल का विकास भी बहुत जरूरी है। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में हर सांसद को उनके सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ाव से जुड़ी जानकारी का एक प्रिंटआउट दिया गया। प्रधानमंत्री ने सभी सांसदों से कहा कि वे सोशल मीडिया के जरिए लोगों से ज्यादा से ज्यादा जुड़ें और अपनी पहुंच बढ़ाएं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “जब पश्चिम बंगाल आगे बढ़ता है, तो पूरा भारत आगे बढ़ता है।” उन्होंने सांसदों से कहा कि राज्य में विकास के लिए अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों के विकास पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए बेहतर सड़क, रेल और अन्य सुविधाओं के साथ तेज़ विकास पर काम करना होगा। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने सभी सांसदों को हर साल अपनी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य जांच कराने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में बड़े काम करने हैं, इसलिए सभी का स्वस्थ और फिट रहना बहुत जरूरी है।

बैठक के दौरान चाय पर कुछ हल्के-फुल्के और मजेदार पल भी देखने को मिले। जब मेहमानों को माचा चाय परोसी गई, तो बीजेपी सांसद शताब्दी रॉय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके बारे में बताया और कहा कि यह चाय पश्चिम बंगाल में भी मिलती है। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने फिर कहा कि पश्चिम बंगाल को एक बार फिर देश के विकास की ताकत बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पहले बंगाल तरक्की करता था, तब पूरे देश को उसका फायदा मिलता था।

बातचीत के बीच माहौल उस समय और हल्का हो गया, जब वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने मजाक करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के आसपास कई ऐसे नेता हैं, जो पहले फिल्म और टीवी की दुनिया में काम करते थे और अब राजनीति में हैं। इनमें शताब्दी रॉय, सयोनी घोष, जून मालिया और रचना बनर्जी के नाम शामिल हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि इन सभी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए प्रधानमंत्री को भी पूरी तरह फिट रहना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के पूर्व सांसदों से मराठी में बातचीत की। वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर आए नेताओं से भी उन्होंने गर्मजोशी से मुलाकात की। इससे इन नेताओं की अयोग्यता की आशंका और अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों की नाराज़गी जैसी चिंताएं काफी हद तक कम होती दिखीं। बैठक में इन नेताओं को खास महत्व भी दिया गया। एनसीपीआई की अध्यक्ष और मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) काकोली घोष दस्तीदार, जो कभी ममता बनर्जी की करीबी सहयोगी रही हैं, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ सबसे आगे की पंक्ति में बैठने की जगह दी गई।

संसद में संख्या बढ़ाने पर बीजेपी का जोर

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) संसद में अपने गठबंधन की ताकत बढ़ाने में जुटी है, ताकि उसे दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत मिल सके। यह बहुमत बड़े संवैधानिक संशोधन पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। इनमें परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने जैसे अहम विधेयक भी शामिल हैं। हालांकि, विपक्ष छोड़कर आए ज्यादातर सांसद इस बैठक में शामिल हुए, लेकिन मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद क्षेत्र से एनसीपीआई के तीन सांसद—अबू ताहिर खान, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान—एनडीए की बड़ी बैठक में नहीं पहुंचे। बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने क्षेत्र के मतदाताओं की नाराज़गी और राजनीतिक माहौल को देखते हुए दूरी बनाए रखी। हालांकि, इन सांसदों ने पार्टी नेतृत्व के साथ विकास कार्यों और अन्य मुद्दों पर अलग से चर्चा की।

AISA की जिस स्टूडेंट लीडर के साथ राहुल गांधी ने की थी प्रेस कॉन्फ्रेंस रांची में उनपर फेंकी गई स्याही, कौन हैं नेहा बोरा?

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के विरोध में शुक्रवार को विधानसभा की ओर निकाले गए मार्च के दौरान एक व्यक्ति ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंक दी और उन पर  “राष्ट्र-विरोधी” होने का आरोप लगाया। बता दें कि यह घटना बिरसा चौक के पास तब घटी जब दो छात्र संगठनों – AISA और AISF के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे।

मैं डरने वाली नहीं हूं- नेहा बोरा

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए बोरा ने कहा, “मैं स्याही फेंके जाने से डरने वाली नहीं हूं, क्योंकि दिल्ली में हुए प्रदर्शन में मैंने पेलेट गन फायरिंग और लाठीचार्ज का सामना किया था।” AISA की नेता शिवानी ने कहा, “हम शांतिपूर्ण मार्च कर रहे थे। अचानक भीड़ में से एक व्यक्ति निकला और उसने बोरा पर स्याही फेंक दी।” उन्होंने आरोप लगाया कि वह व्यक्ति भाजपा समर्थित गुंडा था।

एक अधिकारी ने बताया कि स्याही फेंकने वाले व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है।

मीडिया से बात करते हुए उस व्यक्ति ने कहा, “बोरा उमर खालिद की समर्थक हैं। मुझे वह पसंद नहीं हैं। वह राष्ट्र-विरोधी हैं।”

स्टूडेंट्स के भविष्य के लिए खड़े रहेंगे

नेहा ने मांग करते हुए कहा कि सिस्टम में शामिल जिन पर गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन सभी प्राइवेट एजेंसियों को हटाया जाना चाहिए। हम 10 तारीख को स्टूडेंट्स की अपील का सपोर्ट करेंगे और स्टूडेंट्स के भविष्य के लिए खड़े रहेंगे।

दिल्ली में नेहा बोरा के साथ राहुल गांधी की थी प्रेस कॉन्फ्रेंस

बता दें कि कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 10 जनपथ पर शनिवार, 25 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इस दौरान उनके साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा समेत वो छात्राएं भी मौजूद रहीं, जो जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठी थीं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि छात्रों पर हुए हमले के लिए प्रधानमंत्री मोदी को माफी मांगनी चाहिए। अपने भाषण में राहुल ने छात्रों को देश का भविष्य बताया और प्रधानमंत्री मोदी को भारत का ‘अतीत’।

वहीं, इसके बाद लेफ्ट संगठन AISA से जुड़ी और जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठी नेहा ने भी पत्रकारों से बात की। उन्होंने राहुल गांधी के बातों का समर्थन किया और उसे अच्छा बताया।

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‘UPI पेमेंट के लिए ग्राहकों पर कोई चार्ज नहीं लगेगा’, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 6 अगस्त को स्पष्ट किया कि अगर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ व्यापारियों (Merchants) पर होगा। आम UPI यूजर्स से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।

वित्त मंत्री ने कहा कि MDR से बैंकों और फिनटेक कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सुरक्षा पर ज्यादा निवेश करने में मदद मिलेगी। इसका फायदा आखिरकार सभी UPI यूजर्स को मिलेगा।

अभी MDR पर अंतिम फैसला नहीं

निर्मला सीतारमण ने कहा कि UPI पर MDR लागू होगा या नहीं, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह फैसला UPI और NPCI की सर्विसेज स्टीरिंग कमेटी करेगी।

उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया तभी आगे बढ़ेगी, जब संसद टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 पारित करेगी। इस बिल में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन का प्रस्ताव है।

कांग्रेस ने क्या कहा था?

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया था कि नया विधेयक UPI ट्रांजैक्शन को फीस-मुक्त रखने वाली कानूनी गारंटी को खत्म कर देगा। उनके मुताबिक, इससे भविष्य में सभी तरह के UPI ट्रांजैक्शन पर MDR लगाने का रास्ता खुल सकता है और इसका बोझ आखिरकार ग्राहकों पर पड़ेगा।

उन्होंने कहा था कि आम लोगों को भविष्य में UPI इस्तेमाल करने के लिए भी शुल्क देना पड़ सकता है।

वित्त मंत्री ने दावे को बताया गलत

निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के दावों को भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर संसद के भीतर रचनात्मक चर्चा होनी चाहिए, न कि गलतफहमियां फैलानी चाहिए। उनके मुताबिक, फिलहाल ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है जिससे UPI यूजर्स पर कोई शुल्क लगाया जाए।

RBI गवर्नर ने क्या कहा था

UPI पर MDR को लेकर बहस RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के हालिया बयान के बाद तेज हुई। इसमें  उन्होंने कहा कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने की एक लागत होती है और किसी न किसी को इसका बोझ उठाना होगा। हालांकि, उन्होंने साफ संकेत नहीं दिया था कि इसका बोझ कौन उठाएगा।

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राहुल-रिजिजू मुलाकात बेनतीजा: ‘गृह मंत्री दें जवाब, पीएम मांगे माफी… तभी होगी बात’, परिसीमन बिल पर संसद में फंसा पेच!

kiren rijiju and rahul gandhi

संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच बना गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा है। लोकसभा और राज्यसभा में जारी हंगामे के बीच बुधवार को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संसद भवन स्थित चेंबर में जाकर उनसे मुलाकात की। लगभग 50 मिनट तक चली इस उच्चस्तरीय बैठक में कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद रहीं।ALSO READ: Fact-Check: क्या दतिया उपचुनाव हारने के बाद BJP ने हजारों नेताओं को बाहर निकाला?

हालांकि, परिसीमन बिल (Delimitation Bill) पर विपक्ष का समर्थन जुटाने और सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की सरकारी कोशिशें इस बैठक के बाद भी बेनतीजा ही रहीं। 

 

1. मुलाकात में क्या हुआ और कहां अटका पेच?

सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रस्तावित परिसीमन बिल को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों का रुख जानना चाहा और संसद की कार्यवाही में सहयोग की अपील की। लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि जब तक सरकार विपक्ष की मुख्य मांगों पर ध्यान नहीं देती, तब तक किसी भी विधायी कार्य पर सहमति बनना संभव नहीं है। ALSO READ: यूसुफ पठान समेत 3 मुस्लिम सांसदों ने क्यों बनाई NDA से दूरी! क्या 'खेला' हो गया?
 

2. राहुल गांधी की 3 मुख्य शर्तें

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए सरकार के सामने ये प्रमुख मांगें रखी हैं: 

1. गृह मंत्री अमित शाह का सदन में वक्तव्य: विपक्ष की मांग है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद सदन में आकर हालिया प्रदर्शनों के दौरान हुए पुलिस एक्शन और पेलेट गन/लाठीचार्ज के मुद्दे पर विस्तृत बयान दें। 

2. प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी और माफी: विपक्ष का कहना है कि उत्पन्न हुई समस्याओं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सदन में आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। 

3. मुद्दों पर सीधी चर्चा: जब तक इन गंभीर विषयों पर गृह मंत्री और प्रधानमंत्री का जवाब नहीं आता, तब तक विपक्ष किसी भी नए बिल या विधायी प्रक्रिया का समर्थन नहीं करेगा। ALSO READ: संसद परिसर में विपक्षी सांसदों का मार्च, अमित शाह से मांगा जवाब

 

 

किरेन रिजिजू और राहुल गांधी के बीच हुई यह बैठक भले ही गतिरोध को समाप्त न कर सकी हो, लेकिन इसने दोनों पक्षों के कड़े रुख को स्पष्ट कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार विपक्ष की मांगों को मानते हुए गृह मंत्री के बयान के लिए तैयार होती है या फिर मानसून सत्र के बाकी बचे दिनों में भी हंगामे का दौर इसी तरह जारी रहता है। 

दतिया में हार के बाद भाजपा की जिला कार्यकारिणी भंग होना क्या नरोत्तम मिश्रा की दतिया राजनीति के अंत का संकेत?

दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद अब एक्शन का दौर शुरु हो गया है। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने दतिया की जिला कार्यकारिणी, मंडल और मोर्चा इकाइयों को भंग कर दिया। इसके साथ ही चुनावी हार के कारणों की समीक्षा के लिए दो सदस्यीय समिति का गठन भी किया गया। नतीजों के बाद यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व ने चुनाव परिणाम को गंभीरता से लिया गया है और पूरे चुनाव के दौरान जिस भितरघात की चर्चा थी उस पर अब पार्टी एक्शन मोड में है।

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दतिया भाजपा जिला कार्यकारिणी पर एक तरह से नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का कब्जा था, इसका बडा कारण है कि नरोत्तम मिश्रा का लगातार 15 साल तक दतिया से विधायक रहना। इसके साथ नरोत्तम मिश्रा की गिनती मध्यप्रदेश भाजपा के उन दिग्गज नेताओं में होती थी  जिनका प्रभाव सरकार से लेकर संगठन तक में था। 
 

शहर में हार के बाद पार्षदों पर एक्शन की तैयारी-दतिया भाजपा जिला कार्यकारिणी के भंग किए जाने के बाद अब पार्टी उन पार्षदों के खिलाफ भी बड़ी कार्रवाई कर सकती है, जिन्होंने चुनाव में पार्टी के विरोध में काम किया है। पार्टी सूत्र बताते है कि  ऐसे करीब एक दर्जन पार्षदों की पहचान की गई है जिनकी गतिविधियां चुनाव में पार्टी के विरोध में रही और उन्होंने वोटिंग के दिन खुलकर पार्टी का विरोध किया। इन पार्षदों को पार्टी नेतृत्व सीधे बाहर का रास्ता दिखा सकता है।

बताया जा रहा है कि पार्टी के पार्षदों ने पार्टी के विरोध में काम किया, यहीं कारण रहा है कि दतिया शहर में भाजपा को अब तक की सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा। आंकड़े बताते है कि भाजपा दतिया मंडल में साढ़े पांच हजार वोटों से  पीछे रही, वहीं पूरे दतिया शह में भाजपा करीब 11 हजार वोटों से कांग्रेस से पीछे  रही गौरतलब है कि दतिया उपचुनाव की वोटिंग के दिन पुलिस ने नरोत्तम मिश्रा समर्थक 4 पार्षदों को उनके घरों में  नजरबंद कर दिया था। 

 

क्या नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ पार्टी कर पाएगी कार्रवाई?-दतिया उपचुनाव में हार की समीक्षा को लेकर मंगलवार को भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पर पार्टी की बड़ी बैठक हुई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की मौजदूगी में हुई बैठक में हार के कारणों की विस्तार से समीक्षा की गई। बताया जा रहा है कि बैठक में शामिल सरकार के मंत्री, जिन्होंने दतिया उपचुनाव में मंडल जिताने की जिम्मेदारी दी गई थी उन्होने खुलकर नरोत्तम मिश्रा पर पार्टी के विरोध में काम करने के आरोप लगाए। 
 

भाजपा से जुड़े सूत्र बताते है कि नरोत्तम मिश्रा की चुनाव में भूमिका को लेकर प्रदेश नेतृत्व एक रिपोर्ट तैयार करके पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भेज रहा है। सूत्र बताते  है कि पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा पर कार्रवाई का फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा। दरअसल दतिया उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को लगभग 6,016 मतों के अंतर से पराजित किया। अब इस हार का पूरा ठीकरा नरोत्तम मिश्रा पर फूटता हुआ दिख रहा है। यहीं कारण है कि पहले उनके समर्थक दतिया भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह सहित पूरी कार्यकारिणी को भंग कर दिया गया। 

 

दतिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार का बड़ा कारण भितरघात को माना जा रहा है। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के बाद दतिया की सड़कों पर जिस तरह से नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने शहर में हंगाम और प्रदर्शन किया,  उसने पार्टी को शहर में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। वहीं बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी की नामांकन रैली में जिस तरह से मंच पर नरोत्तम मिश्रा रोएं और पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह से टिकट कटने को लेकर पार्टी नेतृ्व्य पर इशारों ही इशारों में सवाल उठाए, उसका खामियाजा पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ा।

चुनावी नतीजे बताते हैं कि बीजेपी को नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ पर भी कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा, यह इस बात का साफ इशारा है कि चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के खिलाफ जमकर भितरघात हुआ।  दतिया से खुलकर टिकट की दावेदारी करने वाले नरोत्तम मिश्रा के रोने का वीडियो जिस तरह से वोटिंग के ठीक पहले सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों के द्वारा वायरल किया गया और चुनाव में ‘बीजेपी को सबक सिखाने’ और ‘दादा के आंसुओं का बदला लेने’ के कमेंट किए गए उसने चुनाव में बीजेपी को हराने का काम किया।

संसद परिसर में विपक्षी सांसदों का मार्च, अमित शाह से मांगा जवाब

opposition protest in parliment

छात्रों पर लाठीचार्ज और चढ़ावा चोरी मामले में प्रेरणा स्थल से मकर द्वार तक विपक्षी सांसदों ने बुधवार को मार्च किया। प्रदर्शन में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत सभी विपक्षी दलों के सांसद शामिल थे। प्रदर्शनकारियों के हाथ में एक बड़ा पोस्टर था, इस पर लिखा था 'अमित शाह जवाब दो'। भाजपा ने राहुल गांधी पर संसद नहीं चलने देने का आरोप लगाया। ALSO READ: सुनेत्रा पवार को 'गूंगी गुड़िया' कहने पर गरमाई महाराष्ट्र की सियासत, CM फडणवीस का कांग्रेस पर तीखा हमला

 

 

कांग्रेस ने भी सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में प्रोटेस्ट का वीडियो शेयर करते हुए कहा कि छात्रों पर हुई बर्बरता और चढ़ावा चोरी के खिलाफ विपक्ष के सांसदों का पैदल मार्च। मोदी सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सदन में आकर जवाब देना ही होगा।

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि हमारी मांग यही है कि प्रधानमंत्री मोदी जी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में आएं। वो अपना बयान दें, हम चर्चा करने को तैयार हैं। चर्चा से ही हल निकलेगा। सदन शुरु हुए काफी दिन हो गए हैं। उन्हें आना चाहिए, सदन में न आकर वो संसद का अपमान कर रहे हैं। ALSO READ: UPI यूजर्स के लिए बड़ा अपडेट! 2000 रुपए से ऊपर के बिजनेस पेमेंट पर लग सकता है MDR चार्ज, जानिए किस पर पड़ेगा असर

 

राहुल गांधी पर भाजपा का बड़ा आरोप

भाजपा नेता गौरव भाटिया ने कहा कि ऐसा क्यों है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद को चलने नहीं दे रहे हैं? हमने हमेशा कहा है कि ये 2 विचार धाराओं की लड़ाई है। एक तरफ नरेंद्र मोदी राष्ट्र की बात करते हैं राष्ट्र हित सर्वोपरि है। दूसरी तरफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी केवल देश को बांटने का काम करते हैं। अराजक तत्वों के साथ खड़े होना खुद, अराजक हो जाना। नरेंद्र मोदी की सरकार में जीरो टॉलरेंस की नीति है, 2019-2026 तक 36 देशों से 274 भगोडे भारत वापस लाए गए हैं।'

 

गौरतलब है कि संसद के मानसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बना हुआ है। इस वजह से संसद की कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने आज भी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ बैठक की।

पूर्व राज्यपाल और शिक्षाविद डॉ. डीवाई पाटिल का निधन, 91 वर्ष की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

DY Patil dies

बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के पूर्व गवर्नर रहे और मशहूर शिक्षाविद डॉ. ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल (डीवाई पाटिल) का मंगलवार को कोल्हापुर के कस्बा बावड़ा स्थित घर पर निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे। ALSO READ: क्या है ‍बांकीपुर का जातीय गणित और किस जाति से आते हैं प्रशांत किशोर? कितने पढ़े-लिखे हैं PK

 

पूर्व कांग्रेस नेता डी वाई पाटिल को प्यार से दादा कहा जाता था। पाटिल के परिवार में उनके बेटे कांग्रेस एमएलसी सतेज पाटिल, संजय पाटिल और अजिंक्य पाटिल और बेटी नंदिता पालशेतकर हैं। उनके नेतृत्व में देशभर में 182 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों, 7 विश्वविद्यालयों और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विशाल नेटवर्क की स्थापना हुई।

 

पाटिल ने वर्ष 1957 से 1962 तक कोल्हापुर के महापौर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद वे 1967 से 1972 तक महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य रहे। कांग्रेस ने उन्हें बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल का गर्वनर बनाया। वर्ष 2018 में वे कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए। ALSO READ: 'कुत्ता या बिल्ली भी जीत जाएगा', क्या इसी ओवरकॉन्फिडेंस ने डुबो दी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट?

 

डी वाई पाटिल के निधन की जानकारी देते हुए पिंपरी की प्रो-वाइस चांसलर स्मिता जाधव ने कहा कि बहुत दुख और भारी मन से मैं आपको हमारे प्रिय संस्थापक, माननीय डॉ. डी वाई पाटिल सर के निधन की सूचना दे रही हूं। उनकी दूरदर्शी लीडरशिप, शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण और असाधारण विरासत ने अनगिनत लोगों के जीवन और संस्थानों को संवारा है। उनका जाना पूरे डी वाई पाटिल परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

 

डी वाई पाटिल को सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1991 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनका अंतिम संस्कार बुधवार, 5 अगस्त को कोल्हापुर के लाइन बाजार स्थित डॉ. डी वाई पाटील मेडिकल कॉलेज परिसर में किया जाएगा।

दतिया में हार के बाद बड़े एक्शन की तैयारी में भाजपा, जिला अध्यक्ष सहित पूरी कार्यकारिणी पर गिर सकती है गाज

भोपाल। दतिया विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद अब पार्टी के अंदर ही सवाल उठने लगे है। पार्टी में हाशिए पर चले रहे नेताओं ने अब पार्टी के फैसलों के खिलाफ सवाल उठाना शुरु कर दिया है। पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया ने दतिया और बांकीपुर में भाजपा की हार के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स लिखा…आत्ममंथन का समय। इसके साथ 

वहीं दतिया में कांग्रेस की जीत के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक पत्र लिखा है। उन्होंने लिखा कि दतिया के जनादेश से यह साफ हो गया है कि जनता अब झूठे वादों की बजाय पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और ठोस परिणाम चाहती है। पटवारी ने प्रदेश की बुनियादी चुनौतियों पर सरकार से श्र्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।  

हार पर भाजपा की समीक्षा, बड़े एक्शन की तैयारी-दतिया विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब भाजपा बड़े एक्शन की तैयारी में है। हार के कारणों की समीक्षा को लेकर मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडलेवाल के नेतृत्व में मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में हार के कारणों की विस्तार से समीक्षा की गई। बैठक में भाजपा के चुनाव प्रभारी और सांसद  भारत सिंह कुशवाह, प्रत्याशी आशुतोष तिवारी सहित वह सभी मंत्री भी शामिल हुए जिन्हें भाजपा ने दतिया में विभिन्न मंडलों को जिताने की जिम्मेदारी सौंपी थी।

पार्टी सूत्रों के साथ बैठक में उपचुनाव में भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा सहित भाजपा के जिला पदाधिकारियों, पार्षदों की भूमिका की विस्तार से समीक्षा की गई। बताया  जा  रहा है कि बैठक में शामिल दतिया विधानसभा चुनाव से जुड़े सभी नेताओं ने हार की मुख्य वजह भितरघात को बताया। इसके साथ बैठक में पार्टी की चुनावी रणनीति और चुनावी मैनेजमेंट को लेकर भी सवाल उठाया गया।

इसके साथ वोटिंग के ठीक पहले पार्षद कल्लू कुशवाह के हत्याकांड की सीआईडी जांच को लेकर उसकी पत्नी के वायरल किए गए वीडियो और वोंटिग के दिन भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह को निष्कासन के फर्जी वायरल पत्र के चुनाव पर प़ड़े प्रभाव की समीक्षा की गई।

भितरघात भाजपा की हार की मुख्य वजह-दतिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार का बड़ा कारण पार्टी में जमकर भितरघात होना रहा। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के बाद दतिया की सड़कों पर जिस तरह से उनके समर्थकों ने बवाल काटा, उसने उपचुनाव में बीजेपी की हार की पूरी भूमिका तैयार कर दी थी। इसके बाद बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी की नामांकन रैली में जिस तरह से मंच पर नरोत्तम मिश्रा रोएं और पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह से टिकट कटने को लेकर पार्टी नेतृ्व्य पर इशारों ही इशारों में सवाल उठाए, उसका खामियाजा पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ा।

चुनाव परिणाम के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी को नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ के साथ दतिया भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह के पोलिंग बूथ पर भी कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा, यह इस बात का साफ इशारा है कि चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के खिलाफ जमकर भितरघात हुआ।

दतिया से खुलकर टिकट की दावेदारी करने वाले नरोत्तम मिश्रा के रोने का वीडियो जिस तरह से वोटिंग के ठीक पहले सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों के द्वारा वायरल किया गया और चुनाव में ‘बीजेपी को सबक सिखाने’ और ‘दादा के आंसुओं का बदला लेने’ के कमेंट किए गए उसने चुनाव में बीजेपी को हराने का काम किया। 

दतिया में पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के साथ बीजेपी के जिला पदाधिकारी अलग-थलग दिखाई पड़े और उन्होंने एक तरह से पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के विरोध में काम किया और अपने घर बैठ गए। दतिया बीजेपी जिला कार्यकारिणी के पदाधिकारी के साथ बीजेपी के पार्षद एक तरह से पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नदारद रहे। 

LIVE: पीएम मोदी की अध्यक्षता में एनडीए सांसदों की बैठक

PM Modi in NDA MP meeting

Latest News Today Live Updates in Hindi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में संसद में एनडीए सांसदों की बैठक हुई। पल पल की जानकारी…

-उत्तर प्रदेश के मथुरा में भारी बारिश के कारण सड़कों पर जलभराव हुआ।

-हरियाणा के अंबाला शहर के कई हिस्सों में बारिश हुई।

-राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कुछ हिस्सों में बरसा पानी।

-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्लियामेंट लाइब्रेरी बिल्डिंग में NDA पार्लियामेंट्री पार्टी की हर हफ़्ते होने वाली मीटिंग 'मंगल मिलन' के लिए पहुंचे।

-केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज लोकसभा में पास करने और विचार के लिए बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026, टैक्सेशन और अन्य कानून (संशोधन) बिल, 2026 पेश करेंगी।

-कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने नए दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा के लिए लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया।

बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत के क्या हैं मायने

prashant kishor

मनीष कुमार

प्रशांत किशोर (पीके) की बिहार के उपचुनाव में जीत पर फिलहाल उन्हें गेम चेंजर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तो साफ है कि बिहार की राजनीति करवट लेना चाह रही है। ALSO READ: दक्षिण कोरिया में गर्मी ने तोड़ा 100 साल का रिकॉर्ड

 

इस जीत का साफ संदेश है कि कुछ वोटर सिर्फ जातिगत समीकरण नहीं देख रहे, बल्कि उनकी नजर में मुद्दों, गवर्नेंस व विकास के साथ-साथ विकल्प भी अहमियत रख रहा है। साथ ही, यह भी तय है कि बतौर विधायक अब अकेले ही प्रशांत किशोर विधानसभा में गवर्नेंस के मुद्दे पर दबाव बनाए रखेंगे। अगर सब कुछ ठीक रहा तो एनडीए को मजबूरी मान रहे लोगों को उनकी पार्टी भी विकल्प के रूप में दिखेगी। भारत की राजनीति ने एक बार फिर चौंकाया है। 

 

बीजेपी की पारंपरिक सीट

बांकीपुर उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान हुआ था। इस बार 2025 के चुनाव की तुलना में यहां सात प्रतिशत कम वोटिंग हुई। पिछली बार यहां 41.39 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार 34.30 फीसदी वोटिंग हुई। 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मतदान का यह सबसे कम प्रतिशत है। एनडीए की तरफ से बीजेपी के नीरज सिन्हा और महागठबंधन की ओर से आरजेडी की रेखा गुप्ता सहित कुल 25 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।

 

बांकीपुर की यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी। यह बीजेपी की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। 1995 से यहां बीजेपी जीतती रही है। पहले पिता नवीन कुमार सिन्हा और फिर पुत्र नितिन यहां से लगातार जीतते रहे।

 

यहां से पांच बार लगातार जीतने वाले नितिन को इस बार भी पार्टी की जीत का इतना अधिक भरोसा था कि उन्होंने यहां तक कहा था कि बांकीपुर की जनता इस चुनाव में बीजेपी की जीत के नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। लेकिन अब, जब पीके ने बीजेपी के गढ़ में घुसकर सेंध लगा दी है।

 

राजनीतिक समीक्षक एके चौधरी कहते हैं, ‘‘बिहार में चुनाव में जाति ही जीत की गारंटी रही है। इसी समीकरण को देखकर पार्टियां टिकट भी देती रही हैं, यह इतनी जल्दी टूटने वाला नहीं है। हां, इतना जरूर है कि पीके की जीत से उन सुधारों की चर्चा अवश्य ही तेज होगी, जिससे संबंधित मुद्दे वे 2025 के चुनाव से उठा रहे। अब इन मुद्दों से अन्य पार्टियां भी मुंह नहीं मोड़ सकेंगी।'' ALSO READ: क्या हम फफूंद के खतरे को अब तक कम आंकते रहे हैं?

 

पीके पर भरोसा बढ़ेगा

प्रशांत किशोर की 'वोटकटवा' वाली छवि पर इसका असर पड़ेगा। 2025 के चुनाव में जनसुराज ने 238 सीट पर अपने प्रत्याशी खड़े थे, किंतु हालत इतनी खराब हुई कि 237 पर पार्टी के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। चौधरी कहते हैं, ‘‘पीके को पिछली बार ही चुनाव लड़ना चाहिए था। राघोपुर सहित अन्य सीटों से उनके चुनाव लड़ने की बात पहले सामने आई, किंतु अंतत: वे शायद हिम्मत नहीं जुटा सके, या यूं कहिए कि अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे। पार्टी के मुखिया की यह अनिश्चितता लोगों को शायद रास नहीं आई।''

 

विश्लेषकों का कहना है कि इस जीत से उनका मनोबल तो बढ़ेगा ही, साथ ही उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। आखिरकार, उन्हें चुनौतीपूर्ण लंबी लड़ाई जो लडऩी है। हालांकि बीजेपी के एक नेता कहते हैं, “और कारण जो भी रहे हों, पीके की जीत में भितरघात की भी बड़ी भूमिका रही। अन्यथा इतना अधिक मार्जिन नहीं रहता। निशाने पर कौन और क्यों था, आप समझ सकते हैं।”

 

बीजेपी के गढ़ में मिली यह जीत प्रशांत किशोर के लिए संजीवनी का काम करेगी। राजनीति विज्ञान की अवकाश प्राप्त प्रोफेसर श्यामली घोष कहती हैं, ‘‘अब उनकी शख्सियत केवल एक पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट की नहीं रह जाएगी, बल्कि वह राजनेता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। उनकी पार्टी के लिए अवसर बढ़ेंगे, लेकिन बहुत कुछ विधानसभा में उनके परफार्मेंस पर निर्भर करेगा, जिससे आम जनता को लगे कि उनकी बात दमदार तरीके से उठाने वाला कोई है, जिस पर कोई चर्चा नहीं होती।''

 

घोष के मुताबिक प्रशांत किशोर को सरकार के उन वादों को जोरदार तरीके से उछालना होगा, जिन पर काम नहीं हुआ या वे पूरे नहीं हुए। सरकार के आंकड़ों के खेल पर भी उन्हें सक्रिय रहना होगा। तभी उनकी पार्टी के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि बिहार में जातिगत रूढ़िवादिता को तोड़ना इतना आसान नहीं है।

 

श्यामली घोष यह भी कहती हैं, ‘‘यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे एनडीए की पार्टियों का कोर वोटर शिफ्ट हो रहा। हां, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि सवर्ण सहित इनका शहरी व मिडिल क्लास वोटर इनसे बिदक सकता है। मुझे नहीं लगता कि सम्राट सरकार पर कोई असर पड़ने वाला है।''

 

हालांकि, पीके एनडीए की हार का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर फोड़ने की कोशिश करते हुए उनसे नैतिक आधार पर इस्तीफे को लेकर तंज तो कसते रहेंगे। जनसुराज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने इसे जनता की जीत और बीजेपी की हार बताते हुए कहा, ‘‘बिहार में लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए इस जीत के बड़े मायने हैं।'' ALSO READ: अमेरिका-चीन के बीच तनाव, अमेरिका ने लगाया चीनी रोबोट पर प्रतिबंध

 

गठबंधनों को करना होगा आत्ममंथन

बिहार में पिछले कई दशकों से कोई भी पार्टी अकेले सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी है। जातिगत समीकरणों को देखते हुए गठबंधन उनकी मजबूरी बन जाती है। सत्ता पक्ष में बीजेपी, जेडीयू, चिराग पासवान की एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी), उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा) और जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) है तो विपक्ष में आरजेडी, कांग्रेस और माले सहित सात पार्टियां हैं। पिछले 21 सालों के अधिकांश समय में एनडीए सत्ता और आरजेडी विपक्ष में है। यह परिणाम इन दोनों गठबंधनों के लिए झटका तो है ही, साथ यह एक अवसर भी है।

 

श्यामली घोष कहती हैं, ‘‘अब समय आ गया है कि दोनों ही पक्ष आत्ममंथन करें। किसी वर्ग विशेष को अपनी जागीर का हिस्सा नहीं समझें। अपनी नीतियों तथा रणनीति की समीक्षा करें। क्योंकि, अगर एनडीए से शहरी वोटरों का मोहभंग दिख रहा है तो आरजेडी का माइ (मुस्लिम-यादव) समीकरण भी कहीं न कहीं दरक रहा।''

 

जेडीयू-आरजेडी में भी नेतृत्व के प्रति चुनौती बढ़ेगी। कांग्रेस प्रवक्ता असितनाथ तिवारी तो पहले ही कह चुके हैं कि बिहार में महागठबंधन को चलाने की जिम्मेदारी आरजेडी पर है, लेकिन इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने साथी दलों को साथ लेने की जरूरत ही नहीं समझी। हालांकि, आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया है।

 

इस खींचतान के बीच गठबंधन की पार्टियों में परिवर्तन के इच्छुक वोटर जनसुराज के प्रति आकर्षित तो हो ही सकते हैं। पटना के बोरिंग रोड निवासी वोटर राहुल कहते हैं, ‘‘परिवर्तन से ही बेहतर मिलता है। पहले विकल्प का अभाव था। लोग यह सोचते थे कि कहीं पहले वाली स्थिति ना लौट आए, इसलिए मजबूरी में वोट करते थे। स्वाभाविक है, जब विकल्प दिखेगा तो लोग आजमाएंगे ही। इसमें गलत क्या है।''

 

प्रशांत किशोर की जीत के फैक्टर अब चाहे जितने गिना लें, फिलहाल बीजेपी का यह भ्रम तो टूट ही गया कि वे बांकीपुर सीट से किसी को भी जीत दिला देंगे।