महिला आरक्षण का भी भरोसा

एसआईआर और परिसीमन के बाद भाजपा के चुनाव जीतने के भरोसे का एक आधार महिला आरक्षण की तैयारियां हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण का दांव 2034 के चुनाव के लिए रखा था। तभी 2023 में महिला आऱक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून को पास करते समय उसमें जनगणना और परिसीमन की शर्त जोड़ दी गई। लेकिन 2024 के चुनाव नतीजों के बाद अब सरकार को बेचैनी है कि परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों 2024 के चुनाव में ही लागू किया जाएगा। अगर परिसीमन का फैसला होता है और सीटों की संख्या बढ़ा कर साढ़े आठ सौ की जाती है तो उसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 33 फीसदी आरक्षण के अलावा भी अनारक्षित सीटों पर महिलाओं को टिकट मिलेगी। सो, महिला सदस्यों की संख्या 40 फीसदी तक जा सकती है।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय के अपने शासन में नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को एक अलग और स्वतंत्र वोट समूह के रूप में तैयार करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए कई काम किए हैं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पिछले दो दशक में महिलाओं की स्वतंत्र कांस्टीट्यूएंसी विकसित हुई है। अलग अलग राज्यों के नेताओं ने भी इसके लिए काम किया। बिहार में नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल आदि की मिसाल दी जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को अपने साथ जोडऩे के लिए काम किए। शौचालय की योजना से लेकर लखपति दीदी तक कई योजनाएं चलाई गईं।

लोकसभा और राज्यों के चुनाव के बाद पोस्ट इलेक्शन डेटा एनालिसिस में सीएसडीएस और अन्य एजेंसियों ने महिला वोट का जो आकलन किया है उसका निष्कर्ष यह है कि महिलाएं मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को अपेक्षाकृत थोड़ा ज्यादा वोट करती हैं। महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत भी हर चुनाव के साथ बढ़ रहा है। यह भी माना जा रहा है कि महिलाएं जाति के बंधन से निकल कर वोट कर रही हैं। तीन तलाक को अवैध करने के फैसले के बाद यह भी दावा किया जाता है कि मुस्लिम महिलाओं के भी कुछ वोट भाजपा को मिलते हैं।

अब भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लग रहा है कि अगर इस समय लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया जाए तो कम से कम एक चुनाव में तो महिलाओं का वोट थोक में हासिल किया जा सकता है। हालांकि यह भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार की सदिच्छा है, जो हो सकता है कि पूरी नहीं भी हो। कई बार इस तरह के दांव उलटा पड़ जाते हैं। कांग्रेस जब केंद्र में थी तब उसने 2014 के चुनाव से ठीक पहले आंध्र प्रदेश का विभाजन यह सोच कर किया था कि इससे 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी खत्म होगी और अगर आंध्र में नहीं तो नए राज्य तेलंगाना में तो कांग्रेस जरूर जीत जाएगी। लेकिन अगले दो चुनाव तक वह तेलंगाना तो नहीं ही जीती, आंध्र प्रदेश से साफ अलग हो गई। तीन चुनाव से आंध्र में कांग्रेस का खाता नहीं खुल रहा है।

बहरहाल, भाजपा और नरेंद्र मोदी एसआईआर के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में हैं। इससे भरोसा बना है कि 2029 हर हाल में जीतेंगे। विपक्ष महिला आरक्षण के समर्थन में है। लेकिन उसकी कई पार्टियां आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि अगर महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण नहीं मिला तो संभव है कि लोकसभा और विधानसभाओं में इन जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व कम हो। अगर यह मुद्दा बनता है तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। वैसे भाजपा अब कांग्रेस व अन्य प्रादेशिक पार्टियों से ज्यादा जातीय मामलों की चैंपियन बन गई है। हिदुत्व से ज्यादा भाजपा नेता अब जाति की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी को ओबीसी और एससी, एसटी का नया मसीहा बनाया जा रहा है।

वोट बंटवारे का नगांव व रेजिनगर मॉडल

एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद भाजपा को यह उम्मीद है कि विपक्ष का वोट बंटेगा, जिसका लाभ उसको मिलेगा। भाजपा के इस भरोसे को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट और असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव को मॉडल की तरह देखा जा सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में नगांव सीट कांग्रेस ने जीती थी। लेकिन उसके सांसद प्रद्योत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इसलिए वहां उपचुनाव हुआ। ऐसे ही रेजिनगर की सीट हुमायूं कबीर ने जीती थी। वे दो सीटों से जीते थे इसलिए उन्होंने रेजीनगर से इस्तीफा दिया। नगांव में 55 से 60 फीसदी औऱ रेजिनगर में करीब 70 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। इसके बावजूद दोनों सीटों पर भाजपा जीती।

नगांव लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार को करीब 50 फीसदी वोट मिले और रेजिनगर में करीब 60 फीसदी वोट मिला। भाजपा ने हुमायूं कबीर के बेटे को 75 हजार वोट से हराया। नगांव लोकसभा सीट पर वोट बंटवारा एक बड़ा फैक्टर रहा। वहां ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता बदरूद्दीन अजमल चुनाव लड़े थे। मुस्लिम मतदाता उनके पक्ष में एकजुट हुए फिर भी कांग्रेस को सवा लाख के करीब वोट मिला। जीत हार का अंतर डेढ़ लाख के करीब वोट का था। तभी माना जा रहा है कि अगर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर लड़तीं तो शायद भाजपा नहीं जीत पाती। रेजिनगर का मामला अलग है। वहां विपक्ष के सभी उम्मीदवारों को मिला कर भी उतना वोट नहीं आया, जितने वोट से भाजपा जीती।

सो, ये दोनों मॉडल हैं। रेजिनगर में कहा गया कि राज्य के मुस्लिम मतदाता भी लेफ्ट और तृणमूल के शासन से ऊबे हुए थे और उनको भी विकास, रोजगार वाली राजनीति पसंद आ रही है। इसलिए मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट दिया। नगांव का मॉडल विपक्ष के वोट बंटवारे का है। भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ेगा। पिछली बार यानी 2024 में विपक्ष एकजुट होकर लड़ा था तो संगठन और नैरेटिव दोनों की साझा ताकत के दम पर उसने भाजपा को बहुमत से नीचे ला दिया था। आजादी के बाद पहली बार इतना मजबूत विपक्ष जीत कर आया। लेकिन उसके बाद अलग अलग कारणों से बिखराव है। आम आदमी पार्टी, डीएमके आदि अलग रास्ते पर चल रहे हैं। अगर ये सभी पार्टियां साथ नहीं आती हैं तो भाजपा विरोधी वोट बंटेगा। विपक्ष के अंदर विभाजन बढ़ाने के लिए भाजपा की ओर से भी साम, दाम, दंड और भेद सारे उपाय किए जाते हैं।

इस बीच मुस्लिम नेताओं की पार्टियां भी चुनाव लड़ेंगी। मुस्लिम नेताओं ने अपनी जिस तरह की छवि बनाई है या विपक्षी पार्टियों ने उनके बारे में जिस तरह के प्रचार किए हैं उसके बाद यह संभावना कम है कि विपक्ष के साथ उनका तालमेल होगा। चाहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी हो या बदरूद्दीन अजमल की पार्टी हो या हुमायूं कबीर और नौशाद सिद्दीकी पार्टी हो। इनका तालमेल मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियों के साथ नहीं होगा। ऐसे में ये पार्टियां अलग चुनाव लड़ेंगी। इनकी वजह से भी वोट का बंटवारा होगा, जिस लाभ भाजपा को मिल सकता है।

Yogi Adityanath Popularity Survey: यूपी में आज चुनाव हुए तो सीएम पद के लिए योगी आदित्यनाथ कितने लोकप्रिय?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद और उनकी लोकप्रियता एक बार फिर बुलंदियों पर नजर आ रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर न्यूज 18 की ओर से कराए गए मेगा ओपिनियन पोल में मुख्यमंत्री पद की पसंद, सरकार के कामकाज और जनता के मूड को लेकर बेहद चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ इस पद की रेस में अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे नजर आ रहे हैं।

सर्वे: सीएम पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ सबसे आगे, अखिलेश यादव काफी पीछे

सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य के मतदाताओं के बीच फिर से सत्ता की कमान संभालने के लिए सबसे पसंदीदा चेहरा बने हुए हैं। सर्वे में शामिल कुल लोगों में से 66.2% लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त और योग्य उम्मीदवार माना है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस मुकाबले में काफी पीछे छूटते नजर आए। उन्हें सिर्फ 24.4% लोगों का समर्थन मिला। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती को मात्र 5% लोगों ने पसंद किया है जबकि चंद्रशेखर आजाद को 1.8% उत्तरदाताओं का समर्थन हासिल हुआ।

विपक्षी दलों के वोटर्स के बीच भी है सीएम योगी का प्रभाव

इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आकर्षण सिर्फ एनडीए के पारंपरिक मतदाताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के कैडर में भी उनकी स्वीकार्यता है। सर्वे के अनुसार, सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन करने वाले 11.7% मतदाताओं ने भी यह माना कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। इसके अलावा बसपा समर्थकों में से भी 10.2% लोगों ने सीएम योगी के पक्ष में अपनी पसंद जाहिर की है।

बीजेपी की बंपर बढ़त और वोट शेयर का अनुमान

अगर उत्तर प्रदेश में आज विधानसभा चुनाव आयोजित कराए जाते हैं, तो सर्वे के नतीजे एक बार फिर बीजेपी के लिए भारी बहुमत की ओर इशारा करते हैं। सर्वे के अनुसार, एनडीए को 66.6% वोट शेयर मिलने का अनुमान है। वहीं, 66.6% लोगों का यह भी मानना है कि अगली सरकार भी बीजेपी ही बनाएगी और 65.2% जनता चाहती है कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरे कार्यकाल (हैट्रिक) के लिए मौका मिलना चाहिए। सपा-कांग्रेस के गठबंधन को 26.4% वोट शेयर मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि 26.5% लोगों ने इनके सरकार बनाने की उम्मीद जताई है। बीएसपी को 5.4% वोट शेयर मिलने का अनुमान है।आपको बता दें कि यह सर्वे उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 18 वर्ष से अधिक आयु के 30925 लोगों के बीच 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के दौरान किया गया था।

UP Election Survey: यूपी में आज हुए चुनाव तो क्या Gen-Z वोटर पलटेंगे बाजी? जानिए इस मेगा सर्वे में क्या पता चला

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक हलचल अभी से तेज हो गई है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल की है। एक बार फिर सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी तीसरी बार यूपी की सत्ता पर दावेदापी पेश कर रही है। ऐसे में प्रदेश की जनता का मूड, युवाओं की भूमिका और सरकार के कामकाज को लेकर न्यूज 18 ने Pvalue Analytics के सहयोग से ने सबसे बड़ा ओपिनियन पोल पेश किया है। हाल के दिनों युवाओं और छात्रों (Gen-Z) के आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों की चर्चा के बीच इस मेगा सर्वे में एक बड़ा सवाल पूछा गया कि क्या आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में Gen-Z यानी युवा मतदाता बाजी पलटने में मुख्य भूमिका निभाएंगे? इस पर उत्तर प्रदेश की जनता ने बेहद दिलचस्प और स्पष्ट राय दी है।

56% लोगों का मानना: Gen-Z वोटर निभाएंगे सबसे बड़ी भूमिका

न्यूज 18 के मेगा सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक आधे से अधिक यानी 56% उत्तरदाताओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में Gen-Z मतदाता निर्णायक और प्रमुख भूमिका निभाएंगे। इसके उलट सिर्फ 16.2% लोगों का मानना है कि चुनाव में युवाओं का कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा। सर्वे में यह भी सामने आया कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए (BJP/NDA) के समर्थकों में यह आंकड़ा अधिक है क्योंकि वे बेहतर शिक्षित हैं और राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक नजर आते हैं। वहीं 14.2% लोगों ने स्वीकार किया कि वे Gen-Z शब्द या इसके कॉन्सेप्ट को नहीं जानते।

सर्वे: 77% लोग योगी सरकार से संतुष्ट, सीएम पद की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ

सर्वे में राज्य सरकार के प्रदर्शन और नेतृत्व को लेकर भी जनमत का आकलन किया गया। ओपिनियन पोल में शामिल 77.1% लोग योगी आदित्यनाथ सरकार के अब तक के कामकाज और प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट हैं। अगले मुख्यमंत्री के रूप में 66.2% मतदाताओं की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ हैं। 65.2% लोगों का मानना है कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक बनाते हुए तीसरा कार्यकाल दिया जाना चाहिए।

सपा-कांग्रेस गठबंधन 26.4% वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) 5.4% वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर सिमटती नजर आई। आपको बता दें कि न्यूज 18 का यह ओपिनियन पोल 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच किया गया था। इसमें यूपी के सभी 75 जिलों से 30925 लोगों की राय ली गई।

UP Election Survey: यूपी में अभी चुनाव हुए तो किसकी बनेगी सरकार? ओपिनियन पोल में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

उत्तर प्रदेश की सियासत को लेकर देश के सबसे बड़े ओपिनियन पोल के आंकड़े सामने आ चुके हैं। हमारे सहयोगी न्यूज 18 द्वारा कराए गए इस सर्वे में राज्य की भावी राजनीतिक दिशा, मुख्यमंत्री पद की पसंद और योगी सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा जनता की राय के आधार पर पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में 30925 के बीच किए गए इस ओपिनियन पोल के नतीजे बताते हैं कि राज्य में आज विधानसभा चुनाव होते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) विपक्ष के इंडिया गठबंधन पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। हालांकि आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन भी युवाओं और आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों के बीच अपनी पैठ मजबूत कर रहा है।

सत्ता की हैट्रिक की ओर बीजेपी/एनडीए, सपा-कांग्रेस गठबंधन दूसरे नंबर पर

ओपिनियन पोल में जब लोगों से पूछा गया कि आज चुना हुए तो वो किसे वोट देना पसंद करेंगे, तो बीजेपी/एनडीए को 66.6% फीसदी लोगों ने अपनी पहली चॉइस बताया। सपा-कांग्रेस गठबंधन 26.4% वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) 5.4% वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर सिमटती नजर आई। यानी ओपिनियन पोल में ये बात साफ समझ में आई कि सीएम योगी के नेतृत्व में एनडीए चुनावों में हैट्रिक लगा सकता है।

सीएम पद की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ, 77% लोग कामकाज से संतुष्ट

योगी आदित्यनाथ सरकार का प्रदर्शन और उनका नेतृत्व बीजेपी की इस बढ़त का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। सर्वे के मुताबिक ओपनियन पोल में शामिल 77.1% लोग योगी सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट हैं, जबकि केवल 13.5% लोगों ने असंतोष जताया है। अगले मुख्यमंत्री के रूप में 66.2% लोगों की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ हैं। वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को 24.4% लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

विपक्ष की वापसी और मतदाताओं का रुझान

सर्वे से यह भी संकेत मिलता है कि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में सपा-कांग्रेस गठबंधन के जनाधार में क्रमशः 3.7% और 2.4% की बढ़त देखने को मिली है। यह रुझान मुख्य रूप से युवाओं, बेरोजगारों, पेपर लीक/जेन-जी विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित लोगों और पूर्वी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है। हालांकि ओपिनियन पोल के मुताबिक बीजेपी न सिर्फ अपने 91% पुराने मतदाताओं को बरकरार रखने में सफल रही है, बल्कि 2024 में वोट न देने वाले 53.0% नए मतदाताओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

कैसा रहा इस ओपिनियन पोल का सर्वे सैंपल?

न्यूज 18 द्वारा कराए गए इस व्यापक ओपिनियन पोल का सर्वे 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच आयोजित किया गया था। उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों से 30925 लोगों की राय ली गई।

‘अमित शाह की पुलिस’ की बर्बरता को अनदेखा नहीं किया जाएगा: राहुल गांधी

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई में कई विद्यार्थियों के घायल होने का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि ‘‘अमित शाह की दिल्ली पुलिस की बर्बरता को अनदेखा नहीं किया जाएगा’’ और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ हर कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा।

गांधी ने इन विद्यार्थियों से हाल ही में हुई मुलाकात का एक वीडियो ‘एक्स’ पर साझा किया। इनमें कुछ का संबंध कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से है। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने केरल की अथिरा और राजस्थान की रितु समेत कई विद्यार्थियों की पिटाई की, लेकिन इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार किया जा रहा है।

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला और राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से बात की तथा उनसे संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ अपने यहां मामला दर्ज कराने के लिए कहा।

उन्होंने कहा कि केरल में पहले ही ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज की जा चुकी है और घटना के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केरल, राजस्थान तथा अदालतों में उपलब्ध सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किया जाएगा। गांधी ने कहा अमित शाह की दिल्ली पुलिस की बर्बरता को अनदेखा नहीं किया जाएगा।’’

कांग्रेस नेता ने इस घटना की तुलना 1930 के धरासणा सत्याग्रह से भी की और कहा कि उस समय सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में निहत्थे सत्याग्रहियों ने पुलिस की लाठियों का सामना किया था, लेकिन उनमें से किसी ने जवाब में हाथ नहीं उठाया और पूरी दुनिया ने इसे देखा था। उन्होंने कहा पुलिस हड्डियां तोड़ सकती है, सत्याग्रह नहीं।’’

गांधी ने कहा कि देश के युवा, विशेषकर युवतियां निडर, दृढ़ और एकजुट’’ हैं तथा लोकतंत्र के लिए खड़े हो रहे हैं। उन्होंने कहा मैं उनके साथ खड़ा हूं।

Pic Credit : UNI

सचाई झुठलाने की सरकारी कोशिश

क्या दिल्ली में 10 अक्टूबर को मेट्रो की सेवा नहीं बंद थी? क्या मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली नीट की परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए थे? क्या नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जिन परीक्षाओं का आयोजन कराती है उनमें से पिछले नौ साल में किसी परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए हैं? राजधानी दिल्ली में या दूसरे भी किसी शहर में किसी भी नागरिक से ये सवाल पूछेंगे तो उसका जवाब यही होगा कि मेट्रो बंद थी और पेपर लीक हुए हैं। दिल्ली और एनसीआर में रहने वाला हर व्यक्ति निजी अनुभव से जानता है कि मेट्रो की सेवा बंद थी। जहां तक इंटरनेट सेवा की बात है तो उस पर तो एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट गुरुवार, 15 अक्टूबर को ही छपी है, जिसके मुताबिक पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद होने के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर सैनिक तानाशाही वाला देश म्यांमार है। सो, मेट्रो बंद थी और इंटरनेट भी बंद थे।

परंतु दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। उसने कहा है कि सिर्फ 45 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद किया गया था। यानी मेट्रो की सेवा सीमित की गई थी। सोचें, कितना आसान है सरकार के लिए यह कह देना! 45 मेट्रो स्टेशनों पर लोग अंदर नहीं जा सकते थे और न बाहर निकल सकते थे। फिर यह सेवा सीमित करना कैसे हुआ? जिन लोगों को इन 45 मेट्रो स्टेशनों पर ट्रेन पकड़नी थी या इन स्टेशनों पर उतरना था उनके लिए तो मेट्रो बंद ही हुई न! सो, लाखों लोगों के लिए मेट्रो की सेवा बंद थी। सरकार एक तकनीकी टर्म का इस्तेमाल करके अदालत को बता रही है कि उसने अदालत की अवमानना नहीं की है। वास्तव में 10 और 11 अक्टूबर को कई इलाकों में मेट्रो बंद थी और ऐसा नहीं था कि मेट्रो ने स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद की तो यात्रियों के लिए कोई और बंदोबस्त किया। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचाने के लिए कोई फीडर बस सेवा नहीं चलाई गई थी। इसलिए यह कहना सरासर गलत है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। यह हलफनामा देकर झूठ बोलना है।

ऐसे ही एक रिपोर्ट आई है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए ने शिक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने कहा है कि 2017 में एनटीए के गठन के बाद से आज तक कोई पेपर लीक नहीं हुआ है। यह झूठ नहीं, बल्कि सफेद झूठ है। कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने एनटीए ने कहा कि कुछ अनियमितता का शिकायत हुई है लेकिन पेपर लीक नहीं हुआ है। सवाल है कि तीन मई 2026 को हुई नीट की परीक्षा को क्यों रद्द किया गया? सात मई को पेपर लीक होने की खबर आई और 12 मई को एनटीए ने परीक्षा रद्द दी, जिसका आयोजन 21 जून को किया गया। एनटीए और शिक्षा मंत्रालय दोनों की ओर से कई बार कहा गया कि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द हुई है। इस बार तो किसी और धांधली या अनियमितता की खबर भी नहीं थी। इसी तरह 2024 के नीट की परीक्षा पेपर लीक और धांधली दोनों कारणों से प्रभावित हुई थी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कई जगह परीक्षा रद्द की गई। उसके बाद पेपर लीक रोकने का एक कानून बना। जिस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने कानून बनाया उसमें अनियमितता को ‘पेपर लीक केस’ के तौर पर दर्ज किया गया। सोचें, नीट परीक्षा को लेकर 356 केस दर्ज हैं, जेईई मेन्स के 31, यूजीसी नेट के 26 और सीयूईटी यूजी के 14 केस दर्ज हैं। पर एनटीए कह रहा है कि सब कुछ ठीक है!

गोवा फॉरवर्ड पार्टी का मोहभंग हो गया!

गोवा में गठबंधन की नई तस्वीर बन रही है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने गोवा की राजनीति में हलचल मचा दी थी। उन्होंने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ अलायंस बना कर इसका ऐलान कर दिया था। एक बड़े कार्यक्रम में गोवा फॉरवर्ड पार्टी के नेता विजय सरदेसाई केसाथ केजरीवाल ने मीडिया से बात की और ‘गोवा फर्स्ट’ अलांयस का ऐलान किया। गौरतलब है कि पहले गोवा फॉरवर्ड पार्टी यानी जीएफपी कांग्रेस के साथ थी। इस गठबंधन को कांग्रेस के लिए झटका माना गया। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि विजय सरदेसाई का मोहभंग हो रहा है या उनको गोवा की राजनीति की वास्तविकता का अंदाजा हो रहा है।

विजय सरदेसाई ने अब ‘गोवा फर्स्ट’ की बजाय ग्रैंड अलायंस की बात शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि वे चाहते हैं कि इस गठबंधन में कांग्रेस को भी रखा जाए। हालांकि कांग्रेस किसी हाल में आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल नहीं करेगी। इसका कारण पंजाब का चुनाव है। अगर कांग्रेस और आप ने तालमेल किया तो पंजाब में कांग्रेस की उम्मीदें पंक्चर होंगी। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल चाहेंगे कि ग्रैंड अलायंस बन जाए। उनको इसका गोवा में तो लाभ होगा ही पंजाब में ज्यादा फायदा हो जाएगा। 2021 में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट से तालमेल किया था, जिसका बड़ा नुकसान उसको केरल में उठाना पड़ा था। वैसे ही अगर इस बार कांग्रेस ने गोवा में आप से तालमेल किया तो पंजाब में नुकसान होगा। तभी कांग्रेस नेता विजय सरदेसाई के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह संभव है कि वे केजरीवाल से तालमेल तोड़ें तब कांग्रेस से उनका गठबंधन हो सकता है।

केटीआर ने राहुल की पोल खोली

एक तरफ राहुल गांधी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को अलोकतांत्रिक और मनमानी करने वाला बता रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ प्रादेशिक पार्टियां कांग्रेस की सरकारों पर ठीक इसी तरह के आरोप लगा रही हैं। कर्नाटक में भाजपा और जेडीएस ने राज्य सरकार के मनमाने तरीके से काम करने और तानाशाही के आरोप लगाए हैं तो तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति ने भी इसी तरह के आरोप लगाए हैं। इनमें से सबसे बड़ा मामला तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के बेटे केटी रामाराव का है। केटी रामाराव ने तेलंगाना सरकार के ऊपर गंभीर आरोप लगाए हैं और राहुल गांधी पर भी निशाना साधा है। इसे लेकर दो बातें कही जा रही हैं। पहली बात तो यह है कि केटीआर प्रदेश की राजनीति में अपनी पार्टी को मुख्य विपक्ष बनाए रखना चाहते हैं। उनको भाजपा की चिंता है। दूसरी बात यह है कि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर राहुल को कठघरे में खड़ा करके भाजपा से नजदीकी बना रहे हैं।

बहरहाल, केटीआर ने राहुल के ऊपर दोहरा रवैया अपनाने के आरोप लगाए हैं। केटीआर ने अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में राहुल को ‘कावर्ड, बुली एंड अनडेमोक्रेटिक’ कहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ‘राहुल की कठपुतली रेवंत एनार्की’ कर रहा है। केसीआर के बेटे केटीआर का कहना है कि राहुल गांधी वोट चोरी के आरोप लगा कर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने ‘वोट फॉर नोट पेडलर’ को तेलंगाना का मुख्यमंत्री बना कर रखा हुआ है। उनका निशाना रेवंत रेड्डी पर था। केटीआर ने एक घटना का हवाला देते हुए कहा कि उनकी पार्टी के नेता कृशंक माने ने कांग्रेस के अनुमुल्ला परिवार के भ्रष्टाचार पर सवाल किया तो उनको गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि राहुल किसी पर कोई भी आरोप लगाते हैं। केटीआर ने यह भी कहा कि राहुल भारतीय संविधान का मजाक बना रहे हैं।

वोटर लिस्ट पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, यूपी-पंजाब समेत 17 राज्यों में होगा SSR

Voter List Revision: वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने या उसमें किसी तरह का बदलाव कराने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए अहम खबर है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। गुरुवार को जारी नोटिस के मुताबिक, इन जगहों पर स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देशभर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद चल रहा है।

इस प्रक्रिया के दायरे में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा समेत 17 राज्य शामिल हैं। चुनाव आयोग ने इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के तहत मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करने का निर्देश दिया है।

आयोग ने इस प्रक्रिया के लिए 1 जनवरी 2027 को पात्रता की तारीख तय किया है।

इस पुनरीक्षण (रिवीजन) में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल होंगे।

यह अधिसूचना तब आई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के नौ अन्य नेताओं द्वारा दायर एक याचिका पर ECI (चुनाव आयोग), CEC ज्ञानेश कुमार, और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को चुनौती दी गई है।

आयोग ने कहा है कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) चल रहा है या हाल ही में पूरा हुआ है, वहां SSR (स्पेशल समरी रिवीजन) का कार्यक्रम बाद में घोषित किया जाएगा।

बता दें कि यह याचिका 12 अक्टूबर को गांधी के नेतृत्व में विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए मार्च के बाद दायर की गई है, जो SIR (विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया के खिलाफ था।

खड़गे, अखिलेश और तेजस्वी समेत कई विपक्षी नेताओं ने दायर की याचिका

इस याचिका को गांधी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, तृणमूल कांग्रेस नेता सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, RJD नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता एम.ए. बेबी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की सुप्रिया सुले, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के नेता मोहम्मद बशीर, विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री सज्जाद अहमद किचलू ने दायर किया है।

इसमें SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई है। साथ ही, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने, हटाए गए मतदाताओं का विवरण जारी करने, मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय करने और नाम वापस जोड़ने के लिए एक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

नेताओं ने वोटर लिस्ट ने संशोधन प्रक्रिया के न्यायिक ऑडिट की भी मांग की और यह भी कहा कि जब तक इस मामले पर कोई फैसला नहीं आ जाता, तब तक सभी राज्यों में यह प्रक्रिया रोक दी जानी चाहिए।

इससे पहले, विपक्षी नेताओं ने SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं जताने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने के लिए CJI सूर्य कांत से मिलने का समय मांगा था। लेकिन CJI ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि ये मुद्दे पहले से ही कोर्ट के सामने लंबित हैं, इसलिए नेता न्यायिक कार्यवाही के जरिए राहत मांग सकते हैं।

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