पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने पहली बार ‘मक्का पैक्ट’ एक्टिवेट कर दिया है। 2 महीने पहले हुए करार के तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। यानी, अब हूतियों से जंग में उलझे सऊदी की मदद के लिए पाक-तुर्किये को सेनाएं भेजनी पड़ेंगी। आखिर मदद मांगने को कैसे मजबूर हुआ सऊदी, क्या वाकई दूसरे देश के लिए लड़ेंगी पाकिस्तान-तुर्किये की सेनाएं और क्या इससे भारत को चिंता करनी चाहिए; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हूतियों ने सऊदी अरब को मदद मांगने पर कैसे मजबूर किया? जवाब: सऊदी अरब के पड़ोस में है यमन। यहां की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती। यमन की मान्यता प्राप्त सरकार को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। सऊदी के जवान सरकार की सेना के साथ मिलकर कई इलाकों में डेरा डाले हुए हैं। वहीं सरकार के खिलाफ विद्रोह करके यमन के उत्तर-पश्चिम इलाके, राजधानी सना और लाल सागर के तटीय इलाके में हूतियों का कब्जा है। इन्हें ईरान से हथियार और पैसे की मदद मिलती है। 2015 से ही हूतियों और सऊदी समर्थित यमन की सेना में इलाकों पर कब्जे को लेकर छिटपुट संघर्ष चलता रहा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने सीजफायर करवाया। बीते साल शुरू हुई ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ईरान ने अमेरिका के सहयोगी सऊदी पर भी हमले किए। हूतियों ने भी कई बार सऊदी पर हमला करने की धमकी दी। 5 अगस्त 2026 को हूतियों ने सऊदी समर्थित यमन सेना के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए. हूतियों ने आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना जमावड़ा बढ़ा रही थी। इसी के साथ 4 साल पुराना सीजफायर टूट गया… सवाल-2: पाकिस्तान ने पहले टाला, फिर जमीनी सेना भेजने को क्यों तैयार हुआ? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने पर कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’ पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें थीं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमेट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट प्रतीकात्मक है, क्योंकि इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं है। तुर्किये और पाकिस्तान का सीधे टकराव में शामिल होना मुश्किल है। 2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान, अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका में है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ने से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती थी। 3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान में शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी थी, तब भी पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ इधर 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा था। ट्रम्प ने मदद ठुकरा दी। फिर 15 सितंबर को हूतियों और अमेरिका में सीक्रेट मीटिंग हुई, जिसमें हूतियों ने वादा किया कि वो लाल सागर में अमेरिका और इजराइल के जहाजों पर हमला नहीं करेंगे। इससे सऊदी को अमेरिकी मदद मिलने की उम्मीद और कम हो गई। सऊदी ने दावा किया कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने सऊदी के पवित्र शहर मक्का की तरफ ड्रोन छोड़े। हूतियों के प्रवक्ता याह्या सिरी का कहना था, ‘हमारा निशाना सऊदी के तेल और सैन्य ठिकाने थे, जो कि पवित्र स्थलों से काफी दूर हैं।’ हालांकि ड्रोन को रोकने के दौरान मक्का प्रांत के ताइफ शहर में एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। इसके बाद पाकिस्तान का रुख बदलने लगा… सवाल-3: तो क्या वाकई पाक-तुर्किये की सेनाएं हूतियों से लड़ेंगी? जवाब: साझा बयान में कहा गया है, ‘तीनों देश सऊदी में ‘तेजी से’ जॉइंट फोर्सेज और दूसरी ताकत (यानी हथियार, इंटेलिजेंस वगैरह) तैनात करेंगे।’ हालांकि पाकिस्तानी सैनिकों का सऊदी जाना नई बात नहीं है…. वहीं तुर्किये के विदेश मंत्री फिदान ने कहा है कि मक्का पैक्ट, नाटो की तरह काम करेगा, लेकिन मदद का पैमाना आगे की बातचीत से तय होगा। तुर्किये के सामने अपनी सेना भेजने में एक अड़चन ये भी है कि उसके कानून के तहत विदेश में सेना भेजने के लिए संसद की मंजूरी लेनी होगी। 5 अक्टूबर के फैसले में भी कहा गया है कि सऊदी की मदद में सेनाओं की तैनाती तीनों देशों के राष्ट्रीय कानूनों और आपसी सहमति के आधार पर होगी। सवाल-4: पाकिस्तान-भारत जंग छिड़ी, तो क्या तुर्किये-सऊदी भी लड़ने आएंगे? जवाब: सऊदी और तुर्किये भारत को दुश्मन नहीं मानते, इसलिए जंग में उनके हमले की आशंका बेहद कम है। लेकिन 3 बातें गौर करनी चाहिए… पाकिस्तान पैक्ट का फायदा उठाएगा: कार्नेगी इंडिया थिंकटैंक में सिक्योरिटी स्टडीज प्रोग्राम के फेलो दिनकर पेरी के मुताबिक, ‘यह पैक्ट पश्चिम एशिया के लिए बना है, लेकिन पाकिस्तान इसे भारत के साथ संघर्षों में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद बनी हालात के चलते।’ सऊदी भारत पर हमला नहीं करेगा: भारत और सऊदी अरब के अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं। सऊदी और भारत में सालाना 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। सऊदी-पाकिस्तान से यह 5 बिलियन डॉलर से भी कम है। इसलिए पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी कहते हैं, ‘अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करे या ऑपरेशन सिंदूर जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो, तो सऊदी पाकिस्तान का रक्षक बनकर नहीं आएगा।’ तुर्किये हथियार सप्लाई जारी रखेगा: रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को 350 से ज्यादा ड्रोन्स भेजे थे। पाकिस्तान के समर्थन में स्टेटमेंट जारी किया था। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया के मुताबिक, ‘इस पैक्ट से भारत-पाकिस्तान की स्थिति नहीं बदलेगी। तुर्किये पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करता रहेगा और सऊदी खुद को पाकिस्तान का समर्थक दिखाने से बचेगा।’ सवाल-5: भारत के पास इस नई चुनौती की क्या काट है? जवाब: भारत की सबसे बड़ी काट उसके खाड़ी देशों से डिप्लोमैटिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। खाड़ी देशों में 89 लाख भारतीय रहते हैं। भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। सऊदी अरब अपना करीब 16% तो UAE करीब 11% कच्चा तेल भारत को बेचता है। मई 2026 में ही भारत ने UAE के साथ रक्षा समझौता किया है। यह रिश्ते और मजबूत किए जा सकते हैं… ——– ये एक्सप्लेनर भी पढ़िए… पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ऑनलाइन फॉर्म-6 में अवैध और एकतरफा बदलाव किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पद का दुरुपयोग कर भारतीय जनता पार्टी की मदद की है।
श्री गांधी ने सोमवार को सोशल मीडिया एक्स पर कहा “अब यह स्पष्ट हो गया है कि श्री ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म-6 में अवैध और एकतरफा बदलाव किया है और यह बदलाव स्पष्ट रूप से भाजपा की मदद के लिए किया गया। यह उनके पद के दुरुपयोग का एक और प्रमाण है। इस मामले की साजिश में शामिल सभी लोगों को ‘वोट चोरी’ के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि ऑनलाइन फॉर्म-6 में अवैध बदलाव की बात चुनाव आयोग के अपने आयुक्तों ने भी दर्ज की है। उन्होंने कहा कि यह भी सामने आना चाहिए कि चुनाव आयोग में किसके आदेश पर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) से यह बदलाव कराया । श्री गांधी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार और इस मामले में शामिल अन्य सभी लोगों को लोकतंत्र पर किए गए इस कथित आपराधिक प्रहार के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा।
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श्री गांधी ने अपने पोस्ट में 26 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से जारी स्पष्टीकरण भी साझा किया है जिसमें कहा गया था कि एसआईआर की अवधि के लिए फॉर्म-6 के साथ संलग्न घोषणा को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा है। आयोग ने कहा था कि गैर-एसआईआर अवधि में नियमों के अनुसार लागू फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा।
गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर कोई एकतरफा अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि वह मतदाता सूची के एसआईआर से जुड़े अहम फैसले, मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा लिये जाने के आरोपों पर पहले चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों का पक्ष सुनेगा।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेब्रास्का के ग्रैंड आइलैंड में एक चुनावी रैली को ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के सैन्य अभियान को वैश्विक बचाव अभियान के रूप में पेश करने के लिए इस्तेमाल किया और कहा कि यह संघर्ष जल्द ही समाप्त हो जाएगा।
श्री ट्रंप ने कहा हम पश्चिम एशिया, इजरायल और हर कोई पूरी दुनिया को एक ऐसी स्थिति से बचा रहे हैं, जो अब तक की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक हो सकती थी।
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उन्होंने एक बार फिर जोर देकर कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने सैन्य अभियान को लेकर और अधिक आक्रामक अंदाज में कहा, “वैसे, हम ईरान की जमकर धुनाई कर रहे हैं। आप जानते हैं, है न? यह किसी न किसी तरह खत्म होगा। यह बहुत जल्द खत्म होने वाला है।
श्री ट्रंप ने अमेरिका में कीमतों में कमी को भी युद्ध की समाप्ति से जोड़ा और कहा और आपकी कीमतें कम होने वाली हैं।
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आरबीआई 7 अक्तूबर यानी बुधवार को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी का ऐलान करेगा। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) की मीटिंग 5 अक्तूबर को शुरू हुई। इसके नतीजे बुधवार को आएंगे। सवाल है कि क्या केंद्रीय बैंक इसमें रेपो रेट बढ़ाने का ऐलान करेगा?
रेपो रेट एक चौथाई-फीसदी बढ़ सकता है
इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि RBI 7 अक्तूबर को रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट्स यानी एक चौथाई-फीसदी बढ़ा सकता है। इसकी वजह यह है कि रिटेल इनफ्लेशन लगातार बीते कई महीनों से केंद्रीय बैंक के 4 फीसदी के तय लक्ष्य से ऊपर बना हुआ है। मध्यपूर्व में अमेरिका-ईरान की लड़ाई की वजह से क्रूड की कीमतों में उछाल आया है। इसने इनफ्लेशन पर दबाव बढ़ाया है।
फेडरल रिजर्व ने बढ़ाया था इंटरेस्ट रेट
एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स में ग्लोबल चीफ इकोनॉमिस्ट्स पॉल ग्रुएनवाल्ड ने कहा कि आरबीआई उन केंद्रीय बैंकों की लिस्ट में शामिल है सकता है, जिन्होंने महंगाई को बढ़ने से रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। हालांकि, उनका मानना है कि दुनिया में इंटरेस्ट रेट में होने वाली वृद्धि सीमित रहेगी।
दिसंबर में भी बढ़ सकता है रेपो रेट
क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी के जोशी का भी मानना है कि आरबीआई अक्तूबर की पॉलिसी में रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट्स बढ़ा सकता है। हालांकि, उनका कहना है कि फिर दिसंबर की पॉलिसी में भी इंटरेस्ट रेट बढ़ने की काफी उम्मीद है। उसके बाद इंटरेस्ट रेट में वृद्धि इकोनॉमी से जुड़े डेटा पर निर्भर करेगी।
अगले साल आर्थिक डेटा पर निर्भर करेगी वृद्धि
जोशी ने कहा, “हमारा मानना है कि इंटरेस्ट रेट में वृद्धि दिसंबर में भी होगी। उसके बाद इसके बढ़ने की कम उम्मीद है। हालांकि, यह इकोनॉमी से जुड़े डेटा पर निर्भर करेगा।” उनका मानना है कि केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट में आक्रामक वृद्धि का साइकिल शुरू करने की जगह नापतौल कर इस बारे में फैसला लेगा।
अगस्त की पॉलिसी के बाद हुए हैं तीन बड़े बदलाव
उन्होंने अगस्त की आरबीआई की पॉलिसी के बाद हुए तीन बदलावों का जिक्र किया। मानसून की बारिश कम हुई है और असमान रही है। पश्चिम एशिया में स्थिति गंभीर हुई है। ऑयल की कीमतें हाई लेवल पर बनी हुई हैं। इस बीच. पहली तिमाही में देश में जीडीपी की ग्रोथ आरबीआई की उम्मीद से ज्यादा रही है।
इनफ्लेशन पर दबाव जारी रहने के आसार
उपर्युक्त वजहों से इनफ्लेशन पर दबाव बना रह सकता है। अमेरिका और भारत के इंटरेस्ट रेट के बीच घटता फर्क दूसरी ब़ड़ी वजह है, जिसका असर पॉलिसी से जुड़े आरबीआई के फैसले पर पड़ सकता है। जोशी ने कहा कि 10 साल की भारत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच का फर्क घटकर 190 बेसिस प्वाइंट्स रह गया है, जो तीन साल पहले करीब 450 बेसिस प्वाइंट्स था। फेडरल रिजर्व भी इस महीने के आखिर में पॉलिसी का ऐलान करेगा। वह लगातार दूसरी बार इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है।
रिटेल इनफ्लेशन अगस्त में 4.82 फीसदी पहुंचा
भारतीय युवा शक्ति ट्रस्ट की फाउंडिंग और मैनेजिंग ट्रस्टी लक्ष्मी वेंकटरमण ने कहा कि अगस्त में भारत में रिटेल इनफ्लेशन बढ़कर 4.82 फीसदी पर पहुंच गया। यह जुलाई में 4.45 फीसदी था। हालांकि, इंडस्ट्रियल आउटपुट जुलाई के 6.7 फीसदी से बढ़कर अगस्त में 8 फीसदी रहा। ऐसे में दोनों के बीच बैलेंस जरूरी है। उन्होंने कहा कि आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी का फोकस मैक्रोइकोनॉमिक स्टैबिलिटी पर होगा। हालांकि, केंद्रीय बैंक की कोशिश कर्ज तक आसान पहुंच बनाए रखने पर भी होगी।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को कहा कि फ्लाईदुबई का को-पायलट हमाम अल-हमामी पहले से मुसीबत था। ये अमेरिकी इंटेलिजेंस नहीं बोल रहा, उसका इतिहास खुद गवाह है। इसके बावजूद उसे पैसेंजर विमान उड़ाने की अनुमति कैसे मिली, यह सवाल उठता है। हमामी पर 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट के कॉकपिट में भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला करने और विमान को क्रैश कराने का आरोप है। वहीं, ओमान ने कहा कि किसी दूसरे देश ने हमामी की बैकग्राउंड जांच के लिए जानकारी नहीं मांगी थी। ओमान के मुताबिक अगर किसी देश ने मांगी होती तो वह हमामी के कट्टरपंथी होने से जुड़ी उपलब्ध जानकारी जरूर साझा करता। ओमान ने हमामी पर पहले ही जांच की थी जेडी वेंस के मुताबिक ओमान के अधिकारियों ने पहले हमामी के व्यवहार को लेकर चिंता जताई थी। उसे उड़ान ड्यूटी से भी हटाया गया था, लेकिन बाद में फ्लाईदुबई ने उसे यात्री उड़ानों की जिम्मेदारी दे दी। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक ओमान ने 29 साल के हमामी की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच की थी। उसकी कट्टरपंथी विचारधारा में रुचि को लेकर चिंता जताई गई थी। 2024 में उसे इसी वजह से ओमान की सरकारी एयरलाइन की पायलट ट्रेनिंग से हटा दिया गया था। बाद में उसे दूसरी जिम्मेदारी दे दी गई। करीब 8 महीने पहले वह फ्लाईदुबई से जुड़ा था। रिपोर्ट के मुताबिक ओमान ने अपनी जांच की जानकारी दूसरी एजेंसियों या एयरलाइंस को नहीं दी। फरवरी में जब फ्लाईदुबई ने हमामी को नौकरी दी, तब उसने उसकी पिछली नौकरी और रिकॉर्ड की पुष्टि के लिए ओमान से संपर्क नहीं किया। वेंस बोले- ईरान कनेक्शन का सबूत नहीं फ्लाईदुबई की घटना में ईरान की भूमिका के सवाल पर वेंस ने कहा कि अभी तक ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं मिला, जिससे ईरान का कनेक्शन साबित हो। उन्होंने कहा- ईरान की भूमिका को लेकर मैं अमेरिकी खुफिया अधिकारियों की बात पर भरोसा करूंगा। किसी आधिकारिक ऐलान से पहले मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता। इसकी जांच चल रही है, लेकिन अभी तक मुझे ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं मिला है। तेल अवीव की फ्लाइट में ड्यूटी कैसे मिली, इसकी जांच जारी ओमान और इजराइल के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। ऐसे में जांच का एक अहम सवाल यह है कि हमामी को तेल अवीव जाने वाली फ्लाईदुबई की फ्लाइट में को-पायलट की ड्यूटी कैसे मिली। सीएनएन के मुताबिक, इजराइल की शिन बेट (जांच एजेंसी), मोसाद (खुफिया एजेंसी), सेना और ट्रांसपोर्टेशन मिनिस्ट्री समेत कई एजेंसियां इस पहलू की जांच कर रही हैं। वे यह पता लगा रही हैं कि पहले उठी चिंताओं के बावजूद हमामी फ्लाइट क्रू का हिस्सा कैसे बना। घटना के बाद हमामी को सऊदी अरब से UAE भेज दिया गया, जहां उसके खिलाफ आतंकवाद से जुड़े मामले की जांच चल रही है। रिपोर्ट- हमामी को मौत की सजा दी जा सकती है आरोपी ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी को UAE में मौत की सजा का सामना करना पड़ सकता है। एक सीनियर अमीराती अधिकारी के मुताबिक, हमामी को कट्टरपंथी विचारधारा की ट्रेनिंग मिली थी। जांच में उसके पास कथित तौर पर चरमपंथी सामग्री और सोशल मीडिया पर लंबे समय से कट्टर विचारों से जुड़ी गतिविधियां भी मिली हैं। UAE की एजेंसियां इस घटना को सिर्फ कॉकपिट में हुई झड़प नहीं, बल्कि आतंकवादी घटना के तौर पर देख रही हैं। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। हमामी ने प्लेन क्रैश की साजिश अकेले रची थी हमामी ने अकेले ही विमान को क्रैश करने की साजिश रची थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अभी तक उसके किसी संगठन या सरकार से जुड़े होने की जानकारी नहीं मिली है। इटली के अखबार कोरिएरे डेला सेरा की रिपोर्ट के मुताबिक हमामी का प्लान कैप्टन स्मित को मारकर विमान को तेल अवीव में किसी ऊंची बिल्डिंग से टकराना था। उसने कॉकपिट में नमाज पढ़ने का बहाना बनाया और कैप्टन पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। जब उसका पहला प्लान नाकाम होने लगा तो उसने विमान को रेगिस्तान में गिराने की कोशिश की। इस दौरान उसने ऑटोपायलट बंद कर दिया, जिससे विमान तेजी से नीचे आने लगा। जांचकर्ताओं को शक है कि हमामी ने विमान के दोनों इंजन बंद करने की कोशिश की थी। विमान एक मिनट में 17 हजार फीट तक नीचे आ गया था, देखें GFX… विमान की रफ्तार 970 किमी प्रति घंटे से ज्यादा पहुंची इस पूरे घटनाक्रम के दौरान विमान तेजी से जमीन की ओर गिर रहा था। उसकी रफ्तार 970 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा पहुंच गई थी। इस दौरान विमान का पिछला हिस्सा भी टूट गया। को-पायलट हमामी ने कंट्रोल को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। फ्लाइट FZ1073 में 174 लोग सवार थे। हमले के दौरान कैप्टन ने विमान से इमरजेंसी सिग्नल भेजे। इसी दौरान पेशे से प्लंबर यानिव हयून ने कंट्रोल स्टिक अपनी ओर खींची, जिससे विमान का तेजी से नीचे जाना रुका। इसके बाद दो ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने कॉकपिट का नियंत्रण संभाला और विमान को सामान्य स्थिति में लाने की कोशिश की। वहीं, यात्रियों और क्रू की मदद से आरोपी को-पायलट को कंट्रोल किया गया। सऊदी अरब के ताबुक में इमरजेंसी लैंडिंग सऊदी अरब के एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स ने विमान को वापस मोड़ने को कहा। इसके बाद फ्लाइट को ताबुक में इमरजेंसी लैंडिंग कराने के निर्देश दिए गए। पायलटों ने विमान को सुरक्षित उतारा। लैंडिंग के बाद घायल कैप्टन स्मित को अस्पताल ले जाया गया, जबकि हमाम अल-हमामी को सऊदी अधिकारियों को सौंप दिया गया। ———————- यह खबर भी पढ़ें… तीन देशों की लापरवाही से प्लेन में पहुंचा हमलावर पायलट फ्लाईदुबई की फ्लाइट में भारतीय पायलट स्मित मच्छर पर हमला करने वाले ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी को लेकर ओमान, UAE और इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। पूरी खबर पढ़ें…
Houthi-Saudi War: यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान और तुर्की ने बड़ा ऐलान किया है। ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के तहत दोनों देश सऊदी अरब में अपने सैनिकों और सैन्य क्षमताओं की जल्द तैनाती की दिशा में आगे बढ़ेंगे। तीनों देशों ने सऊदी की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ किसी भी हमले या खतरे को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए त्रिपक्षीय मक्का रक्षा गठबंधन की एक उच्चस्तरीय समिति रियाद में बैठक की, जिसके बाद ये फैसला लिया गया।
क्या है पूरा मामला?
सोमवार को रियाद में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की आपात बैठक हुई। इसमें पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक के बाद जारी एक संयुक्त बयान में तीनों देशों ने कहा कि वे सऊदी अरब की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ किसी भी हमले या धमकी को स्वीकार नहीं करेंगे। साथ ही, सामूहिक रक्षा से जुड़ी प्रतिबद्धताओं को व्यावहारिक रूप से लागू करने और जरूरी सैन्य बल व क्षमताएं उपलब्ध कराने पर सहमति बनी है।
क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?
अगस्त में हुए इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो बाकी दोनों देश उसके समर्थन में सामने आएंगे। इस समझौते में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब शामिल हैं। इस गठजोड़ में तुर्की की नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है। जबकि सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख सैन्य और आर्थिक शक्तियों में से एक है।
कितने सैनिक जाएंगे, भूमिका क्या होगी?
हालांकि, तीनों देशों ने सऊदी अरब में सैन्य बलों की तेजी से तैनाती की बात कही है। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पाकिस्तान और तुर्की कितने सैनिक भेजेंगे। यह भी नहीं बताया गया है कि तैनात सैनिकों को किस तरह की जिम्मेदारी दी जाएगी।
हूती हमलों के बीच बढ़ी चिंता
यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब सऊदी अरब को यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। हूती पहले भी सऊदी शहरों, तेल प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों को निशाना बना चुके हैं। सितंबर में हूतियों ने बड़ा सैन्य अभियान चलाकर यमन की सऊदी समर्थित सरकार के नियंत्रण वाले कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था।
इसके जवाब में सोमवार को सऊदी समर्थित बलों ने जवाबी अभियान शुरू किया और हूतियों के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेने की कोशिश तेज कर दी। हूती विद्रोहियों ने कहा है कि उन्होंने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बड़ा हमला किया है। यह हमला ईरान के समर्थक इस गुट और यमन की सऊदी-समर्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बीच बढ़ती लड़ाई के दौरान हुआ है।

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनावों के लिए सोमवार को अपने प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया। तमाम अनुमानों के उलट भाजपा ने आठ सीटों के लिए आठ बिल्कुल नए प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया। पहले के सभी राज्यसभा सांसदों की टिकट कट गई। दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का पत्ता साफ हो गया। इन दोनों की अब केंद्रीय मंत्रिमंडल से विदाई हो सकती है। भाजपा ने झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को भी राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है।
भाजपा के आठ उम्मीदवारों की सूची की खास बात यह है कि इसमें सभी नए उम्मीदवार हैं। इनमें दो महिलाएं हैं। दो दलित, तीन पिछड़ी जाति के और तीन सवर्ण उम्मीदवार हैं। भाजपा ने दो ब्राह्मणों को टिकट दिया है, जबकि रिटायर हो रहे दो राजपूत सांसदों की जगह सिर्फ एक टिकट राजपूत समाज को मिली है। अरुण सिंह और नीरज शेखर दो लोग रिटायर हो रहे हैं। नितिन नबीन की टीम में महामंत्री बनाए गए हरीश द्विवेदी और स्मृति ईरानी को टिकट नहीं मिली है।
गौरतलब है कि चार महीने में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में सामाजिक समीकरण का खास ख्याल रखा है। तीन टिकट पिछड़े वर्ग को दी गई है, जिसमें एक लोधी, एक कुर्मी और एक पाल समाज से हैं। वहीं, दलित वर्ग में एक खटीक और एक पासी समाज से हैं। सवर्णों में दो ब्राह्मण और एक ठाकुर हैं। जानकार सूत्रों के मुताबिर रिटायर हो रहे सांसदों में से कुछ को विधानसभा का चुनाव लड़ाया जा सकता है।
इससे पहले समाजवादी पार्टी के दो उम्मीदवारों राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी ने 30 सितंबर को नामांकन दाखिल किया है। यदि सपा तीसरे और भाजपा नौंवें उम्मीदवार को नहीं उतारती है तो चुनाव में सपा के दो और भाजपा के आठ उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय है। गौरतलब है कि मंगलवार को नामांकन का आखिरी दिन है। भाजपा से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा और नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, बृजलाल, गीता शाक्य, अरुण सिंह और सपा के रामगोपाल यादव, बसपा के रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। डॉ. दिनेश शर्मा अंडमान निकोबार के उप राज्यपाल बनाए गए हैं। उन्होंने उप राज्यपाल बनाए जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था।
अफगानिस्तान ने उत्तर-पूर्वी बदख्शां प्रांत में वाखान कॉरिडोर के जरिए चीन के शिनजियांग को जोड़ने वाली 121 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण पूरा कर इसका उद्घाटन कर दिया है। करीब साढ़े पांच मिलियन डॉलर की लागत से तैयार यह सड़क दोनों देशों के बीच सीधा पहला जमीनी संपर्क मार्ग बन गई है। दरअसल, तालिबान सरकार अपने प्राकृतिक संसाधनों और सोने की खदानों के लिए चीनी बाजार तक सीधी पहुंच बनाना चाहती है। इससे उसकी विदेशी कंपनियों समेत दूसरे देशों पर निर्भरता काफी हद तक घट जाएगी। इसके अलावा पाकिस्तान से तनाव के बीच यह मार्ग रणनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है। नई दिल्ली में अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी के साथ मुलाकात के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वाखान में हो रही गतिविधियों पर नई दिल्ली की नजर होने की बात कही थी। चीन के लिए खनिज-कनेक्टिविटी का रास्ता चीन के लिए यह क्षेत्र शिनजियांग की सुरक्षा और संभावित व्यापारिक कनेक्टिविटी के लिहाज से अहम है। चीन ने इसी साल यहां नया प्रशासनिक कॉरिडोर भी बनाया है। दरअसल, चीन यहां से नजदीकी, छोटे और सीधे सोने जैसे खनिजों पर भी है। अब चीन को मलक्का जलडमरूमध्य या समुद्री संकट से बेपरवाह होकर सीधे ईरान और मध्य पूर्व के बाजारों व तेल आपूर्ति तक सबसे छोटा जमीनी मार्ग भी मिल जाएगा। भारत के लिए चिंता का विषय क्यों यह कॉरिडोर भारत के दावे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान की सीमा से सटा है। ऐसे में यहां चीन का बढ़ता प्रभाव भारतीय सामरिक हितों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। इसके अलावा, लद्दाख से बेहद पास होने के कारण भारत को उत्तरी सीमा पर अपनी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ेगी। भारत को रणनीतिक मौजूदगी बढ़ानी होगी रक्षा विशेषज्ञ एनसी विपिन द्विवेदी के मुताबिक, वाखान में चीन और मध्य एशिया के सामरिक हित मिलते हैं और भारत-पाकिस्तान का भू-राजनीतिक समीकरण भी अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में तनाव और क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी ने इसका महत्व और बढ़ा दिया है। भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के साथ संपर्क बढ़ाकर कूटनीतिक और राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करनी चाहिए।
Gold Silver Prices Today: सोने की कीमतों में सोमवार को करीब 1% की गिरावट आई। मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण सोने की तेजी पर दबाव बना हुआ है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर दिसंबर डिलीवरी वाला सोना ₹1,020 गिरकर ₹1,49,370 प्रति 10 ग्राम पर आ गया।
पिछले हफ्ते छुट्टियों के कारण कम कारोबार वाले सत्र में भी सोने की कीमतों में गिरावट आई थी। सोना ₹2,887 यानी करीब 2% टूटकर ₹1.50 लाख प्रति 10 ग्राम पर रहा। शुक्रवार को महात्मा गांधी जयंती के कारण घरेलू कमोडिटी बाजार बंद था।
मजबूत डॉलर से सोने पर दबाव
Choice Broking की कमोडिटी टेक्निकल एनालिस्ट कावेरी मोरे ने कहा कि सोने की कीमतें फिलहाल एक दायरे में बनी हुई हैं। मजबूत अमेरिकी डॉलर और ऊंची बॉन्ड यील्ड के कारण सोने में तेजी की रफ्तार सीमित है। डॉलर इंडेक्स 102.37 के आसपास 18 महीने के ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। इससे सोने पर दबाव बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना
अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूयॉर्क के कॉमेक्स पर दिसंबर डिलीवरी वाला सोना मामूली बढ़त के साथ 4,163.50 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था।
निवेश प्लेटफॉर्म Mudrex के लीड क्वांट एनालिस्ट अक्षत सिद्धांत के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 4,150 डॉलर प्रति औंस के ऊपर बना हुआ है। शुक्रवार को यह थोड़े समय के लिए 4,200 डॉलर के पार चला गया था।
अमेरिका के कमजोर रोजगार आंकड़ों से फेडरल रिजर्व की अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ाने की उम्मीद घटकर 20% से नीचे आ गई है। हालांकि, दिसंबर में दर बढ़ने की संभावना अभी करीब 70% मानी जा रही है।
पिछले हफ्ते सोना और चांदी दोनों टूटे
पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 158.9 डॉलर यानी 3.7% गिरकर 4,162.3 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ। वहीं, चांदी 4.38 डॉलर यानी 6.7% गिरकर 60.41 डॉलर प्रति औंस पर आ गई।
Motilal Oswal Financial Services के कमोडिटी एनालिस्ट मानव मोदी के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड ऊंची रहने के कारण सोने की रिकवरी पर दबाव बना हुआ है। 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 5.2% पर बनी हुई है। लगातार महंगाई, राजकोषीय चिंताएं और सरकार की ज्यादा उधारी इसके पीछे प्रमुख कारण हैं।
आगे किन आंकड़ों पर नजर?
एनालिस्ट के मुताबिक, इस हफ्ते प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सर्विसेज PMI आंकड़े, अमेरिका के व्यापार आंकड़े और महीने के मध्य में आने वाले कंज्यूमर सेंटिमेंट के आंकड़े सोने की दिशा के लिए अहम होंगे।
इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव भी कीमती धातुओं में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकता है।
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‘वोट चोरी’ के आरोपों और चुनाव आयोग की जवाबदेही की मांग को लेकर नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने सोमवार को जंतर-मंतर पर अनोखा प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया।
एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने ‘जीवित लाश’ बनकर प्रदर्शन करते हुए कहा कि यदि नागरिकों के वोट और लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित नहीं हैं तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता। प्रदर्शन का नेतृत्व एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
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एनएसयूआई के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने जाखड़ समेत कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। श्री जाखड़ ने कहा कि वोट चोरी और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवालों का जवाब देने के बजाय छात्रों को हिरासत में लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एनएसयूआई न डरेगी और न झुकेगी तथा हर मतदाता के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी।
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