Trump vs Iran: ट्रंप ने होर्मुज को बताया अमेरिका का नया हिस्सा! ओमान को दे दी बमबारी की धमकी, भड़का ईरान

Strait of Hormuz Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनातनी के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक दावे ने ‘होर्मुज की खाड़ी’ में तनाव को और भड़का दिया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर स्ट्रैट ऑफ होर्मुज का एक नक्शा शेयर करते हुए उसे ‘New U.S. Territory’ यानी उन्होंने अपने पोस्ट में होर्मुज को अमेरिका का नया क्षेत्र करार दिया है।

ट्रंप का यह पोस्ट ऐसे समय में आया है जब ईरान के शीर्ष वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालीबाफ ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी शर्तें पूरी नहीं करता, तब तक ईरान इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को फिर से खोलने की इजाजत नहीं देगा।

ट्रंप का नक्शा और ‘US Territory’ का दावा

ट्रंप ने सोशल मीडिया पर होर्मुज की खाड़ी का नक्शा जारी कर उस पर ‘New U.S. Territory’ लिखा। इससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका का इस जलमार्ग पर ‘पूरा नियंत्रण’ है और उन्होंने ईरान से ‘आत्मसमर्पण का सफेद झंडा’ उठाने की मांग की थी।

इतना ही नहीं, ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से बातचीत के दौरान ओमान को भी सीधी चेतावनी दे डाली। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते के रास्ते में ओमान रुकावट बनता है, तो अमेरिका ‘ओमान पर भारी बमबारी करने से पीछे नहीं हटेगा।’

जब तक शर्तें पूरी नहीं होंगी, बंद रहेगी खाड़ी

ईरानी संसद के अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालीबाफ ने ईरानी सरकारी टेलीविजन पर दिए भाषण में कहा कि जब तक अमेरिका जून में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करता, तब तक स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को खोला नहीं जाएगा।

ईरान ने अमेरिका के सामने रखीं है ये मुख्य शर्तें

  • नौसैनिक नाकाबंदी का अंत: अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी तुरंत हटाई जाए।
  • तेल प्रतिबंध हटाए जाएं: ईरानी तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को खत्म किया जाए।
  • जब्त संपत्तियों को अनफ्रीज करना: विदेशों में फंसे ईरान के वित्तीय एसेट्स (जब्त संपत्तियों) को वापस दिया जाए।

गालीबाफ ने कहा कि ईरान किसी भी सैन्य दुस्साहस का करारा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

ओमान के साथ बैकचैनल वार्ता और ट्रंप की बौखलाहट

एक तरफ जहां अमेरिका और ईरान के बीच गतिरोध बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ ईरान और ओमान मिलकर एक वैकल्पिक नौवहन समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। दोनों देश होर्मुज की खाड़ी में एक निर्दिष्ट सुरक्षित मार्ग के भौगोलिक निर्देशांकों पर सहमत हो गए हैं। दोनों पक्ष एक ‘संयुक्त बयान’ का प्रारूप तैयार कर रहे हैं ताकि वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन फिर से शुरू हो सके।

हालांकि, अमेरिका को दरकिनार कर ओमान और ईरान के बीच हो रही इस शांति वार्ता से राष्ट्रपति ट्रम्प खासे नाराज हैं, जिसके चलते उन्होंने ओमान को सैन्य हमले की धमकी दी है।

आखिर क्यों इतना अहम है स्ट्रैट ऑफ होर्मुज?

स्ट्रैट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित एक बेहद संकरा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल कच्चे तेल के लगभग 20% हिस्से का परिवहन इसी रास्ते से होता है। 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए संघर्ष के बाद से इस इलाके में जहाजों की आवाजाही पर गंभीर असर पड़ा है। ईरान वर्तमान में इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से अनुमति मांगने और ट्रांजिट फीस देने की मांग कर रहा है, जिसका अमेरिका कड़ा विरोध कर रहा है।

ट्रम्प का ईरान से बातचीत की डेडलाइन बढ़ाने से इनकार:बोले- तेहरान जरूरी शर्तों वाला समझौता नहीं करना चाहता; 60 दिन की मोहलत खत्म

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ शांति वार्ता के लिए तय 60 दिन की समयसीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया है। सोमवार को यह डेडलाइन खत्म हो गई। ट्रम्प ने कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन वह उस तरह की डील के लिए तैयार नहीं है, जिसे अमेरिका जरूरी मानता है। ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रम्प ने कहा, “वे समझौता करना चाहते हैं, लेकिन वे उस तरह का समझौता नहीं करने जा रहे, जिसे मैं जरूरी मानता हूं।” अमेरिका की प्रमुख मांग ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना है। वहीं, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण ऊर्जा के लिए जारी रखने की बात कहता रहा है। यही दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। 60 दिन पहले क्या हुआ था? अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को एक समझौता ज्ञापन (MOU) हुआ था। इसके तहत दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए 60 दिन का समय तय किया गया था। इस अवधि में कई अहम मुद्दों पर समाधान निकालने की कोशिश की जानी थी। लेकिन 60 दिन पूरे होने के बाद भी प्रमुख मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। होर्मुज स्ट्रेट खोलने, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और स्थायी शांति समझौते को लेकर दोनों देशों की स्थिति अलग बनी हुई है। MOU में बातचीत की अवधि बढ़ाने का विकल्प था, लेकिन कई हफ्तों से वार्ता आगे नहीं बढ़ी थी। ईरान ने कहा- 60 दिन की डेडलाइन का कोई मतलब नहीं ईरान ने भी बातचीत की समयसीमा बढ़ाने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि दोनों देशों के बीच वास्तव में कोई बातचीत शुरू ही नहीं हुई थी। उन्होंने कहा, “हमने कोई बातचीत शुरू ही नहीं की थी और अमेरिका ने शुरुआत से ही समझ को तोड़ दिया। इसलिए 60 दिन का मुद्दा प्रासंगिक नहीं है।” ईरान का कहना है कि अमेरिका ने समझ के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं। इसी वजह से तेहरान 60 दिन की अवधि को बातचीत की वास्तविक समयसीमा नहीं मानता। अमेरिका का सैन्य कार्रवाई के बजाय आर्थिक दबाव बढ़ाने पर फोकस जुलाई के अंत के बाद से अमेरिका ने ईरान पर कोई नया हमला नहीं किया है। अब ट्रम्प प्रशासन ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अगले हफ्ते ईरान के खिलाफ नए आर्थिक कदमों का ऐलान किया जाएगा। उन्होंने बताया कि कि ये कदम अब तक किसी देश पर लगाए गए सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में शामिल हो सकते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका फिलहाल ईरान पर बम गिराने के बजाय उसकी कमाई और कारोबार पर चोट करके अपनी शर्तें मनवाना चाहता है। बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट भी बना बड़ा मुद्दा अमेरिका-ईरान विवाद में होर्मुज स्ट्रेट भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल और गैस कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ट्रम्प ने सोमवार को दावा किया कि अमेरिका स्ट्रेट पर नाकाबंदी के जरिए नियंत्रण बनाए हुए है। उन्होंने इसे अमेरिकी क्षेत्र घोषित करने के विचार का भी समर्थन किया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, जुलाई के मध्य से अमेरिकी नाकाबंदी के दौरान 64 कॉमर्शियल जहाजों का रास्ता बदला गया है। समुद्री निगरानी एजेंसियों के मुताबिक, स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही भी काफी कम हुई है। ट्रम्प ने होर्मुज को लेकर ओमान को भी चेतावनी दी होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ट्रंप ने अमेरिका के सहयोगी ओमान को भी कड़ी चेतावनी दी है। फॉक्स न्यूज से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर ओमान इस मामले में अमेरिका के रास्ते में आया तो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। ओमान ईरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को खोलने और इसके नियंत्रण को दोनों देशों के पास रखने की योजना पर काम कर रहा है। वह पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। आगे क्या होगा? 60 दिन की समयसीमा खत्म होने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता और मुश्किल होता दिख रहा है। ट्रम्प प्रशासन जहां आर्थिक दबाव बढ़ाने के संकेत दे रहा है, वहीं ईरान परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आर्थिक और सैन्य दबाव ईरान को नई बातचीत के लिए तैयार करेगा या दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ेगा। होर्मुज स्ट्रेट पर जारी गतिरोध इस स्थिति को और गंभीर बना सकता है। ————————- ये खबर भी पढ़े…. ईरान-अमेरिका के बीच 60 दिन की डेडलाइन खत्म:फिर ट्रम्प ने हमले का आदेश क्यों नहीं दिया; दुश्मन को 3 तरफ से घेरने की स्ट्रैटजी अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच युद्ध रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद का समाधान निकालना था। डेडलाइन खत्म होने के बावजूद न तो कोई फाइनल समझौता हुआ, न ही अमेरिका ने ईरान पर बड़ा हमला शुरू किया। पूरी खबर यहां पढ़े…

Crude Oil Price: ईरान-US में तनाव बढ़ने क्रूड में भारी उछाल, $91 के पार पहुंचा भाव

US-Iran war: मंगलवार को तेल की कीमतें बढ़ गई। मिडिल ईस्ट में चल रहे झगड़े को खत्म करने के लिए किसी समझौते की उम्मीद कम हो गई। ईरान ने ज़्यादा आक्रामक रुख दिखाया और US ने युद्धविराम को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। इन घटनाक्रमों ने एनर्जी सप्लाई में रुकावट की आशंकाओं को बढ़ा दिया।

पिछले सेशन में 30 जुलाई के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद, ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 27 सेंट या 0.3% बढ़कर $91.14 प्रति बैरल हो गए। US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड फ्यूचर्स 42 सेंट बढ़कर $85.04 प्रति बैरल हो गए, जबकि इससे पहले इसमें 1% से ज़्यादा की बढ़त हुई थी और यह $85.37 तक पहुंच गया था, जो 31 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था।

 कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

US प्रेसिडेंट द्वारा बताए गए मेमोरैंडम पर जून में साइन किए गए थे और तकनीकी रूप से, इसकी समय सीमा सोमवार को खत्म हो गई।

हालांकि, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ समेत कई अहम मुद्दों पर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। ईरान अभी इस अहम समुद्री रास्ते के मैनेजमेंट को लेकर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है, जबकि US इस बातचीत में शामिल नहीं है। फॉक्स न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ओमान ने US के नेतृत्व वाली नाकेबंदी में दखल दिया तो वे ओमान पर बम गिरा देंगे।

US अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि वॉशिंगटन इस झगड़े को खत्म करने की कोई जल्दबाजी में नहीं है, जो अब छठे महीने में प्रवेश कर रहा है। एनर्जी सेक्रेटरी क्रिस राइट ने फॉक्स न्यूज़ को बताया कि US ईरान से निपटने के लिए लंबे समय का नज़रिया अपना रहा है, जबकि दूत जेरेड कुशनर ने कहा कि ट्रंप समझौते के लिए धैर्य रखने को तैयार हैं।

इस साल क्रूड ऑयल की कीमतें लगभग 50% बढ़ गई हैं क्योंकि लंबे समय से चल रहे युद्ध ने मिडिल ईस्ट से एनर्जी की सप्लाई में रुकावट पैदा की है। हालांकि, पर्शियन गल्फ के प्रोड्यूसर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के ज़रिए तेल भेजने और इंटरनेशनल मार्केट में सप्लाई करने के ज़्यादा असरदार तरीके ढूंढते दिख रहे हैं। सऊदी अरब अब ऐसे कार्गो की पेशकश कर रहा है जो चोकपॉइंट के बाहर से आते हैं, जिससे पता चलता है कि किंगडम तेल एक्सपोर्ट करने के लिए UAE की तरह वैकल्पिक रास्ते खोजने की रणनीति अपना सकता है।

“आज ब्रेंट की कीमतें बढ़कर $89.5 प्रति बैरल हो गईं और WTI $83 के पार पहुंच गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि US-ईरान तनाव कम करने के लिए किसी समझौते की उम्मीदें कम होती जा रही हैं, साथ ही लेबनान में नई लड़ाई और होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर लगातार हमलों के कारण सप्लाई का रिस्क बना हुआ है।

US-ईरान के बीच अंतिम समझौते के लिए तय 60 दिन की समय-सीमा बिना किसी समझौते के खत्म हो गई, और ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट द्वारा ईरान पर लगाए जाने वाले अभूतपूर्व प्रतिबंधों की घोषणा – जिनकी उम्मीद इस हफ्ते थी,अभी भी बाकी है। होर्मुज की स्थिति, खत्म हो चुकी समय-सीमा और संभावित प्रतिबंधों को देखते हुए कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है। कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी रिसर्च की AVP कायनात चेनवाला ने कहा अगर तनाव बढ़ता है या प्रतिबंधों के कारण स्थिति बिगड़ती है तो कच्चे तेल की कीमत $95 तक जा सकती है, जबकि हमलों में कमी आने पर कीमतों में बढ़ोतरी सीमित हो सकती है।

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ईरान-अमेरिका के बीच 60 दिन की डेडलाइन खत्म:फिर ट्रम्प ने हमले का आदेश क्यों नहीं दिया; दुश्मन को 3 तरफ से घेरने की स्ट्रैटजी

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच युद्ध रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद का समाधान निकालना था। डेडलाइन खत्म होने के बावजूद न तो कोई फाइनल समझौता हुआ, न ही अमेरिका ने ईरान पर बड़ा हमला शुरू किया। 60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका फिर बड़ा हमला कर सकता है। समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिखा। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम पहले के मुकाबले हल्का रुख अपना रहे हैं।” वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है। 1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना। 2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना। 3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना। ट्रम्प के इस बयान का मतलब अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत से समझौते की कोशिश भी कर रहा है। ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं? ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है। ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी। यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जंग को जिम्मेदार ठहरा सकती है। जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा। ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी? ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया। अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है। ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं। इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे। यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है। युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं। दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई। अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है। अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है। इन ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास निगरानी और हमलों के लिए किया गया था। कम ऊंचाई और धीमी गति के कारण ये ईरानी बलों और ईरान समर्थित समूहों के निशाने पर रहे। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 185 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 वायुसेना और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। मई में अमेरिकी वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डेविड टैबर ने सीनेट को बताया था कि वायुसेना के पास करीब 135 रीपर ड्रोन बचे हैं। पेंटागन पहले से ही रीपर ड्रोन को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह कम कीमत वाले नए हथियारबंद ड्रोन लाने की योजना पर काम कर रहा है। लंबी दूरी की मिसाइलों की कीमत भी 10 लाख डॉलर से ज्यादा होती है। इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी किया गया है। अगर अमेरिका के पास इन हथियारों का भंडार कम होता है तो भविष्य में ईरान पर बड़े हमले या रूस और चीन जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में मौजूद अपने सैन्य भंडार से इन हथियारों की फिर से आपूर्ति कर सकता है। ईरान की मांगें क्या हैं? अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को समझौते के लिए तैयार करना चाहता है। लेकिन ईरान भी अपने पास मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज खोलने के लिए 6 मांगें रखी हैं। यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अपनी पकड़ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश होते हुए भी समझौते की राह आसान नहीं है।
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ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Gold Price Today: सोना ₹600 उछलकर ₹1.56 लाख के पार, कमजोर डॉलर से बढ़ी चमक

Gold Price Today: कमजोर अमेरिकी डॉलर और ग्लोबल बाजार में तेजी के चलते सोमवार को सोने की कीमतों में जोरदार उछाल आया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट वाला सोना ₹600 चढ़कर ₹1,56,800 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। शुक्रवार को इसका भाव ₹1,56,200 प्रति 10 ग्राम था।

वहीं, चांदी की कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ। यह लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में ₹2,40,000 प्रति किलोग्राम पर स्थिर रही।

सोने के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?

HDFC Securities के सीनियर एनालिस्ट (कमोडिटी) सौमिल गांधी के मुताबिक, अमेरिका के कमजोर आर्थिक आंकड़ों के बाद फेडरल रिजर्व के सख्त रुख की उम्मीद कम हुई है। इससे डॉलर पर दबाव बढ़ा और सोने की मांग को सहारा मिला।

पिछले हफ्ते अमेरिका में महंगाई, रोजगार और रिटेल सेल्स के आंकड़े उम्मीद से नरम रहे। इससे बाजार को लगने लगा कि फेड जल्द ब्याज दरें बढ़ाने से बच सकता है।

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ग्लोबल बाजार में भी तेजी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना मजबूत रहा। स्पॉट गोल्ड करीब 0.5% बढ़कर 4,398 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गया। वहीं, चांदी 1% से ज्यादा चढ़कर 65.58 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

Mirae Asset ShareKhan के हेड ऑफ कमोडिटीज प्रवीण सिंह का कहना है कि कमजोर डॉलर और कच्चे तेल की सीमित कीमतें फिलहाल सोने को सहारा दे रही हैं।

इस हफ्ते किन बातों पर रहेगी नजर?

जियोपॉलिटिकल मोर्चे पर अमेरिका-ईरान तनाव अब भी बाजार की नजर में है। हालांकि, इस हफ्ते निवेशकों की सबसे बड़ी नजर अमेरिकी फेड की FOMC बैठक के मिनट्स पर रहेगी।

LKP Securities के VP रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी और करेंसी) जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, फेड के मिनट्स से ब्याज दरों के अगले संकेत मिल सकते हैं। इससे सोने की कीमतों की अगली दिशा तय होने में मदद मिलेगी।

नहीं थम रही सोने-चांदी की तेजी, रुपया और ग्लोबल फैक्टर्स कैसे डाल रहे है असर,

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को फोन पर हुई बातचीत में ट्रम्प ने यह धमकी दी। हालांकि, ट्रम्प ने यह नहीं बताया कि ओमान ने ऐसा क्या किया था जिसे वह रुकावट मान रहे हैं। ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि अमेरिका का ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ सीक्रेट बातचीत जारी है। हालांकि, IRGC ने कुछ देर बाद ही ट्रम्प के इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिका के साथ उसकी कोई बातचीत नहीं हो रही है। अमेरिका-ईरान की बातचीत में ओमान मध्यस्थ देश ओमान लंबे समय से खुद को इस संघर्ष में तटस्थ देश बताता रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में भी वह मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की ओर से ओमान पर कई हमले हुए, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत कराने में उसकी भूमिका बनी रही। ट्रम्प का बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह पहली बार है जब उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे ओमान को सीधे सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। होर्मुज स्ट्रेट पर टिकी है पूरी बातचीत ओमान इस समय होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के मुद्दे पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभा रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही काफी हद तक रोक रखी है। दुनिया 20% कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस समुद्री मार्ग को दोबारा खोलना दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। ईरान बोला- जहाजों के रास्ते पर समझ बनी ट्रम्प की धमकी से कुछ घंटे पहले ईरान ने दावा किया था कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच समझ बन गई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने सोमवार को तेहरान में पत्रकारों से कहा कि दोनों पक्ष जहाजों के आने-जाने के रास्ते पर सहमत हो गए हैं। अब सिर्फ बाकी तकनीकी और प्रशासनिक विवरण तय किए जाने हैं, जिसके बाद संयुक्त बयान जारी किया जाएगा। IRGC ने ट्रम्प के दावे को झूठ बताया ट्रम्प के इस दावे को ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज एजेंसी तस्नीम न्यूज के हवाले से IRGC ने खारिज कर दिया। IRGC के एक प्रवक्ता ने कहा कि उसके अधिकारियों और अमेरिका के बीच किसी तरह की बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने ट्रम्प के बयान को झूठ बताते हुए कहा कि यह युद्ध में हार और निराशा से पैदा हुई उनकी कल्पना है। IRGC ईरान की सबसे प्रभावशाली सैन्य संस्थाओं में से एक है। देश की सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी उसकी अहम भूमिका मानी जाती है। होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले मुआवजा चाहता है ईरान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस महीने की शुरुआत में कह चुके हैं कि होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका ईरान को मुआवजा देता है या नहीं। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने दोनों देशों के बीच हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का उल्लंघन किया है। रॉयटर्स ने पहले एक ईरानी अधिकारी के हवाले से बताया था कि ईरान चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के माल की कीमत का 5 से 7% शुल्क लिया जाए। ट्रम्प बोले- युद्ध खत्म करने की कोई जल्दी नहीं फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रम्प ने कहा कि उन्हें ईरान के साथ युद्ध खत्म करने की कोई जल्दी नहीं है। उन्होंने ईरान की तुलना अच्छे पोकर खिलाड़ी से करते हुए कहा कि ईरान के लोग अच्छे खिलाड़ी हैं, लेकिन वे मर रहे हैं। ट्रम्प ने कहा कि उनकी कोई समय सीमा तय नहीं है। नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का भी उनके फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के हथियारों के भंडार को लेकर उठ रही चिंताओं को भी खारिज करते हुए कहा कि इस्तेमाल किए गए हथियार उसकी कुल सैन्य क्षमता के मुकाबले बहुत कम हैं। अमेरिका-ईरान के बीच 60 दिन का MoU आज खत्म हो रहा अमेरिका और ईरान के बीच 18 जून को हुआ 60 दिन का एमओयू 17 अगस्त को खत्म हो रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखना और स्थायी समझौते तक पहुंचना था। हालांकि, दोनों देशों ने बाद में एक-दूसरे पर फिर हमले शुरू कर दिए और 8 जुलाई को ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म होने का ऐलान कर दिया। अब MoU की अवधि पूरी होने के बीच दोनों देशों के बीच बातचीत का सबसे अहम मुद्दा फिर से होर्मुज स्ट्रेट को खोलना बना हुआ है। ट्रम्प ने फिर दोहराया- ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे MoU की अवधि खत्म होने से पहले ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यही रहेगी कि ईरान किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल न कर सके। यानी एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, वहीं दूसरी तरफ ट्रम्प ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अपना सख्त रुख भी बनाए हुए हैं।

ईरान पर अमेरिका करेगा परमाणु हमला? होर्मुज पर तनाव के बीच मार्जोरी टेलर के दावे से दुनिया भर में हड़कंप

ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज को लेकर तनाव चरम पर है। ट्रंप लगातार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपने कंट्रोल का दावा कर रहे हैं। हालांकि फिलहाल दोनों देशों के बीच मिसाइल अटैक तो नहीं हो रहा लेकिन गतिरोध बना हुआ है। इस बीच अब एक अमेरिकी नेत्री के दावे ने दुनिया भर में टेंशन बढ़ा दी है।

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नेचिरवान बरजानी कौन हैं, जिनके जरिए हुई अमेरिका-ईरान बातचीत:ट्रम्प IRGC चीफ तक नहीं पहुंच पाए, बरजानी के जरिए हुई सीक्रेट बात

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के दौरान मई में दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए एक सीक्रेट चैनल बनाया गया था। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस के मुताबिक, इस संपर्क में इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवान बरजानी ने अहम भूमिका निभाई। बरजानी ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं, जिनके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने को लेकर बातचीत शुरू हुई थी। अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान की ओर से संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची बातचीत कर रहे थे। लेकिन बातचीत के बीच अमेरिका के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। उसे यह पता करना था कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का भी समर्थन हासिल है या नहीं। इसके लिए अमेरिका ने बरजानी की मदद ली। बरजानी ने IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से सीधे संपर्क किया। अमेरिका खुद IRGC चीफ तक नहीं पहुंच पा रहा था अमेरिका खुद वाहिदी से संपर्क नहीं कर पा रहा था। ट्रम्प प्रशासन जानता था कि ईरान में खासकर सुरक्षा और परमाणु जैसे संवेदनशील मामलों में सिर्फ सरकार नहीं IRGC का भी बड़ा रोल है। मई की शुरुआत तक व्हाइट हाउस को लग रहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता हो सकता है। लेकिन बातचीत अचानक अटक गई। ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव पर करीब 10 दिन तक कोई जवाब नहीं दिया। इससे ट्रम्प प्रशासन को शक हुआ कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची शायद अंतिम फैसला लेने की स्थिति में नहीं हैं। अमेरिका यह जानना चाहता था कि जो बातें दोनों नेता कर रहे हैं, क्या IRGC भी उनसे सहमत है या नहीं। बरजानी ही क्यों बने अमेरिका की पसंद? नेचिरवान बरजानी इराक के उत्तरी हिस्से में मौजूद कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति हैं। यह इलाका इराक का हिस्सा है, लेकिन यहां अपनी सरकार, संसद और सुरक्षा बल हैं। इसकी राजधानी एरबिल है। कुर्दिस्तान क्षेत्र लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। वहीं, इसकी ईरान से भी नजदीकी है। बरजानी के ईरान से पुराने व्यक्तिगत रिश्ते भी हैं। ईरान-इराक युद्ध के दौरान बरजानी ने ईरान में समय बिताया और तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। वह फारसी भाषा बोलते हैं और ईरान के कई बड़े नेताओं और अधिकारियों से उनके निजी संबंध हैं। यानी बरजानी की खासियत यह थी कि उनके पास अमेरिका और ईरान दोनों तक पहुंच थी। यही वजह थी कि वह दोनों पक्षों के बीच बातचीत में मदद करने के लिए उपयोगी साबित हुए। बरजानी परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता नेचिरवान बरजानी का जन्म 1966 में एरबिल में हुआ था। वे कुर्द राजनीति के सबसे प्रभावशाली बरजानी परिवार से आते हैं। उनके दादा मुस्तफा बरजानी आधुनिक कुर्द आंदोलन के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। वहीं, उनके चाचा मसूद बरजानी कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति रह चुके हैं। यानी नेचिरवान ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी कई पीढ़ियों से कुर्द राजनीति में मजबूत पकड़ रही है। सद्दाम हुसैन के दौर में ईरान जाना पड़ा सद्दाम हुसैन के शासनकाल में कुर्दों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई हुई थी। इसी दौरान बरजानी परिवार को इराक छोड़कर ईरान जाना पड़ा। नेचिरवान ने अपने शुरुआती साल ईरान में बिताए। वहीं उन्होंने पढ़ाई की, फारसी भाषा सीखी और ईरान के कई प्रभावशाली लोगों से संपर्क बनाए। बाद में यही रिश्ते उनकी राजनीति में भी काम आए। ईरान में बिताए समय की वजह से उन्हें वहां की भाषा, समाज और राजनीतिक व्यवस्था की अच्छी समझ थी। 1990 के दशक में कुर्दिस्तान लौटे नेचिरवान बरजानी 1990 के दशक में कुर्दिस्तान लौटे और राजनीति में सक्रिय हो गए। वे कुर्दिस्तान की राजनीति में तेजी से आगे बढ़े। 1999 से 2019 के बीच वे कई बार कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद 2019 में वे कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति बने। आज वे इराकी कुर्दिस्तान के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। तुलसी गबार्ड ने बरजानी को फोन किया एक्सियोस के मुताबिक, अमेरिका की तत्कालीन राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने करीब 10 मई को बरजानी से पहली बार संपर्क किया। गबार्ड ने उनसे कहा कि ट्रम्प प्रशासन को IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से संपर्क करने में उनकी मदद चाहिए। गबार्ड ने बरजानी को बताया कि वह यह अनुरोध राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मंजूरी के बाद कर रही हैं। अमेरिका यह भी जानना चाहता था कि IRGC की कोई अलग मांग तो नहीं है और क्या वह ईरानी वार्ताकारों की बातचीत का समर्थन करता है। बरजानी ने एन्क्रिप्टेड फोन से वाहिदी से बात की बरजानी ने गबार्ड की बात मान ली और अपने संपर्कों के जरिए IRGC तक अमेरिकी संदेश पहुंचाया। इसके बाद वाहिदी ने बरजानी से सीधे बात करने की इच्छा जताई। 14 मई को IRGC का एक अधिकारी एरबिल में बरजानी के कार्यालय पहुंचा। वह अपने साथ एक एन्क्रिप्टेड फोन लेकर आया, ताकि बरजानी सुरक्षित तरीके से वाहिदी से बात कर सकें। इसके बाद बरजानी और वाहिदी के बीच सीधे फोन पर बातचीत हुई। बरजानी ने वाहिदी से पूछा कि क्या वह ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची के साथ हैं। वाहिदी ने इसका जवाब हां में दिया। उन्होंने कहा कि वह दोनों वार्ताकारों का पूरा समर्थन करते हैं और यह IRGC का भी रुख है। उन्होंने यह भी कहा कि IRGC इस संकट का समाधान बातचीत के जरिए करना चाहता है। वाहिदी का संदेश व्हाइट हाउस तक पहुंचा बातचीत के बाद बरजानी ने तुलसी गबार्ड से संपर्क किया और वाहिदी का संदेश उन्हें बताया। गबार्ड ने यह जानकारी व्हाइट हाउस तक पहुंचा दी। इससे ट्रम्प प्रशासन को यह भरोसा मिला कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची को IRGC का समर्थन हासिल है। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने बरजानी से एक और मदद मांगी। अमेरिका चाहता था कि बरजानी एरबिल में अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच सीक्रेट मीटिंग की मेजबानी करें। हालांकि, यह बैठक नहीं हो सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी पक्ष को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता थी। बरजानी की अहमियत क्यों बढ़ी? नेचिरवान बरजानी को सबसे प्रभावशाली कुर्द नेताओं में गिना जाता है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। उनके तुर्की और अरब देशों के नेताओं से भी संपर्क हैं। इसी वजह से वह अलग-अलग पक्षों के बीच बातचीत में मदद करने वाले नेता के तौर पर सामने आए हैं। इस मामले में भी उनकी भूमिका इसलिए अहम रही क्योंकि अमेरिका खुद IRGC कमांडर तक नहीं पहुंच पा रहा था। बरजानी ने अपने पुराने ईरानी संपर्कों का इस्तेमाल कर अमेरिकी टीम को IRGC नेतृत्व तक पहुंचाया।

बीजेपी की नई टीम का ऐलान, युवा और अनुभवी नेतृत्व का उचित संतुलन

अटकलों का दौर खत्म हुआ। लंबे इंतजार के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नबीन की टीम का ऐलान आखिरकार हो ही गया। बीजेपी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की लिस्ट से साफ है कि नीतिन नबीन की इस नयी टीम में निरंतरता के साथ साथ परिवर्तन का भी एक बड़ा संतुलन बना कर रखा गया है। इसमें 40 वर्ष से कम उम्र के 6 सदस्य, 40-49 की आयु के 15 और 50-59 साल के 21 सदस्यों को स्थान मिला है। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी टीम के गठन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सहयोग मिला।

संदेश साफ है कि 2029 को ध्यान में रख कर ये टीम बनायी गयी है। इसमें 13 उपाध्यक्ष, 8 महासचिव, एक संगठन महासचिव, दो सह संगठन महासचिव, 16 सचिव, और केन्द्रीय मंत्री पियुष गोयल को एक बार फिर राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है। बीएल संतोष बतौर समगठन महामंत्री और साथ ही सौदान सिंह और शिव प्रकाश बतौर सह संगठन महामंत्री अपना काम करते रहेंगे। पूर्व महासचिव महासचिव तरुण चुघ को केन्द्रीय कार्यालय का प्रभारी बनाया गया है। विष्णु दत्त शर्मा को सभी सेलों और प्रकोष्ठों का प्रभारी बनाया गया है जबकि संबित पात्रा को पूर्वोत्तर का प्रभारी बनाया गया है। जानते हैं कि क्या है इस नयी टीम का क्या है संदेश–

अनुभवी औऱ युवा नेतृत्व का संतुलन

नयी टीम की सबसे महत्वपूर्ण बात है पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं प्रखर वक्ता स्मृति ईरानी की महामंत्री के रूप में वापसी। 2024 के लोकसभा चुनावो की हार के बाद स्मृति ईरानी थोड़ी हाशिए पर थीं। लेकिन बतौर स्टार प्रचारक पार्टी उनको कभी नहीं भूली थी। जेपी नड्डा के अध्यक्ष काल में संगठन से बाहर हुए संघ के प्रचारक रहे लेखक-चिंतक राम माधव की उपाध्यक्ष के रूप में वापसी हुई है। जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में भगवा लहराने वाले राम माधव की संगठनात्मक कुशलता का लाभ भी पार्टी को मिलने वाला है। एबीवीपी कार्यकर्ता रहे विनोद तावड़े को उनके कुशल सांगठनिक क्षमता के लिए फिर से महामंत्री बनाया गया हो तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में भारी विजय दिलाने वाले सुनील बंसल को दुबारा महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।

आदिवासी समाज के गजेंद्र पटेल को मिली महामंत्री की जिम्मेदारी दी गयी है तो उत्तर पूर्व से युवा नेता मृगांक बर्मन बने राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद और युवा नेता संगीता यादव बनी राष्ट्रीय सचिव बनायी गयीं हैं। अनुभव की बात करें तो 3 पूर्व मुख्यमंत्रियों को भाजपा की राष्ट्रीय टीम में शामिल किया गया है राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता वसुंधरा राजे सिंधिया, उत्तराखंड के पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत और त्रिपुरा के पूर्व सीएम बिप्लव देब का अनुभव संगठन में खासा काम आने वाला है।

समाज के सभी वर्गों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व

नितिन नबीन ने आला नेताओं से चर्चा के बाद तमाम क्षेत्रों और समाज के सभी वर्गों को ध्यान में रखते हुए ये कोशिश की कि टीम में एक सामंजस्य़ बना रहे और देश भर में सही संदेश जाए। अरसे से बात चल रही थई कि उत्तर प्रदेश में अग़डे नाराज है या फिर ब्राह्मण नाराज हैं। लेकिन नयी टीम मे उत्तर प्रदेश से आने वाले हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महासचिव बना कर चुनावों से पहले अगड़ों को भी एक संदेश दे दिया है। दूसरी तरफ लिस्ट के मुताबिक लगभग 40 फीसदी से ज्यादा नयी टीम के सदस्य वंचित समाज से है। नागालैंड से राज्यसभा सांसद फांगनोन कोन्याक को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई है। आंध्र प्रदेश से डी पुरंदेश्वरी बनी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और तमिलनाडु के मा व्यंकटेशन बने राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है।

अल्पसंख्यक समाज से आने वाले उत्तर प्रदेश के प्रोफेसर तारीक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के कूुंवर बसित अली तो अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया है। सरदार मनप्रीत सिंह बादल को उपाध्यक्ष बनाया गया है। गुजरात के डाक्टर हेमांग जोशी को युवा मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। हेमांग जोशी अब कर्नाटक के तेजस्वी सूर्या की जगह लेंगे।

संगठन और प्रोफेशनल विशेषज्ञों का उचित समन्वय

संघ के प्रचारक और प्रवक्ता रहे राम माधव की टीम में वापसी संघ और संगठन के बीच सामंजस्य तो जोड़ती ही रहेगी और साथ ही उनकी संगठनात्मक क्षमता का उपयोग उन इलाकों में काम आएगा जहां पार्टी कमजोर है। बंगाल चुनावों में संगठन को मजबूत करने वाले नेता सुनील बंसल पुनः महासचिव बने हैं। जेएनयू में एबीवीपी कार्यकर्ता रहे और वर्तमान में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ स्वदेश सिंह भाजपा की नई टीम में राष्ट्रीय सचिव, कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ मधुचंद्रा कर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, कर्नाटक के प्रोफेसर M नागराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया संभालने के लिए भी नयी टीम लेकिन नेतृत्व अनुभवी हाथों में

अब तक मीडिया प्रमुख का पद संभाल रहे पौड़ी से सांसद अनिल बलूनी को एक बार फिर मीडिया का राष्ट्रीय सयोजन बनाया गया है। उनके साथ हरियाणा के सिद्धार्थ यादव, दिल्ली के प्रदीप भंडारी और मध्य प्रदेश के आशीष उषा अग्रवाल को सह संयोजक बनाया गया है। इसमे पहले के उप मीडिया प्रमुख संजय मयूख को उनके पद से मुक्त कर दिया गया है। अब वे बिहार में विधायक के तौर पर अपनी राजनीति करेंगेे। सोशल नीडिया की टीम के प्रमुख के पद से अमित मालविय को मुक्त किया गया है औऱ उनकी जगह छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को संयोजक बनाया गया है।

नजर 2029 पर है और जिम्मेदारी इस युवा टीम पर। नीतीन नबीन को इस युवा और अनुभवी टीम को फ्रंट से लीड करना होगा ताकि पहली चुनौती जो अगले साळ कई यूपी, पंजाब, उत्तराखंड समेत कई राज्यों में होने वालों चुनावों में बीजेपी का भगवा फिर से लहराने लगे।

नहीं थम रही सोने-चांदी की तेजी, रुपया और ग्लोबल फैक्टर्स कैसे डाल रहे है असर, अब क्या करें निवेशक!

Gold Silver price: भारत में सोने और चांदी की कीमतों में तेजी देखी गई। इसकी वजह ग्लोबल मार्केट में मजबूती का ट्रेंड था, जिसमें कमज़ोर अमेरिकी डॉलर और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों ने कीमती धातुओं की मांग को सहारा दिया। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, अक्टूबर डिलीवरी के लिए सोने के वायदा भाव ₹676 या 0.44% बढ़कर ₹1.55 लाख प्रति 10 ग्राम हो गए। सितंबर डिलीवरी के लिए चांदी के वायदा भाव ₹2,270 या 0.96% बढ़कर ₹2.38 लाख प्रति किलोग्राम हो गए।

ग्लोबल स्तर पर, सोने के वायदा भाव लगभग 0.40% बढ़कर $4,394.01 प्रति औंस हो गए, जबकि चांदी के वायदा भाव 1.64% बढ़कर $65.74 प्रति औंस हो गए।

क्यों बढ़ रही कीमतें हैं?

इसका एक मुख्य कारण अमेरिकी मॉनेटरी पॉलिसी (मौद्रिक नीति) को लेकर बदलता नज़रिया है। हाल ही में अमेरिका में महंगाई, रोजगार और कंज्यूमर एक्टिविटी के आंकड़े कमज़ोर रहे हैं, जिससे फेडरल रिज़र्व द्वारा और सख्ती बरतने की उम्मीदें कम हो गई हैं। इसका असर अमेरिकी डॉलर पर पड़ा है और सोने को इससे सहारा मिला है।

आमतौर पर डॉलर के कमज़ोर होने से सोने को फायदा होता है क्योंकि दूसरी करेंसी रखने वालों के लिए यह धातु सस्ती हो जाती है। कम ब्याज दरों की उम्मीदें भी सोने को सहारा दे सकती हैं, क्योंकि सोने जैसी ऐसी एसेट (संपत्ति) को रखने की ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ (वैकल्पिक लागत) कम हो जाती है जिससे कोई रेगुलर इनकम नहीं होती।

भारत के लिए खास वजह क्या है?

घरेलू कीमतें करेंसी में होने वाले उतार-चढ़ाव को भी दिखाती हैं। सोमवार (17 अगस्त) को शुरुआती कारोबार में रुपया कमज़ोर होकर लगभग ₹95.59 प्रति डॉलर पर आ गया। रुपया कमज़ोर होने से सोने और चांदी जैसी इंटरनेशनल कीमत वाली कमोडिटीज़ की ‘लैंडेड कॉस्ट’ (आयात लागत) बढ़ सकती है, जिससे घरेलू कीमतों को और सहारा मिलता है।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का भी रुपये पर दबाव रहा है। लेमन (Lemonn) में रिसर्च हेड गौरव गर्ग के अनुसार, WTI क्रूड लगभग $82.83 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था, जबकि ब्रेंट $89 के आसपास बना हुआ था। गर्ग ने कहा कि डॉलर के कमज़ोर होने और आर्थिक आंकड़े कमज़ोर रहने से फेड द्वारा जल्द ही ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें कम हो गईं, जिससे सोने और चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई। उन्होंने US-ईरान शांति वार्ता के रुकने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से टैंकरों की आवाजाही कम होने के बाद सप्लाई में रुकावट की चिंताओं की ओर भी इशारा किया।

बता दें कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता एक और वजह है जो बुलियन (सोना-चांदी) को सहारा दे रही है। US-ईरान शांति वार्ता में कोई प्रगति न होने और तेल की सप्लाई को लेकर चिंताओं ने निवेशकों को सतर्क रखा है। ऐसी अनिश्चितता सोने जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली संपत्तियों की मांग बढ़ा सकती है।

अब आगे क्या करें निवेशक

सोने के लिए, फेडरल रिजर्व का रेट आउटलुक, US डॉलर, बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक घटनाक्रम मुख्य कारक बने रहेंगे। अगर फेड का रुख नरम (dovish) होता है तो कीमतों को सहारा मिल सकता है, जबकि महंगाई का नया झटका या सख्त (hawkish) पॉलिसी रुख बुलियन पर दबाव डाल सकता है।

VT मार्केट्स में ग्लोबल स्ट्रैटेजी ऑपरेशंस लीड, रॉस मैक्सवेल ने कहा कि $4,400-$4,450 प्रति औंस सोने के लिए तत्काल रेजिस्टेंस ज़ोन है। अगर कीमत $4,500 प्रति औंस से ऊपर बनी रहती है तो तेजी का रुझान (bullish trend) मजबूत हो सकता है, जबकि उन्होंने $4,150-$4,200 प्रति औंस को एक महत्वपूर्ण सपोर्ट एरिया बताया।

हालांकि, भारतीय निवेशकों के लिए, ग्लोबल सोना और चांदी की कीमतें समीकरण का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं। रुपया-डॉलर एक्सचेंज रेट, इंटरनेशनल कीमतें और घरेलू बाजार की स्थितियां मिलकर MCX कीमतों की दिशा तय करती हैं।

एस्पेक्ट बुलियन एंड रिफाइनरी के CEO दर्शन देसाई ने कहा, “कमज़ोर अमेरिकी डॉलर, दरों को लेकर बदलती उम्मीदों और सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन) के तौर पर लगातार बनी मांग के कारण सोने और चांदी की कीमतें नए हफ़्ते में मजबूती के साथ आगे बढ़ रही हैं।”

देसाई ने कहा, “भू-राजनीतिक जोखिम और ग्लोबल ग्रोथ को लेकर चिंताएं बुलियन को और सहारा दे रही हैं।” हालांकि, एनालिस्ट कीमतों में सीधी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं कर रहे हैं। हालिया बढ़त के बाद, सोने और चांदी की कीमतों में कुछ ठहराव (कंसोलिडेशन) या मुनाफावसूली (प्रॉफिट-टेकिंग) देखी जा सकती है।

Silver Price Today: चांदी की बढ़ी चमक, देश-विदेश में महंगे हुए दाम, चेक करें अपने शहर का ताजा भाव

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