भारत से सीमा विवाद के बीच नेपाल का बड़ा कबूलनामा! क्या गायब हो गए 210 साल पुरानी सुगौली संधि के असली कागज?

India-Nepal Sugauli Treaty: भारत और नेपाल के बीच जारी सीमा विवाद के बीच नेपाल सरकार की ओर से एक हैरान करने वाला कबूलनामा सामने आया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में स्वीकार किया है कि सरकार को इस बात की पक्की जानकारी नहीं है कि उसके पास 1816 की ऐतिहासिक सुगौली संधि और 1950 की नेपाल-भारत संधि के मूल दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। ब्रिटिश भारत के साथ नेपाल की सीमा तय करने वाली यह संधि दोनों देशों के सीमांकन का मुख्य आधार रही है।

नेपाल की प्रतिनिधि सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि सरकार के पास 1816 की संधि से जुड़े दस्तावेजों के रिकॉर्ड तो मौजूद हैं, लेकिन उनमें से कोई आधिकारिक मूल संधि पत्र है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

नेपाल की संसद में विदेश मंत्री बोले- नेशनल आर्काइव्स में हैं रिकॉर्ड, पर मूल दस्तावेज स्पष्ट नहीं

विदेश मंत्री खनाल ने स्पष्ट किया कि वैसे तो देश के नेशनल आर्काइव्स में कुछ कागजात संरक्षित हैं लेकिन तमाम सरकारी विभागों में की गई व्यापक खोजबीन के बाद भी हस्ताक्षर युक्त स्पष्ट और मूल संधि पत्र का पता नहीं चल सका है। संसद में बोलते हुए खनाल ने कहा कि नेपाल सरकार के पास इस बात की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि हमारे पास आधिकारिक संधि दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। रिकॉर्ड दिखाते हैं कि कुछ संधियों से संबंधित दस्तावेज नेशनल आर्काइव्स में रखे गए हैं। लेकिन क्या वे वास्तव में आधिकारिक और मूल संधियां हैं, इसे लेकर हमारे पास स्पष्ट जानकारी नहीं है।

आपको बता दें कि 1814-1816 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद नेपाल साम्राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1816 में सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि ने नेपाल के क्षेत्र को काफी हद तक कम कर दिया था और इसकी आधुनिक सीमाओं की रूपरेखा तय की थी।

लिपुलेख दर्रे पर भारत-चीन व्यापार और नए विवाद की वजह

नेपाल सरकार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच व्यापार फिर से शुरू होने को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। नेपाल ने इस व्यापार मार्ग का विरोध करते हुए दावा किया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा उसके क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

मौजूदा सीमा विवाद मुख्य रूप से काली (या महाकाली) नदी की व्याख्या पर केंद्रित है, जिसे 1816 की सुगौली संधि ने नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में स्थापित किया था। नेपाल का तर्क है कि इस नदी का उद्गम लिंपियाधुरा से होता है। इस व्याख्या के आधार पर लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा नदी के पूर्व में स्थित हैं और इसलिए वे नेपाल का हिस्सा हैं।

भारत ने नेपाल के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहा है। भारत ने अपने रुख के समर्थन में ऐतिहासिक रिकॉर्ड और नक्शों का भी हवाला दिया है।

गायब दस्तावेजों की पुरानी पहेली: 1950 की संधि के कागजात भी नदारद

मूल संधियों के गायब होने या न मिलने की यह अनिश्चितता नई नहीं है। साल 2016 में भी नेपाल को तब मुश्किलों का सामना करना पड़ा था जब दोनों देशों के बीच बने प्रबुद्ध व्यक्ति समूह द्वारा 1950 की नेपाल-भारत शांति और मित्रता संधि की समीक्षा या उसे बदलने पर विचार किया जा रहा था। उस समय भी नेपाल सरकार 1950 की संधि की मूल प्रति खोजने में असमर्थ रही थी।

द काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद हुई एक संसदीय जांच में सरकारी दफ्तरों, अभिलेखागारों, संग्रहालयों और दूसरे भंडारों में काफी तलाशी ली गई थी, लेकिन सुगौली संधि और 1950 की संधि की मूल प्रतियां नहीं मिल सकी थीं।

इसके बाद साल 2019 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने भी स्वीकार किया था कि नेपाल के पास दोनों समझौतों की प्रतियां (कॉपी) तो हैं लेकिन वे मूल प्रतियां हैं या नहीं, यह स्थापित नहीं किया जा सका है। तब ज्ञावली ने कहा था कि हमारे पास दोनों संधियां मौजूद हैं, लेकिन हमें फोरेंसिक रूप से यह सत्यापित करना होगा कि ये प्रतियां ओरिजनल हैं या नहीं।

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ChatGPT और Google Gemini ने पार किया 1 अरब यूजर्स का आंकड़ा, AI की दुनिया में बदल गया मुकाबला

ChatGPT और Google Gemini ने पार किया 1 अरब यूजर्स का आंकड़ा, AI की दुनिया में बदल गया मुकाबला

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। OpenAI के ChatGPT और Google के Gemini ने 1 अरब यूजर्स का बड़ा आंकड़ा पार कर लिया है। हालांकि, यूजर बेस के मामले में ChatGPT अभी भी आगे है, लेकिन Gemini तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और OpenAI की बढ़त को लगातार कम कर रहा है।

 

ChatGPT और Gemini के 1 अरब यूजर्स

OpenAI और Google दोनों अपने जनरेटिव AI टूल्स के साथ 1 अरब यूजर्स के आंकड़े तक पहुंच चुके हैं। Google के CEO सुंदर पिचाई ने बताया कि Gemini के मासिक यूजर्स की संख्या 1 अरब के पार पहुंच गई है। उन्होंने इसे Google का अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला प्रोडक्ट बताया। यह घोषणा OpenAI के उस बयान के कुछ सप्ताह बाद आई है, जिसमें कंपनी ने कहा था कि ChatGPT भी 1 अरब यूजर्स का आंकड़ा पार कर चुका है।

 

हालांकि, दोनों कंपनियां यूजर्स की संख्या को अलग-अलग तरीके और अलग-अलग समय अवधि के आधार पर मापती हैं। इसके बावजूद एक बात स्पष्ट है कि AI असिस्टेंट बेहद तेजी से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन रहे हैं।

 

ChatGPT के मुकाबले तेजी से बढ़ रहा Gemini

 

Gemini के यूजर्स की संख्या फरवरी में करीब 75 करोड़ थी, जो जुलाई के अंत तक बढ़कर 95 करोड़ हो गई और इसके बाद 1 अरब के आंकड़े को पार कर गई। वहीं, OpenAI ने फरवरी में ChatGPT के 90 करोड़ साप्ताहिक एक्टिव यूजर्स होने की जानकारी दी थी। बाद में कंपनी ने बताया कि ChatGPT के मासिक यूजर्स की संख्या 1 अरब से ज्यादा हो गई है। हालांकि, OpenAI ने हाल का मासिक यूजर आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है।

 

दोनों कंपनियों द्वारा अलग-अलग टाइमफ्रेम में यूजर डेटा जारी किए जाने के कारण सीधे तौर पर तुलना करना आसान नहीं है। फिर भी मौजूदा आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ChatGPT की पहुंच फिलहाल ज्यादा है, जबकि Gemini बेहद तेजी से इस अंतर को कम कर रहा है।

 

Google के इकोसिस्टम से Gemini को बड़ा फायदा

Gemini की तेज ग्रोथ की एक बड़ी वजह Google का विशाल इकोसिस्टम है। Gemini को Android और Google की कई सेवाओं में गहराई से जोड़ा गया है। इसका मतलब है कि ऐसे लोग भी Gemini का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो खास तौर पर किसी AI चैटबॉट की तलाश में नहीं आए थे।

 

Google ने यह भी बताया कि Gemini के 10 करोड़ से ज्यादा एक्टिव iPhone यूजर्स हैं। इससे संकेत मिलता है कि Gemini के कुल यूजर बेस का बड़ा हिस्सा Android से आता है। Google के लिए यह एक महत्वपूर्ण बढ़त है, क्योंकि कंपनी Gemini को लगातार ज्यादा डिवाइस और सेवाओं में शामिल कर रही है।

 

AI हार्डवेयर पर भी OpenAI की नजर

 

OpenAI अब केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं रहना चाहता। कंपनी की AI-स्पेसिफिक हार्डवेयर में भी दिलचस्पी बढ़ती दिखाई दे रही है। इससे भविष्य में ChatGPT के इस्तेमाल का दायरा स्मार्टफोन और कंप्यूटर से आगे बढ़ने की संभावना बन रही है।

 

अब AI की रेस सिर्फ ChatGPT तक सीमित नहीं

 

AI की प्रतिस्पर्धा अब केवल ChatGPT और Gemini तक सीमित नहीं है। पिछले एक साल में इस क्षेत्र में मुकाबला काफी तेज हुआ है। Google का Gemini, Anthropic का Claude, OpenAI का Codex और चीन की कई AI कंपनियों ने बाजार में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है। ChatGPT आज भी AI की दुनिया में सबसे चर्चित नामों में से एक है, लेकिन उसकी बढ़त पहले जितनी सुरक्षित नहीं दिख रही। ChatGPT और Gemini दोनों के 1 अरब यूजर्स के आंकड़े तक पहुंचने के बाद AI की अगली जंग सिर्फ नए यूजर्स जोड़ने की नहीं होगी।

 

अब कंपनियों के सामने यूजर्स को लंबे समय तक अपने प्लेटफॉर्म से जोड़े रखना, नए AI फीचर्स पेश करना और इतने बड़े यूजर बेस को मजबूत बिजनेस में बदलना बड़ी चुनौती होगी।

Copper Price: कॉपर की कीमतों में गिरावट, 2 हफ्ते के निचले स्तर पर फिसला भाव

Copper Price: इंटरनेशनल मार्केट में कॉपर के दाम गिरे। कॉपर वायदा $6.55/पाउंड से नीचे फिसला। कॉपर का भाव करीब 2 हफ्तों के निचले स्तर पर फिसला। ऊंची कीमतों से चीन में मांग कमजोर बना हुआ। चीन में कॉपर की खरीद में गिरावट आई।

यांगशान प्रीमियम में भी गिरावट आई और यांगशान प्रीमियम घटकर 96 डॉलर प्रति टन रहा। पिछले महीने प्रीमियम 115 डॉलर प्रति टन था। Codelco ने उत्पादन लक्ष्य घटाया है। US कॉपर टैरिफ की चिंता बरकरार है। टैरिफ से कॉपर US वेयरहाउस पहुंच रहा है।

क्या है यांगशान प्रीमियम?

यांगशान प्रीमियम LME भाव से ऊपर का प्रीमियम है। चीन में इंपोर्टेड कॉपर की अतिरिक्त लागत का संकेत दिया है।

चीन में यांगशान प्रीमियम का असर

प्रीमियम बढ़े तो कॉपर की मांग मजबूत मानी जाती है। प्रीमियम घटे तो कॉपर की मांग कमजोर मानी जाती है। इंपोर्टेड कॉपर के लिए खरीदार कम दाम देना चाहते हैं। खरीदार पहले जितना प्रीमियम देने को तैयार नहीं हैं। ऊंची कॉपर कीमतों ने चीन में मांग को कमजोर किया।

यांगशान प्रीमियम का गणित

यांगशान प्रीमियम का गणित पर नजर डालें तो LME पर $10,000/टन का अनुमानित भाव है। यांगशान प्रीमियम $96/टन और चीन में इंपोर्टेड कॉपर का अनुमानित भाव $10,096/टन है।

कैसे रहा कॉपर का चाल

इंटरनेशनल मार्केट में कॉपर की चाल पर नजर डालें तो 1 हफ्ते कॉपर की कीमतों में 2 फीसदी की गिरावट आई। वहीं 1 महीने में 3 फीसदी चढ़ा जबकि जनवरी 2026 में अब तक कॉपर में 15 फीसदी चढा। वहीं 1 साल में इसमें 46 फीसदी की तेजी देखने को मिली।

MCX पर कॉपर की चाल पर नजर डालें 1 हफ्ते कॉपर की कीमतों में 1 फीसदी की गिरावट आई। वहीं 1 महीने में 5 फीसदी चढ़ा जबकि 3 महीने में 1 फीसदी गिरा। वहीं 6 महीने में इसमें 13 फीसदी की तेजी आई। इस साल अब तक 8 फीसदी की तेजी आई।

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ईरान में अब रेयर अर्थ खोजने के लिए अपने वैज्ञानिक भेज रहा चीन! जानिए दुनिया के लिए क्या हैं इसके मायने

Iran rare earths: महत्वपूर्ण खनिजों की ग्लोबल रेस में अब चीन और अमेरिका के बीच का कंपीटिशन और तीखा होता नजर आ रहा है। दुर्लभ खनिजों यानी रेयर अर्थ के प्रोसेसिंग में अपने दबदबे को अमेरिका से चुनौती मिल रही है। इसी बीच चीन अब रेयर अर्थ एलिमेंट्स की खोज और एक्सप्लोरेशन के लिए ईरान में अपने वैज्ञानिकों को भेजने की तैयारी कर रहा है। यह कदम दोनों देशों के बीच वैज्ञानिक संबंधों को और गहरा करने के साथ-साथ जियो पॉलिटिक्स के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘फर्स्टपोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल नेचुरल साइंस फाउंडेशन ऑफ चाइना (NSFC) ने ईरान नेशनल साइंस फाउंडेशन (INSF) के साथ अपने नए जॉइंट वर्कशॉप प्रोग्राम में रेयर अर्थ एलिमेंट्स की खोज और एक्सप्लोरेशन को शामिल किया है।

क्या है चीन और ईरान की योजना और कैसे होगी फंडिंग?

इसके तहत चीन बैठकों, आवास और घरेलू यात्रा को कवर करने के लिए हर कार्यशाला पर 30,000 युआन (लगभग $4,200) देगा। दूसरी ओर ईरान में जाने वाले चीनी रिसर्चर्स के रहने की व्यवस्था और ईरानी प्रतिभागियों की इंटरनेशनल फ्लाइट का खर्च ईरान उठाएगा। यह रेयर अर्थ पहल चीन और ईरान के बीच व्यापक वैज्ञानिक सहयोग के विस्तार का हिस्सा है।

इस वर्कशॉप प्रोग्राम में कुल 5 क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसमें रेयर अर्थ एलिमेंट्स की खोज और एक्सप्लोरेशन, बीमारी का पता लगाने के लिए नैनोमैटेरियल्स, प्रदूषण निगरानी, भूकंप रेजिस्टेंट कंस्ट्रक्शन और ग्रीनर मैन्युफैक्चरिंग शामिल हैं।

इसके अलावा बीते 4 जुलाई को दोनों देशों ने एक डिटेल्ड रिसर्च सेल शुरू किया है। इसके तहत 15 सहयोगी अनुसंधान परियोजनाओं को सहायता दी जाएगी। इसके लिए आवेदन की अंतिम तिथि 23 अगस्त रखी गई है और दिसंबर के उत्तरार्ध में अंतिम चयन के बाद स्वीकृत परियोजनाएं जनवरी 2027 से शुरू होंगी। इसमें जल और ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी, सूखा व जलवायु परिवर्तन के बीच जल प्रबंधन, और कृषि व चिकित्सा बायोटेक्नोलॉजी जैसे विषय शामिल हैं।

दशक भर पुराना है दोनों देशों का वैज्ञानिक संबंध

चीन की NSFC और ईरान के नेशनल साइंस फाउंडेशन ने साल 2017 में बीजिंग में एक MoU पर हस्ताक्षर किए थे। तब से दोनों देशों ने चिकित्सा, नवीकरणीय ऊर्जा, सामग्री विज्ञान, जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम किया है।

साल 2024 में दोनों देशों के बीच संयुक्त कार्यशाला कार्यक्रम शुरू हुआ था जो शुरुआत में जलवायु परिवर्तन, एआई, उन्नत सामग्री और मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित था। हालांकि अब इसमें रेयर अर्थ को शामिल किए जाने से यह साझेदारी रणनीतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश कर गई है।

अमेरिका-चीन तनाव के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?

रेयर अर्थ एलिमेंट्स टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील खनिज हैं। अमेरिका-चीन संबंधों में यह एक बड़ा प्रेशर पॉइंट बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन के खिलाफ ट्रेड वॉर शुरू करने के बाद, बीजिंग ने रेयर अर्थ के एक्सपोर्ट पर कड़े नियम लागू कर दिए थे, जिससे कई अमेरिकी निर्माताओं के इंपोर्ट पर असर पड़ा।

इसके जवाब में अमेरिका ने अपने घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। बीते 7 अगस्त को ही ट्रंप प्रशासन ने क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी प्रोजेक्ट्स में 3 बिलियन डॉलर के निवेश का ऐलान किया है ताकि रक्षा भंडार को फिर से भरा जा सके और चीन पर निर्भरता कम की जा सके।

दुनिया के लिए यह खबर क्यों मायने रखती है?

इस घटनाक्रम का तात्कालिक महत्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि ईरान आज कितना रेयर अर्थ उत्पादन कर सकता है बल्कि इस बात पर है कि चीन अपनी विश्व स्तरीय विशेषज्ञता को एक ऐसे देश में ले जा रहा है जिसके पास मूल्यवान लेकिन काफी हद तक अविकसित संसाधन मौजूद हैं। चीन के पास रेयर अर्थ के खनन, सेपरेशन और प्रसंस्करण की दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक है।

चीनी वैज्ञानिकों के आने से ईरान को अपनी रेयर अर्थ क्षमता को समझने और भविष्य में घरेलू प्रसंस्करण क्षमताएं विकसित करने में मदद मिलेगी। हालांकि ईरान को एक प्रमुख रेयर अर्थ उत्पादक बनने में अभी कई साल लगेंगे, क्योंकि इसके लिए व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक भंडार स्थापित करने के साथ-साथ खनन और प्रसंस्करण इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना होगा।

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इसके बावजूद, अमेरिका द्वारा चीन की घेराबंदी के प्रयासों के बीच चीन का ईरान जैसे देश के साथ मिलकर रणनीतिक खनिजों पर काम करना वैश्विक राजनीति और आर्थिक संतुलन के लिए एक बड़ा संकेत है।

Arunachal Pradesh: अरुणाचल की 27 जगहों का भारत ने कर दिया पक्का नामकरण! चीन को मिर्ची क्यों लगी ये भी समझिए

Arunachal Pradesh: भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के कुछ स्थानों के नाम बार-बार बदले जाने के जवाब में भारत ने पिछले सप्ताह औपचारिक रूप से राज्य के 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र पर उनके मानक भारतीय नामों के साथ दर्ज किया था। चीन के नागरिक मामलों का मंत्रालय 2017 से समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के लिए चीनी नाम जारी करता रहा है। ताकि उस क्षेत्र पर चीन के दावे को मजबूत किया जा सके। इस साल अप्रैल में भी नामों की एक नई लिस्ट जारी की गई थी।

अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की चीन की हरकत को भारत ने हमेशा स्पष्ट रूप से खारिज किया है। भारत ने लगातार ऐसे कदमों को निरर्थक और बेतुक बताया है। भारत ने कहा है कि इस तरह के प्रयास इस अटल सच्चाई को नहीं बदल सकते कि अरुणाचल प्रदेश हमेशा भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है, है और रहेगा। चीन तिब्बत को शीजांग और अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है।

भारत ने दिया सख्त संदेश

भारत द्वारा अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक क्षेत्रों को उनके आधिकारिक भारतीय नामों के साथ सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र पर दर्ज करना चीन को सख्त संदेश है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग स्थानों को अपने हिसाब से नाम देने की कोशिश करता रहा है। भारत ने चीन के इस कदम को पहले भी खारिज करते हुए साफ कहा है कि नाम बदलने से जमीन की वास्तविक स्थिति नहीं बदल सकती।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-चीन सीमा से जुड़े मामलों को भारत बेहद गंभीरता से लेता है और वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

27 जगहों के नाम तय करने का क्या मतलब है?

भारत ने अरुणाचल प्रदेश के आधिकारिक नक्शे में 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं को उनके मानक भारतीय नामों से दर्ज किया है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य इन स्थानों की सटीक पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों के बीच इनके बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इन स्थानों में कुछ ऐसे इलाके भी शामिल हैं, जिनका भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास और रणनीतिक दृष्टि से खास महत्व है।

जैसे लोंगजू (Long Ju) LAC के पास स्थित है। वर्ष 1959 में यह भारत-चीन तनाव के शुरुआती बड़े फ्लैशप्वाइंट में से एक रहा था, जब चीनी सेना ने इस इलाके में प्रवेश किया था। इसके अलावा अपर सुबनसिरी जिले का माजा गांव भी लिस्ट में शामिल है।

इसके अलावा इस लिस्ट में बिसा गांव तथा ऊंचाई वाले महत्वपूर्ण दर्रे ड्जो ला, रिजा ला और पुकुर ला भी शामिल हैं। वहीं, थाग ला भी इस लिस्ट का हिस्सा है, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र रहा था।

थाग ला और 1962 के युद्ध का कनेक्शन

थाग ला का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1962 के भारत-चीन युद्ध के शुरुआती दौर में यहां बड़ी सैन्य कार्रवाई हुई थी। यह इलाका ऊंचाई पर स्थित होने के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।इसी तरह जयरामपुर को भी लिस्ट में शामिल किया गया है। चांगलांग जिले में स्थित जयरामपुर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक केंद्र है और सुरक्षा बलों की आवाजाही के लिहाज से इसका महत्व है।

लिस्ट में सांभो सरोवर, बारा कुंडुन, छोटा कुंडुन, धनबाड़ी, प्रीतनगर, तेरीतनगर, रामनगर और जसवंतगढ़ जैसे स्थान भी शामिल हैं। जसवंतगढ़ में 1962 के युद्ध में शहीद भारतीय सैनिक जसवंत सिंह रावत की स्मृति से जुड़ा स्मारक है। इसके अलावा सागर, पद्मा, ज्योतिनगर और बैसाखी जैसे गांव भी सूची में हैं।

चीन अरुणाचल के नाम क्यों बदलता रहा है?

चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता रहा है। वह इसे जांगनान कहता है। इसी दावे के तहत चीन ने समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग स्थानों के लिए चीनी नाम जारी किए हैं। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने 2017 में पहली बार अरुणाचल प्रदेश के छह स्थानों के लिए नामों की लिस्ट जारी की थी। इसके बाद 2021 में 15 और 2023 में 11 स्थानों के नामों की लिस्ट जारी की गई।

भारत ने हर बार इन कोशिशों को खारिज किया है। नई दिल्ली का स्पष्ट रुख है कि किसी भारतीय इलाके का नाम बदलने की कोशिश से उसकी संप्रभुता या वास्तविक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता।इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी क्षेत्र में चीनी सैनिकों के आक्रामक रुख की खबरों ने भी चिंता बढ़ाई है। हालांकि चीन ने सीमा पर स्थिति को फिलहाल सामान्य और स्थिर बताया है।

 

अभी सीमा पर कैसे हैं हालात?

चीन ने बुधवार को कहा कि भारत-चीन सीमा पर स्थिति फिलहाल आम तौर पर स्थिर है। हालांकि, उसने अरुणाचल प्रदेश में सीमा के पास चीनी सेना की गतिविधियां बढ़ने संबंधी खबरों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन मीडिया के इन सवालों का जवाब दे रहे थे कि क्या हाल में भारत के साथ कोई सैन्य घटना हुई है और क्या चीन ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

गुओ ने कहा, “चीन-भारत सीमा पर स्थिति फिलहाल आम तौर पर स्थिर है।” उन्होंने बताया कि बीजिंग और नई दिल्ली ने भारत-चीन सीमा मामलों पर 36वीं बैठक पिछले हफ्ते आयोजित की थी।

भारत ने क्या कहा?

भारत ने मंगलवार को कहा था कि वह चीन की सीमा से लगे इलाकों से जुड़े मामलों को बेहद गंभीर मानता है। उसने इस बात पर जोर दिया था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूर है, क्योंकि सीमा की स्थिति दोनों देशों के आपसी संबंधों की आगे की दिशा तय करेगी। यह बयान अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी इलाके में चीनी सैनिकों के आक्रामक रुख अपनाने की अपुष्ट खबरों के बीच आया।

भारत ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान उनके आधिकारिक नामों से करने के अपने फैसले की चीन की ओर से की गई आलोचना को भी खारिज कर दिया। उसने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अटूट एवं अभिन्न हिस्सा है। इस अविवादित सत्य को कोई नहीं बदल सकता।

2020 से भारत और चीन के रिश्तों में भारी तनाव

वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई भीषण झड़पों और उसके बाद चार साल से ज्यादा समय तक चले सैन्य टकराव के कारण भारत और चीन के रिश्तों में भारी तनाव आ गया था। इसके बाद द्विपक्षीय रिश्तों को फिर से बेहतर बनाने के लिए दोनों देशों ने पिछले करीब एक साल से ज्यादा समय में कई कदम उठाए हैं।

अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में गतिरोध वाले अंतिम दो स्थान-देपसांग और डेमचोक से सैनिकों की वापसी से जुड़े समझौते को अंतिम रूप दिया था। समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के कजान में मुलाकात करके संबंध सुधारने के लिए कई फैसले लिए थे।

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पिछले साल अगस्त में मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन के तियानजिन शहर गए थे। एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर pm मोदी और जिनपिंग के बीच विस्तृत बातचीत हुई थी। इस बैठक में पीएम मोदी ने कहा था कि भारत आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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उत्तरी भारत से लेकर एशिया के बड़े हिस्से तक बादलों का एक विशाल पट्टा सैटेलाइट तस्वीरों में साफ नजर आया है। करीब 5,000 किलोमीटर लंबा यह मॉनसून क्लाउड बेल्ट पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत से होते हुए चीन तक फैला हुआ दिखाई दे रहा है। मौसम की यह सक्रिय स्थिति आने वाले दिनों में क्षेत्र के कई हिस्सों में व्यापक बारिश करा सकती है।

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सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा विशाल बादलों का घेरा

 

सैटेलाइट इमेज में नजर आ रहा यह पूरा क्षेत्र किसी एक विशाल तूफानी बादल का हिस्सा नहीं है। इसके बजाय यह मॉनसून सर्कुलेशन से जुड़ा गहरे संवहन (Deep Convection) और घने बादलों का लंबा क्षेत्र है। इसके भीतर कई गरज-चमक वाले बादलों और बारिश वाले सिस्टम के क्लस्टर मौजूद हैं। यह बादलों का विशाल बेल्ट पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत से शुरू होकर चीन तक फैला हुआ दिखाई दे रहा है। इसकी लंबाई 5,000 किलोमीटर से अधिक बताई जा रही है।

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सक्रिय मॉनसून से बढ़ी बारिश की गतिविधियां

 

मॉनसून के इस सक्रिय चरण के कारण कई इलाकों में गरज-चमक के साथ बारिश और भारी बारिश की गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं। इस दौरान अलग-अलग स्थानों पर बने थंडरस्टॉर्म क्लस्टर बारिश को बढ़ा सकते हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी देश के कई हिस्सों में व्यापक बारिश और गरज-चमक के साथ बौछारों का पूर्वानुमान जताया है। उत्तरी भारत के कई इलाकों में भी मॉनसून की सक्रियता के चलते बारिश की गतिविधियां जारी रहने की संभावना है।

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5,000 KM का क्लाउड बेल्ट क्यों है खास?

मॉनसून के दौरान इस तरह के लंबे बादल क्षेत्र बड़े पैमाने पर नमी और संवहन वाली गतिविधियों का संकेत देते हैं। हालांकि, पूरे बादल क्षेत्र को एक ही तूफानी सिस्टम मानना सही नहीं है। इसके भीतर अलग-अलग बारिश और गरज-चमक वाले सिस्टम सक्रिय हो सकते हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम को प्रभावित करते हैं। आने वाले दिनों में मॉनसून की यह सक्रियता उत्तर भारत समेत कई हिस्सों में बारिश का दौर बढ़ा सकती है।

हिमाचल प्रदेश में महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, कांग्रेस सरकार ने 60 पैसे प्रति लीटर अनाथ और विधवा सेस लगाया

Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश में पेट्रोल और डीजल आज से महंगा हो गया है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर 60 पैसे प्रति लीटर ऑर्फन एंड विडो यानी अनाथ और विधवा सेस (Orphan and Widow Cess) लगाने की घोषणा की है। यह सेस 11 अगस्त, 2026 की आधी रात से लागू हो गया है। राज्य के टैक्स और आबकारी विभाग ने 11 अगस्त को जारी एक नोटिफिकेशन में कहा कि यह सेस पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल दोनों पर ₹0.60 (60 पैसे) प्रति लीटर की दर से लगाया जाएगा।

नोटिफिकेशन के अनुसार, अनाथ और विधवा सेस हिमाचल प्रदेश में पहली बार बिक्री के समय लगाया जाएगा। यह सेस ‘हिमाचल प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट, 2005’ की धारा 6-A के तहत लागू किया गया है। इसे मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिली हुई है। यह सेस मार्च में राज्य विधानसभा द्वारा ‘हिमाचल प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स (संशोधन) बिल, 2026’ पास किए जाने के बाद लगाया गया है।

अभी और महंगा होने की आशंका

इस संशोधन ने पेट्रोल और हाई-स्पीड डीज़ल पर ‘अनाथ और विधवा सेस’ लगाने के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया। हमारे सहयोगी cnbctv18.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक संशोधित कानून के तहत, सरकार ₹5 प्रति लीटर तक की दर से सेस लगा सकती है। अभी जो 60 पैसे का सेस लगाया गया है। वह कानून में तय अधिकतम सीमा से काफी कम है।

जब यह बिल पेश किया गया था, तो राज्य सरकार ने कहा था कि इस सेस का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की विधवाओं और अनाथों के कल्याणकारी कार्यों के लिए रेवेन्यू का एक खास और टिकाऊ जरिया बनाना है। राज्य सरकार ने पहले कहा था कि यह सेस हिमाचल प्रदेश के भीतर बिक्री के शुरुआती चरण पर वसूला जाएगा, न कि बिक्री के बाद के चरणों में। मार्च में बने कानून में मौजूदा VAT कानून के तहत पहले से लागू टैक्स के अलावा यह सेस लगाने का प्रावधान है।

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इस बीच, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के लिए कांग्रेस आलाकमान की अंतिम मंजूरी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। सुक्खू ने डिया से बातचीत के दौरान कहा कि कुल्लू से कांग्रेस विधायक सुंदर सिंह ठाकुर जल्द होने वाली पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) की बैठक से पहले या बाद में शपथ ले सकते हैं।

क्या AI तय करेगा अगली महाशक्ति? मार्क जुकरबर्ग ने चीन को लेकर ऐसा बता दिया जिसने उड़ाई दिग्गजों की नींद

AI Decide Global Superpower: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला लगातार तेज हो रहा है। इसी बीच Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उसने AI के लिए जरूरी एनर्जी और डेटा सेंटर का इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से नहीं बढ़ाया, तो वह इस क्षेत्र में चीन से पिछड़ सकता है। एक नोट में जुकरबर्ग ने कहा कि जो देश एडवांस्ड AI के डेवलपमेंट और इस्तेमाल में आगे रहेंगे, उनका दुनिया में ताकत के संतुलन पर बड़ा असर होगा। इसका असर लोकतंत्र, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

जुकरबर्ग के मुताबिक, आने वाले समय में जो देश अत्याधुनिक AI को विकसित करने और बड़े पैमाने पर अपनाने में सबसे आगे रहेंगे, वे दुनिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की स्थिति में होंगे। इसका असर सिर्फ टेक्नोलॉली सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “जो देश एडवांस्ड AI के डेवलपमेंट और इस्तेमाल में आगे रहेंगे, वे एक नए जियोपॉलिटिकल पावर बैलेंस में योगदान देंगे। यही भविष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों, समृद्धि और सुरक्षा की स्थिति तय करेगा।”

क्या अमेरिका को चीन के AI बूम से टेंशन लेनी चाहिए?

सिलिकॉन पर अमेरिका के एक्सपोर्ट कंट्रोल का समर्थन करते हुए जुकरबर्ग ने कहा कि AI को सपोर्ट करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में चीन की तेजी से हो रही तरक्की वॉशिंगटन के लिए खास चिंता का विषय है। उन्होंने माना कि सिलिकॉन डिजाइन में अमेरिका को बढ़त हासिल है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि एनर्जी कैपेसिटी बढ़ाने और AI के लिए जरूरी फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के मामले में वह पिछड़ रहा है। उन्होंने कहा, “चीन जैसे देश हर दूसरे हफ्ते 1GW से ज्यादा न्यूक्लियर कैपेसिटी शुरू कर रहे हैं। इसलिए कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए हमें एनर्जी और डेटा सेंटर बनाने की रफ़्तार बढ़ानी होगी।”

AI की दौड़ में चीन से क्यों चिंतित हैं जुकरबर्ग?

जुकरबर्ग ने अपने एक नोट में चीन की तेजी से बढ़ती AI इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमता को अमेरिका के लिए खास चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि AI मॉडल बनाने के लिए सिर्फ बेहतरीन चिप डिजाइन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए भारी मात्रा में बिजली, बड़े डेटा सेंटर और मजबूत फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। उनके मुताबिक, अमेरिका के पास सिलिकॉन डिजाइन के क्षेत्र में बढ़त है। उनके मुताबिक ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और AI के लिए जरूरी डेटा सेंटर बनाने में चीन की गति से अमेरिका पीछे रह रहा है। जुकरबर्ग ने कहा कि चीन हर कुछ हफ्तों में बड़ी मात्रा में नई परमाणु ऊर्जा क्षमता ऑनलाइन ला रहा है।

AI को लोग बना लेंगे हथियार!

जुकरबर्ग की चेतावनी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू AI को वैश्विक शक्ति संतुलन से जोड़ना है। उनका कहना है कि भविष्य में अत्याधुनिक AI के विकास और उसके इस्तेमाल में कौन से देश सबसे आगे रहते हैं, इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्य, समृद्धि और सुरक्षा किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।

यानी AI की दौड़ को केवल कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे बड़ी तस्वीर यह है कि AI में तकनीकी बढ़त हासिल करने वाला देश आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।

अमेरिका के लिए बिजली बड़ी चुनौती

अमेरिका ने AI से जुड़ी हाई टेक्नोलॉजी और चिप्स को लेकर चीन सहित कुछ देशों पर निर्यात करने पर प्रतिबंध लगाए हैं। जुकरबर्ग ने इन प्रतिबंधों को जारी रखने का समर्थन किया है। उनका मानना है कि इन प्रतिबंधों ने महत्वपूर्ण दौर में दूसरे देशों में AI के विकास की गति को धीमा किया है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि केवल चिप्स पर कंट्रोल रखना पर्याप्त नहीं होगा।

AI सिस्टम को चलाने और लोगों को ट्रेंड करने के लिए विशाल कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। इसके लिए लगातार बिजली की आपूर्ति आवश्यक है। इसलिए अमेरिका को अपनी ऊर्जा क्षमता और डेटा सेंटर नेटवर्क का तेजी से विस्तार करना होगा।

AI इतिहास का सबसे कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री?

जुकरबर्ग ने AI को इतिहास के सबसे कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री में से एक बताया। उनके मुताबिक AI के सेक्टर में नई तकनीक और इनोवेशन बेहद तेजी से दूसरे खिलाड़ियों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में कुछ ही महीनों में उनकी नकल या उन्हें अपनाया जा सकता है। यही वजह है कि AI की इस दौड़ में छोटी-सी बढ़त भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

जुकरबर्ग का कहना है कि कभी-कभी सिर्फ दो महीने की बढ़त भी मायने रख सकती है। उन्होंने अमेरिका से ऐसी पॉलिसी बनाने की अपील की है, जो AI इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण को तेज करें। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि घरेलू AI मॉडल को बाजार में जारी करने में अनावश्यक देरी भी अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नुकसान पहुंचा सकती है।

चीन की बढ़त से अमेरिका को खतरा?

जुकरबर्ग की चिंता का मूल कारण यह है कि AI आने वाले सालों में अर्थव्यवस्था से लेकर रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा तक लगभग हर बड़े सेक्टर को प्रभावित कर सकता है। अगर चीन AI मॉडल, कंप्यूटिंग क्षमता, एनर्जी और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से आगे बढ़ता है और अमेरिका पर्याप्त रफ्तार से अपनी क्षमता नहीं बढ़ाता, तो दोनों देशों के बीच तकनीकी अंतर कम हो सकता है। या फिर चीन कुछ क्षेत्रों में बढ़त हासिल कर सकता है।

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ऐसे में AI की मौजूदा दौड़ भविष्य में अमेरिका-चीन के बीच वैश्विक प्रभाव की बड़ी लड़ाई में बदल सकती है। आपको बता दें कि जिस देश के पास पर्याप्त चिप्स, बिजली, डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग क्षमता होगी, उसके पास AI को बड़े पैमाने पर विकसित और इस्तेमाल करने की क्षमता भी ज्यादा होगी।

अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था

अमेरिकी राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। दरअसल, शुक्रवार को अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर किया था। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। पहले 500%टैरिफ का प्रस्ताव था 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह बिल कानून बना तो भारत पर असर पहली स्थिति: भारत रूस से तेल खरीदता रहे अमेरिका के 100% टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात बिल पर पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिका में दोगुना महंगा हो जाएगा। अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन। नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स आदि के ऑर्डर घट जाएंगे। दूसरी स्थिति: भारत रूस को छोड़कर दूसरे देशों से तेल खरीदे तो रूस से आने वाले तेल पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ता है, तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा। यह महंगा पड़ सकता है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। अमेरिका के प्रतिबंध पूरे असरदार नहीं अमेरिका के प्रतिबंध और टैरिफ से कई देशों की अर्थव्यवस्था और कारोबार पर असर पड़ा, लेकिन राजनीतिक मकसद हमेशा पूरे नहीं हुए। 1. क्यूबा: 1960 से अमेरिका ने 1960 में क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। छह दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये प्रतिबंध क्यूबा की सरकार को बदलने में सफल नहीं हुए। क्यूबा ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र में कहा कि इन प्रतिबंधों से उसे अब तक 159 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है। 2. इराक: 1990 से इराक पर 1990 में आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। इनका उसकी अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ा। तेल से होने वाली कमाई और जरूरी सामान के आयात पर असर पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में प्रतिबंधों के दौरान भूख, बीमारी और गरीबी बढ़ने की बात कही गई। 3. ईरान: 2012 से 2012 में कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ईरान का तेल निर्यात करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन घट गया। उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दो साल तक मंदी में रही। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2012-14 के दौरान प्रतिबंधों से ईरान के निर्यात को 17.1 अरब डॉलर, यानी उसकी GDP के करीब 4.5% का नुकसान हुआ। 4. चीन: 2018 से अमेरिका ने 2018 में चीन से आने वाले करीब 250 अरब डॉलर के सामान पर अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगाया। 2019 में चीन से अमेरिका आने वाला सामान 16.2% घटकर 452.2 अरब डॉलर रह गया और दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 17.6% कम हुआ। लेकिन अमेरिकी व्यापार आयोग के मुताबिक, इन टैरिफ का ज्यादातर खर्च अमेरिकी कंपनियों और खरीदारों ने उठाया। 5. रूस: 2022 से यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और दूसरे देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे रूस के लिए विदेशों से पैसा जुटाना, कारोबार करना और जरूरी तकनीक हासिल करना मुश्किल हुआ। IMF ने अप्रैल 2022 में अनुमान लगाया था कि उस साल रूस की अर्थव्यवस्था 8.5% घट सकती है। लेकिन रूस ने तेल समेत अपना सामान दूसरे देशों में बेचकर नुकसान को कुछ कम कर लिया। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दावा- अरुणाचल में चीनी घुसपैठ की बात झूठी:पड़ोसी देश की हरकतों पर भारतीय सेना की नजर; विदेश मंत्रालय बोला- अरुणाचल हमारा अटूट हिस्सा

अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के सूत्रों ने दावा किया कि चीनी घुसपैठ की बातें झूठी हैं। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक सेना ने मंगलवार को कहा कि सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस लगातार चीन की हरकतों पर नजर रखे हुए है और सोशल मीडिया पर किए जा रहे घुसपैठ के दावे गलत हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने भी कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट हिस्सा है। MEA ने यह बात चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के स्थानों को चीनी नाम देने की कोशिशों के बीच कही है। चीन के LAC पार कर घुसपैठ का दावा किया गया था मीडिया रिपोर्ट्स में स्थानीय लोगों दावा किया थीं कि चीन के सैनिक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में घुस आए थे। बताया गया था कि चीनी सैनिकों ने LAC पार कर पुकार ला और ओल्लो इलाके में प्रवेश किया। इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 6 अगस्त को भारत-चीन सीमा मामलों पर सलाह और तालमेल के लिए बनी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई थी। इस बैठक में दोनों देशों ने खुलकर बातचीत की। LAC पर मौजूदा हालात की भी समीक्षा की गई। भारत ने कहा कि सीमा इलाकों में शांति और सुकून बना रहना जरूरी है। यही दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए भी जरूरी है। चीन अरुणाचल को ‘साउथ तिब्बत’ बताता रहा है ANI के मुताबिक, चीन अरुणाचल प्रदेश पर ‘साउथ तिब्बत’ के नाम से दावा करता रहा है। 1960 की सीमा वार्ता में चीन ने अरुणाचल प्रदेश की करीब 69,000 वर्ग किमी जमीन पर दावा किया था। भारत ने चीन के इस दावे को कई बार खारिज किया है। भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और उनकी भौगोलिक विशेषताओं को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया था। इस पर चीन ने कहा कि भारत का अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को अपने मैप पर दिखाना गलत है। यह अमान्य’ है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन ने कई बार अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता।