चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 1989 के तियानमेन प्रदर्शन को रोकने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की गई कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की भी तारीफ की। शी ने कहा कि उस समय जियांग ने पार्टी के फैसले का साथ दिया और शंघाई में हालात को काबू में रखने में अहम भूमिका निभाई। शी ने यह बात सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने चीन के सामने मौजूद चुनौतियों का भी जिक्र किया। शी ने लोगों से मुश्किल वक्त में हार न मानने और हर चुनौती का डटकर सामना करने की अपील की। जिनपिंग ने कहा कि चीन के सामने चाहे कितनी भी बड़ी चुनौती आए, वह पीछे नहीं हटेगा। 1989 में तियानमेन स्क्वायर पर क्या हुआ था? 1989 में चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर पर लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए थे। कई हफ्तों तक चले इन प्रदर्शनों में हजारों छात्र और आम नागरिक शामिल हुए थे। इसके बाद चीनी सेना ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया और प्रदर्शन को कुचल दिया। कार्रवाई में सेना और टैंकों का इस्तेमाल किया गया था। इस घटना में कितने लोगों की मौत हुई, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। चीन की सरकार ने 200 से ज्यादा लोगों की मौत की बात कही थी। वहीं, अलग-अलग विदेशी स्रोतों और अनुमानों में मृतकों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक बताई गई है। तियानमेन की यह घटना आज भी चीन में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इस घटना से जुड़ी चर्चा और जानकारी के प्रसार पर चीन में कड़े प्रतिबंध हैं। तियानमेन के बाद जियांग जेमिन बने चीन के टॉप लीडर तियानमेन प्रदर्शन कुचले जाने के कुछ समय बाद जियांग जेमिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे। उनसे पहले इस पद पर झाओ जियांग थे। झाओ जियांग को प्रदर्शनकारियों के प्रति नरम रुख रखने वाला माना गया था। इसी वजह से उन्हें पद से हटा दिया गया था। इसके बाद जियांग जेमिन तेजी से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में पहुंचे। 1993 तक जियांग चीन के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल हो चुके थे। वे 1993 से 2002 तक चीन के राष्ट्रपति रहे। 30 नवंबर 2022 को 96 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। जियांग ने चीन की इकोनॉमी दुनिया के लिए खोली जियांग जेमिन के शासनकाल में चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। इस दौरान चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए और खोला। अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में भी सुधार हुआ। 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना। उस समय अमेरिका ने भी चीन के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने का समर्थन किया था। इसके बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका और मजबूत हुई। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के रिश्ते काफी बदल गए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर कई बार तनाव बढ़ा है। इसके अलावा ताइवान, तकनीक और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी दोनों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक टकराव बढ़ा है। जिनपिंग ने चीन की उपलब्धियों का जिक्र किया शी ने अपने भाषण में चीन की उपलब्धियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन के लोगों का जीवन लगातार बेहतर हो रहा है। हालांकि, हाल के आर्थिक आंकड़े चीन की आर्थिक विकास दर में धीमापन दिखा रहे हैं। इसके बावजूद शी ने चीन के भविष्य को लेकर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान की संभावनाएं उज्ज्वल हैं। उनके मुताबिक, कई पीढ़ियों से चीन जिस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा है, वह धीरे-धीरे हकीकत बन रहा है। जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में चीन के शीर्ष नेता मौजूद रहे। चीन की सबसे ताकतवर पोलित ब्यूरो स्थायी समिति के सभी सात सदस्य कार्यक्रम में शामिल हुए।

चीन के साथ कड़े मुकाबले में 2-2 से ड्रॉ खेलने के बाद अपनी पहली जीत की उम्मीद में भारतीय महिला टीम कल FIH वर्ल्ड कप हॉकी टूर्नामेंट में अपने दूसरे पूल डी मैच में दक्षिण अफ्रीका का सामना करेगी। भारत ने चीन के खिलाफ अच्छी शुरुआत की, जिसमें नवनीत और दीपिका ने गोल करके अपनी शानदार फॉर्म जारी रखी।
चीन ने दो बार वापसी करते हुए बराबरी की, लेकिन भारत की अनुशासित रक्षापंक्ति और लड़ने के जज्बे ने उन्हें टूर्नामेंट की प्रमुख टीमों में से एक के खिलाफ एक अहम अंक दिलाने में मदद की। इस नतीजे से दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ होने वाले मैच से पहले भारत का आत्मविश्वास बढ़ेगा, साथ ही यह भी पता चलेगा कि अपनी सकारात्मक लय को तीन अंक में बदलना कितना जरूरी है।
वहीं, दक्षिण अफ्रीका अपने पहले मैच में इंग्लैंड से 4-0 से हारने के बाद वापसी करने के लिए उत्सुक होगा। इंग्लैंड अभी पूल में सबसे आगे है, जबकि भारत और चीन पहले दिन ड्रॉ खेलने के बाद अंक के मामले में दूसरे स्थान पर हैं। टूर्नामेंट के पहले चरण से हर पूल की शीर्ष दो टीमें आगे बढ़ेंगी और सेमीफाइनल की दौड़ में बनी रहेंगी, इसलिए हर अंक बहुत अहम हो जाता है।
इसलिए भारत इस मुकाबले में यह जानते हुए उतरेगा कि जीत से उनके क्वालिफिकेशन की उम्मीदों को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वे चीन के खिलाफ दिखाई गई तीव्रता और संयम को बनाए रखें और साथ ही अटैकिंग थर्ड में और अधिक सटीक खेलें।
The front line is ready to make some noise!
Meet the forwards of the Indian Women’s Team, bringing speed, skill and attacking intent to the FIH Hockey World Cup Belgium & Netherlands 2026.
Star Select 2 (SD+HD) + Khel & JioHotstar and DD Sports (DD Free Dish)
… pic.twitter.com/DsZ7RR4QZl— Hockey India (@TheHockeyIndia) August 13, 2026
टूर्नामेंट की शुरुआत में नवनीत और दीपिका की फॉर्म आत्मविश्वास का बड़ा स्रोत होगी, जबकि दबाव झेलने की टीम की क्षमता का फिर से परीक्षण किया जाएगा। दूसरी ओर, दक्षिण अफ्रीका अपनी शुरुआती हार के बाद मजबूत वापसी करने के लिए पूरी तरह तैयार होगा। भारत को एक ऐसी टीम से कड़े मुकाबले की उम्मीद करनी चाहिए जिसके पास दांव पर लगाने के लिए बहुत कुछ है।
भारतीय टीम चीन के खिलाफ दिखाए गए भरोसे और जीतने की जबरदस्त इच्छाशक्ति से आत्मविश्वास हासिल करेगी। अब, इस विश्व कप में अपनी पहली जीत पर नजर रखते हुए, भारत उसी आधार को आगे बढ़ाना चाहेगा, तीन अहम अंक हासिल करना चाहेगा और कड़े मुकाबले वाले पूल डी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगा।
मैच का समय – शाम 6.30 बजे
कहां देखें- स्टार सिलेक्ट या फिर जियो हॉटस्टार पर

भारत ने प्रबल दावेदार चीन के साथ हॉकी महिला विश्व कप मुकाबले में रविवार को दो बार बढ़त बनाने के बाद 2-2 का ड्रा खेला।भारत इस परिणाम से कॉन्फिडेंस लेगा। चीन फेवरेट के तौर पर आया था, लेकिन दोनों टीमों में से भारत ज़्यादा खुश होगा।
उन्होंने नवनीत की आठवें मिनट में शानदार फिनिश की वजह से लीड ली और फिर दीपिका ने 25वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर से स्कोर 2-1 कर दिया। चीन ने दोनों गोल किए, झांग यिंग ने शिल्पी के फाउल के बाद 15वें मिनट में पेनल्टी स्ट्रोक को गोल में बदला और फिर मा निंग ने तीसरे क्वार्टर में 39वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर पर गोल करके स्कोर 2-2 कर दिया।
The Indian Women’s Team showed immense character, resilience and fighting spirit to secure a hard-fought 2-2 draw against Olympic silver medallists China in their opening match of the FIH Hockey… pic.twitter.com/QIYons4rEN
— Hockey India (@TheHockeyIndia) August 16, 2026
चीन ने आखिरी क्वार्टर में ज़ोर लगाया, भारत ने प्रेशर झेलते हुए एक पॉइंट हासिल किया।इंग्लैंड दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपनी पिछली जीत के बाद ग्रुप में सबसे आगे है। चीन और भारत ने इस गेम से एक-एक पॉइंट हासिल किया।ग्रुप से दूसरे राउंड में सिर्फ़ दो टीमें ही आगे बढ़ी हैं, इसलिए चीन और भारत दोनों अपने अगले गेम में पॉइंट गंवाने का रिस्क नहीं उठा सकते।
Amber Enterprises: इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Amber Enterprises India अगले साल से चीन की स्मार्टफोन कंपनियों Oppo, OnePlus और Realme के लिए भारत में फोन बनाना शुरू करेगी। कंपनी ने कहा है कि ट्रायल प्रोडक्शन वित्त वर्ष 2027 की चौथी तिमाही में शुरू होगा। वहीं, कमर्शियल प्रोडक्शन FY28 की पहली तिमाही यानी मार्च 2027 के बाद शुरू होने की उम्मीद है।
पहले साल 80 लाख का टारगेट
एंबर एंटरप्राइजेज के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और CEO जसबीर सिंह ने बताया कि पहले साल करीब 80 लाख स्मार्टफोन बनाने का लक्ष्य है। दूसरे साल इसे बढ़ाकर 1.5 से 1.6 करोड़ यूनिट तक पहुंचाने की योजना है। कंपनी ने अपने मोबाइल कारोबार के लिए नया COO भी नियुक्त किया है।
कंपनी ने Oppo Mobiles India के साथ मैन्युफैक्चरिंग सहयोग समझौता किया है। इसके तहत कंपनी Oppo, OnePlus और Realme तीनों ब्रांड के स्मार्टफोन बनाएगी।
चीन की कंपनियां अपना मॉडल बदल रहीं
ये कदम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चीन की स्मार्टफोन कंपनियां भारत में खुद फैक्ट्री चलाने की बजाय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अपनाने लगी हैं। अभी Oppo के कुछ फोन Vivo की नोएडा फैक्ट्री में भी बनते हैं। वहीं, Vivo अपनी फैक्ट्री को Dixon Technologies के साथ जॉइंट वेंचर में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में है।
भारतीय बाजार में मजबूत पकड़
Counterpoint Research के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में Vivo की भारतीय स्मार्टफोन बाजार में 17.8% हिस्सेदारी रही। Samsung 17.6% के साथ दूसरे नंबर पर रहा, जबकि Oppo की हिस्सेदारी 13.6% रही। अगर Vivo, iQOO, Oppo, Realme और OnePlus को मिलाकर देखें, तो इन ब्रांड्स की संयुक्त हिस्सेदारी 45.6% रही।
PCB कारोबार में दबाव
एंबर एंटरप्राइजेज ने बताया कि उसके PCB कारोबार में फिलहाल मार्जिन पर दबाव है। इसकी वजह Copper-Clad Laminate (CCL) की बढ़ती कीमतें हैं। हालांकि, कंपनी धीरे-धीरे इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचा रही है।
Amber Enterprises की योजना 2029-30 तक अपना CCL प्लांट लगाने की भी है। इससे भविष्य में कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
एंबर एंटरप्राइजेज के शेयरों का हाल
एंबर एंटरप्राइजेज का शेयर पिछले कारोबारी सत्र में 0.68% बढ़कर 7,224 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 महीने में स्टॉक 9.89% गिरा है। वहीं, 1 साल में यह 2.88% टूटा है। हालांकि, बीते 5 साल में इसने 158% का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। कंपनी का मार्केट कैप 24.48 हजार करोड़ रुपये है।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।
दुनिया भर में 200 से ज्यादा देश मौजूद हैं। वहीं दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका इतिहास हजारों साल पुराना है। ये देश हजारों सालों से पुरानी सभ्यताओं, संस्कृति और परंपराओं को आज भी बनाए हुए है। मिस्र, भारत और चीन जैसे देशों से लेकर सैन मैरिनो तक, कई देशों ने सदियों के बदलाव के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया के सबसे पुराने देश कौन-कौन है। आइए जानते हैं दुनिया के कुछ सबसे पुराने देशों के बारे में, जिनका इतिहास आज भी लोगों को हैरान करता है।
दुनिया का सबसे पुराना देश कौन सा है, इसका कोई एक तय जवाब नहीं है। किसी देश की उम्र उसकी प्राचीन सभ्यता, राज्य के गठन या लंबे राजनीतिक इतिहास के आधार पर तय की जा सकती है। इसलिए कई देशों को दुनिया के सबसे पुराने देशों में गिना जाता है।
मिस्र (लगभग 3100 ईसा पूर्व): मिस्र का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसे दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिना जाता है। नील नदी के किनारे विकसित मिस्र की सभ्यता अपनी भव्य वास्तुकला और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां के पिरामिड और प्राचीन मंदिर आज भी इसके समृद्ध इतिहास की गवाही देते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, करीब 3100 ईसा पूर्व राजा नार्मर के शासन में ऊपरी और निचले मिस्र का एकीकरण हुआ था, जिसे प्राचीन मिस्र के शुरुआती राजवंशीय दौर की शुरुआत माना जाता है।
भारत (लगभग 3300 ईसा पूर्व): भारत को दुनिया के सबसे पुराने देशों में से एक माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती हैं। करीब 3300 ईसा पूर्व के आसपास विकसित हुई सिंधु घाटी सभ्यता को दुनिया की शुरुआती शहरी सभ्यताओं में गिना जाता है। इसके बाद भारत में वैदिक काल के साथ कई राजवंशों और साम्राज्यों का विकास हुआ। प्राचीन भारत ने गणित, विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और साहित्य जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी देश की कई पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।
चीन (लगभग 2070 ईसा पूर्व): चीन का इतिहास दुनिया के सबसे पुराने इतिहासों में शामिल है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, शिया राजवंश की शुरुआत करीब 2070 ईसा पूर्व हुई थी। अलग-अलग राजवंशों ने चीन की संस्कृति और तकनीक को आगे बढ़ाया। कागज, छपाई, बारूद और कंपास जैसे आविष्कारों के लिए भी चीन प्रसिद्ध है।
जॉर्जिया (लगभग 1500 ईसा पूर्व): जॉर्जिया का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसका संबंध कोल्चिस व आइबेरिया जैसे प्राचीन राज्यों से माना जाता है। कई साम्राज्यों के प्रभाव के बावजूद जॉर्जिया ने अपनी संस्कृति और पहचान को बनाए रखा है।
इथियोपिया (लगभग 980 ईसा पूर्व): इथियोपिया का इतिहास अफ्रीका के सबसे पुराने और समृद्ध इतिहासों में शामिल है। यहां कई प्राचीन राज्य और संस्कृतियां विकसित हुईं। यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के दौर में भी इसने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी, हालांकि 1936 से 1941 तक इटली ने यहां कब्जा किया था।
ग्रीस (लगभग 800 ईसा पूर्व): ग्रीस का प्राचीन इतिहास दुनिया की सबसे प्रभावशाली सभ्यताओं में गिना जाता है। दर्शन, विज्ञान, कला और राजनीति में इसके योगदान का असर आज भी दिखता है। सुकरात, प्लेटो और अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने दुनिया की सोच को प्रभावित किया।
ईरान (लगभग 550 ईसा पूर्व): ईरान का इतिहास प्राचीन फारस से जुड़ा है। करीब छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस द ग्रेट ने अकेमेनिड साम्राज्य की नींव रखी, जो पश्चिम एशिया की बड़ी शक्तियों में शामिल था।
जापान (परंपरागत रूप से 660 ईसा पूर्व): जापान के इतिहास में 660 ईसा पूर्व का समय काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इसी समय सम्राट जिम्मू ने जापान की गद्दी संभाली थी। लेकिन, इतिहासकार इस तारीख को प्रमाणित नहीं मानते। जापान आज भी अपनी पुरानी संस्कृति और आधुनिक तकनीक के मेल के लिए जाना जाता है।
आर्मेनिया (पारंपरिक रूप से 2492 ईसा पूर्व): आर्मेनिया का इतिहास और संस्कृति काफी पुरानी है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, आर्मेनियाई लोगों का संबंध हायक नामक पूर्वज से जोड़ा जाता है। यह क्षेत्र कई प्राचीन राज्यों का केंद्र रहा है। करीब 301 ईस्वी में आर्मेनिया ने ईसाई धर्म को राजकीय धर्म बनाया था।
सैन मैरिनो (301 ईस्वी): इटली से घिरा सैन मैरिनो दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक है। मान्यता है कि सेंट मैरिनस ने 301 ईस्वी में इसकी स्थापना की थी। आज भी यह अपनी पुरानी राजनीतिक पहचान बनाए हुए है।
समय के साथ दुनिया में कई बड़े साम्राज्य आए और उनका अंत भी हुआ, लेकिन कुछ देशों ने अपनी पुरानी संस्कृति और विरासत को आज तक संभालकर रखा है। भारत, मिस्र और ग्रीस इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इन देशों का लंबा इतिहास उनकी समृद्ध सभ्यता और परंपराओं की खास पहचान को दर्शाता है
Suryapath Tiranga: स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर एक अनोखा वैश्विक जश्न देखने को मिला, जिसमें तिरंगा सूरज की उगती किरणों के रास्ते के साथ पूरी दुनिया में यात्रा करते हुए नजर आया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इस वैश्विक आयोजन की पूरी जानकारी साझा की गई है, जिसे सूर्यपथ तिरंगा नाम दिया गया है। यह विशेष पहल हर घर तिरंगा 2026 अभियान के तहत आयोजित की गई थी।
फिजी से शुरू हुई सूर्यपथ तिरंगा की वैश्विक यात्रा
संस्कृति मंत्रालय के बयान के मुताबिक सूर्यपथ तिरंगा की इस अनूठी यात्रा की शुरुआत भारतीय समयानुसार (IST) रात 1:30 बजे फिजी से हुई, जहां रिले के पहले प्वाइंट पर तिरंगा फहराया गया। फिजी के बाद यह प्रतीकात्मक यात्रा सूरज की चाल के साथ पश्चिम की ओर बढ़ी और न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया गणराज्य, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और म्यांमार से होते हुए आगे बढ़ी। दुनिया भर में स्थित भारतीय मिशनों और पोस्ट्स पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया जिससे समय क्षेत्रों और महाद्वीपों के पार तिरंगे की एक निरंतर दृश्य रिले तैयार हुई।
सुबह 8:00 बजे तक यह यात्रा बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव तक पहुंच चुकी थी, जो पूरे क्षेत्र में भारत के गौरव और एकता का संदेश ले जा रही थी। इसके बाद यह रिले पश्चिम की ओर बढ़ते हुए उज्बेकिस्तान और ओमान से गुजरी, सुबह 9:45 बजे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे कतर तक जा पहुंची। मात्र नौ घंटों में तिरंगे ने प्रशांत महासागर में दिन के सबसे पहले उजाले से लेकर पश्चिम एशिया तक की प्रतीकात्मक यात्रा पूरी की, जिसके जरिए 21 देशों और मिशनों/पोस्ट्स को एक साझा राष्ट्रीय प्रतीक से जोड़ा गया। ‘सूर्यपथ तिरंगा’ ने उगते सूरज को देशभक्ति के एक वैश्विक रिले में बदल दिया।
अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक फैला तिरंगे का कारवां
संस्कृति मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार, भारतीय समयानुसार सुबह 10:45 बजे के बाद ‘सूर्यपथ तिरंगा’ की पश्चिम की ओर यात्रा लगातार जारी रही। यह सफर कुवैत, सऊदी अरब, इथियोपिया, रूस, केन्या, इजराइल, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका से होकर गुजरा। हर एक झंडा फहराने के साथ तिरंगा नए टाइम जोन और भूगोल को पार करता हुआ पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरेशिया तक पहुंच गया। दोपहर 12:30 बजे तक यह रिले प्रिटोरिया पहुंच चुकी थी।
इसके बाद यात्रा ने यूरोप में प्रवेश किया, जहां लातविया से लेकर जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, मोरक्को और आइसलैंड तक लगातार तिरंगा फहराया गया। दोपहर 12:45 बजे रीगा से शुरू होकर दोपहर 3:00 बजे रेकजाविक तक इस रिले ने पूरे यूरोप में जश्न की एक अद्भुत श्रृंखला बना दी। जैसे-जैसे ‘सूर्यपथ तिरंगा’ और पश्चिम की ओर बढ़ा, यह यात्रा अटलांटिक पार करते हुए अमेरिका की तरफ बढ़ गई।
क्या है सूर्यपथ तिरंगा का उद्देश्य?
हर घर तिरंगा 2026 के तहत इस विशेष पहल पर बात करते हुए संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि सूर्यपथ तिरंगा हमारे देश के शक्तिशाली प्रतीक तिरंगे के जरिए भारत की भावना को पूरी दुनिया तक पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि उगते सूरज के पथ का अनुसरण करते हुए यह अनूठी रिले हमारे मिशनों और भारतीय प्रवासियों को भारत की एकता, विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों के साझा जश्न में पिरोती है। यह दुनिया भर के भारतीयों के लिए एक आमंत्रण है कि वे एक साथ आएं और भारत की चिरस्थायी भावना को दुनिया के साथ साझा करें। कुल मिलाकर 40 से अधिक देशों में भारतीय नागरिकों और भारत के मित्रों को जोड़ने वाली इस ग्लोबल तिरंगा रिले ने यह साबित कर दिया कि सूरज जहां भी उगता है, वहां तिरंगे की भावना साथ चलती है।
SURYAPATH TIRANGA Global Relay Goes Live, following the path of the Rising Sun
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से आज तेरहवीं बार झंडा फहराया। इसी के साथ मोदी ने शासन प्रमुख के तौर पर झंडा फहराने का एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया, लगातार 25 बार झंडोत्तोलन करने का। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी पहले ही बारह बार राष्ट्र ध्वज राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में फहरा चुके हैं और देश के प्रधानमंत्री के तौर पर आज तेरहवीं बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर वो सिल्वर जुबली का ऐसा रिकॉर्ड बना गये, जो जल्दी टूटने वाला नहीं है।
इससे पहले सबसे अधिक झंडोत्तोलन का रिकॉर्ड राज्य स्तर पर तीन मुख्यमंत्रियों के नाम था, ज्योति बसु, पवन कुमार चामलिंग और नवीन पटनायक ने लगातार चौबीस बार झंडोत्तोलन करने का रिकॉर्ड बनाया था। उन तीनों में सबसे पहले ये कीर्तिमान पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर ज्योति बसु ने जून 1977 से लेकर नवंबर 2000 के बीच बनाया था। आगे चलकर सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने दिसंबर 1994 से मई 2019 के बीच और ओडीशा के मुख्यमंत्री के तौर पर के नवीन पटनायक ने मार्च 2000 से जून 2024 के बीच इसकी बराबरी की। मोदी इन तीनों से अब आगे निकल गये हैं। न सिर्फ सीएम से लेकर पीएम तक सबसे अधिक समय तक प्रशासनिक प्रमुख बने रहने का, बल्कि सबसे अधिक बार झंडा फहराने का, जो रिकॉर्ड उन्होंने देश के अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर बनाया।

राष्ट्र ध्वज फहराने के मामले में आज सिल्वर जुबली मनाने वाले मोदी अगले दो महीने के अंदर अपने प्रशासनिक कैरियर की भी सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं। सात अक्टूबर के दिन उन्हें प्रशासन के शीर्ष पर रहते हुए 25 साल हो जाएंगे, सात अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात का सीएम बनने वाले मोदी लगातार मिले जनसमर्थन के कारण सीएम से पीएम तक की अपनी प्रशासनिक यात्रा की निरंतरता को बनाए हुए हैं।
मोदी से पहले लगातार शासन के अगुआ बने रहने का रिकॉर्ड पवन कुमार चामलिंग के नाम था, जो सिक्किम के मुख्यमंत्री 24 साल 165 दिन लगातार रहे थे, 12 दिसंबर 1994 से लेकर 26 मई 2019 तक। मोदी चामलिंग का ये रिकॉर्ड पहले ही तोड़ चुके हैं, सिर्फ सीएम के तौर पर कौन कहे, सीएम- पीएम के तौर कुल मिलाकर सबसे लंबे समय तक प्रशासन के शीर्ष पर बने हुए हैं मोदी।
लेकिन अगर स्वतंत्रता दिवस समारोह की ही बात की जाए, तो मोदी ने इसे सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़कर जन उत्सव में बदल दिया है पिछले 25 वर्षों में। यही नहीं, इसे बड़े संकल्प लेने और अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करने का भी अवसर बना दिया है मोदी ने। आखिर प्रजातंत्र में जन प्रतिनिधि को अपना हिसाब देने और शासन की दशा- दिशा और बड़े लक्ष्यों को तय करने का स्वतंत्रता दिवस समारोह से बड़ा अवसर क्या हो सकता है।
बहुत कम लोगों को ध्यान में होगा कि सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान संभालने वाले मोदी को पहली बार शासन प्रमुख के तौर पर झंडा फहराने का अवसर 15 अगस्त 2002 को मिला था। ये वो समय था, जब मोदी गंभीर चुनौतियों से गुजर रहे थे। 27 फरवरी 2002 को गोधरा कांड में 59 कारसेवकों को साजिशन जलाकर मार देने की घटना की वजह से गुजरात के कई हिस्सों में दंगे भड़क उठे थे और इसे लेकर मोदी पर विपक्ष हमलावर था।

मोदी ने इसके सामने जनता की अदालत में जाने का फैसला किया था और 19 जुलाई 2002 को गुजरात विधानसभा को भंग करने की सिफारिश राज्यपाल से करते हुए जल्दी चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन तब के मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंगदोह ने गुजरात में शीघ्र चुनाव कराने से मना कर दिया था।
ऐसे में राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी ने पहली बार अगस्त 2002 में झंडोत्तोलन किया था। राज्य स्तरीय मुख्य कार्यक्रम गुजरात की राजधानी गांधीनगर की जगह अहमदाबाद में हुआ था। दरअसल ये किसी नई परंपरा की शुरूआत नहीं थी, बल्कि गुजरात की स्थापना के बाद से ही ये हो रहा था।
एक मई 1960 को अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आये गुजरात की पहली राजधानी होने का गौरव राज्य के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद को ही हासिल हुआ था और इसलिए यहां के पुलिस स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस का मुख्य कार्यक्रम आयोजित होने लगा, जो 1961-62 के साल में बना था। बाद में गांधीनगर में राजधानी शिफ्ट हो जाने के बावजूद स्वतंत्रता दिवस का मुख्य समारोह अहमदाबाद में ही होता रहा, उसी पुलिस स्टेडियम में।
अहमदाबाद के पुलिस स्टेडियम में ही 15 अगस्त 2002 की सुबह जब मोदी ने सीएम के तौर पर पहली बार झंडोत्तोलन किया, तो इस अवसर को गुजरात को लेकर अपने बड़े सपने सामने रखने का अवसर बना दिया। गुरूवार की उस सुबह मोदी ने शिक्षा पर बल देते हुए ग्रामीण इलाकों में रहने वाले छात्रों के लिए इंटरनेट के जरिये आधुनिक शिक्षा मुहैया कराने की बात की। यही नहीं, अपनी नई शिक्षा नीति को सामने रखते हए मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ ही सीमावर्ती इलाको के सैनिक स्कूलों को भी उन्नत करने की बात की।
मोदी ने तब राज्य में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की संख्या भी बढ़ाने की बात की, ताकि गुजराती और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी सिखकर भी राज्य के बच्चे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ सकें, अपनी जगह बना सकें। जिस राज्य की स्थापना के साथ ही गुजराती भाषा के स्कूलों पर जोर था, वहां के लिए ये एक क्रांतिकारी, आधुनिक सोच थी, ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को पूरी ईमानदारी के साथ लागू करने की शुरूआत थी।
मोदी ने 15 अगस्त 2002 की उस सुबह शिक्षा से आगे बढ़कर सुशासन पर भी जोर दिया। मोदी का कहना था कि गुजरात के दो प्रमुख सपूतों- गांधी और सरदार की अगुआई में आजादी हासिल करने वाले भारत में ‘सुराज’ के बाद ‘सुशासन’ भी उतना ही जरूरी है, और इस मामले में गुजरात को पहल लेनी होगी।
मोदी ने 15 अगस्त 2002 की उस सुबह जिस सुशासन का संकल्प लिया था, अगले एक दशक में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वही उनके शासन का मूल मंत्र रहा, जिसके आधार पर गुजरात मॉडल विकसित हुआ और पूरे देश में उनकी शोहरत हुई। इसी सुशासन के बल पर जनता के हृदय में अपनी जगह बनाकर मई 2014 में मोदी देश के प्रधानमंत्री बने।
लेकिन देश का प्रधानमंत्री बनने से पहले करीब पौने तेरह साल लंबे अपने सीएम कैरियर में मोदी ने जो दर्जन भर अवसरों पर गुजरात में राष्ट्र ध्वज फहराया, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर, मोदी ने उन अवसरों को फटाफट जन उत्सव में बदल दिया।
दिसंबर 2002 में राज्य विधानसभा का चुनाव अपनी अगुआई में जीताने के बाद स्वतंत्रता दिवस समारोह का जो पहला मौका मोदी को मिला, उन्होंने उस मौके को राज्य की जनता के लिए अनूठा बना दिया। गुजरात की स्थापना के बाद पहली बार हुआ, जब स्वतंत्रता दिवस का मुख्य समारोह अहमदाबाद की जगह पाटण में मना, जिस पाटण को गुजरात की प्राचीन राजधानी रहने का गौरव भी हासिल रहा है।
पाटण में तब पूरे शहर को सजाया- संवारा गया, भांति- भांति के कार्यक्रम किये गये।
पूरे शहर में लाइटिंग ऐसी, मानो पूरा पाटण दीपावली मना रहा हो। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। न सिर्फ पाटण शहर के लोग, बल्कि राज्य के कई हिस्सो से यहां लोग पहुंचे। सबके लिए ये सुखद आश्चर्य था, किसी ने कल्पना नहीं की थी कि जिले स्तर पर कभी राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह होगा, अमूमन होता तो ये था कि ऐसे कार्यक्रम या तो राज्य की राजधानी में होते थे या फिर सबसे बड़े शहर में। लेकिन मोदी तो लीक से हटकर चलने के आदी रहे हैं, उन्हें कहां रूटीन चीजों में भरोसा।
15 अगस्त 2003 से पाटण में जो सिलसिला शुरु हुआ, वो मोदी के कार्यकाल के दौरान तो रहा ही, उनके राज्य छोड़ने के बाद भी कोविड की महामारी से आए व्यवधान को छोड़ दें, तो ये सिलसिला अब भी जारी है। मोदी जब आज लाल किले से झंडा फहरा रहे थे, उनके गृह राज्य गुजरात में उनकी शुरू की गई परंपरा के तहत ही राज्य स्तरीय 80वां स्वतंत्रता दिवस समारोह अहमदाबाद या गांधीनगर की जगह अमरेली में मनाया जा रहा था।
खुद मोदी ने गुजरात में राज्य सरकार के मुखिया के तौर पर जो आखिरी झंडोत्तोलन किया था, वो कच्छ जिले के मुख्यालय भुज में। भुज के लालन कॉलेज से ही 15 अगस्त 2013 के दिन मोदी ने लाल किले की तरफ बढ़ने की हुंकार भरी थी। यहां तक कि कार्यक्रम स्थल के चारों तरफ भी लालन कॉलेज से लाल किले की तरफ बढ़ते मोदी के ढेरों पोस्टर- बैनर और होर्डिंग्स लगे थे।
हुआ भी वही, अगले साल मोदी लालन कॉलेज की जगह लाल किले से झंडोत्तोलन करते नजर आए। 15 अगस्त 2014 की सुबह जब देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने पहली बार तिरंगा फहराया, लगे हाथों अपनी प्राथमिकताओं का जिक्र किया, जिसमें स्वच्छ भारत अभियान की बात की थी, सबके लिए शौचालय की बात थी। तब ज्यादातर लोगों को आश्चर्य हुआ था, एक तो लाल किले से कभी किसी प्रधानमंत्री ने इस तरह की बात नहीं की थी, विपक्ष ने माखौल भी उड़ाया था। लेकिन ये मोदी की प्राथमिकताओं का संकेत था, जिसके केंद्र में देश का आम आदमी रहा है।
वहां से मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है, हर बार लाल किले की प्राचीर से बड़े लक्ष्य का ऐलान करते हुए और उसे पाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ने की योजना और उसका रोड मैप रखते आए हैं वो। बतौर पीएम तेरहवीं बार भी लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए मोदी आज ऐसा ही करते नजर आए। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए शक्ति की सप्तधारा बहाने की बात की, एक सौ चालीस करोड़ देशवासियों की सामूहिक ताकत के साथ इस सपने को हकीकत में बदलने की बात की।
मोदी खुली आंखों से सपने देखते हैं, ऐसा वो खुद बार- बार कहते हैं, गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी ये बात कहते थे, 2014 से देश के प्रधानमंत्री हैं, तब भी ये बात करते हैं। मोदी का मानना है कि खुली आंखों से देखे हुए सपने पूरे होते हैं, जरूरत होती है इसके लिए तनतोड़ मेहनत की और अहर्निश प्रयासों की। मोदी को इन दोनों चीजों से कभी परहेज नहीं रहा है, तभी बिना रूके, बिना थके, पचीस वर्षों की प्रशासनिक यात्रा को जल्दी ही पूरा करने जा रहे हैं, विकसित भारत की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा रहे हैं, Gen-Z से लेकर नौजवानों, किसानों और महिलाओं को भी इस लक्ष्य को पाने में योगदान देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
तालिबान के काबुल पर कब्जे के आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पांच साल में अफगानिस्तान की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। तालिबान ने पूरे देश पर अपना नियंत्रण मजबूत किया और अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार आया। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं के अधिकारों पर सख्त पाबंदियां लगीं, प्रेस की आजादी घटी और शारीरिक सजाएं फिर आम हो गईं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2021 से नवंबर 2022 के बीच अदालतों ने कम से कम 18 मामलों में शारीरिक सजा का आदेश दिया। इनमें ज्यादातर मामले तथाकथित नैतिक अपराधों से जुड़े थे। दिसंबर 2022 में परवान प्रांत के एक स्टेडियम में भीड़ के सामने 27 लोगों को सबके सामने कोड़े मारे गए। तालिबान से पहले की अफगान सरकारों के दौर में भी शारीरिक सजा मौजूद थी, लेकिन तालिबान के शासन में इसे खुले तौर पर और नियमित रूप से लागू किया जाने लगा। 15 अगस्त 2021: काबुल में दाखिल हुआ तालिबान अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। कुछ ही घंटों में अफगान सरकार का पतन हो गया। कमर्शियल फ्लाइट रद्द हो गईं और हजारों लोग देश छोड़ने के लिए काबुल एयरपोर्ट पहुंच गए। तालिबान ने उस समय महिलाओं के अधिकार बनाए रखने और अमेरिका व पिछली अफगान सरकार के साथ काम करने वालों को माफी देने का वादा किया था। प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा था कि लोगों को अपनी संपत्ति, जान या सम्मान को लेकर खतरा नहीं होगा। लेकिन अगले पांच साल में तस्वीर इन वादों के बिल्कुल उलट नजर आई। छात्राओं को सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी जाने से रोका अफगानिस्तान अब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां छात्राओं को औपचारिक रूप से सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने से रोक दिया गया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगातार बढ़ती गईं। नौकरी करने, और सार्वजनिक जगहों पर जाने को लेकर भी कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं। UN की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान के राज में अब तक महिलाओं के खिलाफ 100 से ज्यादा फरमान जारी हो चुके हैं। सर्वे में शामिल 10 में से 7 महिलाओं ने अपनी मानसिक स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया। आधे से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि वे महीने में सिर्फ एक या दो बार घर से बाहर निकलती हैं। करीब तीन-चौथाई महिलाओं ने पुरुष अभिभावक के बिना घर से बाहर निकलने में असुरक्षा महसूस होने की बात कही। रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सिर्फ 7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 84% है। प्रेस पर दबाव, सैकड़ों पत्रकारों ने देश छोड़ा तालिबान शासन में पत्रकारिता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स यानी CPJ ने अफगानिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक और मुश्किल जगहों में शामिल किया है। 2021 के बाद से कई अफगान पत्रकार देश छोड़ चुके हैं। तालिबान शासन में अफगानिस्तान की इकोनॉमी बढ़ीं तालिबान के शासन में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद नहीं हुई। कुछ क्षेत्रों में सुधार के संकेत मिले हैं। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक GDP 4.8% बढ़ी। सरकार का घरेलू राजस्व भी बढ़कर GDP का 19.8% हो गया। लेकिन इस ग्रोथ का फायदा आम लोगों तक व्यापक रूप से नहीं पहुंचा। प्रति व्यक्ति आय घटी है और महंगाई बढ़ी है। देश अभी भी बड़े स्तर पर आयात पर निर्भर है। बिजली की कमी, बैंकिंग सुविधाओं तक सीमित पहुंच, बड़े अनौपचारिक कैश सेक्टर और विदेशी मदद में कमी भी आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती हैं। अफीम की खेती में 95% गिरावट तालिबान के सत्ता में आने के समय अफगानिस्तान दुनिया में अफीम का सबसे बड़ा स्रोत था। UNODC के मुताबिक 2022 में दुनिया की करीब 80% अफीम अफगानिस्तान से आती थी। अप्रैल 2022 में तालिबान ने पोस्ता (अफीम का पौधा) की खेती पर रोक लगा दी। इसका सीधा असर खेती पर पड़ा। UNODC के 2023 के सर्वे के मुताबिक पोस्ता की खेती में 95% की गिरावट आई। रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता दी तालिबान सरकार को अब तक सिर्फ रूस ने औपचारिक रूप से मान्यता दी है। हालांकि तालिबान का कहना है कि वह करीब 40 देशों के संपर्क में है और औपचारिक मान्यता के लिए जरूरी शर्तें पूरी कर चुका है। भारत ने भी तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दिए बिना काबुल के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। अक्टूबर 2025 में तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी भारत आए थे। यह तालिबान सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी की भारत की पहली यात्रा थी। चीन और UAE ने भी तालिबान द्वारा नियुक्त राजदूतों को स्वीकार किया है, हालांकि दोनों ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। —————- यह खबर भी पढ़ें… PM रहमान की भारत यात्रा से पहले बांग्लादेश की शर्त: शेख हसीना को राजनीति से दूर रखा जाए; 21 अगस्त को दिल्ली आ सकते हैं बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 21 अगस्त को पहली बार भारत दौरे पर आ सकते हैं। यात्रा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इसे अंतिम रूप देने से पहले दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का है। पूरी खबर पढ़ें…
Saptadhara Explained: सात धाराओं के पवित्र हिंदू विचार से लेकर विकसित भारत के लिए सात-सूत्रीय रोडमैप तक: ‘सप्तधारा’ का क्या अर्थ है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस 2026 पर इसका जिक्र क्यों किया? दरअसल, ‘सप्तधारा’ शब्द असल में ‘सप्त’ (यानी सात) और ‘धारा’ (यानी बहाव या प्रवाह) से मिलकर बना है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इसे विकास के एक फ्रेमवर्क के तौर पर इस्तेमाल किए जाने से बहुत पहले से ही, सात पवित्र धाराओं का यह विचार हिंदू धार्मिक परंपराओं में मौजूद था।
बता दें कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने जो घोषणा की, उसका आधार यही सांस्कृतिक और सभ्यतागत सोच थी। उन्होंने एक नई “सप्तधारा” — यानी ताकत की सात धाराएं — की बात की, जो 2047 तक ‘विकसित भारत’ की ओर भारत के सफर को आगे बढ़ाएंगी।
प्रधानमंत्री ने सबसे पहले ‘सप्त सिंधु’ यानी सात नदियों की पुरानी अवधारणा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कभी भारत अपनी ताकत के लिए सप्त सिंधु के कारण जाना जाता था और तर्क दिया कि अब एक विकसित भारत को ताकत की नई धाराओं की जरूरत है।
तो, सप्तधारा का हिंदू मूल क्या है, और इस शब्द को नीति के संदर्भ में नया अर्थ कैसे मिला है?
हिंदू परंपरा में ‘सप्तधारा’ का क्या अर्थ है?
सबसे बुनियादी स्तर पर, सप्तधारा का अर्थ है ‘सात धाराएं’। हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में सात की संख्या का विशेष महत्व है—चाहे वह सात ऋषि (सप्तर्षि) हों, सात पवित्र नदियां हों या हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में वर्णित सात लोक हों।
पद्म पुराण में एक विशिष्ट ‘सप्तधारा-तीर्थ’ का भी वर्णन मिलता है।
संबंधित अध्याय के अनुवाद के अनुसार, सप्तधारा को एक महत्वपूर्ण पवित्र स्थान माना जाता था और यह ऋषियों से जुड़ा हुआ था। इस ग्रंथ में पवित्र जल की सात धाराओं का जिक्र मिलता है, जिन्हें गंगा के सात शुभ रूपों से जोड़ा गया है। इस स्थान का संबंध पांडवों से भी बताया गया है।
पद्म पुराण में सप्तधारा का उल्लेख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सात धाराओं में बहने वाले पवित्र जल को गंगा की पवित्रता, तीर्थ यात्रा और पूर्वजों से जुड़े धार्मिक कर्मकांडों से जोड़ा गया है।
सप्तधारा या सप्तसरोवर नामक स्थानों से जुड़ी अन्य हिंदू परंपराएं भी हैं। उदाहरण के लिए, हरिद्वार में एक स्थानीय मान्यता है कि गंगा सात धाराओं में विभाजित हो गई थी ताकि सप्तऋषि (सात प्राचीन ऋषि) बिना किसी व्यवधान के अपनी तपस्या कर सकें।
दूसरे शब्दों में, “सात धाराएं” कोई नई गढ़ी गई उपमा नहीं है। लंबे समय से यह पवित्र प्रवाह, समृद्धि, निरंतरता और किसी शक्तिशाली चीज के विभिन्न दिशाओं में फैलने का प्रतीक रही है।
सप्तधारा और सप्त सिंधु: क्या है इनका संबंध?
पीएम मोदी के भाषण को समझने के लिए यह कड़ी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
‘सप्त सिंधु’ का शाब्दिक अर्थ है “सात नदियां” और यह शुरुआती वैदिक काल से जुड़ा एक प्राचीन भौगोलिक और सांस्कृतिक शब्द है।
पीएम मोदी ने अपनी ‘सप्तधारा’ को पौराणिक ‘सप्तधारा-तीर्थ’ की हूबहू नकल के तौर पर पेश नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपने आज के विचार को समझाने के लिए पुरानी ‘सप्त सिंधु’ की अवधारणा का इस्तेमाल एक पुल की तरह किया।
सात ही क्यों?
भारतीय परंपराओं में ‘सात’ का बहुत गहरा महत्व है। सप्तऋषि (सात ऋषि) और सप्तसिंधु (सात नदियां) जैसी अवधारणाएं हैं। साथ ही हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान, रीति-रिवाजों और साहित्य में भी सात के समूहों का कई बार जिक्र मिलता है।
इसलिए, यह संख्या पूर्णता और विविधता को दिखाने के लिए एक बेहतरीन प्रतीक है: अलग-अलग धाराएं मिलकर एक बड़ा प्रवाह बनाती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर इसी तरह इस विचार का इस्तेमाल किया। उनकी ‘सप्तधारा’ कोई एक योजना या नया मंत्रालय नहीं है। बल्कि, यह सात हिस्सों वाला एक रणनीतिक ढांचा है। इसमें वे क्षेत्र शामिल हैं जो भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लिए जरूरी आर्थिक, तकनीकी, बुनियादी ढांचे से जुड़ी, सैन्य, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक मजबूती दे सकते हैं।
PM मोदी की सात ‘सप्तधाराएं’ क्या हैं?
- मैन्युफैक्चरिंग पावर: पहली धारा मैन्युफैक्चरिंग है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग की पूरी वैल्यू चेन में अपनी ताकत बढ़ानी होगी। इसमें पार्ट्स और कंपोनेंट्स बनाने से लेकर डिजाइन और तैयार उत्पादों तक हर स्तर शामिल है। साथ ही भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का एक भरोसेमंद हिस्सा बनना होगा। उन्होंने तीन जरूरतों पर ज़ोर दिया: लागत, क्वालिटी और स्केल।
उन्होंने कहा, “मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम कर रहे मेरे भाइयों और बहनों के लिए, यह एक बड़ मौका है। इस मौके को हाथ से न जाने दें। और इसके लिए, हमें लागत, क्वालिटी और स्केल के मामले में ग्लोबल स्टैंडर्ड्स को पूरा करना होगा। हमारी फैक्ट्रियां कॉम्पिटिटिव होनी चाहिए। हमारे प्रोडक्ट यूजर-फ्रेंडली होने चाहिए।”
इसका बड़ा लक्ष्य यह है कि भारत सिर्फ दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार न रहे, बल्कि दुनिया के लिए एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब बने।
- खेती और फ़ूड प्रोसेसिंग: दूसरा क्षेत्र खेती और फूड प्रोसेसिंग का है। यहां जोर सिर्फ खेती से होने वाले उत्पादन को बढ़ाने पर नहीं, बल्कि खेत से ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने पर है। पीएम मोदी ने मोटे अनाज (मिलेट्स), मसालों, फलों और सब्जियों जैसे उत्पादों का जिक्र किया और कहा कि भारत के पारंपरिक खाद्य उत्पाद ग्लोबल ब्रांड बनने चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे किसान केमिकल-मुक्त खेती को बढ़ावा देंगे। दुनिया में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है। और अगर हमारे कृषि उत्पाद हर तरह से ग्लोबल मानकों पर खरे उतरते हैं, तो हम आसानी से दुनिया भर के बाजारों तक पहुंच पाएंगे।”
इसका मकसद खेती से होने वाले उत्पादन में प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट के जरिए वैल्यू जोड़ना है, न कि किसानों को मुख्य रूप से कच्चे माल (रॉ-कमोडिटी) के स्तर पर ही छोड़ देना।
- टेक्नोलॉजी और इनोवेशन: तीसरी धारा टेक्नोलॉजी और इनोवेशन की है। पीएम मोदी ने UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ भारत के अनुभव का जिक्र किया और कहा कि देश को अब टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अगली बड़ी छलांग लगानी चाहिए।
उन्होंने खास तौर पर डेटा सेंटर, रोबोटिक्स, उभरती हुई टेक्नोलॉजी और अगली पीढ़ी के कम्युनिकेशन (जिसमें ‘मेड-इन-इंडिया 6G’ भी शामिल है) जैसे क्षेत्रों का जिक्र किया। इसका मुख्य संदेश यह है कि भारत उभरती हुई टेक्नोलॉजी का सिर्फ एक बड़ा उपभोक्ता बनकर नहीं रह सकता। बल्कि उसे इनका डेवलपर और निर्यातक भी बनना होगा।
उन्होंने कहा, “मेड-इन-इंडिया दुनिया के हर कोने तक पहुंचना चाहिए। यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए और हमें इस दिशा में अपनी कोशिशें तेज करनी चाहिए। इस दिशा में हमारे प्रयास कम नहीं होने चाहिए।”
- गति शक्ति: चौथी धारा है ‘गति शक्ति’ – यानी रफ्तार और कनेक्टिविटी की ताकत। इसमें हाई-स्पीड रेल, हाईवे, अंदरूनी जलमार्ग, एयरपोर्ट, बंदरगाह और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स शामिल हैं।
इसका मकसद पूरे भारत में लोगों और सामान को लाने-ले जाने में लगने वाले समय और खर्च को कम करना है। मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए, इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ निर्माण का काम नहीं है। यह भारत की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता) का हिस्सा बन जाता है।
प्रधानमंत्री ने कहा, “हमें एयरपोर्ट्स की जरूरत है। हमें मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स सिस्टम की जरूरत है। हमें अपने बंदरगाहों को सिर्फ सामान चढ़ाने और उतारने की जगह के तौर पर नहीं देखना चाहिए। दुनिया भर से जहाजों का वहां आकर रुकना ही काफी नहीं है। हमें अपने बंदरगाहों को ‘पोर्ट-लेड डेवलपमेंट’ (बंदरगाह-आधारित विकास) और ग्रोथ की दिशा में आगे ले जाना होगा।”
इसलिए, पीएम मोदी ने बिना रुकावट वाली कनेक्टिविटी को देश के बड़े आर्थिक लक्ष्यों से जोड़ा।
- रक्षा शक्ति और आत्मनिर्भर रक्षा: पांचवां क्षेत्र डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता है। पीएम मोदी ने कहा कि आज की अनिश्चित दुनिया में रणनीतिक आत्मनिर्भरता और भी जरूरी हो गई है।
उन्होंने उस जोखिम का जिक्र किया जो तब पैदा होती है जब जरूरी चीजों – जैसे एनर्जी, फर्टिलाइजर, दवाइयां और टेक्नोलॉजी – की सप्लाई पर जियोपॉलिटिकल तनाव का असर पड़ सकता है। वहीं, इसका समाधान है घरेलू डिफेंस प्रोडक्शन को मजबूत करना और ड्रोन व काउंटर-ड्रोन सिस्टम जैसी टेक्नोलॉजी विकसित करना, ताकि भारत को एक ग्लोबल डिफेंस सप्लायर बनाया जा सके।
उन्होंने कहा, “हमें डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनना होगा। अगली जनरेशन की डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करके, हमें ग्लोबल सप्लायर बनने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ना होगा।”
- ग्रीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी:
छठी धारा दो क्षेत्रों को मिलाती है: ग्रीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी
ग्रीन हिस्से में रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और एनर्जी स्टोरेज शामिल हैं। ब्लू हिस्सा भारत की तटरेखा, महासागरों, मछली पालन, समुद्री गतिविधियों और तटीय पर्यटन पर केंद्रित है। इसका बड़ा मकसद आर्थिक विकास को एनर्जी ट्रांजिशन के साथ जोड़ना और साथ ही भारत की समुद्री क्षमता का इस्तेमाल करना है।
- भारत की सॉफ्ट पावर: सातवीं और आखिरी धारा ‘सॉफ्ट पावर’ है।
यहीं पर मोदी की ‘सप्तधारा’ पारंपरिक आर्थिक पैमानों से आगे निकल जाती है। उन्होंने योग, हस्तशिल्प, डिजिटल कंटेंट और पर्यटन जैसे क्षेत्रों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत का सांस्कृतिक प्रभाव खुद एक आर्थिक और भू-राजनीतिक संपत्ति बन सकता है।
इसका मकसद भारत के उत्पादों, संस्कृति, क्रिएटिव इंडस्ट्रीज़ और विचारों को दुनिया भर के लोगों तक पहुंचाना है।
पीएम मोदी ने कहा, “हम अपनी क्षमताओं को दुनिया तक ले जा सकते हैं। चाहे वह हस्तशिल्प हो, संस्कृति हो, हमारी फिल्में हों, हमारी क्रिएटिव दुनिया हो, VFX, एनिमेशन, गेमिंग या डिजिटल कंटेंट हो – भारत क्रिएटिव दुनिया में अपनी ताकत दिखा सकता है। हमें इसे एक ग्लोबल क्षमता के तौर पर विकसित करना होगा।”
उन्होंने आगे कहा: “भारत के पास वन संपदा का विशाल भंडार है। हमारे यहां 100 से ज्यादा नेशनल पार्क हैं। इसमें बहुत संभावनाएं हैं, लेकिन हम विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में पीछे रहे हैं। हमारे पास अपनी सॉफ्ट पावर के जरिए दुनिया भर के पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने का मौका है। हमें दुनिया के सामने अपनी क्षमताओं को दिखाना होगा।”
सप्तधारा के पीछे की सोच क्या है?
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सप्तधारा’ की घोषणा को ‘विकसित भारत 2047’ के बड़े लक्ष्य से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि आने वाले 5 से 7 साल बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि जो काम पिछले पांच से सात दशकों में नहीं हो पाए, उन्हें अब आने वाले पांच से सात सालों में पूरा करना होगा। उन्होंने इस पहल को “रिफॉर्म एक्सप्रेस” (सुधार की गति बढ़ाने वाला कदम) भी कहा और सिस्टम, सोच और काम करने की रफ्तार में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया।
इस वजह से ‘सप्तधारा’ सिर्फ सरकार की एक अलग योजना नहीं रह जाती, बल्कि सरकार के विकास के एजेंडे के अगले चरण के लिए एक रणनीतिक रूपरेखा बन जाती है।
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Independence Day 2026: भारत इस साल अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। और इस मौके को मनाने का देशभक्ति गीतों से बेहतर तरीका क्या हो सकता है? आज़ादी के बाद के इतिहास में, देश ने ऐसे शानदार गाने दिए हैं जो हर भारतीय के अपने देश के प्रति प्यार और सम्मान को ज़ाहिर करते हैं।
अपनी देशभक्ति की भावना को जगाने के लिए इन गानों के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाएं। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे क्लासिक गानों से लेकर ए.आर. रहमान और सुखविंदर सिंह के दिल को छू लेने वाले गाने ‘देश मेरे देश’ तक, ये गाने देश के प्रति आपके प्यार को ज़ाहिर करने के लिए एकदम सही हैं।
ऐ मेरे वतन के लोगों
भारतीय देशभक्ति गीतों की कोई भी प्लेलिस्ट लता मंगेशकर के इस क्लासिक गाने के बिना पूरी नहीं हो सकती। 1962 के भारत-चीन युद्ध में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों के सम्मान में लता मंगेशकर ने इसे पहली बार 1963 में लाइव गाया था। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सी. रामचंद्र ने कंपोज़ किया था और कवि प्रदीप ने लिखा था।
देश मेरे देश
जब हम ‘द लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ फ़िल्म की बात करते हैं, तो सबसे पहले यही गाना याद आता है। ए.आर. रहमान का बनाया यह दिल को छू लेने वाला गाना सुखविंदर सिंह ने गाया है। ए.आर. रहमान ने ‘माँ तुझे सलाम’ जैसे कई देशभक्ति वाले गाने बनाए हैं, लेकिन देश की आज़ादी के लिए अपनी जान देने वालों को सम्मान देने के लिए ‘देश मेरे देश’ एक बेहतरीन गाना है।
ऐ वतन
आलिया भट्ट की फ़िल्म ‘राज़ी’ में पाकिस्तान में मौजूद एक भारतीय जासूस की कहानी दिखाई गई थी। ‘ऐ वतन’ गाने ने फ़िल्म के मुख्य विषयों—देश के लिए त्याग और प्रेम—को बखूबी दर्शाया है।
तेरी मिट्टी
मनोज मुंतशिर के लिखे और बी प्राक के संगीतबद्ध किए गए गाने ‘तेरी मिट्टी’ को सुनकर इस स्वतंत्रता दिवस पर आपकी आँखों में ज़रूर आँसू आ जाएँगे। यह गाना उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। यह गाना 2019 की फ़िल्म ‘केसरी’ का हिस्सा था।
‘ये जो देश है तेरा’
फिल्म ‘स्वदेश’ के इस गाने में ए.आर. रहमान की आवाज़ और जावेद अख्तर के बोलों ने लोगों के अपने देश के लिए प्यार और लगाव को बखूबी दिखाया है। बैकग्राउंड में बजती शहनाई गाने में पुरानी यादों का एहसास जगाती है। ‘ये जो देश है तेरा’ गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस की प्लेलिस्ट का एक ज़रूरी हिस्सा बन गया है।
संदेशे आते हैं – बॉर्डर
फिल्म ‘बॉर्डर’ का ‘संदेशे आते हैं’ आज भी लोगों के दिलों में बसा है। ये देशभक्ति गानों की लिस्ट में खास जगह रखता है। गाने में सैनिकों और उनके परिवारों के बीच की भावनाओं को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। इसे बॉर्डर 2 में रीक्रिएट भी किया गया है।
तो, इस स्वतंत्रता दिवस पर आप अपनी प्लेलिस्ट में कौन से गाने शामिल कर रहे हैं?

