विलोप के करीब पहुंची मध्यमार्गी राजनीति

समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच।

यूरोपीय राजनीति की खिसक रही भू-गर्भीय परतों (Tectonic Plates) से उठते भूकंपीय झटकों का सितंबर में जर्मनी शिकार बना। पहले हफ्ते में सैक्सनी-अनहाल्ट पहला जर्मन प्रांत बना, जहां नव-नाजीवादी ऑल्टरनेटिव्स फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) पार्टी प्रादेशिक चुनाव जीतने में कामयाब रही (वहां वह लगभग 44 फीसदी वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी)। यह किसी आम स्थिति में अचानक पैदा हुई विसंगति नहीं थी। बल्कि यह एक दशक से अधिक समय से उभरते रूझान का ठोस रूप ग्रहण कर लेना भर था। इस बात की पुष्टि 20 सितंबर को जर्मनी के मेक्लेनबर्ग– वेस्टर्न पोमेरेनिया प्रांत में एएफडी की जीत से हुई। वहां वह 38 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ पहले स्थान पर रही।

उसी रोज जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक दूसरे किस्म का सियासी भूकंप आया। वहां डाई लिंके (द लेफ्ट) पार्टी सबसे आगे रही, जिसे पश्चिमी मीडिया धुर-वामपंथी बताता है। इन तीन नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी की राजनीति तेजी से दक्षिण एवं वाम की ‘चरम’ (extreme) धुरियों के बीच बंटती जा रही है। इस तरह सेंटर राइट- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) और सेंटर लेफ्ट- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के बीच सत्ता की अदला-बदली का जारी लगभग आठ दशक से जारी खेल अब खत्म हो रहा है। उचित ही इसे जर्मन राजनीति में मध्य मार्ग के विलोप के रूप में देखा गया है।

और यह सिर्फ जर्मनी का रुझान नहीं है। वैसे तो यह ट्रेंड चुनावी लोकतंत्र वाले तमाम देशों में उभरा है, लेकिन पश्चिमी देशों में इस नई राजनीतिक परिघटना की खास झलक देखी जा सकती है। कुछ महीनों के बाद इस रुझान की पुष्टि संभवतः फ्रांस में भी होगी, जहां अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य गोलबंदी “धुर वामपंथी” नेता ज्यां ल्यूक मेलेन्शॉ और धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन के बीच हो रही है।

यह घटनाक्रम आने वाले वक्त में संभावित राजनीतिक टकराव का संकेत है। डाई लिंके की जीत और मेलेन्शॉ को मिल रही लोकप्रियता दुनिया में नए तेवर वाले वामपंथ के उदय की मिसाल हैं। और ऐसे संकेत सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं हैं। डाई लिंके की जीत के सिलसिले में यह बात सामने आई कि इस पार्टी ने बर्लिन में अपने चुनावी अभियान को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से सीख लेते हुए डिजाइन किया। बर्लिन में डाई लिंके का चेहरा तुर्किश मूल की सोशलिस्ट एलीफ एराल्प हैं। उनकी टीम ममदानी के प्रचार अभियान का अध्ययन करने न्यूयॉर्क गई। वहां से वह ये सबक लेकर लौटी कि बिखरे हुए अनगिनत मुद्दों को उठाने के बजाय दो या तीन ऐसे मुद्दे लिए जाएं, जिनकी वजह ‘लोगों की रात की नींद उड़ी रहती है’।

न्यूयॉर्क की तरह ही बर्लिन में भी नवोदित लेफ्ट ने मकान किराये को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाया। साथ में रोजमर्रा की चीजों की महंगाई और परिवहन पर ध्यान केंद्रित किया गया। उसके साथ हज़ारों स्वयंसेवकों को संगठित किया गया, ताकि वे घर घर जाकर चर्चा कर सकें। और उसका असर हुआ- ठीक न्यूयॉर्क की तरह। अब एराल्प बर्लिन की मेयर कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी हैं।

एक जर्मन विश्लेषक ने लिखा है- यह तथ्य कि पूंजीवादी विरोधी वामपंथ ने बर्लिन में जीत हासिल की है, पुष्टि करता है कि उदारवादी (लिबरल) और मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) विकल्पों का पतन और “बाज़ार लोकतंत्र” का ढहना जारी है। वह पार्टी सिस्टम ढह रहा है, जो नव-उदारवाद के दौरान एक ही केंद्र- पूंजी से नियंत्रित रहा, भले दिखावटी तौर पर कई पार्टियों के रूप में उसके अनेक चेहरे सामने रहे हों।

गुजरे डेढ़ दशक में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथ का बढ़ना सबसे मजबूत राजनीतिक परिघटना रही है। ऐसा उन विशाल निराश समूहों की प्रतिक्रिया से संभव हुआ, जिन्होंने नव-उदारवादी भूमंडलीकरण के विनाशकारी परिणामों को झेला और एक मुकाम आकर उसे ठुकराना शुरू किया। अर्थव्यवस्था का उत्तरोत्तर वित्तीयकरण, वेतन की अस्थिरता, बेरोजगारी, आवास का दुर्लभ होना, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षय- आदि के कारणों से उपजे जन असंतोष का लाभ धुर दक्षिणपंथी दलों ने उठाया। किसी ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ नफरत भरे अभियान चलाना, काल्पनिक प्रभु वर्ग (मोटे तौर पर पहले सत्ता से लाभान्वित रहे समूहों) को तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराना, अयथार्थ समाधान पेश करना- आदि ऐसा तरीका रहा है, जिसे लगभग हर देश में उन दलों ने अपनाया है। इनकी बदौलत धुर-दक्षिणपंथियों को कामयाबी मिली है।

उन्हें यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि पारंपरिक वामपंथ ने नव-उदारवाद के हाथों अपनी हार को स्वीकार कर लिया। वे दल बाजार, बड़ी कंपनियों, और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के समन्वित हमलों के आगे झुक गए। उन्होंने बिना आलोचनात्मक रुख अपनाए उस एजेंडे को स्वीकार कर लिया, जो शासक वर्ग उनके लिए तैयार किया था। मसलन, पहचान आधारित मुद्दों और woke culture के समर्थन में उन्होंने अपना सारा जोर लगाया, जबकि आम जन के रोजमर्रा के सवालों से उन्होंने नेता तोड़ लिया।

ट्रेड यूनियनों का बदलाव के बड़े सपनों को छोड़ देना, वर्ग-आधारित पार्टियों का विघटन और वर्ग चेतना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी से उनका मुंह मोड़ लेना- ये सब इसी दौर की कहानियां हैं। इस दौर में पूंजी बनाम श्रम की बहस को हाशिये में चले जाने दिया गया और यह शिक्षा नजरअंदाज दी गई कि पूंजी का बेलगाम संकेंद्रण धन उत्पन्न करने के अन्य दो स्रोतों- प्रकृति और श्रम- को नष्ट कर देता है।

इसी दौर में धुर-दक्षिणपंथ “समाधान” बनकर उभरा। उसने मुसीबत के असली स्रोतों से ध्यान हटा कर अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, या कम्युनिस्ट प्रतीकों को निशाने पर लिया। पश्चिमी देशों में पारंपरिक वामपंथ और मध्यमार्गी दलों ने इनमें से कुछ सवालों पर धुर-दक्षिणपंथ को अपनी मौन सहमति दी, जबकि कुछ मुद्दों पर उसे सीधे चुनौती देने से वे बचते रहे। उसी का नतीजा अब उनका खुद हाशिये पर चले जाना और उससे पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए नए तेवर वाले वामपंथ का उभरना है।

इस प्रक्रिया को फिलहाल अमेरिका भी साफ देखा जा सकता है। वहां नए वामपंथी तेवर की नुमाइंदगी Democratic Socialists of America (डीएसए) कर रहा है। हालांकि यह स्वायत्त राजनीतिक समूह है, लेकिन चुनावी सिस्टम की मजबूरियों के कारण वह डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर अपने को संगठित किए हुए है। इस समय जोहरान ममदानी डीएसए का सबसे प्रखर चेहरा हैं। लेकिन उसके अनेक चेहरे इस वर्ष डेमोक्रेटिक प्राइमरी (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) में कामयाब रहे, और तीन नवंबर को होने वाले मध्य-अवधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके नतीजों पर सबका ध्यान टिका हुआ है।

यह घटनाक्रम अमेरिका में आए एक बड़े बदलाव को जाहिर करता है। इस सिलसिले में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन रॉस की यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर हैः

“पिछली बार जब किसी सोशलिस्ट उम्मीदवार को अमेरिकी चुनाव में गंभीरता से लिया गया, तो वह 1912 में था, जब यूजीन डेब्स को राष्ट्रपति पद के लिए 6 फीसदी वोट मिले। यह बहुत कम था, लेकिन नगण्य नहीं था। उसके बाद पहली बार हो रहा है, जब डीएसए चुनाव जीत रहा है। उनके सदस्य कांग्रेस में हैं। उन्होंने दो सीटें जीतीं। उन्होंने सीनेट के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी हासिल की है। न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी डीएसए के सदस्य हैं। यह पहली बार है कि जब उम्मीदवार खुले तौर पर समाजवादी के रूप में खड़े हो रहे हैं। इसका अपवाद सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे।।।।।

अमेरिकी अखबार पढ़ें, तो मुझे लगता है वॉल स्ट्रीट जर्नल लगभग हर दिन डीएसए की निंदा करने वाला लेख छापता है, और न्यूयॉर्क टाइम्स आदि भी। और यह चौंकाने वाला है। यह तो शायद संवैधानिक भी न हो कि अमेरिकी कांग्रेस किसी विशिष्ट संगठन की निंदा करने के लिए मतदान करे, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के खिलाफ है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि अब मामला गंभीर है।।।।

इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका समाजवादी बनने जा रहा है। दुर्भाग्य से मेरे जीवन काल में ऐसा नहीं होगा। यहां मेरा मतलब वास्तविक समाजवाद से है- यानी उस अर्थ में, जिसमें अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा राजकीय स्वामित्व में आ जाता है, आपके सामने औपचारिक समाजवादी समाज होता है, और श्रमिक वर्ग समाज में अग्रणी शक्ति होता है।”

यहां जॉन रॉस ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया, वह निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने पिछले एक सितंबर को पारित किया। 192 के मुकाबले 220 मतों के बहुत से पारित इस प्रस्ताव में “समाजवाद” की निंदा की गई। डीएसए का इसमें नाम लेकर जिक्र किया गया। इसके अलावा हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार बार कम्युनिस्ट खतरे का जिक्र करते रहे हैं। उन्होंने डीएसए उम्मीदवारों का उल्लेख कर कहा है कि “कम्युनिज़्म हमारा दुश्मन है”। बीते चार जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने एक चौथाई से ज्यादा समय कम्युनिस्ट खतरे के उल्लेख और कम्युनिज्म के कथित अत्याचारों की चर्चा में लगाया।

इसके बावजूद हकीकत यह है कि समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच। और अब बात चर्चा से आगे निकल कर यहां पहुंच गई है कि खुद को सोशलिस्ट बताने वाले उम्मीदवार चुनाव जीतने लगे हैं।

इस घटनाक्रम ने डीएसए की नीतियों और कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में लाया है। आम धारणा यही है कि डीएसए नॉर्डिक सोशल डेमोक्रेसी का अमेरिकी संस्करण है। नॉर्डिक मॉडल निजी स्वामित्व, प्रतिस्पर्धी बाज़ार, और बड़े निजी कॉरपोरेट्स को चुनौती नहीं देता। वह महज सामूहिक सौदेबाजी (यानी यूनियन अधिकारों) को मजबूत करने और उदार कल्याणकारी राज्य की धारणा पर आधारित है। नॉर्डिक मॉडल के तहत राज्य अधिक कर लगाता है, अधिक विनियमन करता है, और अधिक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था का स्वामित्व और संचालन मुख्य रूप से निजी पूंजी ही करती है।

व्यवहार में डीएसए की राजनीति चाहे जो हो, अपने प्रोग्राम में वह इससे कहीं आगे गया है। उसका कार्यक्रम पूंजीवादी स्वामित्व को केंद्रीय समस्या मानता है। वह कंपनी संचालन, निवेश, संसाधन आवंटन आदि का दायित्व सार्वजनिक संस्थानों, श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक निकायों की ओर ट्रांसफर करना चाहता है। संघीय स्तर पर रोजगार गारंटी, 32 घंटे का कार्य सप्ताह, पूर्ण वेतन के साथ पर्यटन अवकाश,  व्यक्तिगत शुल्क के बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, प्री-स्कूल से विश्वविद्यालय तक मुफ्त शिक्षा, छात्र ऋण की समाप्ति, किराया नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सामाजिक आवास का निर्माण आदि उसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं। संसाधन जुटाने के लिए वह वेल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स की ऊंची दरों तथा उत्तराधिकार कर लगाने की मांग करता है।

डीएसए का राजनीतिक सुधार कार्यक्रम भी उतना ही व्यापक है। यह अमेरिकी सीनेट और इलेक्टॉरल कॉलेज को समाप्त करने, आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने, बहुदलीय लोकतंत्र लागू करने, राष्ट्रपति पद और सुप्रीम कोर्ट का ढांचा फिर से तय करने, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को कहीं अधिक कड़े विधायी नियंत्रण के अधीन लाने आदि जैसी बात करता है।

अमेरिकी सिस्टम के भीतर से ऐसे सुधारों को लागू करवा पाना असंभव समझा जाता है। जबकि बाहरी जन हस्तक्षेप से सिस्टम को पलटना डीएसए की रणनीति का हिस्सा नहीं है। इसीलिए उसके कार्यक्रमों को अक्सर हवाई बताया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका कोई महत्त्व नहीं है। डीएसए को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि उसने अमेरिका में उन मुद्दों को लोकप्रियता दिलाई, जिनसे वहां का शासक वर्ग ना सिर्फ नफरत करता है, बल्कि भयभीत भी होता है।

बीसवीं सदी वयस्क मताधिकार आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों के कारण जनता के राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ था। बोल्शेविक क्रांति ने उसमें आर्थिक एवं सामाजिक पक्ष जोड़े। लेकिन एक मुकाम के बाद शासक वर्ग उस चेतना को भटकाने और सिस्टम पर फिर से अपना पूरा शिकंजा कसने में कामयाब हो गया। मौजूदा दौर में धुर-दक्षिणपंथ को उसने अपना राजनीतिक औजार बनाया है। उसके प्रतिवाद के रूप में अब नए तेवर वाला वामपंथ सामने आया है। हालांकि इसकी सीमाएं हर जगह स्पष्ट हैं, फिर भी इसका उदय स्वागतयोग्य है, क्योंकि इनसे नई संभावनाएं खुलती हैं।

भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अभी ऐसी किसी संभावना के संकेत नजर नहीं आते, तो उसकी वजह यहां शासक वर्ग के चलाए उस वैचारिक एजेंडे का अभी भी प्रभावशाली बने रहना है, जिसके जरिए आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं को विमर्श से बाहर धकेला गया है। बहरहाल, यहां की नई पीढ़ी अगर सीखना चाहे, तो वह पश्चिम में उभरी संभावनाओं और उनकी सीमाओं का अध्ययन कर सकती है। हालांकि अपनी राजनीति विकसित करने के लिए शिक्षा का असल स्रोत तो अपनी वस्तुगत परिस्थितियां और आवाम हो ही सकते हैं। खैर, यह एक बिल्कुल अलग मुद्दा है।

IIT job offers withdrawn: आईआईटी से दो प्लेसमेंट सीजन के लिए बाहर हो सकती हैं ओरेकल समेत 22 कंपनियां, जानें क्यों लेना पड़ रहा ऐसा फैसला

IIT job offers withdrawn: देश के प्रमुख आईआईटी संस्थानों ने छात्रों के हितों को देखते हुए सर्व सम्मति से एक फैसला किया है। इस फैसले के अनुसार, इंडियन इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) ने 2 प्लेसमेंट सीजन के लिए 22 कंपनियां को बाहर कर दिया है। आईआईटी संस्थानों में कैंपस प्लेसमेंट के दौरान छात्रों को नौकरी का ऑफर देने वाली इन कंपनियों में ओरेकल जैसी दिग्गज कंपनी भी शामिल है।

ऑल आईआईटी प्लेसमेंट कमेटी (AIPC) इस बारे में 30 सितंबर तक कंपनियों को लिखित रूप से सूचित करेगी। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये कंपनियां 2026 में ग्रेजुएट होने वाले स्टूडेंट्स को दिए गए जॉब ऑफर को पूरा करने में फेल रहीं। एआईपीसी के कन्वीनर और आईआईटी गुवाहाटी के एसोसिएट प्रोफेसर जॉन जोस ने बताया कि कमेटी ने कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय इस एक्शन को “नॉन-कोऑपरेशन” कहा है।

एआईपीसी ने क्यों लिया यह फैसला ?

आईआईटी ने अगले दो प्लेसमेंट सीजन के लिए कैंपस रिक्रूटमेंट के लिए 22 कंपनियों के साथ सहयोग बंद करने का फैसला किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये कंपनियां 2026 में ग्रेजुएट होने वाले स्टूडेंट्स को दिए गए जॉब ऑफर को पूरा करने में फेल रहीं। यह फैसला 23 आईआईटी के 150 से ज्यादा ऑफर पर लागू होता है। एआईपीसी के कन्वीनर जोस जोस ने कहा कि कुछ कंपनियों ने 10 से 15 ऑफर वापस ले लिए थे। फाइनल लिस्ट और जिन ऑफर पर असर पड़ा है, उनकी संख्या अभी भी तैयार की जा रही है क्योंकि अलग-अलग आईआईटी कमेटी को मामलों के स्टेटस के बारे में अपडेट कर रहे हैं।

प्लेसमेंट सीजन से बाहर होने वाली कंपनियों में ओरेकल भी शामिल

आईआईटी के 2 प्लेसमेंट सीजन से बाहर होने वाली कंपनियों की सूची में ओरेकल का नाम भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस सॉफ्टवेयर कंपनी ने आईआईअी छात्रों को दिए गए करीब 40 ऑफर नहीं माने। कई स्टार्टअप भी इस लिस्ट में हैं।

IITs ने नियोक्ताओं को पहले दी थी चेतावनी

आईआईटी का सितंबर का यह फैसला ऑफर वापस लेने वाली कंपनियों के साथ महीनों की बातचीत के बाद आया है। जून में, एआईपीसी ने Oracle, Interview Kickstart और SuperAGI समेत 10 से ज्यादा कंपनियों से कहा कि वे या तो उनके ऑफर मानें या प्रभावित स्टूडेंट्स को तीन महीने की सैलरी दें। इस मामले से उस समय करीब 100 छात्र प्रभावित हुए थे।

आईआईटी ने कंपनियों को दिया था 15 अगस्त तक का समय

एआईपीसी ने कंपनियों को जवाब देने के लिए 15 अगस्त तक का समय दिया था। मामलों को सुलझाने में नाकाम रहने वाली कंपनियों को 2027 और 2028 की क्लास के प्लेसमेंट ड्राइव से बाहर करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद AIPC ने कंपनियों के लिए ऑफर पाने वाले छात्रों को ऑनबोर्ड करने की डेडलाइन 15 सितंबर तय की।

ट्रम्प-जिनपिंग की मीटिंग खत्म, 60 मिनट ज्यादा चली:AI से टैरिफ तक कई मुद्दों पर चर्चा; आज व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच व्हाइट हाउस में मीटिंग करीब 2 घंटे बाद खत्म हो गई है। यह निर्धारित समय से 1 घंटे ज्यादा चली। बंद कमरे में हुई इस बैठक में AI, व्यापार, सुरक्षा और अमेरिका-चीन के रिश्तों जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने जिनपिंग के साथ अपने निजी रिश्ते पर जोर दिया। उन्होंने दोनों नेताओं की दोस्ती को सच्ची और गहरी बताया। वहीं, जिनपिंग ने निजी रिश्तों के बजाय दोनों देशों के बीच लंबे समय के संबंधों और आपसी हितों पर ज्यादा जोर दिया। जिनपिंग के सम्मान में गुरुवार रात व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर रखा गया है। इसमें टेक्नोलॉजी और AI से जुड़े बड़े कारोबारी भी शामिल होंगे। ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से जुड़ीं 4 अहम बातें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सबसे अहम मुद्दा AI इस बैठक के अहम मुद्दों में रहा। ट्रम्प ने इसे सुपरइंटेलिजेंस कहा। उन्होंने कहा कि आज इन क्षेत्रों में लिए गए फैसलों का असर आने वाले कई दशकों तक रहेगा। जिनपिंग ने AI को लेकर कहा कि यह हमेशा इंसानों के नियंत्रण में रहना चाहिए। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता 2 महीने बढ़ा अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार समझौते को दो महीने और बढ़ाकर 10 जनवरी तक कर दिया गया है। यह समझौता पहले 10 नवंबर को खत्म होना था। जिनपिंग ने 1 लाख अमेरिकी छात्रों को चीन बुलाया जिनपिंग ने अगले 5 साल में 1 लाख अमेरिकी छात्रों को चीन आने का न्योता भी दिया। जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन अमेरिकी कंपनियों के लिए अपना बाजार खुला रखेगा और उम्मीद करता है कि अमेरिका में चीनी कंपनियों के साथ भी निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा। ट्रम्प ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस का निर्माण दिखाया बैठक के दौरान ट्रम्प ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस में बन रहे नए बॉलरूम और हेलिपैड का काम भी दिखाया। ट्रम्प ने जिनपिंग को ‘ग्रेनाइट एक्सपर्ट’ बताया और कहा कि उन्हें अच्छा ग्रेनाइट पसंद है। अमेरिकी मीडिया की एंट्री पर विवाद जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस और अमेरिकी मीडिया के बीच भी विवाद देखने को मिला। ट्रम्प प्रशासन ने CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों को व्हाइट हाउस में एंट्री पर रोक लगा दी थी। इसके बाद कोर्ट ने इनकी व्हाइट हाउस में एंट्री बहाल करने का आदेश दिया। इसके बावजूद अगले दिन पत्रकारों को दोबारा अंदर जाने से रोक दिया गया। कई कोशिशों के बाद दोपहर करीब 12 बजे उन्हें व्हाइट हाउस में प्रवेश मिला। मीडिया की एंट्री को लेकर हुए इस विवाद का असर ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात की टीवी कवरेज पर भी पड़ा। अमेरिका के कई बड़े टीवी नेटवर्क ने दोनों नेताओं की शुरुआती मुलाकात का लाइव प्रसारण नहीं किया। इसी दौरान ओवल ऑफिस में ट्रम्प ने चीनी पत्रकारों को लेकर मजाक करते हुए कहा कि चीन की मीडिया सबसे दोस्ताना है।

कोर्ट ने ट्रम्प का फैसला 6 दिन बाद ही पलटा:CNN समेत 3 मीडिया हाउस की व्हाइट हाउस में एंट्री पर बैन हटाया

अमेरिकी कोर्ट ने CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों पर लगाए गए ट्रम्प प्रशासन के बैन को हटाने का आदेश दिया है। अब इन तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को फिर से व्हाइट हाउस में एंट्री मिल सकेगी। अमेरिकी फेडरल जज टिमोथी केली ने कहा कि मीडिया पर लगाया गया बैन अमेरिकी संविधान के खिलाफ हो सकता है। तीनों मीडिया संस्थानों ने ट्रम्प के फैसले के खिलाफ कोर्ट में अपील की थी। ट्रम्प ने 18 सितंबर को CNN, MS NOW और पॉलिटिको को व्हाइट हाउस से बैन करने का ऐलान किया था। उस समय तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकार व्हाइट हाउस प्रेस क्षेत्र में मौजूद थे और अपनी रिपोर्टिंग कर रहे थे। मीडिया संस्थानों ने कहा- बैन से पहले अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला CNN, MS NOW और पॉलिटिको ने कोर्ट में कहा कि ट्रम्प का फैसला उनके फर्स्ट अमेंडमेंट अधिकारों का उल्लंघन करता है। अमेरिकी संविधान का फर्स्ट अमेंडमेंट अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी की सुरक्षा करता है। तीनों मीडिया संस्थानों ने कहा था कि एक्सेस हटाने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया। मीडिया संस्थानों पर गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप ट्रम्प प्रशासन ने कोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था। उसका कहना था कि CNN, MS NOW और पॉलिटिको की कुछ खबरों में गलत जानकारी के साथ संवेदनशील और गोपनीय जानकारी भी लीक हुई। प्रशासन ने CNN की व्हाइट हाउस के नीचे बने बंकर से जुड़ी रिपोर्ट, MS NOW की ईरान युद्ध में अमेरिकी हथियारों की कमी वाली रिपोर्ट और पॉलिटिको की व्हाइट हाउस के बॉलरूम की फंडिंग से जुड़ी रिपोर्ट का उदाहरण दिया था। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने यह भी कहा कि इन मीडिया संस्थानों ने तय नियमों का पालन नहीं किया। ट्रम्प पहले भी मीडिया पर सवाल उठाते रहे हैं ट्रम्प 2016 से CNN की रिपोर्टिंग को लगातार ‘फेक न्यूज’ कहते रहे हैं। उनके कार्यकाल में पहले भी CNN के पत्रकारों का व्हाइट हाउस पास रोका जा चुका है। ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे बड़े अखबारों पर भी उनके खिलाफ पक्षपात करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए और आरोप लगाया कि ये संस्थान गलत नीयत से उनके खिलाफ खबरें प्रकाशित करते हैं। व्हाइट हाउस ने ट्रम्प टीवी शुरू की CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों पर बैन के बाद अमेरिका के बड़े टीवी चैनलों ने ट्रम्प के कार्यक्रमों की साझा लाइव कवरेज बंद कर दी थी। इसके बाद व्हाइट हाउस ने अपनी ऑनलाइन वीडियो फीड शुरू की, जिसका नाम ‘ट्रम्प टीवी’ रखा। ——————— ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी F-35 फाइटर जेट के पार्ट्स चीन के हाथ लगे: ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे थे अमेरिका के सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट F-35 के कुछ पार्ट्स चीन के हाथ लग गए हैं। ये पार्ट्स ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका भेजे जा रहे थे, लेकिन रास्ते में इनकी खेप हांगकांग पहुंच गई। पूरी खबर यहां पढ़ें…

मनीकंट्रोल अगस्त में भारत का नंबर-1 बिजनेस न्यूज प्लेटफॉर्म रहा, 3.22 करोड़ यूनिक विजिटर्स आए : Comscore

अगस्त में मनीकंट्रोल देश का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला बिजनेस न्यूज प्लेटफॉर्म रहा। ग्लोबल ऑडियंस मेजरमेंट कंपनी Comscore के मुताबिक, मनीकंट्रोल पर इस दौरान किसी भी दूसरी बिजनेस न्यूज साइट से ज्यादा यूनिक विजिटर्स आए। इसमें द इकोनॉमिक टाइम्स भी शामिल है।

Comscore की MMX Multi-Platform India रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में मनीकंट्रोल पर 3.22 करोड़ यूनिक विजिटर्स आए। वहीं, इकोनॉमिक टाइम्स पर 3.06 करोड़ यूनिक विजिटर्स पहुंचे। ये आंकड़े डेस्कटॉप, मोबाइल और सोशल समेत भारत की पूरी डिजिटल ऑडियंस के हैं।

पेज व्यू में भी बड़ी बढ़त

पेज व्यू के मामले में भी मनीकंट्रोल काफी आगे रहा। अगस्त में मनीकंट्रोल पर 25.75 करोड़ पेज व्यू दर्ज किए गए। इकोनॉमिक टाइम्स के पेज व्यू 7.85 करोड़ रहे।

यानी मनीकंट्रोल के पेज व्यू इकोनॉमिक टाइम्स के मुकाबले तीन गुने से भी ज्यादा रहे। इससे प्लेटफॉर्म पर आने वाले पाठकों की संख्या और उनकी एक्टिविटी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

Moneycontrol पर ज्यादा समय बिताते हैं रीडर

रीडर्स ने मनीकंट्रोल पर ज्यादा समय भी बिताया। अगस्त में यूजर्स ने इस प्लेटफॉर्म पर कुल 49.91 करोड़ मिनट बिताए। वहीं, The Economic Times के लिए यह आंकड़ा 13.28 करोड़ मिनट रहा।

इस तरह रीडर एंगेजमेंट में भी मनीकंट्रोल की बढ़त काफी बड़ी रही। यानी पाठक सिर्फ प्लेटफॉर्म पर आ नहीं रहे, बल्कि वहां ज्यादा समय भी बिता रहे हैं।

मैनेजिंग एडिटर ने क्या कहा?

मैनेजिंग एडिटर के मैनेजिंग एडिटर नलिन मेहता ने कहा, ‘भू-राजनीतिक अनिश्चितता और बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी चाहते हैं। रीडरशिप के आंकड़े Moneycontrol की रिपोर्टिंग और बाजार की गहरी कवरेज में रीडर्स के भरोसे को दिखाते हैं।’

उन्होंने कहा कि निवेशकों को बाजार और बिजनेस से जुड़ी जानकारी के साथ सही एनालिसिस भी चाहिए। Moneycontrol इसी जरूरत को पूरा करने पर फोकस करता है।

मार्केट से लेकर बिजनेस तक पूरी कवरेज

Moneycontrol पर रियल-टाइम मार्केट डेटा, ब्रेकिंग न्यूज और एनालिटिक्स मिलते हैं। इसके अलावा रिसर्च और बाजार से जुड़े एक्सपर्ट व्यू भी उपलब्ध हैं।

Comscore के ताजा आंकड़े प्लेटफॉर्म की पहुंच को दिखाते हैं। खासकर निवेशकों और बिजनेस लीडर्स के बीच इसकी रीडरशिप मजबूत बनी हुई है। बदलते आर्थिक माहौल में लोग समय पर जानकारी और गहरे विश्लेषण के लिए Moneycontrol का रुख कर रहे हैं।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

व्हाइट हाउस ने लॉन्च किया ट्रम्प टीवी:डिजिटल नेटवर्क पर 24 घंटे दिखाया जाएगा सरकार का कंटेंट; पहले शुरू किया था अपना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

व्हाइट हाउस ने सोमवार को ‘ट्रम्प टीवी’ लॉन्च करने की आधिकारिक घोषणा की है। यह एक डिजिटल ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क होगा। इस नेटवर्क पर अमेरिकी प्रशासन से जुड़ा कंटेंट 24 घंटे स्ट्रीम किया जाएगी। इससे पहले साल 2021 में ट्रम्प अपने का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ शुरू कर चुक हैं। ट्रम्प ने 18 सितंबर को CNN, MS NOW और पॉलिटिको को व्हाइट हाउस से बैन करने का ऐलान किया था। ट्रम्प ने कहा था कि ये संस्थान लगातार फेक न्यूज फैला रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि भविष्य में दूसरे मीडिया संस्थानों पर भी ऐसा एक्शन हो सकता है। ट्रम्प पहले शुरू कर चुके हैं अपने का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जनवरी 2021 में बैन X पर का सामना करने के बाद ट्रम्प ने 21 फरवरी 2022 को ‘ट्रुथ सोशल’ प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था, जिसे मुख्यधारा की पाबंदियों से मुक्त अभिव्यक्ति के लिए बनाया गया है। अभी इसके लगभग 60 लाख सक्रिय यूजर्स हैं और लेकिन अकेले ट्रम्प के इस पर 1.29 करोड़ फॉलोअर्स हैं। अमेरिकी टीवी नेटवर्क्स ने ट्रम्प की कवरेज बंद की अमेरिकी टीवी नेटवर्क ने व्हाइट हाउस से तीन प्रमुख आउटलेट्स पर प्रतिबंध के विरोध में ट्रम्प के लाइव कवरेज को रोक दिया है। इस विवाद के परिणामस्वरूप, ट्रम्प द्वारा अपने नए व्हाइट हाउस हेलीपैड के उद्घाटन और संयुक्त राष्ट्र महासभा की उनकी यात्रा का लाइव कवरेज नहीं किया जा रहा है ट्रम्प पक्षपात का आरोप लगाते रहे हैं साल 2016 से ही ट्रम्प CNN की खबरों को लगातार ‘फेक न्यूज’ कहते रहे हैं और उनके कार्यकाल में पहले भी इस चैनल के पत्रकारों के व्हाइट हाउस पास रोके जा चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ जैसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबारों पर भी अपने खिलाफ पक्षपात करने का आरोप लगाया और उन पर मानहानि के केस तक दर्ज कराए। ट्रम्प ने इन सभी संस्थानों की रिपोर्टिंग पर खुले तौर पर सवाल उठाए और उन पर जानबूझकर गलत नीयत से खबरें चलाकर उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाया। —————————- ये खबर भी पढे़ं… ट्रम्प ने कनाडा को लेकर यूरोप को धमकी दी:कहा- EU में शामिल किया तो भारी टैरिफ लगाऊंगा, व्यापार भी रोक दूंगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोपीय संघ को गंभीर टैरिफ लगाने की धमकी दी है। ट्रम्प ने कहा पूरी खबर पढ़ें…

Bengal SIR Dispute: बंगाल में अबतक SIR में कटे 93% वोटर्स की अपील मंजूर, बहाल हुआ तो मिलेगा वोटिंग का अधिकार, EC ने कहा- चुनाव नतीजों पर नहीं पड़ा असर

Bengal SIR Dispute: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन (SIR) के दौरान नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में अहम आंकड़े पेश किए हैं। आयोग के मुताबिक, अब तक जिन मामलों में अपील पर फैसला हुआ है, उनमें करीब 93 फीसदी लोगों ने अपनी अपील जीत ली है। उन्हें दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया गया है। चुनाव आयोग (EC) ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में यह जानकारी दी है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के साथ दिए गए आंकड़ों के अनुसार, कुल 1,26,194 मामलों का निपटारा 16 सितंबर तक किया गया था। इनमें से 1,13,943 लोग अपीलीय प्रक्रिया में यह साबित करने में सफल रहे कि वोटर लिस्ट से उनका नाम हटाने का फैसला सही नहीं था। वहीं, करीब 8,649 लोगों की अपील खारिज हुई और उनके नाम वोटर लिस्ट से बाहर ही रहेंगे।

24 अपीलीय ट्रिब्यूनल ने सुनीं अपीलें

वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए थे। इन पैनलों में हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और जजों को शामिल किया गया था। जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने का दावा खारिज कर दिया गया था, वे इन ट्रिब्यूनल के सामने अपील कर सकते थे। इन अपीलों की सुनवाई अप्रैल से शुरू हुई थी। हलफनामे में बताया गया कि अलग-अलग जिलों में कई मतदाताओं ने अपील दायर की। इस दौरान कई मामलों का निपटारा किया गया।

10 सितंबर और 16 सितंबर के आंकड़ों में अंतर

चुनाव आयोग के हलफनामे में एक दिलचस्प अंतर भी सामने आया है। मुख्य हलफनामे में कहा गया है कि 16 सितंबर तक 1,26,194 मामलों का निपटारा हो चुका था। वहीं, 24 ट्रिब्यूनल द्वारा 10 सितंबर तक 1,22,592 मामलों के निपटारे की जानकारी दी गई है। हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि अभी निपटाए गए मामलों की संख्या कुल मामलों की तुलना में काफी कम है, इसलिए इसे अंतिम परिणाम का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती चरण में उन मामलों का निपटारा पहले हुआ जिनमें मतदाताओं के पास अपने दावे के समर्थन में दस्तावेजी सबूत मौजूद थे। इसलिए अभी के आंकड़ों में नाम दोबारा शामिल किए जाने का अनुपात अधिक दिखाई दे सकता है।

TMC के 31 सीटों वाले दावे पर EC का जवाब

चुनाव आयोग ने यह हलफनामा तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उसके सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के उस दावे के जवाब में दाखिल किया है, जिसमें कहा गया था कि वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के कारण पार्टी को विधानसभा की 31 सीटों पर नुकसान हुआ। आयोग ने ओ’ब्रायन पर अदालत को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने उन्हीं आंकड़ों के दूसरे पक्ष को नजरअंदाज किया, जिनका इस्तेमाल अपने दावे के समर्थन में किया गया था।

EC ने कहा कि 21 विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले अभी विचाराधीन हैं, जिनकी संख्या संबंधित सीटों पर जीत के अंतर से अधिक है। आयोग के मुताबिक, इन सीटों में जीतने वाले उम्मीदवारों में TMC के उम्मीदवार भी शामिल हैं। आयोग ने अपने हलफनामे में तर्क दिया कि यदि ओ’ब्रायन द्वारा अपनाए गए तर्क और कसौटी को ही लागू किया जाए, तो TMC को उन विधानसभा सीटों के चुनाव परिणामों को भी चुनौती देनी होगी, जहां उसकी अपनी पार्टी के उम्मीदवार जीत चुके हैं।

अभी फाइनल तस्वीर साफ नहीं

चुनाव आयोग के मुताबिक, अपीलों के मौजूदा आंकड़े पूरी प्रक्रिया का फाइनल रिजल्ट नहीं बताते हैं। अभी सभी मामलों का निपटारा नहीं हुआ है। कई अपीलों पर फैसला होना बाकी है। इसलिए फिलहाल 93 फीसदी अपीलों के पक्ष में फैसला आने का आंकड़ा शुरुआती तस्वीर देता है। जबकि SIR के तहत वोटर लिस्ट से हटाए गए सभी नामों और लंबित अपीलों का फाइनल आंकड़ा सामने आने के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट होगी।

अब तक की बड़ी बातें

  • सफलता की दर: जिन मामलों का निपटारा हुआ है, उनमें से 1,13,943 लोग ट्रिब्यूनल को यह समझाने में सफल रहे कि EC द्वारा उन्हें वोटर लिस्ट से बाहर करने का फैसला गलत था।
  • चुनाव नतीजों पर असर नहीं: चुनाव आयोग का कहना है कि इन नामों को हटाए जाने से विधानसभा चुनाव के अंतिम नतीजों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
  • अपील की प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद 24 अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन किया गया था, जिसमें पूर्व चीफ जस्टिस और अन्य जजों की पीठ ने अप्रैल से इन अपीलों की सुनवाई शुरू की थी।
  • TMC के दावों का खंडन: आयोग ने TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के उस दावे को खारिज किया, जिसमें कहा गया था कि इनकी वजह से उन्हें 31 सीटों का नुकसान हुआ। चुनाव आयोग ने कहा कि यह तर्क पूरी तरह से काल्पनिक और गुमराह करने वाला है।

Bullet train India: भारत की खुद की 350 kmph स्पीड वाली बुलेट ट्रेन का प्लान आया सामने, जानिए जापान की E10 सीरीज को कैसे देगा टक्कर

Bullet train India: भारत अब हाई-स्पीड रेल के क्षेत्र में अपनी तकनीक और ट्रेनें विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। रेलवे मंत्रालय ने 2030 तक 350 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाली स्वदेशी बुलेट ट्रेन तैयार करने की योजना बनाई है। यह ट्रेन जापान की अगली पीढ़ी की E10 सीरीज की हाई-स्पीड ट्रेनों की क्षमता के बराबर होगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “भारत की अगली पीढ़ी की बुलेट ट्रेन को 350 किलोमीटर प्रति घंटे की टॉप स्पीड के हिसाब से प्लान किया जा रहा है। ट्रेन के डिज़ाइन का काम अगले छह महीनों में शुरू होने की उम्मीद है।” 2

016 में शुरू हुआ 508 किलोमीटर लंबा मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर अभी बन रहा है। इसे फिलहाल 320 kmph तक की रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों के लिए बनाया जा रहा है। इसके ऑपरेशन का पहला चरण अगस्त 2027 में शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ ही मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) कॉरिडोर की लागत में भी बड़ा इजाफा हुआ है। कैबिनेट ने प्रोजेक्ट की संशोधित लागत को 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक मंजूरी दी है। यह 2015 में तैयार शुरुआती अनुमान की तुलना में लगभग दोगुनी है।

350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली B35 ट्रेन

रेलवे मंत्रालय की योजना के तहत भारत अपनी B35 हाई-स्पीड ट्रेन विकसित करेगा। इसका डिजाइन स्पीड 350 किमी प्रति घंटा रखी जाएगी। इसका उद्देश्य भारत में ऐसी स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन तैयार करना है, जो दुनिया की आधुनिक बुलेट ट्रेन तकनीक के स्तर की हो। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका लक्ष्य जापान की अगली पीढ़ी की E10 सीरीज से मेल करना है।

जापान ने दिसंबर 2024 में भारत सरकार को बताया था कि उसकी मौजूदा E5 सीरीज की ट्रेनों का उत्पादन चरणबद्ध तरीके से बंद किया जा रहा है। जापान के अनुसार, E10 ट्रेनों का उत्पादन 2030 से शुरू होगा। ये 2034 तक संचालन के लिए उपलब्ध हो सकती हैं। भारत इन ट्रेनों के उपलब्ध होने तक अपने स्वदेशी विकल्प को तैयार करने पर काम कर रहा है।

पहले B28 ट्रेनें होंगी तैयार

भारत की तत्काल योजना B28 हाई-स्पीड ट्रेनों के निर्माण की है। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर पर शुरुआत में इन्हीं ट्रेनों को चलाया जाएगा। इंडियन रेलवे के मुताबिक, BEML को 32 B28 ट्रेनों के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका है। इसके अलावा BEML को 15 और B28 ट्रेनों के निर्माण के लिए 5,400 करोड़ रुपये का अलग कॉन्ट्रैक्ट मिला है। इस तरह कुल 47 B28 ट्रेनों के निर्माण की योजना है।

  • B28 ट्रेनों की डिजाइन स्पीड: 280 किमी प्रति घंटा
  • अधिकतम ऑपरेटिंग स्पीड: 249 किमी प्रति घंटा

2027 की शुरुआत में प्रोटोटाइप का ट्रायल

B28 ट्रेन के दो प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे। इनका ट्रायल 2027 की पहली तिमाही में शुरू होने की उम्मीद है। इसके बाद ट्रेनों के प्रदर्शन, सुरक्षा और हाई-स्पीड संचालन से जुड़ी जांच के आधार पर आगे का उत्पादन और संचालन किया जाएगा।

भारत का अपना ट्रेन कंट्रोल सिस्टम भी

स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेनों के साथ भारत अपना Bharat Train Control System (BTCS) भी विकसित करेगा। यह सिस्टम ट्रेन की रफ्तार, ट्रेनों के बीच दूरी, संचालन और सुरक्षा को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, BTCS की अवधारणा चीन के Chinese Train Control System (CTCS) जैसी होगी। इसका इस्तेमाल हाई-स्पीड और सामान्य रेल नेटवर्क में ट्रेन की गति और सुरक्षा प्रबंधन के लिए किया जाता है।

प्रोजेक्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी लागत में इजाफा

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट की लागत में भी भारी वृद्धि हुई है। 2015 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये थी। अब इसकी संशोधित लागत 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक लागत बढ़ने के प्रमुख कारणों में जमीन अधिग्रहण, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिग्नलिंग सिस्टम की लागत में बढ़ोतरी शामिल है।

जमीन अधिग्रहण की लागत में तीन गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है। यह खर्च बढ़कर करीब 19,700 करोड़ रुपये हो गया है। प्रोजेक्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी लागत में भी करीब 50% की वृद्धि हुई है। यह अब 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। 2015 के अनुमान की तुलना में ट्रेन सिग्नलिंग सिस्टम पर होने वाला खर्च भी करीब 100% बढ़ गया है। मौजूदा अनुमान के अनुसार, भविष्य में आने वाली जापानी ट्रेनों की लागत को छोड़कर पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 399 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर खर्च आ रहा है।

508 किलोमीटर लंबा है मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की कुल लंबाई 508 किलोमीटर है। इस पर शुरुआत में B28 हाई-स्पीड ट्रेनें चलाई जाएंगी। कॉरिडोर को दिसंबर 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद मुंबई और अहमदाबाद के बीच हाई-स्पीड रेल सेवा शुरू होगी। भारत में पहली बार इस तरह की हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन सेवा का संचालन होगा।

भारत की हाई-स्पीड रेल योजना में अब दो चरण

पूरे प्लान को आसान भाषा में समझें तो भारत की योजना दो स्तरों पर आगे बढ़ रही है। इससे भारत का लक्ष्य सिर्फ हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि भविष्य में हाई-स्पीड ट्रेन और उसके कंट्रोल सिस्टम को देश में ही विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ेगा।

  • पहला चरण: मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर के लिए B28 ट्रेनों का स्वदेशी निर्माण और संचालन होगा।
  • दूसरा चरण: इसी अनुभव और तकनीकी क्षमता के आधार पर 2030 तक 350 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाली B35 स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन को विकसित करना है।

फिलहाल, BEML और इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) मिलकर B28 बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इसे 280 kmph तक की रफ्तार के लिए डिजाइन किया गया है। इसका प्रोटोटाइप अगले साल की शुरुआत तक पूरा होने की उम्मीद है। अगस्त 2027 तक मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के एक हिस्से पर इसका ऑपरेशन शुरू होने की योजना है।

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ट्रम्प ने CNN को व्हाइट हाउस से बैन किया:फेक न्यूज कवरेज का आरोप, दोनों अन्य मीडिया हाउस पर भी कार्रवाई; कहा- आगे भी ऐसे कदम उठाएंगे

वॉशिंगटन में 18 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने CNN, MSNOW और पोलिटिको को व्हाइट हाउस से बैन करने का ऐलान किया। ट्रम्प ने शुक्रवार को कहा कि इन संस्थानों की लगातार फेक न्यूज कवरेज के कारण यह रोक लगाई गई है। उन्होंने आगे और मीडिया संस्थानों पर ऐसी पाबंदी लगाने की धमकी दी। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया साइट पर लिखा कि यह रोक तुरंत प्रभाव से लागू होगी। उन्होंने इन संस्थानों की रिपोर्टिंग को “FAKE NEWS” बताया। इससे पहले ट्रम्प ने फरवरी 2025 में एसोसिएटेड प्रेस (AP) के पत्रकारों पर भी ऐसी ही रोक लगाई थी। तब ट्रम्प ने AP के पत्रकारों को ओवल ऑफिस, एयर फोर्स वन और अन्य कार्यक्रमों में जाने से रोक दिया था। यह कार्रवाई AP के गल्फ ऑफ मेक्सिको का नाम बदलने के उनके फैसले का समर्थन नहीं करने के बाद की थी। AP ने दायर किया मुकदमा AP ने इस मामले में मुकदमा किया था। यह मामला अभी जारी है। ट्रम्प लंबे समय से उस मीडिया कवरेज पर नाराजगी जताते रहे हैं, जिसे वह अपने खिलाफ मानते हैं। उनका मीडिया संस्थानों पर मुकदमे करने और पत्रकारों पर व्यक्तिगत रूप से हमला करने का पुराना रिकॉर्ड है। वह पत्रकारों पर आमने-सामने या सोशल मीडिया के जरिए भी निशाना साधते रहे हैं। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल, BBC और अन्य मीडिया संस्थानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। खबर अपडेट हो रही है…

ट्रम्प ने CNN को व्हाइट हाउस से बैन किया:फेक न्यूज कवरेज का आरोप, दो अन्य मीडिया हाउस पर भी कार्रवाई; कहा- आगे भी ऐसे कदम उठाएंगे

वॉशिंगटन में 18 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने CNN, MSNOW और पोलिटिको को व्हाइट हाउस से बैन करने का ऐलान किया। ट्रम्प ने शुक्रवार को कहा कि इन संस्थानों की लगातार फेक न्यूज कवरेज के कारण यह रोक लगाई गई है। उन्होंने आगे और मीडिया संस्थानों पर ऐसी पाबंदी लगाने की धमकी दी। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया साइट पर लिखा कि यह रोक तुरंत प्रभाव से लागू होगी। उन्होंने इन संस्थानों की रिपोर्टिंग को “FAKE NEWS” बताया। इससे पहले ट्रम्प ने फरवरी 2025 में एसोसिएटेड प्रेस (AP) के पत्रकारों पर भी ऐसी ही रोक लगाई थी। तब ट्रम्प ने AP के पत्रकारों को ओवल ऑफिस, एयर फोर्स वन और अन्य कार्यक्रमों में जाने से रोक दिया था। यह कार्रवाई AP के गल्फ ऑफ मेक्सिको का नाम बदलने के उनके फैसले का समर्थन नहीं करने के बाद की थी। तीनों संस्थान ट्रम्प के फैसलों पर सवाल उठाते रहे हैं CNN- 24 घंटे चलने वाला टीवी न्यूज चैनल और डिजिटल वेबसाइट। अमेरिकी राजनीति की बड़ी खबरें और फैक्ट-चेकिंग करता है। ट्रम्प के बयानों और नीतियों पर लगातार तीखे सवाल उठाता रहा है। MS NOW- केबल टीवी न्यूज चैनल और डिजिटल मीडिया। लेफ्ट-ऑफ-सेंटर राजनीतिक डिबेट्स और ओपिनियन शोज पर फोकस करता है। ट्रम्प प्रशासन और उनकी नीतियों का सबसे मुखर आलोचक चैनल माना जाता है। पॉलिटिको- प्रमुख डिजिटल न्यूज वेबसाइट और राजनीतिक अखबार। व्हाइट हाउस और अमेरिकी संसद की अंदरूनी खबरों और नीतियों की रिपोर्टिंग करता है। ट्रम्प प्रशासन के अंदरूनी फैसलों, विवादों और रणनीतियों का बारीक विश्लेषण करता रहा है। ट्रम्प पक्षपात का आरोप लगाते रहे हैं साल 2016 से ही ट्रम्प CNN की खबरों को लगातार “फेक न्यूज” कहते रहे हैं और उनके कार्यकाल में पहले भी इस चैनल के पत्रकारों के व्हाइट हाउस पास रोके जा चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ जैसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबारों पर भी अपने खिलाफ पक्षपात करने का आरोप लगाया और उन पर मानहानि के मुकदमे तक दर्ज कराए। ट्रम्प ने इन सभी संस्थानों की रिपोर्टिंग पर खुले तौर पर सवाल उठाए और उन पर जानबूझकर गलत नीयत से खबरें चलाकर उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाया। AP ने दायर किया मुकदमा AP ने इस मामले में मुकदमा किया था। यह मामला अभी जारी है। ट्रम्प लंबे समय से उस मीडिया कवरेज पर नाराजगी जताते रहे हैं, जिसे वह अपने खिलाफ मानते हैं। उनका मीडिया संस्थानों पर मुकदमे करने और पत्रकारों पर व्यक्तिगत रूप से हमला करने का पुराना रिकॉर्ड है। वह पत्रकारों पर आमने-सामने या सोशल मीडिया के जरिए भी निशाना साधते रहे हैं। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल, BBC और अन्य मीडिया संस्थानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। —————————- ये खबर भी पढे़ं… ट्रम्प ने कनाडा को लेकर यूरोप को धमकी दी:कहा- EU में शामिल किया तो भारी टैरिफ लगाऊंगा, व्यापार भी रोक दूंगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोपीय संघ को गंभीर टैरिफ लगाने की धमकी दी है। ट्रम्प ने कहा पूरी खबर पढ़ें…