Rahul Gandhi : राहुल गांधी की प्रदर्शन के दौरान खरीदारी की अपील, INDIA Bloc Rally में क्यों शामिल नहीं हो रही CJP, दीपके ने बताया कारण

Rahul Gandhi : राहुल गांधी की प्रदर्शन के दौरान खरीदारी की अपील, INDIA Bloc Rally  में क्यों शामिल नहीं हो रही CJP, दीपके ने बताया कारण

दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार, 1 नवंबर को आयोजित INDIA ब्लॉक की रैली को लेकर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रैली में शामिल होने आ रहे लोगों से प्रदर्शन के साथ-साथ दिल्ली के स्थानीय बाजारों में खरीदारी करने की अपील की है। 

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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर विपक्षी गठबंधन के अभियान को समर्थन दिया है। हालांकि, उन्होंने साफ किया है कि उनकी पार्टी रैली में शामिल नहीं होगी और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखेगी। INDIA ब्लॉक की यह रैली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर आयोजित की जा रही है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

राहुल गांधी बोले- प्रदर्शन के साथ थोड़ी खरीदारी भी करें

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो जारी कर रैली में शामिल होने दिल्ली आ रहे लोगों से स्थानीय व्यापारियों का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लाखों लोग रामलीला मैदान पहुंच रहे हैं। यह त्योहारों का समय है और दिवाली, छठ तथा भाई दूज के मौके पर दिल्ली के बाजारों में खरीदारी भी जरूरी है।

 

राहुल गांधी ने कहा, “प्रदर्शन करें, मार्च निकालें, रैलियां करें और इसके साथ थोड़ी खरीदारी भी करें। इससे व्यापारियों को फायदा होगा।”

 

उन्होंने आरोप लगाया कि BJP रैली को लेकर अफवाहें फैला रही है। राहुल ने कहा कि प्रदर्शन से व्यापारियों को नुकसान नहीं होगा, बल्कि रैली में आने वाले लोग स्थानीय दुकानों से सामान खरीदकर कारोबारियों की मदद कर सकते हैं।
 

दिल्ली के व्यापारियों ने जताई थी बिक्री प्रभावित होने की आशंका

रैली के समय और आयोजन स्थल को लेकर दिल्ली के व्यापारिक संगठनों ने चिंता जताई थी। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने कहा था कि बड़ी राजनीतिक सभा के कारण ट्रैफिक जाम और बाजारों में आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इससे दिवाली के आसपास कारोबार और बिक्री पर असर पड़ने की आशंका है।

 

CTI ने सदर बाजार, करोल बाग, चांदनी चौक और चावड़ी बाजार जैसे प्रमुख व्यावसायिक इलाकों का हवाला देते हुए प्रदर्शन की तारीख और स्थान पर आपत्ति जताई थी। व्यापारियों ने राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के नेताओं से दिवाली के बाद प्रदर्शन करने की अपील की थी।

abhijit dipke cjp protest

CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने किया रैली का समर्थन

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर INDIA ब्लॉक की रैली का समर्थन किया है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी रविवार को रामलीला मैदान में होने वाले विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लेगी।

 

दीपके ने कहा कि CJP इस मुद्दे पर विपक्षी दलों के साथ एकजुटता रखती है, लेकिन संगठन अपनी स्वतंत्र पहचान और तटस्थता बनाए रखेगा। उनके मुताबिक, ‘वोट चोरी’ का मुद्दा किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है। जो भी संगठन इसके खिलाफ लड़ाई लड़ेगा, CJP उसका समर्थन करेगी।

 

रैली में पार्टी की भागीदारी को लेकर पूछे जाने पर दीपके ने कहा, “हम रविवार को प्रदर्शन का समर्थन करते हैं और उसके प्रति एकजुटता जताते हैं, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी एक स्वतंत्र संगठन है। यह एक तटस्थ मंच है और हम इसे ऐसा ही बनाए रखना चाहते हैं।” उन्होंने कहा कि वोट चोरी के खिलाफ संघर्ष करने वाले सभी संगठनों को उनका समर्थन रहेगा।

SIR में कथित गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष का अभियान

INDIA ब्लॉक की यह रैली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) में कथित अनियमितताओं के आरोपों के विरोध में आयोजित की जा रही है। विपक्षी गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है। इस मुद्दे पर विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज है।

 

रैली से पहले राहुल गांधी की व्यापारियों के समर्थन में खरीदारी की अपील और CJP की ओर से प्रदर्शन को मिले समर्थन ने इस आयोजन को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। हालांकि, CJP ने स्पष्ट कर दिया है कि वह रैली में शामिल हुए बिना इस मुद्दे पर अपना स्वतंत्र अभियान जारी रखेगी।

‘वोट चोरी’ आंदोलन में कितनी जान?

आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोधों का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं।

भारत में चुनावों को नियंत्रित करने के आरोप के कई पहलू हैं, मगर उनके लिए आम बोलचाल में ‘वोट चोरी’ शब्द प्रचलित हो गया है। आज जब वोट चोरी कहा जाता है, तो निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को अपने माफिक बदलने के नरेंद्र मोदी सरकार के कदम, भारतीय जनता पार्टी की सुविधा के मुताबिक चुनाव कार्यक्रम तय होने की बनी धारणा, आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू करने में भेदभाव, मतदान के दिन प्रशासन के एकतरफा रुख, मतदाताओं की संख्या से अधिक मतदान होने की बढ़ती गई शिकायतें, वोटर लिस्ट से इरादतन नाम काटने या जोड़ने के इल्जाम, और अब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर संगीन हुए संदेह- सभी शामिल होते हैं।

वैसे अविश्वास इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर भी रहा है। यह खासकर इसलिए गंभीर हुआ, क्योंकि वीवीपैट पर्चियों की गणना करने और ईवीएम के सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग को विपक्ष के साथ साझा करने के मामलों में निर्वाचन आयोग ने जिद्दी रुख अपनाए रखा है। विपक्षी दलों से संवाद करने और उनके शक को दूर करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर आयोग ने जनमत के एक बड़े दायरे में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया को संदिग्ध बना रखा है। आज जब ‘वोट चोरी’ कहा जाता है, तो उससे गुजरे वर्षों में इन सबको लेकर गहराती गई धारणा की अभिव्यक्ति होती है।

सितंबर में जब इंडियन एक्सप्रेस ने एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग के अंदर आपत्तियों और मतभेद की खबर छापी, तब से ‘वोट चोरी’ एक बड़ा सियासी मुद्दा बनी हुई है। अक्टूबर के पहले दो हफ्तों में यह एक बड़ी राजनीतिक गोलबंदी को प्रेरित करती नजर आई। कॉकरोच जनता पार्टी और उसके साथ जुड़े, खासकर वामपंथी छात्र/युवा संगठनों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर जोर डालने के लिए आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया। कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के घटक विपक्षी दल भी कभी अलग से, और कभी युवा आंदोलन के सहायक के रूप में सक्रिय नजर आए। यह सक्रियता अभी जारी है। इसके बावजूद अब राय बनने लगी है कि ‘वोट चोरी’ आंदोलन उस तरह राजनीतिक संगठनों से बाहर के नौजवानों, और आम जन को उद्वेलित नहीं कर पाया, जैसा जून-जुलाई में नीट पेपर लीक के बाद शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के दौरान हुआ था।

यानी ‘वोट चोरी’ आंदोलन असल में राजनीतिकृत (politicalised/ politicised) युवाओं, संगठनों और दलों का आंदोलन भर बन कर रह गया है। यहां राजनीतिकृत से मतलब उन नौजवानों से है, जो किसी ना किसी राजनीतिक दल से संबंधित छात्र या युवा संगठनों का हिस्सा हैं या फिर उन लोगों से जो राजनीतिक दलों से सीधे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा इस आंदोलन को उन लोगों का समर्थन मिला है, जो राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और ‘वोट चोरी’ के परिणाम को समझते हैं। कुल मिलाकर आंदोलन में भागीदारी उन व्यक्तियों और समूहों तक सीमित रही है, जो देश में पहले से मौजूद राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच “मोदी विरोधी धुरी” पर मौजूद रहे हैं। जबकि इस आंदोलन की सफलता इस धुरी पर नए लोगों को लाने और नए जन समूहों तक इसके विस्तार से अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।

अगर यह आकलन सही है, तो फिर सवाल उठेगा कि स्वतंत्र’ छात्र-युवा क्यों ‘नीट पेपर लीक आंदोलन की ओर आकर्षित हुए, जिससे उनके परिजनों का समर्थन भी उसे मिलने लगा; और क्यों ‘वोट चोरी’ विरोधी आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हुआ?

दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार के रुख को देखें, तो उससे भी ऐसे आकलन को बल मिलता है। नीट पेपर लीक आंदोलन धीरे-धीरे मोदी सरकार की बड़ी चिंता बनता जा रहा था। 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ के दौरान आंदोलनकारियों के हुए दमन पर देश के विभिन्न इलाकों में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली और जिस तरह स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए- जो कई जगहों पर उग्र होते भी नजर आए- उनसे मोदी सरकार की नींद उड़ी। इसीलिए उसने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर बढ़ते संकट को निष्प्रभावी करने में अपनी भलाई देखी। अब ज्ञानेश कुमार के मामले उसे ऐसा करने की जरूरत महसूस नहीं हुई है, तो संभवतः इसीलिए कि इस आंदोलन में उस तरह की “स्वतःस्फूर्तता” (spontaneities’) नज़र नहीं आई है।

क्यों? यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। क्या ‘वोट चोरी’ का सवाल उस तरह आम जन को नहीं छूता, जैसे पेपर लीक के मुद्दे ने छात्रों को स्पर्श किया था? हाल में एक पॉडकास्ट में राजनीति-शास्त्री अजय गुडावर्ती ने कहा कि एसआईआर में 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम काट दिए गए, लेकिन 13 करोड़ लोग कहां हैं? क्या वे सिर्फ संख्या हैं या वास्तविक नागरिक हैं, जिन्हें विपक्ष ने अपने साथ जोड़ने की कोई कोशिश नहीं की है? विपक्षी दल अगर उन 13 करोड़ लोगों में से आठ-दस फीसदी को भी गोलबंद कर पाते और उनको लेकर देश में किसी स्थल पर ‘जंतर-मंतर’ बना देते, तो क्या सरकार के लिए इस आंदोलन को नजरअंदाज कर पाना संभव होता?

गुडावर्ती का यह सवाल आंदोलन के चरित्र को समझने के लिहाज से अहम है। इसका संदेश यह है कि पेपर लीक से प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित छात्रों और उनके परिजनों की भागीदारी ने कॉकरोच आंदोलन को जानदार बनाया था, जबकि वोट चोरी आंदोलन में ऐसे प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित पक्षों की लगभग कोई भागीदारी नहीं रही है। यह कमोबेश अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से आए, राजनीतिक रूप से जागरूक, और मोदी विरोधी राजनीतिक समूहों से जुड़े लोगों का आंदोलन बना रहा, जिस कारण फिलहाल सरकार ने उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं समझी है।

चूंकि मौजूदा सत्ताधारी सबको साथ लेकर चलने में यकीन नहीं करते, इसलिए उनकी दृष्टि अपने निकट राजनीतिक एवं अन्य स्वार्थों से आगे नहीं जाती है। देश के दीर्घकालिक भविष्य के प्रति लापरवाह हैं, नतीजतन ‘वोट चोरी’ के कथानक से जनमत के एक बड़े हिस्से की निगाह में भारतीय राजसत्ता की वैधता संदिग्ध होने और देश की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर गहराते सवाल उन्हें अहम नहीं लगते। उनकी निगाह में तब तक ये मुद्दे गौर करने लायक नहीं बनेंगे, जब तक कि उनकी वजह से उनकी सत्ता के लिए फौरी खतरा पैदा ना हो! यह साफ है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन से अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

इसलिए इस बात की वास्तविक आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोध का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं। मोदी सरकार ऐसे मामलों में खुद एक पक्ष बन कर आंदोलनों को देश विरोधी किसी साजिश का हिस्सा बताने की रणनीति अपना लेती है, जिससे अक्सर वह अपने समर्थक तबकों को अपने पक्ष में अधिक गोलबंद करने में सफल रहती आई है। लेकिन उससे पैदा होने वाला गतिरोध संबंधित असंतुष्ट जन समूहों में टूटन और व्यवस्था से अलगाव का बोध पैदा करता है। देश और समाज के लिए इसके दूरगामी परिणाम बेहद हानिकारक हो सकते हैं। लेकिन तथ्य यही है कि वर्तमान सत्ताधारी उसकी चिंता नहीं करते।

इसलिए ये संभावना फिलहाल कम दिखती है कि चुनाव प्रणाली और निर्वाचन आयोग की घटती साख से उत्पन्न समस्या का कोई समाधान निकलेगा। अधिक संभावना यह है कि वोट चोरी के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बढ़ता जाएगा। इससे जनमत के एक बड़े दायरे में भारतीय चुनावों की विश्वसनीयता घटेगी और उसकी निगाह में राजसत्ता की लोक-वैधता संदिग्ध होगी। विपक्ष हर चुनावी हार के बाद ‘वोट चोरी’ के इल्जाम लगाएगा, जबकि सत्ता पक्ष इसे पराजित पक्ष की हताशा की मिसाल के रूप में पेश करेगा। जैसे यह स्थिति एक बड़े जनमत की निगाह में चुनाव परिणामों को संदिग्ध बनाए रखेगी, वैसे ही जनमत के दूसरे हिस्सों की निगाह में इससे विपक्षी कथानक की साख पर सवाल उठेंगे। कहा जाएगा कि जब विपक्ष जब जीत जाता है, तो उसे चुनाव स्वच्छ मालूम पड़ते हैं, जबकि हार की स्थिति में ‘वोट चोरी’ की बात कर वह ‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’ की कहावत को चरितार्थ करता है! इस तरह यह मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तीक्ष्ण बनाएगा।

जब तक विपक्ष इसे आर-पार की लड़ाई का मुद्दा बनाने को तैयार नहीं होता, इस गतिरोध के इसी रूप में आगे बढ़ते रहने की संभावना है। आर-पार की लड़ाई का एक रूप यही हो सकता है कि विपक्ष अपनी शर्तें तय करे और उनके पूरा होने तक चुनाव बहिष्कार का एलान करे। मसलन, यह कि एसआईआर रद्द कर जब तक उसके पहले की मतदाता सूची बहाल नहीं होती, निर्वाचन कार्यक्रम तय करने में उसकी सलाह को अहमियत नहीं दी जाती, अथवा ईवीएम संबंधित उसकी शिकायतों को दूर नहीं किया जाता, विपक्ष (यानी इंडिया गठबंधन) किसी चुनाव में भाग नहीं लेगा। कहा जा सकता है कि सिर्फ ऐसा होने पर ही वोट चोरी के कथानक को विपक्षी दायरे से बाहर विश्वसनीयता हासिल हो सकती है। संभवतः तभी ऐसी सूरत बन सकेगी, जब विपक्षी राजनीतिक दलों के दायरे से बाहर के लोग ‘वोट चोरी’ को लेकर उद्वेलित हों।

वरना, फिलहाल यह आंदोलन ‘संविधान बचाओ मुहिम’ के हश्र की तरफ जाता दिख रहा है। इस स्थिति का संदर्भ कहीं व्यापक है। गौरतलब है कि मोदी राज के 12 साल में विपक्षी दलों की पूरी सियासत नकारात्मक गोलबंदी की कोशिश पर टिकी रही है। या इसे इस तरह कहा जा सकता है कि ये दल ‘एंटी-इन्कम्बैंसी’ के भरोसे बैठे रहे हैं, जिसे पैदा करने या फैलाने के लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की रोजमर्रा के स्तर पर आलोचना पेश की है। लेकिन उन्होंने अपना कोई सकारात्मक एजेंडा आम जन के सामने नहीं रखा है। ना ही उन्होंने अपने पूर्व शासनकाल की गलतियों एवं नाकामियों की समीक्षा करने की जरूरत महसूस की है।  इस कारण अक्सर उनकी आलोचनाएं अवसरवाद से ग्रस्त नज़र

आई हैं।

जमीनी स्तर तक संगठन के मामले में अपनी कमजोरी के कारण ये दल अपना संदेश (जो भी संदेश उनके पास हो) आम जन तक ले जाने में सक्षम साबित नहीं हुए हैं। प्रतिबद्ध एवं विचार-सक्षम कार्यकर्ताओं का अभाव इन दलों की समस्या बना हुआ है। भाजपा/आरएसएस की विशाल चुनावी मशीनरी की तुलना में देखें, तो यह समस्या और भी अधिक गंभीर नजर आती है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर और अति-महत्त्वपूर्ण मसले को भी ये दल जन मुद्दा नहीं बना पाए हैं। अधिक से अधिक वे इसे राजनीतिक दलों के बीच का मुद्दा बनाने में सफल हुए हैँ। नतीजा, वह गतिरोध है, जिसकी चर्चा इस लेख में ऊपर हुई है।

दोहराव का जोखिम उठाते हुए भी यह कहना अनिवार्य है कि यह गतिरोध सिर्फ किसी नाटकीय या परिदृश्य में आमूल-चूल बदलाव लाने वाले कदम से ही टूट सकता है। बेशक चुनाव बहिष्कार का निर्णय ऐसा एक कदम होगा। लेकिन उससे ऐसा फैसला करने वाले दलों के लिए दूसरे किस्म की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। भारतीय राजनीति का आज जो चरित्र है, उसमें ज्यादातर राजनीतिक दल किसी विचार या उद्देश्य के इर्द-गिर्द संगठित नहीं हैं।

ये असल में महत्त्वाकांक्षी, निहित-स्वार्थी और सत्ता की लालसा रखने वाले तत्वों की जमात भर रह गए हैं। इसलिए चुनाव ना लड़ने का एलान करने का एक मतलब यह संदेश देना होगा कि अभी लंबे समय तक सत्ता या उससे संबंधित लाभ मिलने की संभावना नहीं है। उस हाल में पार्टी के साथ कितने नेता और कथित कार्यकर्ता जुड़े रह जाएंगे, यह बड़ा सवाल है। यह संभव है कि उस स्थिति में बहुत से नेता/कथित कार्यकर्ता उस दल में चले जाएं, जिसके चुनाव में शामिल होने की संभावना होगी या फिर यह भी संभव है कि उनका एक हिस्सा चुनाव लड़ने के लिए खुद अपनी पार्टी बना ले।

पार्टियों का ढांचा ऐसा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग उनसे सिर्फ इस उम्मीद में जुड़े रहते हैं कि उन्हें कभी, किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। ऐसा ना भी हो, तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए कई तरह के फायदों की आस रहती है। चुनाव के समय पार्टियां चंदा और संसाधन इकट्ठा करती हैं, जिससे वे कथित कार्यकर्ता भी लाभान्वित होते हैं, जिन्हें खुद चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलता। यानी चुनाव ना सिर्फ एक राजनीतिक गतिविधि है, बल्कि इसकी अपनी एक खास अर्थव्यवस्था है, जिसके लाभ इस प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति उठाते हैं।

इसीलिए पार्टियों के लिए चुनाव बहिष्कार का फैसला करना बेहद कठिन है। चूंकि ऐसा होने की फिलहाल गुंजाइश नहीं है, इसलिए ‘वोट चोरी’ आंदोलन के आगे बढ़ने की संभावना भी सीमित है। ऐसे में छिटपुट गतिविधियों के जरिए इस आंदोलन को जारी रखने की धारणा बनाने की कोशिशें होती रहेंगी। एक नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की प्रस्तावित रैली वैसा ही एक प्रयास है। लेकिन दूरगामी प्रभाव छोड़ने के लिहाज ये गतिविधियां अप्रभावी साबित होती रहेंगी।

40 लग्जरी विला, 6.16 करोड़ रुपये का निवेश और हर साल ₹1.80 करोड़ का किराया, IAS-IPS पति-पत्नी पर भ्रष्टाचार का शिकंजा!

Rajasthan IAS-IPS Couple News: राजस्थान में वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनकी IPS पत्नी प्रशाखा माथुर से जुड़ा 40 लग्जरी विला और कॉटेज खरीदने का मामला इन दिनों सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है। आरोप है कि IAS अधिकारी और उनके परिवार के सदस्यों ने दो बड़े रिसॉर्ट में करीब 6.16 करोड़ रुपये में 40 संपत्तियां खरीदीं। फिर उन्हीं संपत्तियों को बेचने वाली कंपनी को वापस लीज पर दे दिया। इस लीज व्यवस्था के तहत कपल को हर साल 1.80 करोड़ रुपये किराया मिलने की बात सामने आई है। मामला सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को विस्तृत जांच की मंजूरी दे दी है। दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को फिलहाल अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर्स (APO) पर रखा गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला राजस्थान के उदयपुर और अलवर में स्थित दो लग्जरी रिसॉर्ट से जुड़ा है। इन रिसॉर्ट का संचालन ‘गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी करती है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल, उनकी IPS पत्नी प्रशाखा माथुर और परिवार के अन्य सदस्यों ने कंपनी से लगभग ढाई साल के दौरान बड़ी संख्या में कॉटेज और विला खरीदे।

बताया जा रहा है कि इन संपत्तियों की खरीदारी का कुल कीमत लगभग 6.16 करोड़ रुपये था। इस सौदे की सबसे अहम बात यह है कि संपत्तियां खरीदने के तुरंत बाद इन्हें उसी कंपनी को वापस लीज पर दे दिया गया, जिससे इन्हें खरीदा गया था। इस डील के तहत हर साल कुल 1.80 करोड़ रुपये किराए के रूप में मिलने का प्रावधान बताया गया है। इसी असामान्य खरीद और लीज व्यवस्था ने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा है।

ACB का बयान

ACB के डायरेक्टर जनरल गोविन्द गुप्ता ने एक बयान में बताया कि राजस्थान सरकार ने ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 2018’ की धारा 17-ए के तहत विस्तृत जांच के लिए पूर्वानुमोदन प्रदान किया है। मामले में आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल (तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव, उद्योग विभाग), निजी कंपनी ‘गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशकों और अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच की जाएगी।

कैसे किया फर्जीवाड़ा?

गुप्ता ने कहा कि राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी अग्रवाल द्वारा ‘गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशकों के साथ कथित आपराधिक मिलीभगत कर अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग करने के प्रथम दृष्टया तथ्य सामने आए हैं। आरोप है कि उन्होंने खुद और संबंधित कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया। साथ ही राज्य सरकार को भारी आर्थिक नुकसान कराया।

उन्होंने बताया कि ब्यूरो ने मीडिया में आई एक खबर और उद्योग विभाग से प्राप्त तथ्यात्मक रिपोर्ट का विश्लेषण किया। इसके अलावा, गोपनीय सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर सामने आए तथ्यों के संबंध में प्राथमिक जांच दर्ज कर विस्तृत पड़ताल करना उचित पाया गया।

कंपनियों के साथ मिलीभगत का आरोप

बयान के मुताबिक, प्रारंभिक जांच में सामने आया कि अग्रवाल ने राजस्थान में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए कथित तौर पर अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग किया। इनमें उदयपुर के जिला अधिकारी, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष और उद्योग विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव समेत अन्य पद शामिल हैं।

आरोप है कि उन्होंने निजी कंपनी ‘गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशकों के साथ मिलीभगत कर कंपनी को रिजॉर्ट निर्माण संबंधी शर्तों में अनुचित छूट दिलाई। इसके अलावा, आवश्यक प्रमाण-पत्रों की जांच किए बिना स्वीकृतियां और विशेष रियायती आर्थिक पैकेज दिलाकर कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया।

उदयपुर में 20 कॉटेज, अलवर में 20 विला

मीडिया रिपोर्टों और ACB की शुरुआती जांच से सामने आई जानकारी के मुताबिक, संपत्तियों की खरीद दो अलग-अलग चरणों में हुई। बयान के अनुसार, उदयपुर स्थित बुझड़ा रिजॉर्ट में अग्रवाल और उनकी पत्नी के नाम पर 10-10 विला 15-15 लाख रुपये में खरीदे जाने की जानकारी सामने आई है।

इसी तरह, अलवर के अजबगढ़ स्थित अनंता रिसॉर्ट में अग्रवाल और उनकी पत्नी के नाम पर आठ विला 16.5-16.5 लाख रुपये में दोनों बेटों के नाम पर चार विला करीब 15-15 लाख रुपये में और सास-ससुर के नाम पर चार विला लगभग 16.5-16.5 लाख रुपये में खरीदे जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि इन संपत्तियों की मार्केट कीमत की तुलना में काफी कम कीमत पर किया गया।

एक ही दिन में 20 विला की रजिस्ट्री

गुप्ता के मुताबिक, गोपनीय सूत्रों से यह जानकारी भी सामने आई है कि वित्त विभाग ने ‘गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड’ को 27 मार्च 2026 को विशेष रियायती आर्थिक पैकेज जारी किया था। इसी दिन शिखर अग्रवाल ने 20 विला की रजिस्ट्री कराई थी। ब्यूरो के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह भी प्रतीत हुआ कि अग्रवाल ने विभिन्न पदों पर रहते हुए निजी कंपनी के निदेशकों के साथ कथित आपराधिक मिलीभगत कर कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया और राज्य सरकार को भारी आर्थिक नुकसान कराया। इसके अलावा, स्वयं और अपने परिजनों के नाम पर कथित रूप से आय से अधिक संपत्तियां अर्जित किए जाने के तथ्यों की भी विस्तृत जांच आवश्यक पाई गई है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर राजस्थान सरकार ने मामले में विस्तृत जांच की मंजूरी दी है।

कौन हैं IAS शिखर अग्रवाल और IPS प्रशाखा माथुर?

शिखर अग्रवाल 1993 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं। वह राजस्थान सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल रहे हैं:-

– अतिरिक्त मुख्य सचिव, उद्योग विभाग।

– राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष।

– उदयपुर जिला कलेक्टर।

– राजस्थान के मुख्यमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त मुख्य सचिव।

– RIICO के अध्यक्ष।

– निवेश प्रोत्साहन और औद्योगिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग।

दिसंबर 2023 में भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद फरवरी 2024 में शिखर अग्रवाल को मुख्यमंत्री का अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था। उन्होंने नवंबर 2025 तक यह जिम्मेदारी संभाली। प्रशाखा माथुर 1995 बैच की IPS अधिकारी हैं। वह राजस्थान पुलिस मुख्यालय में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) के पद पर तैनात थीं। उनके पास योजना, आधुनिकीकरण और कल्याण से जुड़ी जिम्मेदारियां थीं।

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rahul gandhi

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन INDIA ने अपना विरोध तेज कर दिया है। शनिवार को प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ का प्रस्ताव पारित करने के बाद आज रविवार को विपक्षी दल दिल्ली में ‘दिल्ली चलो’ मार्च निकालेंगे और रामलीला मैदान में महारैली करेंगे। इस प्रदर्शन में कांग्रेस समेत गठबंधन के कई दलों के नेता और कार्यकर्ता शामिल होंगे। विपक्ष चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाएगा। साथ ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की जाएगी। 

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आज कब और कहां से निकलेगा ‘दिल्ली चलो’ मार्च?

INDIA गठबंधन का प्रस्तावित मार्च दोपहर 12 बजे मिंटो रोड-कनॉट प्लेस जंक्शन से शुरू होकर रामलीला मैदान पहुंचेगा। इसके बाद मैदान में विपक्षी नेता जनसभा को संबोधित करेंगे। रामलीला मैदान में रैली के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास से विपक्षी नेता खुली बसों में मार्च के शुरुआती स्थान तक पहुंचने वाले हैं। राहुल गांधी सहित कई बड़े नेताओं के इसमें शामिल होने की संभावना है।

 क्या है ‘जन महाभियोग’, शनिवार को क्या हुआ था?

INDIA गठबंधन के नेताओं ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ की कार्यवाही की थी। इसकी अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की थी।

इस दौरान विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर आरोप लगाए। खरगे ने प्रस्ताव पेश किया, जबकि राहुल गांधी ने समापन भाषण दिया। विपक्ष ने प्रस्ताव पारित कर ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग उठाई। हालांकि, यह विपक्ष की ओर से आयोजित प्रतीकात्मक राजनीतिक कार्यवाही थी, संवैधानिक प्रक्रिया के तहत औपचारिक महाभियोग नहीं।

INDIA bloc Ramlila Maidan Rally: दिल्ली में आज INDIA गठबंधन का हल्लाबोल: रामलीला मैदान किले में तब्दील! 4,000 पुलिसकर्मी और CAPF जवान तैनात

INDIA Bloc Rally Today Delhi: राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को होने वाले ‘इंडिया’ गठबंधन की प्रस्तावित महारैली के मद्देनजर 4,000 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ-साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (RCRPF) की कंपनियों को तैनात किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत पूरे स्थल को 14 जोन में बांटकर निगरानी के लिए 200 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि पुलिस ने इस रैली के मद्देनजर सुरक्षा और ट्रैफिक को लेकर व्यापक इंतजाम किए हैं। इस रैली में करीब 50,000 लोगों के शामिल होने का अनुमान है। मिंटो ब्रिज से लेकर कार्यक्रम स्थल तक के रैली मार्ग और रामलीला मैदान दोनों जगह बल तैनात करने की योजना बनाई गई है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘इंडिया’ के प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ का प्रस्ताव पारित होने के अगले दिन रामलीला मैदान में गठबंधन की रैली होने जा रही है। पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने विशेष आयुक्त, संयुक्त आयुक्त और मध्य एवं नई दिल्ली जिलों के पुलिस उपायुक्तों सहित वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शनिवार को मिंटो रोड और रामलीला मैदान में सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया।

दिल्ली में पिछले दिनों विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर बुलाईं गईं सीएपीएफ की 270 कंपनियों की तैनाती की अवधि को तीसरी बार बढ़ाकर 16 नवंबर तक कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस को पूरे शहर में इनकी तैनाती के समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

200 से अधिक कैमरे लगाए गए

रैली के संबंध में एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया, “निगरानी के लिए 200 से अधिक कैमरे लगाए गए हैं। हम भीड़ के इकट्ठा होने, एंट्री-एग्जिट पॉइंट की निगरानी करेंगे और कार्यक्रम स्थल पर एंट्री करने वाले किसी भी आपराधिक तत्व की जांच करेंगे।” इन व्यवस्थाओं में ड्रोन से निगरानी और बॉडी-वॉर्न (शरीर पर लगे) कैमरे भी शामिल हैं। स्थिति पर नजर रखने के लिए मैदान के भीतर एक कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। जबकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दंगा-रोधी वाहन और अन्य निगरानी उपकरण तैनात रहेंगे।

50,000 लोग आ सकते हैं रामलीला मैदान

कार्यक्रम स्थल के 14 जोन में से प्रत्येक की देखरेख सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) स्तर के अधिकारी करेंगे। जबकि दो जोन की निगरानी अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी। वरिष्ठ अधिकारी व्यवस्था पर कड़ी नजर रखेंगे। अधिकारियों के मुताबिक, रामलीला मैदान के खाली रहने पर उसमें करीब 45,000 से 50,000 लोग आ सकते हैं। हालांकि, कुर्सियां, घेराबंदी और निर्धारित रास्ते बनाए जाने के कारण पुलिस का अनुमान है कि 30,000 से 40,000 लोगों का जमावड़ा हो सकता है।

वहीं, ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं ने रैली में 10 लाख तक लोगों के पहुंचने की उम्मीद जताई है। रैली को सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक आयोजित करने की अनुमति दी गई है। पुलिस ने आयोजकों से कहा है कि वे भीड़ को नियंत्रित करने, लोगों की आवाजाही को सुगम बनाने और पेयजल व्यवस्था के लिए वालंटियर्स को तैनात करें। भीड़ अधिक होने की स्थिति से निपटने के लिए मैदान के बाहर भी जगह रखी जाएगी।

कांग्रेस ने की बड़ी तैयारी

चुनावी सिस्टम में कथित अनियमितताओं के विरोध और सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित ‘दिल्ली चलो’ मार्च तथा रैली में शामिल होने के लिए विभिन्न राज्यों से विपक्षी दलों के नेता और समर्थक शनिवार को ही राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने लगे। रामलीला मैदान में मुख्य मंच के ऊपर विशाल तिरंगा शामियाना लगाया गया है। ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के प्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम के बीच विपक्ष मिंटो रोड से रामलीला मैदान तक मार्च निकालने की तैयारी में है, जिसके बाद रैली होगी।

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रैली में विपक्षी दलों के अलावा छात्र संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के भी बड़ी संख्या में शामिल होने की संभावना है। ‘इंडिया’ गठबंधन ने छात्रों, युवाओं, महिलाओं, श्रमिकों और नागरिक समाज के सदस्यों से प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और कुछ छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। विपक्षी गठबंधन का मार्च दोपहर 12 बजे मिंटो रोड-कनॉट प्लेस चौराहे से शुरू होगा और रामलीला मैदान पहुंचेगा। इसके बाद रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन के नेता रैली को संबोधित करेंगे। विपक्षी नेताओं के कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से बसों में सवार होकर मार्च के शुरुआती स्थल तक पहुंचने की संभावना है।

किरेन रिजिजू ने कांग्रेस से पूछे 5 तीखे सवाल, बोले- 2014 और 2024 की हार पर क्या जवाब है?

किरेन रिजिजू ने कांग्रेस से पूछे 5 तीखे सवाल, बोले- 2014 और 2024 की हार पर क्या जवाब है?

kiren rijiju

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े पांच सवालों के जवाब मांगे हैं। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ 44 सीटें जीतने पर सवाल उठाया। उन्होंने 8 बार के SIR को लेकर भी मुख्‍य विपक्षी दल से जवाब मांगा। 

 

रिजिजू ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कांग्रेस सरकार द्वारा की जाती थी, तब 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 44 सांसद ही क्यों मिले? जब 2024 में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) नहीं थे, तब कांग्रेस को लगातार तीसरी हार का सामना क्यों करना पड़ा?

 

रिजिजू ने सवाल किया कि क्या वर्तमान कांग्रेसी मुख्यमंत्री इस्तीफा देंगे और 2014 से 2026 के बीच सरकारें बनाने के लिए माफी भी मांगेंगे? क्या मतदाता सूचियों से उन सभी लोगों के नाम हटाए जाने चाहिए जो अवैध अप्रवासी (घुसपैठिए), मृत, स्थानांतरित या फर्जी हैं, या नहीं?

उन्होंने सवाल किया कि क्या 1952-56, 1958-61, 1965-66, 1983-84, 1987-88, 1993, 1995 और 2002-2004 में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण SIR अवैध एक परिवार की पार्टी बाहरी ताकतों के साथ मिलकर संविधान और भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिश कर रही है।

 

गौरतलब है कि आगामी एक नवंबर यानी कल लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक की दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली आयोजित होनी है।

1 नवंबर को रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक की रैली, 250 CCTV कैमरों से होगी निगरानी, चप्पे-चप्पे पर पुलिस की नजर

कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया ब्लॉक 1 नवंबर को रामलीला मैदान में बड़ी रैली करने वाली है। रैली को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए पूरे मैदान में 200 से 250 हाई-डेफिनिशन CCTV कैमरे लगाए गए। वहीं इस पर निगरानी रखने के लिए कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। यहां से पुलिस अधिकारी रैली में होने वाली हर हलचल पर नजर रखेंगे। इसके अलावा, भीड़ को संभालने और किसी भी आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अलग-अलग रास्तों की व्यवस्था भी की गई है। आइए जानते हैं रैली को लेकर कैसी है दिल्ली पुलिस की तैयारी

SIR में गड़बड़ी को लेकर विरोध प्रदर्शन

ये रैली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों के विरोध में आयोजित की जा रही है। SIR में कथित गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग कर रहा है। रैली को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने 12 एकड़ में फैले रामलीला मैदान में तैयारियां शुरू कर दी हैं। मैदान में बैग की जांच करने वाली मशीनें, मेटल डिटेक्टर और बैरिकेड लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा, आने-जाने वाले सभी रास्तों पर निगरानी रखी जाएगी। भीड़ को संभालने और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पुलिस की विशेष टीमें भी तैनात रहेंगी।

चप्पे-चप्पे पर होगी निगरानी

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, रामलीला मैदान और आसपास के इलाकों में सुरक्षा के लिए करीब 200 से 250 CCTV कैमरे लगाए जाएंगे। इनकी मदद से मैदान के अंदर और बाहर हर गतिविधि पर नजर रखी जाएगी। सभी कैमरों की लाइव तस्वीरें कंट्रोल रूम में देखी जाएंगी, ताकि पुलिस भीड़ पर नजर रख सके और किसी भी परेशानी पर तुरंत कार्रवाई कर सके। इसके अलावा, पुलिसकर्मी अपने शरीर पर कैमरे लगाएंगे और AI तकनीक वाले कैमरों से लोगों के चेहरों की पहचान की जाएगी। इसके लिए एक अस्थायी कंट्रोल रूम भी बनाया जाएगा, जहां से पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखी जाएगी। इन सभी इंतजामों का मकसद किसी भी गड़बड़ी या आपात स्थिति का जल्द पता लगाना और समय पर कार्रवाई करना है।

करीब 3,000 से 3,500 पुलिसकर्मी होंगे तैनात

सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए रामलीला मैदान को 14 हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से की जिम्मेदारी सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) स्तर के अधिकारी को सौंपी जाएगी। इन सभी हिस्सों को आगे आठ क्षेत्रों में बांटा जाएगा, जिनकी निगरानी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेंगे। रैली के दौरान मैदान और आसपास के इलाकों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवानों समेत करीब 3,000 से 3,500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाएगी। पुलिस ने इस दौरान करीब 50 हजार लोगों के जुटने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा के इंतजाम किए हैं।

आठ में से तीन गेट खोले जाएंगे

रामलीला मैदान के कुल आठ गेट में से केवल तीन गेट आम लोगों के आने-जाने के लिए खोले जाएंगे। वीआईपी लोगों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के लिए अलग-अलग गेट की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, मैदान में प्रवेश करने से पहले सभी लोगों की दो बार जांच की जाएगी, ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा चूक न हो और रैली के दौरान व्यवस्था बनी रहे। किसी भी आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए एक अलग गेट बनाया गया है। इसके अलावा, पुलिस पूरे कार्यक्रम के दौरान लोगों की आवाजाही पर नजर रखेगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बिना अनुमति के कोई भीड़ जुलूस के रूप में शहर के दूसरे इलाकों की ओर न बढ़े और कानून-व्यवस्था बनी रहे।

कब से कब होगी रैली

रैली के दौरान सही व्यवस्था बनाए रखने के लिए आयोजकों को पर्याप्त संख्या में वॉलंटियर रखने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही पीने के पानी, महिलाओं के लिए अलग शौचालय और पार्किंग की सुविधा का इंतजाम करने के निर्देश दिए गए हैं। पार्किंग की व्यवस्था के लिए ट्रैफिक पुलिस से भी संपर्क करना होगा। इसके अलावा, रैली में आने वाले लोगों को लाने और ले जाने वाली बसों की जानकारी भी मांगी गई है। रैली सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक होगी। आयोजकों को निर्देश दिया गया है कि कार्यक्रम तय समय पर खत्म करना होगा और किसी को भी रामलीला मैदान में रातभर रुकने की अनुमति नहीं होगी।