चुनाव हारकर भी तेलंगाना के मंत्री बने मोहम्मद अजहरुद्दीन ने मांगा ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा (Video)

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और वर्तमान में तेलंगाना राज्य में कांग्रेस के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ने भी केंद्रीय पार्टी लाइन पकड़ते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगा है और S.I.R (Special Intensive revision) को धोखाधड़ी बताया है।यह बातचीत उन्होंने प्रदर्शन के दौरान कही जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

गौरतलब है कि 3 साल पहले मोहम्मद अजहरुद्दीन तेलंगाना में घरेलू पिच पर भी नहीं जीत सके। तेलंगाना की हाई प्रोफाइल जुबली हिल्स सीट पर  उनकी स्थिती मजबूत मानी जा रही थी। लेकिन वह इस सीट पर तब हार गए जब पूरे राज्य में कॉंग्रेस की आँधी चल रही थी।हार के बाद भी कांग्रेस आलाकमान ने मशहूर  और मुस्लिम चेहरा होने के कारण अल्पसंख्यक मंत्रालय थमा दिया।

कांग्रेस की आंधी में भी चुनाव हारे अजहर

इस सीट पर भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन को कुल 26 राउंड की वोटिंग के बाद  62,343 वोट मिले। वहीं भारत राष्ट्र समिति के प्रतिद्वंदी मगांथी गोपीनाथ को 78282 वोट मिले थे। इस कारण मोहम्मद अजहरुद्दीन 15,939 वोटों से हार गए थे। तीसरे स्थान पर भारतीय जनता पार्टी के लंकाला दीपक रेड्डी रहे थे जिन्हें कुल 25,083 वोट हासिल हुए थे। साल 2018 में भी मगांथी गोपीनाथ की इस सीट पर जीत हुई थी लेकिन मोहम्मद अजहरुद्दीन को जीत का दावेदार बताया जा रहा था।

साल 2009 में कॉंग्रेस पार्टी से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले मोहम्मद अजहरुद्दीन ने इस ही साल लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की मुरादाबद सीट पर जीत अर्जित की थी।इसके बाद साल 2014 में वह राजस्थान के टोंक सवाई माधोपुर से लोकसभा चुनाव में  उतरे थे लेकिन यहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। भारतीय जनता पार्टी के  प्रत्याशी सुखबीर सिंह जौनपुरिया ने उनको मात दी थी।

शानदार करियर का फिक्सिंग के आरोप ने किया अंत

भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों में से एक अजहर ने भारत का 99 टेस्टों और 334 वनडे में प्रतिनिधित्व किया था। वह 1992, 1996 और 1999 के विश्व कप में भारत के कप्तान रहे थे।अजहर ने अपने करियर में 99 टेस्टों में 22 शतकों की मदद से 6215 रन और 334 वनडे में 7 शतकों की मदद से 9378 रन बनाए थे। वह भारत के सफल कप्तानों में शुमार थे। उन्होंने 47 टेस्टों में भारत का नेतृत्व किया और 14 मैच जीते जबकि वनडे में उन्होंने 174 मैचों में भारत का नेतृत्व किया और 90 मैच जीते।

अपने शानदार करियर के दौरान अजहर का नाम मैच फिक्सिंग में आया था जिसके बाद बीसीसीआई ने उनपर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि 2012 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने उनपर लगा प्रतिबंध हटा दिया।

‘Gyanesh, it’s done bro…’ का नारा लगाते बैरिकेड पर चढ़े राहुल गांधी; अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी सांसद डिटेन

Rahul Gandhi-India Bloc EC March: देश की राजधानी में मंगलवार को विपक्षी INDIA गठबंधन ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुआई में दर्जनों विपक्षी सांसदों ने संसद के मकर द्वार से चुनाव आयोग के मुख्यालय की ओर विरोध मार्च निकाला। सुरक्षा बलों ने इस मार्च को संसद मार्ग पर ही नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के बीच भारी बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया।

बैरिकेड पर चढ़े राहुल गांधी, बोले- ‘ज्ञानेश, अब बहुत हुआ!’

सुरक्षा बलों द्वारा रास्ता रोके जाने पर माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया। इसी दौरान राहुल गांधी प्रदर्शनकारियों के बीच लगे बैरिकेड्स पर चढ़ गए और हाथों में तिरंगा लहराते हुए सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर मुख्य चुनाव आयुक्त को संबोधित करते हुए लिखा, ‘Gyanesh it’s done bro. Time to resign’ यानी ज्ञानेश, अब बहुत हो गया ब्रो! अब इस्तीफा देने का समय आ गया है।

इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, पवन खेड़ा और केसी वेणुगोपाल आकाशवाणी भवन के गेट तक पहुंच गए, जहां से पुलिस ने राहुल और प्रियंका गांधी को हिरासत में ले लिया।

सड़क पर ही धरने पर बैठे सांसद, कई बड़े चेहरे हिरासत में

बैरिकेडिंग के पास मार्च रुकने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता अभिषेक बनर्जी व डेरेक ओ’ब्रायन और सीपीआई (एम) के जॉन ब्रिटास समेत तमाम सांसद सड़क पर ही धरने पर बैठ गए।

सांसदों ने हाथों में तख्तियां और पोस्टर ले रखे थे, जिनमें सीईसी ज्ञानेश कुमार को संघ (RSS) की गणवेश में दिखाया गया था। सांसदों ने ‘भाजपा है CEC है’, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ और ‘लोकतंत्र बिकाऊ नहीं है’ जैसे तीखे नारे लगाए। बाद में पुलिस ने अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी समेत कई नेताओं को बसों में भरकर हिरासत में ले लिया।

पैरामिलिट्री फोर्स तैनात, संजय राउत ने उठाए सवाल

विपक्ष के मार्च को देखते हुए संसद भवन और चुनाव आयोग मुख्यालय के आसपास तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था और भारी बैरिकेडिंग की गई थी। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने इस भारी सुरक्षा बल की तैनाती पर तीखा हमला बोला।

संजय राउत ने कहा, ‘हम सांसद हैं, इस देश के जिम्मेदार नागरिक हैं। हमें रोकने के लिए इतनी बड़ी तादाद में सुरक्षा बल तैनात करने की क्या ज़रूरत थी? हम निहत्थे हैं और शांतिपूर्वक पैदल जा रहे थे।’ राउत ने यह भी दावा किया कि मौके पर बीएसएफ और सीआईएसएफ के जवानों को तैनात किया गया था और केंद्रीय मंत्रियों के आवासों की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई थी।

क्या है विवाद की वजह?

विपक्ष का यह भारी विरोध प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद सामने आया है, जो सोमवार को मतदाता नामांकन से जुड़े ‘फॉर्म 6’ (Form 6) को लेकर की गई थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि उसने फॉर्म 6 के किसी भी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है और वह चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच करेगी कि क्या नियमों में बदलाव किए गए थे और इसकी अनुमति किसने दी थी।

इसी मुद्दे पर चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक बयान जारी कर कहा था कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान फॉर्म 6 के साथ जोड़े गए घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर देश को गुमराह किया है।

एक राज्य के मुख्यमंत्री ने अचानक दे दिया इस्तीफा? नाम ऐसा कि जानकर चौंक जाएंगे आप… जानिए वायरल लेटर की पूरी सच्चाई!

Satirical Resignation Letter MP CM: ‘मैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं…’ सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस एक लाइन के लेटर ने हर किसी को हैरान कर दिया। लेकिन जब लोगों ने इस इस्तीफे के पीछे का नाम और असली कहानी जानी, तो पूरा मामला समझ आया।

दरअसल, यह कोई असली मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं, बल्कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके का मध्य प्रदेश सरकार पर कसा गया एक तीखा प्रहार है।

अभिजीत दिपके ने मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत और वहां के बदहाल स्वास्थ्य ढांचे के विरोध में एक ‘इस्तीफा पत्र’ लिखकर राज्य सरकार की लाचारी पर सवाल उठाए हैं।

तंज भरे इस्तीफे में क्या लिखा दीपके ने?

मध्य प्रदेश के राज्यपाल को संबोधित इस व्यंग्यात्मक पत्र में दिपके ने खुद को ‘मुख्यमंत्री’ बताते हुए लिखा, ‘मुख्यमंत्री के रूप में, मैं इन बच्चों को समय पर उचित चिकित्सा देखभाल और सहायता प्रदान करने में विफल रहने की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं।’

इसके साथ ही उन्होंने सरकार द्वारा घोषित मुआवजे और ‘हर घर नल से जल’ के दावों पर कड़ा तंज कसते हुए कहा कि आज भी बालाघाट के कई आदिवासी परिवार पीने के पानी के लिए नदियों और नालों पर निर्भर हैं।

बालाघाट में क्यों मचा है कोहराम?

यह पूरा विवाद बालाघाट जिले के बैगा और गोंड आदिवासी समुदायों के 30 से अधिक बच्चों की संदिग्ध मौत (खसरा और मलेरिया के प्रकोप) के बाद खड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और बालाघाट कलेक्टर से जवाब तलब किया है।

कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) के मुताबिक, 50 बेड की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 मासूम बच्चों का इलाज चल रहा है, जिससे साफ होता है कि वहां स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी बदहाल हैं।

ग्राउंड पर पहुंचे दिपके का हुआ भारी विरोध

अभिजीत दिपके खुद पीड़ित परिवारों से मिलने बालाघाट के गांवों में पहुंचे थे। 13 सितंबर को जब वे क्षेत्र का दौरा कर रहे थे, तभी वहां कुछ तथाकथित ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स’ की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उन पर ‘मौतों पर राजनीति करने’ का आरोप लगाकर हंगामा शुरू कर दिया।

विवाद इतना बढ़ गया कि माहौल खराब होता देख CJP कार्यकर्ताओं को दिपके को सुरक्षित वहां से बाहर निकालना पड़ा। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

नौकरी जॉइन करने के 6 घंटे बाद ही दिया इस्तीफा, वजह जानकर मैनेजर भी रह गया हैरान

दिल्ली स्थित कंपनी Hiring Insider के संस्थापक और पूर्व टैलेंट एक्विजिशन लीडर हर्षित श्रीवास्तव की एक LinkedIn पोस्ट ने सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी है। उन्होंने एक नए कर्मचारी से जुड़ा ऐसा किस्सा साझा किया, जिसने भर्ती प्रक्रिया और नौकरी की वास्तविकता के बीच के अंतर पर सवाल खड़े कर दिए। खास बात यह रही कि कर्मचारी ने कंपनी जॉइन करने के महज छह घंटे बाद ही इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवारों को नौकरी की पूरी और सच्ची तस्वीर दिखाई जाती है?

अक्सर कंपनियां किसी पद को आकर्षक तरीके से पेश करती हैं, लेकिन असली जिम्मेदारियां, काम का दबाव और टीम का माहौल जॉइन करने के बाद सामने आता है। हर्षित की पोस्ट ने इसी अंतर को बेहद दिलचस्प तरीके से उजागर किया, जिसके बाद LinkedIn पर लोगों के बीच पारदर्शिता और ईमानदार hiring को लेकर सवाल उठा दिए हैं।

पुराने कर्मचारी ने ही नए कर्मचारी को ट्रेनिंग दी

कहानी के मुताबिक, एक कर्मचारी पहले ही इस्तीफा दे चुका था। मैनेजर ने उससे कहा कि जाने से पहले वो अपनी जगह किसी नए व्यक्ति को हायर करे और उसे काम समझाकर जाए। उस कर्मचारी ने उम्मीदवार का इंटरव्यू लिया, उसे चुना और जॉइनिंग के पहले दिन उसे काम की पूरी जानकारी दी।

इंटरव्यू से अलग थी असलियत

नए कर्मचारी को सिर्फ सामान्य काम नहीं बताया गया। उसे कंपनी की पॉलिसी, टीम स्ट्रक्चर, स्टेकहोल्डर्स, काम का दबाव, डेडलाइन और एस्केलेशन कल्चर तक सब कुछ साफ-साफ समझाया गया। सबसे खास बात यह थी कि पुराने कर्मचारी ने कुछ छिपाया नहीं और न ही बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया।  नतीजा? दिन खत्म होते-होते नए कर्मचारी ने नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया।

मैनेजर ने पूछा “तुमने उसे क्या बताया?”

नए कर्मचारी के इस्तीफे से मैनेजर हैरान और नाराज था। उसने पुराने कर्मचारी से पूछा कि आखिर उसने नए व्यक्ति को ऐसा क्या बता दिया कि उसने कुछ ही घंटों में नौकरी छोड़ दी। जवाब मिला “वही सब, जो आपने मुझे उसे सिखाने के लिए कहा था।” यानी नए कर्मचारी को पहली बार नौकरी की असली तस्वीर दिखाई गई थी। कंपनी ने नौकरी बेची, कर्मचारी ने काम की सच्चाई दिखाई

श्रीवास्तव ने इस घटना को एक दिलचस्प लाइन में समझाया कंपनी ने उसे नौकरी का सपना दिखाया था, जबकि पुराने कर्मचारी ने उसे उस नौकरी की हकीकत दिखा दी। उनका कहना था कि कई बार नौकरी के विज्ञापन और इंटरव्यू में भूमिका जितनी आकर्षक दिखाई जाती है, असल में काम उससे काफी अलग होता है।

ईमानदारी से हो सकती है बेहतर भर्ती

इस कहानी के बाद LinkedIn पर लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई कि भर्ती के दौरान सैलरी और पद के साथ-साथ काम की असली चुनौतियां भी बतानी चाहिए। अगर कंपनी शुरुआत में ही काम का दबाव, जिम्मेदारियां, टीम कल्चर और वास्तविक उम्मीदें साफ कर दे, तो बाद में कर्मचारी के निराश होकर छोड़ने की संभावना कम हो सकती है।

अच्छी hiring सिर्फ कंपनी को पसंद आने वाला उम्मीदवार ढूंढना नहीं है। यह भी देखना है कि उम्मीदवार को कंपनी और नौकरी की सच्ची तस्वीर पहले से पता हो और फिर भी वह वहां काम करना चाहे।

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