‘वोट चोरी’ आंदोलन में कितनी जान?

आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोधों का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं।

भारत में चुनावों को नियंत्रित करने के आरोप के कई पहलू हैं, मगर उनके लिए आम बोलचाल में ‘वोट चोरी’ शब्द प्रचलित हो गया है। आज जब वोट चोरी कहा जाता है, तो निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को अपने माफिक बदलने के नरेंद्र मोदी सरकार के कदम, भारतीय जनता पार्टी की सुविधा के मुताबिक चुनाव कार्यक्रम तय होने की बनी धारणा, आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू करने में भेदभाव, मतदान के दिन प्रशासन के एकतरफा रुख, मतदाताओं की संख्या से अधिक मतदान होने की बढ़ती गई शिकायतें, वोटर लिस्ट से इरादतन नाम काटने या जोड़ने के इल्जाम, और अब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर संगीन हुए संदेह- सभी शामिल होते हैं।

वैसे अविश्वास इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर भी रहा है। यह खासकर इसलिए गंभीर हुआ, क्योंकि वीवीपैट पर्चियों की गणना करने और ईवीएम के सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग को विपक्ष के साथ साझा करने के मामलों में निर्वाचन आयोग ने जिद्दी रुख अपनाए रखा है। विपक्षी दलों से संवाद करने और उनके शक को दूर करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर आयोग ने जनमत के एक बड़े दायरे में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया को संदिग्ध बना रखा है। आज जब ‘वोट चोरी’ कहा जाता है, तो उससे गुजरे वर्षों में इन सबको लेकर गहराती गई धारणा की अभिव्यक्ति होती है।

सितंबर में जब इंडियन एक्सप्रेस ने एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग के अंदर आपत्तियों और मतभेद की खबर छापी, तब से ‘वोट चोरी’ एक बड़ा सियासी मुद्दा बनी हुई है। अक्टूबर के पहले दो हफ्तों में यह एक बड़ी राजनीतिक गोलबंदी को प्रेरित करती नजर आई। कॉकरोच जनता पार्टी और उसके साथ जुड़े, खासकर वामपंथी छात्र/युवा संगठनों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर जोर डालने के लिए आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया। कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के घटक विपक्षी दल भी कभी अलग से, और कभी युवा आंदोलन के सहायक के रूप में सक्रिय नजर आए। यह सक्रियता अभी जारी है। इसके बावजूद अब राय बनने लगी है कि ‘वोट चोरी’ आंदोलन उस तरह राजनीतिक संगठनों से बाहर के नौजवानों, और आम जन को उद्वेलित नहीं कर पाया, जैसा जून-जुलाई में नीट पेपर लीक के बाद शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के दौरान हुआ था।

यानी ‘वोट चोरी’ आंदोलन असल में राजनीतिकृत (politicalised/ politicised) युवाओं, संगठनों और दलों का आंदोलन भर बन कर रह गया है। यहां राजनीतिकृत से मतलब उन नौजवानों से है, जो किसी ना किसी राजनीतिक दल से संबंधित छात्र या युवा संगठनों का हिस्सा हैं या फिर उन लोगों से जो राजनीतिक दलों से सीधे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा इस आंदोलन को उन लोगों का समर्थन मिला है, जो राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और ‘वोट चोरी’ के परिणाम को समझते हैं। कुल मिलाकर आंदोलन में भागीदारी उन व्यक्तियों और समूहों तक सीमित रही है, जो देश में पहले से मौजूद राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच “मोदी विरोधी धुरी” पर मौजूद रहे हैं। जबकि इस आंदोलन की सफलता इस धुरी पर नए लोगों को लाने और नए जन समूहों तक इसके विस्तार से अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।

अगर यह आकलन सही है, तो फिर सवाल उठेगा कि स्वतंत्र’ छात्र-युवा क्यों ‘नीट पेपर लीक आंदोलन की ओर आकर्षित हुए, जिससे उनके परिजनों का समर्थन भी उसे मिलने लगा; और क्यों ‘वोट चोरी’ विरोधी आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हुआ?

दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार के रुख को देखें, तो उससे भी ऐसे आकलन को बल मिलता है। नीट पेपर लीक आंदोलन धीरे-धीरे मोदी सरकार की बड़ी चिंता बनता जा रहा था। 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ के दौरान आंदोलनकारियों के हुए दमन पर देश के विभिन्न इलाकों में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली और जिस तरह स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए- जो कई जगहों पर उग्र होते भी नजर आए- उनसे मोदी सरकार की नींद उड़ी। इसीलिए उसने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर बढ़ते संकट को निष्प्रभावी करने में अपनी भलाई देखी। अब ज्ञानेश कुमार के मामले उसे ऐसा करने की जरूरत महसूस नहीं हुई है, तो संभवतः इसीलिए कि इस आंदोलन में उस तरह की “स्वतःस्फूर्तता” (spontaneities’) नज़र नहीं आई है।

क्यों? यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। क्या ‘वोट चोरी’ का सवाल उस तरह आम जन को नहीं छूता, जैसे पेपर लीक के मुद्दे ने छात्रों को स्पर्श किया था? हाल में एक पॉडकास्ट में राजनीति-शास्त्री अजय गुडावर्ती ने कहा कि एसआईआर में 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम काट दिए गए, लेकिन 13 करोड़ लोग कहां हैं? क्या वे सिर्फ संख्या हैं या वास्तविक नागरिक हैं, जिन्हें विपक्ष ने अपने साथ जोड़ने की कोई कोशिश नहीं की है? विपक्षी दल अगर उन 13 करोड़ लोगों में से आठ-दस फीसदी को भी गोलबंद कर पाते और उनको लेकर देश में किसी स्थल पर ‘जंतर-मंतर’ बना देते, तो क्या सरकार के लिए इस आंदोलन को नजरअंदाज कर पाना संभव होता?

गुडावर्ती का यह सवाल आंदोलन के चरित्र को समझने के लिहाज से अहम है। इसका संदेश यह है कि पेपर लीक से प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित छात्रों और उनके परिजनों की भागीदारी ने कॉकरोच आंदोलन को जानदार बनाया था, जबकि वोट चोरी आंदोलन में ऐसे प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित पक्षों की लगभग कोई भागीदारी नहीं रही है। यह कमोबेश अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से आए, राजनीतिक रूप से जागरूक, और मोदी विरोधी राजनीतिक समूहों से जुड़े लोगों का आंदोलन बना रहा, जिस कारण फिलहाल सरकार ने उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं समझी है।

चूंकि मौजूदा सत्ताधारी सबको साथ लेकर चलने में यकीन नहीं करते, इसलिए उनकी दृष्टि अपने निकट राजनीतिक एवं अन्य स्वार्थों से आगे नहीं जाती है। देश के दीर्घकालिक भविष्य के प्रति लापरवाह हैं, नतीजतन ‘वोट चोरी’ के कथानक से जनमत के एक बड़े हिस्से की निगाह में भारतीय राजसत्ता की वैधता संदिग्ध होने और देश की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर गहराते सवाल उन्हें अहम नहीं लगते। उनकी निगाह में तब तक ये मुद्दे गौर करने लायक नहीं बनेंगे, जब तक कि उनकी वजह से उनकी सत्ता के लिए फौरी खतरा पैदा ना हो! यह साफ है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन से अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

इसलिए इस बात की वास्तविक आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोध का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं। मोदी सरकार ऐसे मामलों में खुद एक पक्ष बन कर आंदोलनों को देश विरोधी किसी साजिश का हिस्सा बताने की रणनीति अपना लेती है, जिससे अक्सर वह अपने समर्थक तबकों को अपने पक्ष में अधिक गोलबंद करने में सफल रहती आई है। लेकिन उससे पैदा होने वाला गतिरोध संबंधित असंतुष्ट जन समूहों में टूटन और व्यवस्था से अलगाव का बोध पैदा करता है। देश और समाज के लिए इसके दूरगामी परिणाम बेहद हानिकारक हो सकते हैं। लेकिन तथ्य यही है कि वर्तमान सत्ताधारी उसकी चिंता नहीं करते।

इसलिए ये संभावना फिलहाल कम दिखती है कि चुनाव प्रणाली और निर्वाचन आयोग की घटती साख से उत्पन्न समस्या का कोई समाधान निकलेगा। अधिक संभावना यह है कि वोट चोरी के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बढ़ता जाएगा। इससे जनमत के एक बड़े दायरे में भारतीय चुनावों की विश्वसनीयता घटेगी और उसकी निगाह में राजसत्ता की लोक-वैधता संदिग्ध होगी। विपक्ष हर चुनावी हार के बाद ‘वोट चोरी’ के इल्जाम लगाएगा, जबकि सत्ता पक्ष इसे पराजित पक्ष की हताशा की मिसाल के रूप में पेश करेगा। जैसे यह स्थिति एक बड़े जनमत की निगाह में चुनाव परिणामों को संदिग्ध बनाए रखेगी, वैसे ही जनमत के दूसरे हिस्सों की निगाह में इससे विपक्षी कथानक की साख पर सवाल उठेंगे। कहा जाएगा कि जब विपक्ष जब जीत जाता है, तो उसे चुनाव स्वच्छ मालूम पड़ते हैं, जबकि हार की स्थिति में ‘वोट चोरी’ की बात कर वह ‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’ की कहावत को चरितार्थ करता है! इस तरह यह मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तीक्ष्ण बनाएगा।

जब तक विपक्ष इसे आर-पार की लड़ाई का मुद्दा बनाने को तैयार नहीं होता, इस गतिरोध के इसी रूप में आगे बढ़ते रहने की संभावना है। आर-पार की लड़ाई का एक रूप यही हो सकता है कि विपक्ष अपनी शर्तें तय करे और उनके पूरा होने तक चुनाव बहिष्कार का एलान करे। मसलन, यह कि एसआईआर रद्द कर जब तक उसके पहले की मतदाता सूची बहाल नहीं होती, निर्वाचन कार्यक्रम तय करने में उसकी सलाह को अहमियत नहीं दी जाती, अथवा ईवीएम संबंधित उसकी शिकायतों को दूर नहीं किया जाता, विपक्ष (यानी इंडिया गठबंधन) किसी चुनाव में भाग नहीं लेगा। कहा जा सकता है कि सिर्फ ऐसा होने पर ही वोट चोरी के कथानक को विपक्षी दायरे से बाहर विश्वसनीयता हासिल हो सकती है। संभवतः तभी ऐसी सूरत बन सकेगी, जब विपक्षी राजनीतिक दलों के दायरे से बाहर के लोग ‘वोट चोरी’ को लेकर उद्वेलित हों।

वरना, फिलहाल यह आंदोलन ‘संविधान बचाओ मुहिम’ के हश्र की तरफ जाता दिख रहा है। इस स्थिति का संदर्भ कहीं व्यापक है। गौरतलब है कि मोदी राज के 12 साल में विपक्षी दलों की पूरी सियासत नकारात्मक गोलबंदी की कोशिश पर टिकी रही है। या इसे इस तरह कहा जा सकता है कि ये दल ‘एंटी-इन्कम्बैंसी’ के भरोसे बैठे रहे हैं, जिसे पैदा करने या फैलाने के लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की रोजमर्रा के स्तर पर आलोचना पेश की है। लेकिन उन्होंने अपना कोई सकारात्मक एजेंडा आम जन के सामने नहीं रखा है। ना ही उन्होंने अपने पूर्व शासनकाल की गलतियों एवं नाकामियों की समीक्षा करने की जरूरत महसूस की है।  इस कारण अक्सर उनकी आलोचनाएं अवसरवाद से ग्रस्त नज़र

आई हैं।

जमीनी स्तर तक संगठन के मामले में अपनी कमजोरी के कारण ये दल अपना संदेश (जो भी संदेश उनके पास हो) आम जन तक ले जाने में सक्षम साबित नहीं हुए हैं। प्रतिबद्ध एवं विचार-सक्षम कार्यकर्ताओं का अभाव इन दलों की समस्या बना हुआ है। भाजपा/आरएसएस की विशाल चुनावी मशीनरी की तुलना में देखें, तो यह समस्या और भी अधिक गंभीर नजर आती है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर और अति-महत्त्वपूर्ण मसले को भी ये दल जन मुद्दा नहीं बना पाए हैं। अधिक से अधिक वे इसे राजनीतिक दलों के बीच का मुद्दा बनाने में सफल हुए हैँ। नतीजा, वह गतिरोध है, जिसकी चर्चा इस लेख में ऊपर हुई है।

दोहराव का जोखिम उठाते हुए भी यह कहना अनिवार्य है कि यह गतिरोध सिर्फ किसी नाटकीय या परिदृश्य में आमूल-चूल बदलाव लाने वाले कदम से ही टूट सकता है। बेशक चुनाव बहिष्कार का निर्णय ऐसा एक कदम होगा। लेकिन उससे ऐसा फैसला करने वाले दलों के लिए दूसरे किस्म की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। भारतीय राजनीति का आज जो चरित्र है, उसमें ज्यादातर राजनीतिक दल किसी विचार या उद्देश्य के इर्द-गिर्द संगठित नहीं हैं।

ये असल में महत्त्वाकांक्षी, निहित-स्वार्थी और सत्ता की लालसा रखने वाले तत्वों की जमात भर रह गए हैं। इसलिए चुनाव ना लड़ने का एलान करने का एक मतलब यह संदेश देना होगा कि अभी लंबे समय तक सत्ता या उससे संबंधित लाभ मिलने की संभावना नहीं है। उस हाल में पार्टी के साथ कितने नेता और कथित कार्यकर्ता जुड़े रह जाएंगे, यह बड़ा सवाल है। यह संभव है कि उस स्थिति में बहुत से नेता/कथित कार्यकर्ता उस दल में चले जाएं, जिसके चुनाव में शामिल होने की संभावना होगी या फिर यह भी संभव है कि उनका एक हिस्सा चुनाव लड़ने के लिए खुद अपनी पार्टी बना ले।

पार्टियों का ढांचा ऐसा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग उनसे सिर्फ इस उम्मीद में जुड़े रहते हैं कि उन्हें कभी, किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। ऐसा ना भी हो, तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए कई तरह के फायदों की आस रहती है। चुनाव के समय पार्टियां चंदा और संसाधन इकट्ठा करती हैं, जिससे वे कथित कार्यकर्ता भी लाभान्वित होते हैं, जिन्हें खुद चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलता। यानी चुनाव ना सिर्फ एक राजनीतिक गतिविधि है, बल्कि इसकी अपनी एक खास अर्थव्यवस्था है, जिसके लाभ इस प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति उठाते हैं।

इसीलिए पार्टियों के लिए चुनाव बहिष्कार का फैसला करना बेहद कठिन है। चूंकि ऐसा होने की फिलहाल गुंजाइश नहीं है, इसलिए ‘वोट चोरी’ आंदोलन के आगे बढ़ने की संभावना भी सीमित है। ऐसे में छिटपुट गतिविधियों के जरिए इस आंदोलन को जारी रखने की धारणा बनाने की कोशिशें होती रहेंगी। एक नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की प्रस्तावित रैली वैसा ही एक प्रयास है। लेकिन दूरगामी प्रभाव छोड़ने के लिहाज ये गतिविधियां अप्रभावी साबित होती रहेंगी।

LIVE : INDIA गठबंधन का आज ‘दिल्ली चलो मार्च’, रामलीला मैदान में महारैली, CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

LIVE : INDIA गठबंधन का आज 'दिल्ली चलो मार्च', रामलीला मैदान में महारैली, CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

rahul gandhi

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन INDIA ने अपना विरोध तेज कर दिया है। शनिवार को प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ का प्रस्ताव पारित करने के बाद आज रविवार को विपक्षी दल दिल्ली में ‘दिल्ली चलो’ मार्च निकालेंगे और रामलीला मैदान में महारैली करेंगे। इस प्रदर्शन में कांग्रेस समेत गठबंधन के कई दलों के नेता और कार्यकर्ता शामिल होंगे। विपक्ष चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाएगा। साथ ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की जाएगी। 

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आज कब और कहां से निकलेगा ‘दिल्ली चलो’ मार्च?

INDIA गठबंधन का प्रस्तावित मार्च दोपहर 12 बजे मिंटो रोड-कनॉट प्लेस जंक्शन से शुरू होकर रामलीला मैदान पहुंचेगा। इसके बाद मैदान में विपक्षी नेता जनसभा को संबोधित करेंगे। रामलीला मैदान में रैली के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास से विपक्षी नेता खुली बसों में मार्च के शुरुआती स्थान तक पहुंचने वाले हैं। राहुल गांधी सहित कई बड़े नेताओं के इसमें शामिल होने की संभावना है।

 क्या है ‘जन महाभियोग’, शनिवार को क्या हुआ था?

INDIA गठबंधन के नेताओं ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ की कार्यवाही की थी। इसकी अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की थी।

इस दौरान विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर आरोप लगाए। खरगे ने प्रस्ताव पेश किया, जबकि राहुल गांधी ने समापन भाषण दिया। विपक्ष ने प्रस्ताव पारित कर ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग उठाई। हालांकि, यह विपक्ष की ओर से आयोजित प्रतीकात्मक राजनीतिक कार्यवाही थी, संवैधानिक प्रक्रिया के तहत औपचारिक महाभियोग नहीं।

INDIA bloc Ramlila Maidan Rally: दिल्ली में आज INDIA गठबंधन का हल्लाबोल: रामलीला मैदान किले में तब्दील! 4,000 पुलिसकर्मी और CAPF जवान तैनात

INDIA Bloc Rally Today Delhi: राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को होने वाले ‘इंडिया’ गठबंधन की प्रस्तावित महारैली के मद्देनजर 4,000 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ-साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (RCRPF) की कंपनियों को तैनात किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत पूरे स्थल को 14 जोन में बांटकर निगरानी के लिए 200 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि पुलिस ने इस रैली के मद्देनजर सुरक्षा और ट्रैफिक को लेकर व्यापक इंतजाम किए हैं। इस रैली में करीब 50,000 लोगों के शामिल होने का अनुमान है। मिंटो ब्रिज से लेकर कार्यक्रम स्थल तक के रैली मार्ग और रामलीला मैदान दोनों जगह बल तैनात करने की योजना बनाई गई है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘इंडिया’ के प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ का प्रस्ताव पारित होने के अगले दिन रामलीला मैदान में गठबंधन की रैली होने जा रही है। पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने विशेष आयुक्त, संयुक्त आयुक्त और मध्य एवं नई दिल्ली जिलों के पुलिस उपायुक्तों सहित वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शनिवार को मिंटो रोड और रामलीला मैदान में सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया।

दिल्ली में पिछले दिनों विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर बुलाईं गईं सीएपीएफ की 270 कंपनियों की तैनाती की अवधि को तीसरी बार बढ़ाकर 16 नवंबर तक कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस को पूरे शहर में इनकी तैनाती के समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

200 से अधिक कैमरे लगाए गए

रैली के संबंध में एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया, “निगरानी के लिए 200 से अधिक कैमरे लगाए गए हैं। हम भीड़ के इकट्ठा होने, एंट्री-एग्जिट पॉइंट की निगरानी करेंगे और कार्यक्रम स्थल पर एंट्री करने वाले किसी भी आपराधिक तत्व की जांच करेंगे।” इन व्यवस्थाओं में ड्रोन से निगरानी और बॉडी-वॉर्न (शरीर पर लगे) कैमरे भी शामिल हैं। स्थिति पर नजर रखने के लिए मैदान के भीतर एक कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। जबकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दंगा-रोधी वाहन और अन्य निगरानी उपकरण तैनात रहेंगे।

50,000 लोग आ सकते हैं रामलीला मैदान

कार्यक्रम स्थल के 14 जोन में से प्रत्येक की देखरेख सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) स्तर के अधिकारी करेंगे। जबकि दो जोन की निगरानी अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी। वरिष्ठ अधिकारी व्यवस्था पर कड़ी नजर रखेंगे। अधिकारियों के मुताबिक, रामलीला मैदान के खाली रहने पर उसमें करीब 45,000 से 50,000 लोग आ सकते हैं। हालांकि, कुर्सियां, घेराबंदी और निर्धारित रास्ते बनाए जाने के कारण पुलिस का अनुमान है कि 30,000 से 40,000 लोगों का जमावड़ा हो सकता है।

वहीं, ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं ने रैली में 10 लाख तक लोगों के पहुंचने की उम्मीद जताई है। रैली को सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक आयोजित करने की अनुमति दी गई है। पुलिस ने आयोजकों से कहा है कि वे भीड़ को नियंत्रित करने, लोगों की आवाजाही को सुगम बनाने और पेयजल व्यवस्था के लिए वालंटियर्स को तैनात करें। भीड़ अधिक होने की स्थिति से निपटने के लिए मैदान के बाहर भी जगह रखी जाएगी।

कांग्रेस ने की बड़ी तैयारी

चुनावी सिस्टम में कथित अनियमितताओं के विरोध और सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित ‘दिल्ली चलो’ मार्च तथा रैली में शामिल होने के लिए विभिन्न राज्यों से विपक्षी दलों के नेता और समर्थक शनिवार को ही राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने लगे। रामलीला मैदान में मुख्य मंच के ऊपर विशाल तिरंगा शामियाना लगाया गया है। ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के प्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम के बीच विपक्ष मिंटो रोड से रामलीला मैदान तक मार्च निकालने की तैयारी में है, जिसके बाद रैली होगी।

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रैली में विपक्षी दलों के अलावा छात्र संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के भी बड़ी संख्या में शामिल होने की संभावना है। ‘इंडिया’ गठबंधन ने छात्रों, युवाओं, महिलाओं, श्रमिकों और नागरिक समाज के सदस्यों से प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और कुछ छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। विपक्षी गठबंधन का मार्च दोपहर 12 बजे मिंटो रोड-कनॉट प्लेस चौराहे से शुरू होगा और रामलीला मैदान पहुंचेगा। इसके बाद रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन के नेता रैली को संबोधित करेंगे। विपक्षी नेताओं के कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से बसों में सवार होकर मार्च के शुरुआती स्थल तक पहुंचने की संभावना है।

मोदी, शाह के इशारे पर चल रहा चुनाव आयोग, जन महाभियोग कार्यक्रम में खरगे का CEC ज्ञानेश पर बड़ा हमला

मोदी, शाह के इशारे पर चल रहा चुनाव आयोग, जन महाभियोग कार्यक्रम में खरगे का CEC ज्ञानेश पर बड़ा हमला

Mallikarjun Kharge

Mallikarjun Kharge Jan Mahabhiyog: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। शनिवार को आयोजित ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम के दौरान खरगे ने आरोप लगाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के निर्देशों पर निर्वाचन आयोग चला रहे हैं। विपक्ष ने कहा कि वह देश के नागरिकों के मताधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत से लड़ाई लड़ रहा है। दूसरी ओर, भाजपा ने आरोप लगाया कि पंडित नेहरू वोट चोरी करके देश के प्रधानमंत्री बने थे। 

‘जन महाभियोग’ में सीईसी के खिलाफ प्रस्ताव

विपक्ष द्वारा आयोजित ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ एक ‘प्रस्ताव’ प्रस्तुत किया। हालांकि अपने संबोधन के दौरान खरगे ने स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से विपक्ष का कोई व्यक्तिगत बैर या दुश्मनी नहीं है। हमारी केवल इतनी मांग है कि भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी संस्था के रूप में काम करे ताकि देश के प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की साजिश का आरोप

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर सत्ता में बने रहने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से समझौता करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार सत्ता बरकरार रखने के लिए तरह-तरह की साजिशें रच रही है और निर्वाचन प्रक्रिया को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। खरगे के मुताबिक, निष्पक्ष चुनाव कराना किसी भी लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन वर्तमान में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर दबाव बनाया जा रहा है।

संसद में दिया गया नोटिस

खरगे ने याद दिलाया कि विपक्ष की ओर से संसद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ पहले ही औपचारिक नोटिस दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि यह कदम किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं और मताधिकार के संरक्षण के लिए उठाया गया एक संस्थागत कदम है। उन्होंने दोहराया कि विपक्षी दल एकजुट होकर सड़क से लेकर संसद तक देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने और चुनावी निष्पक्षता बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

 

मल्लिकार्जुन खरगे के 10 राजाजी मार्ग स्थित आवास पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ शुरू हुआ। कांग्रेस नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कहा कि मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे भी अपनी बात रखेंगे। 

भाजपा का कांग्रेस पर पलटवार

दूसरी ओर, भाजपा नेता संबित पात्रा ने  कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि असली संसद में विपक्ष हंगामा करता है और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी गायब रहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि मतदाता सूची से 13 करोड़ लोगों के वोट कट जाएंगे तो लोग सड़कों पर आ जाएंगे। जिनके दो-दो जगह नाम थे, उनके नाम काटे गए। एसआईआर में मृतकों के नाम सूची से हटाए गए। खरगे ने फॉर्म 6 को लेकर खरगे पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। भाजपा नेता ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पर भी आरोप लगाया कि वे वोट चोरी कर प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने सरदार पटेल का अपमान किया था।

Jagan Mohan Reddy : BJP से मोहभंग या INDIA गठबंधन की ओर कदम? क्या 2029 से पहले बदल सकती है YSRCP की रणनीति

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jaganmohan reddy

आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के प्रमुख वाईएस जगनमोहन रेड्डी के हालिया बयान ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की अटकलों को हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जगनमोहन रेड्डी कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन की ओर रुख करने का संकेत दे रहे हैं या फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रति नरम रुख रखने वाली अपनी छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

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जगनमोहन रेड्डी सत्ता में रहते हुए संसद में कई अहम विधेयकों पर केंद्र की BJP-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन देते रहे। हालांकि उनकी पार्टी अब तक किसी भी गठबंधन में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुई है। ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून का समर्थन करने को अपनी ‘गलती’ बताने वाले उनके बयान को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल

YSRCP प्रमुख ने हाल ही में कहा कि उनकी पार्टी को उस प्रक्रिया का समर्थन करने पर अफसोस है। इसके तहत केंद्र में सत्तारूढ़ दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के चयन में प्रभावी भूमिका निभाता है। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति सत्तारूढ़ दल द्वारा नहीं की जानी चाहिए। जगन मोहन रेड्डी के मुताबिक, चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होने चाहिए तथा तीनों को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।

 

उनके इस बयान के समय और राजनीतिक संदर्भ को लेकर चर्चा तेज है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि YSRCP ने कांग्रेस या INDIA गठबंधन के साथ जाने का फैसला कर लिया है। फिलहाल यह राजनीतिक संभावनाओं और अटकलों का विषय है।

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2019 से 2024 तक NDA सरकार के कई विधेयकों का किया समर्थन

जगन मोहन रेड्डी की पार्टी के सांसदों ने 2019 से 2024 के बीच लोकसभा और राज्यसभा में कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर केंद्र की मोदी सरकार का समर्थन किया था। यह समर्थन मुद्दों के आधार पर दिया गया था, न कि किसी औपचारिक गठबंधन के तहत, लेकिन 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले BJP ने YSRCP के बजाय जगन के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के साथ गठबंधन किया। BJP और TDP ने आंध्र प्रदेश में जनसेना पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और शानदार प्रदर्शन किया।

2024 के चुनाव में YSRCP को बड़ा झटका

आंध्र प्रदेश विधानसभा की 175 सीटों में से TDP, BJP और जनसेना गठबंधन ने कुल 164 सीटें जीतीं। वहीं, लोकसभा की 25 सीटों में से इस गठबंधन को 21 सीटों पर जीत मिली। इसके उलट, जगन मोहन रेड्डी की YSRCP विधानसभा में सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव में पार्टी को चार सीटें मिलीं। इस नतीजे ने राज्य की राजनीति में YSRCP की स्थिति को बड़ा झटका दिया।
 

BJP से दूरी के बाद भी जगन को थी समर्थन की उम्मीद

चुनावी हार और BJP के TDP के साथ जाने के बावजूद जगन मोहन रेड्डी ने केंद्र की NDA सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन देने की बात कही थी। उस समय YSRCP के पास कुल 15 सांसद थे—लोकसभा में चार और राज्यसभा में 11। केंद्र में बहुमत के लिए सहयोगियों पर निर्भर NDA सरकार के लिए ऐसे सांसदों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता था।

 

जगन ने राष्ट्रीय और राज्य के हित से जुड़े मुद्दों पर अपनी पार्टी के सांसदों की ओर से समर्थन देने की बात कही थी। हालांकि, केंद्र में BJP की राजनीतिक रणनीति में चंद्रबाबू नायडू की TDP की अहम भूमिका रही। ऐसे में YSRCP के लिए BJP के साथ राजनीतिक तालमेल बढ़ाने की गुंजाइश सीमित दिखाई दी।

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क्या 2029 के चुनाव से पहले बदलेगी जगन की रणनीति?

करीब ढाई साल बाद जगन मोहन रेड्डी के हालिया बयान को उनकी भविष्य की राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वह अपनी अब तक की स्वतंत्र राजनीति की रणनीति पर दोबारा विचार कर रहे हैं और 2029 के चुनाव से पहले नए राजनीतिक विकल्प तलाश सकते हैं।  अभी तक कांग्रेस या YSRCP की ओर से किसी संभावित गठबंधन को लेकर स्पष्ट घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि जगन मोहन रेड्डी INDIA गठबंधन में शामिल होने जा रहे हैं। आने वाले समय में उनके बयानों, संसदीय रुख और कांग्रेस के साथ संभावित संवाद पर राजनीतिक नजरें रहेंगी।

ECI Row: चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की शिकायतों पर क्यों नहीं हुई कार्रवाई? RTI के जवाब में हुआ बड़ा खुलासा

ECI Row: कैबिनेट सचिवालय ने चुनाव आयोग (ECI) के एक अधिकारी के आचरण के खिलाफ दो निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से भेजी गई शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की। सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट के तहत दायर अर्जी पर मिले जवाब को सार्वजनिक किए जाने से यह जानकारी सामने आई है। जवाब के मुताबिक, सचिवालय ने कहा था कि ये शिकायतें उन्होंने (निर्वाचन आयुक्तों) ‘व्यक्तिगत हैसियत’ से की थीं। चूंकि पूर्ण आयोग की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली थी, इसलिए “इस समय कोई भी कार्रवाई करना अनुपयुक्त हो सकता है।”

क्या है पूरा मामला?

आरटीआई कार्यकर्ता कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत दायर अर्जी के जवाब में मिले पत्रों से पता चलता है कि निर्वाचन आयुक्त संधू और जोशी ने 29 जुलाई को देश के शीर्ष नौकरशाह टीवी सोमनाथन को दो अलग-अलग पत्र भेजे थे। ये पत्र वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग (IAS) के कामकाज के बारे में थे, जिन्हें मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने दो सितंबर 2024 से निर्वाचन आयोग में नियुक्त किया था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने सितंबर में प्रकाशित खबर में दावा किया था कि निर्वाचन आयोग के भीतर काम के बंटवारे का आदेश जारी होने के बाद संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखा था। खबर में कहा गया था कि इस आदेश से वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने और रिकॉर्ड अपडेट करने की शक्तियां राज्य स्तर के अधिकारियों के बजाय निर्वाचन आयोग के पास केंद्रित होने का खतरा पैदा हो गया था।

चुनाव आयोग का बयान

निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी एक बयान में कहा था कि संबंधित अधिकारी की ओर से जारी किए गए काम के पुनर्वितरण (reallocation) संबंधी आदेशों को दोनों आयुक्तों के निर्देशों के बाद कभी लागू नहीं किया गया। निर्वाचन आयोग ने कहा था कि संधू और जोशी की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी से संबंधित थे, न कि नीति या आईटी विभाग के मामलों से…।

RTI जवाब में कैबिनेट ने क्या कहा?

आरटीआई आवेदन के जवाब में दिए गए एक कैबिनेट ‘नोट’ में कहा गया है, “दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने बताया कि गर्ग ने उप निर्वाचन आयुक्त (प्रशासन) के लिंक अधिकारी का कार्यभार संभालने के बाद आयोग या संबंधित अधिकारियों से चर्चा किए बिना, अपने समकक्ष और वरिष्ठ अधिकारियों के कार्य आवंटन के संबंध में एक आदेश जारी कर दिया।” जवाब में कहा गया है, “इसके अलावा, उक्त निर्वाचन आयुक्तों ने कहा कि ऐसा तब हुआ, जब सभी संबंधित अधिकारियों को बार-बार मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे कि वे आयोग से पूर्व चर्चा या मंजूरी लिए बिना ऐसा कोई कदम न उठाएं।”

जवाब के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्तों ने इस बात की ओर इशारा किया कि गर्ग के कार्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 का स्पष्ट उल्लंघन थे। शिकायत पर तीन अगस्त को तैयार किए गए कैबिनेट नोट में कहा गया है, “इस संबंध में हम मुख्य निर्वाचन आयुक्त से इस मुद्दे पर उनकी राय मांग सकते हैं। अनुमोदन के लिए एक मसौदा पत्र प्रस्तुत है, कृपया देखें।”

‘संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता है’

अगले दिन अन्य मसौदा नोट में कहा गया कि निर्वाचन आयोग की ओर से आधिकारिक सूचना मिले बिना, किसी अधिकारी के खिलाफ दो निर्वाचन आयुक्तों की ओर से की गई शिकायतों पर कार्रवाई करने को संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता है। आरटीआई जवाब में कहा गया है, “आयोग एक संवैधानिक संस्था है और इसे इस तरह से बनाया गया है कि इस पर कार्यपालिका का कोई हस्तक्षेप न हो, ताकि यह स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से काम कर सके।”

जवाब में कहा गया है, “आयोग का कामकाज निर्वाचन आयोग के नियमों और दिशा-निर्देशों के तहत संचालित होता है। उपरोक्त पत्र निर्वाचन आयुक्तों की व्यक्तिगत हैसियत से भेजे गए हैं। हालांकि, इन्हें पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन इन्हें पूर्ण आयोग की ओर से कोई औपचारिक पत्राचार नहीं माना जा सकता।” नोट में कहा गया है कि भले ही मनीष गर्ग की नियुक्ति मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति की ओर से की गई है। लेकिन अब वह निर्वाचन आयोग के अधिकारी हैं। उनके काम तथा आचरण को आयोग के नियमों और दिशा-निर्देशों के तहत नियंत्रित किया जाए और निगरानी की जाए।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर क्यों नहीं हो सकती कार्रवाई?

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक कैबिनेट नोट में बताया गया है कि ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा-18 के तहत आयोग के कामकाज का निपटारा, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए और मतभेद होने की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाना चाहिए।

नोट में कहा गया है, “निर्वाचन आयुक्तों ने उचित कार्रवाई के लिए ये संदेश भेजे हैं। हालांकि, पूर्ण आयोग की ओर से कोई आधिकारिक संदेश न होने की स्थिति में इस स्तर पर कोई भी कार्रवाई करना अनुचित हो सकता है। इसे संवैधानिक निकाय के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है। इसलिए दोनों निर्वाचन आयुक्तों को पावती भेजना और साथ ही सीईसी की जानकारी के लिए उनके पीपीएस को इसकी एक प्रति भेजना उचित होगा।”

कैबिनेट सचिव सोमनाथन के हस्ताक्षर वाला एक ड्राफ्ट नोट को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव और स्थापना अधिकारी को भी भेजा गया, ताकि इस मामले को रिकॉर्ड पर लिया जा सके। इससे “भविष्य में अधिकारी से जुड़े निर्णय लेते समय इस बात को ध्यान में रखने में मदद मिलेगी।” सोमनाथन की ओर से पत्र की एक कॉपी दोनों निर्वाचन आयुक्तों को भी भेजी गई थी।

निर्वाचन आयुक्तों का आरोप

निर्वाचन आयुक्तों ने आरोप लगाया था कि गर्ग ने आयोग या संबंधित आयुक्तों से चर्चा किए बिना या उन्हें सूचित किए बिना, वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्तों, उप निर्वाचन आयुक्तों, महानिदेशकों और उनके समकक्ष अधिकारियों के बीच कार्य-आवंटन में बदलाव करने का आदेश जारी कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा तब किया गया, जब आयोग से पूर्व चर्चा या मंजूरी लिए बिना इस तरह के बदलाव न करने के लिए बार-बार मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे। जोशी ने कहा कि जब उन्होंने प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगी, तो उन्हें वह फाइल नहीं दी गई। दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई स्थापित परंपरा के विपरीत है और अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करती है।