PPF vs NSC: पीपीएफ या एनएससी? लंबी अवधि की बचत के लिए कौन सी सरकारी योजना है बेस्ट, देखें तुलना

PPF vs NSC Comparison: अगर आप बिना किसी जोखिम के अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित निवेश कर बेहतर रिटर्न और टैक्स बचत चाहते हैं, तो केंद्र सरकार की छोटी बचत योजनाएं सबसे भरोसेमंद विकल्प मानी जाती हैं। इन योजनाओं में पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF) और नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC) सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं।

दोनों ही योजनाएं पूरी तरह से सरकारी गारंटी के साथ आती हैं, लेकिन इनके निवेश की अवधि, ब्याज दर, टैक्स नियम और लिक्विडिटी के नियम एक-दूसरे से काफी अलग हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आपकी वित्तीय जरूरतों के हिसाब से कौन सी योजना ज्यादा बेहतर है।

PPF vs NSC: ब्याज दर और मैच्योरिटी अवधि

दोनों सरकारी योजनाओं में ब्याज दर और अवधि का अंतर सबसे प्रमुख है:

PPF vs NSC: ब्याज दर और मैच्योरिटी अवधि

लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए PPF क्यों है बेस्ट?

PPF को उन निवेशकों के लिए तैयार किया गया है जो 10 से 15 साल या उससे अधिक लंबे समय जैसे- रिटायरमेंट या बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए पैसा जोड़ना चाहते हैं।इसमें आपको एक साथ एकमुश्त रकम जमा करने की बाध्यता नहीं है। आप पूरे साल में किस्तों में पैसा जमा कर सकते हैं। 15 साल की शुरुआती अवधि होने के कारण इसमें ब्याज पर मिलने वाला चक्रवृद्धि ब्याज लंबी अवधि में एक बहुत बड़ा कॉर्पस तैयार कर देता है।

5 साल के निश्चित गोल के लिए NSC है बेहतर विकल्प

अगर आपके पास एकमुश्त रकम है और आपका लक्ष्य 5 साल की अवधि के लिए स्पष्ट है, तो NSC एक सही चुनाव साबित हो सकता है। NSC में जिस ब्याज दर (7.7%) पर आप सर्टिफिकेट खरीदते हैं, वह दर आपके 5 साल के पूरे कार्यकाल के लिए लॉक हो जाती है। बाजार या दरों में उतार-चढ़ाव का इस पर असर नहीं पड़ता।

PPF में एक ही खाता सालों-साल चलता रहता है, जबकि NSC में हर बार नया सर्टिफिकेट खरीदने पर उसकी 5 साल की मैच्योरिटी अलग से तय होती है।

टैक्स छूट का गणित: ‘EEE’ कैटेगरी में आता है PPF

ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत दोनों योजनाओं में आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत ₹1.5 लाख तक के निवेश पर टैक्स छूट मिलती है, लेकिन टैक्स का अंतिम नियम अलग है:

PPF (Exempt-Exempt-Exempt): यह ट्रिपल ई (EEE) कैटेगरी में आता है। इसमें निवेश की गई रकम, मिलने वाला ब्याज और मैच्योरिटी पर मिलने वाला पूरा पैसा पूरी तरह टैक्स-फ्री होता है।

NSC (Taxable Interest): NSC का ब्याज टैक्सेबल होता है। हालांकि, शुरुआत के 4 सालों में मिलने वाला ब्याज स्वतः दोबारा निवेश मान लिया जाता है, जिससे उस पर 80C के तहत छूट मिल जाती है। लेकिन मैच्योरिटी पर अंतिम वर्ष का ब्याज टैक्स के दायरे में आता है।

लिक्विडिटी और पैसे निकालने के नियम

इमरजेंसी में पैसे की जरूरत पड़ने पर दोनों के नियम कड़े हैं:

PPF: इसमें निश्चित शर्तों के तहत 6 साल पूरे होने के बाद आंशिक निकासी और लोन की सुविधा मिलती है। कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे- गंभीर बीमारी या उच्च शिक्षा) में ही 5 साल बाद खाता समय से पहले बंद किया जा सकता है।

NSC: इसमें 5 साल से पहले पैसा निकालना लगभग असंभव है। केवल खाताधारक की मृत्यु या अदालत के आदेश जैसी असाधारण परिस्थितियों में ही मैच्योरिटी से पहले इसे भुनाया जा सकता है।

आपके लिए कौन सी योजना है बेस्ट?

PPF चुनें: अगर आपका लक्ष्य 10-15 साल से आगे का है, आप रिटायरमेंट प्लान कर रहे हैं और मैच्योरिटी पर 100% टैक्स-फ्री रिटर्न चाहते हैं।

NSC चुनें: अगर आप 5 साल के निश्चित समय के लिए पैसा सुरक्षित रखना चाहते हैं, एकमुश्त निवेश करना चाहते हैं और PPF की तुलना में अधिक ब्याज दर (7.7%) पाना चाहते हैं।

वैसे एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सबसे स्मार्ट तरीका ये है कि आप चाहें तो अपने पोर्टफोलियो को बैलेंस करने के लिए दोनों योजनाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। लंबी अवधि के लिए PPF में और 5 साल के मीडियम-टर्म गोल के लिए NSC में निवेश कर सकते हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

EPF vs PPF: रिटायरमेंट फंड के लिए कौन सा ऑप्शन है नंबर-1? जानिए किसमें मिलेगा ज्यादा फायदा

EPF vs PPF Retirement Planning: जब भी नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग की बात आती है, तो दो नाम सबसे पहले सामने आते हैं एंप्लॉई प्रोविडेंट फंड (EPF) और पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF)। दोनों ही योजनाएं सरकार द्वारा समर्थित हैं, लंबी अवधि की बचत के लिए हैं और टैक्स छूट का फायदा भी देती हैं। यही वजह है कि इन दोनों में से किसी एक को चुनना काफी उलझन भरा काम लगता है।

हालांकि, वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि यह ‘EPF बनाम PPF’ की जंग नहीं है। दोनों स्कीम्स के अपने अलग-अलग फायदे और उद्देश्य हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि एक सैलरीड कर्मचारी को किसे पहले चुनना चाहिए।

EPF: ऑटोमैटिक बचत और एंप्लॉयर का योगदान

अगर आप किसी ऐसी कंपनी या संस्थान में काम करते हैं जो EPF के तहत कवर है, तो आपके वेतन से हर महीने अपने आप ईपीएफ में कटौती होती है। ईपीएफ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जितना योगदान आपकी बेसिक सैलरी से कटता है, उतना ही हिस्सा आपकी कंपनी भी जमा करती है। यह एक ऐसा एक्स्ट्रा फायदा है जो आपको PPF में नहीं मिलता।

बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के आपकी सैलरी से हर महीने पैसे कटकर जमा होते रहते हैं, जिससे करियर के अंत तक एक बड़ा फंड तैयार हो जाता है। इसीलिए ज्यादातर फाइनेंशियल प्लानर्स सुझाव देते हैं कि वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए EPF को हमेशा पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए।

PPF: फ्लेक्सिबिलिटी और अतिरिक्त बचत का जरिया

पीपीएफ किसी कंपनी या नौकरी से बंधा हुआ नहीं होता। इसे कोई भी नागरिक अपने बैंक या पोस्ट ऑफिस में जाकर खुलवा सकता है। इसमें आप अपनी सुविधा और बजट के हिसाब से न्यूनतम और अधिकतम सीमा के दायरे में सालाना निवेश कर सकते हैं।

अगर आप जॉब बदलते हैं या कुछ समय का ब्रेक लेते हैं, तब भी आपका PPF अकाउंट बिना किसी रुकावट के चलता रहता है क्योंकि यह पूरी तरह आपका पर्सनल अकाउंट है। साथ ही आप EPF के अलावा अपनी रिटायरमेंट या किसी अन्य लंबे लक्ष्य के लिए अतिरिक्त बचत करना चाहते हैं, तो पीपीएफ सबसे सुरक्षित विकल्प बनता है।

लिक्विडिटी और निकासी

दोनों ही योजनाएं रोजमर्रा के खर्चों या बार-बार पैसे निकालने के लिए नहीं बनाई गई हैं।

EPF निकासी: ईपीएफ से पैसे निकालने के नियम आपकी नौकरी की स्थिति और विशिष्ट जरूरतों जैसे- घर खरीदना, बीमारी, शादी से जुड़े होते हैं।

PPF लॉक-इन: पीपीएफ का लॉक-इन पीरियड 15 साल का होता है, हालांकि कुछ शर्तों के साथ आंशिक निकासी और लोन की सुविधा मिलती है।

दोनों में से किसे चुनें?

एक वेतनभोगी कर्मचारी के लिए सही रणनीति यह है कि दोनों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय पूरक के रूप में इस्तेमाल किया जाए:

ईपीएफ को बनने दें बुनियाद: चूंकि ईपीएफ में कंपनी का भी योगदान मिलता है, इसलिए अपनी नौकरी के दौरान ईपीएफ अंशदान को बिना किसी रुकावट के जारी रहने दें यह आपकी रिटायरमेंट की मुख्य नींव है।

पीपीएफ को बनाएं बैकअप शील्ड: अगर ईपीएफ में कटौती के बाद भी आपके बजट में और बचत की गुंजाइश है, तो अतिरिक्त सरप्लस पैसे को पीपीएफ में निवेश करें। इससे आपका एसेट एलोकेशन मजबूत होगा और पोर्टफोलियो सुरक्षित रहेगा।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Gold Silver Price Today: सोना ₹900 सस्ता हुआ, चांदी का ₹1800 बढ़ा भाव

Gold Silver Price Today: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोमवार को सोने की कीमत में ₹900 प्रति 10 ग्राम की गिरावट दर्ज की गई। ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के मुताबिक, 24 कैरेट शुद्धता वाला सोना अब ₹1,47,400 प्रति 10 ग्राम पर आ गया है। पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹1,48,300 प्रति 10 ग्राम था।

सोना क्यों हुआ सस्ता?

HDFC Securities के सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट सौमिल गांधी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की चाल सुस्त रही। वहीं, रुपये की मजबूती का भी घरेलू कीमतों पर असर पड़ा। इसी वजह से सोना सीमित दायरे में कारोबार करता रहा और कीमतों में गिरावट आई।

चांदी में लौटी तेजी

सोने के उलट चांदी की कीमत में ₹1,800 प्रति किलो की तेजी आई। अब चांदी ₹2,26,500 प्रति किलो पर पहुंच गई है। पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹2,24,700 प्रति किलो था।

Lemonn Markets Desk के रिसर्च हेड गौरव गर्ग के अनुसार, अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद निवेशकों ने चांदी में खरीदारी बढ़ाई। इससे चांदी के दाम मजबूत हुए।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्या रहा हाल?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड मामूली बढ़त के साथ 4,048.89 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं, चांदी भी हल्की तेजी के साथ 57.97 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

Kotak Securities की कमोडिटी रिसर्च AVP कायनात चैनवाला के मुताबिक, ईरान पर नए हमले की योजना रद्द होने के बाद भू-राजनीतिक तनाव कुछ कम हुआ है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई और कीमती धातुओं को थोड़ा सहारा मिला। साथ ही, डॉलर में कमजोरी ने भी सोना और चांदी को सपोर्ट दिया।

इस हफ्ते इन आंकड़ों पर रहेगी नजर

Mirae Asset Sharekhan के हेड ऑफ कमोडिटीज प्रवीण सिंह का कहना है कि तेल की कीमतों में 5% से ज्यादा गिरावट के बावजूद सोने में बड़ी तेजी नहीं दिख रही है। इसकी वजह यह है कि इस हफ्ते अमेरिका के कई अहम आर्थिक आंकड़े जारी होने वाले हैं। निवेशकों की नजर फिलहाल इन्हीं आंकड़ों पर टिकी है।

MCX गोल्ड पर एक्सपर्ट की राय

LKP Securities के वाइस प्रेसिडेंट (कमोडिटी और करेंसी रिसर्च) जतीन त्रिवेदी का कहना है कि फिलहाल MCX पर सोने की कीमतें सीमित दायरे में कारोबार कर रही हैं। इसकी वजह अमेरिका-ईरान के बीच फिलहाल कोई नया तनाव नहीं होना, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और डॉलर का कमजोर होना है।

अब आगे सोने की चाल कैसी रहेगी

जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, अब सोने की चाल फेडरल रिजर्व के रेट संकेत और अमेरिका के रोजगार से जुड़े अहम आंकड़ों के हिसाब से चलेंगी। उनका मानना है कि तकनीकी रूप से निकट भविष्य में MCX Gold ₹1,42,000 से ₹1,45,000 प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार कर सकता है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

PPF Rules: पीपीएफ में पैसा लगाते समय ये 5 गलतियां न करें, वरना आपके रिटर्न पर सीधा असर पड़ेगा

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

आपके PF का पैसा EPFO कहां निवेश करता है, आपको तगड़ा ब्याज कैसे मिलता है? समझिए पूरा हिसाब

हर महीने आपकी सैलरी से PF कटता है। फिर EPFO उसी पैसे को अलग-अलग जगह निवेश करता है। वहीं से कमाई होती है और उसी कमाई के दम पर EPFO अपने करोड़ों सदस्यों को 8.25% जैसी आकर्षक ब्याज दर देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का यह विशाल फंड आखिर संभालता कौन है?

जवाब आपको चौंका सकता है। दरअसल, EPFO इस निवेश का बड़ा हिस्सा खुद मैनेज नहीं करता, बल्कि पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के जरिए प्रोफेशनल फंड मैनेजर को सौंपता है।

PMS आखिर क्या होते हैं?

पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में अमीर निवेशकों की तस्वीर आती है। लेकिन हकीकत कुछ और है।

SEBI के जून 2026 के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं। PMS इंडस्ट्री के 36.72 लाख करोड़ रुपये में से करीब 31.04 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 85% पैसा EPFO और दूसरे प्रोविडेंट फंड्स का है। इससे साफ है कि PMS सिर्फ अमीर निवेशकों के लिए नहीं है। बड़े संस्थान भी अपने हजारों-लाखों करोड़ रुपये इसी के जरिए निवेश करते हैं।

EPFO PMS का इस्तेमाल क्यों करता है?

EPFO करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की रिटायरमेंट की बचत संभालता है। उसका मकसद ज्यादा मुनाफा कमाना नहीं है। उसकी पहली जिम्मेदारी लोगों का पैसा सुरक्षित रखना है। साथ ही, लंबे समय तक स्थिर रिटर्न देना भी जरूरी है।

इसी वजह से EPFO निवेश की जिम्मेदारी SEBI-रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है। हालांकि, निवेश से जुड़े बड़े फैसलों पर नजर EPFO और सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की ही रहती है।

नियमों के मुताबिक, EPFO अपने पैसे का 45% से 65% सरकारी बॉन्ड, 35% से 45% कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाता है। वहीं, 15% तक पैसा इक्विटी में लगाया जा सकता है। यह निवेश भी ज्यादातर इंडेक्स ETF के जरिए होता है।

पैसा बाहर के एक्सपर्ट क्यों संभालते हैं?

31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड संभालना आसान नहीं है। इसके लिए डेट मार्केट की गहरी समझ चाहिए। जोखिम का आकलन करना पड़ता है। हर दिन बाजार पर नजर रखनी होती है।

अगर EPFO यह पूरा काम खुद करे तो उसे बहुत बड़ा निवेश सेटअप तैयार करना पड़ेगा। इसलिए वह यह जिम्मेदारी प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है।

EPFO एक नहीं, कई पोर्टफोलियो मैनेजर नियुक्त करता है। उनकी नियुक्ति बोली प्रक्रिया से होती है। प्रदर्शन की लगातार समीक्षा होती है। जो बेहतर काम करता है, उसे ज्यादा फंड मिलता है। खराब प्रदर्शन करने वाले मैनेजर अपना काम भी गंवा सकते हैं।

chart epfo

आम निवेशक क्या सीख सकते हैं?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कि EPFO का पोर्टफोलियो कॉपी करने की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी निवेश करने की सोच जरूर अपनाई जा सकती है।

सबसे बड़ी सीख है अनुशासन। पहले तय करें कि कितना पैसा इक्विटी में रखना है और कितना डेट में। फिर बाजार के उतार-चढ़ाव को देखकर बार-बार फैसला न बदलें। SIP करते रहें और समय-समय पर पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करें।

दूसरी बात, अगर निवेश की ज्यादा समझ नहीं है तो म्यूचुअल फंड या ETF जैसे प्रोफेशनल विकल्प चुनें। हर शेयर खुद खरीदना जरूरी नहीं होता।

तीसरी सीख है कि सिर्फ रिटर्न के पीछे न भागें। रिस्क पर भी बराबर ध्यान दें। पूरा पैसा एक ही शेयर, सेक्टर या कम गुणवत्ता वाले बॉन्ड में लगाना समझदारी नहीं है।

EPFO की रणनीति हर किसी के लिए सही नहीं

EPFO का पोर्टफोलियो उसकी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। आम निवेशकों की जरूरतें अलग होती हैं। खासकर युवा निवेशकों को लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए ज्यादा इक्विटी की जरूरत पड़ सकती है।

एक और बड़ा फर्क टैक्स का है। PMS में हर खरीद और बिक्री पर टैक्स लग सकता है। वहीं, म्यूचुअल फंड में आमतौर पर यूनिट बेचने तक टैक्स नहीं देना पड़ता। इसलिए बिना सोचे-समझे EPFO की निवेश रणनीति अपनाना हर निवेशक के लिए सही नहीं होगा।

PPF for Child: बच्चे के नाम पर हर महीने ₹5,000 की बचत! जानिए 15 साल बाद कितना बड़ा फंड होगा

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

क्या स्पाउस के अकाउंट में पैसे डालकर टैक्स बचाया जा सकता है? पैसे गिफ्ट करने को लेकर क्या रूल है, ये कब टैक्सेबल होता है?

Tax Rules On Gifting Money To Spouse: बहुत से नौकरीपेशा और बिजनेसमैन यह मान लेते हैं कि अपनी पत्नी या पति के बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करके या उनके नाम पर निवेश करके परिवार की टैक्स देनदारी को कम किया जा सकता है। विशेष रूप से तब, जब स्पाउस की कोई अपनी कमाई न हो या वे लोअर टैक्स स्लैब में आते हों।

हालांकि, आयकर विभाग के नियम कुछ और ही कहते हैं। अगर आप सही नियमों और ‘क्लबिंग ऑफ इनकम’ के प्रावधानों को नहीं समझते हैं, तो टैक्स बचाने का यह तरीका आपके लिए भारी पड़ सकता है।

क्या स्पाउस को पैसे गिफ्ट करना टैक्स फ्री है?

हां, पैसे गिफ्ट करना पूरी तरह से टैक्स फ्री है! इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56 के तहत पति या पत्नी को ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में रखा गया है। इसलिए अपनी पत्नी या पति को कैश, चेक या एसेट के रूप में कितना भी पैसा गिफ्ट किया जाए, उस पर पाने वाले को कोई टैक्स नहीं देना होता।

कब लगता है अन्य पर टैक्स?

किसी गैर-रिश्तेदार से एक वित्तीय वर्ष में ₹50,000 से अधिक का गिफ्ट मिलने पर टैक्स लगता है, लेकिन स्पाउस के मामले में यह सीमा लागू नहीं होती। पैसे गिफ्ट करना भले ही टैक्स-फ्री हो, लेकिन जैसे ही उस पैसे को कहीं इन्वेस्ट किया जाता है और उससे कमाई शुरू होती है, टैक्स के नियम बदल जाते हैं।

‘क्लबिंग ऑफ इनकम’ (सेक्शन 64) का गणित क्या है?

अगर आप अपनी पत्नी को पैसे गिफ्ट करते हैं और वे उस पैसे को एफडी, म्युचुअल फंड, शेयर मार्केट या सोने में निवेश कर देती हैं, तो उससे होने वाली कमाई पर आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आपको टैक्स देना होगा। आयकर अधिनियम की धारा 64 के तहत ‘क्लबिंग प्रावधान’ इसलिए बनाए गए हैं ताकि लोग कम टैक्स स्लैब वाले पारिवारिक सदस्यों के नाम पर संपत्ति या पैसे ट्रांसफर करके टैक्स न चुरा सकें।

टैक्स किस पर लगेगा?

गिफ्ट किए गए पैसे से जो भी ब्याज, डिविडेंड या कैपिटल गेन्स होगा, वह आपकी कुल कर योग्य आय में जोड़ दिया जाएगा और आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स काटा जाएगा।

कब लागू नहीं होते क्लबिंग ऑफ इनकम के नियम?

कुछ खास परिस्थितियां ऐसी हैं जहां क्लबिंग के नियम लागू नहीं होते और आप कानूनी रूप से टैक्स राहत पा सकते हैं:

खुद की प्रोफेशनल या टेक्निकल योग्यता से कमाई: अगर आपकी पत्नी आपकी किसी कंपनी या फर्म से सैलरी, फीस या कमीशन प्राप्त करती हैं और वह कमाई उनकी अपनी शैक्षणिक योग्यता, ज्ञान या हुनर के दम पर है, तो उस कमाई को आपके साथ नहीं जोड़ा जाएगा।

PPF में निवेश: अगर आप अपनी पत्नी के नाम से पीपीएफ खाता खोलकर उसमें पैसे जमा करते हैं, तो उस पर मिलने वाला ब्याज पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। इसलिए वहां क्लबिंग का कोई नुकसान नहीं होता।

पिन मनी या घर के खर्च की बचत: अगर पत्नी घर चलाने के लिए मिले खर्चों में से बचत करके उसे कहीं इन्वेस्ट करती हैं, तो उससे हुई आय पर क्लबिंग नियम लागू नहीं होते।

कमाई पर दोबारा कमाई: गिफ्ट किए गए पैसे से जो पहली कमाई होगी, वह आपके खाते में जुड़ेगी। लेकिन अगर आपकी पत्नी उस ब्याज के पैसे को दोबारा कहीं इन्वेस्ट करके और कमाई करती हैं, तो उस ‘दूसरी कमाई’ पर क्लबिंग लागू नहीं होगी।

ITR Deadline Alert: 31 जुलाई के बाद ITR भरा तो लगेगा जुर्माना! जानिए लेट रिटर्न दाखिल करने पर कितना होगा नुकसान

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Retirement Planning: रिटायरमेंट के लिए कौन-सी पेंशन स्कीम सबसे बढ़िया? समझिए पूरा हिसाब

Retirement Planning: रिटायरमेंट की प्लानिंग जितनी जल्दी शुरू करेंगे, उतना बेहतर रहेगा। आज लोगों के पास कई विकल्प हैं। कोई NPS में निवेश करता है, कोई PPF में पैसा जमा करता है। नौकरीपेशा लोगों के लिए EPF है। वहीं, कम आय वाले लोगों के लिए Atal Pension Yojana (APY) और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM) जैसी योजनाएं भी हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सबसे बेहतर स्कीम कौन-सी है? इसका जवाब एक नहीं है। यह आपकी नौकरी, आय, उम्र और रिटायरमेंट के लक्ष्य पर निर्भर करता है। आइए एक-एक करके समझते हैं।

स्कीम किसके लिए सबसे बड़ा फायदा

स्कीमकिसके लिएसबसे बड़ा फायदा
NPSसभी भारतीय नागरिक
बड़ा रिटायरमेंट फंड और टैक्स छूट

EPFनौकरीपेशा कर्मचारी
कर्मचारी और कंपनी दोनों का योगदान

PPFसभी भारतीय नागरिक
पूरी तरह टैक्स-फ्री रिटर्न

APYकम आय वाले लोग
₹1,000 से ₹5,000 तक गारंटीड पेंशन

PM-SYMअसंगठित क्षेत्र के कामगार₹3,000 मासिक गारंटीड पेंशन, सरकार भी बराबर योगदान देती है
UPSकेंद्र सरकार के पात्र कर्मचारीतय शर्तों पर निश्चित पेंशन

NPS: लंबी अवधि में बड़ा फंड बनाने का मौका

अगर आपकी उम्र 20 से 45 साल के बीच है और आप लंबे समय तक निवेश कर सकते हैं, तो National Pension System (NPS) अच्छा विकल्प माना जाता है। इसमें आपका पैसा शेयर बाजार और बॉन्ड में निवेश होता है। इसलिए लंबे समय में अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। हालांकि, रिटर्न तय नहीं होता।

मान लीजिए आपकी उम्र 30 साल है और आप हर महीने ₹5,000 निवेश करते हैं। अगर औसतन 10% सालाना रिटर्न मिलता है और आप 60 साल की उम्र तक निवेश करते हैं, तो आपका कुल निवेश ₹18 लाख होगा। वहीं, अनुमानित फंड करीब ₹1.13 करोड़ बन सकता है।

रिटायरमेंट के समय करीब ₹68 लाख (60%) टैक्स-फ्री निकाले जा सकते हैं। बाकी करीब ₹45 लाख से एन्युटी खरीदनी होगी। इसी से हर महीने पेंशन मिलेगी।

EPF: नौकरीपेशा लोगों की मजबूत बचत

अगर आप नौकरी करते हैं, तो EPF आपकी रिटायरमेंट प्लानिंग की सबसे मजबूत नींव है। इसमें कर्मचारी और कंपनी दोनों हर महीने योगदान करते हैं। सरकार हर साल ब्याज भी देती है।

मान लीजिए आपकी बेसिक सैलरी ₹40,000 है। ऐसे में कर्मचारी और कंपनी मिलाकर हर महीने करीब ₹9,600 EPF खाते में जमा हो सकते हैं। अगर 30 साल तक नियमित योगदान होता है, तो रिटायरमेंट के समय बड़ा फंड तैयार हो सकता है।

PPF: बिना जोखिम वालों के लिए

अगर आप जोखिम नहीं लेना चाहते, तो Public Provident Fund (PPF) अच्छा विकल्प है। इसमें सरकार ब्याज देती है। ब्याज और मैच्योरिटी दोनों टैक्स-फ्री रहते हैं।

अगर आप हर साल ₹1.5 लाख निवेश करते हैं और ब्याज दर 7.1% रहती है, तो 15 साल बाद करीब ₹40 लाख का फंड बन सकता है। जरूरत पड़ने पर इस खाते को आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

APY : कम आय वालों के लिए बेहतर

अगर आपकी आय कम है और आप गारंटीड पेंशन चाहते हैं, तो Atal Pension Yojana (APY) अच्छा विकल्प हो सकती है। इसमें 60 साल की उम्र के बाद ₹1,000 से ₹5,000 तक मासिक पेंशन मिलती है। जितनी कम उम्र में योजना से जुड़ेंगे, उतना कम योगदान देना होगा।

मान लीजिए आपकी उम्र 25 साल है और आप ₹5,000 महीने की पेंशन चाहते हैं। ऐसे में आपको करीब ₹376 महीने जमा करने होंगे। 60 साल के बाद आपको तय पेंशन मिलनी शुरू हो जाएगी।

PM-SYM : रेहड़ी पटरी या मजदूरी वालों के लिए

अगर आप असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जैसे रेहड़ी-पटरी लगाते हैं, मजदूरी करते हैं या छोटे दुकानदार हैं, तो प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन (PM-SYM) भी अच्छा विकल्प है। इस योजना में 60 साल की उम्र के बाद ₹3,000 महीने की गारंटीड पेंशन मिलती है। इसकी सबसे खास बात यह है कि जितना पैसा आप जमा करते हैं, उतना ही पैसा सरकार भी जमा करती है।

उदाहरण के लिए, अगर आपकी उम्र 30 साल है, तो आपको हर महीने ₹100 जमा करने होंगे। सरकार भी ₹100 जमा करेगी। यानी हर महीने कुल ₹200 खाते में जमा होंगे। 60 साल की उम्र के बाद आपको ₹3,000 महीने की पेंशन मिलेगी। अगर पेंशनधारक की मृत्यु हो जाती है, तो उसके जीवनसाथी को 50% फैमिली पेंशन मिलती है।

UPS: सरकारी कर्मचारियों के लिए नया विकल्प

अगर आप केंद्र सरकार के पात्र कर्मचारी हैं, तो Unified Pension Scheme (UPS) भी अच्छा विकल्प हो सकता है।

इस योजना में तय शर्तें पूरी होने पर रिटायरमेंट के बाद आखिरी 12 महीने की औसत बेसिक सैलरी का 50% तक पेंशन मिल सकती है। इससे रिटायरमेंट के बाद नियमित आय बनी रहती है।

आखिर कौन-सी स्कीम सबसे बेहतर?

  • अगर आप प्राइवेट नौकरी करते हैं, तो EPF और NPS का कॉम्बिनेशन सबसे मजबूत माना जाता है। EPF सुरक्षित बचत देता है, जबकि NPS लंबी अवधि में बड़ा फंड बनाने में मदद कर सकता है।
  • अगर आप खुद का कारोबार करते हैं, तो NPS और PPF अच्छा विकल्प हो सकता है। एक तरफ बेहतर ग्रोथ की संभावना रहती है, तो दूसरी तरफ सुरक्षित और टैक्स-फ्री बचत भी होती है।
  • अगर आपकी आय कम है या आप असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, तो APY और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन जैसी योजनाएं रिटायरमेंट के बाद नियमित पेंशन का सहारा बन सकती हैं।
  • अगर आप केंद्र सरकार के पात्र कर्मचारी हैं, तो UPS पर भी विचार कर सकते हैं।

रिटायरमेंट के लिए कितना फंड होना चाहिए?

एक आसान नियम है। रिटायरमेंट के बाद हर महीने जितना खर्च चाहिए, उसका कम से कम 200 से 250 गुना फंड बनाने की कोशिश करें।

मान लीजिए रिटायरमेंट के बाद हर महीने ₹20,000 खर्च होगा। ऐसे में कम से कम ₹50 लाख से ₹60 लाख का रिटायरमेंट फंड बनाने का लक्ष्य रखना चाहिए। हालांकि, महंगाई को देखते हुए इससे बड़ा फंड तैयार करना हमेशा बेहतर रहेगा।

₹2 लाख सैलरी, नो लोन और अच्छी सेविंग्स… फिर भी 26 साल के युवक को क्यों लगता है कि वह गरीब है

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।